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 माँ जीवन का सार है, माँ है तो संसार।
माँ बिन जीवन लाल का,समझो है बेकार।1।
 
माँ की ममता धरा पर, सबसे है अनमोल।
माँ जिसने भूला दिया,सब कुछ उसका गोल।2।
 
माँ सम गुरू नहीं मिले, ढ़ूढ़े इस संसार।
गुरु का जो मान रखा,नैया उसका पार।3।
 
माँ के दूध का कर्जा, चुका न पाया कोय।
जन जो कर्ज चुका दिया,जग बैरी ना होय।4।
 
माँ पीपल की छांव है,माँ बगिया के मूल।
माँ जीवन का सार है, हरे लाल के शूल।5।
 
माँ से जग संसार है,माँ से जीवन मूल।
माँ बिना मोल कुछ नहीं,मुर्झाये सब फूल।6।
 -लाल बिहारी लाल

संप्रति 
संपादक 
साहित्य टीवी
नई दिल्ली
   फोन- 7042663073


-सरफ़राज़ ख़ान 
 
आजकल जीवन काफ़ी संघर्षों से भरा हुआ है। जो लोग संघर्ष करते हैं, वही आगे बढ़ते हैं। ऐसे में पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के बाद भी कुछ लोग समाजसेवा एवं हिन्दी सेवा तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए समय निकाल ही लेते हैं। ऐसे लोग ही अपना नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखवाने की ओर अग्रसर होते हैं। इन्हीं नामों में एक नाम है लाल बिहारी लाल का, जो बिना शोर-शराबे के अपना लक्ष्य साधने में लगे हुए हैं। वे कवि, लेखक एवं पत्रकार हैं। फ़िलहाल वे साहित्य टीवी में अवैतनिक सम्पादक के रूप में जुड़े हुए हैं।
  
लाल बिहारी लाल का जन्म बिहार के सारण ज़िले के श्रीरामपुर ग्राम में एक मध्यम वर्गीय़ शिक्षक परिवार में तृतीय संतान के रूप में 10 अक्टूबर 1974 को हुआ था। घऱ में शिक्षा का माहौल था और सामाजिक परिवेश में बचपन बीता।

वे कहते हैं- "पिता जी एक माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे और माता जी एक कुशल गृहणी थीं। तीन भाइयों में मैं सबसे छोटा हूँ। बड़े भाई भी शिक्षा विभाग बिहार सरकार में शिक्षक के पद पर थे। अब वो नहीं रहे। उनसे छोटे भाई स्टेट बैंक आँफ़ इंडिया में वरिष्ट प्रबंधक से 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं।"

अपनी शिक्षा के विषय में वे कहते हैं- "प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई औऱ बाक़ी शिक्षा दिल्ली से, तो कुछ पत्राचार से भी हुई। दिल्ली आने के बाद ज़िन्दगी से काफ़ी कुछ सीखने को मिला। जब तक आप दो पैसे कमा नहीं लेते, तब तक कोई रिश्ता-नाता आपकी मदद नहीं करेगा। काफ़ी संघर्ष और कोशिश के बाद और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, नई दिल्ली में 1995 के अंत में जाँब लग गई।"
 
अपने लिखने के शौक़ का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं- "जो औरो की बेवफ़ाई ग़मों का समंदर एवं उल्फ़त का पहाड़ लिए खडे हो जाते हैं, वही कवि या लेखक बन जाते हैं। दुखों का सामना तो हर कोई करता है। कोई हंस के सह लेता है, तो कोई रोकर, तो कोई सोच-विचार के आगे बढ़ता है। इसी का परिणाम है कि मैंने लेखनी को हाथ में पकड़ लिया और यह सिलसिला आज भी जारी है। इसी समय बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी का पाठ्यक्रम तैयार हो रहा था, जिसकी अध्यक्षता डॉ. प्रभुनाथ बाबू कर रहे थे, उनको अपनी एक कविता क्रांति भेजी औऱ वो स्वीकृत हो गई, परन्तु इसकी मुझे सूचना 2016 में डॉ. संतोष पटेल जी से मिली। औऱ यही कविता क्रांति नालंदा विश्वविद्यालय के पत्राचार के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में भी शामिल है और विश्व कविता कोष में भी शामिल है।" 
 
वे आगे कहते हैं- "स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं से लेखनी की शुरुआत हुई फिर धीरे- धीरे साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक तथा दैनिक पत्र पत्रिकाओं में देश के विभिन्न क्षेत्रों से अनवरत कविता, लघु कथा तथा समसामयिक एवं सामाजिक मुद्दों पर आलेख लगातार देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। दर्जनों साझा काव्य एवं लघु कथा संकलन में सहभागिता, 5 काव्य संकलन का संपादन 2006-2009 तक, 2009 में पर्यावरण पर आधारिक संकलन घऱती कहे पुकार के संपादित किया जिसके लिए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पुरस्कृत हुआ, कोलकता से प्रकाशित साहित्य त्रिवेणी के पर्यावरण अंक का 2011 में अतिथि संपादन भी किया तथा 2017 से 2022 तक 5 बदरपुर डायरेक्टरी का संपादन भी किया। वर्ष  2023 में महंगी रोटी एकल काब्य संकलन आया, जिसका लोकार्पण 2023 के विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में हुआ था।" 

उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे बताते हैं- "वर्ष 2003 में मारिशस के भारत में तत्कालिक उच्चायुक्त डॉ. यू.सी द्वारा कैनावेदी द्वारा हिंदी भवन, गाजियाबाद  में पर्यावरण संरक्षण के लिए राष्ट्र-गौरव सम्मान, जैमिनी अकादमी, पानीपत द्वारा दिल्ली रत्न सम्मान, राष्ट्र भाषा रत्न, साहित्य श्री, साहित्य रत्न, पत्रकार गौरव आदि सहित 100 से ज़्यादा पुरस्कार सामाजिक, हिन्दी संरक्षण, पत्रकारिता एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए मिल चुके हैं।" 

अपनी लेखनी के विषय में वे कहते हैं- "सेवा में रहते हुए बहुत कुछ किया है और आगे भी करने का प्रयास जारी रहेगा। सरकार द्वारा सिविल पुरस्कार मिले एक दिन, यही अभिलाषा है। इसके लिए अपना प्रयास जारी है। देखते हैं मंजिल तक कब पहुंचते हैं।"


कमीज़ के कपड़े में
यौवन की सिलवटें थीं
हर धागे में
एक अधूरी कहानी उगा करती थी।
दर्जी की कैंची काटती थी कपड़े को
पर सपनों को नहीं ।
बची कतरनें
जैसे मन के कोने में अटके हुए ख्याल
न छोड़े जाते - न सिले जाते।
मैंने कहा -
"इनसे रूमाल बना दो या स्कार्फ़
जो गले में लिपटे
तो यादों का बोझ हल्क़ा हो।"
कतरनें जमा होती रहीं 
जैसे भीतर
मोह की छोटी-छोटी गठरियाँ ।
हर कतरन में
एक रंग
एक गंध
एक आधा-लिखा ख़त ।
कभी नीला
जैसे सुबह का आसमान
कभी लाल
जैसे साँझ की लज्जा ।
इन कतरनों को
कभी तह नहीं किया
बस बिखेर दिया मन के आँगन में
कभी हवा में उड़तीं 
कभी ठहरकर - पुरानी बातें सुनातीं।
एक कतरन बोली - मुझे छोड़ दे,मैं बोझ हूँ।
पर मैंने उसे
दिल के तहखाने में सँभाल लिया ।
कतरनों का मोह
जैसे नदी का किनारा
जो बहता नहीं-बस ठहरता है।
हर कतरन
एक छोटा-सा मंदिर
जहाँ पूजा जाता है
वो, जो कभी पूरा नहीं हुआ।
कभी सोचता हूँ
इन कतरनों को
उड़ने दूँ हवा में - पंछी की तरह।
पर फिर डर लगता है -
क्या बचेगा
अगर मोह की ये गठरियाँ खुल गईं?
तो मैं बस इन्हें सिलता हूँ धीरे-धीरे
एक अनगढ़ कविता में
कतरनें अब भी बिखरी हैं
पर अब वे
मेरे मन की धुन में नाच उठती हैं।
-जयप्रकाश मानस  


ईश्वर की कृति का तू पोषण करे जगत में
इस हेतु पूर्ति हेतु, ईश्वर ऋणी है तेरा
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।
तू धूप में जलता है, शीत में गलाता तन है
हर ऋतु से कर युद्ध, विजित करता अन्न है
अट्टालिका विशाल में धन के अतुल भंडार भी
उजड़ते अन्न बिन, न बस सके कोई बसेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

स्कंध पर निर्भर है तेरे, देश की समृद्धि
बूंदे तेरे पसीने की, उपजाऊ करें धरती
उर्वक धरा से होता प्रकट, स्वर्ण अन्नरूपी
शोभित मां भारती के भाल, स्वेद तिलक तेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

तू है मेरी इस मातृभूमि का सपूत सच्चा
तू भूख के दानव से करता है हमारी रक्षा
कठोर श्रम तेरा करे मानव की क्षुधापूर्ति
जब जागता है तू, तभी धरती पे हो सवेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

तू पुत्र, प्रेमी, सखा और पिता है इस धरा का
हर रूप तेरा धरा का अद्भुत श्रृंगार रचता
बंजर धरा  की गोद भी तेरा प्रताप भर दे
हरियाली के सुंदर स्वरूप का है तू चितेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

साधक है तू और साधना तेरी कठिन है
तेरे ही तप से उर्जित हमारे रातदिन हैं
उपज तेरे श्रम की सबके प्राण करती पोषित
है आत्मनिर्भर तेरे कर्म से ये देश मेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

हे व्योम पर विराज परमशक्ति परमेश्वर
कृषक के कष्टों का तू, पूर्ण अब शमन कर
स्व अंत न करे कृषक कोई प्राण अपने
उर के इसी उद्गार से पूजन करें हम तेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।
-किश्वर अंजुम
 भिलाई (छत्तीसगढ़) 


महुए के फूल नहीं ये
जंगल की ज़ेब में टकराते सिक्के हैं।
टप-टप गिरते हैं
जैसे कोई पुरखा अंँधेरे में साँस गिन रहा हो।
सुबह होती है,
और जंगल पूछता है —
आज क्या?
पेट भरेगा या फिर सिर्फ़ हवा में महक बचेगी?
इन फूलों की गंध में
नदी की उदासी है
जो पत्थरों से हार नहीं मानती।
इनमें बच्चों की हँसी है
जो भूख के पास बैठकर भी
आसमान की बात करती है।
ये सिक्के नहीं
पर इनसे ख़रीदते हैं - एक दिन की ज़िंदगी।
कभी ये थाली में चढ़ते हैं - कभी देवता के माथे पर।
कभी बस यों ही हाथों में रह जाते हैं
जैसे कोई जवाब
जो सवाल से बड़ा हो।
जंगल की राहें
इन फूलों से पूछती हैं : कहाँ जाना है?
और फूल कहते हैं—
वहीं, जहाँ हवा गाती है
जहाँ मांदल की थाप पर
पैर ख़ुद-ब-ख़ुद थिरकते हैं।
ये फूल एक वादा हैं
कि जो गिरता है वह फिर उठता है।
जैसे जंगल
जो हर रात के बाद सुबह को जन्म देता है।
महुए के फूल जंगल की कविता हैं
जो हवा में तैरती है
और चुपके से
ज़मीन की छाती पर बिखर जाती है।
-जयप्रकाश मानस 


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.
गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.
और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.

चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com

इंद्रेश कुमार
लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) रोज़ा, (4) ज़कात और (5) हज. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
-इंद्रेश कुमार

(लेखक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है.  ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
फ़ारूख़ शेख़ फ़िल्मी दुनिया के आसमान का एक ऐसा रौशन सितारे थे, जिसकी चमक से समानांतर सिनेमा दमकता था. उनके चेहरे पर मासूमियत थी. उनके अंदाज़ में शोख़ी थी और उनका मिज़ाज शायराना था.

फ़ारूख़ शेख़ का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के सूरत ज़िले के गांव अमरोली में हुआ था. उनके पिता मुस्तफ़ा शेख़ मुम्बई के जाने माने वकील थे. उनके पिता ज़मींदार परिवार से ताल्लुक़ रखते थे. उनकी परवरिश बड़ी शानो-शौकत से हुई थी. उनके कहने से पहले ही ज़रूरत की हर चीज़ उन्हें मुहैया हो जाती थी. इसके बावजूद उनमें ज़रा सा भी ग़ुरूर नहीं था. 
उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम मुम्बई के सेंट मैरी स्कूल से हासिल की. उसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाई की. फिर उन्होंने मुम्बई के ही सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ लॉ से वकालत की पढ़ाई मुकम्मल की.

उनके पिता चाहते थे कि वह भी उनकी तरह वकील बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी अभिनय में थी. वे कालेज के दिनों से ही रंगमंच से जुड़ गए थे. वे इतना शानदार अभिनय करते थे कि उनके चर्चे दूर-दूर तलक होने लगे. इसका नतीजा ये हुआ कि उन्हें साल 1973 में आई फ़िल्म 'गर्म हवा' में काम करने का मौक़ा मिल गया. इस फ़िल्म में उनके अभिनय को ख़ूब सराहा गया. और इस तरह उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत हुई और हिन्दी सिनेमा को शानदार अभिनेता मिल गया.

फ़ारूख़ शेख़ एक बेहतरीन कलाकार थे. उनके लिए अभिनय महज़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं था. वे एक वक़्त में दो से ज़्यादा फ़िल्मों में काम नहीं करते थे. साल 1978 में आई फ़िल्म 'नूरी' ने उन्हें कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचा दिया. ये फ़िल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके पास तक़रीबन 40 फ़िल्मों के प्रस्ताव आए. ख़ास बात ये थी कि सबकी सब फ़िल्मों की कहानी 'नूरी' फ़िल्म की कहानी के आसपास ही घूमती थी. उन्होंने सब प्रस्ताव ठुकरा दिए, क्योंकि वे सिर्फ़ पैसों के लिए एक जैसी फ़िल्मों में काम नहीं करना चाहते थे. वे नये और दमदार किरदार निभाना चाहते थे.

फ़ारूख़ शेख़ कलात्मक फ़िल्मों के अभिनेता थे. उनकी फ़िल्मों में जनमानस का दुख-दर्द, उनकी ख़ुशियां और उनके इंद्रधनुषी ख़्वाबों की झलक मिलती है. हालांकि उन्हें दरख़्तों के इर्दगिर्द घूमने वाले किरदार पसंद नहीं थे, लेकिन दर्शकों ने उन्हें अपनी महबूबा से शिद्दत से मुहब्बत करने वाले महबूब के किरदार में भी ख़ूब पसंद किया. नूरी फ़िल्म का नग़मा देखें-
आजा रे ओ दिलबर जानिया
आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा
दिल की प्यास बुझा जा रे...

नूरी फ़िल्म का ये नग़मा भी बहुत ही दिलकश है-
चोरी चोरी कोई आये
चुपके-चुपके, सबसे छुपके 
ख़्वाब कई दे जाये
आंखें डाले आंखों में, जाने मुझसे क्या वो पूछे
मैं जो बोलूं क्या, हंस दूं मुझको कुछ ना सूझे
ऐसे तांके, दिल में झांके, सांस मेरी रुक जाए


उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'बाज़ार' की ग़ज़ल आज भी लोगों को बहुत पसंद आती है-
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की 
फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की...

फ़िल्म 'उमराव जान' ने तो इतिहास रच दिया था. इसकी ग़ज़ल आज भी लोगों को गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है-
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चांद से बेहतर नज़र आती है हमें  

सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें 
दिन ढले यूं तिरी आवाज़ बुलाती है हमें 

याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से 
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें 

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूं है 
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें...

फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी' का नग़मा देखें, जिसमें वह अभिनेत्री रेखा के साथ बहुत ही शोख़ अंदाज़ में नज़र आ रहे हैं-
फूल गुलाब का, लाखों में हज़ारों में 
एक चेहरा जनाब का...

उनके अंदाज़ में शोख़ी के साथ-साथ एक ऐसी संजीदगी भी थी, जो मुहब्बत में सिर्फ़ वादे करना ही नहीं जानती, बल्कि उसे शिद्दत से निभाने का जज़्बा भी रखती थी. उसके लिए महबूब ही सबकुछ है. कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में महबूब का अक्स नज़र आता है. फ़िल्म साथ-साथ का नग़मा ऐसा ही है-
तुमको देखा तो ये ख़्याल आया
ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया
आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया...

ये मुहब्बत ही तो है, जो नायिका अपने अमीर बाप का घर छोड़कर नायक के साथ एक छोटे से घर में रहने के लिए आ जाती है. फिर वे दोनों मिलकर अपना घर सजाते हैं-
ये तेरा घर, ये मेरा घर
किसी को देखना हो अगर
पहले आके मांग ले, तेरी नज़र मेरी नज़र...
न बादलों की छांव में, न चांदनी के गांव में
न फूल जैसे रास्ते बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईंट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर...

उनकी फ़िल्म 'चश्मे बद्दूर' का ये गीत रूह की गहराई में उतर जाता है- 
कहां से आए बदरा हो
कहां से आए बदरा हो
घुलता जाए कजरा... 

उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'गमन' की ग़ज़ल भी यादगार है-
आपकी याद आती रही रातभर
चश्मे- ग़म मुस्कुराती रही रातभर...

इसी फ़िल्म की ये ग़ज़ल भी ख़ूब पसंद की गई-
सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर का हर शख़्स परेशान सा क्यूं है...

सटारडम से कोसों दूर रहने वाले फ़ारूख़ शेख़ एक आम आदमी के अभिनेता थे. दर्शकों को लगता था कि उन्हीं के बीच से निकला कोई शख़्स पर्दे पर उन्हीं का कोई किरदार निभा रहा है. उनमें सादगी, विनम्रता और संजीदगी थी. ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे. उनके मासूम चेहरे से उनके बावक़ार वजूद का अक्स झलकता था.

उन्होंने रंगमंच और फ़िल्मों के अलावा टेलीविज़न के लिए भी काम किया. यहां भी उन्हें ख़ूब कामयाबी मिली. वे समाज सेवा से भी जुड़े रहे.

28 दिसम्बर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया.
आज भले ही वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अपने अभिनय के ज़रिये वे आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में ज़िन्दा हैं.

***
जन्म : 25 मार्च 1948 
स्थान : गांव अमरोली, ज़िला सूरत (गुजरात)
निधन : 28 दिसम्बर 2013 
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र) 

राजेश कुमार गुप्ता 


हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...

ईद के चांद की खोज में हर बरस
दिखती दुनिया बराबर ये बेज़ार है

बांटने को मगर सब पै अपनी ख़ुशी
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है

ईद दौलत नहीं, कोई दिखावा नहीं
ईद जज़्बा है दिल का, ख़ुशी की घड़ी

रस्म कोरी नहीं, जो कि केवल निभे
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !!1!!

अपने को औरों को और क़ुदरत को भी
समझने को ख़ुदा के ये फ़रमान है

है मुबारक घड़ी, करने अहसास ये
रिश्ता है हरेक का, हरेक इंसान से

है गुंथी साथ सबकी यहां ज़िंदगी
सबका मिल जुल के रहना है लाज़िम यहां

सबके ही मेल से दुनिया रंगीन है
प्यार से ख़ूबसूरत ये संसार है !!2!!

मोहब्बत, आदमीयत, मेल मिल्लत ही
तो सिखाते हैं सभी मज़हब संसार में

हो अमीरी, ग़रीबी या कि मुफ़लिसी
कोई झुलसे न नफ़रत के अंगार में

सिर्फ़ घर-गांव -शहरों ही तक में नहीं
देश दुनियां में ख़ुशियों की ख़ुशबू बसे

है ख़दा से दुआ उसे सदबुद्धि दे
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!3!!

ईद सबको ख़ुशी से गले से लगा
सिखाती बांटना आपसी प्यार है

है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी
जिसको दिल से मनाने की दरकार है

दी ख़ुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर
आदमी भूल नफ़रत रहा बांटता

राह ईमान की चलने का वायदा
ख़ुद से करने का ईद एक तेवहार है !!4!!

जो भी कुछ है यहां सब ख़ुदा का दिया
वह है सबका किसी एक का है नहीं

बस ज़रूरत है ले सब ख़ुशी से जियें
सभी हिल मिल जहां पर भी हों जो कहीं

ख़ुदा सबका है सब पर मेहरबान है
जो भी ख़ुदग़र्ज़ है वह ही बेईमान है

भाईचारा बढ़े और मोहब्बत पले
ईद का यही पैग़ाम,  इसरार है !!5!!

-प्रो.सीबी. श्रीवास्तव
ओ बी 11, विद्युत मंडल कॊलोनी, रामपुर
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

मेरठ। व्यंग्यकार और वरिष्ठ पत्रकार सूर्यकांत द्विवेदी के दो व्यंग्य संग्रह बाल की खाल और कलेजे का पोस्टमार्टम का विमोचन रविवार को प्रसिद्ध कवि डॉ. हरिओम पंवार और डॉ. पापुलर मेरठी ने किया।
इस्माइल नेशनल महिला डिग्री कॉलेज के सुरेंद्र प्रताप सभागार में आयोजित समारोह में साहित्य जगत के विशिष्टजन शामिल हुए। 
मुजफ्फरनगर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा पुष्प लता, व्यंग्यकार डॉक्टर सुधाकर आशावादी विनय नोक और ऋचा जोशी ने दोनों पुस्तकों की समीक्षा पढ़ी। सभी ने व्यंग्य की धार को महत्वपूर्ण बताया। 
वरिष्ठ पत्रकार ओमकार चौधरी, पुष्पेंद्र शर्मा, ओपी सक्सेना, रविंद्र श्रीवास्तव, सुमनेश सुमन, सत्यपाल सत्यम, नितीश राजपूत, ओंकार गुलशन, सुबोध शर्मा, इस्माइल डिग्री कॉलेज प्रबंध समिति के सचिव अरुण कुमार गुप्ता, डॉ.नरेश त्यागी, अर्चना शर्मा, डॉ. अनुभूति, आकांक्षा पारे आदि ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन मेरठ के गजलकार डॉक्टर रामगोपाल भारतीय ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन और पुष्पांजलि के द्वारा हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा दोनों पुस्तकों का वैदिक विमोचन किया गया। तत्पश्चात सभी अतिथियों का स्वागत शाल और  माला पहनाकर किया गया।  सरस्वती वंदना का वाचन गीतकार मनोज कुमार मनोज ने किया। इसके बाद सूर्यकांत द्विवेदी ने अपनी कुछ व्यंग्य रचनाएं प्रस्तुत की। 
कार्यक्रम में अनिल बंसल यशपाल कोत्सायन, अजय प्रेमी, अलका गुप्ता, रेखा गिरीश, कुमार पंकज, प्रोफेसर वेद प्रकाश बटुक, शाहिद ए चौधरी, शीलवर्धन, कविता मधुर, मुक्ता शर्मा, डॉ. अलका वशिष्ठ, दिनेश शांडिल्य, दिनेश तलवार, दिशा दिनेश, सर्वेश सर्राफ, अरुण चड्डा, एनके शर्मा एडवोकेट, गोपाल सारस्वत आदि उपस्थित थे।


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... मौसम पर एक नज़्म पेश है...
दहकते पलाश का मौसम...
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में 
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से 
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और 
गुलाबी शामें 
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


फूल पलाश के
वक़्त के समन्दर में
यादों का जज़ीरा हैं
जिसके हर ज़र्रे में
ख़्वाबों की धनक फूटती है
फ़िज़ाओं में
चाहत के गुलाब महकते हैं
जिसकी हवायें 
रूमानी नगमें गुनगुनाती हैं
जिसके जाड़ों पर
क़ुर्बतों का कोहरा छाया होता है
जिसकी गर्मियों में
तमन्नायें अंगडाइयां लेती हैं
जिसकी बरसात
रफ़ाक़तों से भीगी होती है
फूल पलाश के
इक उम्र का
हसीन सरमाया ही तो हैं...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान

मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इंद्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
-फ़िरदौस ख़ान


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हर भाषा की अपनी अहमियत होती है। फिर भी मातृभाषा हमें सबसे प्यारी होती है, क्योंकि उसी ज़ुबान में हम बोलना सीखते हैं। बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है। इसलिए भी मां बोली हमें सबसे अज़ीज़ होती है। लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िन्दगी बसर करते हैं, यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को 'तुच्छ' समझते हैं। बार-बार अपनी मातृभाषा का अपमान करते हुए अंग्रेजी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हैं। हिन्दी के साथ ऐसा सबसे ज़्यादा हो रहा है। वे लोग जिनके पुरखे अंग्रेजी का 'ए' नहीं जानते थे, वे भी हिन्दी को गरियाते हुए मिल जाएंगे। हक़ीक़त में ऐसे लोगों को न तो ठीक से हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी। दरअसल, वह तो हिन्दी को गरिया कर अपनी 'कुंठा' का 'सार्वजनिक प्रदर्शन' करते रहते हैं।

अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है। इंसान को अंग्रेजी ही नहीं, दूसरी देसी-विदेशी भाषाएं भी सीखनी चाहिए। इल्म हासिल करना तो अच्छी बात है, लेकिन अपनी मातृभाषा की क़ुर्बानी देकर किसी दूसरी भाषा को अपनाए जाने को किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। यह अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। हालत यह है कि अब तो गांव-देहात में भी अंग्रेज़ी का चलन बढ़ने लगा है। पढ़े-लिखे लोग अपनी मातृभाषा में बात करना पसंद नहीं करते, उन्हें लगता है कि अगर वे ऐसा करेंगे तो गंवार कहलाएंगे। क्या अपनी संस्कृति की उपेक्षा करने को सभ्यता की निशानी माना जा सकता है, क़तई नहीं। हमें ये बात अच्छे से समझनी होगी कि जब तक हिन्दी भाषी लोग ख़ुद हिन्दी को सम्मान नहीं देंगे, तब तक हिन्दी को वो सम्मान नहीं मिल सकता, जो उसे मिलना चाहिए।

देश को आज़ाद हुए साढ़े सात दशक बीत चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।

ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। स्टैटिस्टा के मुताबिक़ दुनियाभर में हिन्दी भाषा तेज़ी से बढ़ रही है। साल 1900 से 2021 के दौरान इसकी रफ़्तार 175.52 फ़ीसदी रही, जो अंग्रेज़ी की रफ़्तार 380.71 फ़ीसदी के बाद सबसे ज़्यादा है। अंग्रेज़ी और मंदारिन भाषा के बाद हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। साल 1961 में ही हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई। उस वक़्त दुनियाभर में 42.7 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे। साल 2021 में यह तादाद बढ़कर 117 करोड़ हो गई। इनमें से 53 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। हालत यह है कि हिन्दी अब शीर्ष 10 कारोबारी भाषाओं में शामिल है। इतना ही नहीं दुनियाभर के 10 सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बारों में शीर्ष-6 हिन्दी के अख़बार हैं। भारत के अलावा 260 से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। विदेशों में 28 हज़ार से ज़्यादा शिक्षण संस्थान हिन्दी भाषा सिखा रहे हैं। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है। गूगल पर  हिन्दी के 10 लाख करोड़ से ज़्यादा पन्ने मौजूद हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।


भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। 

रूस में अपनी मातृभाषा भूलना बहुत बड़ा शाप माना जाता है। एक महिला दूसरी महिला को कोसते हुए कहती है- अल्लाह, तुम्हारे बच्चों को उनकी मां की भाषा से वंचित कर दे। अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उनसे महरूम कर दे, जो उन्हें उनकी ज़ुबान सिखा सकता हों। नहीं, अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उससे महरूम करे, जिसे वे अपनी ज़ुबान सिखा सकते हों। मगर पहा़डों में तो किसी तरह के शाप के बिना भी उस आदमी की कोई इज्ज़त नहीं रहती, जो अपनी ज़ुबान की इज्ज़त नहीं करता। पहाड़ी मां विकृत भाषा में लिखी अपने बेटे की कविताएं नहीं पढ़ेगी। रूस के प्रसिद्ध लेखक रसूल हमज़ातोव ने अपनी किताब मेरा दाग़िस्तान में ऐसे कई क़िस्सों का ज़िक्र किया है, जो मातृभाषा से जुड़े हैं। कैस्पियन सागर के पास काकेशियाई पर्वतों की ऊंचाइयों पर बसे दाग़िस्तान के एक छोटे से गांव त्सादा में जन्मे रसूल हमज़ातोव को अपने गांव, अपने प्रदेश, अपने देश और उसकी संस्कृति से बेहद लगाव रहा है। मातृभाषा की अहमियत का ज़िक्र करते हुए ‘मेरा दाग़िस्तान’ में वह लिखते हैं, मेरे लिए विभिन्न जातियों की भाषाएं आकाश के सितारों के समान हैं। मैं नहीं चाहता कि सभी सितारे आधे आकाश को घेर लेने वाले अतिकाय सितारे में मिल जाएं। इसके लिए सूरज है, मगर सितारों को भी तो चमकते रहना चाहिए। हर व्यक्ति को अपना सितारा होना चाहिए। मैं अपने सितारे अपनी अवार मातृभाषा को प्यार करता हूं। मैं उन भूतत्वेत्ताओं पर विश्वास करता हूं, जो यह कहते हैं कि छोटे-से पहाड़ में भी बहुत-सा सोना हो सकता है।

एक बेहद दिलचस्प वाक़िये के बारे में वह लिखते हैं, किसी बड़े शहर मास्को या लेनिनग्राद में एक लाक घूम रहा था। अचानक उसे दाग़िस्तानी पोशाक पहने एक आदमी दिखाई दिया। उसे तो जैसे अपने वतन की हवा का झोंका-सा महसूस हुआ, बातचीत करने को मन ललक उठा। बस भागकर हमवतन के पास गया और लाक भाषा में उससे बात करने लगा। इस हमवतन ने उसकी बात नहीं समझी और सिर हिलाया। लाक ने कुमीक, फिर तात और लेज़गीन भाषा में बात करने की कोशिश की। लाक ने चाहे किसी भी ज़बान में बात करने की कोशिश क्यों न की, दाग़िस्तानी पोशाक में उसका हमवतन बातचीत को आगे न बढ़ा सका। चुनांचे रूसी भाषा का सहारा लेना पड़ा। तब पता चला कि लाक की अवार से मुलाक़ात हो गई थी। अवार अचानक ही सामने आ जाने वाले इस लाक को भला-बुरा कहने और शर्मिंदा करने लगा। तुम भी कैसे दाग़िस्तानी, कैसे हमवतन हो, अगर अवार भाषा ही नहीं जानते, तुम दाग़िस्तानी नहीं, मूर्ख ऊंट हो। इस मामले में मैं अपने अवार भाई के पक्ष में नहीं हूं। बेचारे लाक को भला-बुरा कहने का उसे कोई हक़ नहीं था। अवार भाषा की जानकारी हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है। अहम बात यह है कि उसे अपनी मातृभाषा, लाक भाषा आनी चाहिए। वह तो दूसरी कई भाषाएं जानता था, जबकि अवार को वे भाषाएं नहीं आती थीं।

अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग़्रेज़ ही उनके सामने आ गया। इसमें हैरानी की तो कोई बात नहीं। मास्को की सड़कों पर तो विदेशियों की कोई कमी नहीं है।

अंग्रेज़ अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेज़ी, फिर फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में भी पूछताछ करने लगा। अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेज़गीन, दार्ग़िन और कुमीक भाषाओं में अपनी बात को समझाने की कोशिश की। आख़िर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत दाग़िस्तानी ने जो अंग्रेज़ी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए यह कहा-देखो संस्कृति का क्या महत्व है। अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज़ से बात कर पाते। समझे न? समझ रहा हूं। अबूतालिब ने जवाब दिया। मगर अंग्रेज़ को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी ज़ुबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की?

रसूल हमज़ातोव लिखते हैं, एक बार पेरिस में एक दाग़िस्तानी चित्रकार से मेरी भेंट हुई। क्रांति के कुछ ही समय बाद वह पढ़ने के लिए इटली गया था, वहीं एक इतावली लड़की से उसने शादी कर ली और अपने घर नहीं लौटा। पहाड़ों के नियमों के अभ्यस्त इस दाग़िस्तानी के लिए अपने को नई मातृभूमि के अनुरूप ढालना मुश्किल था। वह देश-देश में घूमता रहा, उसने दूर-दराज़ के अजनबी मुल्कों की राजधानियां देखीं, मगर जहां भी गया, सभी जगह घर की याद उसे सताती रही। मैंने यह देखना चाहा कि रंगों के रूप में यह याद कैसे व्यक्त हुई है। इसलिए मैंने चित्रकार से अपने चित्र दिखाने का अनुरोध किया। एक चित्र का नाम ही था मातृभूमि की याद। चित्र में इतावली औरत (उसकी पत्नी) पुरानी अवार पोशाक में दिखाई गई थी। वह होत्सातल के मशहूर कारीगरों की नक़्क़ाशी वाली चांदी की गागर लिए एक पहाड़ी चश्मे के पास खड़ी थी। पहाड़ी ढाल पर पत्थरों के घरों वाला उदास-सा अवार गांव दिखाया गया था और गांव के ऊपर पहाड़ी चोटियां कुहासे में लिपटी हुई थीं। पहाड़ों के आंसू ही कुहासा है-चित्रकार ने कहा, वह जब ढालों को ढंक देता है, तो चट्टानों की झुर्रियों पर उजली बूंदें बहने लगती हैं। मैं कुहासा ही हूं। दूसरे चित्र में मैंने कंटीली जंगली झाड़ी में बैठा हुआ एक पक्षी देखा। झाड़ी नंगे पत्थरों के बीच उगी हुई थी। पक्षियों को गाता हुआ दिखाया गया था और पहाड़ी घर की खिड़की से एक उदास पहाडिन उसकी तरफ़ देख रही थी। चित्र में मेरी दिलचस्पी देखकर चित्रकार ने स्पष्ट किया-यह चित्र पुरानी अवार की किंवदंती के आधार पर बनाया गया है।
किस किंवदंती के आधार पर?
एक पक्षी को पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया गया। बंदी पक्षी दिन-रात एक ही रट लगाए रहता था-मातृभूमि, मेरी मातृभूमि, मातृभूमि… बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि इन तमाम सालों के दौरान मैं भी यह रटता रहा हूं। पक्षी के मालिक ने सोचा, जाने कैसी है उसकी मातृभूमि, कहां है? अवश्य ही वह कोई फलता-फूलता हुआ बहुत ही सुन्दर देश होगा, जिसमें स्वार्गिक वृक्ष और स्वार्गिक पक्षी होंगे। तो मैं इस परिन्दे को आज़ाद कर देता हूं, और फिर देखूंगा कि वह किधर उड़कर जाता है। इस तरह वह मुझे उस अद्भुत देश का रास्ता दिखा देगा। उसने पिंजरा खोल दिया और पक्षी बाहर उड़ गया। दस एक क़दम की दूरी पर वह नंगे पत्थरों के बीच उगी जंगली झाड़ी में जा बैठा। इस झाड़ी की शाख़ाओं पर उसका घोंसला था। अपनी मातृभूमि को मैं भी अपने पिंजरे की खिड़की से ही देखता हूं। चित्रकार ने अपनी बात ख़त्म की।

तो आप लौटना क्यों नहीं चाहते?
देर हो चुकी है। कभी मैं अपनी मातृभूमि से जवान और जोशीला दिल लेकर आया था। अब मैं उसे सिर्फ़ बूढ़ी हड्डियां कैसे लौटा सकता हूं?
रसूल हमज़ातोव ने अपनी कविताओं में भी अपनी मातृभाषा का गुणगान किया है। अपनी एक कविता में वह कहते हैं-
मैंने तो अपनी भाषा को सदा हृदय से प्यार किया है
हमें भी अपनी मातृ भाषा के प्रति अपने दिल में यही जज़्बा पैदा करना होगा।
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)





-लाल बिहारी लाल
भाषाई औऱ सांस्कृतिक विविधता औऱ बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को के पहल पर नवंबर 1999 में सभी लोगों, समुदायों, क्षेत्र व देशों की मातृभाषा को संरक्षण प्रदान करने के लिए 21 फरवरी का दिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा के लिए समर्पित किया।

भाषाई औऱ सांस्कृतिक विविधता औऱ बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को के पहल पर  यूनेस्को ने 17 नवंबर 1999 को  अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस  मनाए जाने की घोषणा की थी  क्योंकि  21 फरवरी 1952 को ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का कड़ा विरोध जताते हुए अपनी मातृभाषा (बंगाली भाषा) के अस्तित्व बनाए रखने के लिए  आंदोलन शुरु किया। पाकिस्तान की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी लेकिन लगातार विरोध जारी रहा आखिर सरकार को बांग्ला भाषा को आधिकारिक  दर्जा देना पड़ा।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में बोली जाने वाली कुल भाषाएं लगभग 6900 से  उपर  है। इनमें से 90 फीसद भाषाएं बोलने वालों की संख्या एक लाख से कम है यानी विलुप्ती के  कगार पर  है । दुनिया की कुल आबादी में करीबन 60  फीसद लोग 30 प्रमुख भाषाएं बोलते हैं, जिनमें से दस सर्वाधिक बोले जानी वाली भाषाओं में-जापानी, अंग्रेजी,  रुसी, बांग्ला, पुर्तगाली, अरबी, पंजाबी, मंदारिन, हिंदी और स्पैनिश है।

भारत में 29  भाषाएँ ऐसी है  उनको  बोलने वालों  की  संख्या दस  लाख से अधिक है। भारत  में 7  ऐसी   भाषाएँ  है जिनको  बोलने वालों  की संख्या एक लाख  से अधिक है।  भारत में 122 भाषाएँ ऐसी है  उनको  बोलने वालों  की  संख्या दस हजार से अधिक है।  भारत में भी मातृभाषा की  विविधता पर्याप्त है। यहां  संविधान   में शामिल 22 भाषाओं में   भी कई स्थानीय भाषायें सम्मलित है।  

इस दिन यूनेस्को(UNESCO) और यू.एन.(UN) एजेंसियां दुनिया भर में भाषा और संस्कृति (कल्चर) से जुड़े अलग-अलग तरह के कार्यक्रम आयोजित कराते हैं । ताकि दुनिया भर में लुप्त हो रही भाषा को बचाया जा सके जिसका  मकसद दुनियाभर में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाना है।  हर साल इस खास दिन का एक खास थीम होता है। इस  अवसर पर  हर साल वर्ष 2000  से  ही एक थीम को रखा जाता है । अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का रजत जयंती समारोह वर्ष 2025 था ।” गत वर्ष का थीम भाषाई विविधता को बढ़ावा देने, लुप्तप्राय भाषाओं की रक्षा करने और बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को प्रदर्शित करने पर जोर दे रहा है। वर्श 2022-32 तक स्वदेशी भाषाओं का अन्तर्राष्ठ्रीय दशक मनाया जा रहा है।    इस वर्ष का थीम है-  बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की राय। आशा है सारी दुनिया एक दिन मातृभाषा की ओऱ एख दिन अवश्य अग्रसर होगी।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं)


आया बसंत फल फूलने लगे
सिमटे हुए तन, ठहरे हुए मन
मंद -मंद झोंकों में झूमने लगे

कुहू-कुहू पीहू पीहू होने लगी
चेतना हरेक मन की खोने लगी
गाने लगे, गुनगुनाने लगे
सब अपनी मस्ती में झूमने लगे
आया बसंत फल-फूलने लगे

बागों में कलियां,चटकने लगी
वृक्षों की शाखें, मटकने लगी
हंसे फूल और येभंवरे तितलियां
फूलों के अधरों को चूमने लगे
आया बसंत फल फूलने लगे

सतरंगी फूलों की माला लिए
हाथों में मकरंदी प्याला लिए
आते हैं हर साल वैसे यह दिन
अबकी बार और भी ये घने लगे
आया बसंत फल फूलने लगे
-सत्यपाल सत्यम


विनय अंजू कुमार 
रहस्य रोमांच की कहानियाँ या उपन्यास मैंने बहुत कम पढ़ा है, लेकिन किश्वर अंजुम जी का कहानी संग्रह “परछाइयाँ अंधेरों की” दो दिन पहले मँगवाया था और आज पढ़कर समाप्त किया. मैंने पहले भी किश्वर जी को पढ़ा है और इनकी भाषा मुझे बहुत प्रभावित करती है, ख़ासकर इनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उर्दू ज़बान के शब्द. वैसे मुझे जाती तौर पर पारलौकिक ताक़तों या मृत्योपरांत जीवन में कोई यक़ीन नहीं होता है लेकिन कहानियाँ तो कल्पना की उड़ान ही होती हैं और इन कहानियों को भी इसी नज़रिए से मैंने पढ़ा. 

संग्रह में कुल 15 कहानियाँ हैं और सब रहस्य, रोमांच से भरपूर हैं. हम लोगों ने भी अपने बचपन से लेकर आज तक तमाम ऐसे क़िस्से सुने हैं जिनपे यक़ीन नहीं होता है लेकिन चूँकि उनका कोई तात्कालिक उत्तर नहीं होता तो ऐसे क़िस्से चकित कर देते हैं. बहरहाल अगर कहानियों की बात करें तो पहली कहानी “संयोग” सच्चाई के क़रीब है क्योंकि ऐसा संयोग बहुतेरे लोगों के साथ घटता है. दूसरी कहानी “पच्चीस कलदार” हमको पुराने समय में ले जाती है और बहुत कमाल की कल्पना है इसमें. “चिड़िया” बहुत भावपूर्ण कहानी है और माँ की बच्चों के लिए ममता का सजीव चित्रण करती है. “मैकी मास्टर” ने भी बहुत प्रभावित किया और अंत ने चकित कर दिया. “पोस्टमार्टम” पढ़कर मन अजीब सा हो गया और “केर घाटी” बहुत दिलचस्प लगी और कुछ क़िस्से हमें भी याद आ गए. 

“कोयला” और “दामिश एक इफरीत” अलग स्तर की कहानियाँ हैं जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था. “बू”, “लौ”, “आग” सभी कहानियों में रहस्य भी है और रोमांच भी. कुल मिलाकर बहुत बेहतरीन किस्सागोई है इन कहानियों में और भाषा शैली के चलते पढ़ने का आनंद दोगुना हो जाता है. 

आ किश्वर जी को बहुत बहुत बधाई इस कहानी संग्रह के लिए और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ. ख़ैर किस्सा मुख्तसर यह है कि अगर आपकी दिलचस्पी रूहानी ताक़तों, रहस्य रोमांच में है तो यकीनन यह किताब आपको मुसलसल तौर पर बहुत पसंद आएगी.
संग्रह शुभदा बुक्स ने प्रकाशित किया है


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
अहमद फ़राज़ आधुनिक दौर के उम्दा शायरों में गिने जाते हैं. उनका जन्म 14 जनवरी, 1931 को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कोहाट में हुआ था. उनका असली नाम सैयद अहमद शाह था. उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू और फ़ारसी में एमए किया. इसके बाद यहीं प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई थी. उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था. वह इक़बाल से बहुत प्रभावित थे, लेकिन बाद में उनका रुझान प्रगतिवादी कविता की तरफ़ हो गया. उनकी कई ग़ज़लों को ज़ियाउल हक़ सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत के तौर पर लिया गया और उन्हें जेल जाना पड़ा. जेल से आने के बाद वह पाकिस्तान छोड़कर चले गए. इस दौरान वह कई सालों तक संयुक्त राजशाही यानी ग्रेट ब्रिटेन, उत्तरी आयरलैंड के यूनाइटेड किंगडम और कनाडा में रहे. उन्होंने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की. 1986 में वह पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स के डायरेक्टर जनरल और फिर चेयरमैन बने. 2004 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ अवॉर्ड से नवाज़ा, लेकिन 2006 में उन्होंने सरकार की नीतियों के प्रति ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए यह पुरस्कार वापस कर दिया.

अहमद फ़राज़ को मुहब्बत का शायर कहना ग़लत न होगा. उनके कलाम में मुहब्बत अपने शो़ख रंग में नज़र आती है-
करूं न याद, मगर किस तरह भुलाऊं उसे
ग़ज़ल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे
वो ख़ार-ख़ार है शा़ख़-ए-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूं फिर भी गले लगाऊं उसे...
लोग तज़किरे करते हैं अपने लोगों के
मैं कैसे बात करूं और कहां से लाऊं उसे

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने मांगे
दिल वो बेरहम कि रोने के बहाने मांगे

अपना ये हाल के जी हार चुके, लुट भी चुके
और मुहब्बत वही अंदाज़ पुराने मांगे

जिस सिम्त भी देखूं नज़र आता है कि तुम हो
ऐ जाने-ए-जहां ये कोई तुम सा है कि तुम हो
ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है
ये धुंध है बादल है कि साया है कि तुम हो...

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-राहे दुनिया की निभाने के लिए आ...

बदन में आग सी चेहरा गुलाब जैसा है
कि ज़हर-ए-ग़म का नशा भी शराब जैसा है
कहां वो क़ुर्ब के अब तो ये हाल है जैसे
तेरे फिराक़ का आलम भी ख़्वाब जैसा है
मगर कभी कोई देखे कोई पढ़े तो सही
दिल आईना है तो चेहरा किताब जैसा है...

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसां हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें...

उन्होंने ग़ज़लों के साथ नज़्में भी लिखीं. उनकी नज़्मों को भी वही लोकप्रियता मिली, जो उनकी ग़ज़लों को हासिल है. उनकी नज़्म ख़्वाब मरते नहीं बेहद पसंद की जाती है-
ख़्वाब कभी मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं, न आंखें, न सांसें कि जो
रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएंगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जाएंगे...

उनकी ग़ज़लों और नज़्मों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें ख़ानाबदोश, ज़िन्दगी! ऐ ज़िन्दगी और दर्द आशोब (ग़ज़ल संग्रह) और ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह) शामिल हैं. 25 अगस्त, 2008 को किडनी फेल होने के कारण उनका निधन हो गया. वह काफ़ी वक़्त से बीमार थे और इस्लामाबाद के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. इस्लामाबाद के ही क़ब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया.


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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