पूरे चाँद की रात
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*डॉ फ़िरदौस ख़ान*आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती
हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल...
राहुल मिश्रा
उस आदमी की नौकरी यह थी कि वो अंधेरे में बैठा रहे, और सामने रोशनी फेंकता रहे।
हर शाम शहर के सबसे बड़े सिनेमाघर में हजारों लोग उसी रोशनी में चेहरे देखते थे। हंसते थे। रोते थे।
उन चेहरों में एक भी उसका अपना नहीं था।
शो खत्म होने के बाद वो घर लौटता, और तब तक उसके बच्चे सो चुके होते थे।
और फिर एक दिन उसी परदे पर एक चेहरा उभरा, जिसे उसने पालने में देखा था।
वो चेहरा आज सौ साल का हो रहा है।
अब शुरू से शुरू करते हैं
अहिरीटोला। उत्तरी कलकत्ता। 1926 का सितंबर।
एक बच्चा अपने ननिहाल में पैदा हुआ। नाना ने उसका नाम रखा, उत्तम।
उत्तम, यानी सबसे अच्छा।
मां को वो नाम पसंद नहीं आया।
नाम बदलकर अरुण कर दिया गया।
पर उस घर में उस नाम को लेकर एक और बात दर्ज है।
ननिहाल के कुलगुरु उस बच्चे को देखने आए। उन्होंने उसकी हंसी देखी।
और कहा कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में इसी नाम से पहचाना जाएगा उत्तम।
उस दिन उस कमरे में जो लोग बैठे थे, उनमें से किसी ने इस बात को गंभीरता से लिया होगा, यह मानना मुश्किल है।
क्योंकि आगे जो हुआ, वो इसका ठीक उल्टा था।
उसकी जिंदगी में सबसे ज्यादा बार जो चीज बदली, वो कोई फिल्म नहीं थी।
उसका नाम था।
वो नाम अभी चार बार और बदलेगा, चार बार पिटेगा, और एक भोर में पूरा बंगाल उसे ठुकरा भी देगा।
पिता का नाम सतकड़ि चट्टोपाध्याय। जड़ें हुगली में। पेशा एक ही, और पूरी उम्र वही रहा।
वो चौरंगी के मेट्रो सिनेमा में प्रोजेक्शनिस्ट थे। वही मेट्रो, जहां तब तक एक भी बंगाली फिल्म नहीं दिखाई गई थी।
मां चपला देवी। दो छोटे भाई, बरुण और तरुण। घर भवानीपुर में, गिरीश मुखर्जी रोड पर। बड़ा परिवार, छोटी कमाई।
पर उस घर में एक चीज थी, जो पैसे से नहीं आती।
पिता और चाचा ने मिलकर मोहल्ले का एक नाटक दल बनाया था। नाम, सुहृद समाज। रिहर्सल क्लबघर में होती, और मंचन गली में।
मां-बाप सख्त थे। शाम को किताब खुलनी चाहिए थी।
तो बच्चा चुपके से निकलकर क्लबघर की खिड़की पर खड़ा हो जाता।
कभी दरवाजे पर कान लगा देता, संवाद सुनता, और घर आकर अकेले दोहराता। डर लगा रहता था कि पकड़ा जाएगा हालांकि उसने खुद बताया है कि जिंदगी में उसके मां-बाप ने उसे कभी नहीं मारा।
बचपन के ये दृश्य कहीं बाहर से नहीं आए हैं।
आखिरी बरसों में उसने अपनी आत्मकथा लिखवाई थी। नाम, आमार आमि। यह सब उसी में दर्ज है, उसी की जबान से।
उस किताब का क्या हुआ, यह इस कहानी के आखिर में आएगा।
एक दिन वो पकड़ा गया।
पकड़ने वाली उसकी बड़ी बहन थी। पुतुल।
उसने घर में शिकायत नहीं की।
उल्टे उससे कहा कि जो देखकर आए हो, वो करके दिखाओ।
बच्चे ने उसके सामने एक दृश्य निभाया।
बहन हंस पड़ी। और फिर उसने वो बात कही, जो उस बच्चे की जिंदगी की पहली अभिनय-सलाह थी।
उसने कहा कि एक ही जगह खड़े मत रहो। थोड़ा घूमो-फिरो।
कुछ ही अरसे बाद वो स्कूल से लौटा और बहन को आवाज लगाई।
बहन नहीं आई। मां आई, चेहरा उतरा हुआ।
टाइफाइड।
एक दिन के बुखार में वो पीली पड़ चुकी थी।
उसने भाई को कमरे में बुलाया, और कहा कि तुम जात्रा सीखो, उसमें बहुत मजा आएगा।
वो ठीक नहीं हुई।
आगे चलकर, जिंदगी के अकेले पलों में, खुले आसमान की तरफ देखते हुए उसे बहन की वही आखिरी बात सुनाई देती रही।
जिस आदमी को देखने के लिए एक दिन पूरा बंगाल सड़कों पर टूट पड़ेगा, उसका पहला दर्शक जा चुका था।
और यह याद रखिएगा कि उसे अभिनय की पहली सलाह किसी निर्देशक ने नहीं दी थी। एक बहन ने दी थी, जो उसे बचाने के लिए झूठ बोल चुकी थी।
स्कूल चकरबेड़िया में था, घर से पैदल की दूरी पर।
बहुत छोटी उम्र में हेडमास्टर क्लास में आए और पूछा कि नाटक में कौन काम करेगा।
पूरी क्लास चुप।
एक लड़का खड़ा हुआ, और छाती धड़कते हुए बोला कि वो कर लेगा।
उसे गयासुर के बचपन वाला हिस्सा मिला।
नाटक के बीच में बांस का बना मंच टूटकर गिर गया, क्योंकि बड़े गयासुर वाला लड़का ऊपर बहुत उछल रहा था। मंच दोबारा जोड़ा गया, और नाटक पूरा हुआ।
उस दिन उसे मेडल मिला। वो उसे लेकर घर तक दौड़ता आया।
फिर मोहल्ले के लड़कों ने अपना दल बनाया, लूनार क्लब।
मंच के परदे के लिए घर-घर से साड़ियां और चादरें मांगी गईं, और उन्हें सेफ्टी पिन से जोड़ा गया। मुकुट चांदी के कागज से बने, और मेकअप पाउडर से हुआ।
उसी इंतजाम में उन्होंने अपना पहला नाटक खेला रवींद्रनाथ का मुकुट।
नाटक इतना चला कि पड़ोस के एक घर ने रिहर्सल के लिए अपना कमरा दे दिया।
और अब उस क्लब की एक ऐसी बात, जो हिंदी में लगभग कहीं नहीं लिखी गई।
1943 में उन लड़कों ने बंकिमचंद्र के आनंदमठ का एक विशेष मंचन किया।
उससे सत्रह सौ रुपये जुटे। पूरे के पूरे आजाद हिंद फौज के कोष में भेज दिए गए।
सत्रह बरस का एक लड़का, जिसका अपना घर मुश्किल से चल रहा था, नेताजी की फौज के लिए चंदा जुटा रहा था।
पढ़ाई साउथ सबर्बन स्कूल से होते हुए कॉमर्स कॉलेज तक पहुंची।
पर वहां रुक गई।
बरसों बाद उसने खुद कहा कि हालात ऐसे थे कि पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और नौकरी पकड़नी पड़ी।
नौकरी वो थी, जो उस दौर के कलकत्ता में सबसे सुरक्षित मानी जाती थी।
खिदिरपुर। पोर्ट कमिश्नर्स का दफ्तर। कैश विभाग। एक क्लर्क की कुर्सी।
महीने के दो सौ पचहत्तर रुपये। उसी बातचीत में उसने यह भी कहा कि उस वक्त अभिनय उसके लिए करियर नहीं था, सिर्फ शौक था। दफ्तर में भी एक क्लब था जो नाटक करता था, और वो उसमें भी खेलता था।
दिन में हिसाब। शाम को मंच।
और इसी बीच उसने अपने ऊपर वो मेहनत शुरू की, जो आज के किसी भी नौजवान को पढ़नी चाहिए।
आवाज साधने के लिए उसने निधानबंधु बनर्जी से शास्त्रीय संगीत सीखा।
तैराकी में वो जॉनी वाइजमुलर का दीवाना था वही तैराक, जो परदे पर टार्जन बना था। और भवानीपुर स्विमिंग एसोसिएशन में सौ गज की फ्रीस्टाइल का चैंपियन वो लगातार तीन साल रहा।
लाठी खेला सीखा। कुश्ती लड़ी। योग किया।
फुटबॉल में वो राइट-बैक खेलता था, और आखिरी सांस तक मोहन बागान का समर्थक रहा
पर एक चीज थी, जो इस पूरी मेहनत के बावजूद उसके साथ अटकी रही।
उसका उच्चारण।
उसके साथ काम करने वाली दो बड़ी अभिनेत्रियों ने बाद में साफ कहा है कि शुरुआती दिनों में उसका उच्चारण साफ नहीं था।
और उसने उस कमी पर जो काम किया, वो अजीब था।
उसने गीता और चंडीपाठ का अभ्यास शुरू किया।
यह वाक्य अभी बिल्कुल मामूली लग रहा है।
तीस बरस बाद यही अभ्यास उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा घाव बनने वाला था।
अब उस लड़की की बात, जिसके बिना यह कहानी वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन उसने अपने ही घर से एक लड़की को निकलते देखा, चचेरी बहन अन्नपूर्णा के साथ।
पूछने पर नाम मिला। गौरी रानी गांगुली।
उसके बाद वो शाम को क्लब की रिहर्सल छोड़ने लगा, और घर के आसपास मंडराने लगा, इस उम्मीद में कि वो लड़की फिर आएगी।
वो नहीं आई।
कई हफ्ते बाद वो आई।
लड़के ने हारमोनियम उठाया और गाना शुरू कर दिया।
उसे पक्का यकीन था कि उसकी आवाज सुनकर वो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ जाएगी, और वो हारमोनियम से नजर उठाएगा तो वो दरवाजे पर खड़ी होगी।
वो गाता रहा। कोई नहीं आया।
आखिर में अन्नपूर्णा ऊपर आई, और अपने साथ उसका संदेश लेकर आई।
संदेश यह था कि तुम बहुत अच्छा गाते हो, और वो तुम्हें ठीक से जानना चाहती है।
फिर वो फिर गायब हो गई।
एक दिन बेचैनी में वो घूमते-घूमते गंगा किनारे जा बैठा। और वहीं से सीधे उसके स्कूल पहुंच गया।
साथ में उनके घर का चौकीदार खड़ा था। लड़की ने सिर्फ आंख से इशारा किया, कि छुट्टी के वक्त आना।
वो आया।
और उसने वो सवाल पूछा, जो उस उम्र में कोई नहीं पूछता।
उसने कहा कि वो फिल्मों में जाना चाहता है। क्या तुम्हें मंजूर है?
उसने कहा कि अगर तुम हीरो बन गए, तो उससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी।
उसने यह सवाल इसलिए पूछा था, क्योंकि उसे अपनी पहली भूमिका मिल चुकी थी।
1947। एक हिंदी फिल्म। भरतलक्ष्मी स्टूडियो में पांच दिन का काम, वो भी एक्स्ट्रा के तौर पर।
किरदार यह था कि वो दूल्हा बनेगा, जिसे मंडप पर पीटा जाता है। और वो फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हुई।
अगले साल एक बंगाली फिल्म आई। निर्देशक नितिन बोस। कहानी रवींद्रनाथ की।
उसमें उसने असित बरन के बचपन वाला हिस्सा निभाया।
फिल्म का विज्ञापन अखबार में छपा।
वो उसमें अपना नाम ढूंढ रहा था।
नाम नहीं था।
भूमिका छोटी थी और वो अनजान था, इसलिए परदे पर चलने वाली नामावली में भी उसका नाम नहीं गया।
पहली रिलीज हुई फिल्म। और उसमें उसका कोई नाम ही नहीं था।
पर एक इंसान ने उसे उस भीड़ में पहचान लिया।
गौरी अपनी दादी के साथ वो फिल्म देखने गई थी। दादी ने मजाक में पूछा कि परदे पर कौन सा अभिनेता अच्छा लगा।
गौरी ने उसकी तरफ इशारा कर दिया।
और दादी को समझ आ गया कि यह मजाक का जवाब नहीं था।
उसी दिन से गौरी का घर से निकलना बंद, और रिश्ता कहीं और तय।
वो चुपके से निकलकर उसके पास पहुंची।
लड़के के पास न कमाई थी, न कोई नाम। फिर भी वो सीधे उसके पिता के पास गया, और हाथ मांग लिया।
पिता संपन्न आदमी थे। पर उन्हें उस लड़के की नीयत पर भरोसा हो गया, और उन्होंने हां कह दी।
1 जून 1948 को शादी हुई।
अब उन नामों की बात, जो एक के बाद एक फेल हुए।
1949 में वो पहली बार हीरो बना। परदे पर नाम गया, उत्तम चटर्जी। फिल्म नहीं चली।
अगली फिल्म में नाम बदलकर अरूप कुमार कर दिया गया। वो भी नहीं चली।
फिर वो लौटकर अरुण हो गया।
और 1951 में दो चीजें एक साथ हुईं, जिन्होंने उसकी जिंदगी बदल दी।
पहली। एक बड़े अभिनेता की नजर उस पर पड़ी।
पहाड़ी सान्याल। उस दौर के जाने-माने कलाकार।
उन्हीं की वजह से उसे न्यू थियेटर्स में मौका मिला।
और उन्हीं ने उसे सलाह दी कि परदे पर वो एक नाम तय कर ले, और वो नाम यही रखे।
दूसरी। उसी साल एक फिल्म बन रही थी, सहयात्री। हीरो असित बरन तय थे, पर वो दूसरी तारीखों में फंस गए और अनुबंध पर दस्तखत नहीं कर सके।
वो भूमिका उस संघर्ष कर रहे लड़के के पास आ गई।
और उसी फिल्म में, जिंदगी में पहली बार, उसका नाम परदे की नामावली में छपा। फिल्म की पुस्तिका के कवर पर उसका चेहरा गया।
इस बार उसने वही नाम चुना, जो जन्म के पहले ही दिन उसकी अपनी मां ने लौटा दिया था।
नाम उत्तम कुमार।
उसी फिल्म में हेमंत मुखर्जी ने पहली बार उसके लिए तीन गाने गाए।
न फिल्म चली, न गाने।
और यहां इस कहानी की सबसे चुप बात आती है।
1947 से 1951 के बीच उसकी जितनी भी फिल्में बनीं, सब पिटीं।
सिनेमा पढ़ाने वाले जो लोग आज उस दौर पर काम करते हैं, वो एक बात दर्ज करते हैं।
उन बरसों की उसकी फिल्में अब मौजूद नहीं हैं। प्रिंट खो चुके हैं।
उसकी नाकामी का कोई सबूत आज दुनिया में नहीं बचा। जो बचा, वो सिर्फ वो है जो उसने उस नाकामी के बाद बनाया।
पर उस वक्त उसे यह कोई नहीं बता सकता था।
उस वक्त स्टूडियो में उसका एक खिताब बन चुका था, जो पीठ पीछे नहीं, मुंह पर बोला जाता था।
फ्लॉप मास्टर जनरल।
और एक दूसरा ताना भी था। लोग उसे देखकर कहते लो, नया दुर्गादास आ गया।
दुर्गादास बनर्जी उस जमाने के बड़े सितारे थे, जो मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक कामयाबी से पहुंचे थे। बड़े घर के, रईस, तराशे हुए आदमी।
यानी वो ताना सिर्फ नाकामी का नहीं था। वो यह याद दिलाने के लिए था कि तुम कहां से आए हो।
वो टूट गया।
उसने तय कर लिया कि सिनेमा छोड़ देगा और पोर्ट की पक्की नौकरी में लौट जाएगा।
उस मोड़ पर उसे गौरी ने रोका।
उन्होंने कहा कि जिस काम में मन नहीं लगता, उसमें लौटने से कुछ नहीं मिलेगा।
जिस आदमी को पूरी इंडस्ट्री नाकाम मान चुकी थी, उसके लिए उस साल की सबसे बड़ी पूंजी यही एक वाक्य था।
1952। निर्देशक निर्मल दे ने उसे बुलाया।
बाकी लोगों को उसमें कुछ नहीं दिखा था। निर्मल दे को दिखा।
फिल्म का नाम था बासु परिबार।
और वो चल गई।
पच्चीस साल की उम्र में, आठ बरस की लगातार पिटाई के बाद, उसे पहली कामयाबी मिली।
उसने उसी साल पोर्ट की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
बरसों बाद उसने कहा कि किरदार को तोड़कर समझना उसने सबसे पहले निर्मल दे से ही सीखा।
और ठीक इसी दौर में उसने वो काम किया, जो उसकी असली मरम्मत थी।
1953 में वो मंच पर लौटा। नाटक का नाम था श्यामली।
वो नाटक लगातार करीब पांच सौ रातें चला।
पांच सौ रातें, हर रात एक ही किरदार, एक ही संवाद, एक जीवित भीड़ के सामने।
जो उच्चारण उसकी सबसे बड़ी कमजोरी था, वो पचास के दशक के मध्य तक पूरी तरह ठीक हो चुका था।
और आगे चलकर उसकी बांग्ला बोलने का ढंग खुद एक मानक बन गया वो नमूना, जिसे सुनकर लोग बोलना सीखते हैं।
1953 में ही शाड़े चुयात्तोर आई। और उसमें एक नई अभिनेत्री उसके सामने खड़ी थी।
सुचित्रा सेन।
वो फिल्म महीनों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी। और उसने एक और काम किया, जिस पर कम ध्यान गया है।
कलकत्ता के पैराडाइस सिनेमा में साल भर ज्यादातर हिंदी फिल्में चलती थीं। वहां दिखाई जाने वाली वो पहली बंगाली फिल्म थी।
अगले साल अग्निपरीक्षा आई, जिसने उसे रोमांटिक हीरो बना दिया।
और वो फिल्म संयोग से उसी दिन रिलीज हुई, जिस दिन उसका जन्मदिन था।
आगे चलकर वो दोनों तीस फिल्मों में साथ आए।
उस जोड़ी के बारे में उसने खुद जो कहा, उसमें एक भी शब्द बनावटी नहीं है।
उसने कहा कि अगर सुचित्रा उसके साथ न होतीं, तो वो उत्तम बन ही नहीं पाता।
पर सिर्फ सुचित्रा के साथ की कहानी अधूरी है।
उसने लगभग उतनी ही फिल्में एक और अभिनेत्री के साथ कीं। सावित्री चटर्जी।
और उनके बारे में एक किस्सा है, जो बताता है कि यह आदमी असल में क्या था।
एक शाम वो अपनी रोज की महफिल में बैठा था। गाना चल रहा था, हंसी-मजाक चल रहा था।
अचानक वो उठ खड़ा हुआ।
लोग हैरान रह गए, क्योंकि उसके जाने का वक्त नहीं हुआ था।
उसने वजह बताई। कल सुबह सावित्री के साथ एक दृश्य है। घर जाकर तैयारी करनी है।
वरना वो पूरा दृश्य उसके हाथ से ले जाएंगी।
बंगाल का सबसे बड़ा सितारा, महफिल छोड़कर घर जा रहा था, क्योंकि उसे अपनी सह-कलाकार से डर लगता था।
उसकी तस्वीरें आज हर जगह हैं। पर एक बात उन तस्वीरों से नहीं दिखती।
वो पारंपरिक अर्थों में सुंदर नहीं था।
लंबा जरूर था, पर नाक चपटी थी, होंठ मोटे थे, और कद-काठी कोई खास नहीं थी।
उसके अपने दौर के कई नौजवान अभिनेता उससे कहीं ज्यादा सुडौल थे।
जो चीज उसके पास थी, उसे परदे की मौजूदगी कहते हैं। और आम तौर पर माना जाता है कि यह चीज या तो होती है, या नहीं होती।
पर उसकी शुरुआती नाकामियां यही साबित करती हैं कि उसके पास वो चीज पैदाइशी नहीं थी।
उसने वो बनाई।
बालों की वो लापरवाह सी लट, होंठों के कोने पर टिकी सिगरेट, वो हल्का सा तनाव, सिर का वो आधा मुड़ना, और आखिर में वो अचानक खुलने वाली मुस्कान यह सब किसी वरदान से नहीं आया था।
यह बरसों की मेहनत का नतीजा था।
उस दौर में एक और नाम था, जिसे बंगाल हमेशा उसी के साथ जोड़कर लेता था।
सौमित्र चटर्जी।
बंगाल ने उन दोनों को हमेशा आमने-सामने खड़ा किया। सौमित्र ने खुद कहा है कि उनका और उत्तम का नाम राज्य की दो संस्थाओं जैसा हो गया था मोहन बागान और ईस्ट बंगाल।
पर वही सौमित्र यह भी कहते रहे कि लोकप्रियता में उत्तम कुमार से आगे कोई नहीं निकल सका। वो खुद पास तक पहुंचे, पर आगे हमेशा वही रहा।
और असल जिंदगी में वो दोनों दुश्मन नहीं थे।
वो अक्सर साथ बैठते थे। शहर के एक पुराने होटल में, देर तक, गिलास सामने रखकर।
जिन दो नामों को पूरा बंगाल आपस में लड़ाता रहा, वो दोनों शाम को एक ही मेज पर होते थे।
अब उस अंधेरे कमरे पर लौटिए, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी।
1957। मेट्रो सिनेमा ने तय किया कि वो पहली बार एक बंगाली फिल्म दिखाएगा।
फिल्म का नाम था चंद्रनाथ। शरतचंद्र के उपन्यास पर बनी। हीरो वही लड़का, हीरोइन सुचित्रा सेन।
और उस शाम प्रोजेक्शन रूम में वही लंबा, दुबला, गंभीर आदमी बैठा था, जो बरसों से उस परदे पर रोशनी फेंकता आया था।
रोशनी उसने फेंकी। और उस रोशनी में जो चेहरा खड़ा हुआ, वो उसका अपना बेटा था।
बाप ने कभी परदे पर अपना नाम नहीं देखा। पर वो परदा रोज उसी ने जिंदा किया था।
अगले ही साल एक और चीज हुई, जो हिंदी के पाठकों के लिए खास है।
उसकी एक बंगाली फिल्म में एक हिंदी गाना रखा गया।
गाने वाले थे मोहम्मद रफी। और उन्होंने उसके लिए एक पैसा नहीं लिया।
किसी बंगाली फिल्म में वो पहला हिंदी गाना था।
और फिर 1959 में उसे वो नाम मिला, जिससे आज पूरा हिंदुस्तान उसे जानता है।
वो नाम किसी सरकार ने नहीं दिया था। किसी पुरस्कार समिति ने नहीं दिया था।
एक बांग्ला पत्रिका ने उसे पहली बार महानायक लिखा।
और वो शब्द चिपक गया।
तीस साल पहले जिस बच्चे की मां ने उसका नाम लौटा दिया था, उसे अब लोग एक नया नाम दे रहे थे।
अब सत्यजित रे इस कहानी में दाखिल होते हैं।
साठ के दशक की शुरुआत में रे ने उसे रवींद्रनाथ के एक उपन्यास पर बनने वाली फिल्म के लिए बुलाया, और खलनायक की भूमिका दी।
उसने मना कर दिया। उसका कहना था कि इस किरदार के साथ कोई और ज्यादा इंसाफ करेगा।
और फिर उसने रे से यह गुजारिश की कि वो फिल्म उसे बनाने दें, अपने बैनर तले।
जो आदमी किरदार के लिए खुद को नाकाफी बता रहा था, वो उसी फिल्म पर अपना पैसा लगाने को तैयार था।
वो फिल्म तब बनी नहीं। पर रे ने वो नाम याद रखा।
1966। नायक।
एक सुपरस्टार, जो पुरस्कार लेने ट्रेन से दिल्ली जा रहा है, और रास्ते में एक नौजवान पत्रकार के सामने अपने डर, अपनी गलतियां और अपना अकेलापन खोलता जाता है।
रे ने खुद लिखा है कि उन्होंने वो भूमिका इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें लगा कि यह अभिनेता उससे आसानी से जुड़ पाएगा।
क्योंकि वो कहानी एक साधारण मध्यवर्गीय नौजवान की थी, जिसे फिल्मों में मौका मिलता है और जो तेजी से ऊपर चढ़ जाता है।
रे ने साफ लिखा कि यह फर्श से अर्श तक की कहानी है, और इसमें उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
इस बात को याद रखिएगा। कहानी के आखिर में खुद उत्तम कुमार इसका ठीक उल्टा कहने वाले हैं।
उस फिल्म में एक दृश्य है जो आज तक दोहराया जाता है। एक पुराना कलाकार नए लड़के को डांटता है कि यह क्या तरीका है, यह हॉलीवुड है क्या, तुम बुदबुदा क्यों रहे हो।
मजा यह है कि असल जिंदगी में उत्तम कुमार की पहचान ही यही थी संवाद को ऊंचा उछालने की जगह उसे दबाकर, ठहराकर बोलना।
रे ने वो असली ताना उठाकर फिल्म में रख दिया था।
और उस फिल्म के लिए उसने जो किया, वो शायद उस दौर का कोई सितारा नहीं करता।
शूटिंग से कुछ समय पहले उसे चेचक हुई थी। चेहरे पर उसके निशान साफ दिख रहे थे।
उसने मेकअप न करने पर हामी भर दी।
बंगाल का सबसे बड़ा हीरो, कैमरे के सामने अपने दाग लेकर खड़ा हो गया।
नायक के प्रीमियर के दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले नहीं देखा था।
भीड़ ने उसकी कमीज नोच ली।
वो फिल्म बर्लिन तक गई और वहां सम्मानित हुई। और उसे देखकर हॉलीवुड की एलिजाबेथ टेलर ने कहा कि वो इस अभिनेता से मिलना चाहती हैं, उसके साथ काम करना चाहती हैं।
1967 इस कहानी का सबसे अजीब साल है। उसमें दो चीजें एक साथ हुईं।
पहली। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तब तक कई बरसों से दिए जा रहे थे, पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी उस साल पहली बार बनी।
वो पुरस्कार पाने वाला देश का पहला अभिनेता यही आदमी था। और एक नहीं, दो फिल्मों के लिए एक साथ।
उसने बंबई में अपनी सबसे बड़ी छलांग लगाने की कोशिश की।
उसने एक हिंदी फिल्म खुद बनाई। रंगीन, महंगी, बड़ी लोकेशन। सामने वैजयंतीमाला।
और वो फिल्म असल में उसी अग्निपरीक्षा का हिंदी रूपांतर थी, जिसने तेरह साल पहले उसे बंगाल का हीरो बनाया था।
जो जादू बंगाल में चला था, वो बंबई में नहीं चला।
फिल्म बुरी तरह पिटी।
जो पैसा उसने बरसों में जोड़ा था, वो उसी में चला गया। और ऊपर से कर्ज।
उसी दौर में, एक शूटिंग के बीच, उसे पहला दिल का दौरा पड़ा।
और यह भी जान लीजिए कि उससे पहले वो बंबई के कई बड़े मौके ठुकरा चुका था जिनमें राज कपूर की संगम भी थी।
अब समझिए कि कर्ज में डूबा हुआ आदमी आगे क्या करता है।
वो सिर्फ अपना कर्ज नहीं उतारता। वो दूसरों के लिए एक संस्था खड़ी करता है।
साठ के दशक के आखिर में उसने कलाकारों की पुरानी संस्था छोड़ी, और अपनी खुद की बनाई। शिल्पी संसद। फिल्म इंडस्ट्री के गरीब कर्मचारियों और छोटे कलाकारों के लिए।
वो उसका आजीवन अध्यक्ष रहा।
शो करके पैसा जुटाया जाता था, पर उतना जमा नहीं होता था।
तो उसने तय किया कि संस्था के लिए एक पूरी फिल्म बनाएगा, और उसकी सारी कमाई वहीं जाएगी।
1973। बोन पलाशिर पदाबली।
निर्देशन उसने किया, पटकथा उसने लिखी, और पार्श्व संगीत भी उसी ने दिया।
बड़े से बड़ा कलाकार बिना पैसे लिए काम करने आया। खुद उसने भी एक पैसा नहीं लिया।
और वो फिल्म खूब चली।
यह कोई एक बार का काम नहीं था।
साठ के दशक में जब तकनीशियनों का वितरकों से झगड़ा हुआ, तो वो तकनीशियनों के साथ खड़ा हो गया।
और अपनी ही फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ धरने पर बैठ गया।
उसकी मौत के बाद इंडस्ट्री के एक निर्देशक ने जो कहा, उससे पूरी बात एक लाइन में खुल जाती है।
उन्होंने कहा कि संस्थाओं ने, फिल्मी विद्वानों ने और बौद्धिक तबके के एक हिस्से ने उसे लगातार नजरअंदाज किया।
पर स्टूडियो के मजदूरों, तकनीशियनों और दिहाड़ी वालों ने उसे बेशर्त प्यार दिया।
और यह भी जान लीजिए कि वो दौर उसके लिए आसान नहीं था।
सत्तर का दशक बंगाल में नौजवानों के गुस्से का दशक था। पढ़े-लिखे लड़के सड़कों पर थे, और पुरानी हर चीज सवालों के घेरे में आ गई थी।
उस गुस्से से वो भी नहीं बचा। स्टूडियो की दीवारों पर उसके खिलाफ लिखा गया, और कई बार सामने भी सुनना पड़ा।
उसी दौर में उसने ऐसी फिल्में करनी शुरू कीं, जिनमें वो हीरो नहीं, दादा था।
एक फिल्म में वो ऐसा बड़ा भाई है, जिसे कभी मोहल्ले के लड़के पूजते थे, और अब वही लड़के उसे नीचा दिखाते हैं। उसका कारोबार डूब चुका है, और उसकी बात का कोई वजन नहीं बचा।
परदे पर वो अपने ही दौर का दृश्य निभा रहा था।
सत्तर के दशक के मध्य में शक्ति सामंत उसे एक ऐसी फिल्म में ले आए, जो एक साथ बंगाली और हिंदी दोनों में बनी। नाम, अमानुष। सामने शर्मिला टैगोर।
उस फिल्म में उसका किरदार एक टूटा हुआ, शराब में डूबा हुआ, पर भीतर से खरा आदमी था।
और उस फिल्म का एक गाना आज भी हिंदुस्तान के हर कोने में बजता है।
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा।
उसी गाने पर किशोर कुमार को फिल्मफेयर मिला।
पचास के करीब पहुंच चुके, कर्ज में डूबे एक आदमी ने बंबई से आखिरकार वो चीज ले ली, जो कुछ बरस पहले उसके हाथ से फिसल गई थी।
और 1975 उसके करियर का सबसे अजीब साल है।
उस साल उसकी छह फिल्में आईं।
छहों चलीं।
एक हास्य फिल्म, एक ऐसे डॉक्टर की कहानी जो जिंदगी भर झुका नहीं, एक राजा जो साधु बनकर लौटता है, और एक ऐसा किरदार जिसमें वो सिरे से खलनायक था।
उस आखिरी फिल्म के लिए उसे मना किया गया था, कि दर्शक तुम्हें इस रूप में कभी नहीं देखना चाहेंगे।
उसने वो फिल्म फिर भी की।
1979 में, उसने एक और काम किया जिसका जिक्र कम होता है।
पिछले साल बंगाल में भीषण बाढ़ आई थी।
राहत के पैसे जुटाने के लिए उसने एक चैरिटी क्रिकेट मैच कराया। एक तरफ बंगाली फिल्म इंडस्ट्री, दूसरी तरफ बंबई की फिल्म इंडस्ट्री।
बंगाल की टीम की कप्तानी उसने खुद की।
और बंबई की टीम की कप्तानी की दिलीप कुमार ने।
और अब वो हिस्सा, जिसे इस कहानी से निकाल देना बेईमानी होगी।
1948 में जिस लड़की के लिए वो बिना कमाई और बिना नाम के उसके पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया था, उसी गौरी के साथ उसका घर आगे चलकर वैसा नहीं रहा।
1963 में पर्दे के बाहर उसकी जिंदगी में सुप्रिया देवी आईं। वही अभिनेत्री, जो 1952 की उसी पहली कामयाब फिल्म में उसके साथ परदे पर थीं, जिसने उसे फ्लॉप मास्टर जनरल से उत्तम कुमार बनाया था।
उसके बाद उसकी जिंदगी दो घरों में बंट गई।
उसने गौरी से कानूनी अलगाव कभी नहीं लिया।
इस पर बंगाल में बरसों बहस हुई, और आज भी होती है। मैं उस बहस में नहीं पड़ूंगा। यह पन्ना किसी के निजी फैसलों पर अदालत लगाने के लिए नहीं है, और तीनों में से कोई आज सफाई देने के लिए मौजूद नहीं है।
पर एक बात दर्ज करना जरूरी है, क्योंकि वो उसी ने दर्ज की है।
आमार आमि का पहला मसौदा जब सुप्रिया देवी ने पढ़ा, तो उन्हें लगा कि उसमें उनकी जगह बहुत कम है।
उसने किताब में एक हिस्सा और जोड़ा।
यानी जो आदमी जिंदगी भर लोगों की उम्मीदों के हिसाब से जिया, वो अपनी आत्मकथा भी पूरी तरह अकेले नहीं लिख पाया।
1967 में उसने एक बच्ची को कानूनी तौर पर गोद भी लिया था।
और उसके जाने के बाद उसके दोनों घर कभी एक जगह नहीं आ पाए।
अब उस आदमी की अपनी जबान से सुनिए, क्योंकि वो मौका बहुत कम मिला है।
20 जुलाई 1980 को उसने एक लंबी बातचीत दी। वो इंटरव्यू लगभग नहीं देता था, और उस पत्रकार को डेढ़ साल से टाल रहा था।
वो उसकी आखिरी प्रकाशित बातचीत निकली।
उससे पूछा गया कि इतनी बड़ी लोकप्रियता कैसी लगती है।
उसने कहा कि अच्छी लगती है। पर जब वो हद पार कर जाती है तो मुसीबत बन जाती है। लोग छूते नहीं, चिकोटी काटते हैं, कपड़े फाड़ देते हैं, कभी गाड़ी का शीशा तोड़ देते हैं।
उसने उसे एक ही शब्द दिया। घुटन।
फिर उससे पूछा गया कि क्या यह छवि उसके अभिनय को भी बांधती है।
उसने कहा, हां।
उसने कहा कि वो किसी किरदार को अपने ढंग से नहीं कर पाता, अगर वो उत्तम कुमार की बनी-बनाई छवि से टकराता हो।
उसने यह भी कहा कि वो कभी एक शातिर, सचमुच का खलनायक करना चाहता है। पर उसे मालूम है कि लोग मंजूर नहीं करेंगे।
फिर उससे पूछा गया कि अब तक का कौन सा किरदार करने में उसे सबसे ज्यादा मजा आया।
उसका जवाब एक शब्द का था।
कोई नहीं।
पूछा गया, एक भी नहीं?
उसने कहा कि कुछ फिल्मों के कुछ हिस्से अच्छे लगे, बस इतना ही।
और नायक?
अब वो बात याद कीजिए जो रे ने लिखी थी कि यह कहानी उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
उत्तम कुमार ने कहा कि उसे उस किरदार में अपनी कोई झलक नहीं दिखती।
उसने कहा कि उसकी समझ में यह आया ही नहीं कि वो आदमी आखिर किस बात से इतना परेशान है।
अब आखिरी हफ्ते पर आइए।
दो साल पहले उसे एक और दौरा पड़ चुका था। उसके बाद डॉक्टरों ने दिल से जुड़ी एक और तकलीफ पकड़ी थी, और जेब में हमेशा एक दवा रहने लगी थी, जो सीने में अचानक ऐंठन उठने पर काम आती।
डॉक्टरों ने उसे दो चीजों से रोका था।
इतना काम मत करो। और शराब छोड़ दो।
उसने दोनों में से एक भी बात नहीं मानी।
काम इसलिए नहीं छोड़ सका कि कर्ज था, संस्था थी, और उस अकेले नाम पर टिकी एक पूरी इंडस्ट्री थी।
और बाकी जो था, वो शायद उसी घुटन का दूसरा नाम था, जिसका जिक्र उसने चार दिन पहले खुद किया था।
22 जुलाई। सेट पर मेकअप करने वाले ने देखा कि वो उखड़ा हुआ है।
उसने पूछा कि आप थोड़ा आराम क्यों नहीं करते, इतना काम करके खुद को क्यों तोड़ते हैं।
जवाब में उसने कहा कि बहुत लंबा वक्त हो गया, अब शायद उसकी जरूरत खत्म हो गई है।
23 जुलाई की सुबह घर के पास खड़ी उसकी गाड़ी से उसका टेप रिकॉर्डर चोरी हो गया।
वो टेप रिकॉर्डर वो हर जगह साथ रखता था। उस पर गाने सुनता था, और अपनी आवाज भी रिकॉर्ड करता था।
उस चोरी ने उसे तोड़ दिया।
स्टूडियो पहुंचा तो उसका मेकअप रूम किसी और के पास था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
फिर उस दिन का दृश्य आया। एक सीढ़ी। चढ़ना और उतरना।
उसके हिसाब से यह मामूली दृश्य था।
पर हर बार उसे लगा कि ठीक नहीं हुआ।
सात बार।
आखिर में निर्देशक ने बाकी लोगों से चुपके से कहा कि जोर से ताली बजा दो, ताकि वो और रीटेक न मांगे।
जिस फिल्म का वो दृश्य था, वो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के पिग्मेलियन पर बनी थी।
कहानी उस आदमी की, जो एक लड़की का उच्चारण सुधारता है।
यानी वो आदमी, जिसने अपनी जबान खुद घिसकर तैयार की थी, जिसे शुरू में साफ न बोल पाने का ताना मिला था, आखिरी बार परदे पर किसी और की जबान सुधार रहा था।
और तिरपन साल की उम्र में, दिल के कई दौरे झेल चुका वो आदमी, सातवीं बार भी सीढ़ी चढ़-उतरकर यही सोच रहा था कि अभी ठीक नहीं हुआ।
उस शाम वो एक दोस्त की महफिल में गया, और देर रात तक वहीं रहा।
आधी रात के आसपास तबीयत बिगड़ी।
वो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल गया घर से पांच मिनट का रास्ता।
रात तीन बजे उसे भर्ती किया गया। शहर के बड़े हृदय-रोग विशेषज्ञों का एक बोर्ड बैठा।
और उस बोर्ड में जो एक डॉक्टर उसे संभाल रहा था, उसका नाम था लालमोहन मुखर्जी।
यह वही लड़का था, जिससे उसकी दोस्ती सातवीं क्लास में साउथ सबर्बन स्कूल में हुई थी।
स्कूल से लेकर आखिरी रात तक, वो साथ था।
पूरी रात और अगला पूरा दिन कोशिश चलती रही।
24 जुलाई 1980। रात साढ़े नौ बजे के करीब वो चला गया।
अगले दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले कभी नहीं देखा था।
एक खुली ट्रक। सफेद फूलों के ढेर। और दक्षिण कलकत्ता की सारी सड़कें रुक गईं।
अगली सुबह आनंदबाजार पत्रिका के पहले पन्ने पर जो शीर्षक छपा, उसका मतलब सिर्फ इतना था सिनेमा का इंद्र गिर गया।
और उसी दिन एक और चीज गायब हो गई।
वो अपनी आत्मकथा लिख रहा था। नाम, आमार आमि।
जिस दिन वो गया, उस पांडुलिपि का कोई पता नहीं चला। वो चोरी हो गई।
फिर बरसों बाद, एक अखबारनवीस को वो मिली। और तीस साल बाद, कोलकाता पुस्तक मेले में वो छपकर सामने आई।
उन पन्नों में वो अपने डर के बारे में लिखता है। कि यह रोशनी, यह चमक, कुछ भी टिकने वाला नहीं। कि यह किसी भी पल बुझ सकती है, और उसे और गहरे अंधेरे में फेंक सकती है।
जिसे पूरा बंगाल महानायक कहता था, वो अकेले में अंधेरे की गिनती कर रहा था।
और एक तारीख, जो इस कहानी में अक्सर छूट जाती है।
जिस औरत ने उसे पोर्ट की नौकरी में लौटने से रोका था, जिसकी वजह से यह पूरा नाम बना गौरी वो उसके जाने के नौ महीने बाद ही चली गईं।
अब आज पर आइए।
3 सितंबर 2026, उस बच्चे के जन्म को आज सौ साल पूरे हो रहे हैं।
अहिरीटोला और टॉलीगंज में उसकी मूर्तियों पर माला चढ़ेगी, और बिजली सिनेमा के सामने बीस फुट ऊंचा कटआउट खड़ा होगा।
न्यू टाउन में उसके नाम के फिल्म केंद्र की नींव रखी जा रही है, और डाक विभाग भी उसके नाम पर स्मृति-सामग्री जारी कर रहा है।
डाक टिकट तो सत्रह साल पहले ही आ चुका था।
चार दिन का उत्सव जिस फिल्म से शुरू होगा, वो वही है नायक। जिसकी नई, साफ की हुई कॉपी हाल में परदे पर लौटी है, और एक नई पीढ़ी उसे पहली बार बड़े परदे पर देख रही है।
***
जन्म : 3 सितम्बर 1926
स्थान : अहिरितोला, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
मृत्यु : 24 जुलाई 1980
स्थान : बेल व्यू क्लिनिक, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
इन दिनों जौहर को लेकर के बहुत बड़ी चर्चा चल रही है... हमें याद रखना चाहिए कि जोहर इतिहास के भीतर दर्ज घटनाओं में बहुत कम है, खासतौर पर पद्मावती का जौहर तो बिल्कुल भी ऐतिहासिक सत्य नहीं है, बल्कि एक सूफ़ी कवि मालिक मुहम्मद जायसी के द्वारा रचित ग्रंथ है!
आज जब जौहर को महिमा मंडित भी करने की कोशिश की जा रही है हमें नहीं भूलना चाहिए कि जोहर या सती प्रथा यह सारी बातें कहीं ना कहीं भारत और दुनिया भर की सामाजिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अलग-अलग नाम से अंकित मिलती हैं, जो स्त्रियों को दमित करके रखने का एक फूहड़ तरीका भर ही रहा है।
यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि किसी समुदाय की स्वतंत्रता का दमन करने के लिए हर बार किसी अस्त्र शस्त्र या बाहुबल की ही आवश्यकता नहीं होती है। बल्कि उसके लिए सबसे अधिक बार सांप्रदायिक,नैतिक, ऐतिहासिक और पारंपरिक दबाव पैदा किया जाता है जो अधिक स्वीकार्य और प्रभावी होता है, जिसमें सारे कुत्सित मंतव्य सम्मानजनक ढंग से समाहित हो जाते हैं! 80 के दशक में हमने राजस्थान में सती प्रथा को चलते हुए आखिरी बार भी देखा है और उसकी केस स्टडी में यह पता लगता है कि वह सती प्रथा भी ज़मीन जायदाद की लालच में हुई थी। पीछे भी तमाम ऐसी घटनाएं हैं जिनमें स्त्रियों को खासतौर पर बड़े घरानों की विधवा स्त्रियों को जला देने के कई षड्यंत्र बनाए जाते थे, जिनका सबसे सरल तरीका होता था उसे धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा के नाम पर ऐतिहासिक और सम्मानजनक होने का जामा पहना देना।
मैं जोहर अथवा सती प्रथा ऐसी किसी भी घटना को लज्जित करने वाली ऐतिहासिक घटना के तौर पर ही देखता हूं! इस कारण यदि मैं पद्मावत को सच भी मान लूं और उसके बाद के अन्य जौहर अथवा सतीप्रथा की घटनाओं स्वीकार करूं तो भी वह एक भयानक दुर्घटना से अधिक कुछ नहीं है... जिसमें की कई निर्दोष स्त्रियों को भ्रामक सम्मान के नाम पर अपनी जान गंवानी पड़ी। निःसंदेह! हमारे पुरुष प्रधान पारंपरिक पारिवारिक सामाजिक संरचना में हर युग काल में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया के अंदर स्त्रियों पर और बच्चों पर अनगिनत अत्याचार किए गए हैं।
राजतंत्र के समय ऐसा दुनिया का कोई हिस्सा नहीं और इतिहास का कोई ऐसा हिस्सा नहीं था जहां पर इस तरह की घटनाएं नहीं घटी है, पूरे वैदिक पौराणिक काल से लेकर हम मिश्र में देखते हैं, बेबीलोन में देखते हैं, ईरान में देखते हैं, इस्लामी शासन में देखते हैं, यहूदी,ईसाई शासन में देखते हैं, बौद्ध शासन में देखते हैं, सभी धार्मिक परंपराओं के शासन काम के बाद भी जब आज लोकतांत्रिक सत्ताएं आ चुकी हैं तब भी हम देखते हैं कि दंगों में, फसाद में, पारिवारिक सामुदायिक झगड़ो में यहां तक कि हमारी भाषा में हर जगह स्त्रियां टारगेट की जाती हैं उनका बलात्कार किया जाता है। उनकी हत्या की जाती है। यह मानवीय कमजोरी और पारंपरिक सोच का घृणातम रूप है जिसे प्रायः किसी अन्य धर्म या समुदाय या देश के विरुद्ध खड़ा करके अपनी वासन पूरी की जाती रही है। और इसे महानता का नाम दे कर अपने पाप को छुपा ले जाने की कोशिश मूर्खता के अलावा कुछ भी नहीं है। अगर यह पाप है तो पूरी दुनिया के लिए पाप है। और यह लज्जा जनक है हर एक के लिए उसके लिए भी जिसने इस तरह के कृत्य को उकसाया और उनके लिए भी जिन्हें यह करना पड़ा और उसको बाद में उन्होंने महिमा मंडित कर दिया गया।
अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कहानी झूठी है, लेकिन अगर यह सच है तो अलाउद्दीन खिलजी खलनायक है! पद्मावती और उसके साथ जोहर करने वाली रनियां वही बेसहारा स्त्रियां है(जिन्हें पुरुष प्रधान सोच ने एक सम्पत्ति में बदल रखा था) लेकिन वह भी लोग सबसे बड़े खलनायक है जोहर या सती प्रथा को महिमामंडित करके कहीं ना कहीं स्त्री को उस बेहूदा घेरे में बंद रखना चाहते हैं जहां से वह अपनी आजादी का ऐलान न कर सके! तथा वह यह कभी ना जान पाए कि वह एक मनुष्य है एक सामान्य मनुष्य है ना कि किसी भी दूसरे मनुष्य ,नैतिकता,परम्परा या इतिहास की बपौती ।।
-ओमा अक्क
तू नहीं है तेरा ख़्याल नहीं
ज़िंदगानी में अब बवाल नहीं
जंग लड़ना मुझे गवारा पर
बेबसों को बना के ढाल नहीं
ऐसे लीडर को लानतें भेजो
चल सका जो सियासी चाल नहीं
पा लिया जो ख़ुदा की रहमत थी
खो दिया तो किया मलाल नहीं
भूख का मसअला सुलझ जाए
इतना सीधा भी ये सवाल नहीं
-बलजीत सिंह "बेनाम"
बेबसों को बना के ढाल नहीं
ऐसे लीडर को लानतें भेजो
चल सका जो सियासी चाल नहीं
पा लिया जो ख़ुदा की रहमत थी
खो दिया तो किया मलाल नहीं
भूख का मसअला सुलझ जाए
इतना सीधा भी ये सवाल नहीं
-बलजीत सिंह "बेनाम"
बलजीत सिंह "बेनाम"
आकाशवाणी कवि, Raven Cage (Germany) में रचनाएं प्रकाशित
हांसी, हिसार, हरियाणा- 125033
ईमेल : baljeetkumar636363@gmail.com
किसी से अगर दिल लगाने की आदत
मोहब्बत में रख भूल जाने की आदत
जो हँसता रहा तू ज़माने की ख़ातिर
न पड़ जाए आँसू बहाने की आदत
तुम्हें घर बसाने की ज़िद है अगर तो
हमें उम्र तन्हा बिताने की आदत
सभी दिन नहीं एक जैसे जहां में
ग़मों में भी रख मुस्कुराने की आदत
जवां बेटियों पर चलाना हक़ूमत
सदा से है ऊँचे घराने की आदत
मोहब्बत में रख भूल जाने की आदत
जो हँसता रहा तू ज़माने की ख़ातिर
न पड़ जाए आँसू बहाने की आदत
तुम्हें घर बसाने की ज़िद है अगर तो
हमें उम्र तन्हा बिताने की आदत
सभी दिन नहीं एक जैसे जहां में
ग़मों में भी रख मुस्कुराने की आदत
जवां बेटियों पर चलाना हक़ूमत
सदा से है ऊँचे घराने की आदत
-बलजीत सिंह "बेनाम"
बलजीत सिंह "बेनाम"
आकाशवाणी कवि, Raven Cage (Germany) में रचनाएं प्रकाशित
हांसी, हिसार, हरियाणा- 125033
ईमेल : baljeetkumar636363@gmail.com
अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है. शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया. अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने तक़रीबन एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है. उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई. इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे.
अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण
ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों में उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया. इससे पहले उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत किया गया. अमृता को 1988 में अंतरराष्ट्रीय बल्गारिया वैरोव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें 1982 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया. अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं. उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई.
अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखा है, यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से सदा दूसरे स्थान पर रही है. कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं. सिर्फ़ लेखक का रूप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है. पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अंदर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया. वहां उस वक़्त थोड़ी सी भी ख़ाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती. यह याद केवल अब कर सकती हूं, वर्षों की दूरी पर खड़ी होकर. पहला वक़्त तब देखा था जब मेरी उम्र पच्चीस वर्ष की थी. मेरे कोई बच्चा नहीं था और मुझे प्राय: एक बच्चे का स्वप्न आया करता था. जब मैं जाग जाती थी. मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली. एक सिर्फ़ औरत, जो अगर मां नहीं बन सकती थी तो जीना नहीं चाहती थी. और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई.
दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, उसे हल्का सा बुख़ार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने विक्स मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खड़े मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र ग़ुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़ क़लम की आवश्यकता नहीं थी.
और तीसरी बार यह सिर्फ़ औरत मैंने तब देखी थी, जब अपने स्टूडियो में बैठे हुए इमरोज़ ने अपना पतला सा ब्रश अपने काग़ज़ के ऊपर से उठाकर उसे एक बार लाल रंग में डुबोया था और फिर उठकर उस ब्रश से मेरे माथे पर बिंदी लगा दी थी. मेरे भीतर की इस सिर्फ़ औरत की सिर्फ़ लेखक से कोई अदावत नहीं. उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में खड़े होना स्वीकार कर लिया है. अपने बदन को अपनी आंखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आंखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अगली जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के सिर्फ़ लेखक ने पीछे हटकर उसके लिए जगह ख़ाली कर दी थी.
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम को लेकर कई क़िस्से हैं. अमृता प्रीतम ने भी बेबाकी से साहिर के प्रति अपने प्रेम को बयां किया है. वह लिखती हैं, मैंने ज़िंदगी में दो बार मुहब्बत की. एक बार साहिर से और दूसरी बार इमरोज़ से. अक्षरों के साये में जवाहर लाल नेहरू और एडविना पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए वह कहती हैं, मेरा और साहिर का रिश्ता भी कुछ इसी रोशनी में पहचाना जा सकता है, जिसके लंबे बरसों में कभी तन नहीं रहा था, सिर्फ़ मन था, जो नज़्मों में धड़कता रहा दोनों की.
लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था, तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी से निकला हुआ ख़ामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था. वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था. और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े-छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी, एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं. वह कहती हैं-
मेरे इस जिस्म में
तेरा सांस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी सांसों में
कुछ हवा में मिल गई
अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में इमरोज़ के बारे में भी विस्तार से लिखा है. एक जगह वह लिखती हैं-
मुझ पर उसकी पहली मुलाक़ात का असर-मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया, और तेज़ बुख़ार चढ़ गया. उस दिन-उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था-बहुत बुख़ार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं.
कभी हैरान हो जाती हूं. इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत, जो उसकी अपनी ख़ुशी का मुख़ालिफ़ है. एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता, और वह मुझे, मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा- मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता. सोचती हूं, क्या ख़ुदा इस जैसे इंसान से कहीं अलग होता है. अपनी एक कविता में वह अपने जज़्बात को कुछ इस तरह बयां करती हैं-
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूं
कि वक़्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी
एक बार जब अमृता प्रीतम से पूछा गया कि ज़िंदगी में उन्हें किस चीज़ ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया तो जवाब में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाते हुए कहा था, 1961 में जब मैं पहली बार रूस गई थी तब ताजिकिस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली, जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बनाकर रहते थे. औरत की नीली और मर्द कि काली आंखों में क्षण-क्षण जिए हुए इश्क़ का जलाल था. पता चला अब कि साठ-सत्तर बरस की उम्र इश्क़ का एक दस्तावेज़ है. मर्द की उठती जवानी थी, जब वह किसी काम से कश्मीर से यहां आया था और उस नीली आंखों वाली सुंदरी की आंखों में खोकर यहीं का होकर रहा गया था और फिर कश्मीर नहीं लौटा. वह दो देशों की नदियों की तरह मिले और उनका पानी एक हो गया. वे यहीं एक कुटिया बनाकर रहने लगे. अब यह कुटिया उनके इश्क़ की दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ़ बांधकर और गले में एक चोग़ा पहनकर जंगल के पेड़ों की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहनकर आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है. वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठकर उनके हाथों उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसी ज़िंदगी नसीब हो. यह ख़ुदा के फ़ज़ल से कहूंगी कि मुझे वह मुराद मिली है.
अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिल्कुल नई बीवी है। एक तो नई इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नई हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नई है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे।
पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरिया वाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अँगोछा पानी से ही भीगा होता है, इस पर साधारण-सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है... ‘‘उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं भीगा हुआ अँगोछा भी सुखा दिया है।’’
इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था। पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की माँ गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पाँच सालों पर जा पड़ी थी... फिर एक-एक कर पाँच साल भी निकल गए थे और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गाँव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, या फिर वह भी गांव से नहीं लौटेगा। मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते थे। पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछे वाली कच्ची जगह को पोतकर अपना चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गये थे। सो अंगूरी शहर आ गयी थी। चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या औरतों से भी घूँघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूँघट झीना हो गया था। वह पैरों में चाँदी के झाँझरें पहनकर छनक-छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गयी थी। एक झाँझर उसके पाँवों में पहनी होती, एक उसकी हँसी में। चाहे वह दिन के अधिकरतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक़ उसके पाँवों के साथ-साथ चलती थी।
‘यह क्या पहना है, अंगूरी ?’’
‘‘यह तो मेरे पैरों की छैल चूड़ी है।’’
‘‘और यह उँगलियों में ?’’
‘‘यह तो बिछुआ है।’’
‘‘और यह बाहों में ?’’
‘‘यह तो पछेला है।’’
‘‘और माथे पर ?’’
‘आलीबन्द कहते हैं इसे।’’
‘‘आज तुमने कमर में कुछ नहीं पहना ?’’
‘‘तगड़ी बहुत भारी लगती है, कल को पहनूंगी। आज तो मैंने तौक भी नहीं पहना। उसका टाँका टूट गया है कल शहर में जाऊँगी, टाँका भी गढ़ाऊँगी और नाक कील भी लाऊँगी। मेरी नाक को नकसा भी था, इत्ता बड़ा, मेरी सास ने दिया नहीं।’’
इस तरह अंगूरी अपने चाँदी के गहने एक नख़रे से पहनती थी, एक नखरे से दिखाती थी।
पीछे जब मौसम फिरा था, अंगूरी का अपनी छोटी कोठरी में दम घुटने लगा था। वह बहुत बार मेरे घर के सामने आ बैठती थी। मेरे घर के आगे नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, और इन पेड़ों के पास ज़रा ऊँची जगह पर एक पुराना कुआँ है। चाहे मुहल्ले का कोई भी आदमी इस कुएँ से पानी नहीं भरता, पर इसके पार एक सरकारी सड़क बन रही है और उस सड़क के मज़दूर कई बार इस कुएँ को चला लेते हैं जिससे कुएँ के गिर्द अकसर पानी गिरा होता है और यह जगह बड़ी ठण्डी रहती है।
‘‘क्या पढ़ती हो बीबीजी ?’’ एक दिन अंगूरी जब आयी, मैं नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर एक किताब पढ़ रही थी।
‘तुम पढ़ोगी ?’’
‘‘मेरे को पढ़ना नहीं आता।’’
‘‘सीख लो।’’
‘‘ना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘औरतों को पाप लगता है पढ़ने से।’’
‘‘औरतों को पाप लगता है, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘ना, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘यह तुम्हें किसने कहा है ?"
‘‘मैं जानती हूँ।’’
"फिर तो मैं पढ़ती हूँ मुझे पाप लगेगा?’’
‘‘सहर की औरत को पाप नहीं लगता, गांव की औरत को पाप लगता
मैं भी हँस पड़ी और अंगूरी भी। अंगूरी ने जो कुछ सीखा-सुना हुआ था, उसमें कोई शंका नहीं थी, इसलिए मैंने उससे कुछ न कहा। वह अगर हँसती-खेलती अपनी जिन्दगी के दायरे में सुखी रह सकती थी, तो उसके लिए यही ठीक था। वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का मांस गुथा हुआ था। कहते हैं- औरत आटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का मांस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का मांस बिलकुल ख़मीरे आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का मांस इतना सख़्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो।... मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिण्डलियों की ओर... वह इतने सख़्त मैदे की तरह गुथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने क़द का, ढलके हुए मुँह का, कसोरे जैसा और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर उसके ख़ाविन्द के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आटे की इस घनी गुथी लोई को पकाकर खाने का हक़दार नहीं- वह इस लोई को ढककर रखने वाला कठवत है। इस तुलना से मुझे खुद ही हंसी आ गई। पर मैंने अंगूरी को इस तुलना का आभास नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए उससे मैं उसके गाँव की छोटी-छोटी बातें करने लगी।
माँ-बाप की, बहन-भाइयों की, और खेतों-खलिहानों की बातें करते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘अंगूरी, तुम्हारे गांव में शादी कैसे होती है ?’’
‘‘लड़की छोटी-सी होती है। पाँच-सात साल की, जब वह किसी के पाँव पूज लेती है।’’
‘‘कैसे पूजती है पाँव?’’
‘लड़की का बाप जाता है, फूलों की एक थाली ले जाता है, साथ में रुपये, और लड़के के आगे रख देता है।’’
‘‘यह तो एक तरह से बाप ने पाँव पूज लिये। लड़की ने कैसे पूजे ?’’
‘‘लड़की की तरफ़ से तो पूजे।’’
‘‘पर लड़की ने तो उसे देखा भी नहीं?’’
‘‘लड़कियाँ नहीं देखतीं।’’
‘‘लड़कियाँ अपने होने वाला ख़ाविन्द को नहीं देखतीं।’’
‘‘ना’’
‘‘कोई भी लड़की नहीं देखती?’’
‘‘ना’’
पहले तो अंगूरी ने ‘ना’ कर दी पर फिर कुछ सोच-सोचकर कहने लगी, ‘‘जो लड़कियाँ प्रेम करती हैं, वे देखती हैं।’’
‘‘तुम्हारे गाँव में लड़कियाँ प्रेम करती हैं?’’
‘‘कोई-कोई’’
‘‘जो प्रेम करती हैं, उनको पाप नहीं लगता?’’ मुझे असल में अंगूरी की वह बात स्मरण हो आयी थी कि औरत को पढ़ने से पाप लगता है। इसलिए मैंने सोचा कि उस हिसाब से प्रेम करने से भी पाप लगता होगा।
‘‘पाप लगता है, बड़ा पाप लगता है।’’ अंगूरी ने जल्दी से कहा।
‘‘अगर पाप लगता है तो फिर वे क्यों प्रेम करती हैं ?’’
‘‘जे तो...बात यह होती है कि कोई आदमी जब किसी की छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।’’
‘‘कोई क्या खिला देता है उसको?’’
‘‘एक जंगली बूटी होती है। बस वही पान में डालकर या मिठाई में डाल कर खिला देता है। छोकरी उससे प्रेम करने लग जाती है। फिर उसे वही अच्छा लगता है, दुनिया का और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘सच?’’
‘‘मैं जानती हूँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है।’’
‘‘किसे देखा था ?’’
‘‘मेरी एक सखी थी। इत्ती बड़ी थी मेरे से।’
‘‘फिर?’’
‘‘फिर क्या? वह तो पागल हो गयी उसके पीछे। सहर चली गयी उसके साथ।’’
‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलाई थी ?’’
‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलाई थी ?’’
‘‘बरफी में डालकर खिलाई थी। और नहीं तो क्या, वह ऐसे ही अपने माँ-बाप को छोड़कर चली जाती? वह उसको बहुत चीज़ें लाकर देता था। सहर से धोती लाता था, चूड़ियाँ भी लाता था शीशे की, और मोतियों की माला भी।’’
‘‘ये तो चीज़ें हुईं न! पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि उसने जंगली बूटी खिलाई थी!’’
‘‘नहीं खिलाई थी तो फिर वह उसको प्रेम क्यों करने लग गयी?’’
‘‘प्रेम तो यों भी हो जाता है।’’
‘‘नहीं, ऐसे नहीं होता। जिससे माँ-बाप बुरा मान जाएँ, भला उससे प्रेम कैसे हो सकता है ?’’
‘‘तूने वह जंगली बूटी देखी है?’’
‘‘मैंने नहीं देखी। वो तो बड़ी दूर से लाते हैं। फिर छिपाकर मिठाई में डाल देते हैं, या पान में डाल देते हैं। मेरी माँ ने तो पहले ही बता दिया था कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाना।’’
‘‘तूने बहुत अच्छा किया कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाई। पर तेरी उस सखी ने कैसे खा ली?’’
‘‘अपना किया पाएगी’’
‘‘किया पाएगी’’ कहने को तो अंगूरी ने कह दिया पर फिर शायद उसे सहेली का स्नेह याद आ गया या तरस आ गया, दुखे मन से कहने लगी, ‘‘बावरी हो गई थी बेचारी! बालों में कंघी भी नहीं लगाती थी। रात को उठ-उठकर गाती थी।’’
‘‘क्या गाती थी?’’
‘‘पता नहीं, क्या गाती थी। जो कोई जड़ी बूटी खा लेती है, बहुत गाती है। रोती भी बहुत है।’’
बात गाने से रोने पर आ पहुँची थी। इसलिए मैंने अंगूरी से और कुछ न पूछा।
और अब थोड़े ही दिनों की बात है। एक दिन अंगूरी नीम के पेड़ के नीचे चुपचाप मेरे पास आ खड़ी हुई। पहले जब अंगूरी आया करती थी तो छन-छन करती, बीस गज़ दूर से ही उसके आने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी, पर आज उसके पैरों की झाँझरें पता नहीं कहाँ खोयी हुई थीं। मैंने किताब से सिर उठाया और पूछा, ‘‘क्या बात है, अंगूरी ?’’
अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही और फिर धीरे से बोली "मुझे पढना सीखा दो बीबी जी"... और चुपचाप फिर मेरी आँखों में देखने लगी...
लगता है इसने भी जंगली बूटी खा ली...
"क्यूँ अब तुम्हे पाप नहीं लगेगा, अंगूरी"... यह दोपहर की बात थी शाम को जब मैं बाहर आई तो वह वहीं नीम के पेड़ के नीचे बैठी थी और उसके होंठो पर गीत था पर बिलकुल सिसकी जैसा...मेरी मुंदरी में लागो नगीन्वा, हो बैरी कैसे काटूँ जोबनावा ..अंगूरी ने मेरे पैरों की आहट सुन ली और चुप हो गयी...
"तुम तो बहुत मीठा गाती हो... आगे सुनाओ न गा कर"
अंगूरी ने आपने कांपते आंसू वही पलकों में रोक लिए और उदास लफ़्ज़ों में बोली "मुझे गाना नहीं आता है"
"आता तो है"
"यह तो मेरी सखी गाती थी उसी से सुना था"
"अच्छा मुझे भी सुनाओ पूरा"
"ऐसे ही गिनती है बरस की... चार महीने ठंडी होती है, चार महीने गर्मी और चार महीने बरखा"... और उसने बारह महीने का हिसाब ऐसे गिना दिया जैसे वह अपनी उँगलियों पर कुछ गिन रही हो...
"अंगूरी?"
और वह एक टक मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी... मन मैं आया की पूछूँ की कहीं तुमने जंगली बूटी तो नहीं खा ली है... पर पूछा की "तुमने रोटी खाई?"
"अभी नहीं"
"सवेरे बनाई थी? चाय पी तुने?"
"चाय? आज तो दूध ही नहीं लिया"
"क्यों नहीं लिया दूध?"
"दूध तो वह रामतारा..."
वह हमारे मोहल्ले का चौकीदार था, पहले वह हमसे चाय ले कर पीता था पर जब से अंगूरी आई थी वह सवेरे कहीं से दूध ले आता था, अंगूरी के चूल्हे पर गर्म कर के चाय बनाता और अंगूरी, प्रभाती और रामतारा तीनो मिल कर चाय पीते... और तभी याद आया की रामतारा तो तीन दिन से अपने गांव गया हुआ है।
मुझे दुखी हुई हंसी आई और कहा कि क्या तूने तीन दिन से चाय नही पी है?
"ना"
"और रोटी भी नहीं खायी है न"
अंगूरी से कुछ बोला न गया... बस आँखों में उदासी भरे वही खड़ी रही...
मेरी आँखों के सामने रामतारे की आकृति घूम गयी... बड़े फुर्तीले हाथ पांव, अच्छा बोलने, पहनने का सलीका था।
"अंगूरी... कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली तूने?"
अंगूरी के आंसू बह निकले और गीले अक्षरों से बोली मैंने तो सिर्फ चाय पी थी... कसम लगे न कभी उसके हाथ से पान खाया, न मिठाई... सिर्फ चाय... जाने उसने चाय में ही... और अंगूरी की बाकी आवाज़ आंसुओ में डूब गयी।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
न हींग लगे, न फिटकरी और रंग चौखा. यह कहावत सनाय की खेती पर पूरी तरह से लागू होती है, क्योंकि सनाय की खेती में लागत बहुत कम आती है और आमदनी ख़ूब होती है. सबसे बड़ी बात, इसे न तो उपजाऊ ज़मीन की ज़रूरत होती है, न ज़्यादा सिंचाई जल की, न ज़्यादा खाद की और न ही ज़्यादा कीटनाशकों की. इसे किसी ख़ास देखभाल की भी ज़रूरत नहीं होती. तो हुआ न फ़ायदा का सौदा. इसके फ़ायदों को देखते हुए किसान सनाय की खेती करने लगे हैं. बहुत से किसानों ने सनाय की खेती करके बंजर ज़मीन को हराभरा बना दिया है. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं राजस्थान के जोधपुर के नारायणदास प्रजापति. उन्होंने बंजर ज़मीन पर सनाय की खेती की और इतनी कामयाबी हासिल कर ली कि आज उनका उद्योग भी है. उन्होंने अरब देशों से सनाय के बीज मंगवाकर इसकी खेती शुरू की थी. अब वह कई देशों में सनाय की पत्तियों का निर्यात करते हैं. शुरू में उन्हें अपनी फ़सल बेचने में परेशानी काफ़ी हुई. फिर उन्होंने ऐसे व्यापारियों को ढूंढा, जो सनाय की पत्तियां ख़रीदते हैं. जब एक बार व्यापारियों से उनका संपर्क हो गया, तो फिर उन्हें फ़सल बेचने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने अपना उद्योग स्थापित कर लिया. उन्होंने एक प्रशिक्षण केंद्र भी खोला, जहां किसानों को सनाय की खेती की जानकारी दी जाती है. उन्होंने सनाय पर आधारित एक संग्रहालय भी बनाया हुआ है. उनके परिवार के सदस्य भी उनका हाथ बटा रहे हैं. उनके यहां से प्रशिक्षण पाकर बहुत से किसान सनाय की खेती करने लगे हैं.
सनाय औषधीय पौधा है. इसे स्वर्णमुखी, सोनामुखी और सुनामुखी भी कहा जाता है. यह झाड़ीनुमा पौधा है. इसकी ऊंचाई 120 सेंटीमीटर तक होती है. भारत में यह अरब देश से आया और सबसे पहले तमिलनाडु में इसकी खेती शुरू हुई. इसके बाद देश के अन्य राज्यों में भी इसकी खेती शुरू हो गई. नतीजतन, आज भारत सनाय की खेती के मामले में दुनियाभर में पहले स्थान पर है. यह बहुवर्षीय पौधा है. एक बार बिजाई के बाद यह पांच साल तक उपज देता है. सनाय की ख़ासियत यह है कि यह बंजर ज़मीन में भी उगाया जा सकता है. रेतीली और दोमट भूमि इसके लिए सबसे ज़्यादा बेहतर है. लवणीय भूमि इसके लिए ठीक नहीं होती. जिस भूमि में बरसात का पानी थोड़ा भी रुकता है, उसमें सनाय नहीं उगाना चाहिए, क्योंकि वहां यह पनप नहीं पाता. इसकी जड़ें गल जाती हैं, जिससे पौधा सूख जाता है. इसे ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती. इसलिए यह बहुत कम वर्षा वाले इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. किसानों को इसकी सिंचाई पर ज़्यादा पैसे ख़र्च नहीं करने पड़ते. पौधे के बढ़ने पर इसकी जड़ें ज़मीन से पानी सोख लेती हैं. यह पौधा चार डिग्री से 50 डिग्री सैल्सियस तापमान में भी ख़ूब फलता-फूलता है. देश के शुष्क और बंजर इलाक़ों में इसकी खेती की जा सकती है.
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक़ सनाय की बिजाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितम्बर का वक़्त अच्छा माना जाता है. इसकी बिजाई के लिए किसी ख़ास तैयारी की ज़रूरत नहीं होती. खेत में एक-दो जुताई करना ही काफ़ी है. इसकी बिजाई एक फ़ुट की दूरी पर करनी चाहिए. सनाय की एक ख़ासियत यह भी है कि इसमें किसी भी तरह की कोई बीमारी नहीं लगती. हालांकि बरसात के मौसम में कभी-कभार इसके पत्तों पर काले धब्बे आ जाते हैं, लेकिन धूप निकलने पर ये धब्बे ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाते हैं. इसलिए फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है. सनाय को किसी भी तरह की ज़्यादा खाद और रसायनों की ज़रूरत नहीं होती. कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी इसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचाते. इसलिए इसे किसी विशेष देखभाल की ज़रूरत नहीं होती. बिजाई के तक़रीबन सौ दिन बाद इसकी पत्तियां काटी जा सकती हैं. पौधों को ज़मीन से पांच इंच ऊपर काटना चाहिए, ताकि फिर से पौधे में पत्तियां उग सकें. कटाई वक़्त पर कर लेनी चाहिए. दूसरी कटाई 70 दिन बाद की जा सकती है, जबकि तीसरी कटाई 60 दिन में की जा सकती है. दोबारा बिजाई के लिए इसके बीज प्राप्त करने के लिए स्वस्थ पौधों को छोड़ देना चाहिए. इनकी कटाई नहीं करनी चाहिए. इससे इनमें फलियां लग जाएंगी. पकने पर फलियां भूरे रंग की हो जाती हैं. इन फलियों को धूप में सुखाकर इनके बीज निकाल लेने चाहिए. यही बीज बाद में नई फ़सल उगाने में काम आएंगे.
पत्तियों को सुखाते वक़्त ध्यान रखना चाहिए कि इनका रंग हरा रहे. ताकि बाज़ार में इनकी अच्छी क़ीमत मिल सके. टहनियों की छोटी-छोटी ढेरियां बनाकर इन्हें छाया में सुखाना चाहिए. इनके सूख जाने पर इन्हें किसी तिरपाल पर झाड़ देना चाहिए, जिससे पत्तियां टहनी से अलग हो जाएं. फिर इन्हें बोरियों में भर देना चाहिए. अब सनाय बिक्री के लिए तैयार है. सनाय औषधीय पौधा है, इसलिए बाज़ार में इसकी ख़ासी मांग है. सनाय की पत्तियों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी और एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में किया जाता है. इससे पेट संबंधी दवाएं बनाई जाती हैं. बड़े स्तर पर खेती करने पर दवा निर्माता खेत से ही सनाय की पत्तियां ख़रीद लेते हैं, जिससे किसानों को बिक्री के लिए बाज़ार जाना नहीं पड़ता. सनाय अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, चीन सहित कई देशों में निर्यात किया जाता है. इससे भारत को हर साल तीस करोड़ रुपये से ज़्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है.
बहरहाल, जिन लोगों को कृषि की ज़्यादा जानकारी नहीं है, वे भी सनाय की खेती करके मुनाफ़ा हासिल कर सकते हैं.
राहुल मिश्रा
एक ट्रक ड्राइवर ने रात के ढाबे पर सुनी बातें एक कागज पर उतारीं, और उन्हें लिफाफे में बंद कर दिया।
पते की जगह लिखा के-25, हौज खास, नई दिल्ली।
वो उस औरत से कभी मिला नहीं था।
हफ्ते भर में जवाब आ गया। एक पोस्टकार्ड।
और उस ड्राइवर का नाम हमेशा के लिए बदल गया।
साल था 1979। वो कोलकाता में रहता था और सड़क पर ही उसकी जिंदगी कटती थी। किसी साहित्यिक हलके में उसे कोई नहीं जानता था, और उसने कोई अदबी दावा भी नहीं किया था। उसने बस वो लिखा जो ड्राइवर आपस में बोलते हैं। नींद। उधार। घर से दूरी। अगली फेरी।
पोस्टकार्ड पर लिखा था कि यह लिखत अनोखी है और अगले अंक में छपेगी।
वो पत्रिका थी नागमणि।
और उसे एक औरत अपने घर के भीतर से निकालती थी। रचना चुनने से लेकर सजावट, छपाई, डाक और लिफाफों पर पते लिखने तक। तैंतीस बरस।
उसके पास तब तक देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान आ चुके थे।
और वो फिर भी लिफाफों पर पते अपने हाथ से लिख रही थी।
क्यों?
इसका जवाब उस पोस्टकार्ड में नहीं है।
वो जवाब एक टेलीफोन बूथ में खड़ा है। जहां बरसों पहले उसने एक नंबर मिलाना शुरू किया था, और बीच में ही चोंगा रख दिया था।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
गुजरांवाला। 1919 की अगस्त की आखिरी तारीख। एक अकेली बच्ची पैदा हुई। मां स्कूल में पढ़ाती थीं। पिता कविता लिखते थे, ब्रजभाषा के जानकार थे, एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे, और सिख धर्म के प्रचारक भी थे।
घर में धर्म की हवा थी। पर बच्ची सवाल पूछती थी।
घर में मेहमान आते तो कुछ के लिए अलग बर्तन निकाले जाते थे। जो अपने नहीं थे, उनके लिए अलग। बच्ची ने पूछा कि ऐसा क्यों। यह उसकी पहली बगावत थी, और इसका जिक्र उसने बाद में खुद किया।
फिर वो हुआ जिसने सब बदल दिया।
मां बीमार पड़ीं। बच्ची ने बड़ों से सुन रखा था कि बच्चों की बात ईश्वर नहीं टालता। वो मां की खाट के पास खड़ी होकर दुआ मांगती रही। पूरे यकीन के साथ, कि अब कुछ नहीं होगा।
मां चली गईं। बच्ची ग्यारह की थी।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसी दिन उसका ईश्वर पर से भरोसा उठ गया।
और वो भरोसा जिंदगी भर लौटकर नहीं आया।
पिता ने उसे छंद सिखाया था, बहर सिखाई थी। आठ बरस की उम्र में वो पिता के साथ बैठकर तुक मिलाने लगी थी। मां के जाने के बाद वही तुकें उसका इकलौता साथ बन गईं।
पिता चाहते थे कि वो भक्ति की कविता लिखे।
उसने वो लिखा जो उसे लिखना था।
घर लाहौर आ गया। बचपन में ही उसकी मंगनी तय हो चुकी थी लड़का अनारकली बाजार के एक होजरी व्यापारी का बेटा था, जो आगे चलकर संपादक बना।
सोलह की उम्र में शादी हुई। और शादी के साथ उसका नाम बदल गया। अमृत कौर से अमृता प्रीतम।
जो नाम उसने खुद नहीं चुना था, वही आगे चलकर पंजाबी अदब की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
उसी बरस उसका पहला कविता संग्रह छपा। नाम था अमृत लहरां।
अब एक छोटा-सा दृश्य, जिस पर आगे चलकर बहुत कुछ टिकने वाला है।
उसने संगीत और नृत्य की तालीम ली थी, और लाहौर रेडियो पर लोकगीत गाने लगी थी। बाद में वो अपनी कविताएं भी रेडियो पर पढ़ने लगी।
पति को यह पसंद नहीं था।
उन्होंने एक पेशकश की कि रेडियो से जितने पैसे मिलते हैं, उतने वो खुद दे देंगे।
उसने मना कर दिया।
क्योंकि बात पैसे की थी ही नहीं। बात उन लोगों की थी जो दूसरी तरफ बैठकर सुन रहे थे।
यह उस औरत का पहला फैसला था जो उसने अपने घर के भीतर लिया, और जिसका कोई गवाह नहीं था।
फिर उसका सुर बदलने लगा।
1943 में बंगाल में अकाल पड़ा। लाखों लोग भूख से मरे। अगले बरस उसका जो संग्रह आया, उसमें प्रेम कविताएं नहीं थीं। उसमें लोगों की पीड़ा थी। नाम भी वही रखा लोक पीड़।
और फिर 1947 आया।
लाहौर छूटा। वो शहर, जहां उसकी जवानी थी, जहां उसका घर था, जहां उसकी किताबें छपी थीं। वो देहरादून पहुंची, फिर काम की तलाश में दिल्ली आई।
और उसी रास्ते पर चलती एक रेल में, अट्ठाईस बरस की उम्र में, उसने कागज के एक टुकड़े पर वो नज्म लिखी जो आज भी सरहद के दोनों तरफ पढ़ी जाती है।
उसने खुद लिखा है कि उस रात आंखों में नींद नहीं थी। बाहर घुप अंधेरा था। हवा ऐसे कराह रही थी जैसे इतिहास की गोद में बैठकर रो रही हो। कहीं ऊंचे पेड़ खड़े थे, और कहीं पेड़ भी नहीं थे सिर्फ उजाड़ था, और उस उजाड़ के टीले कब्रों जैसे लग रहे थे।
और उसके भीतर वारिस शाह की एक पंक्ति घूम रही थी। कि मरे हुओं और बिछड़े हुओं को कौन मिलाता है।
नज्म: "अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कितों कबरां विचों बोल!
ते अज्ज किताब-ए-इश्क दा, कोई अगला वरका फोल!
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण,
अज्ज लखां धियां रोंदियां, तेनूं वारिस शाह नूं कहण!
उठ दर्दमंदां देया दरदिया, उठ तक अपना पंजाब,
अज्ज बेले लाशां बिछियां, ते लहू दी भरी चनाब!..."
नज्म वारिस शाह के नाम लिखी गई। उसी वारिस शाह के, जिसकी और उसकी जन्मभूमि एक थी।
दिल्ली में उसे आकाशवाणी की पंजाबी सेवा में नौकरी मिली। और उन्हीं बरसों में लाहौर से उजड़कर आए लेखकों और कलाकारों को पुनर्वास आयुक्त एम.एस. रंधावा ने दिल्ली में प्लॉट दिलवाए।
पड़ोस में भी वही लोग थे, जिनके घर पीछे छूट गए थे।
उसका प्लॉट था के-25, हौज खास।
यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है, क्योंकि इस पर अक्सर बहस होती है। यह जमीन ज्ञानपीठ के पैसों से नहीं खरीदी गई थी। ज्ञानपीठ उन्हें इसके दो दशक से भी ज्यादा बाद मिला, जबकि नागमणि 1966 से इसी पते से निकल रही थी। जमीन पुनर्वास में मिली थी। घर उस जमीन पर उन्होंने खुद खड़ा किया।
पहले पिता का घर। फिर पति का घर। और अब पहली बार, अपना घर।
जिस औरत का पता उससे छिन गया था, उसे एक नया पता मिला। और आगे चलकर वो यही पता हजारों लिफाफों पर अपने हाथ से लिखने वाली थी।
1956 में उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला। पंजाबी में किसी रचना के लिए यह सम्मान पाने वाली वो पहली औरत थी।
जिस लंबी कविता पर यह सम्मान मिला, उसका नाम था सुनेहड़े। यानी संदेश।
पर संदेश किसके नाम थे?
इसके लिए बारह बरस पीछे चलना होगा।
1944। लाहौर और अमृतसर के बीच एक गांव है, प्रीत नगर। वहां एक मुशायरा हुआ, जिसमें पंजाबी और उर्दू दोनों तरफ के शायर जुटे थे।
वो तब पच्चीस के आसपास थी, और शादीशुदा थी।
उसी मंच पर उसने पहली बार एक शायर को सुना।
उसने बाद में लिखा कि उसे आज तक नहीं पता कि उसे उन लफ्जों के जादू ने बांधा था, या उस खामोश निगाह ने।
मुशायरा आधी रात के बाद खत्म हुआ। लौटती बस तक चलते हुए उसे सिर्फ इतना होश था कि वो उस आदमी की परछाईं में चल रही है।
नाम साहिर लुधियानवी।
वो उर्दू में लिखता था, वो पंजाबी में। और आगे के बरसों में उन दोनों के बीच जो सबसे ज्यादा चला, वो न शायरी थी, न बातचीत।
चुप्पी थी।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब साहिर लाहौर में उससे मिलने आता, तो लगता जैसे उसकी अपनी खामोशी का ही एक हिस्सा बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया हो, और फिर चुपचाप उठकर चला गया हो।
वो बैठकर सिगरेट पीता था। आधी पीकर बुझा देता, फिर नई सुलगा लेता।
वो चला जाता, तो कमरे में अधजली सिगरेटें बची रह जातीं।
और वो उन्हें उठाकर संभालकर रख लेती थी।
बाद में उन्हीं को सुलगाती थी।
उसने खुद लिखा है कि जब वो उनमें से कोई सिगरेट उंगलियों में पकड़ती, तो उसे लगता जैसे उसने उस आदमी का हाथ छू लिया हो। और इसी तरह उसे सिगरेट की आदत लगी।
यह किसी उपन्यास का दृश्य नहीं है। यह उसने अपनी किताब में खुद दर्ज किया है, अपने नाम के साथ यह जानते हुए कि उस जमाने में एक औरत का इतना साफ लिखना कितना बड़ा हंगामा खड़ा करेगा।
एक हिंदी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उसने अपने और साहिर के रिश्ते को एक ही वाक्य में बांध दिया था। कि साहिर उसका सार्त्र था, और वो उसकी सीमोन।
पर सार्त्र कभी दिल्ली नहीं आया।
बंटवारे ने दोनों को अलग-अलग शहर दे दिए। वो फिल्मों की दुनिया में चला गया, वो दिल्ली में रह गई। बीच में रह गईं सिर्फ चिट्ठियां।
उन चिट्ठियों में उसने उसे अपना शायर लिखा। अपना महबूब लिखा। अपना खुदा लिखा।
और उसने?
उसने उम्र भर शादी नहीं की। पर उसे अपने साथ भी नहीं रखा। एक बार उसने अपनी मां को बताया जरूर था कि यह औरत उनकी बहू हो सकती थी।
बता देना और साथ ले जाना, दो अलग बातें हैं।
सुनेहड़े इसी खाली जगह में लिखी गई। संदेशों की एक लंबी कविता, उस आदमी के नाम, जो जवाब नहीं देता था।
उसने खुद कहा है कि इस रिश्ते में ज्यादा दीवानी वो थी, और सुनेहड़े उसी के नाम संदेशों से भरी हुई थी। पर उन संदेशों ने उसे पिघलाया नहीं।
और फिर उसने जो जोड़ा, वो इस पूरी कहानी का सबसे साहसी वाक्य है।
उसने कहा कि उसकी मुहब्बत फिर भी बेकार नहीं गई क्योंकि उसी किताब पर उसे साहित्य अकादेमी मिल गया।
अब वो टेलीफोन बूथ।
सम्मान की खबर मिलने पर उसने सोचा कि यह बात सबसे पहले उसी आदमी को बतानी चाहिए। वो बूथ पर गई और नंबर घुमाना शुरू किया।
घुमाते-घुमाते उसकी नजर वहीं बिकने वाली एक पत्रिका पर पड़ी।
उस पर छपी खबर का शीर्षक था कि साहिर को उसका नया प्यार मिल गया है।
उसने चोंगा रख दिया।
और घर लौट आई।
देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान जिस कविता पर मिला था, उसकी खबर उस आदमी तक पहुंची ही नहीं जिसके लिए वो कविता लिखी गई थी।
उन दोनों के बीच जो चुप्पी इसके बाद पसरी, उस पर उसने आगे चलकर एक पूरी रचना लिखी। नाम रखा सात बरस।
1960 में उसने वो शादी छोड़ दी जो बचपन में तय हुई थी।
और यहां उस आदमी का जिक्र जरूरी है, जिसका नाम इस कहानी में सबसे कम लिया जाता है।
प्रीतम सिंह।
उन्हें आसानी से खलनायक बनाया जा सकता था। पर तथ्य दूसरी तरफ जाते हैं।
अमृता ने खुद एक इंटरव्यू में कहा है कि उसे बहुत कम उम्र में ब्याह दिया गया था, और शादी के बाद उसे वो माहौल नहीं मिला जो एक लेखक को चाहिए होता है इसलिए उसने तय किया कि वो अपना माहौल खुद बनाएगी।
और यह भी दर्ज है कि वो घर से दुश्मनी लेकर नहीं निकली। दोनों बच्चे उसके साथ आए। और उस आदमी ने खुद उसे जाने के लिए कहा, ताकि वो लेखक की जिंदगी जी सके।
जिस आदमी ने कभी उसका रेडियो पर पढ़ना पसंद नहीं किया था, उसी ने आखिर में उसे लिखने के लिए जाने दिया। पर उस प्रीतम सिंह को वह अपने नाम में साथ ले आई और कभी नहीं हटाया।
अगले ही बरस रेडियो की नौकरी भी छूट गई।
अब उसके पास न पति था, न नौकरी, न वो शहर जिसमें वो पैदा हुई थी।
और न वो शायर।
पर एक आदमी था।
वो पेशे से चित्रकार था। बंबई में उसने फिल्मों के पोस्टर बनाए थे, गुरुदत्त जैसे लोगों के साथ काम किया था। किसी किताब का कवर बनाने के सिलसिले में उससे मुलाकात हुई थी। फिर वो उसे रोज दफ्तर छोड़ने और लेने लगा पहले साइकिल पर, फिर स्कूटर पर। बच्चों को स्कूल भी वही छोड़ता था।
उसका असली नाम इंदरजीत था। उसने अपना नाम बदलकर इमरोज रख लिया।
इमरोज फारसी और उर्दू का शब्द है। इसका मतलब है आज।
एक किस्सा और चलता है कि यह नाम अंग्रेजी के 'आई एम रोज' से बना। जिन लोगों ने यह लिखा है, उन्होंने खुद लिखा है कि उन्होंने यह कहीं सुना था। दर्ज कहीं नहीं है। जो दर्ज है वो यही है कि इमरोज का मतलब आज होता है।
और नाम बेवजह नहीं था।
एक औरत जिसका सारा बीता हुआ कल सरहद के उस पार छूट गया था, उसके साथ अब एक आदमी था जिसका नाम ही आज था।
अब वो बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे अजीब और सबसे सच्ची बात है।
इमरोज ने खुद बताया है कि जब वो उन्हें स्कूटर पर बिठाकर ले जाते थे, तो वो पीछे बैठी-बैठी अपनी उंगली से उनकी पीठ पर एक नाम लिखा करती थीं।
साहिर।
किसी ने इमरोज से पूछा कि यह उन्हें चुभता नहीं था।
उन्होंने कहा कि वो नाम उसकी पीठ पर भी था और मेरी पीठ पर भी। फिर एतराज किस बात का।
लेखिका उमा त्रिलोक ने यही सवाल दूसरे ढंग से पूछा। इमरोज ने कहा कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया था और जहाँ मुहब्बत में अहंकार न हो, बहस न हो, बनावटी इंतजाम न हों और हिसाब न हो, वहाँ मुश्किल पैदा ही नहीं होती।
पर सबसे बड़ी बात यह नहीं है।
सबसे बड़ी बात यह है कि आगे चलकर साहिर और इमरोज अच्छे दोस्त बन गए।
और साहिर की एक किताब का कवर इमरोज ने ही बनाया।
जिस आदमी का नाम उसकी पीठ पर लिखा जाता था, उसी की किताब उसने अपने हाथों से सजाई।
1980 में साहिर चला गया।
जिस दिन यह खबर आई, उसने अपनी डायरी में लिखा कि आज उसका खुदा मर गया।
जिस आदमी ने उसे कभी अपने साथ नहीं रखा, उसके जाने पर उसने अपना एक हिस्सा भी विदा कर दिया।
पर 1980 अभी दूर था। उससे चौदह बरस पहले, इसी घर में एक और काम शुरू हो चुका था।
1966। इमरोज और अमृता ने एक पत्रिका शुरू की। सुझाव उनके दोस्त और कवि सती कुमार का था। सजावट इमरोज ने संभाली। नाम रखा गया नागमणि।
नागमणि, यानी वो मणि जो लोककथाओं में साँप के सिर में होती है, और अंधेरे में चमकती है।
नाम भी बेवजह नहीं था।
पत्रिका का कागज हल्का भूरा रखा गया। एक कवि ने बताया कि इसकी वजह पूछने पर उसने कहा था कि रंगों के पास भी अपने भाव होते हैं।
किसी नामी लेखक ने ताना मारा कि इस कागज की वजह से रद्दी वाले तक नागमणि लेने से कतराते हैं।
उसका जवाब तुरंत आया नागमणि ही इकलौती पंजाबी पत्रिका है जो रद्दी में नहीं जाती।
पर असली बात कागज नहीं थी। असली बात डाक थी।
उस दौर की बाकी पत्रिकाओं में रचना भेजकर लेखक महीनों चुप्पी झेलते थे। नागमणि में तीन दिन के भीतर पोस्टकार्ड चला जाता था कि रचना मिल गई। और हफ्ते भर के भीतर हाँ या ना, वजह के साथ।
नौजवान लेखक उन चिट्ठियों को तमगे की तरह दिखाते थे। जिनकी रचनाएं लौट आतीं, वो चिढ़कर इन लेखकों को दरबारी कहते थे।
पर उन चिट्ठियों ने जो बनाया, वो अब पंजाबी साहित्य का इतिहास है।
जालंधर में एक दिहाड़ी मजदूर था। उसने सड़क किनारे छोड़ दिया गया एक नवजात देखा, और उस बच्चे के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनकर 1970 में नागमणि को भेज दी। छपने तक वो ज्ञानी कर रहा था, और उसका मास्टर पत्रिका में उसका नाम देखकर दंग रह गया।
आगे चलकर वो प्रेम गोरखी कहलाया, और दबे-कुचले लोगों का दर्द लिखने वाला बड़ा कहानीकार माना गया। उसने खुद कहा है कि वो ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं था, उस औरत ने उसे लेखक बना दिया।
सिक्किम में तैनात एक फौजी कप्तान ने 1971 में एक सिपाही की कहानी लिखी, जो अपनी गर्भवती पत्नी को घर छोड़कर गया और जंग की वजह से लौट नहीं सका। कप्तान का नाम था जसबीर भुल्लर। वो कहानी पंजाबी की सबसे अच्छी फौजी कहानियों में गिनी जाती है।
जवाब में उसे लिखा गया कि फौज की जिंदगी पर गहराई से लिखा ही नहीं गया है, इसलिए ऐसी और कहानियां आनी चाहिए।
एक राजमिस्त्री था, किरपाल कजाक। उसने घुमंतू कबीलों पर जो काम किया, उसे दुनिया ने सराहा।
और एक बागी कवि था, पाश। जब वो जेल में था, उसकी कविताएं नागमणि के मुखपृष्ठ पर छपीं।
एक बार उसने अपनी प्रेमिका की छोटी-सी तस्वीर भिजवाई, अपनी विदा वाली कविता के साथ, और झिझकते हुए गुजारिश की कि चेहरा ऐसे बनाया जाए कि कोई पहचान न सके।
अगले अंक में कविता के साथ एक पेड़ छपा। और उस पेड़ के तने में एक चेहरा छिपा था, जिसे शायद सिर्फ दो लोग पहचान सकते थे।
और वो कोलकाता वाला ट्रक ड्राइवर?
उसका नाम था बलदेव सिंह।
दूसरी रचना भेजने पर उसे पूरा स्तंभ मिल गया। नाम रखा गया सड़कनामा सड़क पर बीतती जिंदगी का ब्योरा। वो स्तंभ पत्रिका के आखिरी अंक तक चला।
और ड्राइवर ने वो नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया। बलदेव सिंह सड़कनामा।
आगे चलकर उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला।
उसने बाद में कहा कि अगर नागमणि न होती, तो उसके वो सब अनुभव शायद वक्त में कहीं खो जाते।
यह कहानी किसी बड़ी लेखिका की नहीं है। यह उस लौटती डाक की कहानी है, जो किसी को पहली बार यह बताती थी कि वो लिख सकता है।
सम्मान उसे मिलते रहे। पद्मश्री। ज्ञानपीठ। बुल्गारिया और फ्रांस के सम्मान। छह बरस राज्यसभा में। और आखिरी बरसों में पद्मविभूषण।
सब उससे सहमत नहीं थे। लंदन में बसे कवि अमरजीत चंदन और चंडीगढ़ के गुरबचन जैसे लेखकों ने खुलकर कहा कि नागमणि का केंद्र हमेशा वो खुद रहीं, और उसकी नकल करने वाले नौजवान लेखकों की एक पूरी कतार खड़ी हो गई।
यह असहमति भी दर्ज होनी चाहिए। क्योंकि जिस पत्रिका ने असहमति को जगह दी, उसकी कहानी में असहमति छिपाना बेईमानी होगी।
नब्बे के दशक के आखिर में खबर आई कि सेहत और खर्च की वजह से पत्रिका बंद हो रही है।
पाठकों ने विरोध किया। पत्रिका चलती रही।
पर 2001 में एक अंक के पन्नों पर एक छोटा-सा नोट छपा। यह आखिरी अंक है।
एक पुराने लेखक ने कहा कि वो रिटायर हो रहा है, पत्रिका वो चला लेगा। कुछ पाठकों ने कहा कि वो ट्रस्ट बना देंगे।
अगले महीने पाठकों के घर डाक आई।
लिफाफे में पत्रिका नहीं थी।
उसमें इमरोज के दस्तखत वाला एक मनीऑर्डर था, और साथ में गुजारिश कि बची हुई सदस्यता की रकम वापस ले ली जाए।
तैंतीस बरस जिस डाक ने लोगों को लेखक बनाया था, वो डाक आखिरी बार पैसे लौटाने आई थी।
और अब वो बात, जिसका जवाब आज तक किसी ने ठीक से नहीं दिया।
अमृता ने वो घर छोड़ दिया था। उस रिश्ते से बाहर निकल आई थी। चालीस बरस किसी और के साथ रहीं।
पर उन्होंने अपने नाम के साथ से प्रीतम कभी नहीं हटाया।
आखिरी दिन तक नहीं।
वजह उन्होंने कहीं नहीं बताई। इसलिए मैं भी नहीं बताऊंगा अंदाजा लगाना इस पन्ने का काम नहीं है।
जो दर्ज है, वो सिर्फ इतना है। बरसों ने उस कड़वाहट को घिस दिया था। और जब प्रीतम सिंह आखिरी दिनों में बीमार पड़े, तो अमृता दिन में दो बार उनके पास जाती थीं। हर बार कुछ घंटे बैठती थीं।
आखिरी दिन तक।
फिर उसकी अपनी बारी आई।
आखिरी बरसों में वो बिस्तर पर थीं। पत्रकार निरुपमा दत्त उनसे मिलने गईं। उन्होंने लिखा है कि उस हालत में भी वो शरारत कर रही थीं, और पूछ रही थीं कि जिंदगी में कोई नया प्रेम आया या नहीं।
उन्होंने अपनी आखिरी नज्मों में से एक उन्हें सुनाई। वो नज्म इमरोज के लिए थी, और उसका मतलब इतना भर था कि वो लौटकर फिर मिलेंगी। कहां, कैसे, यह उन्हें भी नहीं पता था।
"मैं तैनू फिर मिलांगी,
कित्थे? किस तरह? पता नहीं...
शायद तेरे तख़्तयल दी चिंगारी बण के
तेरे कैनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे कैनवास दे उत्ते
इक रहस्यमयी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी!"
निरुपमा ने उसका अनुवाद किया, और उन्होंने वो अनुवाद नींद में जाने से पहले पढ़ लिया।
और एक छोटी-सी बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप बात है।
इमरोज अगर पानी का गिलास लेने भी कमरे से बाहर जाते, तो वो पीछे से लोकगीत की एक पंक्ति पुकार देतीं कि मरती हुई को छोड़कर मत जाना, मेरे साथी।
31 अक्टूबर 2005। वो नींद में चली गईं।
अंतिम संस्कार उनकी अपनी इच्छा के मुताबिक हुआ। कोई भाषण नहीं। कोई भीड़ नहीं। सिर्फ उनके बच्चे और इमरोज उनका शरीर लेकर गए।
जिस औरत की जिंदगी पर देश बहस करता रहा, उसने अपनी विदाई के लिए सिर्फ खामोशी मांगी थी।
और अब आखिरी बात।
उन्होंने वसीयत में लिखा था कि हौज खास वाला घर उनकी याद में वैसा ही रहे, और इमरोज वहीं रहें। उस घर के आँगन में दोनों ने मिलकर एक हरसिंगार लगाया था। खिड़कियों में बोगनवेलिया लटकता था। दीवारों पर इमरोज ने उनका चेहरा बार-बार उतारा था, और उनकी पंक्तियां लैंपशेड, कलमदान और घड़ियों तक पर लिख रखी थीं।
उनके जाने के पांच बरस बाद वो घर बिक गया।
और गिरा दिया गया।
इमरोज उसे गिरते हुए देखने गए थे। अस्सी पार कर चुके थे। रोक कुछ नहीं सकते थे।
मलबे से उन्होंने सिर्फ एक चीज उठाई। दरवाजे की वो नामपट्टी, जिस पर दो नाम साथ लिखे थे।
जिस पते को तैंतीस बरस तक हजारों लिफाफों पर हाथ से लिखा गया, वो पता अब एक ऐसी जगह है जहां जाकर खड़ा नहीं हुआ जा सकता।
अब मेरी बात।
मैं अठारह साल से इसी शहर के समाचार पत्र के दफ्तर में बैठकर तय करता हूं कि किसकी लिखी बात छपेगी और किसकी नहीं। और जिस ट्रक ड्राइवर की चिट्ठी ने यह पूरी कहानी शुरू की, वो चिट्ठी इसी शहर से चली थी।
मुझे यह सोचकर बेचैनी होती है कि आज कोई बलदेव चिट्ठी नहीं लिखता, क्योंकि उसे पता है जवाब नहीं आएगा। अब उनके लिखे के लिए कोई जगह नहीं है।
घर गिर गया। बाग उजड़ गया। हरसिंगार का कोई निशान नहीं बचा।
पर जालंधर का वो दिहाड़ी मजदूर आज एक नाम है। सिक्किम का वो कप्तान आज एक नाम है। कोलकाता का वो ट्रक ड्राइवर आज एक नाम है, और उस नाम का दूसरा हिस्सा उसी पत्रिका ने दिया था।
ये नाम इसलिए हैं क्योंकि किसी ने हफ्ते भर के भीतर जवाब दे दिया था।
उन्होंने अपने पाठकों के नाम एक चिट्ठी में लिखा था कि उनका असली साहित्यिक वारिस अगली पीढ़ी का कोई लेखक होगा।
वो वारिस किसी बड़े घर से नहीं आया। वो ढाबे से आया, मजदूरी से आया, बर्फ में तैनात एक चौकी से आया।
एक आदमी ने उसे कभी जवाब नहीं दिया। और उसने बदले में सैकड़ों लोगों को जवाब देना शुरू कर दिया।
मकान गिर सकता है। जवाब नहीं गिरता।
तीन बातें, जो उन्होंने कहीं नहीं और की थीं।
1. जो रचना आई, उसकी पावती तीन दिन में गई। किसी को महीनों टँगा नहीं छोड़ा गया।
2. ना भी कही, तो वजह के साथ कही। बिना वजह की ना सबसे बड़ी बेइज्जती है।
3. नाम नहीं देखा, लिखत देखी। जिस दिन ड्राइवर की डायरी छपी, उस दिन आलोचक पूछ रहे थे कि क्या यह भी साहित्य है।
यह कहानी उस आदमी तक पहुंचनी चाहिए जो सात समंदर पार बैठा है, जिसका पुराना पता अब किसी और के नाम पर है, और जो अब भी सोचता है कि वहां से जो छूट गया वो लौटेगा नहीं। कुछ चीजें मकान में नहीं रहतीं। वो डाक में रहती हैं।
इस पन्ने पर हर नाम असली होता है, हर तारीख जांची हुई, और जो पुष्ट नहीं होता वो लिखा ही नहीं जाता फिर चाहे वो कितनी भी खूबसूरत बात क्यों न हो।
कोई एक इंसान, जिसने आपको उस वक्त जवाब दिया था जब आप बिल्कुल अनजान थे।
और एक बात मैं जानना चाहता हूं।
डॉ फ़िरदौस ख़ान
आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... कल से वह दिल्ली से बाहर हैं... आज रात भी शायद नींद न आए... चाँद अब भी आसमान में मुस्करा रहा है... उसकी दूधिया चाँदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... चमेली की शाख़ें हवा से झूम रही हैं... मौसम बदल रहा है... हवा में ख़ुनकी है... सोचती हूं कोई किताब ही पढ़ ली जाए... मेज़ पर कृष्ण चंदर की कहानियों की उर्दू की एक किताब रखी है, जिसे कई बार पढ़ चुके हैं...
हमें कृष्ण चंदर की किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है... यह कृष्ण चंदर के लेखन की ख़ासियत रही कि उन्होंने जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी दुश्वारियों को पेश किया, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी जज़्बे को भी अपनी रचनाओं में इस तरह पेश किया कि पढ़ने वाला उसी में खोकर रह गया. उनके उपन्यास मिट्टी के सनम में एक नौजवान की बचपन यादें हैं, जिसका बचपन कश्मीर की हसीन वादियों में बीता. इसे प़ढकर बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं. इसी तरह उनकी कहानी पूरे चांद की रात तो दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया ही नहीं जा सकता है. बानगी देखिए:-
अप्रैल का महीना था. बादाम की डालियां फूलों से लद गई थीं और हवा में बर्फ़ीली ख़ुनकी के बावजूद बहार की लताफ़त आ गई थी. बुलंद व बाला तिनकों के नीचे मख़मली दूब पर कहीं कहीं बर्फ़ के टुकड़े सफ़ेद फूलों की तरह खिले हुए नज़र आ रहे थे. अगले माह तक ये सफ़ेद फूल इसी दूब में जज़्ब हो जाएंगे और दूब का रंग हरा सब्ज़ हो जाएगा और बादाम की शाख़ों पर हरे हरे बादाम पुखराज के नगीनों की तरह झिलमिलाएंगे नीलगूं पहाड़ों के चेहरों से कोहरा दूर होता जाएगा. लेकिन अभी अप्रैल का महीना था. अभी पत्तियां नहीं फूटी थीं. अभी पहाड़ों पर बर्फ़ का कोहरा था. अभी पगडंडियों का सीना भेड़ों की आवाज़ से गूंजा न था. अभी समल की झील पर कंवल के चिराग़ रौशन न हुए थे. झील का गहरा सब्ज़ पानी अपने सीने के अंदर उन लाखों रूपों को छुपाए बैठा था, जो बहार की आमद पर यकायक उसकी सतह पर एक मासूम और बेलोस हंसी की तरह खिल जाएंगे. पुल के किनारे-किनारे बादाम के पेड़ों की शाख़ों पर शिगूफ़े चमकने लगे थे. अप्रैल में ज़मिस्तान की आख़िरी शब में जब बादाम के फूल जागते हैं और बहार की नक़ीब बनकर झील के पानी में अपनी किश्तियां तैराते हैं. फूलों के नन्हे-नन्हे शिकारे सतह आब पर रक्सा व लरज़ा बहार की आमद के मुंतज़िर हैं.
और अब मैं अड़तालीस बरस के बाद लौट के आया हूं. मेरे बेटे मेरे साथ हैं. मेरी बीवी मर चुकी है, लेकिन मेरे बेटों की बेटियां और उनके बच्चे मेरे साथ हैं और हम लोग सैर करते-करते समल झील के किनारे आ निकले हैं और अप्रैल का महीना है और दोपहर से शाम हो गई है और मैं देर तक पुल के किनारे खड़ा बादामों के पेड़ों की क़तारें देखता जाता हूं और ख़ुनक हवा में सफ़ेद शगू़फों के गुच्छे लहराते जाते हैं और पगडंडी की ख़ाक पर से किसी के जाने पहचाने क़दमों की आवाज़ सुनाई नहीं देती. एक हसीन दोशीज़ा लड़की हाथों में एक छोटी सी पोटली दबाए पुल पर से भागती हुई गुज़र जाती है और मेरा दिल धक से रह जाता है. दूर बस्ती में कोई बीवी अपने ख़ाविंद को आवाज़ दे रही है. वह उसे खाने पर बुला रही है. कहीं से एक दरवाज़ा बुलंद होने की आवाज़ आती है और एक रोता हुआ बच्चा यकायक चुप हो जाता है. छतों से धुआं निकल रहा है और परिंदे शोर मचाते हुए एकदम दरख्तों की घनी शाख़ों में अपने पर फड़फड़ाते हैं और फिर एकदम चुप हो जाते हैं. ज़रूर कोई गा रहा है और उसकी आवाज़ गूंजती गूंजती उफ़क़ के उस पार गुम होती जा रही है. मैं पुल को पार करके आगे बढ़ता हूं. मेरे बेटे और उनकी बीवियां और बच्चे मेरे पीछे आ रहे हैं. वे अलग-अलग टोलियों में बटे हुए हैं. यहां पर बादाम के पेड़ों की क़तार ख़त्म हो गई. तल्ला भी ख़त्म हो गया. झील का किनारा है. यह ख़ूबानी का दरख्त है, लेकिन कितना बड़ा हो गया है. मगर किश्ती, यह किश्ती है. मगर क्या यह वही किश्ती है. सामने वह घर है. मेरी पहली बहार का घर. मेरी पूरे चांद की रात की मुहब्बत.
घर में रौशनी है. बच्चों की सदाएं हैं. कोई भारी आवाज़ में गाने लगता है. कोई बुढ़िया चीख़कर उसे चुप करा देती है. मैं सोचता हूं, आधी सदी हो गई. मैंने उस घर को नहीं देखा. देख लेने में क्या हर्ज है. मुझे घर के अंदर घुसते देखकर मेरे घर के सदस्य भी अंदर चले आए थे. बच्चे एक दूसरे से बहुत जल्द मिलजुल गए. हम दोनों आहिस्ता-आहिस्ता बाहर चले आए. आहिस्ता-आहिस्ता झील के किनारे चलते गए. मैंने कहा-मैं आया था. मगर तुम्हें किसी दूसरे नौजवान के साथ देखकर वापस चला गया था. वह बोली-अरे वह तो मेरा सगा भाई था. वह फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी. वह मुझसे मिलने आया था, उसी रोज़ तुम भी आने वाले थे. वह वापस जा रहा था. मैंने उसे रोक लिया कि तुमसे मिलके जाए. तुम फिर आए ही नहीं. वह एकदम संजीदा हो गई. छह बरस मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया. तुम्हारे जाने के बाद मुझे ख़ुदा ने एक बेटा दिया. तुम्हारा बेटा. मगर एक साल बाद वह भी मर गया. चार साल और मैंने तुम्हारी राह देखी, मगर तुम नहीं आए. फिर मैंने शादी कर ली.
हम दोनों चुप हो गए. बच्चे खेलते-खेलते हमारे पास आ गए. उसने मेरी पोती को उठा लिया, मैंने उसके पोते को. और हम ख़ुशी से एक दूसरे को देखने लगे. उसकी पुतलियों में चांद चमक रहा था और वह चांद हैरत और मुसर्रत से कह रहा था- इंसान मर जाते हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं मरती. बहार ख़त्म हो जाती है, लेकिन फिर दूसरी बहार आ जाती है. छोटी-छोटी मुहब्बतें भी ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िंदगी की बड़ी और अज़ीम सच्ची मुहब्बतें हमेशा क़ायम रहती हैं. तुम दोनों पिछले बहार में न थे. यह बहार तुमने देखी. उससे अगली बहार में तुम न होगे. लेकिन ज़िंदगी फिर भी होगी और जवानी भी होगी और ख़ूबसूरती और रानाई और मासूमियत भी. बच्चे हमारी गोद से उतर पड़े, क्योंकि वे अलग से खेलना चाहते थे. वे भागते हुए ख़ूबानी के दरख्त के क़रीब चले गए. जहां किश्ती बंधी थी. मैंने पूछा-यह वही दरख़्त है. उसने मुस्कराकर कहा- नहीं यह दूसरा दरख़्त है.
(पूनम की एक रात में लिखी तहरीर)
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते.
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.
दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं.
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.
ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त. संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.
कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.
एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भी पनाह मांगती है. कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है. जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो, उसे दोज़ख़ की आग का क्या खौफ़. जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो उससे हुआ है. उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है. उस महबूब से जो सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह तो ख़ुदा के नूर का वह क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है. किसी इंसान से हो या ख़ुदा से. जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है. इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है, जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बुल्ले शाह कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी
वह तो अल्लाह को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता. बुल्ले शाह के जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़, बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वह बुल्ले शाह कहलाए. वह जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिद्ध क़िस्सा हीर-रांझा के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की. बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के मुरीद थे. इश्क़े-हक़ीक़ी के बारे में बुल्ले शाह कहते हैं-
इश्क़े-हक़ीक़ी ने मुथ्थी कु़डे
मैनूं दस्सो पिया दा देसा
कियो इश्क़ असां ते आया है
तूं आया है मैं पाया है...
यानी प्रेम के देवता ने मेरा मन चुरा लिया है. मुझे बताओ कि पिया का देश कहां है. इश्क़ मेरे पास क्यों आया है. ओ इश्क़, तू आया है और मैंने तुझे महसूस किया है.
अल्लाह का पहला वर्ण (अरबी, फ़ारसी, उर्दू) है अलिफ़ का आकार 1 के समान होता है. यह परमात्मा की अद्वैतता को इंगित करता है. चूंकि बुल्ले शाह अल्लाह से अलग नहीं होना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा है-
इक्को अलिफ़ पढ़ो छुटकारा आये
यानी मुक्ति के लिए सिर्फ़ अलिफ़ पढ़ना ही काफ़ी है.
इश्क़ में वियोग भी होता है. वियोग में ही प्रेमी गिले-शिकवे करता है. यहां तक कि वह अपने प्रियतम को संगदिल और बेरहम भी कह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
कीह बेदर्दां संग यारी
रोवन अखियां ज़ारो ज़ारी
सानूं गए बेदर्दी छडके
हिजरे संग सीने विच ग़ड के
जिस्मो जिंद नू लै गए क़ढ के
इह गल कर गए हैंसयारी...
यानी बेदर्दी के साथ इश्क़ का क्या कहना. मेरी आंखें तो अविरल आंसू बहाती हैं. वह बेरहम महबूब मेरे सीने में वियोग रूपी कटार घोंपकर, मेरी जान निकालकर ले गया. उसने यह सब ब़डी बेरहमी के साथ किया. प्रेमी को दुनिया की कोई परवाह नहीं होती. वह हर तरह की निंदा सहन कर लेता है. ईश्वर वियोग में उसे तकली़फ महसूस होती है. बुल्ले शाह कहते हैं-
बिरहों आ व़डया विच वेह़डे
ज़ोरों ज़ोर देवे तन घेरे
दारू दर्द नां बझो तेरे
मैं सजनां बाझ मारीनी हां
मित्तर पियारे कारन नी
मैं लोक पियारे कारन नी
मैं लोक अलाहमे लैनी हां...
यानी विरह ने मेरे आंगन में आकर मुझे अपने प्रकोप से बेहोश कर दिया. इसके अलावा तकली़फ दूर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मैं तो प्रियतम के बिना मर रही हूं. मैं अपने प्रिय के लिए लोगों के उलाहने सुन रही हूं. कभी-कभी प्रेमी प्रियतम के उन गहन प्रेम सपनों को देखता है, जिसमें प्रियतम पलभर के लिए दर्शन देकर ओझल हो जाता है. उस व़क्त प्रेमी पी़डा से कराह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
देखो नीं पियारा मैनूं सुफने में छल गया
प्रेमी की ज़िंदगी में एक व़क्त ऐसा भी आता है, जब वह वियोग की रात गुज़र जाती है और फिर मिलन की सुबह आती है. उस व़क्त प्रेमी खुशी से नाच उठता है. वह दूसरों से मुबारकबाद लेना चाहता है. बुल्ले शाह कहते हैं- आओ सैयो रल दियो वधाई
मैं वर पाया रांझा माही...
यानी आओ दोस्तों, सब मिलकर मुझे मुबारकबाद दो. मैंने अपने महबूब यानी अपने खुदा को पा लिया है. हीर की तरह यह रहस्यवादी भी अपने प्रियतम रांझा की तलाश में भटकता रहा. प्रियतम एक जोगी के वेश में आया और प्रेमी ख़ुद को प्रियतम की जोगन कहता है. बुल्ले शाह के शब्दों में-
रांझा जोगिण बण आया
वाह सांगी सांग रचाया
रांझा जोगी ते मैं जुगियाणीं
इस दी खातर भरसां पाणीं
ऐवें पिछली उमर विहाणी
इस हुण मैनूं भरमाया...
यानी प्रियतम योगी के रूप में आया है. बहरुपिए ने ब़डा सुंदर नाटक रचाया है. रांझा एक जोगी है और मैं उसकी जोगन. उसके लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. मेरा पिछला जन्म तो बेकार हो गया. उसने मुझे अब मोहित कर लिया है. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में हिंदुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है.
बुल्ले शाह के मुताबिक़ आत्मा ता परमात्मा की ही एक अभिन्न अंग है. परमात्मा प्रत्येक आत्मा में विराजमान है और स्वेच्छा से बोलता है. वह कहते हैं-
नाल महबूब सिरे दी बाज़ी
जिस ने कुल तबक लै साजी
मन मेरे विच जोत बिराजी
आपे ज़ाहिर हाल बताया...
यानी अपने महबूब के लिए अपने सिर की बाज़ी लगा दी है, जिसने सारी कायनात को बनाया है. मेरे दिल में वह रूहानी रौशनी मौजूद है, जो जिस्म के ज़रिये खुद को दर्शाती है. यह रूहानी रौशनी खुदा के इश्क़ से वाबस्ता है. लेकिन इसकी अपनी कोई ख्वाहिश नहीं है. यह ख़ुदा के हुक्म से ही अपने अलग-अलग रूपों में रहती है. ख़ुदा के हुक्म से ही मिट्टी की देह के रूप में नाचती है. वह कहते हैं-
मैं मेरी है ना तेरी है
एह अंत ख़ाक दी ढेरी है
एक ढेरी होई खेरी है
ढेरी नु नाच नचाई दा
हुण किस तो आप लुकाई दा...
यानी मैं यानी देह न मेरी है, न तेरी है. इसका अंत तो मिट्टी के ढेर के रूप में होता है, जो इधर-उधर बिखर जाती है. मिट्टी के इस ढेर में जब आत्मा प्रविष्ट होती है तो यह ढेर नाचता है. अब तुम ख़ुद को किससे छुपा रहे हो. बुल्ले शाह दुनिया को भ्रम या मायावी नहीं मानते. ख़ुदा ने ही इस दुनिया को बनाया है. इंसान जन्म लेता है और फिर एक रोज़ मर जाता है. यही इस सृष्टि का नियम है. वह कहते हैं-
मैं सुपना सभ जग वी सुपना
सुपना लोक बिबाणा
ख़ाकी ख़ाक सियों रल जागा
कुझ नहीं ज़ोर घीणांणा...
यानी मैं एक सपना हूं और पूरी दुनिया भी एक सपना है. सब इंसान भी एक सपना ही हैं. जो मिट्टी में जन्म लेगा, वह एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा. यह सब बिना किसी ज़ोर के ख़ुद-ब-ख़ुद ही हो जाएगा.
भले ही बुल्ले शाह की धरती अब पाकिस्तान हो, लेकिन हिंदुस्तान में भी उन्हें उतना ही माना जाता है, जितना पाकिस्तान में. उनका कलाम, उनका संदेश तो पूरी दुनिया के लिए है. दरअसल, बुल्ले शाह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के महान सूफ़ी कवि होने के साथ इन दोनों मुल्कों की सांझी विरासत के भी प्रतीक हैं. बुल्ले शाह के बारे में कहा जाता है कि मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)





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