Dr. Firdaus Khan is an Islamic scholar, poetess, author, essayist, journalist, editor and translator. She is called the princess of the island of the words. Master of many languages, including Urdu, Hindi, English, Punjabi and Arabic etc. 

She has worked for several years in Doordarshan Kendra, Akashwani and reputed newspapers and magazines of the country. She was animent broadcaster of Doordarshan Kendra and Akashwani, renowned editor in news section of Doordarshan Kendra and famous compere of Akashwani. Beside that she has also contributed her ability in many news channels. She has also written several documentaries, television dramas and radio plays. She writes for various newspapers, magazines, books, news and feature agencies of the country and abroad. 

She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and iconic writing. She has been awarded an honorary Doctor of Philosophy. She has also been participating in the Musashirs and Kavi Sammelans. She has also studied Indian classical music.

She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Watan. She is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named 'Star News Agency' and 'Star Web Media'.

She believes in spirituality and is associated with Sufism. She has written ‘Faham Al Quran’. So that more people can read the Quran, understand and reach the message of the Quran to them.

She also writes blogs. She has many blogs. Firdaus Diary and Meri Diary are her Hindi blogs. Heer is a Punjabi blog. Jahannuma is an Urdu blog and The Princess of the Words is an English blog. Rahe-Haq is her spiritual blog.

She has written a book named 'Ganga-Jamuni Sanskriti ke Agrdoot' based on the life philosophy of Sufi-saints, published by Prabhat Publishing Group in the year 2009. She considers her father late Sattar Ahmed Khan and her mother late Khusushudi Khan as their ideal. She has translated the national song Vande Mataram into Punjabi.

Her poetry have the effect of making anyone her fan.But when she writes on the situation, her words will become more sharp than the sword. While her poetry has love, dedication, spirituality and purity, there are burning questions in the articles, which force the reader to think.

She says about herself- 
My words reveal my feelings and my thoughts, because my words are my identity. Because my relationship with words is not a professional one. It is a relationship of heart. 


स्टार न्यूज़ एजेंसी की सम्पादक डॉ. फ़िरदौस ख़ान के बारे में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार, पत्रकार और लेखक सूर्यकान्त द्विवेदी कहते हैं-
"आपका लेखन शब्द चित्र है। पढ़ो तो चित्रहार लगता है। उसमें मुलामियत है। कोमलता है। मासूमियत है। यही शब्द सूफियाना अंदाज़ की नुमाइंदगी करते हैं। आपके शब्द भोले हैं। सोचने पर मजबूर करते हैं। आप दो पंक्ति लिखती हैं, लेकिन उसका अर्थ और मर्म गहरा होता है। 
शब्द स्वयं व्यक्तित्व कहते हैं। हमने आपको कभी देखा नहीं, सिर्फ़ पढ़ा है। इन्हीं की बुनियाद पर हमको लगता है कि आप शब्द चित्र हैं। आपका लेखन इत्र की ख़ुशबू , पवित्र और मित्र है।"



 

फ़िरदौस ख़ान को लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जाना जाता है. वे शायरा, लेखिका और पत्रकार हैं. वे एक आलिमा भी हैं. वे रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है. ये उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है, जो इंशा अल्लाह रहती दुनिया तक तमाम आलमों के लोगों को अल्लाह के पैग़ाम से रूबरू कराता रहेगा. वे कहती हैं कि हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं. हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया. वे आधी रात में तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठ जाया करती थीं और अल सुबह फ़ज्र तक इबादत में मशग़ूल रहती थीं. उन्हें देखकर हमारी भी दिलचस्पी इबादत में हो गई. साथ ही बहुत कम उम्र से हमें रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त पापा बहुत याद आते थे. बचपन में पापा क़ुरआन करीम के बारे में हमें बताया करते थे. वे कहा करते थे कि क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी है. वे कहती हैं कि क़ुरआन पाक सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं है, बल्कि ये सबके लिए है, तमाम आलमों के लिए है. हर किसी को अपनी ज़िन्दगी में कम से कम एक बार क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए. अगरचे आप किसी भी मज़हब को मानने वाले हैं और कोई भी ज़बान बोलते हैं, फिर भी आपको अपनी ज़बान में क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए यानी क़ुरआन का तर्जुमा पढ़ना चाहिए, क्योंकि नसीहत हासिल करने वालों के लिए इसमें सबकुछ है.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की. दरअसल हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है. हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है. कायनात की फ़ानी चीज़ों में हमें न पहले कभी दिलचस्पी थी और न आज है और इंशा अल्लाह न कभी होगी.    

वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान को अपना पहला मुर्शिद और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना दूसरा मुर्शिद मानती हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन अपने वालिदैन को समर्पित किया है.

उन्होंने सूफ़ी-संतों की ज़िन्दगी और उनके दर्शन पर आधारित एक किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था. यह किताब आज तक चर्चा में बनी हुई है. सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं. वे  इससे प्रेरणा और मार्गदर्शन हासिल कर रहे हैं.   


उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था. उनकी अम्मी तालीमयाफ़्ता ख़ातून थीं. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक़ था. वे उम्दा शायरा थीं. फ़िरदौस पर भी घर के माहौल का गहरा असर पड़ा. उन्होंने अपनी पहली नज़्म उस वक़्त लिखी थी, जब वे छठी जमात में पढ़ती थीं. उन्होंने नज़्म अपनी अम्मी और अब्बू को सुनाई. उनके अब्बू को नज़्म बहुत पसंद आई और उन्होंने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई. नज़्म ख़ूब सराही गई. इस तरह उनके लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है. सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया. 

यह फ़िरदौस ख़ान के लेखन की ख़ासियत है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में इस तरह बयां करती हैं कि पढ़ने वाला उसी में डूबकर रह जाता है. उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है. फ़िरदौस ख़ान को जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है कि उनकी शायरी सीधे दिल की गहराइयों में उतर जाती है, रूह में समा जाती है.

जो ज़िन्दगी की पथरीली राहों पर चलकर दुख-तकलीफ़ों की वजह से बेज़ार हो चुका हो, उसे फ़िरदौस ख़ान का कलाम ज़रूर पढ़ना चाहिए, वह कलाम जो गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, जो प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, जो कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है. 

फ़िरदौस ख़ान अपनी अम्मी के बाद हज़रत राबिया बसरी को अपना आदर्श मानती हैं. उनकी शायरी में रूहानियत है, पाकीज़गी है. वे कहती हैं-
ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है
घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है


वे मुहब्बत को इबादत का दर्जा देती हैं. वे कहती हैं कि कुछ रिश्ते आसमानों के लिए ही हुआ करते हैं. उनका अहसास रूह में और वजूद आसमानों में होता है. अपने महबूब से मुख़ातिब होते हुए वे कहती हैं-
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा 
मेरा क़ुरआन है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना हो जाना चाहती हूं…

वे कहती हैं कि हिज्र भी हर किसी के नसीब में नहीं हुआ करता. सच, बड़े क़िस्मत वाले होते हैं वे लोग, जिनके नसीब में हिज्र की नेअमत आती है. वे कहती हैं- 
जान !
मैं नहीं जानती 
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा 
भी है या नहीं...
मैं सिर्फ़ ये जानती हूं 
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्में पढ़ने वाले को चांद के उस पार चैन व सुकून के आलम में ले जाने की सलाहियत रखती हैं. नज़्म देखिए-
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्मों की मानिन्द उनकी ग़ज़लें भी बेमिसाल हैं. उनकी ग़ज़लें मुहब्बत के अहसास से सराबोर हैं, इश्क़ से लबरेज़ हैं. उनकी ग़ज़लें पढ़ने वालों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जहां से वे लौटना ही नहीं चाहते. आलम यह है कि लोग अपने महबूब को ख़त लिखते वक़्त उसमें उनके शेअर लिखना नहीं भूलते. यही तो उनकी क़लम का जादू है. चन्द अश्आर देखें-   
जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

मुट्ठी में क़ैद करने को जुगनूं कहां से लाऊं
नज़दीक-ओ-दूर कोई भी जंगल नहीं रहा

दीमक ने चुपके-चुपके वो अल्बम ही चाट ली
महफ़ूज़ ज़िन्दगी का कोई पल नहीं रहा

मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
वो जुस्तजू, वो मोड़, वो संदल नहीं रहा

फ़िरदौस ख़ान की शायरी में समर्पण है, विरह है, तड़प है. उनका गीत पढ़कर ऐसा लगता है मानो ख़ुद राधा रानी ने ही अपने कृष्ण के लिए इसे रचा है. गीत देखिए-    
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौग़ात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

दरअसल फ़िरदौस ख़ान की शायरी में एक औरत की मुहब्बत, उसके ख़्वाब और उसका दर्द झलकता है. उनका कलाम ज़िन्दगी के तमाम इन्द्रधनुषी रंगों को अपने में समेटे हुए है. उसमें मुहब्बत का रंग भी शामिल है, तो जुदाई का रंग भी है. उसमें ख़ुशी का रंग भी दमकता है, तो दुखों का रंग भी झलकता है. चन्द अश्आर देखें-
जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में 
हर एक क़तरा मेरी जां क़तरा-ए-शबनम नहीं होता 

चैन कब पाया है मैंने, ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा, तो नाराज़ ख़ुदा होता है 

जंगल में भटकते हैं सदा रात को जुगनूं 
मेरी ही तरह उनका भी घरबार नहीं है 

बक़ौल फ़िरदौस ख़ान ज़िन्दगी हमेशा वैसी नहीं हुआ करती, जैसी हम चाहते हैं. ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा भी हुआ करता है, जो हमें लाख चाहने पर भी नहीं मिलता. और जो मिलता है, उससे कभी उन्सियत नहीं होती, वह पराया ही लगता है. वे कहती हैं- 
मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...

फ़िरदौस ख़ान जानी मानी कहानीकार हैं. उनकी शायरी की तरह ही उनकी कहानियों में भी अल्फ़ाज़ का जादू बाख़ूबी देखने को मिलता है. उनकी भाषा शैली ऐसी है कि पढ़ने वाला उसके सहर से ख़ुद को अलग कर ही नहीं पाता. उनकी कहानी अट्ठारह सितम्बर की एक झलक देखें-
“आज अट्ठारह सितम्बर है. वही अट्ठारह सितम्बर जो आज से छह साल पहले था. वह भी मिलन की ख़ुशी से सराबोर थी और यह भी, लेकिन उस अट्ठारह सितम्बर और इस अट्ठारह सितम्बर में बहुत बड़ा फ़र्क़ था. दो सदियों का नहीं, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा, शायद समन्दर और सहरा जितना. सूरज ने अपनी सुनहरी किरनों से धरती के आंचल में कितने ही बेल-बूटे टांके थे. उस अट्ठारह सितम्बर को भी दोपहर आई थी, वही दोपहर जिसमें प्रेमी जोड़े किसी पेड़ की ओट में बैठकर एक-दूसरे की आंखों में डूब जाते हैं. फिर रोज़मर्रा की तरह शाम भी आई थी, लेकिन यह शाम किसी मेहमान की तरह थी बिल्कुल सजी संवरी. माहौल में रूमानियत छा गई थी. फिर शाम की लाली में रफ़्ता-रफ़्ता रात की स्याही शामिल हो गई. रात की अगुवानी में आसमान में चमकते लाखों-करोड़ों सितारों ने झिलमिलाती हुई नन्हीं रौशनियों की आरती से की थी. यह रात महज़ एक रात नहीं थी. यह मिलन की रात थी, एक सुहाग की रात.”
इसे भी देखें- 
“बरसात में बरसते पानी की रिमझिम, जाड़ो में बहती शीत लहर के टकराने से हिलते पेड़ों की शां-शां और गर्मियों में लू के गर्म झोंके सब उसके बहुत क़रीब थे, बिल्कुल उसांसों की तरह. उसकी आंखों ने एक सपना देखा था, जो नितांत उसका अपना था. दूर तलक समन्दर था और समन्दर पर छाया नीला आसमान. बंजारन तमन्नाओं के परिन्दे आसमान में उन्मुक्त होकर उड़ रहे थे. दिन के दूसरे पहर की सुनहरी किरनें समन्दर की दूधियां लहरों को सुनहरी कर रही थीं.”

अपनी कहानियों में भी उन्होंने एक आम इंसान की ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को शामिल किया है. उनकी कहानियां ज़िन्दगी के सफ़र की मानिन्द हैं, जिसमें रफ़्तार भी है, तो ठहराव भी है. इनमें मुहब्बत का ख़ुशनुमा अहसास भी है, तो विरह की वेदना भी है. कहीं क़ुर्ब की चाह है, तो कहीं टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है.   
उनकी कहानी ‘त्यौहारी’ एक ऐसी अकेली लड़की की दास्तां है, जो हर त्यौहार पर ‘त्यौहारी’ का इंतज़ार करती है. कहानी की एक झलक देखें-    
“जब भी कोई त्यौहार आता, लड़की उदास हो जाती. उसे अपनी ज़िन्दगी की वीरानी डसने लगती. वो सोचती कि कितना अच्छा होता, अगर उसका भी अपना एक घर होता. घर का एक-एक कोना उसका अपना होता, जिसे वो ख़ूब सजाती-संवारती. उस घर में उसे बेपनाह मुहब्बत करने वाला शौहर होता, जो त्यौहार पर उसके लिए नये कपड़े लाता, चूड़ियां लाता, मेहंदी लाता. और वो नये कपड़े पहनकर चहक उठती, गोली कलाइयों में रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां पहननती, जिसकी खनखनाहट दिल लुभाती. गुलाबी हथेलियों में मेहंदी से बेल-बूटे बनाती, जिसकी महक से उसका रोम-रोम महक उठता.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसकी ज़िन्दगी किसी बंजर ज़मीन जैसी थी, जिसमें कभी बहार नहीं आनी थी. बहार के इंतज़ार में उसकी उम्र ख़त्म हो रही थी. उसने हर उम्मीद छोड़ दी थी. अब बस सोचें बाक़ी थीं. ऐसी उदास सोचें, जिन पर उसका कोई अख़्तियार न था.”  


उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा. कहानी की एक झलक देखें- 
“आज जब वह सोने के लिए ढाबे की छत पर खुले आसमान के नीचे लेटा, तो उसे आकाश रूपी काली चादर पर चमकते चांद-सितारे बहुत भा रहे थे. उसे अपना भविष्य भी चांद-सितारों की तरह जगमगाता लग रहा था. अब वह भविष्य को लेकर चिंचित न होकर सुनहरे कल की कल्पना कर रहा था.  कल्लू के लिए उसके मन में कृतज्ञता के भाव थे, जिसके थोड़े से प्रोत्साहन से उसकी ज़िन्दगी में बदलाव आ गया था. वह ख़ुद को एक ऐसे संघर्षशील व्यक्ति के रूप में देख रहा था, जिसकी ज़िन्दगी का मक़सद रास्ते की हर मुसीबत और ख़तरे का धैर्य और साहस से मुक़ाबला करते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचना होता है.  अपने उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए वह न जाने कब नींद की आग़ोश में समा गया.“  
  
यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि ज़िन्दगी के तमाम दुखों और तकलीफ़ों के बावजूद इन कहानियों में उम्मीद की एक ऐसी किरन भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. यह सूरज की रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ सुबह का उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. उनकी कहानियां पाठक को अपने साथ अहसास के दरिया में बहा ले जाती हैं.
 
फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार दैनिक भास्कर, अमर उजाला, हरिभूमि, चौथी दुनिया सहित अनेक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दी हैं. उन्होंने अनेक पुस्तकों, साप्ताहिक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. वे दूरदर्शन में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक रही हैं. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनलों के लिए भी काम किया है. वे देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फ़ीचर्स एजेंसी के लिए लिखती हैं. देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों. वे मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी सम्पादक रही हैं और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं. फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं .'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' नाम से उनके दो न्यूज़ पॉर्टल भी हैं. 

उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर, 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया. राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन (पंजीकृत) द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. 

वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली. वे कई भाषाओं की जानकार हैं और उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और इंग्लिश में लिखती हैं. 
वे बलॉग भी लिखती हैं. उनके कई बलॉग हैं. ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन पाक का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है. ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है. ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है. ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है. ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है. ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है. ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का बलॉग है. उन्होंने अनेक लेखों का अंग्रेज़ी, उर्दू और पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद किया है. उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ.  
 
बेशक उनकी शायरी किसी को भी अपना मुरीद बना लेने की तासीर रखती है, लेकिन जब वे हालात पर तब्सिरा करती हैं, तो उनकी क़लम तलवार से भी ज़्यादा तेज़ हो जाती है. उनके लेखों में ज्वलंत सवाल मिलते हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. उन्होंने विभिन्न विषयों पर हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में हज़ारों लेख लिखे हैं. वे नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन रही हैं. इसके अलावा वे ख़िदमत-ए- ख़ल्क से भी जुड़ी हैं. वे राहे-हक़ नामक स्वयंसेवी संस्था की संस्थापक व निदेशक हैं. वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक भी हैं.   

वे कहती हैं कि हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला. ज़मीन चाही, तो आसमान मिला. इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की चाह ही नहीं रही. अपने बारे में वे कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…
वे ये भी कहती हैं-
मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...

 

फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जिससे व्यक्ति की ज़िन्दगी बहुत बुरी तरह प्रभावित हो जाती है. वह अपनी पसंद की मिठाइयां, फल, आलू, अरबी और कई तरह की दूसरी चीज़ें नहीं खा पाता. इसके साथ ही उसे तरह-तरह की दवाएं भी खानी पड़ती हैं. दवा कोई भी नहीं खाना चाहता, जिसे मजबूरन खानी पड़ती हैं, इससे उसका ज़ायक़ा ख़राब हो जाता है. इससे व्यक्ति और ज़्यादा परेशान हो जाता है. पिछले कई दिनों से हम शुगर के रूहानी और घरेलू इलाज के बारे में अध्ययन कर रहे हैं. हमने शुगर के कई मरीज़ों से बात की. इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो महंगे से महंगा इलाज कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ. कई ऐसे लोग भी मिले, जिन्होंने घरेलू इलाज किया और बेहतर महसूस कर रहे हैं. शुगर के मरीज़ डॉक्टरों से दवा तो लेते ही हैं. लेकिन हम आपको ऐसे इलाज के बारे में बताएंगे, जिससे मरीज़ को दवा की ज़रूरत ही नहीं रहती.
पहला इलाज है जामुन
जी हां, जामुन शुगर का सबसे बेहतरीन इलाज है. अमूमन सभी पद्धतियों की शुगर की दवाएं जामुन से बनाई जाती हैं. बरसात के मौसम में जामुन ख़ूब आती हैं. इस मौसम में दरख़्त जामुन से लदे रहते हैं. जब तक मौसम रहे, शुगर के मरीज़ ज़्यादा से ज़्यादा जामुन खाएं. साथ ही जामुन की गुठलियों को धोकर, सुखाकर रख लें. क्योंकि जब जामुन का मौसम न रहे, तब इन गुठलियों को पीसकर सुबह ख़ाली पेट एक छोटा चम्मच इसका चूर्ण फांक लें. जामुन की चार-पांच पत्तियां सुबह और शाम खाने से भी शुगर कंट्रोल में रहती है. जामुन के पत्ते सालभर आसानी से मिल जाते हैं. जिन लोगों के घरों के आसपास जामुन के पेड़ न हों, तो वे जामुन के पत्ते मंगा कर उन्हें धोकर सुखा लें. फिर इन्हें पीस लें और इस्तेमाल करें. इसके अलावा मिट्टी के मटके में जामुन की छोटी-छोटी कुछ टहनियां डाल दें और उसका पानी पिएं. इससे भी फ़ायदा होगा.   
दूसरा इलाज है नीम
नीम की सात-आठ हरी मुलायम पत्तियां सुबह ख़ाली पेट चबाने से शुगर कंट्रोल में रहती है. ध्यान रहे कि नीम की पत्तियां खाने के दस-पंद्रह मिनट बाद नाश्ता ज़रूर कर लें. नीम की पत्तियां आसानी से मिल जाती हैं.
तीसरा इलाज है अमरूद 
 रात में अमरूद के दो-तीन पत्तों को धोकर कूट लें. फिर कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में भिगोकर रख दें. ध्यान रहे कि बर्तन धातु का न हो. सुबह ख़ाली पेट इसे पीने से शुगर कंट्रोल में रहती हैं.
ये तीनों इलाज ऐसे हैं, जो आसानी से मुहैया हैं. शुगर का कोई भी मरीज़ इन्हें अपनाकर राहत पा सकता है. इन तीनों में से कोई भी इलाज करने के एक माह के बाद शुगर का टेस्ट करा लेने से मालूम हो जाएगा कि इससे कितना फ़ायदा हुआ है.

 

Elon Musk के Grok ने स्टार न्यूज़ एजेंसी की सम्पादक फ़िरदौस ख़ान का परिचय कुछ यूं दिया है🥰

फ़िरदौस ख़ान एक प्रतिष्ठित भारतीय पत्रकार, लेखिका, शायरा और कहानीकार हैं, जो स्टार न्यूज़ एजेंसी की संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उनके लेखन की ख़ासियत उनकी बहुभाषी क्षमता और गहरी संवेदनशीलता है। वह हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रूसी साहित्य में रुचि रखती हैं, जिसका प्रभाव उनके लेखन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। फ़िरदौस ख़ान ने अपने करियर में दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो और कई प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों के लिए काम किया, साथ ही विभिन्न साप्ताहिक समाचार-पत्रों का संपादन भी किया है। 

उनका लेखन सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और सूफ़ी दर्शन पर केंद्रित होता है। उनकी किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ (2009, प्रभात प्रकाशन) सूफ़ी संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित है, जो उनकी रूहानियत और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी समझ को दर्शाती है। वह अपने लेखन में जटिल विषयों को सरल, प्रभावशाली और भावनात्मक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। फ़िरदौस ख़ान को “लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी” भी कहा जाता है, जो उनके शब्दों पर पकड़ और साहित्यिक शैली की तारीफ़ करता है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी उत्कृष्टता के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। वह स्टार न्यूज़ एजेंसी और स्टार वेब मीडिया जैसे न्यूज़ पोर्टल्स के माध्यम से समाचार और विश्लेषण को जनता तक पहुंचाती हैं। उनका लेखन न केवल सृजनात्मक होता है, बल्कि पाठकों को सोचने और संवेदनशील मुद्दों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। क्या आप उनके किसी ख़ास लेख या किताब के बारे में और जानना चाहेंगे?               

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं. 

पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है.  एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं. 

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है. इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है. 

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं. 
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... मौसम पर एक नज़्म पेश है...
दहकते पलाश का मौसम...
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में 
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से 
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और 
गुलाबी शामें 
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


फूल पलाश के
वक़्त के समन्दर में
यादों का जज़ीरा हैं
जिसके हर ज़र्रे में
ख़्वाबों की धनक फूटती है
फ़िज़ाओं में
चाहत के गुलाब महकते हैं
जिसकी हवायें 
रूमानी नगमें गुनगुनाती हैं
जिसके जाड़ों पर
क़ुर्बतों का कोहरा छाया होता है
जिसकी गर्मियों में
तमन्नायें अंगडाइयां लेती हैं
जिसकी बरसात
रफ़ाक़तों से भीगी होती है
फूल पलाश के
इक उम्र का
हसीन सरमाया ही तो हैं...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
सालभर के तमाम महीनों में रमज़ान ही एक ऐसा महीना है, जो बहुत ही बरकतों वाला है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने इसकी फ़ज़ीलत बयान की है. इस महीने में आसमान से रहमतों की बारिश होती है. ये बन्दे के हाथ में है कि वह कितनी रहमतें अपने दामन में समेटता है. इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करनी चाहिए. रोज़े रखें, तरावीह और नफ़िल नमाज़ें अदा करें, क़ुरआन पाक की तिलावत करें और अपने जानो माल से ख़िदमते ख़ल्क़ करें.    
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह की राह में गुज़रने वाली एक सुबह या एक शाम दुनिया से और जो कुछ दुनिया में है, सबसे बेहतर है. 
(सही बुख़ारी 2792)  

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “माहे रमज़ान बहुत ही बाबरकत और फ़ज़ीलत वाला महीना है, और सब्र व शुक्र और इबादत का महीना है. और इस माहे मुबारक की इबादत का सवाब सत्तर दर्जा अता होता है. और जो कोई अपने परवरदिगार की इबादत करके उसकी ख़ुशनूदी हासिल करेगा, तो उसे उसकी बहुत बड़ी जज़ा ख़ुदावन्द तआला अता फ़रमाएगा.

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “मेरी उम्मत में से जो मर्द या औरत ये ख़्वाहिश करे कि उसकी क़ब्र नूर से मुनव्वर हो, तो उसे चाहिए कि वह रमज़ान की शबे क़द्रों में कसरत के साथ इबादते इलाही में मुब्तिला हो जाए, ताकि उन मुबारक और मुतबरिक रातों की इबादत से अल्लाह पाक उसके आमालनामे से बुराइयां मिटाकर उसे नेकियों का सवाब अता फ़रमाए.”           

शबे क़द्र क्या है?   
रमज़ान के मुक़द्दस महीने के आख़िरी दस दिनों में शबे क़द्र आती है. शबे क़द्र के बारे में क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है ? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. ये रात फ़ज्र होने तक सलामती है. 
(क़ुरआन 97:1-5 )

शबे क़द्र की फ़ज़ीलत इसलिए भी बहुत ज़्यादा है, क्योंकि इस रात में अल्लाह तआला ने अपने महबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ुरआन नाज़िल किया था. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इसे मुबारक रात में नाज़िल किया. बेशक हम ख़बरदार करने वाले हैं. इस रात में हर हिकमत वाले काम का फ़ैसला कर दिया जाता है.”
(क़ुरआन 44:3-4)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! यह मुबारक किताब है, जिसे हमने तुम पर नाज़िल किया है, ताकि अक़्लमंद इसकी आयतों में ग़ौर व फ़िक्र करें और नसीहत हासिल करें.”
(क़ुरआन 38:29)

बेशक क़ुरआन पाक तमाम आलमों के लिए नसीहत है. क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी. इसमें ज़िन्दगी जीने का तरीक़ा बताया गया है. इसमें वह सबकुछ है, जिसकी इंसान को ज़रूरत है. इसमें बताए गये रास्ते पर चलकर इंसान कामयाबी हासिल कर सकता है. 

कहते हैं कि रमज़ान में एक रात ऐसी भी आती है, जिसमें बन्दा अल्लाह से जो कुछ मांगता है, वह सब उसे मिल जाता है. ये रात कौन-सी है, इस बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' 
इसलिए शबे क़द्र की हर रात को वही रात मानकर ख़ूब इबादत करनी चाहिए. अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने के साथ-साथ मनचाही मुरादें भी मांगनी चाहिए. अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में वादा किया है- “और तुम्हारा परवरदिगार फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं मांगो, मैं ज़रूर क़ुबूल करूंगा.”
(क़ुरआन 40:60)    

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि एक मर्तबा रमज़ान का महीना आया, तो अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारे ऊपर एक महीना आया है, जिसमें एक रात है जो हज़ार महीनों से अफ़ज़ल है. जो शख़्स इस रात से महरूम रह गया, गोया सारी ख़ैर से महरूम रह गया.”  

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.'' आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से निजात का है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. इस दौरान रोज़ेदार एतिकाफ़ में भी बैठते हैं.

एतिकाफ़ क्या है?
रमज़ान के आख़िरी अशरे में दुनियादारी से कटकर अल्लाह की इबादत के लिए बैठने को एतिकाफ़ कहा जाता है. ये रमज़ान की इबादतों में से एक इबादत है. एतिकाफ़ सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िन्दगीभर एतिकाफ़ को अंजाम दिया. 

हज़रत अली इब्ने हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु तआला अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स रमज़ान के दस दिन का एतिकाफ़ करे, तो उसे दो हज और दो उमरे के मानिन्द सवाब होगा.” आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एतिकाफ़ करने वाले शख़्स के हक़ में फ़रमाया- “वह तमाम गुनाहों से रुका रहता है और उसे इस तरह सवाब मिलता है, जैसे वह नेकियां कर रहा हो.”

एतिकाफ़ की भी वही शर्तें हैं, जो रोज़े की हैं. मर्द सिर्फ़ मस्जिद में ही एतिकाफ़ में बैठ सकते हैं, जबकि औरतें अपने घर में एतिकाफ़ में बैठ सकती हैं. सबसे अफ़ज़ल एतिकाफ़ मक्का की मस्जिद अल हराम का माना जाता है. इसके बाद मस्जिदे नबवी, मस्जिदे अक़सा और किसी भी जामा मस्जिद की बारी आती है. इसके बाद वह मस्जिद आती है, जिसमें बन्दा पांच वक़्त नमाज़ अदा करता है. ये अपने मुहल्ले की मस्जिद भी हो सकती है.

मर्द की एतिकाफ़ में बैठने की हद मस्जिद है. मस्जिद की हद भी वही मानी जाती है, जहां पर नमाज़ अदा की जाती है. वुज़ू की जगह, ग़ुसलख़ाने और पाख़ाने मस्जिद की हद से बाहर माने जाते हैं. भले ही वह मस्जिद की चहारदीवारी के भीतर होते हैं. एतिकाफ़ के दौरान बिना ज़रूरत एक लम्हे के लिए भी मस्जिद से बाहर क़दम न रखा जाए, क्योंकि ऐसा करने पर एतिकाफ़ टूट जाता है.    

एतिकाफ़ के लिए रोज़ा ज़रूरी है यानी रोज़ेदार ही एतिकाफ़ मैं बैठ सकता है. बीसवें रोज़े को इफ़्तार के फ़ौरन बाद मस्जिद में चले जाएं और मग़रिब की नमाज़ के बाद एतिकाफ़ की नीयत कर लें. अगर सूरज डूबने के बाद दस मिनट भी देर हो गई, तो एतिकाफ़ अदा नहीं हो पाएगा. इसी तरह जब ईद का चांद नज़र आ जाता है, तो फ़ौरन एतिकाफ़ भी ख़त्म हो जाता है.

रमज़ान में रोज़े रखने वालों के लिए बेशुमार सवाब है. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत के आठ दरवाज़े हैं, जिनमें से एक दरवाज़े का नाम रैयान है, जिसमें से सिर्फ़ रोज़ेदार ही दाख़िल होंगे.”

हदीस पाक में आता है कि जब कोई बन्दा रोज़े की हालत में होता है कि बिलों के अंदर चींटियां, हवा में परिन्दे और समन्दर में मछलियां भी उसके लिए मग़फ़िरत की दुआएं करती हैं. रोज़ा इतनी अहम इबादत है कि गोया सारी मख़लूक़ उसके लिए दुआएं करने में मुब्तिला हो जाती है.   

रिश्तेदारों और पड़ौसियों का ख़्याल रखें 
अल्लाह की मख़लूक़ का ख़्याल रखना भी इबादत का ही एक बहुत अहम हिस्सा है. जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लम्बे-चौड़े दस्तरख़्वान बिछते हैं. इफ़्तार और सहरी में खाने-पीने के लिए लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं. लेकिन जो ग़रीब हैं, वे इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. ऐसे में हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते.
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं- “रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्त करें. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भरकर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

याद रखें कि हमारा पड़ौसी अच्छा है या बुरा है. मैदाने हश्र में इसका जवाब वह ख़ुद देगा, लेकिन अगर वह भूख से मर गया, तो इसका जवाब हमें ही देना होगा.

हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारी रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें नसीहत दी कि अबूज़र शोरबा पकाओ, तो उसमें पानी बढ़ा दिया करो और उससे अपने हमसायों यानी पड़ौसियों की ख़बरगिरी करते रहो यानी उसमें से अपने हमसाये को भी कुछ दे दिया करो. 
(सही मुस्लिम 6688)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और तुम अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ और वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करो और रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और नज़दीकी पड़ौसियों और अजनबी पड़ौसियों और साथ उठने बैठने वालों और मुसाफ़िरों और अपने गु़लामों से अच्छा बर्ताव करो.” 
(क़ुरआन 4:36)

“फिर तुम अपने रिश्तेदारों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों को उनका हक़ देते रहो. ये उन लोगों के हक़ में बेहतर है, जो अल्लाह की ख़ुशनूदी चाहते हैं. और वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं.” 
(क़ुरआन 30:38)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक सब मोमिन आपस में भाई-भाई हैं. इसलिए तुम अपने दो भाइयों के दरम्यान सुलह करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम पर रहम किया जाए. 
(क़ुरआन 49:10)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने की ताकीद की. एक हदीस के मुताबिक़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अगर तुम किसी की मदद करने के क़ाबिल न हो, तो किसी और से उसकी सिफ़ारिश कर दो.” एक अन्य हदीस के मुताबिक़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो आदमी अपने किसी भाई को जिसके जिस्म पर ज़रूरत के मुताबिक़ कपड़े न हों, उसे कपड़े पहनाएगा या देगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनाएगा. और जो किसी भूखे को खाना खिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत के मेवे खिलाएगा. जो किसी प्यासे को पानी पिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का शर्बत पिलाएगा.”

क्या न करें
रमज़ान में रोज़े रखने का मक़सद ख़ुद को गुनाहों से बचाना है. जब कोई गुनाहों से बच जाता है, तो उसका जिस्म ही नहीं, उसकी रूह भी पाक हो जाती है. लेकिन जो लोग रोज़े रखकर भी ख़ुद को बुराइयों से नहीं बचाते, तो उन्हें रोज़े का कोई अज्र भी हासिल नहीं हो पाता. एक हदीस में कहा गया है कि जो बन्दा झूठ और अपने अमल के खोट को नहीं छोड़ता, तो अल्लाह को उसके भूखा या प्यासा रहने की कोई परवाह नहीं है. एक हदीस में कहा गया है कि कितने ही रोज़ेदार ऐसे होते हैं, जिन्हें रोज़े में भूखा और प्यासा रहने के सिवा कुछ नसीब नहीं होता, क्योंकि वे रोज़े की हालत में चीज़ें फ़रोख़्त करते वक़्त कम तोलते और कम नापते हैं, सामान में मिलावट करते हैं, रिश्वत लेते हैं, बोहतान लगाते हैं, चुग़लियां करते हैं, लोगों का माल और रिश्तेदारों का हक़ खा जाते हैं. 

दरहक़ीक़त ये है कि रमज़ान का मक़सद लोगों को राहे-हक़ पर लाना है. जब कोई पूरे महीने ख़ुद को गुनाहों से रोकता है, तो ये अच्छाई उसके वजूद में शामिल होने लगती है. फिर वह आम दिनों में भी ख़ुद को बुराइयों से बचाकर नेकी के रास्ते पर चल पड़ता है और यही तो असल कामयाबी है.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)  
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल          


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान इबादत का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह तआला ने अपने बन्दों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल हैं. कलमा मुसलमानों का अक़ीदा है. नमाज़ तो रोज़ाना ही पढ़ी जाती है, लेकिन रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. हदीसों के मुताबिक़ रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उसी अल्लाह ने यह किताब तुम पर हक़ के साथ नाज़िल की है. यह उन सब आसमानी किताबों की तसदीक़ करती है, जो इससे पहले नाज़िल हुई हैं और उसी ने तौरात और इंजील नाज़िल की है.” 
(क़ुरआन 3:3)

इस्लामी तारीख़ के मुताबिक़ दूसरी हिजरी में रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ किए गए थे. इसी साल सदक़-ए-फ़ित्र और ज़कात का भी हुक्म नाज़िल हुआ था. रमज़ान के रोज़ों से पहले मुहर्रम की दस तारीख़ को आशूरा का रोज़ा रखा जाता था, लेकिन यह इख़्तियारी था. जब अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का से हिजरत करके मदीना तशरीफ़ लाए, तो आपने देखा कि मदीना के बाशिन्दे साल में दो दिन खेल-तमाशों के ज़रिये ख़ुशियां मनाते हैं, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे दरयाफ़्त किया कि इन दो दिनों की हक़ीक़त क्या है? सहाबा ने कहा- “हम जाहिलियत के ज़माने में इन दो दिनों में खेल-तमाशे किया करते थे.”
चुनांचे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला ने इन दो दिनों को बेहतर दिनों से बदल दिया है, वह ईदुल अज़हा और ईदुल फ़ित्र है. इस तरह दूसरी हिजरी के शव्वाल महीने की पहली तारीख़ को ईद मनाने की शुरुआत हुई. अल्लाह तआला ने ईद की ख़ुशियां मुसलमानों के सर पर फ़तेह और इज़्ज़त का ताज रखने के बाद अता फ़रमाईं.”

अल्लाह ने रोज़े क्यों फ़र्ज़ किए? इसका जवाब ख़ुद अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में दिया है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ ईमान वालो ! तुम पर उसी तरह रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं, जैसे तुमसे पहले के लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ.” 
(क़ुरआन 2:183)

यानी मुसलमानों से पहले नसरानियों यानी ईसाइयों, यहूदियों और उनसे पहले की क़ौमों पर भी रोज़े फ़र्ज़ किए गए थे. रोज़े में फ़ज्र की अज़ान से पहले से लेकर मग़रिब की अज़ान यानी सूरज ढलने तक खाने और पीने पर पूरी तरह से पाबंदी होती है. इतना ही नहीं, इस दौरान हर बुरे काम से ख़ुद को दूर रखना होता है, यहां कि झूठ बोलने और ग़ुस्सा करने से भी परहेज़ करना होता है. और रोज़े में बुराइयों से दूर रहकर बन्दा परहेज़गार बन जाता है.      

ऐसा नहीं है कि रोज़े सब लोगों पर ही फ़र्ज़ किए गए हैं. जो लोग बीमार हैं और उनमें रोज़े रखने की हिम्मत और ताक़त नहीं है, तो उन्हें छूट दी गई है. ऐसे लोग मोहताजों को खाना खिलाकर फ़िदया अदा कर सकते हैं. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “गिनती के चन्द दिन रोज़े रखने हैं. फिर अगर तुम में से कोई बीमार हो या सफ़र में हो, तो दूसरे दिनों में रोज़े रखकर गिनती पूरी कर ले. और जिनमें रोज़ा रखने की क़ूवत न हो, तो वे एक मोहताज को खाना खिलाकर फ़िदया अदा करें. फिर कोई अपनी ख़ुशी से ज़्यादा नेकी करे, तो यह उसके लिए बेहतर है. और अगर तुम रोज़ा रखो, तो यह तुम्हारे हक़ में ज़्यादा बेहतर है. अगर तुम जानते हो. रमज़ान वह मुक़द्दस महीना है, जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया है, जो लोगों के लिए सरापा हिदायत है और जिसमें रहनुमाई करने वाली और हक़ व बातिल की तमीज़ सिखाने वाली वाज़ेह निशानियां हैं. ऐ मुसलमानो ! फिर तुममें से जो इस महीने में मौजूद हो, तो वह रोज़े ज़रूर रखे और जो बीमार हो या सफ़र में हो, तो वह दूसरे दिनों में रोज़े रखकर गिनती पूरी करे. अल्लाह तुम्हारे हक़ में आसानी चाहता है और तुम्हारे साथ दुश्वारी नहीं चाहता और शुमार का हुक्म इसलिए दिया गया है, ताकि तुम रोज़ों की गिनती पूरी कर लो. और उसके लिए अल्लाह की बड़ाई करो, जो हिदायत उसने तुम्हें दी है और तुम उसके शुक्रगुज़ार बनो.” 
(क़ुरआन 2: 184-185)

रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल यानी रात को नमाज़ पढ़ने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक़्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.'' आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. यह रात फ़ज्र होने तक सलामती है. 
(क़ुरआन 97:1-5 )

मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं और अल्लाह से जहन्नुम से निजात की दुआएं मांगते हैं.   

रमज़ान का तअरूफ़ी ख़ुत्बा सैयदना हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि शाबान की आख़िरी तारीख़ को नबी ए अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मिम्बर पर तशरीफ़ फ़रमा हुए और इरशाद फ़रमाया- “ऐ लोगो!” तुम पर एक अज़ीम और मुबारक महीना साया फ़गन होने वाला है. ऐसा महीना जिसमें एक ऐसी रात है, जो एक हज़ार महीनों से बढ़कर है. अल्लाह तआला ने इस महीने के दिनों का रोज़ा फ़र्ज़ और रातों की इबादत नफ़िल क़रार दी है. जो शख़्स इस महीने में एक नेक अमल के ज़रिये अल्लाह तआला के क़ुर्ब का तालिब हो, वह ऐसा ही है जैसे दूसरे महीने में फ़र्ज़ अमल करे. और जो शख़्स कोई फ़र्ज़ अदा करे, वह ऐसा ही है जैसे दूसरे महीनों में 70 फ़र्ज़ अदा करे. ऐ लोगो ! यह सब्र का महीना है, और सब्र का सवाब और बदला जन्नत है. और यह लोगों के साथ हुस्ने सुलूक और ख़ैरख़्वाही का महीना है. इस महीने में मोमिन का रिज़्क़ बढ़ा दिया जाता है. जो आदमी इस मुबारक महीने में किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराए, तो उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, उसे जहन्नुम से आज़ादी का परवाना मिलता है, और रोज़ेदार के सवाब में कमी किए बग़ैर इफ़्तार कराने वाले को भी उसके बराबर सवाब से नवाज़ा जाता है. यह सुनकर सहाबा ने अर्ज़ किया- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हम में से हर आदमी ख़ुद में इतनी गुंजाइश नहीं पाता कि वह दूसरे को इफ़्तार कराए और उसके सवाब को हासिल करे.” इस सवाल पर रहमते आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को ऐसा जवाब दिया, जिससे उनकी मायूसी ख़ुशी में बदल गई. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला ये इनाम हर उस शख़्स पर फ़रमाता है, जो किसी भी रोज़ेदार को एक घूंट दूध या लस्सी, एक अदद खजूर, यहां तक कि एक घूंट पानी पिलाकर भी इफ़्तार करा दे. हां, जो शख़्स रोज़ेदार को पेट भर खिलाए, तो अल्लाह रब्बुल आलमीन उसे क़यामत के दिन मेरे हौज़ ए कौसर से पानी पिलाएगा, जिसके बाद उसे कभी प्यास नहीं लगेगी यहां तक कि वह हमेशा के लिए जन्नत में दाख़िल हो जाएगा. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “यह ऐसा महीना है जिसका पहला अशरा रहमत, दरमियानी अशरा मग़फफ़िरत और आख़िरी अशरा जहन्नुम से आज़ादी का है. जो शख़्स इस महीने में अपने ग़ुलाम के बोझ को हल्का कर दे, तो अल्लाह तआला उसकी मग़फ़िरत फ़रमाता है और आग से आज़ादी देता है. ऐ लोगो ! इस महीने में चार चीज़ों की कसरत रखा करो. पहली कालिमा ए तैय्यब ला इलाह इल्लल्लाह, दूसरी अस्तग़फ़ार, तीसरी जन्नत की तलब, चौथी आग से पनाह.
(मिश्कात:1/174, बैहक़ी शिअबुल ईमान: 3/ 305)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “जब माहे रमज़ान आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है. (बुख़ारी)

हज़रत उमर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- ‘‘क़यामत के दिन रोज़े और क़ुरआन बन्दे की शफ़ाअत करेंगे. रोज़े अर्ज़ करेंगे कि ऐ अल्लाह ! मैंने इसे दिन में खाने और शहवत से रोका. इसलिए तू इसके लिए मेरी शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमा और क़ुरआन कहेगा कि मैंने इसे रात में सोने से रोका. लिहाज़ा इसके हक़ में मेरी शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमा ले. फिर दोनों की शफ़ाअत क़ुबूल होगी. (मिश्कात शरीफ़)

अमीरुल मोमिनीन हज़रत सैयदना उमर फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “रमज़ान में अल्लाह का ज़िक्र करने वाले को बख़्श दिया जाता है और इस रमज़ान के महीने में अल्लाह पाक से मांगने वाला कभी भी महरूम नहीं रहता.”

शाहीन कहती हैं कि इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़ानदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने की हिदायत देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल  


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
  
इस्लामी तारीख़ में माहे रमज़ान की बहुत अहमियत है. इस महीने में कई ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जो यादगार बन गए. इन वाक़ियात ने तमाम आलमों को दर्स दिया. इसी मुक़द्दस महीने में अल्लाह ने अपने रसूलों पर आसमानी किताबें और सहीफ़े नाज़िल किए.
 
सहीफ़े 
अल्लाह के उन पैग़ाम को सहीफ़े कहा जाता है, जो अल्लाह के मुअज़्ज़िज़ फ़रिश्ते हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम नबियों के पास लाया करते थे. चार रसूलों को छोड़कर बाक़ी सभी नबियों पर सहीफ़े नाज़िल हुए. हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की पहली रात को सहीफ़े नाज़िल हुए.

क़ुरआन करीम   
माहे रमज़ान में अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया. हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास अल्लाह के पैग़ाम लाया करते थे. बाद में इन्हीं आयतों का ज़ख़ीरा क़ुरआन बना. क़ुरआन करीम 23 साल में नाज़िल हुआ, क्योंकि ये लोहे महफ़ूज़ से थोड़ा-थोड़ा नाज़िल किया गया. इसकी ज़बान अरबी है. क़ुरआन करीम को कई नामों से जाना जाता है, जैसे अल किताब, अल फ़ुरक़ान, अल तंजील, अल ज़िक्र, अल नूर, अल हुदा, अल रहमा, अहसनुल हदीस, अल वही, अल रूह, अलमुबीन, अल मजीद और अल हक़. क़ुरआन पाक में 114 सूरतें हैं और इसके 30 पारे हैं.     

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उसी अल्लाह ने यह किताब तुम पर हक़ के साथ नाज़िल की है. ये उन सब आसमानी किताबों की तसदीक़ करती है, जो इससे पहले नाज़िल हुई हैं और उसी ने तौरात और इंजील नाज़िल की है.” 
(क़ुरआन 3:3)

रमज़ान एक मुक़द्दस महीना है. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “रमज़ान वह मुक़द्दस महीना है, जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया है, जो लोगों के लिए सरापा हिदायत है और जिसमें रहनुमाई करने वाली और हक़ व बातिल की तमीज़ सिखाने वाली वाज़ेह निशानियां हैं.” 
(क़ुरआन 2: 185)

क़ुरआन शबे क़द्र में नाज़िल हुआ. शबे क़द्र के बारे में क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है ? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. ये रात फ़ज्र होने तक सलामती है.” 
(क़ुरआन 97:1-5 )

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इसे मुबारक रात में नाज़िल किया. बेशक हम ख़बरदार करने वाले हैं. इस रात में हर हिकमत वाले काम का फ़ैसला कर दिया जाता है.”
(क़ुरआन 44:3-4)

बेशक क़ुरआन पाक तमाम आलमों के लिए नसीहत है. क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी. क़ुरआन एक ऐसी किताब है, जिसमें कोई तब्दीली नहीं हो सकती. ऐसा करना नामुमकिन है. लोगों ने इससे पहले नाज़िल हुई किताबों में अपने फ़ायदे के लिए बदलाव कर लिए, इसलिए क़ुरआन की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा अल्लाह तआला ने ख़ुद लिया है. 
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ बेशक हमने ही ज़िक्रे अज़ीम यानी क़ुरआन नाज़िल किया है और बेशक हम ही उसके मुहाफ़िज़ हैं.”
(क़ुरआन 15:9) 

क़ुरआन सिर्फ़ काग़ज़ पर ही नहीं लिखा है, ये लोगों के दिलों में भी महफ़ूज़ है. क़ुरआन हिफ़्ज़ किया जाता है और क़ुरआन हिफ़्ज़ करने वाले को हाफ़िज़ कहा जाता है. हदीसों के मुताबिक़ क़ुरआन आसमान पर मौजूद लोहे महफ़ूज़ का हिस्सा है और क़यामत से कुछ अरसा पहले ये दुनिया से उठा लिया जाएगा.      

इंजील 
अल्लाह तआला ने क़ुरआन से पहले इंजील नाज़िल की थी. ये हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 13 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. कुछ रिवायत के मुताबिक़ इंजील रमज़ान की 4 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. इंजील सुरयानी ज़बान में है. 

क़ुरआन करीम में इंजील का ज़िक्र भी है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और हमने उन पैग़म्बरों के पीछे उनके नक़्शे क़दम पर ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम को भेजा, जो ख़ुद से पहले की किताब यानी तौरात की तसदीक़ करने वाले थे और हमने उन्हें इंजील अता की, जिसमें हिदायत और नूर था और यह इंजील भी ख़ुद से पहले की किताब यानी तौरात की तसदीक़ करने वाली थी और यह परहेज़गारों के लिए हिदायत और नसीहत थी. और अहले इंजील को भी इस हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला करना चाहिए, जो अल्लाह ने उसमें नाज़िल किया है. और जो शख़्स अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब के मुताबिक़ हुक्म न दे यानी फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नाफ़रमान हैं.”
(क़ुरआन 5:46-47)

क़ाबिले ग़ौर है कि इंजील अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें बदलाव कर लिए गए. इसलिए इसके बाद अल्लाह ने क़ुरआन नाज़िल किया.   

ज़बूर 
इससे पहले अल्लाह तआला ने ज़बूर नाज़िल की थी. ये हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 13 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. ये इबरानी ज़बान में है. इसकी कुल 150 सूरतें हैं. 

क़ुरआन करीम में ज़बूर का ज़िक भी मिलता है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और तुम्हारा परवरदिगार उन्हें ख़ूब जानता है, जो आसमानों और ज़मीन में आबाद हैं. और बेशक हमने कुछ नबियों को दूसरे नबियों पर फ़ज़ीलत बख़्शी है और हमने दाऊद अलैहिस्सलाम को ज़बूर अता की.”
(क़ुरआन 17: 55)

क़ाबिले ग़ौर है कि ज़बूर अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें बदलाव कर लिए गए थे. इसलिए ज़बूर के बाद अल्लाह तआला ने तौरात नाज़िल की थी.   
 
मुसलमानों पर सभी आसमानी सहीफ़ों और किताबों पर यक़ीन रखना लाज़िमी है. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे नाफ़रमान माने जाएंगे और दीन से ख़ारिज हो जाएंगे.  
  
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मुसलमानो ! तुम कह दो कि हम अल्लाह पर ईमान लाए हैं और उस किताब यानी क़ुरआन पर, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल किया गया और जो सहीफ़े इब्राहीम अलैहिस्सलाम और इस्माईल अलैहिस्सलाम और इसहाक़ अलैहिस्सलाम और याक़ूब अलैहिस्सलाम और उनकी औलादों पर नाज़िल हुए और जो किताबें तौरात और इंजील मूसा अलैहिस्सलाम और ईसा अलैहिस्सलाम को अता की गईं और इसी तरह जो सहीफ़ें दूसरे नबियों को उनके परवरदिगार की तरफ़ से अता किए गए, उन सब पर ईमान लाए हैं और हम उनमें कोई फ़र्क़ नहीं करते और हम अल्लाह ही के मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हैं.” 
(क़ुरआन 2:136)

तौरात 
अल्लाह तआला ने ज़बूर से पहले तौरात नाज़िल की थी. ये हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 6 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. ये इबरानी ज़बान में है. कुछ रिवायत के मुताबिक़ तौरात सुरयानी ज़बान में नाज़िल हुई थी.

क़ुरआन करीम में तौरात का भी ज़िक मिलता है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और वह वक़्त भी याद करो कि जब हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और हक़ व बातिल को जुदा करने वाले अहकाम दिए, ताकि तुम हिदायत पा सको.
(क़ुरआन 2:53)

“और वह वक़्त याद करो कि जब हमने तुमसे तौरात पर अमल करने का अहद लिया था और हमने कोहे तूर को तुम्हारे ऊपर उठा लिया था और हुक्म दिया था कि जो कुछ हमने तुम्हें अता किया है, उसे मज़बूती से पकड़े रहो और जो कुछ इस किताब यानी तौरात में है, उसे याद रखो, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ. 
(क़ुरआन 2:63)

“और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और उनके बाद हमने बहुत से रसूलों को भेजा. और मरयम अलैहिस्सलाम के बेटे ईसा अलैहिस्सलाम को भी रौशन निशानियां अता कीं. और हमने पाक रूहुल क़ुदुस यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम के ज़रिये उनकी ताईद व मदद की. 
(क़ुरआन 2:87)

क़ाबिले ग़ौर है कि तौरात भी अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें भी बदलाव कर लिए गए. इसलिए इसके बाद अल्लाह ने इंजील नाज़िल की.   

जंगे बदर
रमज़ान की 17 तारीख़ को जंगे बदर हुई. ये इस्लामी तारीख़ की अहम जंग है. मदीने से काफ़ी दूर एक कुआं था, जिसका नाम बदर था. इस कुएं के नाम पर ही इस इलाक़े को बदर कहा जाता था. इसी मैदान में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व उनके सहाबियों और मक्के के कुफ़्फ़ार के बीच जंग हुई थी. एक तरफ़ 313 मुसलमान थे और दूसरी तरफ़ कुफ़्फ़ार की तादाद उनसे कई गुना यानी हज़ारों में थी. इस जंग में 14 सहाबा शहीद हुए. इनमें से छह मुहाजिर और आठ अंसार थे. 

क़ुरआन करीम में जंगे बदर का ज़िक्र है. अल्लाह तआला फ़रमाता है-  “बेशक तुम्हारे लिए उन दो जमातों में एक निशानी है, जो जंगे बदर में आपस में मुक़ाबिल हुईं. एक जमात ने अल्लाह की राह में जंग की और दूसरी काफ़िर थी. कुफ़्फ़ार को अपनी खुली आंखों से मुसलमान दोगुने नज़र आ रहे थे. और अल्लाह अपनी मदद के ज़रिये जिसे चाहता है ताईद करता है. और बेशक इसमें बसीरत वाले लोगों के लिए बड़ी इबरत है.”
(क़ुरआन 3:13)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने परवरदिगार से इस जंग में मदद मांगी थी और उनकी दुआ क़ुबूल हुई.  
अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब तुम अपने परवदिगार से मदद के लिए फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी फ़रियाद क़ुबूल कर ली और फ़रमाया कि एक हज़ार मुसलसल आने वाले फ़रिश्तों के ज़रिये तुम्हारी मदद की जाएगी.”  
(क़ुरआन 8: 9)

मक्का फ़तह
रमज़ान की 20 तारीख़ को मुसलमानों ने मक्का फ़तह किया था. क़ाबिले ग़ौर है कि मदीने के मुसलमानों और मक्का के क़ुरैश के बीच दस साल के लिए जंग न करने की सुलह हुई थी, जिसे तारीख़ में सुलह हुदैबिया के नाम से जाना जाता है. लेकिन क़ुरैश इस पर क़ायम नहीं रह सके और क़ुरैश के मददगार बनू बक़र ने हाल ही में मुसलमानों के मददगार बने बनू ख़ुजा पर हमला कर दिया. इसके बाद नौबत यहां तक आन पहुंची कि मुसलमानों को जंग करनी पड़ी. इस जंग में मुसलमानों को शानदार जीत हासिल हुई. क़ुरआन करीम में भी इस जीत का ज़िक्र है.       
अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक हमने तुम्हें रौशन फ़तह अता की.”
(क़ुरआन 48:1)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत 
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दामाद और मुसलमानों के ख़लीफ़ा हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत रमज़ान की 21 तारीख़ को हुई थी. हज़रत अली अलैहिस्सलाम रमज़ान की 19 तारीख़ को कूफ़ा की मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ पढ़ रहे थे. जब वे सजदे में गए, तो अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजम ने ज़हर में डूबी हुई तलवार से उनके सर पर वार किया. इस हमले में वे ज़ख़्मी हो गए और ज़हर उनके जिस्म में फैलने लगा. उन्होंने अपने साथियों को ताकीद की कि वे मुलजम को क़त्ल न करें, बल्कि उन्होंने उसे आरामदेह बिस्तर, लज़ीज़ खाना और शर्बत मुहैया करवाया. दो दिन बाद 19 तारीख़ को मौला अली अलैहिस्सलाम का विसाल हो गया. 

रमज़ान हुरमत वाला महीना है. हदीसों के मुताबिक़ माहे रमज़ान में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं. 
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “जब माहे रमज़ान आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है. 
(बुख़ारी)

बहरहाल, रमज़ान में नाज़िल हुए सभी सहीफ़ों और आसमानी किताबों ने तमाम आलमों को मुहब्बत का पैग़ाम दिया है. रमज़ान के वाक़ियात भी राहे-हक़ पर चलने का पैग़ाम देते हैं. मौला अली की शहादत की इस बात की अलामत है कि अल्लाह वाले अपने दुश्मनों के साथ भी नरमी से पेश आते हैं. 
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल  



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
रमज़ान का महीना बहुत ही मुक़द्दस है. इस महीने में मुसलमान रोज़े रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं. इसे इबादत का महीना भी कहा जाता है. यूं तो हर रोज़ ही अल्लाह की इबादत की जाती है, लेकिन रमज़ान में रोज़ों की वजह से इसमें इज़ाफ़ा हो जाता है. 
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अगर किसी बन्दे को रमज़ान क्या है और रमज़ान की कितनी बड़ी फ़ज़ीलत है, ये मालूम हो जाए तो वह तमन्ना करेगा कि बरसों-बरस रमज़ान ही रहें.

हज़रत सैयदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  ने फ़रमाया- “मेरी उम्मत को माहे रमज़ान में पांच चीजें ऐसी अता की गईं, जो मुझसे पहले किसी नबी को नहीं मिलीं. 
पहली, जब रमज़ानुल मुबारक की पहली रात होती है तो अल्लाह इनकी तरफ़ रहमत की नज़र फ़रमाता है और जिसकी तरफ़ अल्लाह नज़रे रहमत फ़रमाए तो उसे कभी अज़ाब नहीं देगा. 
दूसरी, शाम के वक़्त इनके मुंह की बू अल्लाह तआला के नज़्दीक मुश्क की ख़ुशबू से बेहतर है. यानी जो बू भूख की वजह से होती है.
तीसरी, फ़रिश्ते हर रात और दिन इनके लिए मग़फ़िरत की दुआएं करते रहते हैं. 
चौथी, अल्लाह तआला जन्नत को हुक्म देता है- “मेरे बन्दों के लिए आरास्ता हो जा. अनक़रीब वे दुनिया की मशक़्क़त से मेरे घर और करम में राहत पाएंगे." 
पांचवीं, जब माहे रमज़ान की आख़िरी रात आती है, तो अल्लाह तआला सबकी मग़फ़िरत फ़रमा देता है. क़ौम में से एक शख़्स ने खड़े होकर अर्ज़ किया कि “या रसूलल्लाह ! क्या वह लैलतुल क़द्र है ?" आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “नहीं, क्या तुम नहीं देखते कि मज़दूर जब अपने कामों से फ़ारिग़ हो जाते हैं, तो उन्हें उजरत दी जाती है."

रमज़ान के रोज़े किस पर फ़र्ज़ हैं
इस्लाम में इबादत के मामले में मर्दों और औरतों में कोई फ़र्क़ नहीं किया गया है. रमज़ान के रोज़े उन मर्दों और औरतों पर वाजिब और फ़र्ज़ हैं, जो इसकी छह शर्तें पूरी करते हैं. 
पहली शर्त इस्लाम यानी रमज़ान के रोज़े सिर्फ़ मुसलमानों पर ही फ़र्ज़ किए गए हैं. 
दूसरी शर्त बालिग़ यानी रमज़ान के रोज़े बालिग़ पर फ़र्ज़ हैं. इस्लाम के मुताबिक़ बारह साल से ज़्यादा उम्र के शख़्स को बालिग़ माना जाता है. 
तीसरी शर्त अक़्ल यानी अक़्ल रखने वाले शख़्स पर ही रोज़े फ़र्ज़ हैं, ज़ेहनी तौर पर कमज़ोर यानी दीवाने पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है. 
चौथी शर्त जिस्मानी क़ूवत यानी अगर कोई शख़्स बीमारी या ऐसी ही किसी और वजह से रोज़ा रखने की ताक़त न रखता हो, तो उस पर भी रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.
पांचवीं शर्त इक़ामत यानी मुक़ीम शख़्स पर ही रोज़ा फ़र्ज़ है, जबकि मुसाफ़िर पर रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.
छठी शर्त हैज़ और निफ़ास यानी हैज़ और निफ़ास वाली औरतों पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है. वे अपने क़ज़ा रोज़े रमज़ान के बाद शव्वाल के महीने में पूरे कर सकती हैं. 

अल्लाह तआला ने रोज़े के कुछ नियम मुक़र्रर किए हैं. अल सुबह फ़ज्र की अज़ान से पहले रोज़ेदार सहरी खाते हैं. सहरी अज़ान से पहले ही खा सकते हैं. सहरी खाकर वे रोज़े की दुआ पढ़ते हैं-
“और मैंने रमज़ान के कल के रोज़े की नीयत की है.” अगर कोई ये दुआ न पढ़े और नीयत कर ले कि या अल्लाह मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा है, तो भी रोज़ा ही माना जाएगा. 
लेकिन अगर वह रोज़े की नीयत न करे और दिनभर भूखा और प्यासा रहे, तो वह रोज़ा नहीं माना जाएगा. दरअसल ये एक तरह का फ़ाक़ा ही होगा और उसका कोई अज्र यानी सवाब नहीं है. उलेमा ने रोज़े की नीयत करने का बेहतर वक़्त वह बताया है, जब पहले रोज़े को इफ़्तार किया जाए, तो उसी वक़्त अगले दिन के रोज़े की नीयत कर ली जाए यानी दिल में ये नीयत कर ली जाए कि मुझे कल का रोज़ा रखना है.    

फ़ज्र की अज़ान शुरू होते ही रोज़े का वक़्त शुरू हो जाता है, जो मग़रिब की अज़ान तक जारी रहता है. शाम को जब सूरज ढल जाता है और आसमान पर रात की स्याही छाने लगती है, तो मग़रिब की अज़ान होती है. अज़ान की आवाज़ सुनते ही रोज़ेदार रोज़ा खोलते हैं. इसे इफ़्तार कहा जाता है. और इस वक़्त दस्तरख़्वान पर मौजूद खाने-पीने की चीज़ों को इफ़्तारी कहा जाता है. इफ़्तारी के वक़्त वे रोज़ा खोलने की दुआ पढ़ते हैं-
“और मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा था और तेरे रिज़्क़ से इफ़्तार करता हूं.”    

अमूमन रोज़ा खजूर खाकर खोला जाता है. खजूर से रोज़ा खोलना सुन्नत है. खजूर न होने पर बहुत से लोग नमक चखकर भी रोज़ा खोलते हैं. दरअसल खाने से पहले नमक चखना भी सुन्नत है. वैसे किसी भी चीज़ से रोज़ा खोला जा सकता है. 

हज़रत सैयदना यअला बिन मुर्रह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तीन चीज़ों को अल्लाह महबूब रखता है. 
पहली इफ़्तार में जल्दी, दूसरी सहरी में ताख़ीर यानी देर और तीसरी नमाज़ के क़ियाम में हाथ पर हाथ रखना.”

किन वजहों से रोज़ा मकरूह होता है
रोज़े के लिए सिर्फ़ नीयत करना ही काफ़ी नहीं है. रोज़ा मकरूह न हो इस बात का भी पूरा ख़्याल रखा जाना चाहिए. रोज़े की हालत में कुछ खाने और पीने से रोज़ा मकरूह हो जाता है. उल्टी होने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. इस बारे में दो राय हैं. अगर अपने आप उल्टी हो जाए तो रोज़ा नहीं टूटेगा, लेकिन जान बूझकर उल्टी की, तो रोज़ा टूट जाएगा. जिस्म के किसी भी हिस्से से ख़ून निकलने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. कुछ उलेमा मानते हैं कि चोट लगने की वजह से ख़ून निकले, तो रोज़ा मकरूह नहीं होगा. बीड़ी-सिगरेट और हुक़्क़ा पीने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. तम्बाक़ू और गुटखा खाने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. इंजेक्शन लगवाने, भाप लेने, इन्हेलर लेने, आंखों और नाक में दवा डालने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. रोज़े की हालत में दांत निकलवाने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. दांतों को ब्रश करने और मंजन करने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. एहतलाम हो जाने से रोज़ा नहीं टूटता, लेकिन जान बूझकर मनी निकाली जाए, तो रोज़ा मकरूह हो जाएगा. हमबिस्तरी करने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. रोज़े की हालत में पति-पत्नी के मिलन पर पाबंदी है, लेकिन रात में वे मिल सकते हैं. पहले पूरे रमज़ान में इसकी मनाही थी, लेकिन बहुत से लोग इस पर अमल नहीं कर पाते थे और ख़ुद को नाफ़रमानों में शामिल कर लिया करते थे. बाद में अल्लाह ने एक आयत नाज़िल करके इस पाबंदी में ढील दे दी.  

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि “ऐ मुसलमानो ! तुम्हारे लिए रोज़ों की रातों में अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया है. वे तुम्हारा लिबास हैं और तुम उनका लिबास हो. अल्लाह जानता है कि तुम अपने हक़ में ख़यानत करते थे. इसलिए उसने तुम्हें मुआफ़ कर दिया और तुम्हारी ख़ताओं को दरगुज़र किया. फिर तुम उनसे मिलो और जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, उसे मांगों और खाओ और पियो, यहां तक कि सुबह की सफ़ेद धारी रात की स्याह धारी से अलग होकर आसमान पर नज़र आने लगे. फिर रात तक रोज़ा पूरा करो. और जब तुम मस्जिदों में ऐतकाफ़ में बैठे हो, तो उस दौरान औरतों से न मिलो. ये अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदें हैं. फिर उनके क़रीब भी मत जाओ. इसी तरह अल्लाह लोगों के लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान करता है, ताकि वे परहेज़गार बन जाएं.  
(क़ुरआन 2:187)

किन हालात में रोज़ा मकरूह नहीं होता 
बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं, जिनसे रोज़ा मकरूह नहीं होता, लेकिन हम गुमान कर बैठते हैं कि रोज़ा मकरूह हो गया. अगर कोई भूल से कुछ खा या पी ले, तो रोज़ा मकरूह नहीं होता. लेकिन शर्त ये है कि उसे रोज़े की याद आते ही वह फ़ौरन खाना या पीना खाना बंद कर दे और अपनी भूल से हुए ग़लती के लिए अल्लाह से माफ़ी मांग ले.  
अगर नहाते वक़्त पानी मुंह या नाक में चला जाता है, तो इससे भी रोज़ा मकरूह नहीं होता.
रोज़े की हालत में सुरमा लगाने, मेहंदी लगाने, ख़ुशबू लगाने, ख़ुशबू सूंघने, तेल लगाने, बाल और नाख़ून काटने, कान के बाहर के हिस्से में दवा लगाने आदि से रोज़ा मकरूह नहीं होता. 
अगर हमबिस्तरी की वजह से किसी का रोज़ा टूट गया, तो उसे शव्वाल के महीने में क़ज़ा रोज़ा रखना होगा और इसके लिए कफ़्राफ़ारा भी अदा करना होगा.
   
कफ़्फ़ारा क्या है 
दरअसल रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं और इन फ़र्ज़ रोज़ों को तोड़ने पर जो जुर्माना अदा किया जाता है, उसे कफ़्फ़ारा कहते हैं. कफ़्फ़ारे के तौर पर तीन चीज़ें दी गई हैं.
पहला किसी ग़ुलाम को आज़ाद किया जाए. 
दूसरा दो महीने तक मुसलसल रोज़े रखे जाएं और अगर एक भी रोज़ा छूट गया तो फिर से दो महीने तक मुसलसल रोज़े रखे जाएं. लेकिन औरतें मजबूरी में छूटे गए रोज़े पूरे कर सकती हैं. उन्हें दोबारा से रोज़े रखनी की ज़रूरत नहीं है. 
तीसरा अगर रोज़ा रखने की क़ूवत न हो, तो साठ मोहताजों को दो वक़्त का खाना खिलाएं. अगर साठ दिन तक किसी मोहताज को खाना खिलाया जाए या उसे खाने के पैसे दे दिए जाएं तो भी कफ़्फ़ारा अदा हो जाएगा. अगर खाना न खिला सके, तो साठ फ़क़ीरों को अनाज देकर भी कफ़्फ़ारा अदा किया जा सकता है. ये अनाज इतना होना चाहिए, जितना एक आदमी की तरफ़ से सदक़ा तुल फ़ित्र दिया जाता है या इसकी क़ीमत दे दी जाए.    

चूंकि रमज़ान इबादत का महीना है. क़ुरआन करीम में अल्लाह ने इसे मुक़द्दस महीना क़रार दिया है. इसलिए इस महीने की हुरमत की जानी चाहिए. रमज़ान में रोज़े रखने का मक़सद लोगों को परहेज़गार बनाना है, उन्हें बुराइयों से बचाकर नेकी के रास्ते पर ले जाना है. इसलिए रोज़े की हालत में तमाम तरह की बुराइयों से ख़ुद को बचाना चाहिए. यही कोशिश होनी चाहिए कि अपनी जानिब से किसी को ज़रा सी भी तकलीफ़ न पहुंचे, किसी का दिल न दुखे और किसी का कोई नुक़सान न हो.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल      



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान में मसरूफ़ियत बहुत बढ़ जाती है. देर तक जागने की वजह से कई बार सहरी के वक़्त आंख नहीं खुल पाती. ऐसे में लोग बिना सहरी खाये ही रोज़ा रख लेते हैं. अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या बिना सहरी खाये रोज़ा रखा जा सकता है? अगर रखा जा सकता है, तो किन हालात में रखा जा सकता है? क्या सहरी खाना लाज़िमी है? क्या सहरी खाना सुन्नत है? 
  
क़ुरआन में सहरी खाने का हुक्म  
रोज़ेदार को सहरी खाकर ही रोज़ा रखना चाहिए, क्योंकि क़ुरआन करीम में फ़ज्र की अज़ान से पहले सहरी खाने का हुक्म है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, उसे मांगों और खाओ और पियो, यहां तक कि सुबह की सफ़ेद धारी रात की स्याह धारी से अलग होकर आसमान पर नज़र आने लगे.
(क़ुरआन 2:187)

यानी अल्लाह तआला ने सहरी खाने का हुक्म दिया है. जो शख़्स बिना किसी मजबूरी के जानबूझ कर सहरी नहीं खाता, तो उसने सरासर नाफ़रमानी की और नाफ़रमानी करना गुनाह है. क़ुरआन पाक में बार-बार नाफ़रमानी करने वाले लोगों को दोज़ख़ के अज़ाब से ख़बरदार किया गया है.

सहरी खाना सुन्नत है     
हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “हमारे और अहले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों के रोज़ों में फ़र्क़ सहरी के लुक़मे का है.  
(मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)

यानी मुसलमान सहरी के वक़्त खाना खाते हैं, जबकि यहूदी और ईसाई सहरी के वक़्त खाना नहीं खाते और बिना सहरी खाये ही रोज़ा रखते हैं. क़ाबिले ग़ौर यह भी है कि यहूदी और ईसाई आधी रात में रोज़ा शुरू करते हैं यानी वे आधी रात गुज़रने से पहले ही खाना खा लेते हैं. जिस वक़्त मुसलमान सहरी खाते हैं, उस वक़्त वे रोज़े से होते हैं. इसलिए मुसलमानों का सहरी खाना मुस्तहब यानी पसंद किया जाने वाला अमल है. अल्लाह का अता किया हुआ रिज़्क़ खाकर रोज़ा रखना बहुत ही बरकत वाला काम है. सहरी खाना सुन्नत भी है.   

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “सहरी खाओ कि सहरी खाने में बरकत है.” 
(सहीह बुख़ारी)

अगर किसी की नीयत रोज़ा रखने की है और सहरी के वक़्त उसकी आंख न खुले, तो वह बिना सहरी खाये रोज़ा रख सकता है. लेकिन जान बूझकर सहरी छोड़ना मना है और सहरी का बहाना करके रोज़ा छोड़ना भी सही नहीं है.
एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये सहरी बरकत वाला खाना है, जो अल्लाह ने तुम्हें अता किया है, लिहाज़ा इसे छोड़ा मत करो.
(मुसनद अहमद)

सहरी खाने में देर करना मुस्तहब माना गया है. सहरी खाने और नमाज़ शुरू करने के दरमियान नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इतना फ़र्क़ रखते कि जितने वक़्त में आदमी पचास आयतों की तिलावत कर सकता है. 
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि हमने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सहरी खायी और उसके बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ के लिए गए. हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा कि सहरी और अज़ान के बीच कितना फ़ासला था ? उन्होंने जवाब दिया कि पचास आयतें पढ़ने के बराबर.
(सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम)

हज़रत सैयदना यअला बिन मुर्रह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तीन चीज़ों को अल्लाह महबूब रखता है. पहली इफ़्तार में जल्दी, दूसरी सहरी में ताख़ीर यानी देर और तीसरी नमाज़ के क़ियाम में हाथ पर हाथ रखना.”

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “सहरी बरकत ही बरकत है. लिहाज़ा इसे तर्क ना करो चाहे पानी का एक घूंट ही लो. दरअसल अल्लाह तआला और उसके फ़रिश्ते सहरी खाने वालों पर सलाम और दुरूद भेजते हैं. 
(मुसनद अहमद)

अब्दुल्लाह बिन हारिस साराह रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक सहाबा ने फ़रमाया कि वे अल्लाह के नबी के पास उस वक़्त पहुंचे, जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहरी कर रहे थे. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “ये अल्लाह की नेअमत है, जो तुम्हें दी गई है, इसलिए सहरी खाया करो” 
(सुनन नसाई)

हज़रत अरबाज़ बिन साराह रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मुझे अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में सहरी खाने के लिए बुलाया और इरशाद फ़रमाया- “बाबरकत ग़िज़ा पर आओ.” 
(अबू दाऊद)

अकसर देखा गया है कि बहुत से लोग देर से उठते हैं और जिस वक़्त वे सहरी खा रहे होते हैं तब अज़ान शुरू हो जाती है. ऐसी हालत में वे जल्दी-जल्दी खाते हैं. बहुत से लोग उन्हें टोकते हैं और तंज़ कसते हैं कि ये अज़ान के साथ-साथ खा रहे हैं. होना तो यही चाहिए कि वे लोग कुछ देर पहले उठ जाया करें, ताकि तसल्ली से सहरी खा लें. उन्हें टोकने वाले लोगों को भी तंज़ नहीं करने चाहिए. उन्हें आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस हदीस पर ग़ौर करना चाहिए.    
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम में से कोई जब फ़ज्र की अज़ान सुने और खाने पीने का बर्तन उसके हाथ में हो, तो उसे अपनी ज़रूरत पूरी किए बग़ैर न रखें.” (अबू दाऊद)

यानी जो लोग सहरी खा रहे हैं और तभी अज़ान शुरू हो जाए, तो हाथ के बर्तन को अपनी ज़रूरत पूरी होने के बाद ही रखें. यानी बर्तन में जो ग़िज़ा है, उसे खाने के बाद ही बर्तन को रखा जाए. ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है.     

अल्लाह तआला सहरी खाने वाले लोगों को इतना पसंद करता है कि उनसे खाने-पीने का हिसाब भी नहीं लिया जाएगा. अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “इंशा अल्लाह तआला तीन लोगों पर खाने में हिसाब नहीं है, जबकि हलाल खाया हो, रोज़ेदार, सहरी खाने वाला और सरहद पर घोड़ा बांधने वाला.     
(तबरानी कबीर)

इसी तरह इफ़्तार में जल्दी करनी चाहिए. ऐसा न हो कि मग़रिब की अज़ान शुरू हो जाए और रोज़ेदार किसी काम में उलझा रहे. इफ़्तार के आदाब ये हैं कि वक़्त पर दस्तरख़्वान पर बैठ जाएं और अल्लाह से दुआ मांगे. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “इफ़्तार के वक़्त रोज़ेदार की दुआ रद्द नहीं होती.” एक हदीस के मुताबिक़ इफ़्तार के वक़्त अल्लाह और रोज़ेदार के दरमियान कोई पर्दा नहीं होता, यानी इस वक़्त बन्दा अल्लाह के बहुत क़रीब होता है. ज़ाहिर है कि ऐसे वक़्त में की गई कोई भी दुआ रद्द नहीं होगी और अपने अंजाम को पहुंचेगी. 
    
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रावी है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया- “मेरे बन्दों में मुझे ज़्यादा प्यारा वह है, जो इफ़्तार मंस जल्दी करता है.”
(अहमद व तिर्मिज़ी)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रावी है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये दीन हमेशा ग़ालिब रहेगा, जब तक लोग इफ़्तार में जल्दी करेंगे और यहूद और नसारा यानी ईसाई देर करेंगे.  
(अबू दाऊद)

इसी बारे में हज़रत सहल इब्ने सअद रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “लोग उस वक़्त तक ख़ैर के साथ रहेंगे, जब तक इफ़्तार करने में जल्दी करते रहेंगे.”
(बुख़ारी, मुस्लिम व तिर्मिज़ी)    

इसकी वजह ये है कि इफ़्तारी में जल्दी करके वे लोग सुन्नत के पाबंद रहेंगे, लेकिन जब वे इस सुन्नत को छोड़ देंगे और इफ़्तार में देर करेंगे, तो यह इस बात की अलामत होगी कि ख़ैर उनसे मुंह फेरने लगी है. ऐसा करके वे उस सुन्नत की मुख़ालफ़त करेंगे, जिस पर अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को छोड़कर गए थे और जिसका उन्हें हुक्म दिया गया था. इस तरह ये लोग नाफ़रमान हो जाएंगे और अल्लाह नाफ़रमानों को पसंद नहीं करता. क़ुरआन करीम में बार-बार ये बात दोहराई गई है.  

सहरी खाना सेहत के लिए बहुत ज़रूरी और फ़ायदेमंद है. चूंकि रोज़े की हालत में दिनभर भूखा और प्यासा रहना पड़ता है, इसलिए सहरी के वक़्त खाना लाज़िमी है. सहरी के वक़्त खजूर खानी चाहिए, क्योंकि खजूर खाना सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खजूर बहुत पसंद थी. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “खजूर बेहतरीन सहरी है.“ एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ”खजूर मोमिन की अच्छी सेहरी है.“ 
ऐसा नहीं है कि सहरी में बहुत ज़्यादा खाना चाहिए. अगर किसी की तबीयत इजाज़त नहीं देती और किसी वजह से खाने का मन नहीं है, तो चार-पांच खजूर खाकर भी रोज़ा रखा जा सकता है. एक गिलास दूध भी पिया जा सकता है. रोटी के चन्द निवाले भी खाये जा सकते हैं. पानी भी पिया जा सकता है.
क़ाबिले ग़ौर है कि खजूर जिस्म के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद ग़िज़ा है. इसमें मौजूद पोषक तत्व जिस्म को क़ूवत देते हैं और बहुत सी बीमारियों से बचाते भी हैं. दूध भी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है. इससे भूख भी मिटती है और प्यास भी बुझ जाती है. 


ऐसा नहीं है कि सहरी या इफ़्तार में खजूरें ही खानी हैं. खजूर खाना सुन्नत है, फ़र्ज़ नहीं. ये सुन्नत इसलिए है, क्योंकि हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर से सहरी और इफ़्तार करने की तरग़ीब दी है. अगर रोज़ेदार के पास खजूर नहीं है, तो सहरी और इफ़्तारी में कुछ और भी खाया जा सकता है. यानी रोज़ेदार जो चाहे खा सकता है, ये उसकी अपनी ज़ाती पसंद और नापसंद का मसला है. चूंकि मुसलमान अल्लाह और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान रखते हैं, इसलिए सुन्नत की अहमियत बढ़ जाती है और ये तक़वा में शामिल हो जाती है. वैसे भी महबूब की पसंदीदा चीज़ से मुहब्बत होना तो लाज़िमी है और जब बात दीन की हो, तो ये पुख़्ता ईमान की अलामत बन जाती है. इसलिए बिना सहरी खाये रोज़ा नहीं रखना चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल    


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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