अखिल कुमार नामदेव
देश में जब अंग्रेजी कुशासन का दौर चल रहा था तब उन्हें सीधे.सीधे चुनौती देने एवं ललकारने कासाहस मालवा में सीहोर की धरती पर कुंवर चैनसिंह ने दिखाया. उन्होंने अपने साथियों के साथफिरंगियों से लोहा लिया उन्हें नाको चने चबवाए लेकिन अंत में वह वीरगति को प्राप्त हो गए. देश मेंअंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति का पहला शहीद मंगल पांडे को माना जाता है. मगरकुंवर चैन सिंह की शहादत मंगल पांडे के शहीद होने की घटना से भी करीब 33 वर्ष पहले की है.

भारत में व्यापारी के रूप में आई ईस्ट इंडिया कंपनी की हड़प नीति के चलते राजे-रजवाड़े और आम नागरिक बहुत प्रताड़ित और व्यथित हो रहे थे. अपनी विस्तारवादी लिप्सा के चलते कंपनी जहां रजवाड़ों और रियासतों को अधिकार विहीन कर रही थी, वहीं व्यापार के बहाने नागरिकों का दोहन भी कर रही थी. इस वजह से यदा कदा कंपनी की खिलाफत के सुर भी सुनाई पड़ने लगे थे. सन 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल के तत्कालीन नवाब के बीच हुए समझौते के बाद कंपनी ने सीहोर में एक हजार सैनिकों की छावनी बनाई. कंपनी द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को इन फौजियों का प्रभारी बनाया गया. इस फौजी टुकड़ी का वेतन भोपाल रियासत के शाही खजाने से दिया जाता था. समझौते के तहत पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को भोपाल सहित नजदीकी नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ रियासत से संबंधित राजनीतिक अधिकार भी सौंप दिए गए. बाकी तो चुप रहे, लेकिन इस फैसले को नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह ने गुलामी की निशानी मानते हुए स्वीकार नहीं किया. अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बन चुके कुंवर चैन सिंह ने रियासत से गद्दारी कर रहे अंग्रेजों के पिट्ठू दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा को मार दिया.

मंत्री रूपराम के भाई ने कुंवर चैन सिंह के हाथों अपने भाई के मारे जाने की शिकायत कलकत्ता स्थित गवर्नर जनरल से की. गवर्नर जनरल के निर्देश पर पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक बैठक के लिए बुलाया. बैठक में मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा की हत्या के अभियोग से बचाने के लिए दो शर्तें रखीं. पहली शर्त थी कि नरसिंहगढ़ रियासत, अंग्रेजों की अधीनता स्वीकारे. दूसरी शर्त थी कि क्षेत्र में पैदा होनेवाली अफीम की पूरी फसल सिर्फ अंग्रेजों को ही बेची जाए. कुंवर चैन सिंह द्वारा दोनों ही शर्तें ठुकरा देने पर मैडॉक ने उन्हें 24 जून 1824 को सीहोर पहुंचने का आदेश दिया. अंग्रेजों की बदनीयती का अंदेशा होने के बाद भी कुंवर चैन सिंह नरसिंहगढ़ से अपने विश्वस्त साथी सारंगपुर निवासीहिम्मत खां और बहादुर खां सहित 43 सैनिकों के साथ सीहोर पहुंचे. जहां पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक और अंग्रेज सैनिकों से उनकी जमकर मुठभेड़ हुई. कुंवर चैन सिंह और उनके मुट्ठी भर विश्वस्त साथियों ने शस्त्रों से सुसज्जित अंग्रेजों की फौज से डटकर मुकाबला किया. घंटों चलीलड़ाई में अंग्रेजों के तोपखाने ओर बंदूकों के सामने कुंवर चैन सिंह और उनके जांबाज लड़ाके डटेरहे.

ऐसा कहा जाता है  कि युद्ध के दौरान कुंवर चैन सिंह ने अंग्रेजों की अष्टधातु से बनी तोप पर अपनीतलवार से प्रहार किया जिससे तलवार तोप को काटकर उसमे फंस गई. मौके का फायदा उठाकरअंग्रेज तोपची ने उनकी गर्दन पर तलवार का प्रहार कर दिया जिससे कुंवर चैन सिंह की गर्दनरणभूमि में ही गिर गई और उनका स्वामीभक्त घोड़ा शेष धड़ को लेकर नरसिंहगढ़ आ गया.  कुंवरचैन सिंह की धर्मपत्नी कुंवरानी राजावत जी ने उनकी याद में परशुराम सागर के पास एक मंदिर भीबनवाया जिसे हम  कुंवरानी  जी के  मंदिर के नाम से जानते है.

सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम के दौरान 6 अगस्त 1857 को हुए सीहोर सैनिक छावनीविद्रोह के भी 33 वर्ष पहले हुई नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह ओर उनके साथियोंकी इस शहादत का अपना महत्व है. 1824 की यह घटना नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह को इस अंचल के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में प्रतिष्ठित करती है. मध्य प्रदेशसरकार ने वर्ष 2015 से सीहोर स्थित कुंवर चैन सिंह की छतरी पर गार्ड ऑफ ऑनर प्रारम्भ किया है
(उप निदेशक, पीआईबी, भोपाल)

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