प्रेरणादायी उपन्यास है रॉबिन्सन क्रूसो
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*-सरफ़राज़ ख़ान *हाल ही में अंग्रेज़ी के प्रथम उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ का
हिन्दी में भावानुवाद पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह भावानुवाद सुप्रसिद्ध
कवि, ...
फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरत और मिलनसार प्रिया राजवंश की ज़िंदगी की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है. पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच पली-बढ़ी एक लड़की कैसे लंदन पहुंचती है और फिर वापस हिंदुस्तान आकर फ़िल्मों में नायिका बन जाती है. एक ऐसी नायिका जिसने फ़िल्में तो बहुत कम कीं, इतनी कम कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ और दिलकश आवाज़ से उसने सबका दिल जीत लिया.
प्रिया राजवंश का जन्म 1937 में नैसर्गिक सौंदर्य के शहर शिमला में हुआ था. उनका बचपन का नाम वीरा था. उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे. प्रिया राजवंश ने शिमला में ही पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने कई अंग्रेज़ी नाटकों में हिस्सा लिया. जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से ब्रिटेन गए, तो प्रिया राजवंश ने लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाख़िला ले लिया. सौभाग्य से उन्हें फ़िल्मों में भी काम करने का मौक़ा मिल गया. हुआ यूं कि लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची. चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की ख़ूबसूरती के क़ायल हो गए. उन दिनों चेतन आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी. 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था. हिंदुस्तानी फ़ौज को भारी नुक़सान हुआ था और फ़ौज को पीछे हटना पड़ा. इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया. 1964 में बनी इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रिया राजवंश ने चेतन आनंद की हर स्तर पर मदद की. संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और संपादन तक में उनका दख़ल रहा. चेतन आनंद उन दिनों अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे. इसी दौरान प्रिया राजवंश और चेतन आनंद एक दूसरे के क़रीब आ गए और फिर ज़िंदगी भर साथ रहे. प्रिया राजवंश उम्र में चेतन आनंद से तक़रीबन 22 साल छोटी थीं, लेकिन उम्र का फ़ासला उनके बीच कभी नहीं आया.
प्रिया राजवंश ने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया. फ़िल्म हक़ीक़त के बाद 1970 में उनकी फ़िल्म हीर रांझा आई. 1973 में हिंदुस्तान की क़सम और हंसते ज़ख्म, 1977 में साहेब बहादुर, 1981 में क़ुदरत और 1985 में हाथों की लकीरें आई. प्रिया राजवंश ने सिर्फ़ चेतन आनंद की फ़िल्मों में ही काम किया और चेतन ने भी हक़ीक़त के बाद प्रिया राजवंश को ही अपनी हर फ़िल्म में नायिका बनाया. उन्हें फ़िल्मों के बहुत से प्रस्ताव मिलते थे, लेकिन वह इंकार कर देती थीं. उनकी खुशी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतन आनंद के साथ थी. हालांकि दोनों ने विवाह नहीं किया था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाता था. चेतन आनंद के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में वह बहुत सुखी थीं. कहा जाता है कि हीर रांझा प्रिया राजवंश को केंद्र में रखकर ही बनाई गई थी. इस फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि इसके सारे संवाद पद्य यानी काव्य रूप में हैं, जिन्हें कैफ़ी आज़मी ने लिखा था. इसे काव्य फ़िल्म कहना ग़लत न होगा. इसके गीत भी कैफ़ी आज़मी ने ही लिखे थे. प्रिया राजवंश पर फ़िल्माया गया गीत-मिलो न तुम तो, हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है…बहुत मशहूर हुआ. इसी तरह फ़िल्म हंसते जख्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा और मदन मोहन के संगीत से सजा गीत-बेताब दिल की तमन्ना यही है…आज भी लोग गुनगुना उठते हैं.
अंग्रेज़ी के लेखक आरके नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फ़िल्म गाइड बनाने के वक़्त पहला विवाद नायिका को लेकर ही हुआ था. देव आनंद माला सिन्हा को नायिका रोज़ी की भूमिका के लिए लेना चाहते थे, लेकिन चेतन की पसंद प्रिया राजवंश थीं. विजय आनंद का मानना था कि रोज़ी की भूमिका वहीदा रहमान से बेहतर कोई और अभिनेत्री नहीं निभा सकती, लेकिन वहीदा रहमान राज खोसला के साथ काम नहीं करती थीं. दरअसल, हुआ यह था कि देव आनंद गाइड के निर्देशन के लिए पहले ही राज खोसला से बात कर चुके थे. अब उन्हें राज खोसला और वहीदा रहमान में से किसी एक को चुनना था. चेतन आनंद और विजय आनंद ने वहीदा का समर्थन किया और फिर चेतन आनंद की सलाह पर निर्देशन की ज़िम्मेदारी विजय आनंद को सौंप दी गई. वहीदा रहमान ने कमाल का अभिनय किया और फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई.
प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक़्त आईं, जब 6 फ़रवरी, 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया. प्रिया राजवंश अकेली रह गईं. वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया. मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.
कुछ अरसा पहले चेतन आनंद की ज़िंदगी पर आधारित उनकी पत्नी उमा और बेटे केतन आनंद की एक किताब आई थी. इस किताब में ज़िंदगीभर चेतन आनंद के साथ रहने वाली प्रिया राजवंश का ज़िक्र नहीं के बराबर है. दरअसल, चेतन आनंद ने अपने लिए अलग एक बंगला बनवाया था, जिसमें वह प्रिया राजवंश के साथ रहा करते थे. यही बंगला बाद में प्रिया राजवंश की मौत की वजह बना यानी एक बंगले के लालच ने प्रिया राजवंश से उनकी ज़िंदगी छीन ली. वह अपने घर में मृत पाई गई थीं. उनके हत्यारों को तो अदालत ने सज़ा दे दी, लेकिन उनके प्रशंसक शायद ही उनके क़ातिलों को कभी मा़फ़ कर पाएं. अपनी फ़िल्मों की बदौलत वह हमेशा हमारे बीच रहेंगी, मुस्कराती और चहकती हुई.
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...
इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे दोज़ख़ की आग का क्या ख़ौफ़...
जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...
हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...
बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?
बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की दोज़ख़ भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...
जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए, तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...
किसी ने क्या ख़ूब कहा है-
मुकम्मल दो ही दानों पर
ये तस्बीह-ए-मुहब्बत है
जो आए तीसरा दाना
ये डोर टूट जाती है
मुक़र्रर वक़्त होता है
मुहब्बत की नमाज़ों का
अदा जिनकी निकल जाए
क़ज़ा भी छूट जाती है
मोहब्बत की नमाज़ों में
इमामत एक को सौंपो
इसे तकने उसे तकने से
नीयत टूट जाती है
मुहब्बत दिल का सजदा है
जो है तैहीद पर क़ायम
नज़र के शिर्क वालों से
मुहब्बत रूठ जाती है
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
मानव सभ्यता में रंगों का काफ़ी महत्व रहा है. हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया. दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है. कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया. विक्टोरियन काल में ज़्यादातर लोग काला या स्लेटी रंग इस्तेमाल करते थे. एक तरह से ये रंग इनकी पहचान थे. फ़िरऔन हमेशा काले कपड़े पहनता था. वैसे भी हर रंग के अपने सकारात्मक और नकारात्मक असर होते हैं. इसलिए यह नहीं कर सकते कि काला रंग हमेशा बुरा ही होता है. हालांकि कई सभ्यताओं में इसे शोक का रंग माना जाता है. शिया मोहर्रम के दिनों में ज़्यादातर काले कपड़े ही पहनते हैं. विरोध जताने के लिए भी काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे काले झंडे दिखाना, सर पर काला कपड़ा या काली पट्टी बांध लेना. ऐसा इस्लामी देशों में ज़्यादा होता है, लेकिन अब भारत में भी इस तरह विरोध जताया जाने लगा है, विशेषकर बाबरी मस्जिद की शहादत की बरसी यानी छह दिसंबर को मुस्लिम समुदाय के लोग काली पट्टी बांधकर ही अपना विरोध ज़ाहिर करते हैं.
महान दार्शनिक अरस्तु ने 4 ईसा पूर्व में नीले और पीले रंगों की गिनती शुरुआती रंगों में की. उन्होंने इसकी तुलना प्राकृतिक वस्तुओं से की, जैसे सूरज-चांद और दिन-रात आदि. उस वक़्त ज़्यादातर कलाकारों ने उनके सिद्धांत को माना और तक़रीबन दो हज़ार साल तक इसका असर देखने को मिला. इसी बीच मेडिकल प्रेक्टि्स के पितामाह कहे जाने वाले 11वीं शताब्दी के ईरान के चिकित्सा विशेषज्ञ हिप्पोकेट्स ने अरस्तु के सिद्धांत से अलग एक नया सिद्धांत पेश किया. उन्होंने रंगों का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया और इसे इलाज के लिए बेहतर ज़रिया क़रार दिया. उनका मानना था कि सफ़ेद फूल और वॉयलेट फूल के अलग-अलग असर होते हैं. उन्होंने एक और सिद्धांत दिया, जिसके मुताबिक़ हर व्यक्ति की त्वचा के रंग से भी उसकी बीमारी का पता लगाया जा सकता है और रंगों के ज़रिये ही इसका इलाज भी मुमकिन है. उन्होंने इसका ख़ूब इस्तेमाल भी किया.
15वीं शताब्दी में स्विट्जरलैंड के चिकित्सक वॉन होहेनहैम ने ह्यूमन स्टडी पर काफ़ी शोध किया, लेकिन उनके तरीक़े हमेशा विवादों में रहे. उन्होंने ज़ख्म भरने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया. 17-18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धांत ने अरस्तु के विशेष रंगों को सामान्य रंगों में बदल दिया. 1672 में न्यूटन ने रंगों पर अपना पहला परचा पेश किया. यह काफ़ी विवादों में रहा, क्योंकि अरस्तु के सिद्धांत के बाद इसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं था. रंगों के विज्ञान पर काम करने वाले लोगों में जॉन्स वॉल्फगैंग वॉन गौथे भी शामिल थे. उन्होंने न्यूटन के सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हुए थ्योरी ऑफ कलर पेश की. उनके सिद्धांत अरस्तु की थ्योरी से मिलते जुलते थे. उन्होंने कहा कि अंधेरे में से सबसे पहले नीला रंग निकलता है, वहीं सुबह के उगते हुए सूरज की किरणों से पीला रंग सामने आता है. नीला रंग गहरे रंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पीला रंग हल्के रंगों का. 19वीं शताब्दी में कलर थैरेपी का असर कम हुआ, लेकिन इसके बाद 20वीं शताब्दी में यह नए रूप में सामने आया. आज भी कई चिकित्सक कलर थैरेपी को इलाज का अच्छा ज़रिया मानते हैं और इससे अनेक बीमारियों का उपचार भी करते हैं. आयुर्वेद चिकित्सा में भी रंगों का विशेष महत्व है. रंग चिकित्सा के मुताबिक़ शरीर में रंगों के असंतुलन के कारण ही बीमारियां पैदा होती हैं. रंगों का समायोजन ठीक करके बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है. ऑस्टवाल्ड ने आठ आदर्श रंगों को विशेष क्रम में संयोजित किया. इस चक्र को ऑस्टवाल्ड वर्ण कहा जाता है. इसमें पीला, नारंगी, लाल, बैंगनी, नीला, आसमानी, समुद्री हरा और हरा रंग शामिल है. 60 के दशक में एंथ्रोपॉलिजिस्ट्स केन ने रंगों पर अध्ययन किया. उनके मुताबिक़ सभी सभ्यताओं ने रंगों को दो वर्गों में बांटा-पहला हल्के रंग और दूसरा गहरे रंग.
कौन-सा रंग क्या कहता है?
मूल रूप से इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है. ये सात रंग हैं लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैंगनी. लाल रंग को रक्त रंग भी कहते हैं, क्योंकि ख़ून का रंग लाल होता है. यह शक्ति का प्रतीक है, जो जीने की इच्छाशक्ति और अभिलाषा को बढ़ाता है. यह प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो क्यान रंग का संपूरक है. यह रंग क्रोध और हिंसा को भी दर्शाता है. हरा रंग प्रकृति से जुड़ा है. यह ख़ुशहाली का प्रतीक है. हमारे जीवन में इसका बहुत महत्व है. यह प्राथमिक रंग है. हरे रंग में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, सोडियम, कैल्शियम, निकिल आदि होते हैं. इस्लाम में इसे पवित्र रंग माना जाता है. नीला रंग आसमान का रंग है. यह विशालता का प्रतीक है. भारत का क्रीड़ा रंग भी नीला ही है. यह धर्मनिरपेक्षता का भी प्रतीक है. यह एक संयोजी प्राथमिक रंग है. इसका संपूरक रंग पीला है. गहरा नीला रंग अवसाद और निराशा को भी प्रकट करता है. पीला रंग ख़ुशी और रंगीन मिज़ाजी को दर्शाता है. यह आत्मविश्वास बढ़ाता है. यह वैराग्य से भी संबंधित है. हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है. विष्णु और कृष्ण को यह रंग प्रिय है. बसंत पंचमी तो इसी रंग से जुड़ा पर्व है. डल पीला रंग ईर्ष्या को दर्शाता है. स़फेद रंग पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है. यह शांति और सुरक्षा का भाव पैदा करता है. यह अकेलेपन को भी प्रकट करता है. काला रंग रहस्य का प्रतीक है. यह बदलाव से रोकता है. यह नकारात्मकता को भी दर्शाता है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते.
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.
दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं.
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.
ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.
लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.
दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.
कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.
रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं कि दुआएं तक़दीर बदल दिया करती हैं. अगर किसी दुरवेश की दुआ से ज़मीन के एक टुकड़े की हालत ही बदल जाए, तो वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं. वे इस बात के क़ायल हो जाते हैं कि क़ुदरत के करिश्मे को न कोई समझ पाया है और न कभी समझ सकता है. आज हम एक ऐसे ही करिश्मे की बात कर रहे हैं, जो नूह जिले के एक गांव में हुआ था और आज भी बरक़रार है.
देश की राजधानी दिल्ली के समीपवर्ती राज्य हरियाणा के नूह ज़िले का मढ़ी एक ऐसा गांव हैं, जहां फ़सल अन्य इलाक़ों के मुक़ाबले बहुत पहले पहले पक जाती है. जब आसपास और दूर-दराज़ के गांवों के खेतों में फ़सलें लहलहा रही होती हैं, तब इस गांव के किसान अपनी फ़सल काटकर घर ले जा चुके होते हैं. इस गांव के बाशिन्दे जैकम ख़ान का कहना है कि उन्होंने बुज़ुर्गों से सुना है कि किसी ज़माने में यहां भी आसपास के इलाक़ों की तरह ही अपने वक़्त पर फ़सल पका करती थी. एक बार की बात है कि यहां एक दरवेश आए और वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए. वे वहां घंटों तक इबादत करते रहे. गांव के लोगों ने उन्हें देखा, तो वे उनके पास गए और उन्हें पीने के लिए पानी और खाने के लिए भोजन दिया. वह दरवेश कहीं दूर से आए थे और भूखे और प्यासे भी थे. गांववालों की मेहमान नवाज़ी से वह बहुत ख़ुश हुए. उन्होंने गांववालों को दुआ देते हुए कहा कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. कुछ वक़्त बाद वे दुरवेश गांव से चले गए. उनके जाने के कुछ माह बाद किसानों ने देखा कि उनकी फ़सल आसपास के गांवों की फ़सल से पहले पककर तैयार हो गई. इस बात की चर्चा दूर-दूर तलक होने लगी. पहले तो सबने इसे कोई इत्तेफ़ाक़ समझा, लेकिन जब लगातार फ़सल अन्य गांवों की फ़सल से पहले पकने लगी, तो लोग सोचने पर मजबूर हो गए. उन्हें दरवेश की दुआ याद आई कि उन्होंने कहा था कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. वे मान गए कि यह दरवेश की दुआ का ही असर है, जो उन्हें औरों से पहले रिज़्क़ यानी फ़सल मिल पाती है.
इस गांव की एक ख़ास बात यह भी है कि मढ़ी महामारी से महफ़ूज़ रहता है. जब कभी कोई महामारी फैलती है, तो भले ही आसपास के गांव उसकी चपेट में आ जाएं, लेकिन मढ़ी सुरक्षित रहता है. यहां के लोग कम बीमार पड़ते हैं. इसे भी गांववाले दुरवेश की दुआओं का ही असर मानते हैं. सूबे ख़ान कहते हैं कि मढ़ी ही नहीं, पूरे मेवात इलाक़े के लोग सादगी पसंद हैं. वे फ़क़ीरों और साधु-संतों का मान-सम्मान करने वाले हैं. यहां कोई फ़कीर, साधु-संत या कोई मुसाफ़िर आ जाए, तो गांववाले उसे भोजन करवाते हैं, उसे पानी पिलाते हैं, उसका आदर-सत्कार करते हैं. गांववाले कहते हैं कि मेहमान नवाज़ी करना तो हमारा फ़र्ज़ है. अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई मौक़ों पर मेहमान का स्वागत करने, उसकी ख़िदमत करने और उसका ख़्याल रखने का हुक्म दिया है. गांववाले अपनी इस परम्परा को क़ायम रखे हुए हैं और वे अपने बच्चों को भी इसकी तालीम देते हैं.
कुछ लोग कहते हैं कि फ़सल को पर्याप्त सिंचाई जल न मिल पाने की वजह से मढ़ी में फ़सल जल्द पककर तैयार हो जाती है. लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि मढ़ी के आसपास के दर्जनों गांवों की यही हालत है. वहां भी फ़सलों की पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पाती और उन्हें भी बहुत कम पानी मिल पाता है. फिर एक जैसी हालत में वहां की फ़सलें जल्द पककर तैयार क्यों नहीं होती? इस सवाल का उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं होता, सिवाय इसके कि यह बात उनकी समझ से परे है.
गांववाले बताते हैं कि दूर-दूर से कृषि वैज्ञानिक उनके गांव में आए और उन्होंने हालात का जायज़ा लिया, लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे वापस लौट गए.
जल संकट
गांव बाई के सरपंच आबिद बताते हैं कि इलाक़े के मढ़ी सहित तक़रीबन 66 गांवों में अब तक सिंचाई का नहरी पानी नहीं पहुंच पाया है. इसलिए इस इलाक़े के किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर हैं. इस वजह से यहां साल में एक ही फ़सल हो पाती है. इस इलाक़े में भूजल-स्तर बहुत गहरा है. यहां का पानी बहुत खारा होने की वजह से पीने के लायक़ भी नहीं है. ऐसे में फ़सल कहां से हो. यहां के किसान अनाज में गेहूं और जौ की फ़सल उगाते हैं. दलहन में मसूर और तिलहन में सरसों की खेती की जाती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि 1507 वर्ग किलोमीटर में फैले मेवात यानी नूह इलाक़े का भू-जल स्तर बहुत नीचे है. इतना ही नहीं, यहां के ज़्यादातर इलाक़े का पानी बहुत खारा और फ़्लोराइडयुक्त है, जिससे यह पीने लायक़ बिल्कुल भी नहीं है. सिर्फ़ अरावली पहाड़ों की तलहटी में बसे गांवों का पानी ही पीने के लायक़ है. एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ मेवात में जल संकट की हालत बहुत गंभीर हैं. यहां के 443 गांवों में से महज़ 57 गांव ही ऐसे हैं, जहां का भू-जल पीने लायक़ है. इलाक़े के 104 गांवों का पानी बहुत ज़्यादा खारा है. यहां के 31 गांवों के पानी में फ़्लोराइड की मात्रा बहुत ज़्यादा है, जो सेहत के लिए बहुत नुक़सानदेह है. इलाक़े के 52 गांवों का पानी खारा भी है और उसमें फ़्लोराइड भी बहुत ही ज़्यादा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ पानी में फ़्लोराइड की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से यह धीमे ज़हर का काम करता है. इस पानी के सेवन से गुर्दों में पथरी हो जाती है. इससे हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं. शरीर में दर्द रहने लगता है और ज़रा सी चोट से हड्डी टूट भी सकती है. इसके अलावा फ़्लोराइडयुक्त पानी के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियां भी हो जाती हैं.
हालांकि मेवात के तक़रीबन अढ़ाई सौ गांवों में रेनीवेल परियोजना के तहत पेयजल की आपूर्ति की जा रही है. यह पानी यमुना के किनारे बड़े बोरवेल के बूस्टिंग स्टेशनों के ज़रिये गांवों में पहुंचाया जा रहा है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने इस योजना की आधारशिला रखी थी. इसका मक़सद यमुना किनारे रेनीवेल बनाकर मेवात में पानी पहुंचाना था. यह परियोजना 2019 की आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी. इसके तहत प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर स्वच्छ पेयजल देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन बढ़ती आबादी की लगातार बढ़ती पानी की मांग की वजह से यहां जल संकट बना रहता है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार : आवाज़
तस्वीर गूगल
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
"इक तानपुरा मटमैला सा
इक सीधे पल्ले की साड़ी
इक चोटी लाल परांदे संग
माथे पर बिंदिया की लाली
सादी चूड़ी,जगमग कंगन
हंसली,पायल,छम छम करधन
एक औरत,काली सी औरत
दो आंखें रौशन सी आँखें
इक गर्दन ऊंची उठी हुई
आवाज़ हमेशा नपी तुली
वो एक बदन,जिसमें कितने
इतिहास उतरते आते थे
मानव क्या ,असुर राक्षस क्या
देवता कई मिल जाते थे!
वो चलती फिरती गाथा थी
वो लोकभूमि की महाव्यास
वो कठिन शास्त्र का सरल भाष्य
वो कृष्ण बंसरी का प्रकाश!
जो गूँज रही थी नगर नगर
वो जंगल मिट्टी की जाई
अब लील गया आकाश जिसे
कहते थे हम "तीजन बाई"..!!
-ओमा अक्
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...
अच्छी बातें जहां भी मिलें वहां से लेनी चाहिए। यह प्रवृत्ति हमें लानी पड़ेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम इस देश में कितनी भी अच्छी बातें कर लें सौहार्द, प्रेम और गंगा-जमुनी तहजीब की- पर वो आएगी नहीं। आज आप सब यहां इकट्ठा हैं और मुझे लगता है आप में 95% मुस्लिम लोग हैं। तारीफ तो आप लोग सुन सुन के अब तक अघा गए होंगे और बहुत बुरी वाली नफरत भी देख देख के अघा गए होंगे। थोड़ी देर हम लोगों को बैठकर समीक्षात्मक दृष्टि से एक बार अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है दुनिया की हर कौम को, समाज को हर कम्युनिटी को बीच-बीच में अपनी समीक्षा करनी चाहिए कि अगर उसका पतन हो रहा है, उसके खिलाफ लोगों की आवाज बुलंद हो रही है तो सारी कमी हमारे विपक्षी की नहीं होती। बहुत सी कमियां हमारे भीतर व्याप्त होती हैं।
मुझे लगता है कि आज वह समय है कि देश और दुनिया के मुसलमान बैठें और सोचें कि उनसे कहां पर कौन सी गलती होती चली जा रही है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा तबका उसके खिलाफ हो चुका है, उसके मुखालिफ है। ये बातें सुनने में अजीब लग सकती हैं। मैं यहां से बहुत मीठी बातें कर सकता हूं। आप लोगों को बहुत अच्छा बता सकता हूं। इस्लाम धर्म की महानता गिना सकता हूं। पर, इसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि, यदि मेरे लिए इस्लाम दुनिया का सबसे महान धर्म होता तो मैं सुबह कलमा पढ़ के मुसलमान बन चुका होता। यकीनन मेरे और आपके, दोनों के दृष्टिकोण में कोई तो फर्क है और इस फर्क के साथ हमें इस देश में और इस दुनिया में रहना होगा। समस्या कहीं और छुपी हुई है।
हम मुसलमान हैं, या हम हिंदू हैं, या हम ईसाई हैं, या हम सिख हैं- इन बातों से दुनिया में किसी को कोई बैर नहीं होता। इन बातों से किसी को कोई समस्या नहीं होती कि हम कौन हैं। सारी समस्या यहां से शुरू होती है जब हम कहते हैं कि- हमसे बेहतर कोई नहीं है। आपके मुसलमान होने से इस दुनिया को कोई तकलीफ नहीं होती। याद रखिए, आज मुसलमानों के बीच में एक सामान्य बात फैला दी गई है। मेरे पास अक्सर बहुत सारे मुस्लिम ऐसे मीम, ऐसे मैसेज। ऐसे वीडियोज फॉरवर्ड करते हैं जिसमें हिंदू लोग मुसलमानों को मार रहे हैं- या कोई गुरु उकसा रहा है- या कोई गुरु इस्लाम को गालियां दे रहा है- या कोई नेता मुसलमानों के विरुद्ध बोल रहा है। मैं कई बार सोचता हूं कि जवाब में फिर मैं वो सारे वीडियोज निकाल दूं जिसमें कि मुसलमान नेता पूरी दुनिया को गाली दे रहे हैं- मुस्लिम नेता-मौलाना पूरी दुनिया से नाराज घूम रहे हैं- उनको दुनिया में कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसी बातें भरी पड़ी हैं।
मुझे नहीं लगता है कि आप में से जितने लोग अभी यहां मेरी प्रशंसा कर रहे थे इस देश में ऐसे दस-बारह मौलाना निकालिए जो ठीक यही कर रहे हों। मैंने तो अपने यहां ये दावत इफ्तार आज नहीं, 20 साल से रखा है। लेकिन और कितने मौलाना हैं, कितने मुस्लिम स्कॉलर हैं, जिनके घर में आप होली मिलने गए थे और कितने हिंदू लोगों को बुलाकर होली मिलन कराया गया था। आप में से कितने लोगों ने रंग गुलाल लगा के ये करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं लगता कि आप में से अधिकांश लोगों ने ऐसा किया होगा। बहुत शरीफ मुसलमानों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए होंगे ताकि रंग का छींटा ना पड़े, होली की आवाज ना सुनाई दे। कुछ एक होंगे, जो बाहर निकल के गए होंगे, होली खेली होगी। पर, उनको बाद में कितनी गालियां सुननी पड़ी होंगी अपनी कम्युनिटी में… जरा उनसे जाकर यह भी पूछिएगा।
मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि पिछले काफी समय से ना केवल मुसलमान, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वामपंथी धड़ा भी बहुसंख्यक यानी हिन्दुओं के खिलाफ है। पूरी दुनिया में ऐसा है। दुनिया में जहां भी वामपंथी होते हैं… वामपंथी समझते हो ना लेफ्टिस्ट!… जैसे आजकल जो पत्रकार आपको अच्छे लग रहे हैं वो लेफ्टिस्ट हैं। दरअसल भारत के मुसलमानों को अजीत अंजुम अच्छा लगता है, रवीश कुमार अच्छा लगता है, बरखा दत्त अच्छी लगती है। ये सब लोग अच्छे लगते हैं क्योंकि वो इस वक्त मोदी को, बीजेपी सरकार को, हिंदुओं को, हिंदुओं की संकीर्णता को गाली देते हुए आपकी प्रशंसा या आपकी सुरक्षा करते हैं। पर, आप में से किसी को (वो जो गुजर गए) पाकिस्तान के तारिक़ फ़तह शायद ही अच्छे लगते होंगे। लेफ्ट की एक विशिष्टता समझिएगा। लेफ्ट हमेशा अल्पसंख्यकों को, माइनॉरिटी को पकड़ता है, क्योंकि उसके पास अपनी कमजोरी होती है। वह बहुसंख्यक के साथ नहीं है, तभी वह लेफ्ट है। इसलिए वो उस देश के अल्पसंख्यक को पकड़ता है और अल्पसंख्यक को हमेशा सत्ता के खिलाफ बरगलाता रहता है।
बहुत बदकिस्मती की बात है कि भारत में ज्यादातर मुसलमान पढ़ते नहीं है। मैं बीस बाईस सालों से मुसलमानों के संपर्क में हूं। मैंने निरंतर यह कहा कि पढ़ो। तुम्हारी किताब का ही नाम पढ़ो। कुरान के मानी होता है पढ़ना, स्टडी करना। पर तुम नहीं पढ़ते हो। जब तुम नहीं पढ़ते हो तो तुम इतिहास भी नहीं पढ़ते हो। और जब तुम इतिहास नहीं पढ़ते हो, तो तुम अपनी रूट्स नहीं खोज पाते हो, अपनी जड़ नहीं खोज पाते हो। फिर तुम्हें जो बता दिया जाता है तुम उसमें खुश हो जाते हो। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी केवल हिंदुओं के घर नहीं चल रही है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मुसलमानों के घर भी चल रही है, सिखों के घर भी चल रही है, ईसाइयों के घर भी चल रही है, दलितों के घर भी चल रही है। सबके घर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चल रही है।
अच्छी बातें करने का जमाना जा चुका है। अब समझने का जमाना है। यकीनन वो लोग मूर्ख हैं जो किसी बादशाह की कब्र खोद कर उसे सपाट करके उस पे तुलसी का बिरवा लगा देना चाहते हैं। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है। ये तो लगभग वही काम हो गया जो उस बादशाह ने खुद किया था। लेकिन उससे बड़े मूर्ख वो हैं जो उस कब्र को बचाने में लगे हुए हैं- जिन्हें ऐसा लगता है कि उस कब्र को बचा लेने से उनका इतिहास सुरक्षित हो जाएगा। इतिहास कब्रों में नहीं रहता। इतिहास इंसानों में रहता है। कब्रों के अंदर इतिहास नहीं रहते। इस्लाम की मूलभूत परंपरा में कब्रों, समाधियों इन सब चीजों का विरोध किया गया था। इसका मतलब क्या था? मोहम्मद कहना क्या चाहते थे? क्या वो अपने लिए एक बड़ा सा मंदिर, एक बड़ा सा मस्तबा नहीं बनवा सकते थे? पिरामिड से ऊंचा उनका एक समाधि स्थल बन सकता था। इतनी ताकत मोहम्मद की अपनी जिंदगी में आ चुकी थी। नहीं बनवाया तो क्यों? इसलिए क्योंकि मोहम्मद जानते थे कि इस्लाम समाधियों में, बुतों में, कब्रों में, महलों में, दरवाजों में, शिलालेखों में नहीं होगा। इस्लाम अगर जिंदा रहेगा तो वो किसी मुसलमान के किरदार के अंदर जिंदा रहेगा।
मगर ऐसा होता नहीं है। निजामुद्दीन औलिया ने मोहब्बत, प्रेम-सहिष्णुता, सद्भाव की भावना का प्रचार किया। उसे आपने स्वीकार नहीं किया। पर उनकी मजार पर चादर ले ले के आप हर बृहस्पतिवार, हर जुमरात, हर जुम्मा, हर शनिवार, हर खड़े हैं। सवाल किसी बुतपरस्ती, किसी मजारपरस्ती का नहीं है। मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो खुद बुतपरस्त हूं। मेरा इन सब से कोई मुखालिफत नहीं। मेरी मुखालिफत इस बात से है कि ठीक है, आपका अकीदा है, आपको अच्छा लगता है। आप ले जाइए गुलाब और चढ़ा के आ जाइए… निजामुद्दीन के दरवाजे पर… अमीर खुसरो के दरवाजे पर… किसी भी बाबा के, पीर के दरवाजे पर… कोई फर्क नहीं पड़ता। जाइए बोसा ले आइए जाकर के खाना-ए काबे में लगे हुए वो संग असद का। पर इससे क्या होना है? दरअसल जब तक आपके किरदार के भीतर वो मूल बातें नहीं आती हैं जिससे कि इस्लाम दुनिया में इतना फैला… या, एक हिंदू के भीतर जब तक वो बातें उसके चरित्र में नहीं उतरती हैं जिससे राम दुनिया में पूजनीय बने या कृष्ण दुनिया में पूजनीय बने… या एक ईसाई के अंदर नहीं आतीं जिससे ईसा पूरी दुनिया में इतने प्यारे, पूजनीय बने… तब तक किसी समुदाय के होने का अर्थ वास्तव में केवल और केवल दुष्टों की एक बड़ी फौज खड़ा करना होता है। याद रखिएगा आप में से तमाम लोग केवल यह रोज़े रख के, इफ्तार मना करके और दावत इफ्तार करने के बाद बहुत सारी गालियां उन लोगों को देते हो जो आपके खिलाफ बोलते हैं… या चुगलियां करते हुए निकल जाएंगे… या उन लोगों से प्रभावित हो जाएंगे जो बिना मतलब आपको सांत्वना दे रहे हैं… ऐसा है तो आप अपना नुकसान करते जा रहे हैं।
इस वक्त मेरे सामने मुसलमान हैं, इसलिए मैं सिर्फ मुसलमानों से बातें कर रहा हूं। भारत में वो तथाकथित संघीय विचारधारा या संकीर्ण विचारधारा आपकी दुश्मन हो सकती है। पाकिस्तान में कौन सा आरएसएस काम करता है? अफगानिस्तान में कौन सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा है? सूडान में कौन सा मोदी है? इराक में कौन कर रहा है? ईरान में कौन है? दुनिया में शायद 50 से कुछ ज्यादा देश इस्लामिक हो चुके हैं। उन देशों में कौन नरेंद्र मोदी जाकर के बैठा है, कौन योगी आदित्यनाथ बैठा है, कौन सा आरएसएस काम कर रहा है? अरब के कुछ बहुत अमीर, ओबाश और अय्याश देशों को छोड़ दीजिए। उसके बाहर कौन सा ऐसा देश है जहां आपस में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल नहीं कर रहा है- उसकी हत्या नहीं कर रहा है- उसे मार नहीं रहा है। इसकी समस्या कहां छुपी हुई है यह आप खोजेंगे। इसे मैं खोजूंगा तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा। आपको ऐसा लगेगा कि यह तो काफिर है- यह तो हमें बरगला रहा है- तो बेहतर है इसे आप ही खोजिए कि किस समस्या के चलते आपको पूरी दुनिया में जिल्लत, बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा है।
आपको पता है आपको यूरोप और अमेरिका का वीजा लेना पड़े को तो कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। आपकी टोपी और दाढ़ी कितनी बड़ी समस्या बन जाएगी। ऐसा हमेशा से तो नहीं था अचानक से कैसे हो गया? सन 2000 में बीबीसी अपने सर्वे में दुनिया का सबसे सफल और सबसे ताकतवर इतिहास का व्यक्ति चुनता है प्रॉफेट मोहम्मद को। सन 2000 से 2015-16 और फिर 2023-24 आते-आते यूरोप, अमेरिका आपको वीजा नहीं देता है। क्या हो गया इतने दिनों के अंदर? इस समस्या को समझिएगा। यह समस्या हिंदू में भी है, मुसलमान में भी है, सिख में भी है और ईसाई में भी है। मैं सब में एक बराबर समझता हूं।
हमारे बुत परस्त होने से, हमारे आतिश परस्त होने से, हमारे मजार परस्त होने से या हमारे तथाकथित खुदा परस्त होने से किसी को कोई तकलीफ नहीं होती है। तकलीफ शुरू तब होती है जब बहार भाई ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया उस निराकार खुदा को मानने लगे, या जब ओमा द अक्क सोचते हैं कि पूरी दुनिया मेरे भगवान राम को मानने लगे… सारी समस्या वहां से शुरू होती है। दूसरे को अपने जैसा बनाने की धुन इस दुनिया में हमें एक दूसरे का शत्रु बनाती है। तुम्हारा बच्चा तुम्हारी तरह नहीं होता, वो तुम्हारी बात नहीं मानता है और तुम चाहते हो पूरा मुल्क तुम्हारी बात मान ले। ना केवल मुल्क बल्कि पूरी दुनिया तुम्हारी बात मान ले। ये घमंड शायद अच्छा भी लगेगा। यकीनन अच्छा लगेगा। हो सकता है तुम में से कोई उठ के कह दे कि हमारे तो रसूल की सुन्नत है उन्होंने तो खुद इतनी बड़ी जंग लड़ी थी। तो मेरा सवाल होगा कि क्या तुम्हारा किरदार तुम्हारे रसूल की तरह है? क्या तुम दौलत से दूर हो? क्या तुम खुशामद से दूर हो? क्या तुम तारीफों से फूलते नहीं हो? क्या तुम बड़े-बड़े लोगों की चापलूसी नहीं करते हो? क्या तुम्हारा चरित्र तुम्हारे सर के ऊपर बोलता रहता है- कि तुम्हारी लालच तुम्हारी नाक पर चढ़ी रहती है- कि तुम्हारी वासनाएं तुम्हारे सर पर बैठी रहती हैं। किस चीज पर तुम तुलना कर रहे हो क्योंकि तुम्हारा चेहरा देख के तो बार-बार ऐसा ही लगेगा कि इस्लाम यकीनन औरंगजेब की तरह के लोगों ने फैलाया होगा जिनके हाथ में तलवारें थीं, जिन्होंने अपने बाप का कत्ल किया, अपनी बहनों का कत्ल किया, अपने भाइयों का कत्ल किया… और फिर भी टोपी बुन करके अपने को औलिया बताता रहा। इतिहास यही है तुम इसको बदल नहीं सकते हो। लेकिन खुश होने की जगह नहीं है यहां किसी हिंदू को- क्योंकि यही काम बिंबसार भी कर रहा था- यही काम समुद्रगुप्त भी कर रहा था- अजात शत्रु भी कर रहा था… यह काम तो चलता ही रहा है। सत्ताओं में यही होता है। हमेशा एक सत्ता दूसरी सत्ता को निगलने के लिए यही करती है। सत्ताओं में कोई बाप, बेटा, भाई, बहन नहीं होता। मैंने पिछले दिनों कहा भी था कि अकृतज्ञता, एहसान फरामोशी सियासतदान की पहली निशानी होती है। तुम सियासत नहीं कर सकते हो जब तक तुम में एहसान फरामोशी ना आ जाए।
तुम्हारा आदर्श कोई महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी या औरंगजेब या अकबर नहीं है। यकीन करना तुम्हारे हिसाब से, इस्लाम के हिसाब से तुम्हारा आदर्श केवल और केवल एक ही हो सकता है- वो है मोहम्मद पैगंबर… और कोई नहीं। उसके बाद के लोग तुम्हारे लिए मोहब्बत करने के लिए हैं। तुम रूमी से मोहब्बत कर सकते हो। तुम मंसूर से मोहब्बत कर सकते हो। तुम निजामुद्दीन से मोहब्बत कर सकते हो। तुम गालिब से मोहब्बत कर सकते हो। तुम जिससे मन करे उससे मोहब्बत कर सकते हो। गांधी से मोहब्बत कर सकते हो- किसी से भी कर सकते हो। और जब तुम अपने प्रॉफिट, अपने पैगंबर के किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करोगे- मान लो आज से शुरू करोगे- एक साल बाद तुम देखोगे कि तुम्हारे दुश्मन कम हो गए हैं। इसलिए नहीं कि अब लोग तुमसे अदावत नहीं रखते, बल्कि इसलिए कि अब तुम्हें दूसरों की दुश्मनी से खौफ नहीं लगता है। अब तुम्हें अपने खुदा की जात पर इतना यकीन है कि वो तुम्हें हर मुसीबत से बचा लेगा। तुम्हारा डर तुम्हारे दुश्मन बढ़ाता चला जाता है और तुम्हारी हिम्मत तुम्हारे दुश्मनों को घटाती चली जाती है। याद रखना जिसके अंदर हिम्मत होगी उसके दुश्मन घटते चले जाएंगे। जिसके अंदर खौफ होगा उसके दुश्मन बढ़ते चले जाएंगे।
भारत, पाकिस्तान और इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या है कि एक लंबे समय से मुसलमानों को कुछ चंद मुसलमानों ने खौफजदा करके रखा है। डरा करके रखा है। जैसे उनके ऊपर बड़ी कयामत लगी हुई है। सारी दुनिया उनके खिलाफ नेजे (भाले) लेकर खड़ी है। तुम किसी कर्बला में नहीं खड़े हो- इसको अपने दिमाग में रख लेना। तुम एक अच्छी दुनिया में रहते हो। यकीनन ये दुनिया बहुत खराब है लेकिन वो फिर सिर्फ तुम्हारे लिए खराब नहीं है, वो फिर मेरे लिए भी खराब है। वो हर किसी के लिए खराब है। वायु प्रदूषण तुम्हारे लिए ही नहीं है मेरे लिए भी है। वातावरण में गर्मी बढ़ रही है तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी। महंगाई तुम्हारे लिए भी है और मेरे लिए भी। बीमारी तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी। दुनिया में जो कुछ खराब है वो सब हम में बंटा हुआ है। लेकिन साथ ही साथ इसके दुनिया में जो कुछ अच्छा है वो भी अभी हम में, तुम में बटा हुआ है। ये खत्म नहीं हुआ है भारत के अंदर।
यदि यहां का बहुसंख्यक औरंगजेब से नफरत करता है तो ये नहीं सोचो कि आज नफरत करता है। हम लोग उस समय स्कूल में पढ़ते थे। यहां मौजूद मुमताज भी स्कूल में पढ़ा हुआ है, बहार भाई भी स्कूल में पढ़े हुए हैं। हम लोग के स्कूल में भी औरंगजेब खराब ही बादशाह था। इतिहास में कभी अच्छा बादशाह नहीं बताया गया था। लेकिन उस जमाने में भी हम मोहम्मद रफी की तस्वीर अपने घर में लगाते थे। दिलीप कुमार की लगाते थे। मिर्जा गालिब के ऊपर ऐसे ही हिंदुस्तान फिदा था। मीर तकी मीर को खुदा-ए सुखन यही हिंदुस्तान कह रहा था। अमीर खुसरो के गाने गा करके यही हिंदुस्तान बड़ा हो रहा था। यह मत समझो कि इस देश का हिंदू मुसलमानों से नफरत करता है। लेकिन हां, यकीन करो कि हम में से जितने भी लोग हैं उन सबको जब एक समुदाय बनाकर, एक कम्युनिटी बनाकर रख दिया जाता है, तब हम अपने इतिहास की तरफ देखने लगते हैं। और, इतिहास में दंश होते हैं- चोट होती है- तकलीफें होती है। फिर हम औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर निकालने लगते हैं, ये एक समस्या होती है।
औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर ना निकले इसके लिए एक काम मुमताज को भी करना पड़ता है कि उसे अपना किरदार औरंगजेब के किरदार से जोड़कर नहीं दिखाना होता है। फिर उसे अपना किरदार किसी गालिब से, किसी मीर से, किसी खुसरो से… या फिर और ऊंचा उठ सके तो अपने पैगंबर से जोड़ के दिखाना पड़ता है। जिनके पास सबके लिए मोहब्बत थी। जिन्होंने यह कहा कि मेरा खुदा रहमतुल आलमीन है, मेरा खुदा पूरी दुनिया के लिए रहमत है। यह जबानी जमा खर्च नहीं है कि तुमने मुंह से बोल दिया? क्या तुम इस पर यकीन करते हो कि तुम्हारा खुदा पूरी दुनिया पर रहमत करता है… और यदि ऐसा करता है तो उसकी रहमत से ही तो सब होंगे- वो भी जो उसमें यकीन नहीं करते हैं।
एक पुरानी सूफियों की कहानी है। मूसा ने अल्लाह की तरफ देखा और कहा कोई हुक्म दो, जो मैं पूरा करता रहूं, बार-बार पूरा करता रहूं। अल्लाह ने कहा कुछ नहीं लोगों को खाना खिला देना। इतना किया करो वो सब जो मेरे बंदे हैं उनको तू खाना खिलाया कर। मूसा ने कहा ठीक है। मैं सबको बुलाऊंगा और खाना खिलाऊंगा। वह सबको बुलाते खाने के लिए। मूसा यहूदी थे। वो लोगों को बुलाते, प्रार्थना करने को कहते और फिर सबको भोजन देते। एक दिन एक बूढ़ा आया। उसने आकर के कहा- खाना दो। मूसा ने कहा कि ठीक है। आओ प्रार्थना करो और खाना खाओ। उसने कहा- नहीं, मैं तुम्हारे ईश्वर में यकीन नहीं करता हूं। मेरा यकीन तेरे खुदा में नहीं है। इस पर मूसा ने कहा कि तब तो तुम काफिर हो। तुम्हें कैसे मैं खाना दे दूं। मूसा ने उसे लौटा दिया। जब मूसा फिर गए तूर पर अल्लाह से बात करने के लिए। मूसा कलीमुल्लाह थे, कलाम करते थे। अल्लाह से बात करने के लिए गए। मूसा ने सवाल पूछा- अल्लाह ने कोई जवाब नहीं दिया। सिलसिला चलता रहा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। जब एक हफ्ते तक कोई जवाब ना आया तो मूसा को लगा कि लगता है मुझसे कोई गुनाह हो गया है। अब उन्होंने रोना शुरू किया। पुकारना शुरू किया। मेरी गलती माफ करो, मुझे बताओ क्या हुआ? तो फिर आवाज आई कि मैंने तुझे कहा था सबको खाना खिलाने के लिए, तूने नहीं खिलाया। तो उसने कहा कि मैंने तो सबको खिलाया। बस एक को नहीं खिलाया था जो तुझ में यकीन नहीं करता है। अल्लाह ने मूसा से कहा कि क्या मुझे नहीं पता कि वो मुझ में यकीन नहीं करता, लेकिन मैं तो उसे बरसों से खिला रहा हूँ। तूने ये ठेकेदारी कैसे ले ली। सवाल ये है।
दुनिया के सारे धर्म दरअसल इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने सबको अपनी तरफ बुलाया- सबको छांव देने की कोशिश की- सबको आश्रय देने की कोशिश की। और यही किरदार अगर किसी हिंदू में, किसी मुसलमान में, किसी सिख में या किसी ईसाई में पैदा हो जाता है तो लोग उसकी तरफ घूमते हैं। लोग उसकी इज्जत करते हैं। और फिर उसके सदके वो उसके दीन की, उसके मज़हब की भी इज़्ज़त करने लगते हैं। फिर यह रुकने वाला सिलसिला नहीं रह जाता है!!
-ओमा अक्
वो पयम्बर के नवासे, वो बहत्तर जाँ निसार
वो अनलहक़ की सदाओं से महकता रेगज़ार
अर-रिहाया से अली असग़र तलक कितने शहीद
अर्श से माहे मुहर्रम में दिया करते हैं दीद
या मोहम्मद कह रहे थे प्यास से तड़पे हलक़
जीत ना पाएंगे बातिल जीतता है सिर्फ़ हक़
जीत ना पाएंगे बातिल जीतता है सिर्फ़ हक़
हाय ये ख़ुदग़र्ज़ दुनिया, हाय ये ज़ुल्मो सितम
कर्बला ही कर्बला है ज़िन्दग़ी हर एक गाम
राहे हक़ में हो गए क़ुर्बान जो उनको सलाम
आसमाँ पर सर उठाए, ताज़िया देता पयाम...!!
-ओमा अक्
(मुहर्रम के मौक़े पर कर्बला की याद में)
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जनाबे मुहम्मद मोहम्मद हनफ़िया को वसीयत
जब इमाम हुसैन ने मदीने से मक्के की तरफ़ चलने का इरादा किया तो आपने एक वसीयत लिखी और अपनी अंगूठी से उस पर मोहर लगाई, फिर उसको लपेटा और अपने भाई मोहम्मद बिन हनफिया को दिया और उसके बाद आपने उनसे विदा लिया और तीन शाबान 60 हिजरी को अपने अहलेबैत के साथ मक्के की तरफ़ चल पड़े। उस वसीयत में आपने लिखा था-
بِسْمِ اللَهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ. هَذَا مَا أَوْصَي بِهِ الْحُسَيْنُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ إلَي أَخِيهِ مُحَمَّدٍ الْمَعْرُوفِ بِابْنِ الْحَنَفِيَّه:
यह है वह वसीयत जिसे हुसैन इब्ने अली अपने भाई मोहम्मद जो कि इब्ने हनफ़िया के नाम से प्रसिद्ध हैं के नाम कर रह हैं.
إنَّ الْحُسَيْنَ بْنَ عَلِيٍّ يَشْهَدُ أَنْ لاَ إلَهَ إلاَّ اللَهُ، وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ. وَأَنَّ مُحَمَّدًا صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، جَآءَ بِالْحَقِّ مِنْ عِنْدِ الْحَقِّ. وَأَنَّ الْجَنَّه وَالنَّارَ حَقٌّ. وَأَنَّ السَّاعَه ءَاتِيَه لاَ رَيْبَ فِيهَا. وَأَنَّ اللَهَ يَبْعَثُ مَنْ فِي الْقُبُورِ.
निःसंदेह हुसैन बिन अली गवादी देता है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई और ख़ुदा नहीं है वह अकेला है जिसका कोई शरीक नहीं है, और निःसंदेह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके बंदे और रसूल हैं, जो सच के साथ हक़ की तरफ़ से आए हैं। और निःसंदेह स्वर्ग और नर्क हक़ है, और क़यामत आने वाली है और उसमें कोई संदेह नहीं है, और यह कि ख़ुदा उन सभी को जो क़ब्रों में हैं दोबारा उठाएगा।
إنِّي لَمْ أَخْرُجْ أَشِرًا وَلاَبَطِرًا وَلاَمُفْسِدًا وَلاَظَالِمًا وَإنَّمَا خَرَجْتُ لِطَلَبِ الاْءصْلاَحِ فِي أُمَّه جَدِّي مُحَمَّدٍ صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ؛ أُرِيدُ أَنْ ءَامُرَ بِالْمَعْرُوفِ وَأَنْهَي عَنِ الْمُنْكَرِ، وَأَسِيرَ بِسِيرَه جَدِّي وَسِيرَه أَبِي عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ عليه السلام.
मैं तफ़रीह और खिलवाड़ के लिये नहीं निकला हूँ, और न अत्याचार और न फ़साद एवं ख़राबी और न ज़ुल्म व सितम के लिये! बल्कि मैं अपने नाना हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत के सुधार एवं इस्लाह के लिये निकला हूँ, मैं अम्र बिल मारूफ़ करना चाहता हूँ, और न ही अनिल मुनकर करना चाहता हूँ (अच्छाई की तरफ़ बुलाना और बुराई से रोकना चाहता हूँ) और मैं अपने नाना और अपने पिता अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की सुन्नत और सीरत पर चलना चाहता हूँ,
فَمَنْ قَبِلَنِي بِقَبُولِ الْحَقِّ فَاللَهُ أَوْلَي بِالْحَقِّ، وَمَنْ رَدَّ عَلَيَّ هَذَا أَصْبِرُ حَتَّي يَقْضِيَ اللَهُ بَيْنِي وَبَيْنَ الْقَوْمِ بِالْحَقِّ؛ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ
तो जो भी मुझे स्वीकार कर ले और हक़ को क़ुबूल कर ले तो ख़ुदा हक़ के लिये अधिक योग्य है, और जो भी इस कार्य में मेरा साथ न हे और स्वीकार न करे तो मैं सब्र और धैर्य का दामन नहीं छोड़ूंगा, यहां तक कि अल्लाह मेरे और इस गुट के बीच सच्चा फैसला करे, और वही है जो फ़ैसला करने वालों के बीच बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।
وَ هَذِهِ وَصِيَّتِي إلَيْكَ يَا أَخِي ؛ وَمَا تَوْفِيقِي إلاَّ بِاللَهِ، عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإلَيْهِ أُنِيبُ. وَالسَّلاَمُ عَلَيْكَ وَعَلَي مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَي . وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّه إلاَّ بِاللَهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ. 1
और यह मेरी वसीयत है तुम को मेरे भाई! और कोई तौफ़ीक़ नहीं है मेरे लिये मगर अल्लाह की तरफ़ से, मैंने उसपर भरोसा किया और उसी की तरफ़ वापस पलटूँगा, सलाम हो तुम पर और हर उस पर जो हिदायत की पैरवी करे, और कोई शक्ति और ताक़त नहीं है सिवाय महान और अज़ीम ख़ुदा के।
बहन सैय्यदा ज़ैनब की दुआएँ लेकर जब इमाम घोड़े पर सवार हुए, लगाम कसी तो घोड़ा आगे नहीं बढ़ा, फिर कसकर लगाम खींची तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. जोश में फिर से लगाम खींची, तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. नीचे देखा तो आपकी बेटी सैय्यदा सकीना घोड़े के पांव लपेटे खड़ी हैं.
रोते हुए घोड़े से कह रहीं हैं- घोड़े मेरे बाबा को मत ले जाना. वो रोज़ मुझे सीने से लपेटकर सुलाते हैं, जो गया है वो वापस नहीं आया. बाबा वापस नहीं आए, तो मैं किसके सीने से लिपटकर सोऊंगी?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सैय्यदा को गोद में उठाकर फ़रमाया- बेटा जितने दिन सीने से लिपटकर सोने थे, वो बीत चुके. अब मैं तुम्हें फूफी के सुपुर्द कर रहा हूं. इमाम ने सकीना को सैय्यदा ज़ैनब के सुपुर्द किया और घोड़े पर सवार होकर यज़ीदियों की तरफ़ गए. सैय्यदा सकीना दहाड़ मारकर रोने लगीं.
इमाम ने आसमान की जानिब देखकर मालिक से पूछा- ऐ मालिक तू तो राज़ी है न ?
ग़ैब से निदा आई- ऐ रूह-ए-हुसैन ! तू कामयाब हो गया, तुझपे इंसानियत को फ़ख़्र है, विलायत को फ़ख़्र है, अली को फ़ख़्र है, फ़ातिमा को फ़ख़्र है, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़ख़्र है तू बता तू राज़ी है न..
-ज़ैद पठान
जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला पहुंचे, तब मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु उनके साथ थे. आपकी उम्र 80 साल से ज़्यादा थी. सफ़ेद दाढ़ी होने के बावजूद जंग के मैदान में सबसे आगे थे. आशूरा के दिन मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु ने यज़ीदी फ़ौज के ख़िलाफ़ बहुत बहादुरी से जंग लड़ी. रिवायतों के मुताबिक़ आपने कर्बला में पहली क़तार में होकर दुश्मनों का मुक़ाबला किया. दुश्मन की फ़ौज उनके दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकी. जब आप ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिरे, तो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हबीब इब्न मज़ाहिर रज़ियल्लाहु अन्हु आपके पास पहुंचे. हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया- ऐ मुस्लिम अल्लाह तुम पर रहम करे और इसी हालत में आपने शहादत पाई.














