ज़िन्दगी
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कहते हैं कि ज़िन्दगी कभी किसी के लिए नहीं रुकती... लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं
है, ज़ाहिरी तौर पर भले ही ज़िन्दगी मुतासिर दिखाई न दे, लेकिन हक़ीक़ी तौर पर
ज़िन्दग...
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"मुहम्मद रफ़ी साहब इतने अच्छे इंसान थे कि क्या कहना.. वो कहते हैं न भगवान के आदमी... वो वही थे..!" पद्मविभूषण से सम्मानित अतुलनीय गायिका आशा भोंसले ने कभी अपने एक साक्षात्कार में यह बात बड़ी सच्चाई से कही थी... भारत रत्न लता मंगेशकर भी रफ़ी साहब को अतुलनीय रूप से सरल इंसान मानती थीं!...महान संगीतकार नौशाद उन्हें मौसिकी का पैगंबर कहते थे तो महेंद्र कपूर से सोनू निगम या अरिजीत तक तो वो भगवान जैसे ही हैं। परन्तु असल जीवन में वह बेहद सरल और शुक्रगुज़ार इंसान थे जिसे बस गाने से मतलब था और वो भी बहुत अच्छा गाने से... क्यों कि उनका ईश्वर तो सुरों में ही उनसे रिश्ता बनाता था।
अब से पूरी एक सदी पहले 24 दिसंबर 1924 को "कोटला सुल्तान सिंह"(तब भारत अब पाकिस्तान) में मुहम्मद रफ़ी का जन्म हुआ... बचपन में एक दरवेश के गाने से मोहित हुए रफ़ी को संगीत ने ख़ुद एक सुरीला दरवेश बना दिया था।
मुहम्मद रफ़ी... जिनको इस दुनिया से गए आज पूरे पैंतालीस साल हो चुके हैं.. मग़र उनकी आवाज़ और अंदाज़ का जादू आज भी संगीतप्रेमियों के सर चढ़ कर बोलता है और उनके गाए गीतों से रेडियो,टीवी,यूट्यूब सब भरे रहते हैं... उनके गीत जिनमें ग़ज़ब का रोमांस है,कामुकता है,प्रेम है,वात्सल्य है,करुणा है,उदासी है,पीड़ा है,हास्य है, मस्ती है और अतुलनीय भक्ति है। यही कारण है कि मुहम्मद रफ़ी के सिनेमा गायकी के लगभग तीस साल के सफ़र में उन्हें पद्मश्री, एक राष्ट्रीय पुरस्कार, छ फिल्म फेयर अवॉर्ड और पंद्रह बार फिल्म फेयर नॉमिनेशन प्राप्त हुए... किन्तु सबसे बड़ी उपलब्धि तो किसी कलाकार की यही होती है कि उसे ख़ास और आम दोनों तरह की जनता से प्रेम और सम्मान मिले...जिस मामले में मुहम्मद रफ़ी दुनिया के कुछ ही गिने चुने कलाकारों में आते हैं... वो नाती से नाना तक सबके दुलारे रहे हैं।
मै जब छोटा था तब मेरे माता पिता को रिकॉर्ड प्लेयर पर खूब गीत सुनने की आदत थी...उन गीतों में एक रिकॉर्ड लगभग रोज़ ही बजता था और वो था फिल्म "बैजू बावरा" का जिसके दो गाने मुझे सुनते सुनते रट गए - "तू गंगा की मौज मै जमुना का धारा"... और "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"... दोनों के गायक थे "महान रफ़ी"... लेकिन उस फिल्म का एक गीत जो मुझे केवल पसंद नहीं था बल्की मेरी आत्मा में घुला हुआ था वह था "राग मालकौंस" के उच्च स्वरों से सिहरता हुआ एक अद्भुत भजन जिसे नौशाद अली ने डूब कर संगीतबद्ध किया, शकील बदायूंनी ने हृदय के रक्त से लिखा और मुहम्मद रफ़ी ने अपनी आत्मा से ऐसा गाया कि बस पूरा भारत रोम रोम हर्षित हो उठा..उस गीत के अंतिम अंग में जब कीर्तन होता है उस टुकड़े में रफ़ी साहब ने जिस भावुकता से "मोहे दर्शन भिक्षा दे दो" कहा है वह बेजोड़ है।
रफ़ी साहब का कमाल यह था कि वो पांच वक़्त के नमाज़ी होने के साथ ही किसी भी धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठे रहे... यही कारण है कि जब फिल्मकार अपनी किसी फिल्मी सिचुएशन में किसी मार्मिक हिन्दू भजन को गाने के लिए किसी गायक की कल्पना करता तो उसमें हेमंत कुमार के बाद सबसे पहला नाम मुहम्मद रफ़ी का ही होता था और मुहम्मद रफ़ी इस उत्तरदायित्व को इतनी सच्चाई से निभाते थे कि अभिनेताओं को केवल रफ़ी के भावों का अनुकरण मात्र करना रह जाता था... जिसका जीवंत प्रमाण है फिल्म फिल्म वसंत बहार का वह अद्वितीय देवी भजन जिस पर भारत भूषण को अभिनय करने का अवसर मिला किन्तु यदि आप उस गीत को देख रहे हैं तो अनायास आपकी आँखें बंद हो कर केवल गायन में डूब जाना चाहेंगी... और वह मार्मिक भजन है - "दुनिया न भाए मोहे, अब तो बुला ले, चरणों में चरणों में"...माता काली की प्रतिमा के समक्ष चित्रांकित यह गीत आंखों में आंसुओं की धार लाने को पर्याप्त है।
मुहम्मद रफ़ी में अपनी भारत भूमि के प्रति एक गहरा लगाव था... बंटवारे के बाद भारत में रह जाने का उनका फ़ैसला कोई परिस्थिति जन्य घटना नहीं थी अपितु उनके अंतर्मन का निर्णय था... यह बात उनके अनेक देशभक्ति के गीतों के साथ साथ उस एक भजन में भी उदघोषित होती है जो भारत के सबसे लोकप्रिय कृष्ण भजनों में एक है और जिसके बिना अब तक कि कोई जन्माष्टमी नहीं मनी है - "बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके बृजबाला"... इस गीत को राजेंद्र कृष्ण जैसे अनूठे गीतकार ने जिस तन्मयता से लिखा था उसी तन्मयता से विद्वान संगीतकार रवि साहब ने उसकी धुन भी बनाई थी... पर सोने पर सुहागा तो थी मुहम्मद रफ़ी की दिलफरेब आवाज़ जिसमें गाते हुए उनकी तान में मानो कृष्ण की मुरली गूंज गूंज जाती हो...तभी तो इस एक पंक्ति पर पहुंच कर रफ़ी पूरे भारत का स्वर बन जाते हैं - "अरे! पूरा कर दे(तान) आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया/ कोई नहीं है तुझ भी मोहन भारत का रखवाला रे/ बड़ी देर भई नंदलाला"...!
कहते हैं कि किसी के हृदय में कितना प्रेम छुपा है किसी के प्रति यह तब पता लगता है जब कोई अपने प्रिय को नाम से पुकारता हो... आश्चर्य है कि जिस प्रेम भाव से मुहम्मद रफ़ी ने फिल्मी गीतों में भगवान राम का नाम पुकारा है वह कदाचित ही कोई दूसरा कर सका हो.. शायद यही कारण है कि उनसे अधिक "राम भजन" हिंदी फिल्मों में किसी भी गायक ने नहीं गाए हैं... यदि आपको रफ़ी के श्री राम प्रेम का अनुभव करना हो तो आप उनके गाए किसी भी राम भजन को सुनते हुए उनके "राम" बोलने का अंदाज़ सुनिए..विश्वास करिए आप रोम रोम सिहर उठेंगे... उनके भक्ति गीत - "जय रघुनंदन जय सिया राम" या "मुझे अपनी शरण में लेलो राम" और "बड़ी देर भई बड़ी देर भई, कब लोगे खबर मोरे राम"... इस बात का जीवंत प्रमाण हैं।
भारत में जितने भी बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं लगभग सबके लिए रफ़ी साहब ने ही सफलतम गीत या भजन गाए हैं ... उधारण में होली के त्यौहार पर "तन रंग लो जी आज मन रंग लो" या "होली खेलत नंदलाल बिरज में"... अथवा नवरात्रि में "तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए, मै आया मै आया शेरा वालिए"...जिसे वैष्णव माता के रस्ते जाने वाले हर यात्री के मुंह से आज भी सुना जा सकता है... अथवा "हे नाम रे,सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरो वाली, ऊंचे डेरो वाली, बिगड़ी बना दे मेरे नाम"... या शिवरात्रि पर अनन्य शिव भक्ति में डूबा भजन "मोर भंगिया के मनाई दा"..."हे महादेव मेरी लाज रहे/ मेरी लाज रहे तेरा राज रहे/" और "मुझे तो शिव शंकर मिल गए/ किया न जप तप, तीर्थ न घूमा, अपने ही घर मिल गए/"... जन्माष्टमी के मनमोहन पर्व पर "मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे" या "राधिके तूने बंसरी चुराई" या "वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सबकी आंखों का तारा" और "गोविन्दा आला रे आला, ज़रा मटकी संभाल बृजबाला"... देश भर में गणपति पूजा पर घर घर बजने वाला गीत "देवा हो देवा, गणपति देवा तुमसे बढ़ कर कौन, और तुम्हारे भक्त जनों में हमसे बढ़ कर कौन" यह सब मुहम्मद रफ़ी के सुर और लय के साथ ही साथ उनकी पवित्र भावना के भी परिचायक हैं।
हिन्दी उर्दू के अलावा मुहम्मद रफ़ी ने अनेक भारतीय और कुछ विदेशी भाषाओं में गीत गाए हैं... इनमें कई भजन भी हैं जिनमें मराठी ,बंगाली,तेलुगु,पंजाबी जैसी भाषाओं में कई भजन शामिल हैं...और उसमें ही शामिल अनेक सुमधुर गीत "हिंदी की बड़ी बहनों में सबसे करीबी भोजपुरी" भाषा के हैं... यह इतिहास ही है कि भोजपुरी की पहली पहली फिल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" जिसके संगीतकार सुविख्यात "चित्रगुप्त" और गीतकार हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े कवि "शैलेन्द्र" थे और जिसके गीतों को लता मंगेशकर,ऊषा मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली... जिनमें रफ़ी साहब का गाया दर्दभरा गीत -"सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूट गईल डालिया,छितर गईल खोतवा,
छूट गईल नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा मां" ....सुन कर मन भर आता है... निर्गुण सरीखे इस विदाई गीत में जिस प्रकार से एक पंजाबी उर्दू ज़बान के मुहम्मद रफ़ी ने भोजपुरी की चासनी चटाई है वह सुनते ही बनता है... भोजपुरी में तीस से अधिक गाने गाने वाले मुहम्मद रफ़ी ने जब भोजपुरी भजन गाया तो वह संयोग से भगवान राम की लीला को ही समर्पित था... "हमार संसार" नामक भोजपुरी फिल्म जिसका संगीत "श्याम शर्मा" ने दिया था और गीतनुमा भजन लिखा था देश के प्रमुख प्रगतिशील शायर "मज़रूह सुल्तानपुरी" ने... और इस राम भजन को जब राम के दुलारे रफ़ी साहब ने गाया तो माधुर्य ही माधुर्य बरस गया - "हँसत खेलत प्रभु पुनि लौटे ,
हसत खेलत प्रभु पुनि घर लौटे, संग लखन सिया माई,
अइसन दिन सबके घर आवे, मिले भाई से भाई,
आहो मिले राम भरत दूनू भाई, आहो मिले राम भरत दूनू भाई
फुकलो से ई दिया न बुताई, नेह के जोत जरत चली जाई"।
ये भारत की उदार संस्कृति का ही प्रतीक है कि हिन्दी सिनेमा का सबसे सफल नातिया क़लाम (मुहम्मद साहब की तारीफ़) भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज़ में घर घर गूंजा - "बेक़स पे करम कीजिए सरकार ए मदीना"... वहीं दूसरी तरफ़ भारत के सबसे लोकप्रिय सिनेमाई भजनों में सर्वोत्तम मुहम्मद रफ़ी के नाम दर्ज़ मिलते हैं...फिर वह चाहे "शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली हो" जैसी कालजई भक्ति कव्वाली हो या "मधुर राम का नाम जग में/ भज राम राम राम जग में/" जैसा कीर्तन मुहम्मद रफ़ी सबको हृदय से गाते गए और हृदय में उतारते गए... और उतरते गए इस हिंदुस्तान के हृदय में...कदाचित उस परमात्मा के भी जो भारत का रखवाला है... क्यों कि यह एक अनुपम संयोग ही है कि सबसे अधिक सिने भजन गाने वाले इस मुस्लिम गायक के जीवन का अंतिम सफल गीत भी एक भजन ही था... हां! 31 जुलाई 1980 के दिन जब इस हरदिल अज़ीज़ गायक ने अपनी मुस्कुराती आंखें हमेशा के लिए बंद की... रमज़ान का पवित्र महीना भी अलविदा की ओर था... और गुरुपूर्णिमा का पर्व बीता कर महादेव शिव के श्रवण मास अभी अभी प्रारंभ हुआ था...आकाश से शिवकृपा घनघोर वर्षा के रूप में उतर रही थी...लाखों की भीड़ मुंबई की सड़कों पर उस इंसान की अर्थी के पीछे छतरी लिए भीगती चल रही थी जिसे भगवान ने सिर्फ़ गाने के लिए भेजा था और जाते जाते भी भगवान का ये आदमी अपना अंतिम गीत भगवान राम के चरणों में समर्पित कर गया था जो आज उसकी मृत्यु के बाद सारे देश में गूंज रहा था - "राम जी की निकली सवारी/ राम जी की लीला है न्यारी न्यारी..!"
-ओमा अक्
(मुहम्मद रफ़ी की जन्म शताब्दी और पैंतालीसवीं पुण्यतिथि २१ जुलाई २०२५ पर श्रद्धांजलि रूप में यह स्मृतिपत्र)
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.
लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.
दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.
कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.
रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.
राजेश कुमार गुप्ता
फ़िल्मी दुनिया में सुर और संगीत में मंगेशकर घराने का अहम योगदान रहा है। इस घराने ने हमें लता, आशा, उषा, मीना व हृदयनाथ नाथ मंगेशकर जैसे अनमोल नगीने दिए। आज इसी घराने से मंगेशकर बहनों में बहुमुखी प्रतिभा की धनी 'उषा मंगेशकर' जी को उनके 90वें जन्मदिन (15 दिसंबर 1935) पर हार्दिक शुभकामनाएं ...
उषा जी मंगेशकर बहनों में सबसे छोटी और भाई हृदयनाथ मंगेशकर से बड़ी हैं। उनकी यादों में अपने माता-पिता की धुंधली यादें ही हैं, उनके पिता का निधन तभी हो गया था, जब वह मात्र छह वर्ष की थीं। इसलिए वे अपने पिता की संगीत-शिक्षा से महरूम रहीं। लेकिन संगीत और अन्य कलाओं के प्रति उनका झुकाव बचपन से रहा। वे बचपन से ही अपनी बड़ी बहनों (लता, मीना, आशा) के संगीत के प्रति लगाव से प्रभावित रहीं। बाद में उन्होंने उस्ताद अमानत अली ख़ान और उस्ताद अमन अली ख़ान से संगीत की औपचारिक शिक्षा भी प्राप्त की। वह अपने भाई-बहनों के साथ संगीत कार्यक्रमों में जाया करती थीं, जिससे उनकी गायन प्रतिभा और निखर उठी। शुरुआती वर्षों में, उनकी गायन शैली और कुछ हद तक उनकी आवाज़ भी लता मंगेशकर से बहुत मिलती-जुलती थी। 'अपलम चपलम ...' जैसे गीतों में उनकी आवाज़ों में अंतर करना बहुत मुश्किल है।
बाद में उन्होंने अपनी खुद की शैली विकसित की, गायिकी के साथ-साथ उन्हें चित्रकला (जो उन्होंने आर के स्टूडियो के कला निर्देशक श्री अचारेकर से सीखी) और नृत्य में भी रुचि थी। कहीं कहीं ये भी उल्लेख है कि पार्श्व गायिका के रूप में फ़िल्मों में आने से पहले उन्होंने नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण भी लिया था। उनकी चित्रकला प्रतिभा जगजाहिर है और कुछ साल पहले मुंबई में उनकी कुछ पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगी थी। उनके लिए, चित्रकला और गायन एक दूसरे के पूरक हैं और आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि, "जब हम कोई गीत सुनते हैं, तो हमें उसके फिल्मांकन के बारे में एक निश्चित छवि मिलती है। यह एक ऐसी छवि बनाती है जो गीत को सही भावों के साथ गाने में मदद करती है।" वह बचपन से ही पेंटिंग भी करती थीं, लेकिन उन्होंने पहली बार 'सुहाना सफर और ये मौसम हसीन ...' के गीत के लिए पेंटिंग की थी। इसे सुनने के बाद उन्होंने समुद्र तट का चित्र बनाया, लेकिन बाद में जब उन्होंने उसी गीत को जंगल में चित्रित होते देखा तो उन्हें निराशा हुई। उनके द्वारा बनाए गए 'शिवाजी गणेशन' और 'शिवाजी महाराज' के चित्र काफी प्रसिद्ध हैं।
उनका पहला पार्श्व गायन 1954 में आई, व्ही शांताराम की फ़िल्म 'सुबह का तारा' के लिए 'बेबी राजश्री' के लिए था। यह उनका पहला एकल गायन था और उनकी आवाज़ पर्दे पर खूब जमी। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने गायन करियर को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई और न ही वे इसे लेकर ज्यादा सचेत भी रहीं। शुरुआती कुछ वर्षों में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाए, जिनमें से कुछ बेहद हिट रहे। 'आज़ाद' फिल्म के युगल गीत इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। उन्होंने शुरुआती वर्षों में बाल कलाकारों के लिए भी गाया। लंबे समय तक हिंदी फिल्मों में उनकी प्रतिभा को उतना बढ़ावा नहीं मिला। 60 के दशक में उन्होंने लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई युगल गीत गाए। लेकिन इनमें से अधिकांश गाने सहायक नृत्य-भाग थे, हालांकि कभी-कभी अगर लता मंगेशकर सह-गायिका होती थीं तो नायिका भी गाने का हिस्सा होती थीं। 60 के दशक में उन्हें मैजिक कार्पेट, मुजरिम कौन खूनी कौन, टार्ज़न और किंग कांग जैसी कुछ बी-ग्रेड और स्टंट फिल्मों में एकल पार्श्व गायन का मौका मिला। गाने औसत दर्जे के थे, हालांकि कुछ फिल्मों में अच्छे गाने भी थे। उन्होंने लोरी से लेकर कैबरे, प्रेम गीत, भावपूर्ण ग़ज़ल और मुजरा तक, हर तरह के गाने गाए। वह अपनी आवाज़ को परिस्थिति के अनुसार ढाल लेती थीं। उन्हें सबसे ज्यादा फ़िल्म 'जय संतोषी मां' के लिए जाना गया।
इसका एक दिलचस्प किस्सा है, दरअसल 'जय संतोषी मां' के संगीत निर्देशक 'सी अर्जुन' फ़िल्म के गाने लता जी से गवाना चाहते थे। इसके लिए जब वे लता जी के पास पंहुचे तो, फ़िल्म का नाम जानने के बाद लता जी ने उनसे कहा कि फ़िल्म के नाम के मुताबिक सभी गानों में 'ष' का उच्चारण बार बार आएगा, जो शायद मैं बेहतर उच्चारण न कर पाऊं, तो 'सी अर्जुन' जी ने कहा, तो फिर आशा जी से गवा लेते हैं। तो लता जी ने कहा, आशा के साथ भी यही दिक्कत आएगी। आप इन गानों को उषा से गवा लीजिए, क्योंकि जिसके ख़ुद के नाम में 'ष' का उच्चारण हो, वो इन गानों को बेहतर गा पाएगी। और फिर ... इस फ़िल्म के गानों ने इतिहास रच दिया।
जहां उन्हें भक्ति-गीत 'मैं तो आरती उतारू रे ...' के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है, वहीं आइटम नंबर 'मुंगला' भी उनके लोकप्रिय गानों में से एक है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सी. रामचंद्र के साथ की, लेकिन बाद में उन्होंने कई लोकप्रिय और कम लोकप्रिय संगीतकारों के साथ भी काम किया। मदन मोहन, जयदेव, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, कल्याणजी आनंदजी उनके करियर के लोकप्रिय संगीतकारों में से थे। उन्होंने इकबाल कुरैशी, परदेसी, जी.एस. कोहली, चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, बप्पी लाहिड़ी, राम लक्ष्मण आदि के साथ भी काम किया। फ़िल्म 'आरती' में गाये उनके गीत भी ख़ूब मशहूर हुए। उन्हें 'इंकार' फ़िल्म के 'मुगला' और 'इकरार' फ़िल्म के 'हमसे नजर तो मिलाओ ...' गीतों के लिए भी नामांकित किया गया। लेकिन वे कभी भी पुरस्कार नहीं जीत सकीं। उनके करियर पर नजर डालें तो ज्यादातर गाने युगल, तिकड़ी या चौगुनी गायकों के साथ हैं। उनके उत्कृष्ट और लोकप्रिय हिंदी एकल गीतों की संख्या बहुत ही कम है।उन्होंने हिंदी, मराठी व अन्य भाषाओं में पार्श्व-गायन दिया। पर उन्हें अपनी बहनों (लता जी व आशा जी) के समान वो अपेक्षित सफलता व मौके नहीं मिले।
उषा जी को लोक संगीत से बहुत लगाव रहा है। उन्होंने 60 साल से अधिक उम्र तक सिंगिंग की। उन्होंने 1992 में दूरदर्शन के लिए म्यूजिकल ड्रामा 'फूलवंती' को प्रोड्यूस किया था, जिसकी कहानी बाबा साहेब पुरंदरे पर आधारित थी।
'अब्दुल हयी' उर्फ़ 'साहिर लुधियानवी'
ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते
किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई
साहिर लुधियानवी को इस दुनिया से गए 45 साल गुज़र गए हैं, मगर आप जब भी उनकी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों की तरफ़ जाएँगे तो आपको यक़ीनन ऐसा महसूस होगा कि वो अब भी मौजूद हैं। वो अपनी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों में ही कहीं साँसें ले रहे हैं। वो आज भी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए मिसाल बने हुए हैं। उनकी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों की अब भी बहुत लम्बी उम्र बाक़ी है। अपनी शायरी के लिए साहिर कॉलेज के दिनों से ही काफ़ी मशहूर रहे और फिर बम्बई आकर उन्होंने जो किया उसे उनका हर चाहने वाला बहुत अच्छी तरह जानता है।
"कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता हैं", "मेरे दिल में आज क्या हैं तू कहें तो मैं बता दूँ", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा", "तुम अगर साथ देने का वादा करो", "ए मेरी ज़ोहराजबीं तुझे मालूम नहीं", “नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले", "अभी ना जाओ छोड़कर, के दिल अभी भरा नहीं" ऐसे सैकड़ों मधुर प्रेमगीतों के रचनाकार साहिर लुधियानवी का जन्म संयोग से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन यानी 8 मार्च को हुआ था। सन 1921 को लुधियाना (पंजाब) के एक जागीरदार घराने में जन्मे साहिर का असली नाम अब्दुल हयी था। पिता फ़ज़ल मोहम्मद की ग्यारहवीं बीवी सरदार बेग़म उनकी मां थीं। साहिर उनके पहले और इकलौते बेटे थे। इसी कारण उनकी परवरिश बड़े प्यार से हुई।
लेकिन अभी वह बच्चे ही थे कि सुख के सारे दरवाज़े उसके लिए एकाएक बंद हो गए। फ़ज़ल मोहम्मद को अपनी बेशुमार दौलत पर ग़ुरुर था, उसी की वजह से उनकी अय्याशियाँ भी बढ़ने लगीं और उन्होंने बारहवीं शादी करने का फ़ैसला किया। अपने पति की इन अय्याशियों से तंग आकर साहिर की माँ ने पति से अलग होने का फ़ैसला किया। चूँकि लाहौर की अदालत में 13 साल के साहिर ने पिता के मुक़ाबले माँ को अहमियत दी थी। इसलिए उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी उनकी माँ को सौंपी गयी। नतीजे में साहिर का अपने पिता और उनकी जागीर से कोई संबंध नहीं रहा। इसी के साथ साहिर और उनकी माँ, दोनों का कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया।
मुक़दमा हार जाने पर पिता ने यह धमकी दी थी कि वह साहिर को मरवा डालेंगे। तब माँ ने अपने सारे क़ीमती जेवर बेचकर साहिर की हिफ़ाज़त का बंदोबस्त किया। सुरक्षा गार्ड एक पल भी साहिर को अकेला नहीं छोड़ते थे। इस तरह पिता के प्रति घृणा भाव के साथ साहिर के मन में एक विचित्र सा भय भी पल रहा था। बचपन से ही साहिर ने अपनी माँ को, अपने लिए तमाम तरह के दुख-दर्द सहकर और मुश्किल हालात में जूझते हुए देखा था। साहिर को पाल-पोसकर बड़ा करने के लिए मां को बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा। यही संघर्ष फ़िल्म ‘त्रिशूल’ के लिये लिखे, साहिर के एक गीत में उभर कर आया है। जिसमें अकेली मां की भूमिका निभाने वाली वहीदा रहमान अपने बेटे की परवरिश के लिए कई कठिनाइयों से लड़ती है ...
"तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने, ताकि तू जान सके
तुझको परवान चढ़ाने के लिए
कितने संगीन मराहिल से तेरी मा गुज़री
कितने पाँव मेरे ममता के कलेजे पे पड़े
कितने ख़ंजर मेरी आँखों, मेरे कानों में गड़े"
साहिर ने जब बाक़ायदा शायरी शुरू की और फ़िल्मों के लिए गीत लिखना शुरू किये तो ग़रीबी-मुफ़लिसी, तंगहाली, सांप्रदायिकता, शोषण के ख़िलाफ़ उनकी नज़्में आकार लेने लगीं।
"ज़िंदगी भीक में नहीं मिलती ज़िंदगी बढ़ के छीनी जाती है
अपना हक़ संग-दिल ज़माने से छीन पाओ तो कोई बात बने।
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता सर उठाओ तो कोई बात बने ..."
लुधियाना के ख़ालसा हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद साहिर गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ लुधियाना में दाख़िल हुये। वहाँ की सियासी सरगर्मियों का उन पर असर होने लगा। और उस दौर के मशहूर शायर - इक़बाल, फ़ैज़, मजाज़, फ़िराक़ वगैरा की विद्रोही शायरी से भी वह रूबरू होने लगे। सन 1945 में केवल 24 साल की उम्र में 'तल्ख़ियाँ' नाम से उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसकी वजह से उन्हें बतौर शायर बड़ी क़ामयाबी हासिल हुई। साहिर ने बचपन से ही जीवन की कठोर वास्तविकता का अनुभव किया था। जिसकी वजह से उन्होंने अपनी पहली किताब का नाम भी 'तल्ख़ियाँ' मतलब 'कड़वाहटें' रखा था।
साहिर ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रसिद्ध उर्दू पत्र ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ (लाहौर) और द्वैमासिक पत्रिका ‘सवेरा’ के संपादक की ज़िम्मेदारियाँ निभाई। 'सवेरा' पत्रिका में उनकी एक रचना छपी थी जिसे सरकार के विरुद्ध समझा गया और पाकिस्तान सरकार ने उनके ख़िलाफ़ वारंट भी जारी कर दिया था। सन 1949 में साहिर अपनी माँ के साथ पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गये। उसके बाद अपना नसीब आज़माने के लिए बंबई शहर पहुँचे। फ़िल्म 'आज़ादी की राह पर' (1949) से उन्होंने गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। प्यार में नारी के समर्पण की भावना को साहिर से ज़्यादा शायद ही किसी गीतकार ने इतने खुबसूरत शब्दों में बयाँ किया होगा ...
"आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाये
हृदय की पीड़ा देह की अगनी, सब शीतल हो जाये ..."
साहिर ने अपने निजी जीवन में कई दफ़ा मोहब्बत की और वो ज़िंदगी में मोहब्बत की अहमियत से भी अच्छी तरह से वाक़िफ़ थे। उनका कहना था कि मोहब्बत भी तक़दीरवालों के हिस्से में आती है। शायद इसलिए उन्होंने लिखा था।
"मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी
होती है दिलबरों की इनायत कभी-कभी ..."
लेखिका और शायरा अमृता प्रीतम और गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ साहिर के नाम जोड़े जाते रहे हैं। अमृता प्रीतम ने तो साहिर से अपने प्यार को दुनिया के सामने कई बार ज़ाहिर भी किया था। साहिर के लिए उनकी मोहब्बत दिवानगी की हद तक थी। इस मोहब्बत को साहिर ने भी अपनी रचनाओं में ढ़ालते हुए कहा है ...
"तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है, मैंने तो मुहब्बत की है ..."
पर अफ़सोस, साहिर को प्यार में कभी सफलता नहीं मिल सकी। शायद साहिर, अमृता से अपने दिल की बात कह नहीं पाते थे। उनके दिल में भले ही मोहब्बत ख़ामोशी से पलती रहती होगी लेकिन वह उसे अंजाम तक कभी ला नहीं पाये। इन्हीं उलझन भरे सवालों पर वह रूककर, आख़िर यह कह उठते हैं ...
"वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ..."
साहिर के गीतों में नारी की दुर्दशा और सामंती प्रवृत्तियों के प्रति रोष और उनका विरोध उनकी तीखी अभिव्यक्तियाँ हैं। सन 1955 में बनी फ़िल्म 'देवदास' का एक गीत आज भी पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारों की सटीक कहानी बयाँ करने के लिए काफ़ी है, जिसमें नारी ख़ुद अपनी दर्दभरी दास्ताँ सुनाते हुए बोल उठती है ...
"मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के
मेरी उम्र बह गई है मेरे आँसुओं में ढ़ल के ...
जो बहार बन के बरसे वह घटा कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ ...
तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ ..."
साहिर को किसी इन्सान से शिकायत नहीं थी। उन्हें शिकायत थी तो समाज के उस ढ़ाँचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है। उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से, उस संस्कृति से जहाँ मुर्दों को पूजा जाता हैं और ज़िंदा इन्सान को पैरों तले रौंदा जाता है। जहाँ किसी के दुःख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है। देवियों की पूजा की जाती है और औरतों को इंसान नहीं बल्कि जी बहलाने का खिलौना समझा जाता है। फ़िल्म ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ के गीत में साहिर ने यही बात स्पष्ट की है ...
"लोग औरत को फ़क़त एक जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं ...
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ायम, ये गुनाहों का रिवाज़ ..."
हमारे इस घोर ढ़ोंगी और पाखंडी समाज के चेहरे पर से ये झूठी शराफ़त का नक़ाब उठाने की हिम्मत साहिर ने अपने गीतों में की है। साहिर ने महिलाओं के शोषण के लिए, उन पर होनेवाले अत्याचार के लिए पितृसत्ता और सामंतवादी व्यवस्था को दोषी ठहराया है। फ़िल्म साधना में उन्होंने इसका स्पष्ट विवरण दिया है, जहां वह महिलाओं को उपभोग की वस्तु बनाने वाली बर्बर व्यवस्था पर ऊँगली उठाते हैं।
"औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ...
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया ...
मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ,
औरत के लिये रोना भी ख़ता ...
मर्दों के लिये लाखों सेजें,
औरत के लिये बस एक चिता ...
मर्दों के लिये हर ऐश का हक़,
औरत के लिये जीना भी सज़ा ...
मर्दों ने बनायी जो रस्में,
उनको हक़ का फ़रमान कहा ...
औरत के ज़िन्दा जल जाने को,
क़ुर्बानी और बलिदान कहा ...
क़िस्मत के बदले रोटी दी,
उसको भी एहसान कहा ...
औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ..."
नारी जीवन की पीड़ायें असहनीय हैं, यह साहिर भलीभांति जानते थे। समाज के इस क्रुर और अमानवनीय ढ़ाँचे में नारी का दम निरंतर घुटता रहता है। समाज के इस बेरहम और ज़ालिम ढ़ांचे से परेशान होकर साहिर इस हद तक झुँझलाकर कह उठते हैं ...
"जवानी भटकती है बद-कार बन कर,
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर ...
यहाँ प्यार होता है बेपार बन कर,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ..."
साहिर ने पाया कि समाज में देह व्यापार का धंधा अपने पांव पसारे हुए है। जहां लाखों महिलाएँ दुनिया से कटकर बेबस ज़िंदगी जी रही हैं। वेश्या बनी नारी की उफ़नती पीड़ा, अँधेरे कोनों में व्याप्त वेदना, अपमानित जीवन का आतंक, आतंरिक विवशता, दीनहीन होने की वेदना को साहिर ने अपनी रचनाओँ में अभिव्यक्ति दी है। फ़िल्म ‘प्यासा’ में उनकी क़लम ऐसे ही ग़ैर इंसानी रिवाजों के ख़िलाफ़ तेज़ आग बरसाती है। उसमें समाज और उसके ठेकेदारों पर साहिर सवाल उठाते हैं ... के 'आत्मसम्मान की बात करने वाले वह लोग अब कहाँ हैं?? क्या इन्हें अब तंग गलियों और अँधेरे कमरो में चलने वाले देह व्यापार नहीं दिखते?? सहमी हुयी नाबालिग़ लड़कियों को जब इस गहरी खाई में ढ़केला जाता है तब यह मानवता के रक्षक कहाँ होते हैं?? क्यों इस बर्बर प्रथा के ख़िलाफ़ इनकी आवाज़ नहीं उठती ...??
"ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के, ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के ...
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ...
ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियाँ, ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ ...
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ...
ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे ये गलियाँ ये मंज़र दिखाओ ...
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ..."
अपने गीतों के माध्यम से साहिर ने नारी जगत की दिशा और दशा को उजागर किया है। ज़िंदगी के यथार्थ का दर्शन साहिर के नग़्मों की जान है। लेकिन साहिर यथार्थ के साथ-साथ ज्वलन्त आशावाद, उत्साह और दृढ़ विश्वास के शायर भी हैं। उन्होंने औरतों की बेहतरी, ख़ुशहाली व सुखद भविष्य वाले समाज की भी कल्पना की है। उन्हें यह यक़ीन था कि दुःख के ये काले बादल यक़ीनन दूर हो जायेंगे और न्याय, स्वतंत्रता और समानता की सुबह भी ज़रूर आयेगी ...
"दौलत के लिए जब औरत की,
इस्मत को ना बेचा जाएगा ...
चाहत को ना कुचला जाएगा,
इज़्ज़त को न बेचा जाएगा ...
अपने काले करतूतों पर जब,
ये दुनिया शर्माएगी ...
वो सुबह कभी तो आएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी ..."
भारतीय साहित्यिक दुनिया में औरत पर सदियों से होते आ रहे ज़ुल्मों के ख़िलाफ़, इतनी शिद्दत से आवाज़ उठाने वाले शायद वह अकेले ही शायर रहे।
"सीता के लिये लिखा है यही,
हर युग में अग्नि परीक्षा दे ...
दु:ख सह के भी मुख से कुछ ना कहे,
मन को धीरज की शिक्षा दे ..."
साहिर कहते हैं कि स्त्रियाँ अपना पूरा जीवन अन्याय सहते हुए व्यतीत कर देती हैं, कभी विरोध नहीं करती लेकिन जिस दिन उसके ह्रदय में विद्रोह की चिंगारियां जागृत हो जाऐंगी। तो सम्पूर्ण शोषक समाज को उसके ताप में झुलसना पडेगा। साहिर लुधियानवी के नारी चेतना से ओत-प्रोत गीत आधी आबादी को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वर्तमान समाज में फैली अनेक कुरीतियों को भी धराशायी करते प्रतीत होते हैं। ऐसे "शब्दों के जादूगर" अपनी कर्म साधना से सदियों तक प्रासंगिक बने रहेंगे। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें ख़िराज ए अक़ीदत ...
ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते
किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई
साहिर लुधियानवी को इस दुनिया से गए 45 साल गुज़र गए हैं, मगर आप जब भी उनकी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों की तरफ़ जाएँगे तो आपको यक़ीनन ऐसा महसूस होगा कि वो अब भी मौजूद हैं। वो अपनी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों में ही कहीं साँसें ले रहे हैं। वो आज भी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए मिसाल बने हुए हैं। उनकी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों की अब भी बहुत लम्बी उम्र बाक़ी है। अपनी शायरी के लिए साहिर कॉलेज के दिनों से ही काफ़ी मशहूर रहे और फिर बम्बई आकर उन्होंने जो किया उसे उनका हर चाहने वाला बहुत अच्छी तरह जानता है।
"कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता हैं", "मेरे दिल में आज क्या हैं तू कहें तो मैं बता दूँ", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा", "तुम अगर साथ देने का वादा करो", "ए मेरी ज़ोहराजबीं तुझे मालूम नहीं", “नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले", "अभी ना जाओ छोड़कर, के दिल अभी भरा नहीं" ऐसे सैकड़ों मधुर प्रेमगीतों के रचनाकार साहिर लुधियानवी का जन्म संयोग से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन यानी 8 मार्च को हुआ था। सन 1921 को लुधियाना (पंजाब) के एक जागीरदार घराने में जन्मे साहिर का असली नाम अब्दुल हयी था। पिता फ़ज़ल मोहम्मद की ग्यारहवीं बीवी सरदार बेग़म उनकी मां थीं। साहिर उनके पहले और इकलौते बेटे थे। इसी कारण उनकी परवरिश बड़े प्यार से हुई।
लेकिन अभी वह बच्चे ही थे कि सुख के सारे दरवाज़े उसके लिए एकाएक बंद हो गए। फ़ज़ल मोहम्मद को अपनी बेशुमार दौलत पर ग़ुरुर था, उसी की वजह से उनकी अय्याशियाँ भी बढ़ने लगीं और उन्होंने बारहवीं शादी करने का फ़ैसला किया। अपने पति की इन अय्याशियों से तंग आकर साहिर की माँ ने पति से अलग होने का फ़ैसला किया। चूँकि लाहौर की अदालत में 13 साल के साहिर ने पिता के मुक़ाबले माँ को अहमियत दी थी। इसलिए उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी उनकी माँ को सौंपी गयी। नतीजे में साहिर का अपने पिता और उनकी जागीर से कोई संबंध नहीं रहा। इसी के साथ साहिर और उनकी माँ, दोनों का कठिनाइयों और निराशाओं का दौर शुरू हो गया।
मुक़दमा हार जाने पर पिता ने यह धमकी दी थी कि वह साहिर को मरवा डालेंगे। तब माँ ने अपने सारे क़ीमती जेवर बेचकर साहिर की हिफ़ाज़त का बंदोबस्त किया। सुरक्षा गार्ड एक पल भी साहिर को अकेला नहीं छोड़ते थे। इस तरह पिता के प्रति घृणा भाव के साथ साहिर के मन में एक विचित्र सा भय भी पल रहा था। बचपन से ही साहिर ने अपनी माँ को, अपने लिए तमाम तरह के दुख-दर्द सहकर और मुश्किल हालात में जूझते हुए देखा था। साहिर को पाल-पोसकर बड़ा करने के लिए मां को बड़ा कठिन संघर्ष करना पड़ा। यही संघर्ष फ़िल्म ‘त्रिशूल’ के लिये लिखे, साहिर के एक गीत में उभर कर आया है। जिसमें अकेली मां की भूमिका निभाने वाली वहीदा रहमान अपने बेटे की परवरिश के लिए कई कठिनाइयों से लड़ती है ...
"तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने, ताकि तू जान सके
तुझको परवान चढ़ाने के लिए
कितने संगीन मराहिल से तेरी मा गुज़री
कितने पाँव मेरे ममता के कलेजे पे पड़े
कितने ख़ंजर मेरी आँखों, मेरे कानों में गड़े"
साहिर ने जब बाक़ायदा शायरी शुरू की और फ़िल्मों के लिए गीत लिखना शुरू किये तो ग़रीबी-मुफ़लिसी, तंगहाली, सांप्रदायिकता, शोषण के ख़िलाफ़ उनकी नज़्में आकार लेने लगीं।
"ज़िंदगी भीक में नहीं मिलती ज़िंदगी बढ़ के छीनी जाती है
अपना हक़ संग-दिल ज़माने से छीन पाओ तो कोई बात बने।
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने
सर झुकाने से कुछ नहीं होता सर उठाओ तो कोई बात बने ..."
लुधियाना के ख़ालसा हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद साहिर गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ लुधियाना में दाख़िल हुये। वहाँ की सियासी सरगर्मियों का उन पर असर होने लगा। और उस दौर के मशहूर शायर - इक़बाल, फ़ैज़, मजाज़, फ़िराक़ वगैरा की विद्रोही शायरी से भी वह रूबरू होने लगे। सन 1945 में केवल 24 साल की उम्र में 'तल्ख़ियाँ' नाम से उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसकी वजह से उन्हें बतौर शायर बड़ी क़ामयाबी हासिल हुई। साहिर ने बचपन से ही जीवन की कठोर वास्तविकता का अनुभव किया था। जिसकी वजह से उन्होंने अपनी पहली किताब का नाम भी 'तल्ख़ियाँ' मतलब 'कड़वाहटें' रखा था।
साहिर ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रसिद्ध उर्दू पत्र ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ (लाहौर) और द्वैमासिक पत्रिका ‘सवेरा’ के संपादक की ज़िम्मेदारियाँ निभाई। 'सवेरा' पत्रिका में उनकी एक रचना छपी थी जिसे सरकार के विरुद्ध समझा गया और पाकिस्तान सरकार ने उनके ख़िलाफ़ वारंट भी जारी कर दिया था। सन 1949 में साहिर अपनी माँ के साथ पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गये। उसके बाद अपना नसीब आज़माने के लिए बंबई शहर पहुँचे। फ़िल्म 'आज़ादी की राह पर' (1949) से उन्होंने गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। प्यार में नारी के समर्पण की भावना को साहिर से ज़्यादा शायद ही किसी गीतकार ने इतने खुबसूरत शब्दों में बयाँ किया होगा ...
"आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाये
हृदय की पीड़ा देह की अगनी, सब शीतल हो जाये ..."
साहिर ने अपने निजी जीवन में कई दफ़ा मोहब्बत की और वो ज़िंदगी में मोहब्बत की अहमियत से भी अच्छी तरह से वाक़िफ़ थे। उनका कहना था कि मोहब्बत भी तक़दीरवालों के हिस्से में आती है। शायद इसलिए उन्होंने लिखा था।
"मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी-कभी
होती है दिलबरों की इनायत कभी-कभी ..."
लेखिका और शायरा अमृता प्रीतम और गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ साहिर के नाम जोड़े जाते रहे हैं। अमृता प्रीतम ने तो साहिर से अपने प्यार को दुनिया के सामने कई बार ज़ाहिर भी किया था। साहिर के लिए उनकी मोहब्बत दिवानगी की हद तक थी। इस मोहब्बत को साहिर ने भी अपनी रचनाओं में ढ़ालते हुए कहा है ...
"तुम मुझे भूल भी जाओ, तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है, मैंने तो मुहब्बत की है ..."
पर अफ़सोस, साहिर को प्यार में कभी सफलता नहीं मिल सकी। शायद साहिर, अमृता से अपने दिल की बात कह नहीं पाते थे। उनके दिल में भले ही मोहब्बत ख़ामोशी से पलती रहती होगी लेकिन वह उसे अंजाम तक कभी ला नहीं पाये। इन्हीं उलझन भरे सवालों पर वह रूककर, आख़िर यह कह उठते हैं ...
"वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ..."
साहिर के गीतों में नारी की दुर्दशा और सामंती प्रवृत्तियों के प्रति रोष और उनका विरोध उनकी तीखी अभिव्यक्तियाँ हैं। सन 1955 में बनी फ़िल्म 'देवदास' का एक गीत आज भी पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारों की सटीक कहानी बयाँ करने के लिए काफ़ी है, जिसमें नारी ख़ुद अपनी दर्दभरी दास्ताँ सुनाते हुए बोल उठती है ...
"मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के
मेरी उम्र बह गई है मेरे आँसुओं में ढ़ल के ...
जो बहार बन के बरसे वह घटा कहाँ से लाऊँ
जिसे तू क़ुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ ...
तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ ..."
साहिर को किसी इन्सान से शिकायत नहीं थी। उन्हें शिकायत थी तो समाज के उस ढ़ाँचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है। उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से, उस संस्कृति से जहाँ मुर्दों को पूजा जाता हैं और ज़िंदा इन्सान को पैरों तले रौंदा जाता है। जहाँ किसी के दुःख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है। देवियों की पूजा की जाती है और औरतों को इंसान नहीं बल्कि जी बहलाने का खिलौना समझा जाता है। फ़िल्म ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ के गीत में साहिर ने यही बात स्पष्ट की है ...
"लोग औरत को फ़क़त एक जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं ...
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ायम, ये गुनाहों का रिवाज़ ..."
हमारे इस घोर ढ़ोंगी और पाखंडी समाज के चेहरे पर से ये झूठी शराफ़त का नक़ाब उठाने की हिम्मत साहिर ने अपने गीतों में की है। साहिर ने महिलाओं के शोषण के लिए, उन पर होनेवाले अत्याचार के लिए पितृसत्ता और सामंतवादी व्यवस्था को दोषी ठहराया है। फ़िल्म साधना में उन्होंने इसका स्पष्ट विवरण दिया है, जहां वह महिलाओं को उपभोग की वस्तु बनाने वाली बर्बर व्यवस्था पर ऊँगली उठाते हैं।
"औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ...
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया ...
मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ,
औरत के लिये रोना भी ख़ता ...
मर्दों के लिये लाखों सेजें,
औरत के लिये बस एक चिता ...
मर्दों के लिये हर ऐश का हक़,
औरत के लिये जीना भी सज़ा ...
मर्दों ने बनायी जो रस्में,
उनको हक़ का फ़रमान कहा ...
औरत के ज़िन्दा जल जाने को,
क़ुर्बानी और बलिदान कहा ...
क़िस्मत के बदले रोटी दी,
उसको भी एहसान कहा ...
औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ..."
नारी जीवन की पीड़ायें असहनीय हैं, यह साहिर भलीभांति जानते थे। समाज के इस क्रुर और अमानवनीय ढ़ाँचे में नारी का दम निरंतर घुटता रहता है। समाज के इस बेरहम और ज़ालिम ढ़ांचे से परेशान होकर साहिर इस हद तक झुँझलाकर कह उठते हैं ...
"जवानी भटकती है बद-कार बन कर,
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर ...
यहाँ प्यार होता है बेपार बन कर,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ..."
साहिर ने पाया कि समाज में देह व्यापार का धंधा अपने पांव पसारे हुए है। जहां लाखों महिलाएँ दुनिया से कटकर बेबस ज़िंदगी जी रही हैं। वेश्या बनी नारी की उफ़नती पीड़ा, अँधेरे कोनों में व्याप्त वेदना, अपमानित जीवन का आतंक, आतंरिक विवशता, दीनहीन होने की वेदना को साहिर ने अपनी रचनाओँ में अभिव्यक्ति दी है। फ़िल्म ‘प्यासा’ में उनकी क़लम ऐसे ही ग़ैर इंसानी रिवाजों के ख़िलाफ़ तेज़ आग बरसाती है। उसमें समाज और उसके ठेकेदारों पर साहिर सवाल उठाते हैं ... के 'आत्मसम्मान की बात करने वाले वह लोग अब कहाँ हैं?? क्या इन्हें अब तंग गलियों और अँधेरे कमरो में चलने वाले देह व्यापार नहीं दिखते?? सहमी हुयी नाबालिग़ लड़कियों को जब इस गहरी खाई में ढ़केला जाता है तब यह मानवता के रक्षक कहाँ होते हैं?? क्यों इस बर्बर प्रथा के ख़िलाफ़ इनकी आवाज़ नहीं उठती ...??
"ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के, ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के ...
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ...
ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियाँ, ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ ...
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ...
ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे ये गलियाँ ये मंज़र दिखाओ ...
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ..."
अपने गीतों के माध्यम से साहिर ने नारी जगत की दिशा और दशा को उजागर किया है। ज़िंदगी के यथार्थ का दर्शन साहिर के नग़्मों की जान है। लेकिन साहिर यथार्थ के साथ-साथ ज्वलन्त आशावाद, उत्साह और दृढ़ विश्वास के शायर भी हैं। उन्होंने औरतों की बेहतरी, ख़ुशहाली व सुखद भविष्य वाले समाज की भी कल्पना की है। उन्हें यह यक़ीन था कि दुःख के ये काले बादल यक़ीनन दूर हो जायेंगे और न्याय, स्वतंत्रता और समानता की सुबह भी ज़रूर आयेगी ...
"दौलत के लिए जब औरत की,
इस्मत को ना बेचा जाएगा ...
चाहत को ना कुचला जाएगा,
इज़्ज़त को न बेचा जाएगा ...
अपने काले करतूतों पर जब,
ये दुनिया शर्माएगी ...
वो सुबह कभी तो आएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी ..."
भारतीय साहित्यिक दुनिया में औरत पर सदियों से होते आ रहे ज़ुल्मों के ख़िलाफ़, इतनी शिद्दत से आवाज़ उठाने वाले शायद वह अकेले ही शायर रहे।
"सीता के लिये लिखा है यही,
हर युग में अग्नि परीक्षा दे ...
दु:ख सह के भी मुख से कुछ ना कहे,
मन को धीरज की शिक्षा दे ..."
साहिर कहते हैं कि स्त्रियाँ अपना पूरा जीवन अन्याय सहते हुए व्यतीत कर देती हैं, कभी विरोध नहीं करती लेकिन जिस दिन उसके ह्रदय में विद्रोह की चिंगारियां जागृत हो जाऐंगी। तो सम्पूर्ण शोषक समाज को उसके ताप में झुलसना पडेगा। साहिर लुधियानवी के नारी चेतना से ओत-प्रोत गीत आधी आबादी को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वर्तमान समाज में फैली अनेक कुरीतियों को भी धराशायी करते प्रतीत होते हैं। ऐसे "शब्दों के जादूगर" अपनी कर्म साधना से सदियों तक प्रासंगिक बने रहेंगे। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें ख़िराज ए अक़ीदत ...
फ़िरदौस ख़ान
ऑल इंडिया रेडियो से हमारा दिल का या यूं कहें कि रूह का रिश्ता है। ये हमारी ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा है। रेडियो सुनते हुए हम बड़े हुये। बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ। यह हमारी ख़ुशनसीबी थी। ऑल इंडिया रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था। इसकी रिकॉर्डिंग 15 दिसम्बर को हुई थी। कार्यक्रम का नाम था उर्दू कविता पाठ। इसमें हमने अपनी ग़ज़लें पेश की थीं। उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे। पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत यादें वाबस्ता हैं। दिन और रात के न जाने कितने पहर रेडियो पर दिलकश नग़में सुनते हुए ही बीते। ऑल इंडिया रोडियो की उर्दू सर्विस का तो जवाब ही नहीं। मख़मली उर्दू ज़बान सीधे दिल की गहराई में उतर जाती थी। घर से दूर रहने पर, अपनों से दूर रहने पर यही आवाज़ घर की याद दिलाती थी, क्योंकि हमारी मादरी ज़बान भी तो उर्दू ही है। हमें आज भी रेडियो से उतना ही लगाव है, जितना पहले हुआ करता था। रेडियो हमारे दादा जान और पापा को भी बहुत पसंद था। शायद रेडियो से यह लगाव हमें विरासत में मिला है।
हम ही नहीं, लाखों-करोड़ों लोगों की पसंद रहा है रेडियो। ये उस वक़्त शुरू हुआ था, जब मनोरंजन के कोई ख़ास साधन नहीं थे। रेडियो का इतिहास सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है। दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत भी बहुत ही दिलचस्प है। वह 24 दिसम्बर 1906 की एक ख़ूबसूरत शाम थी, जब कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फ़ेसेंडेन ने वॉयलिन बजाया था। उस वक़्त अटलांटिक महासागर के जहाज़ों के रेडियो ऑपरेटरों ने वॉयलिन के उस दिलकश संगीत को सुना। इसके बाद उसी शाम फ़ेसेंडेन ने एक गाना भी गाया और पवित्र बाइबल की कुछ आयतें भी पढ़ी थीं। इससे पहले मारकोनी ने साल 1900 में लन्दन से अमेरिका बेतार संदेश भेजा था। इस तरह व्यक्तिगत रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत हुई थी। पहले रेडियो का इस्तेमाल सिर्फ़ नौसेना ही किया करती थी, बाक़ी लोगों के लिए इसका इस्तेमाल करने पर सख़्त पाबंदी थी। साल 1918 में ली द फ़ोरेस्ट ने न्यूयॉर्क के हाईब्रिज में रेडियो स्टेशन शुरू किया। यह दुनिया का पहला रेडियो स्टेशन था, लेकिन इसे ग़ैर क़ानूनी क़रार देकर बंद करवा दिया गया। फिर उन्होंने 1919 में सैन फ़्रांसिस्को में एक और रेडियो स्टेशन शुरू किया, लेकिन यह भी ग़ैर क़ानूनी ही था। दुनिया में क़ानूनी तौर पर रेडियो स्टेशन शुरू करने का श्रेय फ़्रैंक कॉनार्ड को जाता है।
हमारे देश में रेडियो भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की आकाशवाणी प्रसारण सेवा है। देश में रेडियो प्रसारण की शुरुआत 1920 की दहाई में हुई थी। प्राइवेट इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी लिमिटेड को दो रेडियो स्टेशन संचालित करने के लिए अधिकृत किया गया था। इस तरह 23 जुलाई 1927 को बॉम्बे स्टेशन शुरू हुआ। फिर उसी साल 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता स्टेशन शुरू किया गया। इसके बाद 1 मार्च 1930 को सरकार ने इन्हें अपने नियंत्रण में लेकर इनका राष्ट्रीयकरण किया और दो साल के लिए प्रायोगिक आधार पर भारतीय प्रसारण सेवा की शुरुआत हुई। कुछ वक़्त बाद मई 1936 में स्थायी रूप से ऑल इंडिया रेडियो क़ायम हुआ। फिर साल 1957 में इसे आकाशवाणी का नाम दिया गया।
क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सरकार ने साल 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में भारत में भी रेडियो के लाइसेंस रद्द करके सभी ट्रांसमीटर्स को सरकार के पास जमा करने का आदेश दे दिया। बॉम्बे टेक्निकल इंस्टीट्यूट बायकुला के प्राचार्य नरीमन प्रिंटर ने जब यह ख़बर सुनी, तो उन्होंने अपने रेडियो ट्रांसमीटर को बचाने का फ़ैसला किया। उन्होंने ट्रांसमीटर को खोलकर उसके पुर्ज़े अलग-अलग कर दिए। फिर उन्होंने उन पुर्ज़ों को अलग-अलग महफ़ूज़ जगह पर छुपा दिया। उस वक़्त देश में स्वतंत्रता आन्दोलन चल रहा था। महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ का नारा दिया था। ब्रिटिश हुकूमत ने 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी और उनके साथियों को गिरफ़्तार कर लिया और प्रेस पर पाबंदी लगा दी। ऐसे में कांग्रेस नेताओं को रेडियो की ज़रूरत महसूस हुई। उन्होंने नरीमन प्रिंटर से रेडियो स्टेशन शुरू करने का अनुरोध किया। इस पर उन्होंने अपने ट्रांसमीटर के पुर्ज़ों को इकट्ठा किया। उन्होंने माइक और अन्य ज़रूरत का सामान ख़रीदा। फिर 27 अगस्त 1942 को मुम्बई में नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरू हुआ। अपने पहले प्रसारण में उद्घोषक उषा मेहता ने कहा था- “41 दशमलव 78 मीटर पर एक अनजान जगह से यह नेशनल कांग्रेस रेडियो है।” ब्रिटिश सिपाहियों से बचने के लिए ट्रांसमीटर को सात अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ। आख़िरकार 12 नवम्बर 1942 को नरीमन प्रिंटर और उषा मेहता को गिरफ़्तार कर लिया गया। इस तरह नेशनल कांग्रेस रेडियो बंद हो गया।
आकाशवाणी द्वारा अपनी स्थापना के वक़्त से ही कुछ परम्पराओं का पालन किया जा रहा है। मसलन आकाशवाणी के हर केन्द्र पर प्रसारण शुरू होने से पहले इसकी संकेत धुन बजाई जाती है। फिर वन्दे मातरम् का गायन होता है। इसके बाद उद्घोषक स्टेशन का नाम बताता है। केन्द्र की फ़्रीक्वेंसी बताई जाती है। देसी महीने की तारीख़ और साल बताया जाता है। इसके साथ ही अंग्रेज़ी तारीख़ भी बताई जाती है, दिन बताया जाता है। फिर वक़्त बताया जाता है। लोग इससे अपनी घड़ियां मिलाते हैं। रेडियो की यह ख़ासियत है कि इसके सभी कार्यक्रम अपने तय वक़्त पर ही शुरू होते हैं। इसके बाद मंगल ध्वनि बजाई जाती है, जो भारत रत्न बिस्मिल्लाह ख़ान ने बनाई थी।
आकाशवाणी बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का पालन करती है। यह सबके हित की बात करती है, सबके सुख की बात करती है। सूचना, शिक्षा और मनोरंजन इसके सिद्धांत हैं। आकाशवाणी का विज़न भी यही है- राष्ट्रीय लोक प्रसारक के रूप में, आकाशवाणी अद्यतन तकनीक के इस्तेमाल से मज़बूत इलेक्ट्रॉनिक रेडियो प्रसारण मीडिया द्वारा सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के कार्यक्रम प्रसारित कर सभी वर्गों के लोगों को सशक्त बनाने के लिए वचनबद्ध है। इसके मिशन के तहत सूचना, शिक्षा और मनोरंजन द्वारा एकता, राष्ट्रीय अखंडता, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और साम्प्रदायिक सद्भावना को मज़बूत करना, देश और विदेश के सभी लोगों तक एकरूपता से संदेश और सूचना पहुंचाने के लिए सशक्त इलेक्ट्रॉनिक वायरलेस संचार माध्यम का विकास करना, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की जीवन शैली और सामाजिक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण घटनाओं और परिवर्तनों को शामिल करते हुए पक्षपात रहित अद्यतन, वस्तुनिष्ठ, व्यापक और संतुलित समाचार प्रसारित करना, प्रसारण कार्यक्रम की विषय-वस्तु और सिग्नल गुणवत्ता में अंतर्राष्ट्रीय मानकों को हासिल करना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक सद्भावना को प्रोत्साहन देना है।
आकाशवाणी समाचारों के लिए जानी जाती है। यहां से सिर्फ़ और सिर्फ़ सच्चे समाचार ही प्रसारित होते हैं। यहां झूठ का कोई काम नहीं है। आकाशवाणी और सच एक दूसरे के पर्याय हैं। देश के हर क्षेत्र में आकाशवाणी केन्द्र हैं।
आकाशवाणी ने लेह जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी अपने केन्द्र स्थापित किए हुए हैं, जहां रौशनी तक नहीं पहुंचती।
आकाशवाणी ने देश को दिग्गज कलाकार दिए हैं। अमीन सयानी, कब्बन मिर्ज़ा, सुनील दत्त और स्मिता पाटिल को भला कौन नहीं जानता। समाचार वाचक देवकीनन्दन पांडे और विनोद कश्यप भी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश के सुप्रसिद्ध कलाकार और साहित्यकार इससे जुड़े रहे हैं। आकाशवाणी ने एक कीर्तिमान स्थापित किया है। आकाशवाणी ने न कभी आवाज़ से समझौता किया और न ही उच्चारण से। क़ाबिले- ग़ौर है कि इन्हीं सख़्त नियमों की वजह से अमिताभ बच्चन का आकाशवाणी में चयन नहीं हो पाया था।
आकाशवाणी की कई सेवाएं हैं, जिनमें समाचार के अलावा विविध भारती भी है, जो आकाशवाणी की एक प्रमुख प्रसारण सेवा है। श्रोताओं में यह बहुत लोकप्रिय है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि यह सबसे ज़्यादा सुनी जाने वाली सेवा है। इस पर हिन्दी फ़िल्मों के गाने बजाये जाते हैं। इसकी शुरुआत 3 अक्टूबर 1957 को हुई थी। विविध भारती की शुरुआत की कहानी भी बहुत ही दिलचस्प है। पचास की दहाई में श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन की विदेश सेवा यानी रेडियो सीलोन हिन्दी फ़िल्मों के गाने बजाती थी। लोग इसके दीवाने थी। उस वक़्त आकाशवाणी के तत्कावलीन महानिदेशक गिरिजाकुमार माथुर ने भी आकाशवाणी पर ऐसे ही कार्यक्रम की परिकल्पना की। उन्होंने पंडित नरेंद्र शर्मा, गोपालदास और केशव पंडित व अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर विविध भारती सेवा शुरू की। इस पर बजाया गया पहला गीत पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखा था और इसके संगीतकार थे अनिल विश्वािस। इसे प्रसार गीत कहा गया और इसके बोल थे- नाच मयूरा नाच। इसे सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने अपनी आवाज़ से सजाया था। विविध भारती की पहली उद्घोषणा शील कुमार ने की थी। बाद में अमीन सयानी इससे जुड़ गए और उनके वक़्त में इसने कामयाबी के परचम फहराये और इसका जलवा तो आज भी बरक़रार है। शुरुआत में इसका प्रसारण सिर्फ़ दो केन्द्रों बम्बई और मद्रास से होता था। बाद में आकाशवाणी के दूसरे केन्द्रों ने भी इसका प्रसारण शुरू कर दिया। अब तो देश के सभी केन्दों पर कम से कम एक घंटा विविध भारती का प्रसारण अनिवार्य कर दिया गया है। यह आकाशवाणी की विज्ञापन प्रसारण सेवा भी है। एफ़एम पर तो दिनभर विविध भारती का ही प्रसारण होता है।
विविध भारती के अलावा ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस भी बहुत लोकप्रिय है। यह विदेश प्रसारण सेवा प्रभाग के तहत आती है। यह प्रभाग 1 अक्टूबर 1939 से कार्यरत है। हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी इसे ख़ूब सुना और पसंद किया जाता है। विदेश प्रसारण सेवा प्रभाग अनेक विदेशी भाषा सेवाओं में दुनियाभर में फैले विदेशी श्रोताओं के लिए समाचार और अन्य कार्यक्रम तैयार करता है। इसकी पहुंच तक़रीबन 108 देशों तक है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की दिसम्बर 2011 को जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक़ आकाशवाणी नेटवर्क में 406 ट्रांसमीटर और 261 प्रसारण केन्द्र हैं। इन ट्रांसमीटर्स में 146 मीडियम वेव, 54 शॉर्ट वेव और 203 एफ़एम हैं। आकाशवाणी देश में 99.14 फ़ीसद आबादी और 91.80 फ़ीसद इलाक़े को कवर करती है। आकाशवाणी घरेलू सेवाओं में 146 बोलियों और 24 भाषाओं में काम करती है। इसकी चार स्तरीय सेवाएं हैं- राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय और विदेश सेवा। विदेश सेवा में आकाशवाणी 27 भाषाएं कवर करती है, जिनमें 11 भारतीय और 16 विदेशी भाषाएं शामिल हैं। आकाशवाणी द्वारा 27 भाषाओं में 58 बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं। आकाशवाणी की 44 क्षेत्रीय समाचार इकाई, 32 अपलिंक भूकेंद्र, 40 विज्ञापन प्रसारण सेवा केन्द्र और केन्द्रीय स्तर पर एक आकाशवाणी संसाधन केन्द्र है। आकाशवाणी के पास डीटीएच रेडियो सेवाएं हैं, जिनमें 21 चैनल हैं। आकाशवाणी प्रसारण में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मानकों का पालन करती है।
रेडियो ने अपनी शुरुआत से कई अच्छे और बुरे दौर देखे हैं। 23 मार्च 2020 को प्रसार भारती ने एक कार्यालयीन ज्ञापन जारी करके विदेश प्रसारण सेवा प्रभाग को ग़ैर ज़रूरी सेवा बताया और इसकी तमाम सेवाएं और सभी ट्रांसमीटर्स रद्द कर दिए, जिनसे विदेशी भाषा सेवाएं प्रसारित की जातीं थीं। हालांकि उसी साल जून में कुछ भाषा सेवाएं दोबारा शुरू कर दी गईं, लेकिन इसकी वजह से कई सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
रेडियो मनोरंजन का बहुत ही सस्ता और सुगम साधन है। आज भी खेत-खलिहानों, गांव-देहात में, क़स्बों में दुकानों और कारख़ानों में रेडियो को सुना जा सकता है। अपने घर-परिवार से दूर फ़ौजी भाइयों के लिए तो यह बहुत ज़रूरी साधन है। देश की सरहदों पर जहां दूर-दूर तक चिड़िया का बच्चा भी नज़र नहीं आता, ऐसी वीरान जगहों पर रेडियो उनका साथ निभाता है। रेडियो के ज़रिये जहां उन्हें देश-विदेश की ख़बरें मिल जाती हैं, वहीं गीत-संगीत उनका मनोरंजन करता है। फ़ौजी भाइयों की पसंद के फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जयमाला और नाटिकाओं व झलकियों का कार्यक्रम हवामहल भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पिटारा में रोज़ अलग-अलग कार्यक्रम पेश किए जाते हैं जैसे चिकित्सकों से बातचीत पर आधारित कार्यक्रम सेहतनामा, हैलो फ़रमाइश, फ़िल्मी सितारों से मुलाक़ात का कार्यक्रम’ सेल्युपलाइड के सितारे’, संगीत की दुनिया की हस्तियों से जुड़ा कार्यक्रम ‘सरगम के सितारे’ आदि। पिटारा में लोकप्रिय कार्यक्रम ‘बाईस्कोकप की बातें’ भी प्रसारित होती रही हैं। विविध भारती के कार्यक्रम ‘उजाले उनकी यादों के’ में फ़िल्मी हस्तियों से बातचीत की जाती है, उनकी ज़िन्दगी के कुछ अनछुये पहलुओं पर गुफ़्तगू की जाती है। श्रोता छायागीत, गीत गाता चल, गाता रहे मेरा दिल, गीत गुंजन, कुछ बातें कुछ गीत, रंगोली, रंग तरंग, संगीत सरिता, आज के मेहमान और आज के फ़नकार आदि कार्यक्रमों का भी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। इसके अलावा महिलाओं के लिए चूल्हाय-चौका और सोलह श्रृंगार जैसे कार्यक्रम भी लोकप्रिय रहे हैं। रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री भी ख़ूब सुनी जाती है।
ग़ौरतलब है कि हर साल 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। साल 2010 में स्पेन रेडियो अकादमी ने 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने के लिए प्रस्ताव रखा था, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत 13 फ़रवरी 1946 को हुई थी। साल 2011 में यूनेस्को के सदस्य देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने का ऐलान किया गया। फिर साल 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी इसे स्वीकार कर लिया। फिर उसी साल 13 फ़रवरी को पहली बार यूनेस्को ने विश्व रेडियो दिवस मनाया। इस दिन को मनाने का मक़सद दुनिया भर के लोगों को रेडियो की आवश्यकता और महत्व के प्रति जागरूक करना है।
आज भले ही टेलीविज़न और सोशल मीडिया का ज़माना है। इसके बावजूद रेडियो ने अपना वजूद क़ायम रखा है। अब डीटीएच के ज़रिये टीवी पर भी रेडियो को सुना जा सकता है। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी रेडियो को सुना जा सकता है। ख़ास बात तो यह भी है कि रेडियो के कार्यक्रम जब चाहे सोशल मीडिया पर सुने जा सकते हैं। अब तो निजी एफ़एम चैनलों की भी बाढ़ आई हुई है। बहरहाल, रेडियो का जलवा आज भी बरक़रार है।
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण भारत की कई अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय की अपिट छाप छो़डी है. उनके सौंदर्य, नृत्य कौशल और अभिनय ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों का मन मोह लिया और वे यहां भी उतनी ही कामयाब हुईं, जितनी दक्षिण भारतीय फिल्मों में. इन अभिनेत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनमें से एक नाम है वैजयंती माला का. वैजयंती माला में वह सब था, जो उन्हें हिंदी सिनेमा में बुलंदियों तक पहुंचा सकता था. बेहतरीन अभिनेत्री होने के साथ-साथ वह भरतनाट्यम की भी अच्छी नृत्यांगना रही हैं. फिल्म आम्रपाली में उनके नृत्य को शायद ही कोई भुला पाए. उनका अंदाज़ निराला रहा है. उन्होंने शास्त्रीय नृत्य के साथ वेस्टर्न डांस को मिलाकर नई नृत्य कला पेश की, जिसे दूसरी अभिनेत्रियों ने भी अपनाया.
वैजयंती माला का जन्म 13 अगस्त, 1936 को दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एक आयंगर परिवार में हुआ था. उनकी मां वसुंधरा देवी तमिल फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध नायिका रही हैं. वैजयंती माला का बचपन धार्मिक माहौल में बीता. उनकी परवरिश उनकी नानी यदुगिरी देवी ने की. उन्हें अपने पिता एमडी रमन से बेहद लगाव रहा. क़रीब पांच साल की उम्र में वैजयंती माला को यूरोप जाने का मौक़ा मिला. मैसूर के महाराज के सांस्कृतिक दल में उनकी मां, पिता और नानी साथ गईं. यह 1940 का वाक़िया है. वेटिकन सिटी में वैजयंती माला को पोप के सामने नृत्य करने का मौक़ा मिला. उन्होंने अपने नृत्य प्रदर्शन से सबका मन मोह लिया. पोप ने एक बॉक्स में चांदी का मेडल देकर बच्ची की हौसला अ़फजाई की. इस दल ने पोप के सामने भी प्रदर्शन किया. वैजयंती माला ने गुरु अरियाकुडी रामानुज आयंगर और वझूवूर रमिआह पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा, जबकि कर्नाटक संगीत की शिक्षा मनक्कल शिवराजा अय्यर से ग्रहण की.
तेरह साल की उम्र से ही उन्होंने स्टेज शो करने शुरू कर दिए थे. पहले स्टेज शो के दौरान उनके साथ एक ब़डा हादसा हो गया था, इसके बावजूद उन्होंने शानदार नृत्य प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि वह हालात का मुक़ाबला करना जानती हैं. हुआ यूं कि 13 अप्रैल, 1949 को तमिल नववर्ष के दिन उनके नृत्य का कार्यक्रम था. इसके लिए एक ब़डा घर लिया गया और वहां एक स्टेज बनाया गया. स्टेज का जायज़ा लेते व़क्त वैजयंती माला का पैर वहां पड़े बिजली के नंगे तार से छू गया, जिससे वह झुलस गईं. लेकिन साहसी वैजयंती माला ने जख्मी पैर और दर्द की परवाह किए बिना नृत्य प्रदर्शन किया और उनके चेहरे पर उनकी तकली़फ ज़रा भी नहीं झलकी. अगले दिन के अ़खबारों में उनके नृत्य कौशल और साहस की सराहना करती हुई खबरें और तस्वीरें प्रकाशित हुईं. एक अ़खबार ने लिखा-वरूगिरल वैजयंती यानी यही है वैजयंती. उनके नृत्य के एक के बाद एक कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा. उन्हीं दिनों चेन्नई के गोखले हॉल में आयोजित नृत्य समारोह में एवीएम प्रोडक्शन के मालिक एवी ययप्पा चेटियार और एमवी रमन भी मौजूद थे. कार्यक्रम के बाद ययप्पा चेटियार ने उन्हें अपनी तमिल फिल्म वजकई में काम करने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दरअसल, निर्देशक एमवी रमन को अपनी फिल्म वजकई के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी. फ़िल्म हिट रही. इसे तेलगू में जिवीथम और हिंदी में बहार नाम से बनाया गया. मीडिया ने उन्हें वैजयंती द डांसिंग स्टार नाम दिया. इस दौरान उन्होंने कई क्षेत्रीय फिल्मों में काम किया, लेकिन पहली फिल्म जैसी कामयाबी नहीं मिली. इस दौरान वह नृत्य प्रदर्शन भी करती रहीं.
अचानक एक दिन उन्हें फिल्म नागिन का प्रस्ताव मिला. इसके लिए वह मुंबई आ गईं. उन्होंने सांपों के साथ काम करके सबको चौंका दिया, लेकिन फिल्म को प्रदर्शन के फौरन बाद कामयाबी नहीं मिली. कुछ व़क्त बाद इसी फिल्म को देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों में उम़डने लगे. 1954 में बनी फ़िल्म नागिन उनकी पहली हिट फ़िल्म थी. जिस व़क्त वैजयंती माला हिंदी सिनेमा में आईं, उस व़क्त सुरैया, मधुबाला, नरगिस और मीना कुमारी आदि अभिनेत्रियां सिने पटल पर छाई हुई थीं. वैजयंती माला को इनके बीच ही अपनी अलग पहचान बनानी थी, जो बेहद ही चुनौतीपूर्ण काम था. उन्होंने अपने अभिनय और नृत्य कला के बूते यह साबित कर दिया कि वह भी किसी से कम नहीं हैं. 1955 में बनी फिल्म देवदास में उन्होंने चंद्रमुखी के किरदार को कालजयी बना दिया. 1956 में आई उनकी फिल्म नया दौर में भी उन्होंने शानदार अभिनय किया. इस फिल्म को कई अवॉर्ड मिले. दिलीप कुमार के साथ उनकी जो़डी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. नया दौर हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाती है.
उनकी 1956 में न्यू डेल्ही, 1957 में कठपुतली, आशा और साधना, 1958 में मधुमति, 1959 में पैग़ाम, 1961 में गंगा-जमुना, 1964 में संगम और लीडर, 1966 में आम्रपाली और सूरज, 1967 में ज्वैलीथी़फ, 1968 में संघर्ष और 1969 में प्रिंस आई. उन्होंने बंगाली फिल्मों में भी काम किया. उनकी एक ब़डी खासियत यह भी थी कि उनके डायलॉग डब नहीं करने प़डते थे.वह पहली ऐसी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने डायलॉग खुद बोलने के लिए हिंदी सीखी. उन्हें 1956 में फ़िल्म देवदास के लिए पहली बार सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर पुरस्कार मिला. इसके बाद 1958 में फ़िल्म मधुमती के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया. फिर 1961 में फ़िल्म गंगा-जमुना और 1964 में फ़िल्म संगम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा 1996 में उन्हें फ़िल्म़फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया.
अपने करियर की बुलंदी पर ही उन्होंने विवाह करने का ऐलान कर दिया. उन्होंने डॉ. चमन लाल बाली को अपने जीवन साथी के रूप में चुना. डॉ. बाली राजकपूर के फैमिली डॉक्टर थे. तमिल फिल्म नीलाबू की शूटिंग के दौरान वैजयंती माला डल झील में डूबते-डूबते बचीं थीं. इलाज के लिए उन्हें डॉ. बाली के पास लाया गया. डॉ. बाली ने उनकी अच्छी देखभाल की. इसी दौरान उनका झुकाव डॉ. बाली के प्रति ब़ढता गया और वह उनसे प्रेम करने लगीं. डॉ. बाली रावलपिंडी के थे और वैजयंती शुद्ध दक्षिण भारतीय आयंगर परिवार से थीं. इसलिए उनके परिवार वाले रिश्ते के लिए राज़ी नहीं थे, लेकिन उनकी नानी के द़खल के बाद 10 मार्च, 1968 को उनका विवाह आयंगर विवाह पद्धति से संपन्न हुआ. वह एक बेटे की मां बनीं. उनकी ज़िंदगी में खुशियों का यह दौर उस व़क्त थम गया, जब उनके पति की तबीयत खराब रहने लगी. उनकी एक बार सर्जरी हो चुकी थी. एक रात उनकी तबीयत इतनी ज़्यादा बिग़डी कि फिर कभी वह स्वस्थ नहीं हो पाए. ऐसा व़क्त भी आया, जब डॉ. बाली के परिवार ने वैजयंती माला और उनके पुत्र को जायदाद से बेद़खल कर दिया. वैजयंती माला ने चार साल तक मुक़दमा लड़ा और जीत हासिल की. अब वह फिर से अपने करियर की शुरुआत करना चाहती थीं. 1989 के चुनाव के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने क़ुबूल कर लिया. उन्होंने चुनाव ल़डा और 1.5 लाख वोटों से जीत दर्ज की. इसके बाद वह दो बार राज्यसभा से सांसद रहीं. 1995 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से नवाज़ा. वह खुद को अभिनेत्री से ज़्यादा नृत्यांगना मानती हैं. वह नाट्यालय अकादमी की आजीवन अध्यक्ष हैं.
दशहरे की आहट के साथ पूर्वी और उत्तर भारत के कई राज्यों में ग्रामीण मेलों की शुरुआत हो जाती है। आधुनिकता की तेज रफ्तार ने पिछले कुछ दशकों में इन मेलों का आकर्षण बहुत हद तक छीन लिया है, लेकिन ये मेले कभी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ और हमारे गांवों की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। देश की प्रकृति और गंध को महसूस करने के बेहतरीन ज़रिए। आज के युवाओं में भले ही इन मेलों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह गया हो, ऐसे मेलों को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोगों के भीतर का बच्चा आज भी मचल उठता है। हाल के वर्षों में कई बार कुछ देर इन मेलों में घूम-घामकर बचपन वाले तिलिस्म को जगाने की कोशिश करता रहता हूं, मगर वह जादू अक्सर नदारद ही मिलता है। मेला देखने के लिए अब न वो बचपन वाली आंखें हैं और न उसे महसूस करने के लिए बच्चों वाला दिल। वैसे शहरीकरण की अंधी दौड़ में ग्रामीण मेलों की आत्मा भी कितनी बच गई है अब !
पिछली पीढ़ी के लोगों को अपने बचपन और किशोर वय में साल भर इन मेलों की प्रतीक्षा रहती थी। इन मेलों का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करता था खाने के लिए तीसी के तेल में बनी तेज गंध वाली लाल-पीली गरम जलेबी, रंग-बिरंगे बतासे, मूढ़ी-पकौड़ी और मुंह में रखते ही उड़ जाने वाली छलना-सी हवा मिठाई या बुढ़िया के बाल। देखने के लिए बाइस्कोप वाला क़ुतुब मीनार और ताजमहल, टेंट में चल रहे जादूघर, छोटे-मोटे सर्कस, सांप और संपेरे, कठपुतली का नाच और मौत का कुआं। खरीदने-पढ़ने के लिए ठाकुर प्रसाद एंड संस, कचौड़ी गली बनारस जैसे प्रकाशकों की किताबें जैसे वशीकरण मन्त्र, जीजा-साली विनोद, लैला-मजनू,शीरी-फरहाद,आल्हा-रूदल, सारंगा -बृजाभार और बिहुला-विषहरी के किस्से, प्रेमपत्र कैसे लिखें, आशिक-माशूक की शायरी, लता की तान, मुकेश और रफ़ी के दर्द भरे नग्मे, घर सजाने के लिए रंग-बिरंगे गुबारे,मिट्टी और लकड़ीके असंख्य खिलौने और नरगिस, मधुबाला, सुरैया, दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद जैसे फिल्मी सितारों की बहुरंगी तस्वीरें।
तब के ग्रामीण मेलों की सबसे बड़ी पहचान होती थी हर दिशा से उठती हुई फिनाइल की तीखी मगर जानी-पहचानी गंध। यह गंध आती थी ग्रामीण स्त्रियों के रंग-बिरंगे कपड़ों से। वे अपने धराऊ महंगे कपडे साल भर पेटियों में छुपाकर रखती थीं और कीड़ों से बचाने के लिए उनपर फिनाइल की गोलियां डाल देती थीं। मेले-ठेले के मौके पर वे कपडे बाहर निकलते थे और उनके निकलते ही घर से मेले तक का वातावरण फिनाइल की गंध से महमहा जाता था। उस दौर में मेले के बड़े हिस्सों पर औरतों का ही कब्ज़ा होता था। मंदिरों में पूजा करती औरतें, समूह में झूम-झूमकर गाती-गुनगुनाती औरतें, किसी पेड़ के नीचे मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाती-खिलाती औरतें, सस्ते श्रृंगार प्रसाधनों की दुकानों पर मोलभाव करती औरतें और मेले में बहुत दिनों बाद मिली माई-बहनों के गले मिल बुक्का फाड़कर रुदन करती औरतें। 'माई रे माई', 'बहिनी रे बहिनी' की संगीतमय टेक के साथ उनका लंबा चलने वाला विलाप और कुछ ही पलों बाद उनके हंसने-खिलखिलाने की आवाजें मेलों का कौतूहल हुआ करती थीं। घर-घर में मौजूद मोबाइल और वीडियो कॉल के इस जमाने में माई-बहनों का वह मेल-मिलाप और रुदन अब इतिहास की वस्तु हो चला है।
उस दौर में लोकगायकों और वादकों की आमदनी का एक बड़ा ज़रिया वे ग्रामीण मेले ही हुआ करते थे जहां उनकी कला से खुश होकर लोग उनपर पैसों की बारिश कर देते थे। उन लोक कलाकारों के पास धार्मिक, पौराणिक और लोकगीतों के अलावा मेला घूमने वाली औरतों को लेकर बनाए हुए दर्जनों गीत होते थे। उन मेलाघुमनी गीतों में मेलों में आवारागर्दी करने वाले मर्दों को कोई कुछ नहीं कहता था। मज़ाक की पात्र हमेशा वे भोली-भाली औरतें ही होती थीं जिन्हें ये मेले साल में एक-दो बार घर की चहारदीवारी से निकलकर दुनिया देखने के मौके देते थे। उनमें से ज्यादातर गीत अब भूल गए, लेकिन एक गीत की कुछ पंक्तियां आज भी याद है।
तीसी-तोरी बेच कर पईसा जुटावेली से, मेलावा में खाएके मिठाई मेलाघुमनी।
साड़ी लाल-पीली पर ओढ़के चदरिया से कर लेली सोरहो सिंगार मेलाघुमनी।
चारि जनि आगे भइली, चार जनि पीछे भइली, रस्ते में झूमर उठावे मेलाघुमनी।
मरद के कम भीड़, मउगी के ठेलाठेली, मेलवा में मारेली नजारा मेलाघुमनी।
अचरा में गुड़ चिउरा, झोरवा में लिट्टी-चोखा, गटकेलि गरम जिलेबी मेलाघुमनी।
नैहरा - ससुरवा के लोग से जे भेंट भईल , बीचे राहे रोदन पसारे मेलाघुमनी।
विकास की तेज रफ्तार में जिन चीजों की बलि चढ़ी है, उनमें लोकजीवन की खुशबू से भरे गांव-देहात के ये मेले भी हैं। मॉल संस्कृति में जी रही आज की पीढ़ी के लिए ये मेले अप्रासंगिक हो चुके हैं, लेकिन जिन लोगों ने इन मेलों में भारतीय गांवों की आत्मा की खुशबू, आत्मीयता महसूस की है, उनकी स्मृतियों में ये मेले हमेशा ही बने रहेंगे। और बनी रहेगी वह सरलता और भोलापन जो हमारे जीवन से धीरे-धीरे खारिज़ हो चला है।
पिछली पीढ़ी के लोगों को अपने बचपन और किशोर वय में साल भर इन मेलों की प्रतीक्षा रहती थी। इन मेलों का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करता था खाने के लिए तीसी के तेल में बनी तेज गंध वाली लाल-पीली गरम जलेबी, रंग-बिरंगे बतासे, मूढ़ी-पकौड़ी और मुंह में रखते ही उड़ जाने वाली छलना-सी हवा मिठाई या बुढ़िया के बाल। देखने के लिए बाइस्कोप वाला क़ुतुब मीनार और ताजमहल, टेंट में चल रहे जादूघर, छोटे-मोटे सर्कस, सांप और संपेरे, कठपुतली का नाच और मौत का कुआं। खरीदने-पढ़ने के लिए ठाकुर प्रसाद एंड संस, कचौड़ी गली बनारस जैसे प्रकाशकों की किताबें जैसे वशीकरण मन्त्र, जीजा-साली विनोद, लैला-मजनू,शीरी-फरहाद,आल्हा-रूदल, सारंगा -बृजाभार और बिहुला-विषहरी के किस्से, प्रेमपत्र कैसे लिखें, आशिक-माशूक की शायरी, लता की तान, मुकेश और रफ़ी के दर्द भरे नग्मे, घर सजाने के लिए रंग-बिरंगे गुबारे,मिट्टी और लकड़ीके असंख्य खिलौने और नरगिस, मधुबाला, सुरैया, दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद जैसे फिल्मी सितारों की बहुरंगी तस्वीरें।
तब के ग्रामीण मेलों की सबसे बड़ी पहचान होती थी हर दिशा से उठती हुई फिनाइल की तीखी मगर जानी-पहचानी गंध। यह गंध आती थी ग्रामीण स्त्रियों के रंग-बिरंगे कपड़ों से। वे अपने धराऊ महंगे कपडे साल भर पेटियों में छुपाकर रखती थीं और कीड़ों से बचाने के लिए उनपर फिनाइल की गोलियां डाल देती थीं। मेले-ठेले के मौके पर वे कपडे बाहर निकलते थे और उनके निकलते ही घर से मेले तक का वातावरण फिनाइल की गंध से महमहा जाता था। उस दौर में मेले के बड़े हिस्सों पर औरतों का ही कब्ज़ा होता था। मंदिरों में पूजा करती औरतें, समूह में झूम-झूमकर गाती-गुनगुनाती औरतें, किसी पेड़ के नीचे मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाती-खिलाती औरतें, सस्ते श्रृंगार प्रसाधनों की दुकानों पर मोलभाव करती औरतें और मेले में बहुत दिनों बाद मिली माई-बहनों के गले मिल बुक्का फाड़कर रुदन करती औरतें। 'माई रे माई', 'बहिनी रे बहिनी' की संगीतमय टेक के साथ उनका लंबा चलने वाला विलाप और कुछ ही पलों बाद उनके हंसने-खिलखिलाने की आवाजें मेलों का कौतूहल हुआ करती थीं। घर-घर में मौजूद मोबाइल और वीडियो कॉल के इस जमाने में माई-बहनों का वह मेल-मिलाप और रुदन अब इतिहास की वस्तु हो चला है।
उस दौर में लोकगायकों और वादकों की आमदनी का एक बड़ा ज़रिया वे ग्रामीण मेले ही हुआ करते थे जहां उनकी कला से खुश होकर लोग उनपर पैसों की बारिश कर देते थे। उन लोक कलाकारों के पास धार्मिक, पौराणिक और लोकगीतों के अलावा मेला घूमने वाली औरतों को लेकर बनाए हुए दर्जनों गीत होते थे। उन मेलाघुमनी गीतों में मेलों में आवारागर्दी करने वाले मर्दों को कोई कुछ नहीं कहता था। मज़ाक की पात्र हमेशा वे भोली-भाली औरतें ही होती थीं जिन्हें ये मेले साल में एक-दो बार घर की चहारदीवारी से निकलकर दुनिया देखने के मौके देते थे। उनमें से ज्यादातर गीत अब भूल गए, लेकिन एक गीत की कुछ पंक्तियां आज भी याद है।
तीसी-तोरी बेच कर पईसा जुटावेली से, मेलावा में खाएके मिठाई मेलाघुमनी।
साड़ी लाल-पीली पर ओढ़के चदरिया से कर लेली सोरहो सिंगार मेलाघुमनी।
चारि जनि आगे भइली, चार जनि पीछे भइली, रस्ते में झूमर उठावे मेलाघुमनी।
मरद के कम भीड़, मउगी के ठेलाठेली, मेलवा में मारेली नजारा मेलाघुमनी।
अचरा में गुड़ चिउरा, झोरवा में लिट्टी-चोखा, गटकेलि गरम जिलेबी मेलाघुमनी।
नैहरा - ससुरवा के लोग से जे भेंट भईल , बीचे राहे रोदन पसारे मेलाघुमनी।
विकास की तेज रफ्तार में जिन चीजों की बलि चढ़ी है, उनमें लोकजीवन की खुशबू से भरे गांव-देहात के ये मेले भी हैं। मॉल संस्कृति में जी रही आज की पीढ़ी के लिए ये मेले अप्रासंगिक हो चुके हैं, लेकिन जिन लोगों ने इन मेलों में भारतीय गांवों की आत्मा की खुशबू, आत्मीयता महसूस की है, उनकी स्मृतियों में ये मेले हमेशा ही बने रहेंगे। और बनी रहेगी वह सरलता और भोलापन जो हमारे जीवन से धीरे-धीरे खारिज़ हो चला है।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
कामुकता के कारण लिंगभेद पैदा होता है, अत: लिंगभेद को जानने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि कामुकता का गंभीरता से मूल्यांकन किया जाए. मेकनिन ने रेखांकित किया है कि लिंगों के बीच में विषमता का प्रधान कारण कामुकता है. मीडिया में स्त्रियों के विज्ञापन देखकर पहले यह कहा जा सकता था कि स्त्री का समर्पित रूप ही आदर्श रूप था. किन्तु हाल के वर्षों में स्त्री की स्वायत्त या स्वतंत्र छवि भी सामने आयी है,स्त्री और पुरूष के बीच में समानता का संदेश देने वाले विज्ञापन भी आए हैं. इसके बावजूद स्त्री का समर्पित रूप आज भी सबसे ज्यादा आकर्षित करता है, मुख्यधारा के विज्ञापनों में इसका वर्चस्व है. विज्ञापनों के माध्यम से जो मुख्य संदेश संप्रेषित किया जा रहा है कि स्त्री का मुख्य लक्ष्य है पुरूष को आकर्षित करना. पुरूषों के इस्तेमाल की वस्तुओं में जो कामुक औरत दिखाई जाती है उसकी कामुक अपील मर्द के साथ संबंध बनाते हुए सामने आती है. इसी तरह औरतों के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के विज्ञापनों में रूपायित स्त्री कामुकता का लक्ष्य है मर्द को आकर्षित करना. विज्ञापन यह बताता है कि स्त्री और पुरूष आपस में कैसे व्यवहार करें. साथ ही हम यह भी सोचते हैं कि वे कैसे व्यवहार करें.पितृसत्तात्मक समाज में विज्ञापनों के जरिए हैट्रोसेक्सुअल मर्द परिप्रेक्ष्य में इमेज बनायी जाती है. इस परिप्रेक्ष्य में स्त्री को शारीरिक आकर्षण के साथ जोड़कर पेश किया जाता है. मर्द की पहचान इस संकेत से होती है कि उसके साथ कितनी आकर्षक स्त्रियां जुड़ी हैं. जो औरत शारीरिक तौर पर जितनी आकर्षक होगी उसके सहयोगी मर्द की उतनी ही प्रतिष्ठा होगी. फलत: मीडिया की स्त्री इमेजों और कामुकता से अंतत: पुरूष लाभान्वित होता है. यही वजह है कि कामुकता लिंगभेद की धुरी है, पुंसवादी वर्चस्व का आधार है. मीडिया में समर्पित कामुक औरत का रूपायन जेण्डर हायरार्की की सृष्टि करता है.
विज्ञापनों के अध्ययन की पहली पूर्वधारणा(हाइपोथिस) है -कामुक औरत को समर्पित और आश्रित रूप में पेश किया जाए. भारत में विज्ञापनों में स्त्री इमेज में हिन्दू स्त्री की इमेज ही चारों ओर छायी हुई है.अन्य अल्पसंख्यक समुदाय की स्त्रियों का रूपायन तकरीबन गायब है. कभी-कभार टीकाकरण अभियान के समय अल्पसंख्यक औरत नजर आ जाती है.
सवाल उठता है कि हिन्दू औरत की कामुकता का केन्द्र में बने रहना क्या अल्पसंख्यक स्त्रियों के लिए शुभ लक्षण है ? क्या इससे साम्प्रदायिक भेदभाव बढ़ता है ?
मीडिया के संदर्भ में दूसरी पूर्वधारणा यह है कि हिन्दू औरत अल्पसंख्यक औरत की तुलना में प्रभुत्वशाली और स्वतंत्र होती है. भारत की विशेषता है कि यहां का समूचा मीडिया मूलत: हिन्दू मीडिया है. यहां पर अल्पसंख्यकों का पक्षधर मीडिया गायब है. हिन्दू मीडिया में नमूने के मुस्लिम अभिनेता/ अभिनेत्रियों को देखकर हमें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि भारत का मीडिया धर्मनिरपेक्ष है.
मीडिया के हिन्दुत्ववादी पूर्वाग्रहों को उसकी प्रस्तुतियों के समग्र फ्लो के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि भारतीय सिनेमा ने कितनी फिल्में इस्लामिक संस्कृति की थीम या मुसलमानों की जीवन शैली पर पेश कीं ? कितनी फिल्में हिन्दुओं की संस्कृति और देवी-देवताओं पर पेश कीं ? जो मुस्लिम कलाकार मीडिया में नजर आते हैं वे कितना अल्पसंख्यक समाज का चित्रण करते हैं ?
दिलीप कुमार से लेकर शाहरूख खान तक की पूरी फिल्मी पीढ़ी हिन्दू कथानकों और जीवनशैली के चित्रण से भरी है.फिल्म उद्योग में अनेक मुस्लिम अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के होने के बावजूद हमें मुस्लिम समाज की न्यूनतम जानकारी तक नहीं है. हिन्दू और मुस्लिम समाज के बीच विगत 60 सालों में बेगानापन बढ़ा है. इस बेगानेपन को मीडिया तोड़ सकता था,किन्तु ऐसा नहीं हुआ. मीडिया में हिन्दू औरत का दर्द,उत्पीडन,शोषण,कामुक रूप तो बार-बार और प्रत्येक क्षण सामने आता है किन्तु मुस्लिम औरत की कामुकता, शोषण, वैषम्य, दर्द, सुख आदि को हम देख ही नहीं पाते.
मुस्लिम औरत के बारे में हम खास किस्म के स्टीरियोटाईप से कभी-कभार दो-चार होते हैं, हिन्दुओं में भी ऊँची जाति की औरतें ही मीडिया का पर्दा घेरे हुए हैं. ऊँची जाति का सवर्ण विमर्श ही प्रमुखता से दोहराया जा रहा है. इसी तरह अल्पसंख्यक मीडिया में भी अल्पसंख्यक स्त्री की इमेज एकसिरे से अनुपस्थित है. समग्रता में देखें तो मध्यवर्गीय हिन्दू ऑडिशंस के बाजार को केन्द्र में रखकर मीडिया में स्त्री इमेजों का रूपायन हो रहा है.
मीडिया में खासकर फिल्मों में सारी दुनिया में यह देखा गया है कि अभिनय के क्षेत्र में स्त्रियों की तुलना में मर्द ज्यादा उम्र तक अभिनय करते हैं. हॉलीवुड फिल्मों के बारे में किए गए अनुसन्धान बताते हैं कि औरतों की अभिनय उम्र तीस साल के आसपास जाकर खत्म हो जाती है जबकि मर्द की औसत अभिनय उम्र चालीस साल है. टीवी में बूढ़े चरित्रों का नकारात्मक रूपायन युवाओं में बढ़ी हुई उम्र के कलाकारों के प्रति आकर्षण घटा रहा है. टीवी पर बूढ़ी उम्र के स्त्री चरित्रों का कम आना या उनकी नकारात्मक प्रस्तुति के कारण भी प्रौढ़ स्त्री चरित्रों का प्रयोग घटा है.
मीडिया में मर्द की सफलता का पैमाना इस बात से तय होता है कि वह क्या करता है ? जबकि औरत की सफलता का पैमाना उसके लुक से तय होता है.मर्द की तुलना में औरत का शारीरिक तौर पर आकर्षक होना ज्यादा महत्वपूर्ण है. सौन्दर्य और जवानी को स्त्री के साथ जोड़कर देखा जाता है, इसके कारण ही स्त्री की ज्यादा उम्र को नकारात्मक तत्व के रूप में लिया जाता है. मर्द की उम्र उसकी सफलता और ज्ञान या अनुभव के रूप में देखी जाती है जबकि स्त्री ज्योंही अपनी जवानी के दौर को पार कर जाती है.उसका सौन्दर्य खण्डित मान लिया जाता है. वह सामाजिक तौर पर या कार्य क्षेत्र में अपना सामाजिक मूल्य खो देती है.
समाचारों में स्त्री एंकर या प्रवाचिका मूलत: अपनी एपीयरेंस के कारण बनी रह पाती है. जबकि मर्द एंकर को अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर देखा जाता है. मर्द का चेहरा झुर्रियों रहित,सफेद बालों वाला भी आकर्षक माना जाता है,जबकि औरत को एक सामान्य स्टैण्डर्ड के हिसाब से युवापन को दर्शाना होता है. टीवी पत्रकारिता पर यदि मर्द और औरत के लिए एक ही मानक लागू किया जाए तो ज्यादातर मर्द बेरोजगार हो जाएंगे. कार्य क्षेत्र की प्रस्तुतियों में टीवी चरित्रों में स्त्रियां कुछ ही किस्म के काम करती नजर आती हैं. तुलनात्मक रूप से मातहत पदों पर काम करती नजर आती हैं. जबकि मर्द व्यापक क्षेत्र में काम करता नजर आता है ,कर्ता के रूप में नजर आता है. अपने पद पर काम करते हुए औरतें यदि अपनी क्षमता का इस्तेमाल करती हैं तो उन्हें खतरों का सामना करना पड़ता है, यहां तक कि नौकरी जाने का भी खतरा रहता है.
सफल स्त्री चरित्र हमेशा अस्थिर, चंचल, जड़ से कटे हुए, स्त्रीत्व और मर्दानगी से विच्छिन्न नजर आते हैं. इस तरह के स्त्री चरित्रों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि यदि आप असली औरत हैं तो रीयल में जो कार्य है उसे नहीं कर सकती हैं. यदि रीयल कार्य कर लेती हैं तो रीयल औरत नहीं है. जबकि इस तरह का वर्गीकरण मर्द चरित्रों के संदर्भ में पेश नहीं किया जाता.
(लेखक वामपंथी चिंतक और कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं)
तनवीर जाफ़री
मीडिया को समाज का दर्पण माना जाता है. हमारे भारतीय लोकतंत्र मे तो इसे गैर संवैधानिक तरीक़े से ही सही परंतु इसकी विश्वसनीयता तथा जि़म्मेदारी के आधार पर इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की संज्ञा से नवाज़ा गया है. अख़बारों में छपने वाली खबरें अथवा रेडियो या टीवी पर प्रसारित होने वाले समाचार या इस पर दिखाई जाने वाली विभिन्न विषयों की वार्ताएं अथवा बहस आम लोगों पर अपना महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ती हैं. मीडिया का हमारे समाज में इतना महत्व है कि देश में शांति बनाए रखने या अशांति फैलाने में भी यह अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है. परंतु बड़े अफ़सोस की बात है कि आज यही मीडिया अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों से विमुख होता दिखाई दे रहा है. और मात्र अपनी टीआरपी बढ़ाने अर्थात् टेलीवीज़न रेटिंग प्वाईंटस अर्जित करने के मक़सद से या व्यवसायिक दृष्टिकोण से मीडिया का दुरुपयोग किया जाने लगा है. टेलीविज़न के क्षेत्र में ख़ासतौर से इस प्रकार की प्रवृति बहुत तेज़ी से पनपती देखी जा रही है.
पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में एक प्रतिष्ठित मीडिया हाऊस द्वारा अपना एक वार्षिक कार्यक्रम आयोजित किया गया. उस कार्यक्रम मे टीवी जगत की एक ऐसी प्रसिद्ध परंतु बदनाम शिख्सयत को सम्मानित किया गया जो रिश्वतख़ोरी तथा घोटालों में संदिग्ध तो था ही साथ-साथ उस पर एक महिला के संबंध में ग़लत रिपोर्ट प्रसारित कराए जाने का भी आरोप था. अफ़सोस की बात तो यह है कि ऐसे संदिग्ध पत्रकार को महिलाओं के क्षेत्र में अच्छी रिपोर्टिंग किए जाने के लिए ही सम्मानित किया गया. सोशल मीडिया में इस पत्रकार को सम्मानित किए जाने की काफी आलोचना की गई. कुछ लोगों ने तो इस विषय पर यहां तक लिखा कि उसके सम्मानित होने से तो गोया सम्मान से ही विश्वास उठ गया है. वैसे भी इलेक्ट्रानिक मीडिया पहले की तुलना में अब ऐसी कई बातों को लेकर अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है. टीवी चैनल्स संचालित करना तो गोया एक तमाशा सा बन गया है. यदि कोई धनाढ्य व्यक्ति अपराधी गतिविधियों में या घोटालों में शामिल होता है और टीवी चैनल्स उसकी करतूतों को बेनक़ाब करते हैं तो वही व्यक्ति अपने धनबल से अपना टीवी चैनल चलाकर स्वयं मीडिया परिवार का हिस्सा बन जाता है और शत-प्रतिशत व्यवसायिक तरीके से अपने चैनल को चलाने लगता है. उसे इस बात की क़तईफ़िक्र नहीं होती कि जिस पेशे को उसने शुरु किया है वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है और उसके पेशे के अपने कर्तव्य तथा कुछ ज़िम्मेदारियां भी हैं.
आजकल कई नए-नए क्षेत्रीय टीवी चैनल्स में जिस स्तर पर पत्रकारों की भर्ती की जा रही है वह पैमाना तो बहुत हैरान करने वाला है. चैनल के संचालक या संपादक अथवा निदेशक यह भी नहीं देख रहे हैं कि जिस व्यक्ति के हाथों में वे अपने चैनल का लोगो लगा हुआ माईक थमा रहे हैं वह अपराधी है, सट्टेबाज़ है, अनपढ़ है उसे किसी विशिष्ट व्यक्ति से सवाल पूछना तो दूर उसे पत्रकारिता की एबीसीडी भी नहीं आती. आजकल ऐसे चैनल अपने पत्रकारों को तनख़्वाह अथवा पारिश्रमिक के नाम पर तो कुछ भी नहीं देते बजाए इसके उसी पत्रकार से कैमरा ख़रीदने को कहते हैं तथा उसके पास कार अथवा मोटरसाईकल है या नहीं यह भी सुनिश्चित करते हैं. शैक्षिक योग्यता तो पूछी ही नहीं जाती. ज़रा सोचिए ऐसा पत्रकार किसी मीडिया हाऊस से जुडऩे के बाद अपनी हेकड़ी बघारते हुए ब्लैकमेलिंग या सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए लोगों को डराने-धमकाने का काम करेगा या नहीं? ऐसे कथित पत्रकारों से भला मीडिया के सम्मान तथा उसके कर्तव्यों व ज़िम्मेदारियों को निभाने की उम्मीद भी क्या की जा सकती है जो पत्रकार पत्रकारिता के विषय में कुछ जानता ही न हो? और जो पत्रकार पत्रकारिता की समझ रखते भी हैं वे भी अपने स्वामियों के इशारे पर कुछ ऐसा कर दिखाने की कोशिश करते हैं ताकि जनता उनके चैनल की तरफ़ आकर्षित हो और उनके चैनल की तथा किसी कार्यक्रम विशेष की टीआरपी बढ़ती रहे. इसके लिए चाहे उन्हें ‘रस्सीका सांप’ क्यों न बनाना पड़े वे इससे भी नहीं हिचकिचाते. उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में असहिष्णुता जैसे विषय को लेकर एक फ़ुज़ूल की बहस छेड़ दी गई है. टीवी चैनल्स में मानो परस्पर प्रतिस्पर्धा हो गई है कि कौन सा चैनल किस मशहूरफ़िल्मी हस्ती से सहिष्णुता व असहिष्णुता के विषय पर कुछ ऐसा बयान ले ले जो उसके लिए ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाए.फ़िल्मोद्योग के लोग बेशक आम लोगों की ही तरह संवेदनशील होते हैं. इनमें कई बड़े कलाकार ऐसे भी हैं जो समय-समय पर दान,चंदा अथवा सहयोग देकर जनकल्याण संबंधी कार्य भी करते रहते हैं. परंतु इसमें भी कोई शक नहीं कि यह वर्ग एक व्यवसायिक वर्ग है. इन्हें देश व समाज की चिंताओं से पहले यही देखना होता है कि इनकी फ़िल्में हिट हो रही हें अथवा नहीं. इनकी सफलता व असफलता का पैमाना इनकी फ़िल्मों की लोकप्रियता पर ही निर्भर करता है. लिहाज़ा इसमें कोई दो राय नहीं कि प्राय: इन लोगों को समाज का हर वर्ग प्रिय तथा एक समान दिखाई देता है. इनके लिए धर्म-जात,क्षेत्र या वर्ग आदि की कोई अहमियत नहीं होती. इनके लिए सभी इनके सम्मानित दर्शक व प्रशंसक होते हैं. परंतु पिछले कुछ दिनों से यह देखा जा रहा है कि कुछ विशेष अभिनेताओं से असहिष्णुता संबंधी प्रश्र पूछकर टी वी चैनल्स द्वारा अपनी तो टीआरपी बढ़ाई जा रही है परंतु ऐसा कर इन कलाकारों के लिए मुसीबतें खड़ी की जा रही हैं. किसी धर्म विशेष से जुड़ा कोई अभिनेता यदि इस विषय पर अपने मन की या अपने परिवार की कोई बात सामने रख देता है तो टीवी एंकर गला फाड़-फाड़ कर उस की बातों को एक अपराधपूर्ण बात की तरह पेश करता है. परंतु यही बात अगर किसी अन्य धर्म का व्यक्ति कहे तो उसपर चर्चा भी नहीं होती.टीवी चैनल्स का आख़िर यह कौन सा पैमाना है?
इसी प्रकार हमारे देश में यदि आतंकवाद से जुड़ा या किसी आतंकवादी संगठन से संबंध रखने का कोई संदिग्ध व्यक्ति पकड़ा जाता है तो टीवी चैनल्स इतना शोर मचाते हैं गोया दुनिया का सबसे बड़ा अपराधी पकड़ गया हो. हालांकि गिरफ़्तार किया गया कोई भी व्यक्ति प्रारंभिक दौर में केवल संदिग्ध ही होता है. परंतु टीवी चैनल्स उस की गिरफ़्तारी की ख़बर इस तरह पेश करते हैं गोया गिरफ़्तारी के समय ही अदालत ने उसे अपराधी क़रार दे दिया हो. परंतु यदि कोई अमन-शांति व भाईचारे की ख़बरें समाज से निकलती हैं उनपर यही चैनल ध्यान नहीं देते. गोया विवादित अथवा क्राईम संबंधी खबरें चीख़-चीख़ कर सुनाने से इनको अपनी लोकप्रियता बढ़ती नज़र आती है और अपने चैनल की टीआरपी बुलंदी पर जाती दिखाई देती है. इन दिनों आतंकवाद के नाम पर आईएस अर्थात् इस्लामिक स्टेट से जुड़ी ख़बरें लगभग प्रतिदिन प्रत्येक चैनल पर किसी न किसी राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय समाचार के संदर्भ में सुनाई देती हैं. जैसे हमारे देश में कहीं आईएस का झंडा लहराया गया, कोई व्यक्ति आईएस से संबंधित नेटवर्क का हिस्सा नज़र आया, कोई आईएस के लिए भर्ती करने का आरोपी दिखाई दिया तो कोई आईएस के लिबास में नज़र आया आदि.
एक और ख़बर अक्सर सुनने में आती है कि आतंकवादियों के कुकर्मों की आलोचना तथा इसका विरोध अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा ठीक ढंग से नहीं किया जाता. यहां तक कि पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने भी इसी आशय का बयान दिया था जिसे लेकर मीडिया में ख़ूब चर्चा हुई थी. परंतु पिछले दिनों देश की सबसे प्रमुख सूफ़ी दरगाह अजमेर शरीफ़ में होने वाले सालाना उर्स के दौरान लाखों मुसलमानों की मौजूदगी में देश के लगभग सत्तर हज़ार भारतीय मुस्लिम मौलवियों ने आईएसआईएस,तालिबान,अलक़ायदा तथा अन्य कई आतंकी संगठनों के विरुद्ध एक फतवा जारी करते हुए कहा कि यह आतंकी संगठन इस्लामी संगठन नहीं हैं बल्कि यह संगठन मानवता के लिए एक बड़ा खतरा हैं. यहां न केवल देश के सत्तर हज़ार मौलवियों व मुफ़्तियों ने फ़तवा जारी किया बल्कि इससे संबंधित एक फ़ार्म पर लाखों मुसलमानों से दस्तख़त भी करवाए गए जिसमें सभी ने एक स्वर से इन आतंकवादी संगठनों को ग़ैर इस्लामी बताया,इनकी गतिविधियों को ग़ैर इंसानी कऱार दिया तथा पेरिस पर हुए आतंकवादी हमले सहित दुनिया में हर स्थान पर होने वाले आतंकी हमलों की घोर निंदा की गई. परंतु इतनी बड़ी ख़बर पर ध्यान देना किसी टीवी चैनल ने ज़रूरी नहीं समझा. बड़े आश्चर्य की बात है कि आतंकवाद का एक संदिग्ध तो किसी टीवी चैनल के लिए उसकी टीआरपी बढ़ाने का कारक बन जाता है परंतु सत्तर हज़ार मौलवियों द्वारा एक स्वर से आतंकवाद व आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध फ़तवा जारी करना इन्हीं टीवी चैनल्स के लिए कोई अहमियत नहीं रखता? इसे आख़िर टी वी पत्रकारिता का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? क्या यह इसका प्रमाण नहीं है कि टीवी पत्रकारिता अपने कर्तव्यों व अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोडक़र केवल अपनी टीआर पी को बढ़ाए जाने के एकसूत्रीय एजेंडे पर अमल कर रही है?
लेखक का परिचय
वरिष्ठ पत्रकार, समीक्षक और कॊलम लेखक तनवीर जाफ़री वर्तमान में हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य है. बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं. लेखन के अलावा सांप्रदायिक सौहार्द कायम करन के सामाजिक कामों में भी सक्रिय हैं.
जगदीश्वर चतुर्वेदी
अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है. समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं. हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना. पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना. अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है. संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है. जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं. अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है. उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है. मनोवैज्ञानिकों के यहां पोर्न और वेश्यावृत्ति एक ही कोटि में आते हैं. पोर्न वे लोग देखते हैं जो दमित कामेच्छा के मारे हैं. अथवा जीवन में मर्दानगी नहीं दिखा पाए हैं. वे लोग भी पोर्न ज्यादा देखते हैं जो यह मानते हैं कि पुरूष की तुलना में औरत छोटी, हेय होती है.ये ऐसे लोग हैं जो स्त्री के भाव, संवेदना, संस्कार, आचार- विचार, नैतिकता आदि किसी में भी आस्था नहीं रखते अथवा इन सब चीजों से मुक्त होकर स्त्री को देखते हैं. पोर्न देखने वाला अपने स्त्री संबंधी विचारों को बनाए रखना चाहता है. वह औरत को वस्तु की तरह देखता है. उसे समान नहीं मानता. पोर्न ऐसे भी लोग देखते हैं जो पूरी तरह स्त्री के साथ संबंध नहीं बना पाते.स्त्री के सामने अपने को पूरी तरह खोलते नहीं है. संवेदनात्मक अलगाव में जीते है. संवेदनात्मक अलगाव में जीने के कारण ही इन लोगों को पोर्न अपील करता है. पोर्न देखने वालों में कट्टर धर्मिक मान्यताओं के लोग भी आते हैं जो यह मानते हैं कि औरत तो नागिन होती है, राक्षसनी होती है. पोर्न का दर्शक अपने विचारों में अयथार्थवादी होता है. उसके यहां मर्द और वास्तव औरत के बीच विराट अंतराल होता है. जिस व्यक्ति को पोर्न देखने की आदत पड़ जाती है वह इससे सहज ही अपना दामन बचा नहीं पाता. पोर्न को देखे विना कामोत्तेजना पैदा नहीं होती. वह लगातार पोर्न में उलझता जाता है. अंत में पोर्न से बोर हो जाता है तो पोर्न के दृश्य उत्तेजित करने बंद कर देते हैं. इसके बाद वह पोर्न दृश्यों को अपनी जिन्दगी में उतारने की कोशिश करता है. यही वह बिन्दु है जहां से स्त्री का कामुक उत्पीडन, बलात्कार आदि की घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं.यह एक सच है कि शर्म के मारे 90 फीसदी बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं होती. अमेरिकी समाज में एक-तिहाई बलात्कारियों ने बलात्कार की तैयारी के लिए पोर्न की मदद ली. जबकि बच्चों का कामुक शोषण करने वालों की संख्या 53 फीसदी ने पोर्न की मदद ली.पोर्न की प्रमुख विषयवस्तु होती है निरीह स्त्री पर वर्चस्व.
पोर्न का इतिहास बड़ा पुराना प्राचीन ग्रीक समाज से लेकर भारत,चीन आदि तमाम देशों में पोर्न रचनाएं रची जाती रही हैं. किन्तु सन् 1800 के पहले तक पोर्न सामाजिक समस्या नहीं थी.किन्तु सन् 1800 के बाद से आधुनिक तकनीकी विकास, प्रिण्टिंग प्रेस, फिल्म, टीवी, इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उदय ने पोर्न को एक सामाजिक समस्या बना दिया है. मीडिया ने पोर्न और सेक्स को टेबू नहीं रहने दिया है. आज पोर्न सहज ही उपलब्ध है. सामान्य जीवन में पोर्नको जनप्रिय बनाने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है. विज्ञापनों के माध्यम दर्शक की कामुक मानसिकता बनी है. कल तक जो विज्ञापन की शक्ति थी आज पोर्न की शक्ति बन चुकी है.आज पोर्न संगीत वीडियो से लेकर फैशन परेड तक छायी हुई है. वे वेबसाइड जो एमेच्योर पोर्न के नाम पर आई उनमें सेक्स के दृश्य देख्रकर लों में पोर्न के प्रति आकर्षण बढ़ा. स्कूल-कॉलज पढ़ने जाने वाली लड़कियां बड़े पैमाने ट्यूशन पढ़ने के बहाने अपने घर से निकलती थी. और छुपकर पोन्र का आनंद लेती थीं.इसके लिए वे वेबकॉम का इस्तेमाल करती थीं. वेबकास्ट की तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण कम्प्यूटर पर प्रतिदिन अनेकों नयी वेबसरइट आने लगीं. लाइव शो आने लगे.इनमें नग्न औरत परेड करती दिखाई जाती है,सेक्स करते दिखाई जाती है. पोर्न के निशाने पर युवा दर्शक हैं. फे्रडरिक लेन (थर्ड) ने ”ऑवसीन प्रोफिटस:दि इंटरप्रिनर्स ऑफ पोर्नोग्राफी इन दि साइबर एज” में लिखा है कि पोर्न के विकास में वीसीआर और इंटरनेट तकनीक ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है.
सामान्य तौर पर अमेरिकी मीडिया पर नजर डालें तो पाएंगे कि सन् 1999 में अमेरिका में उपभोक्ता पत्रिकाओं की बिक्री और विज्ञापन से होने वाली आमदनी 7.8 विलियन डालर थी,टेलीविजन 32 .3विलियन डालर, केबल टीवी 45..5 विलियन डालर, पेशेवर और शैक्षणिक प्रकाशन 14.8विलियन डालर, वीडियो किराए से वैध आमदनी 200 विलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी. विज्ञान इतिहासकार मैकेजी के अनुसार विश्व के सकल मीडिया उद्योग की आमदनी 107 ट्रिलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी. यानी पृथ्वी पर रहने वाले प्रति व्यक्ति 18000 हजार डालर. हेलेन रेनॉल्ड ने लिखा कि अमेरिका में सन् 1986 में सेक्स उद्योग में पचास लाख वेश्याएं थीं. जनकी सालाना आय 20 विलियन डालर थी. एक अनुमान के अनुसार सन् 2003 तक सारी दुनिया में कामुक (इरोटिका) सामग्री की बिक्री 3 विलियन डालर तक पहुँच जाने का अनुमान लगाया गया.फरवरी 2003 में ‘विजनगेन’ नामक संस्था ने अनुमान व्यक्त किया कि सन् 2006 तक ऑनलाइन पोर्न उद्योग 70 विलियन डालर का आंकडा पार कर जाएगा.
विशेषज्ञों में यह सवाल चर्चा के केन्द्र में है कि आखिरकार कितनी संख्या में पोर्न वेबसाइट हैं. एक अनुमान के अनुसार तीस से लेकर साठ हजार के बीच में पोर्न वेबसाइट हैं. ओसीएलसी का मानना है कि 70 हजार व्यावसायिक साइट हैं. इसके अलावा दो लाख साइट शिक्षा की आड़ में चलायी जा रही हैं. कुछ लोग यह मानते हैं कि वयस्क सामग्री अरबों खरबों पन्नों में है. सन् 2003 में ‘डोमेनसरफर’ द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चला कि एक लाख सडसठ हजार इकहत्तर वेवसाइट ऐसी हैं जिसमें सेक्स पदबंध शामिल है. बत्तीस हजार नौ सौ बहत्तर में गुदा (अनल) पदबंध शामिल है. उन्नीस हजार दो सौ अडसठ में एफ (संभोग) पदबंध शामिल है. चार सौ सात में स्तन, तिरपन हजार चौरानवे में पोर्न, उनतालीस हजार चार सौ पिचानवे में एक्सएक्सएक्स पदबंध शामिल है. ‘अलटाविस्टा’ के अनुसार पोर्न के तीस लाख पन्ने हैं. असल संख्या से यह आंकड़ा काफी कम है. अकेले गुगल के ‘हिटलर’ सर्च में 1.7मिलियन पन्ने हैं. जबकि ‘कित्तिन’ में 1.2 मिलियन पन्ने हैं. ‘डाग’ में 17मिलियन पन्ने हैं.’सेक्स’ में 132 मिलियन पन्ने हैं. सन् 2003 में गुगल में 126 मिलियन पोर्न पन्ने थे. वयस्क उद्योग में कितने लोग काम करते हैं. इसका सारी दुनिया का सटीक आंकडा उपलब्ध नहीं है, इसके बावजूद कुछ आंकड़े हैं जो आंखें खोलने वाले हैं. आस्टे्रलिया इरोज फाउण्डेशन के अनुसार आस्ट्रेलिया में छह लाख छियालीस हजार लोग के वयस्क वीडियो के पता संकलन में थे.तकरीबन 250 दुकानें थीं जिनका सालाना कारोबार 100 मिलियन डालर था.इसके अलावा 800 वैध और 350 अवैध वेश्यालय, आनंद सहकर्मी, मेसाज पार्लर थे. सालाना 12 लाख लोग सेक्स वर्कर के यहां जाते हैं. यह आंकडा खाली आस्ट्रेलिया का है. इसी तरह वेब पर जाने वाले दस में चार लोग सेक्स या पोर्न वेब पर जरूर जाते हैं.
सेक्स उद्योग के आंकड़ों के बारे में एक तथ्य यह भी है कि इसके प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इस क्षेत्र के बारे में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं. ”केसलॉन एनालिस्टिक प्रोफाइल: एडल्ट कंटेंट इण्डस्ट्रीज ” में आंकडों के इस वैविध्य को सामने रखा. सन् 2002 में एक प्रमोटर ने अनुमान व्यक्त किया कि वयस्क अंतर्वस्तु उद्योग 900 विलियन डालर का है. एक अन्य प्रमोटर ने कहा कि अकेले अमेरिका में ही इसका सालाना कारोबार 10 विलियन डालर का है. एक अन्य अमेरिकी कंपनी ने कहा कि वयस्क वीडियो उद्योग में सालाना 5 विलियन की वृद्धि हो रही है.
(लेखक, वामपंथी चिंतक और कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं)
अमेरिकी समाज पोर्न में पूरी तरह पोर्न में डूब चुका है. समाज को पोर्न में डुबाने में बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां और कारपोरेट हाउस सबसे आगे हैं. हमारे देश में जो लोग अमेरिकीकरण के काम में लगे हैं उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज का अमरीकीकरण करने का अर्र्थ है पोर्न में डुबो देना. पोर्न में डूब जाने का अर्थ है संवेदनहीन हो जाना. अमेरिकी समाज क्रमश: संवेदनहीनता की दिशा में आगे जा रहा है. संवेदनहीनता का आलम यह है कि समाज में बेगानापन बढ रहा है. जबकि सामाजिक होने का अर्थ है कि व्यक्ति सामाजिक संबंध बनाए, संपर्क रखे, एक-दूसरे के सुख-दुख में साझेदारी निभाएं. अमेरिकी समाज में वे ही लोग प्रभावशाली हैं जिनके पास वित्तीय सुविधाएं हैं, पैसा है. उनका ही मीडिया और कानून पर नियंत्रण है. मनोवैज्ञानिकों के यहां पोर्न और वेश्यावृत्ति एक ही कोटि में आते हैं. पोर्न वे लोग देखते हैं जो दमित कामेच्छा के मारे हैं. अथवा जीवन में मर्दानगी नहीं दिखा पाए हैं. वे लोग भी पोर्न ज्यादा देखते हैं जो यह मानते हैं कि पुरूष की तुलना में औरत छोटी, हेय होती है.ये ऐसे लोग हैं जो स्त्री के भाव, संवेदना, संस्कार, आचार- विचार, नैतिकता आदि किसी में भी आस्था नहीं रखते अथवा इन सब चीजों से मुक्त होकर स्त्री को देखते हैं. पोर्न देखने वाला अपने स्त्री संबंधी विचारों को बनाए रखना चाहता है. वह औरत को वस्तु की तरह देखता है. उसे समान नहीं मानता. पोर्न ऐसे भी लोग देखते हैं जो पूरी तरह स्त्री के साथ संबंध नहीं बना पाते.स्त्री के सामने अपने को पूरी तरह खोलते नहीं है. संवेदनात्मक अलगाव में जीते है. संवेदनात्मक अलगाव में जीने के कारण ही इन लोगों को पोर्न अपील करता है. पोर्न देखने वालों में कट्टर धर्मिक मान्यताओं के लोग भी आते हैं जो यह मानते हैं कि औरत तो नागिन होती है, राक्षसनी होती है. पोर्न का दर्शक अपने विचारों में अयथार्थवादी होता है. उसके यहां मर्द और वास्तव औरत के बीच विराट अंतराल होता है. जिस व्यक्ति को पोर्न देखने की आदत पड़ जाती है वह इससे सहज ही अपना दामन बचा नहीं पाता. पोर्न को देखे विना कामोत्तेजना पैदा नहीं होती. वह लगातार पोर्न में उलझता जाता है. अंत में पोर्न से बोर हो जाता है तो पोर्न के दृश्य उत्तेजित करने बंद कर देते हैं. इसके बाद वह पोर्न दृश्यों को अपनी जिन्दगी में उतारने की कोशिश करता है. यही वह बिन्दु है जहां से स्त्री का कामुक उत्पीडन, बलात्कार आदि की घटनाएं तेजी से घटने लगती हैं.यह एक सच है कि शर्म के मारे 90 फीसदी बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं होती. अमेरिकी समाज में एक-तिहाई बलात्कारियों ने बलात्कार की तैयारी के लिए पोर्न की मदद ली. जबकि बच्चों का कामुक शोषण करने वालों की संख्या 53 फीसदी ने पोर्न की मदद ली.पोर्न की प्रमुख विषयवस्तु होती है निरीह स्त्री पर वर्चस्व.
पोर्न का इतिहास बड़ा पुराना प्राचीन ग्रीक समाज से लेकर भारत,चीन आदि तमाम देशों में पोर्न रचनाएं रची जाती रही हैं. किन्तु सन् 1800 के पहले तक पोर्न सामाजिक समस्या नहीं थी.किन्तु सन् 1800 के बाद से आधुनिक तकनीकी विकास, प्रिण्टिंग प्रेस, फिल्म, टीवी, इंटरनेट आदि के विकास के साथ-साथ जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उदय ने पोर्न को एक सामाजिक समस्या बना दिया है. मीडिया ने पोर्न और सेक्स को टेबू नहीं रहने दिया है. आज पोर्न सहज ही उपलब्ध है. सामान्य जीवन में पोर्नको जनप्रिय बनाने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है. विज्ञापनों के माध्यम दर्शक की कामुक मानसिकता बनी है. कल तक जो विज्ञापन की शक्ति थी आज पोर्न की शक्ति बन चुकी है.आज पोर्न संगीत वीडियो से लेकर फैशन परेड तक छायी हुई है. वे वेबसाइड जो एमेच्योर पोर्न के नाम पर आई उनमें सेक्स के दृश्य देख्रकर लों में पोर्न के प्रति आकर्षण बढ़ा. स्कूल-कॉलज पढ़ने जाने वाली लड़कियां बड़े पैमाने ट्यूशन पढ़ने के बहाने अपने घर से निकलती थी. और छुपकर पोन्र का आनंद लेती थीं.इसके लिए वे वेबकॉम का इस्तेमाल करती थीं. वेबकास्ट की तकनीक का इस्तेमाल करने के कारण कम्प्यूटर पर प्रतिदिन अनेकों नयी वेबसरइट आने लगीं. लाइव शो आने लगे.इनमें नग्न औरत परेड करती दिखाई जाती है,सेक्स करते दिखाई जाती है. पोर्न के निशाने पर युवा दर्शक हैं. फे्रडरिक लेन (थर्ड) ने ”ऑवसीन प्रोफिटस:दि इंटरप्रिनर्स ऑफ पोर्नोग्राफी इन दि साइबर एज” में लिखा है कि पोर्न के विकास में वीसीआर और इंटरनेट तकनीक ने केन्द्रीय भूमिका अदा की है.
सामान्य तौर पर अमेरिकी मीडिया पर नजर डालें तो पाएंगे कि सन् 1999 में अमेरिका में उपभोक्ता पत्रिकाओं की बिक्री और विज्ञापन से होने वाली आमदनी 7.8 विलियन डालर थी,टेलीविजन 32 .3विलियन डालर, केबल टीवी 45..5 विलियन डालर, पेशेवर और शैक्षणिक प्रकाशन 14.8विलियन डालर, वीडियो किराए से वैध आमदनी 200 विलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी. विज्ञान इतिहासकार मैकेजी के अनुसार विश्व के सकल मीडिया उद्योग की आमदनी 107 ट्रिलियन डालर सन् 2000 में आंकी गयी. यानी पृथ्वी पर रहने वाले प्रति व्यक्ति 18000 हजार डालर. हेलेन रेनॉल्ड ने लिखा कि अमेरिका में सन् 1986 में सेक्स उद्योग में पचास लाख वेश्याएं थीं. जनकी सालाना आय 20 विलियन डालर थी. एक अनुमान के अनुसार सन् 2003 तक सारी दुनिया में कामुक (इरोटिका) सामग्री की बिक्री 3 विलियन डालर तक पहुँच जाने का अनुमान लगाया गया.फरवरी 2003 में ‘विजनगेन’ नामक संस्था ने अनुमान व्यक्त किया कि सन् 2006 तक ऑनलाइन पोर्न उद्योग 70 विलियन डालर का आंकडा पार कर जाएगा.
विशेषज्ञों में यह सवाल चर्चा के केन्द्र में है कि आखिरकार कितनी संख्या में पोर्न वेबसाइट हैं. एक अनुमान के अनुसार तीस से लेकर साठ हजार के बीच में पोर्न वेबसाइट हैं. ओसीएलसी का मानना है कि 70 हजार व्यावसायिक साइट हैं. इसके अलावा दो लाख साइट शिक्षा की आड़ में चलायी जा रही हैं. कुछ लोग यह मानते हैं कि वयस्क सामग्री अरबों खरबों पन्नों में है. सन् 2003 में ‘डोमेनसरफर’ द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चला कि एक लाख सडसठ हजार इकहत्तर वेवसाइट ऐसी हैं जिसमें सेक्स पदबंध शामिल है. बत्तीस हजार नौ सौ बहत्तर में गुदा (अनल) पदबंध शामिल है. उन्नीस हजार दो सौ अडसठ में एफ (संभोग) पदबंध शामिल है. चार सौ सात में स्तन, तिरपन हजार चौरानवे में पोर्न, उनतालीस हजार चार सौ पिचानवे में एक्सएक्सएक्स पदबंध शामिल है. ‘अलटाविस्टा’ के अनुसार पोर्न के तीस लाख पन्ने हैं. असल संख्या से यह आंकड़ा काफी कम है. अकेले गुगल के ‘हिटलर’ सर्च में 1.7मिलियन पन्ने हैं. जबकि ‘कित्तिन’ में 1.2 मिलियन पन्ने हैं. ‘डाग’ में 17मिलियन पन्ने हैं.’सेक्स’ में 132 मिलियन पन्ने हैं. सन् 2003 में गुगल में 126 मिलियन पोर्न पन्ने थे. वयस्क उद्योग में कितने लोग काम करते हैं. इसका सारी दुनिया का सटीक आंकडा उपलब्ध नहीं है, इसके बावजूद कुछ आंकड़े हैं जो आंखें खोलने वाले हैं. आस्टे्रलिया इरोज फाउण्डेशन के अनुसार आस्ट्रेलिया में छह लाख छियालीस हजार लोग के वयस्क वीडियो के पता संकलन में थे.तकरीबन 250 दुकानें थीं जिनका सालाना कारोबार 100 मिलियन डालर था.इसके अलावा 800 वैध और 350 अवैध वेश्यालय, आनंद सहकर्मी, मेसाज पार्लर थे. सालाना 12 लाख लोग सेक्स वर्कर के यहां जाते हैं. यह आंकडा खाली आस्ट्रेलिया का है. इसी तरह वेब पर जाने वाले दस में चार लोग सेक्स या पोर्न वेब पर जरूर जाते हैं.
सेक्स उद्योग के आंकड़ों के बारे में एक तथ्य यह भी है कि इसके प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इस क्षेत्र के बारे में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं. ”केसलॉन एनालिस्टिक प्रोफाइल: एडल्ट कंटेंट इण्डस्ट्रीज ” में आंकडों के इस वैविध्य को सामने रखा. सन् 2002 में एक प्रमोटर ने अनुमान व्यक्त किया कि वयस्क अंतर्वस्तु उद्योग 900 विलियन डालर का है. एक अन्य प्रमोटर ने कहा कि अकेले अमेरिका में ही इसका सालाना कारोबार 10 विलियन डालर का है. एक अन्य अमेरिकी कंपनी ने कहा कि वयस्क वीडियो उद्योग में सालाना 5 विलियन की वृद्धि हो रही है.
(लेखक, वामपंथी चिंतक और कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं)
फ़िरदौस ख़ान
हिन्द पॉकेट बुक्स ने खुशवंत सिंह की अंग्रेजी में प्रकाशित नेशनल बेस्ट सेलर पुस्तक को औरतें, सेक्स, लव और लस्ट नाम से प्रकाशित किया है. खुशवंत सिंह के बारे में एक ब़डे अ़खबार के संपादक ने कहा था-आपने बुलशिट को भी आर्ट में बदल दिया. खुशवंत सिंह कहते हैं कि लोग बुलशिट को भी प़ढना पसंद करते हैं. इस विचारोत्तेजक पुस्तक को उन्होंने खुलकर बेबाक ढंग से लिखा है. उन्होंने अश्लीलता, पोर्नोग्राफ़ी और इरोटिका में फ़र्क़ बताते हुए इनका विश्लेषण भी किया है. अंदाज़ उनका वही है, बोल्ड. लेखक ने इस विषय पर भारतीय ही नहीं, विदेशी मिथक और किंवदंतियों को शामिल किया है. इसके साथ ही उन्होंने कहानियों और कविताओं का भी सहारा लिया है, जिससे किताब की रोचकता बढ़ गई है.
प्रेम के बारे में खुशवंत सिंह लिखते हैं-पूरे संसार की सभी भाषाओं में केवल प्यार ही एक ऐसा विषय है, जिस पर दिल खोल कर लिखा गया है. कोई भी दूसरा विषय इसके मुक़ाबले नहीं ठहरता, लेकिन फिर भी इसकी परिभाषाएं बहुत ही भ्रामक हैं, क्योंकि यह अपने भीतर इतने भावों को संजोए रहता है, जो अपने आप में एक-दूसरे से अलग होते हैं. एक मनुष्य का अपने बच्चे के लिए स्नेह, बच्चे का मां से लगाव, एक मनुष्य का अपने प्रभु, गुरु और देश से प्रेम, यह सब उस प्रेम से पूरी तरह अलग हैं, जो एक औरत और मर्द को एक-दूसरे का साथ पाने और शारीरिक तौर पर एकाकार होने के लिए लालायित कर देता है. यह आयु, जाति, धन, विद्या और रंग-रूप आदि सभी तरह के मतभेदों को नकार देता है. प्यार में किसी तरह का जोड़-तोड़ नहीं होता, न ही सामाजिक क़ायदे-क़ानूनों और नतीजों से कोई लेना-देना होता है. वास्तविक जीवन में इसकी पूर्ति शारीरिक और भावात्मक संबंध से होती है. तेरहवीं सदी के फ़ारसी कवि जलालुद्दीन रूमी ने कहा है-प्रेम इच्छा रखता है कि उसके रहस्य को प्रकट कर दिया जाए. यदि कोई दर्पण कोई प्रतिबिंब ही नहीं दिखाता, तो उसका लाभ क्या है? प्रेम जीवन का सबसे प्रसन्नतादायक अनुभव है. पंद्रहवीं सदी के रहस्यवादी सू़फ़ी नूरुद्दीन ज़ामी कहते हैं-जिस दिल में प्यार का दर्द नहीं बसता, वह दिल नहीं है. जिस शरीर में प्यार की त़डप नहीं है, वह केवल नींबू और पानी है. यह तत्व ही तो पूरे ब्रह्मांड को गतिशील बनाए रखता है, इसी के नशे में तो सारी दुनिया झूमती है.
पश्चिम के लिए मनुष्य की हेलेन के प्रति इच्छा ही प्रेम का प्रतीक है. पूर्व में यही इच्छा लैला-मजनू की अमर कथा से दर्शाई जाती है. एक दिन मजनू बैठा हाथ से रेत उलीच रहा था. पूछा गया-इन रेत के कणों में क्या तलाशते हो? उसने कहा- मैं लैला को खोजता हूं. तो तुम्हें क्या लगता है कि इस तरह लैला को पा लोगे? उससे पूछा गया. मैं उसे हर जगह, इस उम्मीद में खोजता हूं कि एक न एक दिन, कहीं न कहीं तो पा ही लूंगा.
जब किसी को इश्क़ का रोग लग जाता है, तो उसका सबसे पहला लक्षण यही होता है कि वह बार-बार अपने प्रिय या प्रिया का नाम लेना चाहता है. नाम चाहे कितना भी सामान्य क्यों न हो, प्यार उसे एक जादुई विशेषता दे देता है और व्यक्ति उसे मंत्र की तरह जपना चाहता है. प्रेम के बारे में सबसे यादगार पंक्तियां बाइबिल से मिलती हैं. रूथ की प्रार्थना पर ध्यान दें-मुझे स्वयं से अलग मत होने दो. जहां तुम जाओगे, मैं जाऊंगी. जहां तुम रहोगे, वहीं रहूंगी. तुम्हारे लोग, मेरे लोग होंगे और तुम्हारा ईश्वर, मेरा ईश्वर होगा. जहां तुम मरोगे, वहीं मैं भी मर जाऊंगी और दफ़नाई जाऊंगी. हे ईश्वर, मेरी इतनी विनती सुन लेना और हो सके तो मृत्यु तक मुझे स्वयं से अलग मत होने देना. अंग्रेजी में जहां प्रेम को लेकर सुंदर कविताएं रची गईं, वहीं उर्दू में भी ख़ूबसूरत शेअर लिखे गए. मीर तुक़ी मीर कहते हैं-
जैसे नसीम, हर सहर
तेरी ही करूं जुस्तजू
ख़ाना-ब-ख़ाना, दर-ब-दर
शहर-ब-शहर, कूबा-ब-कू
यानी हर सुबह हवा की तरह मैं तुम्हें खोजने निकलता हूं. एक घर से दूसरे घर, एक दर से दूसरे दर, एक शहर से दूसरे शहर और एक गली से दूसरी गली.
प्रेम में लीन प्रेमियों के लिए यह वह समय होता है, जब प्रेमियों को ऐसा लगता है कि वे जीवन से बस यही तो चाहते थे और ईश्वर से मांगने के लिए कुछ बचा ही नहीं. आग़ा हश्र कश्मीरी के शब्दों में-
सब कुछ ख़ुदा से मांग लिया
तुझ को मांग कर
उठते नहीं हैं मेरे हाथ
इस दुआ के बाद
शायर अपने दिल की दुआ क़ुबूल होने पर, न केवल ख़ुदा बल्कि अपनी माशूक़ा का भी शुक्रिया अदा करता है. मजरूह सुल्तानपुरी कहते हैं-
मुझे सहल हो गईं मंज़िलें
ये हवा के रु़ख बदल गए
तेरा हाथ, हाथ में आ गया
के चिराग़ राहों में जल गए
इसी तरह क्रिस्तो़फ़र मार्लो अपनी प्रेमिका को याद करते हुए लिखते हैं-
तुम्हारा रूप संध्या की बयार से भी मनोहर है
और हज़ारों सितारों की सुंदरता में लिपटा है
सच ही तो है. जब आप प्यार में होते हैं, तो अपने प्रिय के अलावा कुछ सोच तक नहीं पाते हैं. यह एक जुनून बन जाता है और आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते. अपने एक सॉनेट में एडमंड स्पेंसर लिखते हैं- एक दिन मैंने उसका नाम रेत पर लिखा, पर एक लहर आई और बहा ले गई. मैंने फिर से उसका नाम लिखा, पर वही हश्र हुआ. ज्वार आया और मेरी मेहनत पर पानी फेर दिया. उसने कहा कि मनुष्य व्यर्थ है. इस तरह किसी नश्वर चीज़ को अमर नहीं बना सकते. मैं तो स्वयं ऐसा ही क्षय चाहूंगी और चाहूंगी कि मेरा नाम भी इसी तरह मिट जाए. मैंने कहा कि ऐसा नहीं होगा. धूल में मिलने के बावजूद तुम्हारा नाम अमर रहेगा. मेरी कविता तुम्हारे गुणों को अमर बना देगी और स्वर्ग तक तुम्हारी कीर्ति होगी. भले ही मौत सारी दुनिया पर क़ब्ज़ा कर ले, किंतु हमारा प्रेम जीवित रहेगा और बाद में जीवन फिर से नवीन होगा.
संस्कृत काव्य में भी लौकिक प्रेम पाया जाता है. रामायण से हमें संदर्भ मिलता है कि प्रेमी इस तथ्य से आनंदित है कि वह उसी हवा में सांस ले रहा है, जिसमें उसकी प्रिया सांस लेती है-
ऐ पवन, तू वहां तक बह कर जा. जहां मेरी प्रिया है. उसे स्पर्श करके आ और फिर मुझे स्पर्श कर. मैं तेरे माध्यम से उसके कोमल स्पर्श का अनुभव करूंगा और चंद्रमा के प्रकाश में उसका सौंदर्य देखूंगा. ये सब एक प्रेमी के लिए बहुत मायने रखता है. एक व्यक्ति इन्हीं के सहारे जीवित रह सकता है कि वह और उसकी प्रिया एक सी वायु में सांस लेते हैं और एक ही धरती पर वास करते हैं.
भृतहरि स्वीकार करते हैं-
जब कोई युवती अपने दीपक जैसे काले नेत्रों से उसे ढांप देती है, तो पुरुष की विवेचन-क्षमता की उज्जवल ज्वाला दम तोड़ देती है.
यह वास्तव में एक अद्भुत-सा एहसास है. यह प्रत्येक आयु के मनुष्य पर कभी न कभी अपना असर दिखाता ही है. प्यार की कोई परिभाषा दे पाना आसान नहीं होता. आप इसे वर्णित करना भी चाहें तो केवल यही कह सकते हैं कि आपको महसूस हो रहा है, आप जिस भावना को अनुभव करने जा रहे हैं, उसे आपने कभी महसूस नहीं किया. यह कोई बहुत सहायक नहीं जान प़डती तो हम इसके प्रारंभिक लक्षणों पर ध्यान देते हैं. इसका पहला लक्षण यही है कि आप किसी ख़ास इंसान की सोहबत में रहना चाहते हैं. इसके बाद उस व्यक्ति के साथ रहने की इच्छा, उस पर निर्भरता में बदल जाती है. उसके साथ ख़ुशी मिलती है और उसके साथ न होने पर ख़ालीपन का अहसास होता है. निर्भरता की यह अवस्था निश्चित रूप से चाहने वाले की स्थिति बदल देती है. प्रेमी जन अपने प्रेमपात्र की सेवा करने को तत्पर रहते हैं, क्योंकि इस संसार में प्रिय से अधिक प्रिय कोई नहीं होता. बर्नाड शॉ ने इसी भाव को एक प्रेमी और आम आदमी का अंतर कहा है. प्रेमी जन अपनी मर्यादा की परवाह नहीं करते और न ही उन्हें समाज की कोई परवाह होती है. प्यार में दूसरे के साथ लगातार वचनबद्धता निभाने का तत्व शामिल होता है, जिसमें आने वाले ख़तरों की भी गणना नहीं की जाती. प्यार कभी भी, कहीं से भी जीवन में सेंध लगा सकता है. यह धन, राष्ट्रीयता, धर्म और आयु के अंतर को फलांग कर विपरीत जान पड़ते संबंधों में भी हो सकता है. दो लोग एक-दूसरे के लिए खिंचाव क्यों महसूस करते हैं, यह आज तक पहेली बनी हुई है.
बहरहाल, इस किताब में औरत और मर्द की भावनाओं से जु़डी कुछ ऐसी सच्चाइयों के बारे में जानकारी मिलती है, जिन्हें हम जानना नहीं चाहते या फिर उससे मुंह मोड़ लेते हैं. लेकिन हमारे ऐसा करने से हक़ीक़त बदल तो नहीं जाती है. इसलिए ज़रूरी है कि हम इन सच्चाइयों को जानें और उन पर एक बार विचार ज़रूर करें. रिश्तों को बेहतर तरीक़े से निभाने के लिए ऐसा करना ज़रूरी भी है.
समीक्ष्य कृति : औरतें, सेक्स, लव और लस्ट
लेखक : खुशवंत सिंह
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 150 रुपये
फ़िरदौस ख़ान
टाइगर के नाम से मशहूर देश के महान क्रिकेटर मंसूर अली ख़ान पटौदी का जन्म 5 जनवरी, 1941 को मध्य प्रदेश के भोपाल में हुआ था. वह पटौदी रियासत के आख़िरी नवाब थे. उनके पिता इफ़्तिख़ार अली खां पटौदी भी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे. इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि क्रिकेट का शौक़ उन्हें विरासत में मिला, लेकिन 11 साल के मंसूर अली ने क्रिकेट खेलना शुरू भी नहीं किया था कि उनके सिर से पिता का साया उठ गया. जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खेलना शुरू किया तो 1961 में कार हादसे में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई. हालांकि इसके बाद भी उन्होंने पूरे जोश से क्रिकेट खेलना जारी रखा और अपने नेतृत्व कौशल का लोहा मनवाया.
मंसूर अली को कप्तानी मिलने का वाक़या भी बेहद दिलचस्प है. जब मंसूर अली को कप्तानी सौंपी गई, तब टीम वेस्टइंडीज दौरे पर गई थी. टीम के कप्तान नारी कांट्रेक्टर ज़ख्मी हो गए तो 21 साल के मंसूर अली को कप्तानी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. तब वह सबसे कम उम्र के कप्तान थे. उनका यह रिकॉर्ड 2004 तक क़ायम रहा. साल 2004 में जिम्बाब्वे के तातैंडा तायबू ने यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था. पटौदी ने 13 दिसंबर, 1961 को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दिल्ली में 13 रन बनाए. 10 जनवरी, 1962 को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट का अपना पहला शतक लगाया. उन्होंने चेन्नई में 113 रन बनाए. 23 मार्च, 1962 को बारबडोस टेस्ट में भारत के लिए पहली बार कप्तानी की. 12-13 फरवरी, 1964 को करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी 203 नाबाद इंग्लैंड के ख़िलाफ़ नई दिल्ली टेस्ट में खेली. फ़रवरी-मार्च, 1968 को ड्यूनेडिन टेस्ट में न्यूजीलैंड को हराकर पहली बार विदेश में 3-1 से सीरीज़ जीती. 23 जनवरी, 1975 को उन्होंने वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ करियर के अंतिम टेस्ट (मुंबई) की दोनों पारियों में 9-9 रन बनाए. ग़ौरतलब है कि वह देश के पहले ऐसे कप्तान थे, जिन्होंने विदेश में भारत को जीत दिलाई. भारत ने उनकी अगुवाई में नौ टेस्ट मैच जीते. इससे पहले भारत विदेशों में हुए 33 में से कोई टेस्ट मैच नहीं जीत पाया था. क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उन्होंने 1993 से 1996 तक आईसीसी मैच अंपायर की भूमिका निभाई. वह दो टेस्ट और दस वन डे मैचों में अंपायर रहे. उन्हें 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की संचालन परिषद में शामिल किया गया था, लेकिन दो साल बाद 2010 में उन्होंने यह पद छोड़ दिया. उन्होंने आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की खेल पत्रिका स्पोर्ट्स वर्ल्ड का एक दशक से भी ज़्यादा वक़्त तक संपादन किया. 2007 से बीसीसीआई के सलाहकार एवं आईपीएल गवर्निंग काउंसिल के सदस्य पटौदी टीवी कॉमेंट्रेटर भी रहे. 2007 से इंग्लैंड-भारत के बीच पटौदी ट्रॉफी के लिए टेस्ट सीरीज खेली जाती है. पिछले दिनों आयोजित सीरीज में उनकी मौजूदगी में इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस को यह ट्रॉफी दी गई थी. इंग्लैंड ने सीरीज 4-0 से जीती थी. 1968 में पटौदी को विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का ख़िताब मिला. उन्हें 1996 में अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री से नवाज़ा गया.
उन्होंने फ़िल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से शादी की. उनके पुत्र सैफ़ अली ख़ान और एक बेटी सोहा अली ख़ान भी फिल्म जगत में नाम कमा रहे हैं. उन्होंने सियासत में भी क़िस्मत आज़माई, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. उन्होंने विधानसभा का पहला चुनाव 1971 में हरियाणा के पटौदी स्टेट से ल़डा, लेकिन उन्हें शिकस्त का सामना करना प़डा. इसके बाद उन्होंने 1991 में भोपाल से लोकसभा का चुनाव ल़डा, लेकिन इस बार भी उन्हें जीत नहीं मिल पाई. तरक्क़ी पसंद मंसूर अली ख़ान पटौदी ने 2008 में अपनी बेटी सबा अली ख़ान को अपनी जागीर की मस्जिद, मज़ार, यतीमख़ाने और वक़्फ़ की जायदाद का नायब मुतवल्ली बनाया. उनकी रियासत में पिछली ढाई सदी से महिलाओं का ही वर्चस्व रहा है. उन्होंने भी अपनी बेटी को यह ज़िम्मेदारी सौंपकर इसे जारी रखा. बीते 22 सितंबर को उनका निधन हो गया. अगले दिन हरियाणा के गुड़गांव ज़िले के गांव पटौदी में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया.
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