डॉ. फ़िरदौस ख़ान
फ़ारूख़ शेख़ फ़िल्मी दुनिया के आसमान का एक ऐसा रौशन सितारे थे, जिसकी चमक से समानांतर सिनेमा दमकता था. उनके चेहरे पर मासूमियत थी. उनके अंदाज़ में शोख़ी थी और उनका मिज़ाज शायराना था.

फ़ारूख़ शेख़ का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के सूरत ज़िले के गांव अमरोली में हुआ था. उनके पिता मुस्तफ़ा शेख़ मुम्बई के जाने माने वकील थे. उनके पिता ज़मींदार परिवार से ताल्लुक़ रखते थे. उनकी परवरिश बड़ी शानो-शौकत से हुई थी. उनके कहने से पहले ही ज़रूरत की हर चीज़ उन्हें मुहैया हो जाती थी. इसके बावजूद उनमें ज़रा सा भी ग़ुरूर नहीं था. 
उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम मुम्बई के सेंट मैरी स्कूल से हासिल की. उसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाई की. फिर उन्होंने मुम्बई के ही सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ लॉ से वकालत की पढ़ाई मुकम्मल की.

उनके पिता चाहते थे कि वह भी उनकी तरह वकील बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी अभिनय में थी. वे कालेज के दिनों से ही रंगमंच से जुड़ गए थे. वे इतना शानदार अभिनय करते थे कि उनके चर्चे दूर-दूर तलक होने लगे. इसका नतीजा ये हुआ कि उन्हें साल 1973 में आई फ़िल्म 'गर्म हवा' में काम करने का मौक़ा मिल गया. इस फ़िल्म में उनके अभिनय को ख़ूब सराहा गया. और इस तरह उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत हुई और हिन्दी सिनेमा को शानदार अभिनेता मिल गया.

फ़ारूख़ शेख़ एक बेहतरीन कलाकार थे. उनके लिए अभिनय महज़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं था. वे एक वक़्त में दो से ज़्यादा फ़िल्मों में काम नहीं करते थे. साल 1978 में आई फ़िल्म 'नूरी' ने उन्हें कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचा दिया. ये फ़िल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके पास तक़रीबन 40 फ़िल्मों के प्रस्ताव आए. ख़ास बात ये थी कि सबकी सब फ़िल्मों की कहानी 'नूरी' फ़िल्म की कहानी के आसपास ही घूमती थी. उन्होंने सब प्रस्ताव ठुकरा दिए, क्योंकि वे सिर्फ़ पैसों के लिए एक जैसी फ़िल्मों में काम नहीं करना चाहते थे. वे नये और दमदार किरदार निभाना चाहते थे.

फ़ारूख़ शेख़ कलात्मक फ़िल्मों के अभिनेता थे. उनकी फ़िल्मों में जनमानस का दुख-दर्द, उनकी ख़ुशियां और उनके इंद्रधनुषी ख़्वाबों की झलक मिलती है. हालांकि उन्हें दरख़्तों के इर्दगिर्द घूमने वाले किरदार पसंद नहीं थे, लेकिन दर्शकों ने उन्हें अपनी महबूबा से शिद्दत से मुहब्बत करने वाले महबूब के किरदार में भी ख़ूब पसंद किया. नूरी फ़िल्म का नग़मा देखें-
आजा रे ओ दिलबर जानिया
आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा
दिल की प्यास बुझा जा रे...

नूरी फ़िल्म का ये नग़मा भी बहुत ही दिलकश है-
चोरी चोरी कोई आये
चुपके-चुपके, सबसे छुपके 
ख़्वाब कई दे जाये
आंखें डाले आंखों में, जाने मुझसे क्या वो पूछे
मैं जो बोलूं क्या, हंस दूं मुझको कुछ ना सूझे
ऐसे तांके, दिल में झांके, सांस मेरी रुक जाए


उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'बाज़ार' की ग़ज़ल आज भी लोगों को बहुत पसंद आती है-
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की 
फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की...

फ़िल्म 'उमराव जान' ने तो इतिहास रच दिया था. इसकी ग़ज़ल आज भी लोगों को गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है-
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चांद से बेहतर नज़र आती है हमें  

सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें 
दिन ढले यूं तिरी आवाज़ बुलाती है हमें 

याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से 
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें 

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूं है 
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें...

फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी' का नग़मा देखें, जिसमें वह अभिनेत्री रेखा के साथ बहुत ही शोख़ अंदाज़ में नज़र आ रहे हैं-
फूल गुलाब का, लाखों में हज़ारों में 
एक चेहरा जनाब का...

उनके अंदाज़ में शोख़ी के साथ-साथ एक ऐसी संजीदगी भी थी, जो मुहब्बत में सिर्फ़ वादे करना ही नहीं जानती, बल्कि उसे शिद्दत से निभाने का जज़्बा भी रखती थी. उसके लिए महबूब ही सबकुछ है. कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में महबूब का अक्स नज़र आता है. फ़िल्म साथ-साथ का नग़मा ऐसा ही है-
तुमको देखा तो ये ख़्याल आया
ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया
आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया...

ये मुहब्बत ही तो है, जो नायिका अपने अमीर बाप का घर छोड़कर नायक के साथ एक छोटे से घर में रहने के लिए आ जाती है. फिर वे दोनों मिलकर अपना घर सजाते हैं-
ये तेरा घर, ये मेरा घर
किसी को देखना हो अगर
पहले आके मांग ले, तेरी नज़र मेरी नज़र...
न बादलों की छांव में, न चांदनी के गांव में
न फूल जैसे रास्ते बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईंट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर...

उनकी फ़िल्म 'चश्मे बद्दूर' का ये गीत रूह की गहराई में उतर जाता है- 
कहां से आए बदरा हो
कहां से आए बदरा हो
घुलता जाए कजरा... 

उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'गमन' की ग़ज़ल भी यादगार है-
आपकी याद आती रही रातभर
चश्मे- ग़म मुस्कुराती रही रातभर...

इसी फ़िल्म की ये ग़ज़ल भी ख़ूब पसंद की गई-
सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर का हर शख़्स परेशान सा क्यूं है...

सटारडम से कोसों दूर रहने वाले फ़ारूख़ शेख़ एक आम आदमी के अभिनेता थे. दर्शकों को लगता था कि उन्हीं के बीच से निकला कोई शख़्स पर्दे पर उन्हीं का कोई किरदार निभा रहा है. उनमें सादगी, विनम्रता और संजीदगी थी. ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे. उनके मासूम चेहरे से उनके बावक़ार वजूद का अक्स झलकता था.

उन्होंने रंगमंच और फ़िल्मों के अलावा टेलीविज़न के लिए भी काम किया. यहां भी उन्हें ख़ूब कामयाबी मिली. वे समाज सेवा से भी जुड़े रहे.

28 दिसम्बर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया.
आज भले ही वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अपने अभिनय के ज़रिये वे आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में ज़िन्दा हैं.

***
जन्म : 25 मार्च 1948 
स्थान : गांव अमरोली, ज़िला सूरत (गुजरात)
निधन : 28 दिसम्बर 2013 
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र) 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
इंसान सुकून की तलाश में न जाने कहां-कहां भटकता है, लेकिन सुकून उसे सिर्फ़ अल्लाह की पनाह में ही मिलता है. अल्लाह के ज़िक्र से मिलता है. जिस तरह बारिश की बूंदें प्यासी सूखी धरती को सराबोर कर देती हैं, उसी तरह ज़िक्रे इलाही से दिल को क़रार मिलता है, रूह को तस्कीन मिलती है. 
ज़िक्रे इलाही की बेशुमार फ़ज़ीलतें हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है.   
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- "याद रखो कि अल्लाह ही की याद से दिलों को इत्मीनान नसीब होता है." (क़ुरआन 13:28)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम हमारा ज़िक्र किया करो, तो हम भी तुम्हारा ज़िक्रे खै़र किया करेंगे. और हमारा शुक्र अदा करते रहा करो और नाशुक्री न किया करो.
(क़ुरआन 2:152)

अल्लाह की कायनात की तमाम मख़लूक़ात ज़िक्रे इलाही में ही मसरूफ़ रहती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और आसमानों और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही को सजदा करती है, कुछ ख़ुशी से कुछ नागवारी से. और उनके साये भी सुबह व शाम उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 13:15) 

“सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके दरम्यान है, सब अल्लाह की तस्बीह करते हैं. और कोई शय ऐसी नहीं है, जो उसकी हम्दो सना की तस्बीह न करती हो.”
(क़ुरआन : 17:44)

“और जो आसमानों और जो ज़मीन में हैं, सब अल्लाह ही की मख़लूक़ है. और जो क़ुर्बे इलाही में रहते हैं, वे न उसकी इबादत का तकब्बुर करते हैं और न उसकी इताअत से थकते हैं.
वे रात और दिन अल्लाह ही की तस्बीह किया करते हैं और कभी काहिली नहीं करते.”
(क़ुरआन 21:19-20)

“क्या तुमने नहीं देखा कि आसमानों और ज़मीन की हर शय अल्लाह ही की तस्बीह करती है. और परिन्दे भी फ़ज़ाओं में पर फैलाए हुए उसी की तस्बीह करते हैं. हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा जानता है.”
(क़ुरआन 24:41)
     
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है- “और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू किया करो.” (क़ुरआन 2:43)

“अपने परवरदिगार का कसरत से ज़िक्र करो और शाम और सुबह अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 3:41)

“और अपने परवरदिगार का अपने दिल में ज़िक्र किया करो, आजिज़ी से और ख़ौफ़ से और बुलंद आवाज़ के बग़ैर यानी धीमी आवाज़ से सुबह और शाम. और उसकी याद से ग़ाफ़िल न होना. 
बेशक जो लोग यानी फ़रिशते तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में हैं, वे भी उसकी इबादत से तकब्बुर नहीं करते और उसकी तस्बीह करते रहते हैं और उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 7: 205-206)

“तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो और उसकी बारगाह में सजदा करने वालों में से हो जाओ.”
(क़ुरआन 15:98)

“तुम लोग सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन : 19:11)
 
“और सूरज के तुलूअ होने से पहले यानी फ़ज्र की नमाज़ में और सूरज के ग़ुरूब होने से पहले यानी अस्र की नमाज़ में अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात के इब्तियाई लम्हों में भी यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ों में भी तस्बीह किया करो और दिन के किनारों यानी ज़ुहर की नमाज़ में भी तस्बीह किया करो,
(क़ुरआन 20:130)

“इंसान और जिन्न ही नहीं दीगर बेजान चीज़ें भी अल्लाह की ही तस्बीह करती हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और हमने पहाड़ों और परिन्दों को दाऊद अलैहिस्सलाम के ताबे कर दिया था. वे उनके साथ अल्लाह की तस्बीह किया करते थे. और हम ही यह सब करने वाले थे.”
(क़ुरआन 21:79)

जिस जगह अल्लाह तआला का ज़िक्र किया जाता है, वह जगह नूर से मुनव्वर हो जाती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “अल्लाह का यह नूर उन घरों में है, जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है और सुबह व शाम अल्लाह के नाम की तस्बीह की जाती है.” 
(क़ुरआन 24:36)

अल्लाह की तमाम मख़लूक़ का ये फ़र्ज़ है कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ माबूदे यकता की हम्दो सना के साथ तस्बीह करती रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “उसकी हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 25:58)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है.” 
(क़ुरआन 29:45)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया रहो. और आसमानों और ज़मीन में अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. और तुम तस्बीह किया करो तीसरे पहर और दोपहर में भी.”
(क़ुरआन 30:17-18)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ ईमान वालो ! तुम कसरत से अल्लाह का ज़िक्र किया करो. 
और सुबह व शाम उसकी तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 33:41-42)

“जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो उसके अतराफ़ हैं, वे सब अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों के लिए मग़फ़िरत की दुआएं मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ का अहाता किए हुये है. फिर जिन लोगों ने तौबा की और तेरे रास्ते की पैरवी की. और तू उन्हें जहन्नुम के अज़ाब से बचा ले.
(क़ुरआन 40:7)

“सुबह व शाम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 40:55)

“जो फ़रिश्ते तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं, वे रात दिन उसकी तस्बीह करते रहते हैं और वे कभी थकते भी नहीं हैं.”
(क़ुरआन 41:38)
 
“फ़रिश्ते अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और ज़मीन में रहने वाले लोगों के लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगते रहते हैं.”
(क़ुरआन 42:5)

“और सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 48:9)

“और तुम सूरज निकलने से पहले और सूरज छुपने से पहले अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात में भी कुछ वक़्त तस्बीह करो और सजदों यानी नमाज़ों के बाद भी उसकी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 50:39-40)

“जब तुम उठा करो, तो अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो.
और तुम रात में कुछ वक़्त और सितारों के ग़़ुरूब होने के बाद भी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 52:48-49)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:74)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:86)

“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 57:1)

“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:1)

“आसमानों और ज़मीन की हर शय उसी की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:24)

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 61:1) 

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है, जो हक़ीक़ी बादशाह है, पाक है.”
(क़ुरआन 62:1)

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 64:1)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह करते रहो.” 
69:52

“और तुम सुबह और शाम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो. और रात में कुछ वक़्त उसकी बारगाह में सजदा करो और रात के बाक़ी तवील हिस्से में उसकी तस्बीह किया.”
(क़ुरआन 76: 25-26)

“ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! अपने परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो, जो सबसे आला है.” 
(क़ुरआन 87:1) 

“फिर तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करो.”
(क़ुरआन 110:3)

*
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अपनी ज़ुबान को हर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र से तर रखो.”
(सुनन तिर्मिज़ी : 3375)

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तअला के कुछ फ़रिश्ते ज़मीन में चक्कर लगाते रहते हैं, वे अल्लाह के ज़िक्र की मजलिसें तलाश करते हैं, जब वे ऐसी कपि मजलिस तलाश कर लेते हैं, जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो रहा होता है, तो वे उन लोगों के साथ बैठ जाते हैं.”
(सही मुस्लिम : 6839)     


अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए जमा होते हैं फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं, रहमत उन्हें ढांप लेती है, सकीनत नाज़िल होती है और अल्लाह उनका ज़िक्र अपने पास मौजूद फ़रिश्तों में फ़रमाता है."
(सही मुस्लिम : 2700, जामा तिर्मिज़ी 3378) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बन्दा जब नमाज़ पढ़ रहा होता है, तो उसके सिर पर रहमतों की बारिश हो रही होती है.
(तिर्मिज़ी : 2911)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह फ़रमाता है कि अगर मेरा बन्दा एक हाथ मेरे क़रीब आता है, तो मैं दोनों हाथ की पूरी लम्बाई के बराबर उसके क़रीब आता हूं.”
(सही मुस्लिम : 6806) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जब तक कोई शख़्स अपनी नमाज़ की जगह पर बैठा रहता है, फ़रिश्ते उसके लिए अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करते रहते हैं- ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, ऐ अल्लाह! इस पर रहम कर.”
(सही बुख़ारी : 445)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर सूरज निकलने तक ज़िक्रे इलाही में मशग़ूल रहे, फिर वह दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसे पूरे हज और उमराह का अज्र मिलता है."
(सुनन तिर्मिज़ी : 586)    

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं ऐसे लोगों के साथ बैठा रहूं जो अस्र की नमाज़ से सूरज ग़ुरूब होने तक अल्लाह का ज़िक्र करें. ये उससे ज़्यादा पसंदीदा है कि वे चार ग़ुलाम आज़ाद करें."
(सुनन अबू दाऊद : 3667)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो मुसलमान मर्द नमाज़ और ज़िक्रे इलाही के लिए पाबंदी से मस्जिद में हाज़िर होता है, तो अल्लाह तआला उससे इस तरह ख़ुश होता है, जिस तरह मुसाफ़िर के घरवाले उसके घर आपने पर ख़ुश होते हैं.”
(सुनन इब्ने माजा : 800)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम इबादत और नेकी में देर न करो और ये न सोचो कि बाद में कर लेंगे, क्योंकि ज़िन्दगी में ऐसे हालात आ सकते हैं जो इंसान को अल्लाह की इताअत से रोक देते हैं.”
(मिश्कात-उल-मसाबीह : 5175)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अल्लाह अपने रब का ज़िक्र करे और जो अल्लाह का ज़िक्र न करे उनकी मिसाल ज़िन्दा और मुर्दे की तरह हैं.” कहने का मतलब ये है कि अल्लाह का ज़िक्र करने वाला ज़िन्दा है और ज़िक्र न करने वाला मुर्दे की तरह है. इस बात से अल्लाह के ज़िक्र की अहमियत का पता चलता है.  
(सही बुख़ारी : 6407)   

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “क्या मैं तुम्हें तुम्हारे आमाल में से बेहतरीन और तुम्हारे मालिक के नज़दीक सबसे पाकीज़ा अमल न बताऊं? वह अल्लाह का ज़िक्र करना है, जो सोना और चाँदी ख़र्च करने से भी बेहतर है.”     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह के नज़दीक सबसे पसंदीदा वो लोग हैं, जो अल्लाह का ज़िक्र कसरत से करते हैं.”
(जामा अल ज़ायद: 16748)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो, जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसा हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी वक़्त जन्म दिया हो.”
(मुसनद अहमद : 2250)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत की कुंजी नमाज़ है और नमाज़ की कुंजी पाकी है.” 
(सही मुस्लिम)
  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बेशक तुममें से कोई जब नमाज़ के लिए खड़ा होता है, तो शैतान उसे शुब्ह में डाल देता है. यहां तक कि वह नहीं जानता कि उसने कितनी रकआत पढ़ी हैं. तुममें से जब कोई कोई ये कैफ़ियत तो बैठे हुए दो सजदे कर ले.” (मुस्लिम : 1265)
     
हज़रत हातिम रहमतुल्लाह अलैह जब नमाज़ पढ़ते थे, तो ये तसव्वुर बांध लेते थे-
निगाहों के सामने काबा है.
नीचे पुल सिरात है.
दायें जन्नत है.
बायें जहन्नुम है.
पीछे मौत का फ़रिश्ता है.
और ये नमाज़ ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ है.
अल्लाह की रहमत से अपनी नमाज़ क़ुबूल होने की उम्मीद रखते थे. 
और अपने बदआमालों से नमाज़ के मरदूद होने का ख़ौफ़ रखते थे. 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.

लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.

दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.

कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.

रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.


राजेश कुमार गुप्ता 


हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...


डॉ. फ़िरदौस ख़ास 
पर्यटन भी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा है. कुछ लोग क़ुदरत की ख़ूबसूरती निहारने के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में जाते हैं, तो कुछ लोगों को अक़ीदत इबादतगाहों और मज़ारों तक ले जाती है. पर्यटन रोज़गार का भी एक बड़ा साधन है. हमारे देश भारत में लाखों लोग पर्यटन से जुड़े हैं. यहां मज़हबी पर्यटन ख़ूब फल-फूल रहा है. हर साल विदेशों से लाखों लोग भारत भ्रमण के लिए आते हैं, जिनमें एक बड़ी तादाद धार्मिक स्थलों पर आने वाले ज़ायरीनों यानी पर्यटकों की होती है.  

देश की राजधानी दिल्ली में जामा मस्जिद पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है. यह मस्जिद लाल पत्थरों और संगमरमर से बनी हुई है. मुग़ल बादशाह शाहजहां ने इसे बनवाया था. इसके ख़ूबसूरत गुम्बद, शानदार मीनारें और हवादार झरोखे इसे बहुत ही दिलकश बनाते हैं. मस्जिद में उत्तर और दक्षिण के दरवाज़ों से दाख़िल हुआ जा सकता है. पूर्व का दरवाज़ा सिर्फ़ जुमे के दिन ही खुलता है. यह दरवाज़ा शाही परिवार के दाख़िले के लिए हुआ करता था. 

इसके अलावा ज़ायरीन दिल्ली में दरगाहों पर भी हाज़िरी लगाते हैं. यहां बहुत सी दरगाहें अक़ीदत का मर्कज़ हैं, ख़ासकर सूफ़ियाना सिलसिले से जुड़े लोग यहां अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं. यहां महबूबे-इलाही हज़रत शेख़ निजामुद्दीन औलिया और उनके प्यारे मुरीद हज़रत अमीर खुसरो साहब की मज़ारें हैं. ज़ायरीन हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत ख़्वाजा अब्दुल अज़ीज़ बिस्तामी, हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह, हज़रत ख़्वाजा अलीअहमद एहरारी, हज़रत सैयद बदरुद्दीन शाह समरकंदी, हज़रत सैयद महमूद बहार, हज़रत सैयद सदरुद्दीन शाह, हज़रत सैयद आरिफ़ अली शाह, हज़रत सैयद अबुल कासिम सब्ज़वारी, हज़रत सैयद हसन रसूलनुमा, हज़रत सैयद शाह आलम, हज़रत मौलाना शेख़ जमाली और कमाली, हज़रत मौलाना फ़ख़रुद्दीन फ़ख़्र-ए-जहां, हज़रत मौलाना शेख़ मजदुद्दीन हाजी, हज़रत मौलाना नासेहुद्दीन, हज़रत शम्सुल आरफ़ीन तुर्कमान शाह, हज़रत शाह तुर्कमान बयाबानी सुहरवर्दी, हज़रत शाह सरमद शहीद, हज़रत शाह सादुल्लाह गुलशन, हज़रत शाह वलीउल्लाह, हज़रत शाह मुहम्मद आफ़ाक़, हज़रत शाह साबिर अली चिश्ती साबरी, हज़रत शेख़ सैयद जलालुद्दीन चिश्ती, हज़रत शेख़ कबीरुद्दीन औलिया, हज़रत शेख़ जैनुद्दीन अली, हज़रत शेख़ यूसुफ़ कत्ताल, हज़रत शेख़ नसीरुद्दीन महमूद चिराग़-ए-देहली, ख़लीफ़ा शेख़ चिराग़-ए-देहली, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल चिश्ती, हज़रत शेख़ नूरुद्दीन मलिक यारे-पर्रा, हज़रत शेख़ शम्सुद्दीन औता दुल्लाह, हज़रत शेख़ शहाबुद्दीन आशिक़उल्लाह, हज़रत शेख़ ज़ियाउद्दीन रूमी सुहरवर्दी, हज़रत मख़मूद शेख़ समाउद्दीन सुहरवर्दी, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ रुकनुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ एमादुद्दीन इस्माईल फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ उस्मान सय्याह, हज़रत शेख़ सलाहुद्दीन, हज़रत शेख़ अल्लामा कमालुद्दीन, हज़रत शेख़ बाबा फ़रीद (पोते), हज़रत शेख़ अलाउद्दीन, हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन बुख़ारी, हज़रत शेख़ अब्दुलहक़ मुहद्दिस देहलवी, हज़रत शेख़ सुलेमान देहलवी, हज़रत शेख़ मुहम्मद चिश्ती साबरी, हज़रत मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल, हज़रत शेख़ नूर मुहम्मद बदायूंनी, हज़रत शेख़ शाह कलीमुल्लाह, हज़रत शेख़ मुहम्मद फ़रहाद, हज़रत शेख़ मीर मुहम्मदी, हज़रत शेख़ हैदर, हज़रत क़ाज़ी शेख़ हमीदुद्दीन नागौरी, हज़रत अबूबकर तूसी हैदरी, हज़रत नासिरुद्दीन महमूद, हज़रत इमाम ज़ामिन, हज़रत हाफ़िज़ सादुल्लाह नक़्शबंदी, हज़रत शेख़ुल आलेमीन हाजी अताउल्लाह, हज़रत मिर्ज़ा मुल्लाह मज़हर जाने-जानां, हज़रत मीरानशाह नानू और शाह जलाल, हज़रत अब्दुस्सलाम फ़रीदी, हज़रत ख़ुदानुमा, हज़रत नूरनुमा और हज़रत मख़दूम रहमतुल्लाह अलैह की मज़ारों पर भी जाते हैं. यहां हज़रत बीबी हंबल साहिबा, हज़रत बीबी फ़ातिमा साम और हज़रत बीबी ज़ुलैख़ा की मज़ारें भी हैं, जहां महिला ज़ायरीन जाती हैं. यहां पंजा शरीफ़, शाहेमर्दां, क़दम शरीफ़ और चिल्लागाह पर भी ज़ायरीन हाज़िरी लगाते हैं. 

यूं तो हर रोज़ ही मज़ारों पर ज़ायरीनों की भीड़ होती है, लेकिन जुमेरात के दिन यहां का माहौल कुछ अलग ही होता है. क़व्वाल क़व्वालियां गाते हैं. दरगाह के अहाते में अगरबत्तियों की भीनी-भीनी महक और उनका आसमान की तरफ़ उठता सफ़ेद धुआं कितना भला लगता है. ज़ायरीनों के हाथों में फूलों और तबर्रुक की तबाक़ होते हैं. मज़ारों के चारों तरफ़ बनी जालियों के पास बैठी औरतें क़ुरान शरीफ़ की सूरतें पढ़ रही होती हैं. कोई औरत जालियों में मन्नत के धागे बांध रही होती है, तो कोई दुआएं मांग रही होती है. 

राजस्थान के अजमेर में ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह का मज़ार है. ख़्वाजा अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. ख़्वाजा की वजह से अजमेर को अजमेर शरीफ़ भी कहा जाता है. सूफ़ीवाद का चिश्तिया तरीक़ा हज़रत अबू इसहाक़ शामी ने ईरान के शहर चश्त में शुरू किया था. इसलिए इस तरीक़े या सिलसिले का नाम चिश्तिया पड़ गया. जब ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह हिन्दुस्तान आए, तो उन्होंने इसे दूर-दूर तक फैला दिया. हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी चिश्तिया सिलसिला ख़ूब फलफूल रहा है. दरअसल यह सिलसिला भी दूसरे सिलसिलों की तरह ही दुनियाभर में फैला हुआ है. यहां भी दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.     

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सैयद हाजी अली शाह बुख़ारी का मज़ार है. हाजी अली भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. यह मज़ार मुम्बई के वर्ली तट के क़रीब एक टापू पर बनी मस्जिद के अन्दर है. सफ़ेद रंग की यह मस्जिद बहुत ही ख़ूबसूरत लगती है. मुख्य सड़क से मज़ार तक जाने के लिए एक पुल बना हुआ है. इसके दोनों तरफ़ समन्दर है. शाम के वक़्त समन्दर का पानी ऊपर आने लगता है और यह पुल पानी में डूब जाता है. सुबह होते ही पानी उतरने लगता है. यहां भी हिन्दुस्तान के कोने-कोने के अलावा दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.

हरियाणा के पानीपत शहर में शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर का मज़ार है. यह मज़ार एक मक़बरे के अन्दर है, जो साढ़े सात सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है. कहा जाता है कि शेख़ शराफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह ने लम्बे अरसे तक पानी में खड़े होकर इबादत की थी. जब उनकी इबादत क़ुबूल हुई, तो उन्हें बू अली का ख़िताब मिला. दुनिया में अब तक सिर्फ़ साढ़े तीन क़लन्दर हुए हैं. शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर, लाल शाहबाज़ क़लंदर और शम्स अली कलंदर. हज़रत राबिया बसरी भी क़लंदर हैं, लेकिन औरत होने की वजह से उन्हें आधा क़लंदर माना जाता है. बू अली क़लंदर रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार के क़रीब ही उनके मुरीद हज़रत मुबारक अली शाह का भी मज़ार है. यहां भी दूर-दूर से ज़ायरीन आते हैं.  

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवा नामक क़स्बे में हाजी वारिस अली शाह का मज़ार है. आप अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. उनके वालिद क़ुर्बान अल्ली शाह भी जाने-माने औलिया थे.     

उत्तर प्रदेश के ही कानपुर ज़िले के गांव मकनपुर में हज़रत बदीउद्दीन शाह ज़िन्दा क़ुतबुल मदार का मज़ार है. 
इनके बारे में कहा जाता है कि ये योगी दुर्वेश थे और अकसर योग के ज़रिये महीनों साधना में रहते थे. एक बार वह योग समाधि में ऐसे लीन हुए कि लम्बे अरसे से तक उठे नहीं. उनके मुरीदों ने समझा कि उनका विसाल हो गया है. उन्होंने हज़रत बदीउद्दीन शाह को दफ़न कर दिया. दफ़न होने के बाद उन्होंने सांस ली. उनके मुरीद यह देखकर हैरान रह गए कि वे ज़िन्दा हैं. वे क़ब्र खोदकर उन्हें निकालने वाले ही थे, तभी एक बुज़ुर्ग ने हज़रत बदीउद्दीन शाह से मुख़ातिब होकर कहा कि दम न मार यानी अब तुम ज़िन्दा ही दफ़न हो जाओ. फिर उस क़ब्र को ऐसे ही छोड़ दिया गया. इसलिए उन्हें ज़िन्दा पीर भी कहा जाता है. आपकी उम्र मुबारक तक़रीबन छह सौ साल थी.    

इनके अलावा देशभर में और भी औलियाओं की मज़ारें हैं, जहां दूर-दराज़ के इलाक़ों से ज़ायरीन आते हैं और सुकून हासिल करते हैं. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दर्द से परेशान है. किसी के पूरे जिस्म में दर्द है, किसी की पीठ में दर्द है, किसी के घुटनों में दर्द है और किसी के हाथ-पैरों में दर्द है. हालांकि दर्द की कई वजहें होती हैं. इनमें से एक वजह यूरिक एसिड भी है.  

दरअसल, यूरिक एसिड एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो खाद्य पदार्थों के पाचन से पैदा होता है और इसमें प्यूरिन होता है. जब प्यूरिन टूटता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. किडनी यूरिक एसिड को फ़िल्टर करके इसे पेशाब के ज़रिये जिस्म से बाहर निकाल देती है. जब कोई व्यक्ति अपने खाने में ज़्यादा मात्रा में प्यूरिक का इस्तेमाल करता है, तो उसका जिस्म यूरिक एसिड को उस तेज़ी से जिस्म से बाहर नहीं निकाल पाता. इस वजह से जिस्म में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. ऐसी हालत में यूरिक एसिड ख़ून के ज़रिये पूरे जिस्म में फैलने लगता है और यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों में जमा हो जाते हैं, जिससे जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से गठिया भी हो जाता है. जिस्म में असहनीय दर्द होता है. इससे किडनी में पथरी भी हो जाती है. इसकी वजह से पेशाब संबंधी बीमारियां पैदा हो जाती हैं. मूत्राशय में असहनीय दर्द होता है और पेशाब में जलन होती है. पेशाब बार-बार आता है. यह यूरिक एसिड स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देता है. 

यूरिक एसिड से बचने के लिए अपने खान-पान पर ख़ास तवज्जो दें. दाल पकाते वक़्त उसमें से झाग निकाल दें. कोशिश करें कि दाल कम इस्तेमाल करें. बिना छिलकों वाली दालों का इस्तेमाल करना बेहतर है. रात के वक़्त दाल, चावल और दही आदि खाने से परहेज़ करें. हो सके तो फ़ाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें.  
जौ 
यूरिक एसिड से निजात पाने के लिए जौ का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें. जौ की ख़ासियत है कि यह यूरिक एसिड को सोख लेता है और उसे जिस्म से बाहर करने में कारगर है. इसलिए जौ को अपने रोज़मर्रा के खाने में ज़रूर शामिल करें. गर्मियों के मौसम में जौ का सत्तू पी सकते हैं, जौ का दलिया बना सकते हैं, जौ के आटे की रोटी बनाई जा सकती है.
ज़ीरा
यूरिक एसिड के मरीज़ों के लिए ज़ीरा भी बहुत फ़ायदेमंद है. ज़ीरे में आयरन, कैल्शियम, ज़िंक और फ़ॉस्फ़ोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट उच्च मात्रा में मौजूद होता है, जो यूरिक एसिड की वजह से होने वाले जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है. यह टॉक्सिंस को जिस्म से बाहर करने में भी मददगार है.
नींबू
नींबू में मौजूद साइट्रिक एसिड शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ने से रोकता है. इसलिए नींबू का इस्तेमाल करना चाहिए. 
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें. 
   


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
अबुल हसन ख़रक़ानी प्रसिद्ध सूफ़ी संत हैं. उनका असली नाम अबुल हसन हैं, मगर ख़रक़ान में जन्म लेने की वजह से वे अबुल हसन ख़रक़ानी के नाम से विख्यात हुए. सुप्रसिद्ध ग्रंथकार हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार के मुताबिक़ एक बार सत्संग में अबुल हसन ख़रक़ानी ने बताया कि उन्हें उस वक़्त की बातें भी याद हैं, जब वे अपनी मां के गर्भ में चार महीने के थे.

अबुल हसन ख़रक़ानी एक चमत्कारी संत थे, लेकिन उन्होंने कभी लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. वे कहते हैं कि अल्लाह अपने यश के लिए चमत्कार दिखाने वालों से चमत्कारी शक्तियां वापस ले लेता है. उन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग केवल लोककल्याण के लिए किया. एक बार उनके घर कुछ मुसाफ़िर आ गए, जो बहुत भूखे थे. उनकी पत्नी ने कहा कि घर में दो-चार ही रोटियां हैं, जो इतने मेहमानों के लिए बहुत कम पड़ेंगी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि सारी रोटियों को साफ़ कपड़े से ढककर मेहमानों के सामने रख दो. उनकी पत्नी ने ऐसा ही किया. मेहमानों ने भरपेट रोटियां खाईं, मगर वे कम न पड़ीं. मेहमान तृप्त होकर उठ गए, तो उनकी पत्नी ने कपड़ा हटाकर देखा, तो वहां एक भी रोटी नहीं थी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि अगर और भी मेहमान आ जाते, तो वे भी भरपेट भोजन करके ही उठते.

वे बाहरी दिखावे में विश्वास न रखकर कर्म में यकीन करते थे. वे कहते हैं कि जौ और नमक की रोटी खाने या टाट के वस्त्र पहन लेने से कोई सूफ़ी नहीं हो जाता. अगर ऐसा होता, तो ऊन वाले और जौ खाने वाले जानवर भी सूफ़ी कहलाते. अबुल हसन ख़रक़ानी कहते हैं कि सूफ़ी वह है जिसके दिल में सच्चाई और अमल में निष्ठा हो. वे शिष्य नहीं बनाते थे, क्योंकि उन्होंने भी स्वयं किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी. वे कहते थे कि उनके लिए अल्लाह ही सब कुछ है. मगर इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि सांसारिक लोग अल्लाह के इतने करीब नहीं होते, जितने संत-फ़कीर होते हैं. इसलिए लोगों को संतों के प्रवचनों का लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि संतों का तो बस एक ही काम होता है अल्लाह की इबादत और लोककल्याण के लिए सत्संग करना.

एक बार किसी क़ाफ़िले को ख़तरनाक रास्ते से यात्रा करनी थी. क़ाफ़िले में शामिल लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से आग्रह किया कि वे उन्हें कोई ऐसी दुआ बता दें, जिससे वे यात्रा की मुसीबतों से सुरक्षित रहें. इस पर उन्होंने कहा कि जब भी तुम पर कोई मुसीबत आए, तो तुम मुझे याद कर लेना. मगर लोगों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. काफ़ी दूरी तय करने के बाद एक जगह डाकुओं ने क़ाफ़िले पर धावा बोल दिया. एक व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा धन और क़ीमती सामान था, उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद किया. जब डाकू क़ाफ़िले को लूटकर चले गए, तो क़ाफ़िले वालों ने देखा कि उनका तो सब सामान लुट चुका है, लेकिन उस व्यक्ति का सारा सामान सुरक्षित है. लोगों ने उससे इसकी वजह पूछी, तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद कर उनसे सहायता की विनती की थी. इस वाक़िये के कुछ वक़्त बाद जब क़ाफ़िला वापस ख़रक़ान आया, तो लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से कहा कि हम अल्लाह को याद करते रहे, मगर हम लुट गए और उस व्यक्ति ने आपका नाम लिया, तो वह बच गया. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि तुम केवल ज़ुबानी तौर पर अल्लाह को याद करते हो, जबकि संत सच्चे दिल से अल्लाह को याद करते हैं. अगर तुमने मेरा नाम लिया होता, तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता.

एक बार वे अपने बाग की खुदाई कर रहे थे, तो वहां से चांदी निकली. उन्होंने उस जगह को बंद करके दूसरी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से सोना निकला. फिर तीसरी और चौथी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से भी हीरे-जवाहरात निकले, लेकिन उन्होंने किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया और फ़रमाया कि अबुल हसन इन चीज़ों पर मोहित नहीं हो सकता. ये तो क्या अगर दोनों जहां भी मिल जाएं, तो भी अल्लाह से मुंह नहीं मोड़ सकता. हल चलाते में जब नमाज़ का वक़्त आ जाता, तो वे बैलों को छोड़कर नमाज़ अदा करने चले जाते. जब वे वापस आते तो ज़मीन तैयार मिलती.

वे लोगों को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करने की सीख भी देते थे. अबुल हसन ख़रक़ानी और उनके भाई बारी-बारी से जागकर अपनी मां की सेवा करते थे. एक रात उनके भाई ने कहा कि आज रात भी तुम ही मां की सेवा कर लो, क्योंकि मैं अल्लाह की इबादत करना चाहता हूं. उन्होंने अपने भाई की बात मान ली. जब उनके भाई इबादत में लीन थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि ''अल्लाह ने तेरे भाई की मग़फ़िरत की और उसी के ज़रिये से तेरी भी मग़फ़िरत कर दी.'' यह सुनकर उनके भाई को बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह की इबादत की, इसलिए इसका पहला हकदार तो मैं ही था. तभी उसे ग़ैबी आवाज़ सुनाई दी कि ''तू अल्लाह की इबादत करता है, जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है. अबुल हसन ख़रक़ानी अपनी मां की सेवा कर रहा है, क्योंकि बीमार ज़ईफ़ मां को इसकी बेहद ज़रूरत है.'' यानी, अपने माता-पिता और दीन-दुखियों की सेवा करना भी इबादत का ही एक रूप है. वे कहते थे कि मुसलमान के लिए हर जगह मस्जिद है, हर दिन जुमा है और हर महीना रमज़ान है. इसलिए बंदा जहां भी रहे अल्लाह की इबादत में मशग़ूल रहे. एक रोज़ उन्होंने ग़ैबी आवाज़ सुनी कि ''ऐ अबुल हसन जो लोग तेरी मस्जिद में दाख़िल हो जाएंगे उन पर जहन्नुम की आग हराम हो जाएगी और जो लोग तेरी मस्जिद में दो रकअत नमाज़ अदा कर लेंगे उनका हश्र इबादत करने वाले बंदों के साथ होगा.''

अपनी वसीयत में उन्होंने ज़मीन से तीस गज़ नीचे दफ़न होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी. अबुल हसन ख़रक़ानी यह भी कहते थे कि किसी भी समाज को शत्रु से उतनी हानि नहीं पहुंचती, जितनी कि लालची विद्वानों और गलत नेतृत्व से होती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि लोग यह समझें कि हक़ीक़त में उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)

 

फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जिससे व्यक्ति की ज़िन्दगी बहुत बुरी तरह प्रभावित हो जाती है. वह अपनी पसंद की मिठाइयां, फल, आलू, अरबी और कई तरह की दूसरी चीज़ें नहीं खा पाता. इसके साथ ही उसे तरह-तरह की दवाएं भी खानी पड़ती हैं. दवा कोई भी नहीं खाना चाहता, जिसे मजबूरन खानी पड़ती हैं, इससे उसका ज़ायक़ा ख़राब हो जाता है. इससे व्यक्ति और ज़्यादा परेशान हो जाता है. पिछले कई दिनों से हम शुगर के रूहानी और घरेलू इलाज के बारे में अध्ययन कर रहे हैं. हमने शुगर के कई मरीज़ों से बात की. इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो महंगे से महंगा इलाज कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ. कई ऐसे लोग भी मिले, जिन्होंने घरेलू इलाज किया और बेहतर महसूस कर रहे हैं. शुगर के मरीज़ डॉक्टरों से दवा तो लेते ही हैं. लेकिन हम आपको ऐसे इलाज के बारे में बताएंगे, जिससे मरीज़ को दवा की ज़रूरत ही नहीं रहती.
पहला इलाज है जामुन
जी हां, जामुन शुगर का सबसे बेहतरीन इलाज है. अमूमन सभी पद्धतियों की शुगर की दवाएं जामुन से बनाई जाती हैं. बरसात के मौसम में जामुन ख़ूब आती हैं. इस मौसम में दरख़्त जामुन से लदे रहते हैं. जब तक मौसम रहे, शुगर के मरीज़ ज़्यादा से ज़्यादा जामुन खाएं. साथ ही जामुन की गुठलियों को धोकर, सुखाकर रख लें. क्योंकि जब जामुन का मौसम न रहे, तब इन गुठलियों को पीसकर सुबह ख़ाली पेट एक छोटा चम्मच इसका चूर्ण फांक लें. जामुन की चार-पांच पत्तियां सुबह और शाम खाने से भी शुगर कंट्रोल में रहती है. जामुन के पत्ते सालभर आसानी से मिल जाते हैं. जिन लोगों के घरों के आसपास जामुन के पेड़ न हों, तो वे जामुन के पत्ते मंगा कर उन्हें धोकर सुखा लें. फिर इन्हें पीस लें और इस्तेमाल करें. इसके अलावा मिट्टी के मटके में जामुन की छोटी-छोटी कुछ टहनियां डाल दें और उसका पानी पिएं. इससे भी फ़ायदा होगा.   
दूसरा इलाज है नीम
नीम की सात-आठ हरी मुलायम पत्तियां सुबह ख़ाली पेट चबाने से शुगर कंट्रोल में रहती है. ध्यान रहे कि नीम की पत्तियां खाने के दस-पंद्रह मिनट बाद नाश्ता ज़रूर कर लें. नीम की पत्तियां आसानी से मिल जाती हैं.
तीसरा इलाज है अमरूद 
 रात में अमरूद के दो-तीन पत्तों को धोकर कूट लें. फिर कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में भिगोकर रख दें. ध्यान रहे कि बर्तन धातु का न हो. सुबह ख़ाली पेट इसे पीने से शुगर कंट्रोल में रहती हैं.
ये तीनों इलाज ऐसे हैं, जो आसानी से मुहैया हैं. शुगर का कोई भी मरीज़ इन्हें अपनाकर राहत पा सकता है. इन तीनों में से कोई भी इलाज करने के एक माह के बाद शुगर का टेस्ट करा लेने से मालूम हो जाएगा कि इससे कितना फ़ायदा हुआ है.

 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान को लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जाना जाता है. वे शायरा, लेखिका और पत्रकार हैं. वे एक आलिमा भी हैं. वे रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है. ये उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है, जो इंशा अल्लाह रहती दुनिया तक तमाम आलमों के लोगों को अल्लाह के पैग़ाम से रूबरू कराता रहेगा. वे कहती हैं कि हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं. हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया. वे आधी रात में तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठ जाया करती थीं और अल सुबह फ़ज्र तक इबादत में मशग़ूल रहती थीं. उन्हें देखकर हमारी भी दिलचस्पी इबादत में हो गई. साथ ही बहुत कम उम्र से हमें रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त पापा बहुत याद आते थे. बचपन में पापा क़ुरआन करीम के बारे में हमें बताया करते थे. वे कहा करते थे कि क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी है. वे कहती हैं कि क़ुरआन पाक सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं है, बल्कि ये सबके लिए है, तमाम आलमों के लिए है. हर किसी को अपनी ज़िन्दगी में कम से कम एक बार क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए. अगरचे आप किसी भी मज़हब को मानने वाले हैं और कोई भी ज़बान बोलते हैं, फिर भी आपको अपनी ज़बान में क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए यानी क़ुरआन का तर्जुमा पढ़ना चाहिए, क्योंकि नसीहत हासिल करने वालों के लिए इसमें सबकुछ है.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की. दरअसल हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है. हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है. कायनात की फ़ानी चीज़ों में हमें न पहले कभी दिलचस्पी थी और न आज है और इंशा अल्लाह न कभी होगी.    

वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान को अपना पहला मुर्शिद और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना दूसरा मुर्शिद मानती हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन अपने वालिदैन को समर्पित किया है.

उन्होंने सूफ़ी-संतों की ज़िन्दगी और उनके दर्शन पर आधारित एक किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था. यह किताब आज तक चर्चा में बनी हुई है. सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं. वे  इससे प्रेरणा और मार्गदर्शन हासिल कर रहे हैं.   

उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था. उनकी अम्मी तालीमयाफ़्ता ख़ातून थीं. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक़ था. वे उम्दा शायरा थीं. फ़िरदौस पर भी घर के माहौल का गहरा असर पड़ा. उन्होंने अपनी पहली नज़्म उस वक़्त लिखी थी, जब वे छठी जमात में पढ़ती थीं. उन्होंने नज़्म अपनी अम्मी और अब्बू को सुनाई. उनके अब्बू को नज़्म बहुत पसंद आई और उन्होंने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई. नज़्म ख़ूब सराही गई. इस तरह उनके लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है. सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया. 

यह फ़िरदौस ख़ान के लेखन की ख़ासियत है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में इस तरह बयां करती हैं कि पढ़ने वाला उसी में डूबकर रह जाता है. उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है. फ़िरदौस ख़ान को जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है कि उनकी शायरी सीधे दिल की गहराइयों में उतर जाती है, रूह में समा जाती है.

जो ज़िन्दगी की पथरीली राहों पर चलकर दुख-तकलीफ़ों की वजह से बेज़ार हो चुका हो, उसे फ़िरदौस ख़ान का कलाम ज़रूर पढ़ना चाहिए, वह कलाम जो गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, जो प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, जो कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है. 

फ़िरदौस ख़ान अपनी अम्मी के बाद हज़रत राबिया बसरी को अपना आदर्श मानती हैं. उनकी शायरी में रूहानियत है, पाकीज़गी है. वे कहती हैं-
ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है
घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है

वे मुहब्बत को इबादत का दर्जा देती हैं. वे कहती हैं कि कुछ रिश्ते आसमानों के लिए ही हुआ करते हैं. उनका अहसास रूह में और वजूद आसमानों में होता है. अपने महबूब से मुख़ातिब होते हुए वे कहती हैं-
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा 
मेरा क़ुरआन है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना हो जाना चाहती हूं…

वे कहती हैं कि हिज्र भी हर किसी के नसीब में नहीं हुआ करता. सच, बड़े क़िस्मत वाले होते हैं वे लोग, जिनके नसीब में हिज्र की नेअमत आती है. वे कहती हैं- 
जान !
मैं नहीं जानती 
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा 
भी है या नहीं...
मैं सिर्फ़ ये जानती हूं 
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्में पढ़ने वाले को चांद के उस पार चैन व सुकून के आलम में ले जाने की सलाहियत रखती हैं. नज़्म देखिए-
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्मों की मानिन्द उनकी ग़ज़लें भी बेमिसाल हैं. उनकी ग़ज़लें मुहब्बत के अहसास से सराबोर हैं, इश्क़ से लबरेज़ हैं. उनकी ग़ज़लें पढ़ने वालों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जहां से वे लौटना ही नहीं चाहते. आलम यह है कि लोग अपने महबूब को ख़त लिखते वक़्त उसमें उनके शेअर लिखना नहीं भूलते. यही तो उनकी क़लम का जादू है. चन्द अश्आर देखें-   
जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

मुट्ठी में क़ैद करने को जुगनूं कहां से लाऊं
नज़दीक-ओ-दूर कोई भी जंगल नहीं रहा

दीमक ने चुपके-चुपके वो अल्बम ही चाट ली
महफ़ूज़ ज़िन्दगी का कोई पल नहीं रहा

मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
वो जुस्तजू, वो मोड़, वो संदल नहीं रहा

फ़िरदौस ख़ान की शायरी में समर्पण है, विरह है, तड़प है. उनका गीत पढ़कर ऐसा लगता है मानो ख़ुद राधा रानी ने ही अपने कृष्ण के लिए इसे रचा है. गीत देखिए-    
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौग़ात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

दरअसल फ़िरदौस ख़ान की शायरी में एक औरत की मुहब्बत, उसके ख़्वाब और उसका दर्द झलकता है. उनका कलाम ज़िन्दगी के तमाम इन्द्रधनुषी रंगों को अपने में समेटे हुए है. उसमें मुहब्बत का रंग भी शामिल है, तो जुदाई का रंग भी है. उसमें ख़ुशी का रंग भी दमकता है, तो दुखों का रंग भी झलकता है. चन्द अश्आर देखें-
जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में 
हर एक क़तरा मेरी जां क़तरा-ए-शबनम नहीं होता 

चैन कब पाया है मैंने, ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा, तो नाराज़ ख़ुदा होता है 

जंगल में भटकते हैं सदा रात को जुगनूं 
मेरी ही तरह उनका भी घरबार नहीं है 

बक़ौल फ़िरदौस ख़ान ज़िन्दगी हमेशा वैसी नहीं हुआ करती, जैसी हम चाहते हैं. ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा भी हुआ करता है, जो हमें लाख चाहने पर भी नहीं मिलता. और जो मिलता है, उससे कभी उन्सियत नहीं होती, वह पराया ही लगता है. वे कहती हैं- 
मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...

फ़िरदौस ख़ान जानी मानी कहानीकार हैं. उनकी शायरी की तरह ही उनकी कहानियों में भी अल्फ़ाज़ का जादू बाख़ूबी देखने को मिलता है. उनकी भाषा शैली ऐसी है कि पढ़ने वाला उसके सहर से ख़ुद को अलग कर ही नहीं पाता. उनकी कहानी अट्ठारह सितम्बर की एक झलक देखें-
“आज अट्ठारह सितम्बर है. वही अट्ठारह सितम्बर जो आज से छह साल पहले था. वह भी मिलन की ख़ुशी से सराबोर थी और यह भी, लेकिन उस अट्ठारह सितम्बर और इस अट्ठारह सितम्बर में बहुत बड़ा फ़र्क़ था. दो सदियों का नहीं, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा, शायद समन्दर और सहरा जितना. सूरज ने अपनी सुनहरी किरनों से धरती के आंचल में कितने ही बेल-बूटे टांके थे. उस अट्ठारह सितम्बर को भी दोपहर आई थी, वही दोपहर जिसमें प्रेमी जोड़े किसी पेड़ की ओट में बैठकर एक-दूसरे की आंखों में डूब जाते हैं. फिर रोज़मर्रा की तरह शाम भी आई थी, लेकिन यह शाम किसी मेहमान की तरह थी बिल्कुल सजी संवरी. माहौल में रूमानियत छा गई थी. फिर शाम की लाली में रफ़्ता-रफ़्ता रात की स्याही शामिल हो गई. रात की अगुवानी में आसमान में चमकते लाखों-करोड़ों सितारों ने झिलमिलाती हुई नन्हीं रौशनियों की आरती से की थी. यह रात महज़ एक रात नहीं थी. यह मिलन की रात थी, एक सुहाग की रात.”
इसे भी देखें- 
“बरसात में बरसते पानी की रिमझिम, जाड़ो में बहती शीत लहर के टकराने से हिलते पेड़ों की शां-शां और गर्मियों में लू के गर्म झोंके सब उसके बहुत क़रीब थे, बिल्कुल उसांसों की तरह. उसकी आंखों ने एक सपना देखा था, जो नितांत उसका अपना था. दूर तलक समन्दर था और समन्दर पर छाया नीला आसमान. बंजारन तमन्नाओं के परिन्दे आसमान में उन्मुक्त होकर उड़ रहे थे. दिन के दूसरे पहर की सुनहरी किरनें समन्दर की दूधियां लहरों को सुनहरी कर रही थीं.”

अपनी कहानियों में भी उन्होंने एक आम इंसान की ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को शामिल किया है. उनकी कहानियां ज़िन्दगी के सफ़र की मानिन्द हैं, जिसमें रफ़्तार भी है, तो ठहराव भी है. इनमें मुहब्बत का ख़ुशनुमा अहसास भी है, तो विरह की वेदना भी है. कहीं क़ुर्ब की चाह है, तो कहीं टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है.   
उनकी कहानी ‘त्यौहारी’ एक ऐसी अकेली लड़की की दास्तां है, जो हर त्यौहार पर ‘त्यौहारी’ का इंतज़ार करती है. कहानी की एक झलक देखें-    
“जब भी कोई त्यौहार आता, लड़की उदास हो जाती. उसे अपनी ज़िन्दगी की वीरानी डसने लगती. वो सोचती कि कितना अच्छा होता, अगर उसका भी अपना एक घर होता. घर का एक-एक कोना उसका अपना होता, जिसे वो ख़ूब सजाती-संवारती. उस घर में उसे बेपनाह मुहब्बत करने वाला शौहर होता, जो त्यौहार पर उसके लिए नये कपड़े लाता, चूड़ियां लाता, मेहंदी लाता. और वो नये कपड़े पहनकर चहक उठती, गोली कलाइयों में रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां पहननती, जिसकी खनखनाहट दिल लुभाती. गुलाबी हथेलियों में मेहंदी से बेल-बूटे बनाती, जिसकी महक से उसका रोम-रोम महक उठता.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसकी ज़िन्दगी किसी बंजर ज़मीन जैसी थी, जिसमें कभी बहार नहीं आनी थी. बहार के इंतज़ार में उसकी उम्र ख़त्म हो रही थी. उसने हर उम्मीद छोड़ दी थी. अब बस सोचें बाक़ी थीं. ऐसी उदास सोचें, जिन पर उसका कोई अख़्तियार न था.”  


उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा. कहानी की एक झलक देखें- 
“आज जब वह सोने के लिए ढाबे की छत पर खुले आसमान के नीचे लेटा, तो उसे आकाश रूपी काली चादर पर चमकते चांद-सितारे बहुत भा रहे थे. उसे अपना भविष्य भी चांद-सितारों की तरह जगमगाता लग रहा था. अब वह भविष्य को लेकर चिंचित न होकर सुनहरे कल की कल्पना कर रहा था.  कल्लू के लिए उसके मन में कृतज्ञता के भाव थे, जिसके थोड़े से प्रोत्साहन से उसकी ज़िन्दगी में बदलाव आ गया था. वह ख़ुद को एक ऐसे संघर्षशील व्यक्ति के रूप में देख रहा था, जिसकी ज़िन्दगी का मक़सद रास्ते की हर मुसीबत और ख़तरे का धैर्य और साहस से मुक़ाबला करते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचना होता है.  अपने उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए वह न जाने कब नींद की आग़ोश में समा गया.“  
  
यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि ज़िन्दगी के तमाम दुखों और तकलीफ़ों के बावजूद इन कहानियों में उम्मीद की एक ऐसी किरन भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. यह सूरज की रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ सुबह का उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. उनकी कहानियां पाठक को अपने साथ अहसास के दरिया में बहा ले जाती हैं.
 
फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार दैनिक भास्कर, अमर उजाला, हरिभूमि, चौथी दुनिया सहित अनेक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दी हैं. उन्होंने अनेक पुस्तकों, साप्ताहिक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. वे दूरदर्शन में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक रही हैं. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनलों के लिए भी काम किया है. वे देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फ़ीचर्स एजेंसी के लिए लिखती हैं. देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों. वे मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी सम्पादक रही हैं और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं. फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं .'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' नाम से उनके दो न्यूज़ पॉर्टल भी हैं. 

उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर, 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया. राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन (पंजीकृत) द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. 

वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली. वे कई भाषाओं की जानकार हैं और उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और इंग्लिश में लिखती हैं. 
वे बलॉग भी लिखती हैं. उनके कई बलॉग हैं. ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन पाक का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है. ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है. ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है. ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है. ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है. ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है. ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का बलॉग है. उन्होंने अनेक लेखों का अंग्रेज़ी, उर्दू और पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद किया है. उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ.  
 
बेशक उनकी शायरी किसी को भी अपना मुरीद बना लेने की तासीर रखती है, लेकिन जब वे हालात पर तब्सिरा करती हैं, तो उनकी क़लम तलवार से भी ज़्यादा तेज़ हो जाती है. उनके लेखों में ज्वलंत सवाल मिलते हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. उन्होंने विभिन्न विषयों पर हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में हज़ारों लेख लिखे हैं. वे नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन रही हैं. इसके अलावा वे ख़िदमत-ए- ख़ल्क से भी जुड़ी हैं. वे राहे-हक़ नामक स्वयंसेवी संस्था की संस्थापक व निदेशक हैं. वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक भी हैं.   

वे कहती हैं कि हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला. ज़मीन चाही, तो आसमान मिला. इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की चाह ही नहीं रही. अपने बारे में वे कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…
वे ये भी कहती हैं-
मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...

ईद के चांद की खोज में हर बरस
दिखती दुनिया बराबर ये बेज़ार है

बांटने को मगर सब पै अपनी ख़ुशी
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है

ईद दौलत नहीं, कोई दिखावा नहीं
ईद जज़्बा है दिल का, ख़ुशी की घड़ी

रस्म कोरी नहीं, जो कि केवल निभे
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !!1!!

अपने को औरों को और क़ुदरत को भी
समझने को ख़ुदा के ये फ़रमान है

है मुबारक घड़ी, करने अहसास ये
रिश्ता है हरेक का, हरेक इंसान से

है गुंथी साथ सबकी यहां ज़िंदगी
सबका मिल जुल के रहना है लाज़िम यहां

सबके ही मेल से दुनिया रंगीन है
प्यार से ख़ूबसूरत ये संसार है !!2!!

मोहब्बत, आदमीयत, मेल मिल्लत ही
तो सिखाते हैं सभी मज़हब संसार में

हो अमीरी, ग़रीबी या कि मुफ़लिसी
कोई झुलसे न नफ़रत के अंगार में

सिर्फ़ घर-गांव -शहरों ही तक में नहीं
देश दुनियां में ख़ुशियों की ख़ुशबू बसे

है ख़दा से दुआ उसे सदबुद्धि दे
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!3!!

ईद सबको ख़ुशी से गले से लगा
सिखाती बांटना आपसी प्यार है

है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी
जिसको दिल से मनाने की दरकार है

दी ख़ुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर
आदमी भूल नफ़रत रहा बांटता

राह ईमान की चलने का वायदा
ख़ुद से करने का ईद एक तेवहार है !!4!!

जो भी कुछ है यहां सब ख़ुदा का दिया
वह है सबका किसी एक का है नहीं

बस ज़रूरत है ले सब ख़ुशी से जियें
सभी हिल मिल जहां पर भी हों जो कहीं

ख़ुदा सबका है सब पर मेहरबान है
जो भी ख़ुदग़र्ज़ है वह ही बेईमान है

भाईचारा बढ़े और मोहब्बत पले
ईद का यही पैग़ाम,  इसरार है !!5!!

-प्रो.सीबी. श्रीवास्तव
ओ बी 11, विद्युत मंडल कॊलोनी, रामपुर
जबलपुर (मध्य प्रदेश)


Women continue to remain significantly underrepresented in India's High Courts, forming only a small proportion of the overall judicial strength across the country.
According to data released by the Ministry of Law and Justice on February 6, 2026, there are 116 women judges out of a total working strength of 781 judges across the High Courts, accounting for roughly 14.85% of the sitting High Court judges.

Women's representation in Supreme Court
The Supreme Court currently has only one woman judge, Justice B.V. Nagarathna, out of its present working strength of 33 judges.
No woman judge has been appointed to the Supreme Court since September 2021, when three women judges (Justices Hima Kohli, Bela Trivedi and BV Nagarathna) were elevated together to the Court. Over time, as the others retired, Justice Nagarathna remains the only woman judge currently serving on the Bench.
Historically, the highest number of women judges in the Supreme Court at any given time has been four. This occurred following the appointments made in September 2021, which briefly brought the total number of sitting women judges in the Court to four.
Today, on the occasion of International Women's Day, the Chief Justice of India, Surya Kant, called for measures to increase the representation of women on the bench. While the picture in the higher judiciary may not be positive, the representation of women in the district judiciary is quite encouraging. The CJI stated today that women judges account for nearly 37% in the district judiciary. 

High Courts: Overall Picture
Across the 25 High Courts, the Punjab & Haryana High Court has the highest number of women judges (18).  

The Punjab & Haryana High Court leads the country number-wise with 18 women judges out of a working strength of 61, accounting for 29.51% of its bench, one of the highest among major High Courts. The Delhi High Court and Madras High Court also have relatively significant representation with 10 women judges each, translating to 22.73% and 18.87% respectively.

The Bombay High Court has 12 women judges (15%), while Karnataka (9 women judges, 19.57%), Calcutta (8, 18.60%), Gujarat (7, 20%), and Telangana (7, 25%) also show comparatively better gender representation. Among smaller High Courts, Sikkim has the highest percentage representation at 33.33%, though this is based on one woman judge out of three.

At the other end of the spectrum, several High Courts continue to have extremely low representation of women judges. Madhya Pradesh High Court has only one woman judge out of a working strength of 42 (2.38%), one of the lowest ratios in the country. Allahabad High Court, the largest High Court with a working strength of 110 judges, has only 7 women judges (6.36%), reflecting a very low proportion despite its large bench. Similarly, Kerala (7.5%), Jharkhand (7.14%), Chhattisgarh (6.67%), Patna (5.26%), and Orissa (5.26%) have limited representation of women judges.

Some High Courts currently have no women judges at all. These include the Manipur High Court, Tripura High Court, and Uttarakhand High Court, each reporting zero women judges in their present working strength.

 High Court-wise Data 
Allahabad High Court 
Working strength: 110
Women judges: 7
Percentage: 6.36%

Andhra Pradesh High Court 
Working strength: 32
Women judges: 5
Percentage: 15.63%

Bombay High Court
Working strength: 80
Women judges: 12
Percentage: 15%

Calcutta High Court
Working strength: 43
Women judges: 8
Percentage: 18.60%

Chhattisgarh High Court
Working strength: 15
Women judges: 1
Percentage: 6.67%

Delhi High Court
Working strength: 44
Women judges: 10
Percentage: 22.73%

Gauhati High Court
Working strength: 25
Women judges: 5
Percentage: 20%

Gujarat High Court
Working strength: 35
Women judges: 7
Percentage: 20%

Himachal Pradesh High Court
Working strength: 12
Women judges: 1
Percentage: 8.33%

Jammu & Kashmir and Ladakh High Court
Working strength: 14
Women judges: 2
Percentage: 14.29%

Jharkhand High Court
Working strength: 14
Women judges: 1
Percentage: 7.14%

Karnataka High Court
Working strength: 46
Women judges: 9
Percentage: 19.57%

Kerala High Court
Working strength: 40
Women judges: 3
Percentage: 7.5%

Madhya Pradesh High Court
Working strength: 42
Women judges: 1
Percentage: 2.38%

Madras High Court
Working strength: 53
Women judges: 10
Percentage: 18.87%

Manipur High Court
Working strength: 3
Women judges: 0
Percentage: 0%

Meghalaya High Court
Working strength: 4
Women judges: 1
Percentage: 25%

Orissa High Court
Working strength: 19
Women judges: 1
Percentage: 5.26%

Patna High Court
Working strength: 38
Women judges: 2
Percentage: 5.26%

Punjab & Haryana High Court
Working strength: 61
Women judges: 18
Percentage: 29.51%

Rajasthan High Court
Working strength: 39
Women judges: 4
Percentage: 10.26%

Sikkim High Court
Working strength: 3
Women judges: 1
Percentage: 33.33%

Telangana High Court
Working strength: 28
Women judges: 7
Percentage: 25%

Tripura High Court
Working strength: 4
Women judges: 0
Percentage: 0%

Uttarakhand High Court
Working strength: 10
Women judges: 0
Percentage: 0%

Historical Representation Across High Courts
The historical data on women judges in High Courts since their establishment shows the following representation:
Allahabad High Court – 23 women out of 858 judges (2.68%)
Andhra Pradesh High Court – 13 out of 273 (4.76%)
Bombay High Court – 31 out of 577 (5.37%)
Calcutta High Court – 21 out of 197 (10.65%)
Chhattisgarh High Court – 2 out of 62 (3.23%)
Delhi High Court – 34 out of 290 (11.74%)
Gauhati High Court – 10 out of 174 (5.75%)
Gujarat High Court – 12 out of 232 (5.17%)
Himachal Pradesh High Court – 4 out of 84 (4.76%)
Jammu & Kashmir and Ladakh High Court – 3 out of 104 (2.88%)
Jharkhand High Court – 5 out of 56 (8.93%)
Karnataka High Court – 16 out of 300 (5.33%)
Kerala High Court – 23 out of 289 (7.96%)
Madhya Pradesh High Court – 13 out of 309 (4.21%)
Madras High Court – 27 out of 474 (5.70%)
Manipur High Court – 2 out of 32 (6.25%)
Meghalaya High Court – 3 out of 30 (10%)
Orissa High Court – 4 out of 139 (2.88%)
Patna High Court – 10 out of 376 (2.66%)
Punjab & Haryana High Court – 37 out of 425 (8.71%)
Rajasthan High Court – 11 out of 292 (3.77%)
Sikkim High Court – 1 out of 37 (2.70%)
Telangana High Court – 15 out of 62 (24.19%)
Tripura High Court – 0 out of 17 (0%)
Uttarakhand High Court – 2 out of 49 (4.08%)

Presentation by Fazil Mohammed Khan 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान के चौथे जुमे को अलविदा जुमा कहा जाता है, क्योंकि यह इस माह का आख़िरी जुमा होता है. इस्लाम में जुमे के दिन की बड़ी अहमियत और फ़ज़ीलत है. चूंकि रमज़ान साल का सबसे मुक़द्दस महीना है, इसलिए रमज़ान के अलविदा जुमे की अहमियत भी बहुत ज़्यादा है.
 
जिस तरह यहूदियों के लिए सनीचर और ईसाइयों के लिए इतवार की अहमियत है, उसी तरह मुसलमानों के लिए जुमे की अहमियत है. अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हमसे पहले के लोगों को जुमे से महरूम रखा. यहूदियों के लिए सनीचर और ईसाइयों के लिए इतवार का दिन था. फिर अल्लाह तआला हमें लाया और उसने हमारी जुमे के दिन की जानिब रहनुमाई की. उसने पहले जुमा बनाया, फिर सनीचर और उसके बाद इतवार बनाया. इसी तरह ये लोग क़यामत के दिन भी हमसे पीछे होंगे. हम भले ही दुनिया में आख़िर में आए हैं, लेकिन क़यामत के दिन हम पहले होंगे और तमाम उम्मतों में सबसे पहले हमारा फ़ैसला किया जाएगा. (मुस्लिम 856)
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि सबसे बेहतर दिन, जब पहली बार सूरज तुलूअ हुआ, वह जुमे का दिन था। इस दिन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पैदा किया गया. इसी दिन उन्हें ज़मीन पर उतारा गया. इसी दिन उनकी तौबा क़ुबूल की गई. इसी दिन उनकी वफ़ात हुई और इसी दिन क़यामत क़ायम होगी. जिन्न और इंसानों के सिवा हर शय जुमे के दिन सुबह से लेकर सूरज ढलने तक क़यामत से डरते हुए उसके इंतज़ार में रहती है. (सुनन अबु दाऊद 1046)
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बेशक जुमे का दिन तमाम दिनों का सरदार है और अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा अज़मत वाला है. यह दिन अल्लाह के यहां ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-अज़हा से भी ज़्यादा फ़ज़ीलत रखता है. (इब्ने माजा1084)
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जब जुमे का दिन आता है, तो मस्जिद के हर दरवाज़े पर फ़रिश्ते खड़े हो जाते हैं और अबसे पहले आने वाले और फिर उसके बाद आने वाले लोगों के नाम बारी-बारी से लिखते हैं. फिर जब इमाम ख़ुत्बे के लिए बैठ जाते हैं, तो वे अपनी किताब बंद कर देते हैं और ज़िक्र सुनने लगते हैं. (सही बुख़ारी 3211)        
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स जुमे के दिन ग़ुस्ल करे और ख़ूब अच्छी तरह से पाकी हासिल करे और बालों में तेल लगाए या घर में कोई ख़ुशबू मयस्सर हो, तो उसका इस्तेमाल करे यानी इत्र लगाए. फिर वह नमाज़ के लिए निकले और मस्जिद में पहुंचकर दो आदमियों के बीच में न घुसे, जितनी हो सके नफ़िल नमाज़ पढ़े और जब इमाम ख़ुत्बा शुरू करे, तो ख़ामोशी से सुनता रहे, तो उसके इस जुमे से लेकर अगले जुमे तक के तमाम गुनाह मुआफ़ कर दिए जाते हैं. (सही बुख़ारी 883, सही मुस्लिम 857)        
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जुमे के दिन में बारह घड़ियां हैं, जो भी मुसलमान उस वक़्त अल्लाह तआला से कोई सवाल करे, तो अल्लाह तआला उसे वह चीज़ अता फ़रमा देता है. लिहाज़ा इसे अस्र के बाद के लम्हों में तलाश करो. (सुनन अबु दाऊद 1048)
 
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जिसने जुमे के दिन सूरह कहफ़ पढ़ी, उसके लिए जो जुमे के दरम्यान नूर रौशन हो जाता है.  
 
जुमे की अहमियत और फ़ज़ीलत को बयान करने वाली बहुत सी हदीसें हैं. जुमे के दिन दरूद शरीफ़ पढ़ना भी बहुत ही अफ़ज़ल है. इसलिए जुमे का ज़्यादा से ज़्यादा एहतराम करना चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फहम अल क़ुरआन लिखा है)
तस्वीर गूगल से साभार 



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
माहे रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार पकवानों की बहार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ पकवानों के बग़ैर मुकम्मल ही नहीं होता. रमज़ान का ख़ास पकवान है फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है. अमूमन रोज़ा खजूर से ही खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों की चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले हुए मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ पकवान शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ौरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में मुरादाबादी बिरयानी और हैदराबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़्वान की ज़ीनत बढ़ाते हैं.

जन्नत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगवाना ज़्यादा पसंद करते हैं. रोज़े की हालत में देर तक बावर्चीख़ाने में आंच के पास खड़ा नहीं हुआ जाता. इससे प्यास की शिद्दत बढ़ जाती है और कभी-कभार चक्कर भी आने लगते हैं.     

वज़न और मर्ज़ का बढ़ना 
रमज़ान में महीनेभर रोज़े रखे जाते हैं. रोज़ेदार दिनभर भूखे और प्यासे रहते हैं. इसके बावजूद देखने में आता है कि बहुत से लोगों के वज़न में इज़ाफ़ा हो जाता है. इतना ही नहीं, शुगर भी बहुत बढ़ जाती है. जिन लोगों को शुगर नहीं है, उनके ख़ून में भी शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. और जिन्हें शुगर है, उनकी हालत तो बहुत ही बुरी हो जाती है. बहुत से लोगों को तो अस्पताल में दाख़िल होना पड़ जाता है. इसकी वजह ये है कि वे अपने खाने-पीने पर तवज्जो नहीं देते. रमज़ान में इफ़्तारी में शर्बत पिये जाते हैं, तरबूज़ और ख़रबूज़े खाए जाते हैं. फलों की चाट खाई जाती है. दिल्ली में बनने वाली फलों की चाट को कचालू कहा जाता है. इसमें कई तरह के फल शामिल होते हैं. इसमें चाट मसाले के साथ बहुत सी शक्कर भी मिलाई जाती है, जिससे इसकी मिठास बहुत बढ़ जाती है. इफ़्तारी में जलेबियां भी शामिल होती हैं, जो शीरे में तर होती हैं. फिर सहरी में दूध जलेबी, खजला, फैनी, मीठी डबल रोटी खाई जाती है. मीठा दूध पिया जाता है. अब जब इतना मीठा खाया जाएगा, तो शुगर बढ़ना तो लाज़िमी ही है.

चिकित्सकों का कहना है कि रमज़ान में मीठे का इस्तेमाल ज़्यादा होने की वजह से शुगर बढ़ जाती है. ईद के आसपास जो भी व्यक्ति शुगर की जांच करवाता है, तो उसकी शुगर बढ़ी हुई आती है. अकसर लोग रिपोर्ट देखकर डर जाते हैं और गुमान करते हैं कि उन्हें शुगर का मर्ज़ हो गया है, जबकि ऐसा नहीं होता. इसलिए ईद के 20-25 दिन बाद ही शुगर की जांच करवानी चाहिए, तभी ख़ून में शुगर की सही मात्रा का पता चल सकेगा.   
             
इसी तरह इफ़्तारी में पकौड़े, समौसे, कचौरियां, कबाब और तले हुए पापड़ वग़ैरह ख़ूब खाए जाते हैं. इनमें तेल का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी हालत में वज़न बढ़ना तो तय है. इसलिए रमज़ान में खान-पान पर ख़ास तवज्जो देकर सेहत संबंधी परेशानियों से बचा जा सकता है.  

क्या खायें 
अल्लाह ने इंसानों को ख़ूब रिज़्क़ अता किया है, जिसमें तमाम तरह के फल, मेवे, सब्ज़ियां, अनाज और गोश्त शामिल है. इनमें से इंसान को वही चीज़ें खाने का हुक्म है, जो हलाल क़रार दी गई हैं.  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और जो हलाल पाकीज़ा रिज़्क़ अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ व पियो और अल्लाह से डरते रहो, जिस पर तुम ईमान रखते हो.”
(क़ुरआन 5:88)

खाने के भी आदाब हुआ करते हैं. जो निवाला हम खाते हैं, वह कितने ही मरहलों से गुज़र कर हम तक पहुंचता है. अनाज, सब्ज़ियां, फल और मेवे खेतों और बाग़ों से होते हुए बाज़ार पहुंचते हैं और फिर न जाने कितने हाथों से होकर हमारे दस्तरख़्वान तक आते हैं. इन्हें अपने दस्तरख़्वान तक लाने के लिए हमें कितनी मेहनत करनी पड़ती है. ये खाना ही तो है, जिसके लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है और देस से परदेस जाता है, अपना घर-परिवार छोड़कर न जाने कहां-कहां की ख़ाक छानता फिरता है. इसलिए वक़्त पर जो खाना मिले, अल्लाह का शुक्र अदा करके उसे खा लेना चाहिए. खाने में ऐब नहीं निकालने चाहिए. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने परवरदिगार के ज़िक्र के साथ खाना नोश फ़रमाया करते थे. बन्दा जब खाना खाता है, तो उसे इस बात का अहसास होना चाहिए कि ये रिज़्क़ अल्लाह ने अता किया है. ये उसका हम पर कितना बड़ा करम है कि वह अपने बन्दों को रिज़्क़ देना नहीं भूलता. 

खाना ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खाना चाहिए. अकसर लोग कहते हैं कि पेट भर गया, लेकिन नीयत नहीं भरी, इसलिए ज़्यादा खाना खा लिया. अगर इतना ही खाना खाए जाए, जितनी जिस्म को ज़रूरत है, तो ये सेहत के लिए बेहतर है. पेट का एक तिहाई हिस्सा खाने के लिए, एक तिहाई पानी के लिए और एक तिहाई हवा के लिए रखना चाहिए. जब भूख लगे, तभी खाना चाहिए और थोड़ी सी भूख बाक़ी रहने पर खाना छोड़ देना चाहिए. ऐसा करने से जो कुछ खाया है, वह जिस्म को लगेगा और सेहत भी अच्छी रहेगी. 

सहरी के वक़्त ऐसी चीज़ें खानी चाहिए, जिससे दिनभर जिस्म को ताक़त मिलती रहे. इसलिए सहरी में प्रोटीन और फ़ाइबर से भरपूर चीज़ें खानी चाहिए. इन्हें खाने से लम्बे वक़्त तक प्यास और भूख नहीं लगती. इस दौरान ज़्यादा से ज़्यादा दूध पीना चाहिए. पानी भी ख़ूब पीना चाहिए, ताकि प्यास की शिद्दत देर से शरू हो. सहरी में खजूर खाना भी बहुत ही मुफ़ीद है.  

एक हदीस में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “खजूर बेहतरीन सहरी है.“ एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ”खजूर मोमिन की अच्छी सेहरी है.“ 

इंसान के जिस्म में बहुत से ज़हरीले तत्व इकट्ठे होते रहते हैं, जिससे कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “नाश्ते में खजूर खाओ, ताकि तुम्हारे जिस्म में मौजूद जरासीम का ख़ात्मा हो जाए. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिस शख़्स ने नहार मुंह अज्वा खजूर के सात दाने खाए, उस दिन उसे न कोई ज़हर नुक़सान पहुंचाएगा और न कोई जादू.”
(मुस्लिम, अबू दाऊद)   

खजूर इफ़्तारी की जान है. इसके बिना इफ़्तारी मुकम्मल ही नहीं होती. खजूर फल भी है और मेवा भी है. इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, प्रोटीन, मैंगनीज़, मैग्नीशियम, फ़ॉस्फ़ोरस, विटामिन बी6, विटामिन ए, विटामिन के और फ़ाइबर आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे जिस्म को बीमारियों से बचाते हैं. खजूर की तरह अंगूर भी फल और मेवा दोनों ही तौर पर बेहद फ़ायदेमंद है. तरबूज़ रोज़े के दौरान जिस्म में हुई पानी की कमी को पूरा करता है. 

क्या न खाएं 
रमज़ान में अल्लाह रिज़्क़ में इज़ाफ़ा कर देता है. इसलिए अल्लाह की अता की हुई हर नेअमत चखें. लेकिन इस बात का ख़्याल रखें कि इतना ही खाएं, जितनी ज़रूरत हो. जिन लोगों को शुगर है, उन्हें मीठा खाने से परहेज़ करना चाहिए. रक्तचाप के मरीज़ों को भी अपनी सेहत का ख़्याल रखते हुए ऐसी चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए, जिनसे उनका रक्तचाप बढ़ सकता है. जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है, उन्हें तले हुए खाने से बचना चाहिए. ऐसा न करने पर उन्हें हृदय संबंधी समस्या हो सकती है. दिल के मरीज़ों को भी तली हुई और मसालेदार चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए. थायरॉइड के मरीज़ भी खाने पीने का ख़ास ख़्याल रखें. जिन लोगों का वज़न बहुत ज़्यादा है, उन्हें तली हुई और मिर्च-मसालेदार चीज़ों से दूर रहना चाहिए, वरना उनके वज़न में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो जाएगा, जो उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. 

जो लोग नियमित रूप से दवाएं खा रहे हैं, उन्हें सहरी में और इफ़्तार के बाद फ़ौरन दवा खा लेनी चाहिए. बेहतर होगा कि जो लोग किसी बीमारी में मुब्तिला हैं, वे चिकित्सक की सलाह पर ही रोज़ा रखने का फ़ैसला करें. वैसे भी अल्लाह ने बीमारी की हालत में रोज़ा रखने में छूट दी है. अगर कोई शख़्स बीमारी या ऐसी ही किसी और वजह से रोज़ा रखने की ताक़त न रखता हो, तो उस पर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.

ख़ास बात ये भी है कि खाना खाते वक़्त पानी न पिया जाए. खाना खाने के कम से कम आधे घंटे बाद पानी पीना चाहिए. लेकिन इफ़्तार के वक़्त ऐसा नहीं हो पाता. प्यास की शिद्दत की वजह से रोज़ेदार एक साथ बहुत ज़्यादा पानी पी लेते हैं. ऐसा करने से बचना चाहिए, क्योंकि ये सेहत के लिए ठीक नहीं है. कोशिश करें कि घूंट-घूंट पानी पियें. इससे प्यास बुझ जाती है. नीम्बू का शर्बत या शिकंजी बेहतरीन ग़िज़ा है. इससे प्यास भी बुझती है और जिस्म में पोषक तत्वों की कमी भी कुछ हद तक पूरी होती है. 

रमज़ान में ज़्यादा चाय, कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ये सभी चीज़ें जिस्म में मौजूद पानी को सोख लेती हैं. इन चीज़ों से एसिडिटी की समस्या भी हो सकती है. रमज़ान में कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाने से भी बचना चाहिए. वैसे भी कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाकर मस्जिद में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इनकी बू से दूसरों को परेशानी होती है.

सबसे अहम बात ये भी है कि इंसान को सिर्फ़ हलाल रिज़्क़ ही खाना चाहिए. बेईमानी से कमाए गये पैसे से ख़रीदा गया रिज़्क़ हलाल तो नहीं हो सकता. इसलिए ख़ुद को उन कामों से बचाएं, जिन्हें अल्लाह ने हराम क़रार दिया है. अल्लाह ने मेहनत-मशक़्क़त की कमाई में बरकत दी है. बहरहाल, रमज़ान में अपनी सेहत का ख़ास ख़्याल रखें. अगर सेहत सही होगी, तभी तो इबादत भी हो पाएगी. 
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)  
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल   


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