बारिश की उदासी...
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रात से बारिश हो रही है. लड़की को बारिश का मौसम हमेशा से अच्छा लगता है, लेकिन
आज न जाने क्यों वह उदास है. कुछ बरस पहले जब जाड़ों के आख़िर में बारिश हुई थी,...
सरफ़राज़ ख़ान
टोटकों का चलन
पुराना और अंधविश्वास से जुडा है. मगर हैरत की बात तो यह भी है कि अनेक विश्व
विख्यात लेखक भी इन पर यक़ीन करते थे और लेखन के समय इनका नियमित रूप से पालन करते थे,
जो बाद में उनकी आदत में शुमार भी हो
गया. महान फ्रांसीसी लेखक एलेक्जेंडर डयूमा का विचार था कि सभी प्रकार की रचनाएं
एक ही रंग के काग़ज़ पर नहीं लिखनी चाहिए. उनके मुताबिक़ उपन्यास आसमानी रंग के
काग़ज़ पर और अन्य रचनाएं गुलाबी रंग के काग़ज़ पर लिखनी चाहिए.
मगर प्रख्यात हिन्दी लेखक रांगेय राघव को फुलस्केप आकार का काग़ज़ भी बेहद छोटा लगता था. ब्राह्म ग्रीन बलकभ साफ़ लकीरदार वाले काग़ज़ पर लिखते थे. अगर उस पर ज़रा-सा भी कोई धब्बा लग जाता था, तो वे उसे फ़ौरन फाड़ देते थे और फिर नए साफ़ काग़ज़ पर लिखना शुरू करते थे. उनका यह भी मानना था कि जब वे ख़ुद को उदास महसूस करते थे और डेस्क पर बैठते, तो शब्द झरने की तरह फूट पड़ते थे. उदासी भरा दिन उनके लेखन के लिए बेहद कारगर साबित होता था.
इसी तरह चार्ल्स आउडिलायर (1821-1867) नामक फ्रेंच कवि को हरा रंग लिखने की प्रेरणा देता था. इसलिए उन्होंने अपने बाल ही हरे रंग में रंग डाले थे. प्रख्यात समीक्षक डॉ. सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज़ पर बिठाकर ही लिख पाते थे. गार्डन सेल्फ़िज़ शनिवार को दोपहर में और शेष दिनों में रात के समय लिखते थे. शनिवार को दोपहर में वह ख़ुद को विशेष उत्साहित महसूस करते थे.
विख्यात अंग्रेज़ी उपन्यासकार और समीक्षक मैक्स पैंबर सिर्फ़ सुबह दस बजे तक ही लिखते थे. इसलिए एक उपन्यास को पूरा करने में उन्हें बहुत ज़्यादा समय लगता था. इटली के लेखक जियो ऑक्चिनी रौसिनी (1791-1868) लिखने का मूड बनाने के लिए हमेशा नक़ली बालों की तीन विग पहना करते थे. प्रसिद्ध जर्मन कवि फेडरिक वान शिल्लर (1759-1805) की आदत भी कम अजीब नहीं थी. वे अपने पैरों को बर्फ़ के पानी में डुबोकर ही कविताएं लिख सकते थे. अगर वे ऐसा नहीं करते थे, तो उन्हें कविता का एक भी शब्द नहीं सूझता था.
फ्रांसीसी भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा रमणी रसिक चिरकुमार मोंपासा मूड फ्रैश होने पर ही लिखते थे. अपने को तरोताज़ा करने के लिए वे नाव चलाते, मछलियां पकड़ते या फिर मित्रों के साथ हंसी-ठिठौली करते थे. राइज एंड फास्स ऑफ रोमन एंपायर के लेखक नाटककार गिब्सन को लिखने के लिए पहले एकाएक संजीदा होना पड़ता था. महान फ्रांसीसी लेखक बाल्लाजाक की आदत भी विचित्र थी. वह दिन में फैशन के कपड़े पहनते और रात को लिखते समय पादरियों जैसा लिबास पहनते थे.
सुप्रसिद्ध लेखक बर्टेड रसेल का अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में कहना था कि उनका लेखन मौसम पर ही आधारित होता है खु़शगवार मौसम में वे रात-दिन लिखते थे और गर्मी वाले उमस भरे दिन में वे लिखने से कतराते थे. एईडब्ल्यू मेसन भी मूडी स्वभाव के थे. जब उनका मन करता, तभी लिखने बैठते. वे रात या दिन मूड होने पर कभी भी लिख सकते थे.
गोल्जस्मिथ को लिखने से पहले सैर करने का भी शौक़ था. अपने उपन्यास, कविताएं और नाटक रचने के दौरान उन्होंने दूर-दराज़ के इलाक़ों की यात्राएं कीं. गिलबर्टफ़्रेंको सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक लिखा करते थे. दोपहर के भोजन के बाद एक घंटे लिखते थे और फिर वह शाम को भी दो घंटे तक लिखते थे. रात को लिखना उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं था. सर ऑर्थर पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था. दिन में अगर वे लिखने बैठते, तो उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था. इसी तरह की आदत लुई पार्कर को भी थी. वे दिनभर सोते और रात को जागकर लिखते थे. अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन को औंधे मुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी.
अर्नेस्ट हेमिंगवे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूमो और पंजाबी के उपन्यासकार नानक सिंह को खड़े होकर लिखने की आदत थी. विस्मयली लैक्स सुबह चार बजे से दिन के 11 बजे तक और शाम को साढ़े सात बजे तक तथा रात को फिर 11 बजे तक लिखते थे. उनका बाक़ी का समय सोने और चाय पीने में बीतता था. प्रख्यात रूसी लेखक फीडिन ने जब उपन्यास असाधारण ग्रीष्म ऋतु लिखा, तब वह समुद्र किनारे रह रहे थे. उनका मानना था कि समुद्र की लहरों की गूंज की आवाज़ उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती थी.
हैरसवासिल सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को पांच बजे से सात बजे तक लिखते थे. डेलिस ब्रेडकी केवल तीन घंटे ही लिखते थे और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक. सर ऑर्थर कान डायल केवल सुकून महसूस करने पर ही लिखते थे. अगर किसी बात से उनका मन जरा भी विचलित होता, तो वे एक पंक्ति भी नहीं लिख पाते थे. जर्मनी के कार्लबेन को लिखने की प्रेरणा संगीत से मिलती थी. उन्होंने अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड कर रखे थे. पहले वे टेप चलाते और फिर लिखने बैठते.
मगर प्रख्यात हिन्दी लेखक रांगेय राघव को फुलस्केप आकार का काग़ज़ भी बेहद छोटा लगता था. ब्राह्म ग्रीन बलकभ साफ़ लकीरदार वाले काग़ज़ पर लिखते थे. अगर उस पर ज़रा-सा भी कोई धब्बा लग जाता था, तो वे उसे फ़ौरन फाड़ देते थे और फिर नए साफ़ काग़ज़ पर लिखना शुरू करते थे. उनका यह भी मानना था कि जब वे ख़ुद को उदास महसूस करते थे और डेस्क पर बैठते, तो शब्द झरने की तरह फूट पड़ते थे. उदासी भरा दिन उनके लेखन के लिए बेहद कारगर साबित होता था.
इसी तरह चार्ल्स आउडिलायर (1821-1867) नामक फ्रेंच कवि को हरा रंग लिखने की प्रेरणा देता था. इसलिए उन्होंने अपने बाल ही हरे रंग में रंग डाले थे. प्रख्यात समीक्षक डॉ. सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज़ पर बिठाकर ही लिख पाते थे. गार्डन सेल्फ़िज़ शनिवार को दोपहर में और शेष दिनों में रात के समय लिखते थे. शनिवार को दोपहर में वह ख़ुद को विशेष उत्साहित महसूस करते थे.
विख्यात अंग्रेज़ी उपन्यासकार और समीक्षक मैक्स पैंबर सिर्फ़ सुबह दस बजे तक ही लिखते थे. इसलिए एक उपन्यास को पूरा करने में उन्हें बहुत ज़्यादा समय लगता था. इटली के लेखक जियो ऑक्चिनी रौसिनी (1791-1868) लिखने का मूड बनाने के लिए हमेशा नक़ली बालों की तीन विग पहना करते थे. प्रसिद्ध जर्मन कवि फेडरिक वान शिल्लर (1759-1805) की आदत भी कम अजीब नहीं थी. वे अपने पैरों को बर्फ़ के पानी में डुबोकर ही कविताएं लिख सकते थे. अगर वे ऐसा नहीं करते थे, तो उन्हें कविता का एक भी शब्द नहीं सूझता था.
फ्रांसीसी भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा रमणी रसिक चिरकुमार मोंपासा मूड फ्रैश होने पर ही लिखते थे. अपने को तरोताज़ा करने के लिए वे नाव चलाते, मछलियां पकड़ते या फिर मित्रों के साथ हंसी-ठिठौली करते थे. राइज एंड फास्स ऑफ रोमन एंपायर के लेखक नाटककार गिब्सन को लिखने के लिए पहले एकाएक संजीदा होना पड़ता था. महान फ्रांसीसी लेखक बाल्लाजाक की आदत भी विचित्र थी. वह दिन में फैशन के कपड़े पहनते और रात को लिखते समय पादरियों जैसा लिबास पहनते थे.
सुप्रसिद्ध लेखक बर्टेड रसेल का अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में कहना था कि उनका लेखन मौसम पर ही आधारित होता है खु़शगवार मौसम में वे रात-दिन लिखते थे और गर्मी वाले उमस भरे दिन में वे लिखने से कतराते थे. एईडब्ल्यू मेसन भी मूडी स्वभाव के थे. जब उनका मन करता, तभी लिखने बैठते. वे रात या दिन मूड होने पर कभी भी लिख सकते थे.
गोल्जस्मिथ को लिखने से पहले सैर करने का भी शौक़ था. अपने उपन्यास, कविताएं और नाटक रचने के दौरान उन्होंने दूर-दराज़ के इलाक़ों की यात्राएं कीं. गिलबर्टफ़्रेंको सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक लिखा करते थे. दोपहर के भोजन के बाद एक घंटे लिखते थे और फिर वह शाम को भी दो घंटे तक लिखते थे. रात को लिखना उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं था. सर ऑर्थर पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था. दिन में अगर वे लिखने बैठते, तो उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था. इसी तरह की आदत लुई पार्कर को भी थी. वे दिनभर सोते और रात को जागकर लिखते थे. अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन को औंधे मुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी.
अर्नेस्ट हेमिंगवे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूमो और पंजाबी के उपन्यासकार नानक सिंह को खड़े होकर लिखने की आदत थी. विस्मयली लैक्स सुबह चार बजे से दिन के 11 बजे तक और शाम को साढ़े सात बजे तक तथा रात को फिर 11 बजे तक लिखते थे. उनका बाक़ी का समय सोने और चाय पीने में बीतता था. प्रख्यात रूसी लेखक फीडिन ने जब उपन्यास असाधारण ग्रीष्म ऋतु लिखा, तब वह समुद्र किनारे रह रहे थे. उनका मानना था कि समुद्र की लहरों की गूंज की आवाज़ उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती थी.
हैरसवासिल सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को पांच बजे से सात बजे तक लिखते थे. डेलिस ब्रेडकी केवल तीन घंटे ही लिखते थे और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक. सर ऑर्थर कान डायल केवल सुकून महसूस करने पर ही लिखते थे. अगर किसी बात से उनका मन जरा भी विचलित होता, तो वे एक पंक्ति भी नहीं लिख पाते थे. जर्मनी के कार्लबेन को लिखने की प्रेरणा संगीत से मिलती थी. उन्होंने अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड कर रखे थे. पहले वे टेप चलाते और फिर लिखने बैठते.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है. ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
वे लोग बहुत ख़ुशनसीब हुआ करते हैं, जो किसी के काम आते हैं, क्योंकि अल्लाह ही ख़िदमते-ख़ल्क यानी अपनी मख़लूक की मदद के लिए कुछ लोगों को चुनता है. यही वे लोग हैं, जो अल्लाह की तरफ़ से रहमत का ज़रिया बनकर मुसीबतज़दा और परेशान हाल लोगों तक पहुंचते हैं और उनकी मदद करते हैं. ये मदद कई तरह की हुआ करती है. कोई जान से मदद करता है, तो कोई मालो-दौलत से मदद करता है. कोई किसी ज़रूरतमंद को उस जगह तक पहुंचा देता है, जहां से उसकी मदद हो जाती है.
इस्लाम में ख़िदमते-ख़ल्क को इबादत का दर्जा दिया गया है. इसीलिए अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने की ताक़ीद की. एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर तुम किसी की मदद करने के क़ाबिल न हो, तो किसी और से उसकी सिफ़ारिश कर दो. एक अन्य हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अपने किसी भाई को जिसके जिस्म पर ज़रूरत के मुताबिक़ कपड़े न हों, उसे कपड़े पहनाएगा या देगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनाएगा. और जो किसी भूखे को खाना खिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत के मेवे खिलाएगा. जो किसी प्यासे को पानी पिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का शर्बत पिलाएगा.
ये मदद ऐसी होनी चाहिए कि ज़रूरतमंद लोगों को शर्मिन्दगी का अहसास न हो. इसीलिए तो कहते हैं कि मदद इस तरह करनी चाहिए कि एक हाथ से कुछ दो, तो दूसरे हाथ को ख़बर भी न हो. मिसाल के तौर पर किसी लड़की की शादी है या किसी को इलाज की ज़रूरत है या किसी के घर कोई कमाने वाला नहीं है और उन्हें दो वक़्त का खाना भी नहीं मिल पा रहा है, तो ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाई जानी चाहिए, बिना किसी शोर-शराबे के, बिना तस्वीरें वायरल किए. यही तो असल मदद है.
आज के दौर में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो दूसरों की मदद करना अपना फ़र्ज़ मानते हैं और इस नेकी के काम में आगे रहते हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह ने फ़रमाया है कि नेकी सिर्फ़ यही नहीं है कि तुम अपना रुख़ मशरिक़ और मग़रिब की तरफ़ फेर लो, बल्कि असल नेकी तो ये है कि कोई शख़्स अल्लाह और क़यामत के दिन और फ़रिश्तों और अल्लाह की किताब और नबियों पर ईमान लाए और अल्लाह की मुहब्बत में अपना माल क़राबतदारों यानी रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों और साइलों यानी मांगने वालों पर और ग़ुलामों को आज़ाद कराने में ख़र्च करे और पाबंदी से नमाज़ पढ़े और ज़कात देता रहे और जब कोई वादा करे, तो उसे पूरा करे और तंगी और मुसीबत और जंग की सख़्ती के वक़्त सब्र करने वाला हो. यही लोग सच्चे हैं और यही लोग परहेज़गार हैं.
(क़ुरआन 2:117)
दिल्ली के आज़ाद मार्केट इलाक़े में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो ख़ामोशी से इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं. एक ख़ुदाई ख़िदमतगार बरसों से हर रोज़ बिला नाग़ा एक देग़ बनाते हैं और तक़सीम करते हैं. जो भी उनसे खाने का सवाल करता है, वे उससे सिर्फ़ इतना पूछते हैं कि कितने लोगों के लिए चाहिए? इलाक़े में बहुत से ऐसे घर हैं, जिनमें अकेली बुज़ुर्ग औरतें हैं, कई घरों में छोटे बच्चे हैं और उनके घर कमाने वाला कोई नहीं है. ऐसे ज़रूरतमंद लोगों तक वे खाना पहुंचा रहे हैं. वे अपना नाम ज़ाहिर तक नहीं करना चाहते.
इलाक़े की बाशिन्दा राबिया भी इस तरह के नेक कामों में पीछे नहीं रहतीं. वे अपनी कई परिचित महिलाओं के साथ मिलकर ज़रूरतमंद लोगों तक कपड़े और सामान पहुंचाती हैं. शादी-ब्याह में दुल्हन को बरी में भारी-भरकम जोड़े चढ़ाए जाते हैं, जो बस एक-दो बार ही पहने जाते हैं. ऐसे में ये जोड़े किसी सन्दूक़ में बंद करके रख दिए जाते हैं. इसी तरह महिलाएं भी हर शादी-ब्याह या किसी और समारोह के लिए भारी-भरकम जोड़े तो बना लेती हैं, लेकिन उसे दो-चार बार से ज़्यादा नहीं पहनतीं. बस इसी तरह के कपड़ों को इकट्ठा किया जाता है और फिर उन्हें ऐसे घरों में भेज दिया जाता है, जहां उनकी ज़रूरत है. कपड़ों के अलावा कम्बल, बर्तन और खाद्य सामग्री भी ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाई जाती है. बहुत से लोग ऐसे हैं, जो सरकारी डिपो से मिला राशन इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं है. ऐसे में उनसे राशन लेकर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचा दिया जाता है. इसमें गेहूं और चावल भी शामिल हैं.
दरअसल, हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं. हर मौसम में उस मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं. सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कम्बल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या. बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया. हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती, लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए. इस मौसम में कुछ नया ही पहनना है. पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वह पुराना लगने लगा. वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं. ये घर-घर की कहानी है. जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वे पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है. कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए, किसके पास इतना वक़्त है. अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो. बस इसी सोच के साथ ये ख़ुदाई ख़िदमतगार काम कर रहे हैं. बहुत लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें ये ख़ुदाई ख़िदमतगार ज़ाती तौर पर नहीं जानते और न ही कभी उनसे मिले हैं. कोई बता देता है कि उनके इलाक़े में ऐसे लोग हैं, जिन्हें मदद की ज़रूरत है, तो वे उन लोगों तक सामान पहुंचा देते हैं. इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि वे वाक़ई बहुत ज़रूरतमंद हों.
सबसे ख़ास बात ये है कि किसी को कपड़े या दूसरी चीज़ें देते वक़्त इस बात का पूरा ख़्याल रखा जाता है कि कपड़े ज़्यादा पुराने, फटे हुए या फिर रंग से बेरंग हुए न हों. चीज़ें भी ऐसी होनी चाहिए, जिनका ख़ुशी-ख़ुशी इस्तेमाल किया जा सके. चीज़ें वहीं अच्छी लगती हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है.
इलाक़े के डॉ. शफ़ीक़ अहमद इस्लाही भी ख़िदमते-ख़ल्क करते हैं. वे क़ुरान हाफ़िज़ हैं. वे एक मुअज़ज़िन भी हैं. वे मस्जिद में अज़ान देते हैं और जुमे को ख़ुत्बा भी पढ़ते हैं. वे ज़रूरतमंदों की हर मुमकिन मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. वे साल 1972 से ख़िदमते-ख़ल्क कर रहे हैं. उनके पास कोई ऐसा मरीज़ आता है, जिसके पास दवा के लिए पैसे न हों, तो वे उससे दवा की क़ीमत नहीं लेते. किसी मरीज़ को किसी बड़े अस्पताल में दिखाना हो, तो वे उसकी भी मदद करते हैं. वे उसके इलाज के लिए पैसों भी दे देते हैं. वे रमज़ान में खाद्य सामग्री तक़सीम करते हैं, तो सर्दियों में कम्बल बांटते हैं. बच्चों के टीकाकरण और पोलियो की दवाई पिलाने के मामले में भी वे आगे रहते हैं. स्वास्थ्यकर्मियों की टीम उनके क्लीनिक पर आ जाती है और मस्जिद के लाउडस्पीकर के ज़रिये ऐलान कर दिया जाता है कि उनके क्लीनिक में बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं या दवा पिलाई जा रही है. आधी रात को भी किसी को उनकी ज़रूरत होती है, तो वे इलाज के लिए पहुंच जाते हैं. हालांकि वे बहुत ही ज़ईफ़ हैं, लेकिन अपना फ़र्ज़ निभाने में पीछे नहीं रहते. इलाक़े के हिन्दू लोग उन्हें भगवान की तरह मानते हैं. पप्पू का कहना है कि उनकी एक पुकार पर डॉक्टर साहब आ जाते हैं. वे बिना किसी भेदभाव के सबकी मदद करते हैं. कोरोना काल के दौरान उन्होंने उनमें से कई लोगों की दुकानों का किराया तक अपने पास से दिया है.
इलाक़े की बाशिन्दा क़सीम फ़ातिमा भी इस नेक काम में डॉक्टर साहब का हाथ बटाती हैं. वे ज़रूरतमंद लोगों को उन ख़ुदाई ख़िदमतगारों तक पहुंचाती हैं, जो मदद मुहैया कराते हैं. उनके पास दूर-दूर से ज़रूरतमंद महिलाएं आती हैं. कई साहिबे-हैसियत लोग उनके ज़रिये लोगों तक मदद पहुंचाते हैं. वे बताती हैं कि मदद लेने वाले लोगों की तस्वीरें नहीं खींची जातीं, क्योंकि इससे उनकी ख़ुद्दारी को ठेस पहुंचती है. कोई भी व्यक्ति बहुत ही बेबसी और मजबूरी की हालत में ही किसी से मदद क़ुबूल करता है. हां, इतना ज़रूर है कि खाद्य सामग्री और कम्बल वग़ैरह तक़सीम करते वक़्त लोगों से उनके किसी पहचान-पत्र की छायाप्रति ले ली जाती है. इससे पारदर्शिता भी बनी रहती है और यह भी सुनिश्चित रहता है कि एक वक़्त में एक व्यक्ति को एक बार ही मदद दी जाए. खाद्य सामग्री में आटा, चावल, दाल, चना, बेसन, तेल, वनस्पति घी, चीनी, नमक और मसाले आदि दिए जाते हैं.
कोरोना काल में लगी तालाबंदी के वक़्त में भी यहां के ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने ज़रूरतमंद लोगों को खाद्य सामग्री और ऑक्सीज़न सिलेंडर मुहैया करवाए हैं. ईद के मौक़े पर यह सुनिश्चत किया गया कि ज़कात और फ़ितरे की रक़म अपने आसपास के ऐसे लोगों तक पहुंचाई, जो बेसहारा हैं, मजबूर हैं और बेबस हैं, जिनके यहां कोई कमाने वाला नहीं है या जो मेहनत-मशक़्क़त करके भी मुश्किल से गुज़ारा कर पा रहे हैं. तालाबंदी की वजह से कितने ही घरों में फ़ाक़ों तक की नौबत आ गई थी. वैसे भी हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा पड़ौसी अच्छा है या बुरा है. मैदाने हश्र में इसका जवाब वह ख़ुद देगा, लेकिन अगर वह भूख से मर गया, तो इसका जवाब हमें ही देना होगा.
दानिश ख़ान का कहना है कि मदद करने के लिए बहुत से पैसों की नहीं, बल्कि नीयत की ज़रूरत होती है. अगर इंसान किसी की मदद करना चाहे, तो वह अपनी थाली में से आधा खाना किसी भूखे को खिला सकता है. उनका कहना है कि हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम ज़कात और फ़ितरे की रक़म से अपने आसपास के ज़रूरतमंद लोगों की इतनी मदद कर दें कि वे दो वक़्त भरपेट खाना खा सकें, बीमार अपना इलाज करा सकें और ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद सकें. अल्लाह भी उन्हीं लोगों को पसंद करता है, जो उसके बंदों से मुहब्बत करते हैं और उनकी मदद करते हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार आवाज़
फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं कि दुआएं तक़दीर बदल दिया करती हैं. अगर किसी दुरवेश की दुआ से ज़मीन के एक टुकड़े की हालत ही बदल जाए, तो वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं. वे इस बात के क़ायल हो जाते हैं कि क़ुदरत के करिश्मे को न कोई समझ पाया है और न कभी समझ सकता है. आज हम एक ऐसे ही करिश्मे की बात कर रहे हैं, जो नूह जिले के एक गांव में हुआ था और आज भी बरक़रार है.
देश की राजधानी दिल्ली के समीपवर्ती राज्य हरियाणा के नूह ज़िले का मढ़ी एक ऐसा गांव हैं, जहां फ़सल अन्य इलाक़ों के मुक़ाबले बहुत पहले पहले पक जाती है. जब आसपास और दूर-दराज़ के गांवों के खेतों में फ़सलें लहलहा रही होती हैं, तब इस गांव के किसान अपनी फ़सल काटकर घर ले जा चुके होते हैं. इस गांव के बाशिन्दे जैकम ख़ान का कहना है कि उन्होंने बुज़ुर्गों से सुना है कि किसी ज़माने में यहां भी आसपास के इलाक़ों की तरह ही अपने वक़्त पर फ़सल पका करती थी. एक बार की बात है कि यहां एक दरवेश आए और वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए. वे वहां घंटों तक इबादत करते रहे. गांव के लोगों ने उन्हें देखा, तो वे उनके पास गए और उन्हें पीने के लिए पानी और खाने के लिए भोजन दिया. वह दरवेश कहीं दूर से आए थे और भूखे और प्यासे भी थे. गांववालों की मेहमान नवाज़ी से वह बहुत ख़ुश हुए. उन्होंने गांववालों को दुआ देते हुए कहा कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. कुछ वक़्त बाद वे दुरवेश गांव से चले गए. उनके जाने के कुछ माह बाद किसानों ने देखा कि उनकी फ़सल आसपास के गांवों की फ़सल से पहले पककर तैयार हो गई. इस बात की चर्चा दूर-दूर तलक होने लगी. पहले तो सबने इसे कोई इत्तेफ़ाक़ समझा, लेकिन जब लगातार फ़सल अन्य गांवों की फ़सल से पहले पकने लगी, तो लोग सोचने पर मजबूर हो गए. उन्हें दरवेश की दुआ याद आई कि उन्होंने कहा था कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. वे मान गए कि यह दरवेश की दुआ का ही असर है, जो उन्हें औरों से पहले रिज़्क़ यानी फ़सल मिल पाती है.
इस गांव की एक ख़ास बात यह भी है कि मढ़ी महामारी से महफ़ूज़ रहता है. जब कभी कोई महामारी फैलती है, तो भले ही आसपास के गांव उसकी चपेट में आ जाएं, लेकिन मढ़ी सुरक्षित रहता है. यहां के लोग कम बीमार पड़ते हैं. इसे भी गांववाले दुरवेश की दुआओं का ही असर मानते हैं. सूबे ख़ान कहते हैं कि मढ़ी ही नहीं, पूरे मेवात इलाक़े के लोग सादगी पसंद हैं. वे फ़क़ीरों और साधु-संतों का मान-सम्मान करने वाले हैं. यहां कोई फ़कीर, साधु-संत या कोई मुसाफ़िर आ जाए, तो गांववाले उसे भोजन करवाते हैं, उसे पानी पिलाते हैं, उसका आदर-सत्कार करते हैं. गांववाले कहते हैं कि मेहमान नवाज़ी करना तो हमारा फ़र्ज़ है. अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई मौक़ों पर मेहमान का स्वागत करने, उसकी ख़िदमत करने और उसका ख़्याल रखने का हुक्म दिया है. गांववाले अपनी इस परम्परा को क़ायम रखे हुए हैं और वे अपने बच्चों को भी इसकी तालीम देते हैं.
कुछ लोग कहते हैं कि फ़सल को पर्याप्त सिंचाई जल न मिल पाने की वजह से मढ़ी में फ़सल जल्द पककर तैयार हो जाती है. लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि मढ़ी के आसपास के दर्जनों गांवों की यही हालत है. वहां भी फ़सलों की पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पाती और उन्हें भी बहुत कम पानी मिल पाता है. फिर एक जैसी हालत में वहां की फ़सलें जल्द पककर तैयार क्यों नहीं होती? इस सवाल का उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं होता, सिवाय इसके कि यह बात उनकी समझ से परे है.
गांववाले बताते हैं कि दूर-दूर से कृषि वैज्ञानिक उनके गांव में आए और उन्होंने हालात का जायज़ा लिया, लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे वापस लौट गए.
जल संकट
गांव बाई के सरपंच आबिद बताते हैं कि इलाक़े के मढ़ी सहित तक़रीबन 66 गांवों में अब तक सिंचाई का नहरी पानी नहीं पहुंच पाया है. इसलिए इस इलाक़े के किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर हैं. इस वजह से यहां साल में एक ही फ़सल हो पाती है. इस इलाक़े में भूजल-स्तर बहुत गहरा है. यहां का पानी बहुत खारा होने की वजह से पीने के लायक़ भी नहीं है. ऐसे में फ़सल कहां से हो. यहां के किसान अनाज में गेहूं और जौ की फ़सल उगाते हैं. दलहन में मसूर और तिलहन में सरसों की खेती की जाती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि 1507 वर्ग किलोमीटर में फैले मेवात यानी नूह इलाक़े का भू-जल स्तर बहुत नीचे है. इतना ही नहीं, यहां के ज़्यादातर इलाक़े का पानी बहुत खारा और फ़्लोराइडयुक्त है, जिससे यह पीने लायक़ बिल्कुल भी नहीं है. सिर्फ़ अरावली पहाड़ों की तलहटी में बसे गांवों का पानी ही पीने के लायक़ है. एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ मेवात में जल संकट की हालत बहुत गंभीर हैं. यहां के 443 गांवों में से महज़ 57 गांव ही ऐसे हैं, जहां का भू-जल पीने लायक़ है. इलाक़े के 104 गांवों का पानी बहुत ज़्यादा खारा है. यहां के 31 गांवों के पानी में फ़्लोराइड की मात्रा बहुत ज़्यादा है, जो सेहत के लिए बहुत नुक़सानदेह है. इलाक़े के 52 गांवों का पानी खारा भी है और उसमें फ़्लोराइड भी बहुत ही ज़्यादा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ पानी में फ़्लोराइड की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से यह धीमे ज़हर का काम करता है. इस पानी के सेवन से गुर्दों में पथरी हो जाती है. इससे हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं. शरीर में दर्द रहने लगता है और ज़रा सी चोट से हड्डी टूट भी सकती है. इसके अलावा फ़्लोराइडयुक्त पानी के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियां भी हो जाती हैं.
हालांकि मेवात के तक़रीबन अढ़ाई सौ गांवों में रेनीवेल परियोजना के तहत पेयजल की आपूर्ति की जा रही है. यह पानी यमुना के किनारे बड़े बोरवेल के बूस्टिंग स्टेशनों के ज़रिये गांवों में पहुंचाया जा रहा है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने इस योजना की आधारशिला रखी थी. इसका मक़सद यमुना किनारे रेनीवेल बनाकर मेवात में पानी पहुंचाना था. यह परियोजना 2019 की आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी. इसके तहत प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर स्वच्छ पेयजल देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन बढ़ती आबादी की लगातार बढ़ती पानी की मांग की वजह से यहां जल संकट बना रहता है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार : आवाज़
तस्वीर गूगल
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है. इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए. इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.
गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.
सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है. बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारम्परिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं. उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 100 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अनेक राज्य इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा. स्थानीय जलवायु के अनुकूल इसकी नई क़िस्में तैयार की जा रही हैं.
आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारम्परिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती. सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
भारत गांवों का देश है। यहां तक़रीबन साढ़े छह लाख गांव हैं। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार मई 2025 तक देश में कुल छह लाख 44 हज़ार 131 गांव थे। केन्द्रीय बजट 2025-26 के मुताबिक़ तक़रीबन दो लाख 68 हज़ार ग्राम पंचायतें हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा तक़रीबन एक लाख गाँव हैं। वक़्त के साथ इनकी तादाद बदलती रहती है।
अकसर गांवों में जाना होता है। बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई देता है। पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं। खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं। दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं। परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है। हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है। रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है। दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी। दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाख़ों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले कई दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है। गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं। गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है। पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल इख़्तियार कर रहे हैं। गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं। शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं। ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं। पहले ग्रामीण अंचलों में लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे। प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परम्परा वाले प्रदेशों में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं। लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं। शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले गांवों के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है। पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है।
हरियाणा जैसे राज्य विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति के प्रदेश माने जाते हैं। यहां के गांव प्राचीन काल से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केन्द्र रहे हैं। गीता का जन्म स्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं। लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआख़ोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है। नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं। लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है। इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फ़ार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं। अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फ़ार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है।
शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है। तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली रौनक़ नहीं रही है। शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं। शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं। अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं। समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है। समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं। होना तो यही चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें। मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा। आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।
विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए। ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है। लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे। काश, वह दिन जल्द आ जाए। हम तो यही दुआ करते हैं, अमीन।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
फ़ारूख़ शेख़ फ़िल्मी दुनिया के आसमान का एक ऐसा रौशन सितारे थे, जिसकी चमक से समानांतर सिनेमा दमकता था. उनके चेहरे पर मासूमियत थी. उनके अंदाज़ में शोख़ी थी और उनका मिज़ाज शायराना था.
फ़ारूख़ शेख़ का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के सूरत ज़िले के गांव अमरोली में हुआ था. उनके पिता मुस्तफ़ा शेख़ मुम्बई के जाने माने वकील थे. उनके पिता ज़मींदार परिवार से ताल्लुक़ रखते थे. उनकी परवरिश बड़ी शानो-शौकत से हुई थी. उनके कहने से पहले ही ज़रूरत की हर चीज़ उन्हें मुहैया हो जाती थी. इसके बावजूद उनमें ज़रा सा भी ग़ुरूर नहीं था.
उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम मुम्बई के सेंट मैरी स्कूल से हासिल की. उसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाई की. फिर उन्होंने मुम्बई के ही सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ लॉ से वकालत की पढ़ाई मुकम्मल की.
उनके पिता चाहते थे कि वह भी उनकी तरह वकील बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी अभिनय में थी. वे कालेज के दिनों से ही रंगमंच से जुड़ गए थे. वे इतना शानदार अभिनय करते थे कि उनके चर्चे दूर-दूर तलक होने लगे. इसका नतीजा ये हुआ कि उन्हें साल 1973 में आई फ़िल्म 'गर्म हवा' में काम करने का मौक़ा मिल गया. इस फ़िल्म में उनके अभिनय को ख़ूब सराहा गया. और इस तरह उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत हुई और हिन्दी सिनेमा को शानदार अभिनेता मिल गया.
फ़ारूख़ शेख़ एक बेहतरीन कलाकार थे. उनके लिए अभिनय महज़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं था. वे एक वक़्त में दो से ज़्यादा फ़िल्मों में काम नहीं करते थे. साल 1978 में आई फ़िल्म 'नूरी' ने उन्हें कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचा दिया. ये फ़िल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके पास तक़रीबन 40 फ़िल्मों के प्रस्ताव आए. ख़ास बात ये थी कि सबकी सब फ़िल्मों की कहानी 'नूरी' फ़िल्म की कहानी के आसपास ही घूमती थी. उन्होंने सब प्रस्ताव ठुकरा दिए, क्योंकि वे सिर्फ़ पैसों के लिए एक जैसी फ़िल्मों में काम नहीं करना चाहते थे. वे नये और दमदार किरदार निभाना चाहते थे.
फ़ारूख़ शेख़ कलात्मक फ़िल्मों के अभिनेता थे. उनकी फ़िल्मों में जनमानस का दुख-दर्द, उनकी ख़ुशियां और उनके इंद्रधनुषी ख़्वाबों की झलक मिलती है. हालांकि उन्हें दरख़्तों के इर्दगिर्द घूमने वाले किरदार पसंद नहीं थे, लेकिन दर्शकों ने उन्हें अपनी महबूबा से शिद्दत से मुहब्बत करने वाले महबूब के किरदार में भी ख़ूब पसंद किया. नूरी फ़िल्म का नग़मा देखें-
आजा रे ओ दिलबर जानिया
आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा
दिल की प्यास बुझा जा रे...
नूरी फ़िल्म का ये नग़मा भी बहुत ही दिलकश है-
चोरी चोरी कोई आये
चुपके-चुपके, सबसे छुपके
ख़्वाब कई दे जाये
आंखें डाले आंखों में, जाने मुझसे क्या वो पूछे
मैं जो बोलूं क्या, हंस दूं मुझको कुछ ना सूझे
ऐसे तांके, दिल में झांके, सांस मेरी रुक जाए
उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'बाज़ार' की ग़ज़ल आज भी लोगों को बहुत पसंद आती है-
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की
फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की...
फ़िल्म 'उमराव जान' ने तो इतिहास रच दिया था. इसकी ग़ज़ल आज भी लोगों को गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है-
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चांद से बेहतर नज़र आती है हमें
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूं तिरी आवाज़ बुलाती है हमें
याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें
हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूं है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें...
फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी' का नग़मा देखें, जिसमें वह अभिनेत्री रेखा के साथ बहुत ही शोख़ अंदाज़ में नज़र आ रहे हैं-
फूल गुलाब का, लाखों में हज़ारों में
एक चेहरा जनाब का...
उनके अंदाज़ में शोख़ी के साथ-साथ एक ऐसी संजीदगी भी थी, जो मुहब्बत में सिर्फ़ वादे करना ही नहीं जानती, बल्कि उसे शिद्दत से निभाने का जज़्बा भी रखती थी. उसके लिए महबूब ही सबकुछ है. कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में महबूब का अक्स नज़र आता है. फ़िल्म साथ-साथ का नग़मा ऐसा ही है-
तुमको देखा तो ये ख़्याल आया
ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया
आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया...
ये मुहब्बत ही तो है, जो नायिका अपने अमीर बाप का घर छोड़कर नायक के साथ एक छोटे से घर में रहने के लिए आ जाती है. फिर वे दोनों मिलकर अपना घर सजाते हैं-
ये तेरा घर, ये मेरा घर
किसी को देखना हो अगर
पहले आके मांग ले, तेरी नज़र मेरी नज़र...
न बादलों की छांव में, न चांदनी के गांव में
न फूल जैसे रास्ते बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईंट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर...
उनकी फ़िल्म 'चश्मे बद्दूर' का ये गीत रूह की गहराई में उतर जाता है-
कहां से आए बदरा हो
कहां से आए बदरा हो
घुलता जाए कजरा...
उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'गमन' की ग़ज़ल भी यादगार है-
आपकी याद आती रही रातभर
चश्मे- ग़म मुस्कुराती रही रातभर...
इसी फ़िल्म की ये ग़ज़ल भी ख़ूब पसंद की गई-
सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर का हर शख़्स परेशान सा क्यूं है...
सटारडम से कोसों दूर रहने वाले फ़ारूख़ शेख़ एक आम आदमी के अभिनेता थे. दर्शकों को लगता था कि उन्हीं के बीच से निकला कोई शख़्स पर्दे पर उन्हीं का कोई किरदार निभा रहा है. उनमें सादगी, विनम्रता और संजीदगी थी. ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे. उनके मासूम चेहरे से उनके बावक़ार वजूद का अक्स झलकता था.
उन्होंने रंगमंच और फ़िल्मों के अलावा टेलीविज़न के लिए भी काम किया. यहां भी उन्हें ख़ूब कामयाबी मिली. वे समाज सेवा से भी जुड़े रहे.
28 दिसम्बर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया.
आज भले ही वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अपने अभिनय के ज़रिये वे आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में ज़िन्दा हैं.
***
जन्म : 25 मार्च 1948
स्थान : गांव अमरोली, ज़िला सूरत (गुजरात)
निधन : 28 दिसम्बर 2013
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
इंसान सुकून की तलाश में न जाने कहां-कहां भटकता है, लेकिन सुकून उसे सिर्फ़ अल्लाह की पनाह में ही मिलता है. अल्लाह के ज़िक्र से मिलता है. जिस तरह बारिश की बूंदें प्यासी सूखी धरती को सराबोर कर देती हैं, उसी तरह ज़िक्रे इलाही से दिल को क़रार मिलता है, रूह को तस्कीन मिलती है.
ज़िक्रे इलाही की बेशुमार फ़ज़ीलतें हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है.
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- "याद रखो कि अल्लाह ही की याद से दिलों को इत्मीनान नसीब होता है." (क़ुरआन 13:28)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम हमारा ज़िक्र किया करो, तो हम भी तुम्हारा ज़िक्रे खै़र किया करेंगे. और हमारा शुक्र अदा करते रहा करो और नाशुक्री न किया करो.
(क़ुरआन 2:152)
अल्लाह की कायनात की तमाम मख़लूक़ात ज़िक्रे इलाही में ही मसरूफ़ रहती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और आसमानों और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही को सजदा करती है, कुछ ख़ुशी से कुछ नागवारी से. और उनके साये भी सुबह व शाम उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 13:15)
“सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके दरम्यान है, सब अल्लाह की तस्बीह करते हैं. और कोई शय ऐसी नहीं है, जो उसकी हम्दो सना की तस्बीह न करती हो.”
(क़ुरआन : 17:44)
“और जो आसमानों और जो ज़मीन में हैं, सब अल्लाह ही की मख़लूक़ है. और जो क़ुर्बे इलाही में रहते हैं, वे न उसकी इबादत का तकब्बुर करते हैं और न उसकी इताअत से थकते हैं.
वे रात और दिन अल्लाह ही की तस्बीह किया करते हैं और कभी काहिली नहीं करते.”
(क़ुरआन 21:19-20)
“क्या तुमने नहीं देखा कि आसमानों और ज़मीन की हर शय अल्लाह ही की तस्बीह करती है. और परिन्दे भी फ़ज़ाओं में पर फैलाए हुए उसी की तस्बीह करते हैं. हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा जानता है.”
(क़ुरआन 24:41)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है- “और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू किया करो.” (क़ुरआन 2:43)
“अपने परवरदिगार का कसरत से ज़िक्र करो और शाम और सुबह अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 3:41)
“और अपने परवरदिगार का अपने दिल में ज़िक्र किया करो, आजिज़ी से और ख़ौफ़ से और बुलंद आवाज़ के बग़ैर यानी धीमी आवाज़ से सुबह और शाम. और उसकी याद से ग़ाफ़िल न होना.
बेशक जो लोग यानी फ़रिशते तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में हैं, वे भी उसकी इबादत से तकब्बुर नहीं करते और उसकी तस्बीह करते रहते हैं और उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 7: 205-206)
“तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो और उसकी बारगाह में सजदा करने वालों में से हो जाओ.”
(क़ुरआन 15:98)
“तुम लोग सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन : 19:11)
“और सूरज के तुलूअ होने से पहले यानी फ़ज्र की नमाज़ में और सूरज के ग़ुरूब होने से पहले यानी अस्र की नमाज़ में अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात के इब्तियाई लम्हों में भी यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ों में भी तस्बीह किया करो और दिन के किनारों यानी ज़ुहर की नमाज़ में भी तस्बीह किया करो,
(क़ुरआन 20:130)
“इंसान और जिन्न ही नहीं दीगर बेजान चीज़ें भी अल्लाह की ही तस्बीह करती हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और हमने पहाड़ों और परिन्दों को दाऊद अलैहिस्सलाम के ताबे कर दिया था. वे उनके साथ अल्लाह की तस्बीह किया करते थे. और हम ही यह सब करने वाले थे.”
(क़ुरआन 21:79)
जिस जगह अल्लाह तआला का ज़िक्र किया जाता है, वह जगह नूर से मुनव्वर हो जाती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “अल्लाह का यह नूर उन घरों में है, जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है और सुबह व शाम अल्लाह के नाम की तस्बीह की जाती है.”
(क़ुरआन 24:36)
अल्लाह की तमाम मख़लूक़ का ये फ़र्ज़ है कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ माबूदे यकता की हम्दो सना के साथ तस्बीह करती रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “उसकी हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 25:58)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है.”
(क़ुरआन 29:45)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया रहो. और आसमानों और ज़मीन में अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. और तुम तस्बीह किया करो तीसरे पहर और दोपहर में भी.”
(क़ुरआन 30:17-18)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ ईमान वालो ! तुम कसरत से अल्लाह का ज़िक्र किया करो.
और सुबह व शाम उसकी तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 33:41-42)
“जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो उसके अतराफ़ हैं, वे सब अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों के लिए मग़फ़िरत की दुआएं मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ का अहाता किए हुये है. फिर जिन लोगों ने तौबा की और तेरे रास्ते की पैरवी की. और तू उन्हें जहन्नुम के अज़ाब से बचा ले.
(क़ुरआन 40:7)
“सुबह व शाम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 40:55)
“जो फ़रिश्ते तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं, वे रात दिन उसकी तस्बीह करते रहते हैं और वे कभी थकते भी नहीं हैं.”
(क़ुरआन 41:38)
“फ़रिश्ते अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और ज़मीन में रहने वाले लोगों के लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगते रहते हैं.”
(क़ुरआन 42:5)
“और सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 48:9)
“और तुम सूरज निकलने से पहले और सूरज छुपने से पहले अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात में भी कुछ वक़्त तस्बीह करो और सजदों यानी नमाज़ों के बाद भी उसकी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 50:39-40)
“जब तुम उठा करो, तो अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो.
और तुम रात में कुछ वक़्त और सितारों के ग़़ुरूब होने के बाद भी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 52:48-49)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:74)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:86)
“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 57:1)
“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:1)
“आसमानों और ज़मीन की हर शय उसी की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:24)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 61:1)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है, जो हक़ीक़ी बादशाह है, पाक है.”
(क़ुरआन 62:1)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 64:1)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह करते रहो.”
69:52
“और तुम सुबह और शाम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो. और रात में कुछ वक़्त उसकी बारगाह में सजदा करो और रात के बाक़ी तवील हिस्से में उसकी तस्बीह किया.”
(क़ुरआन 76: 25-26)
“ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! अपने परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो, जो सबसे आला है.”
(क़ुरआन 87:1)
“फिर तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करो.”
(क़ुरआन 110:3)
*
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अपनी ज़ुबान को हर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र से तर रखो.”
(सुनन तिर्मिज़ी : 3375)
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तअला के कुछ फ़रिश्ते ज़मीन में चक्कर लगाते रहते हैं, वे अल्लाह के ज़िक्र की मजलिसें तलाश करते हैं, जब वे ऐसी कपि मजलिस तलाश कर लेते हैं, जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो रहा होता है, तो वे उन लोगों के साथ बैठ जाते हैं.”
(सही मुस्लिम : 6839)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए जमा होते हैं फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं, रहमत उन्हें ढांप लेती है, सकीनत नाज़िल होती है और अल्लाह उनका ज़िक्र अपने पास मौजूद फ़रिश्तों में फ़रमाता है."
(सही मुस्लिम : 2700, जामा तिर्मिज़ी 3378)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बन्दा जब नमाज़ पढ़ रहा होता है, तो उसके सिर पर रहमतों की बारिश हो रही होती है.
(तिर्मिज़ी : 2911)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह फ़रमाता है कि अगर मेरा बन्दा एक हाथ मेरे क़रीब आता है, तो मैं दोनों हाथ की पूरी लम्बाई के बराबर उसके क़रीब आता हूं.”
(सही मुस्लिम : 6806)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जब तक कोई शख़्स अपनी नमाज़ की जगह पर बैठा रहता है, फ़रिश्ते उसके लिए अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करते रहते हैं- ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, ऐ अल्लाह! इस पर रहम कर.”
(सही बुख़ारी : 445)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर सूरज निकलने तक ज़िक्रे इलाही में मशग़ूल रहे, फिर वह दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसे पूरे हज और उमराह का अज्र मिलता है."
(सुनन तिर्मिज़ी : 586)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं ऐसे लोगों के साथ बैठा रहूं जो अस्र की नमाज़ से सूरज ग़ुरूब होने तक अल्लाह का ज़िक्र करें. ये उससे ज़्यादा पसंदीदा है कि वे चार ग़ुलाम आज़ाद करें."
(सुनन अबू दाऊद : 3667)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो मुसलमान मर्द नमाज़ और ज़िक्रे इलाही के लिए पाबंदी से मस्जिद में हाज़िर होता है, तो अल्लाह तआला उससे इस तरह ख़ुश होता है, जिस तरह मुसाफ़िर के घरवाले उसके घर आपने पर ख़ुश होते हैं.”
(सुनन इब्ने माजा : 800)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम इबादत और नेकी में देर न करो और ये न सोचो कि बाद में कर लेंगे, क्योंकि ज़िन्दगी में ऐसे हालात आ सकते हैं जो इंसान को अल्लाह की इताअत से रोक देते हैं.”
(मिश्कात-उल-मसाबीह : 5175)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अल्लाह अपने रब का ज़िक्र करे और जो अल्लाह का ज़िक्र न करे उनकी मिसाल ज़िन्दा और मुर्दे की तरह हैं.” कहने का मतलब ये है कि अल्लाह का ज़िक्र करने वाला ज़िन्दा है और ज़िक्र न करने वाला मुर्दे की तरह है. इस बात से अल्लाह के ज़िक्र की अहमियत का पता चलता है.
(सही बुख़ारी : 6407)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “क्या मैं तुम्हें तुम्हारे आमाल में से बेहतरीन और तुम्हारे मालिक के नज़दीक सबसे पाकीज़ा अमल न बताऊं? वह अल्लाह का ज़िक्र करना है, जो सोना और चाँदी ख़र्च करने से भी बेहतर है.”
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह के नज़दीक सबसे पसंदीदा वो लोग हैं, जो अल्लाह का ज़िक्र कसरत से करते हैं.”
(जामा अल ज़ायद: 16748)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो, जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसा हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी वक़्त जन्म दिया हो.”
(मुसनद अहमद : 2250)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत की कुंजी नमाज़ है और नमाज़ की कुंजी पाकी है.”
(सही मुस्लिम)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बेशक तुममें से कोई जब नमाज़ के लिए खड़ा होता है, तो शैतान उसे शुब्ह में डाल देता है. यहां तक कि वह नहीं जानता कि उसने कितनी रकआत पढ़ी हैं. तुममें से जब कोई कोई ये कैफ़ियत तो बैठे हुए दो सजदे कर ले.” (मुस्लिम : 1265)
हज़रत हातिम रहमतुल्लाह अलैह जब नमाज़ पढ़ते थे, तो ये तसव्वुर बांध लेते थे-
निगाहों के सामने काबा है.
नीचे पुल सिरात है.
दायें जन्नत है.
बायें जहन्नुम है.
पीछे मौत का फ़रिश्ता है.
और ये नमाज़ ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ है.
अल्लाह की रहमत से अपनी नमाज़ क़ुबूल होने की उम्मीद रखते थे.
और अपने बदआमालों से नमाज़ के मरदूद होने का ख़ौफ़ रखते थे.
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.
लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.
दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.
कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.
रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.
राजेश कुमार गुप्ता
हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...
हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...
डॉ. फ़िरदौस ख़ास
पर्यटन भी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा है. कुछ लोग क़ुदरत की ख़ूबसूरती निहारने के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में जाते हैं, तो कुछ लोगों को अक़ीदत इबादतगाहों और मज़ारों तक ले जाती है. पर्यटन रोज़गार का भी एक बड़ा साधन है. हमारे देश भारत में लाखों लोग पर्यटन से जुड़े हैं. यहां मज़हबी पर्यटन ख़ूब फल-फूल रहा है. हर साल विदेशों से लाखों लोग भारत भ्रमण के लिए आते हैं, जिनमें एक बड़ी तादाद धार्मिक स्थलों पर आने वाले ज़ायरीनों यानी पर्यटकों की होती है.
देश की राजधानी दिल्ली में जामा मस्जिद पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है. यह मस्जिद लाल पत्थरों और संगमरमर से बनी हुई है. मुग़ल बादशाह शाहजहां ने इसे बनवाया था. इसके ख़ूबसूरत गुम्बद, शानदार मीनारें और हवादार झरोखे इसे बहुत ही दिलकश बनाते हैं. मस्जिद में उत्तर और दक्षिण के दरवाज़ों से दाख़िल हुआ जा सकता है. पूर्व का दरवाज़ा सिर्फ़ जुमे के दिन ही खुलता है. यह दरवाज़ा शाही परिवार के दाख़िले के लिए हुआ करता था.
इसके अलावा ज़ायरीन दिल्ली में दरगाहों पर भी हाज़िरी लगाते हैं. यहां बहुत सी दरगाहें अक़ीदत का मर्कज़ हैं, ख़ासकर सूफ़ियाना सिलसिले से जुड़े लोग यहां अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं. यहां महबूबे-इलाही हज़रत शेख़ निजामुद्दीन औलिया और उनके प्यारे मुरीद हज़रत अमीर खुसरो साहब की मज़ारें हैं. ज़ायरीन हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत ख़्वाजा अब्दुल अज़ीज़ बिस्तामी, हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह, हज़रत ख़्वाजा अलीअहमद एहरारी, हज़रत सैयद बदरुद्दीन शाह समरकंदी, हज़रत सैयद महमूद बहार, हज़रत सैयद सदरुद्दीन शाह, हज़रत सैयद आरिफ़ अली शाह, हज़रत सैयद अबुल कासिम सब्ज़वारी, हज़रत सैयद हसन रसूलनुमा, हज़रत सैयद शाह आलम, हज़रत मौलाना शेख़ जमाली और कमाली, हज़रत मौलाना फ़ख़रुद्दीन फ़ख़्र-ए-जहां, हज़रत मौलाना शेख़ मजदुद्दीन हाजी, हज़रत मौलाना नासेहुद्दीन, हज़रत शम्सुल आरफ़ीन तुर्कमान शाह, हज़रत शाह तुर्कमान बयाबानी सुहरवर्दी, हज़रत शाह सरमद शहीद, हज़रत शाह सादुल्लाह गुलशन, हज़रत शाह वलीउल्लाह, हज़रत शाह मुहम्मद आफ़ाक़, हज़रत शाह साबिर अली चिश्ती साबरी, हज़रत शेख़ सैयद जलालुद्दीन चिश्ती, हज़रत शेख़ कबीरुद्दीन औलिया, हज़रत शेख़ जैनुद्दीन अली, हज़रत शेख़ यूसुफ़ कत्ताल, हज़रत शेख़ नसीरुद्दीन महमूद चिराग़-ए-देहली, ख़लीफ़ा शेख़ चिराग़-ए-देहली, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल चिश्ती, हज़रत शेख़ नूरुद्दीन मलिक यारे-पर्रा, हज़रत शेख़ शम्सुद्दीन औता दुल्लाह, हज़रत शेख़ शहाबुद्दीन आशिक़उल्लाह, हज़रत शेख़ ज़ियाउद्दीन रूमी सुहरवर्दी, हज़रत मख़मूद शेख़ समाउद्दीन सुहरवर्दी, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ रुकनुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ एमादुद्दीन इस्माईल फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ उस्मान सय्याह, हज़रत शेख़ सलाहुद्दीन, हज़रत शेख़ अल्लामा कमालुद्दीन, हज़रत शेख़ बाबा फ़रीद (पोते), हज़रत शेख़ अलाउद्दीन, हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन बुख़ारी, हज़रत शेख़ अब्दुलहक़ मुहद्दिस देहलवी, हज़रत शेख़ सुलेमान देहलवी, हज़रत शेख़ मुहम्मद चिश्ती साबरी, हज़रत मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल, हज़रत शेख़ नूर मुहम्मद बदायूंनी, हज़रत शेख़ शाह कलीमुल्लाह, हज़रत शेख़ मुहम्मद फ़रहाद, हज़रत शेख़ मीर मुहम्मदी, हज़रत शेख़ हैदर, हज़रत क़ाज़ी शेख़ हमीदुद्दीन नागौरी, हज़रत अबूबकर तूसी हैदरी, हज़रत नासिरुद्दीन महमूद, हज़रत इमाम ज़ामिन, हज़रत हाफ़िज़ सादुल्लाह नक़्शबंदी, हज़रत शेख़ुल आलेमीन हाजी अताउल्लाह, हज़रत मिर्ज़ा मुल्लाह मज़हर जाने-जानां, हज़रत मीरानशाह नानू और शाह जलाल, हज़रत अब्दुस्सलाम फ़रीदी, हज़रत ख़ुदानुमा, हज़रत नूरनुमा और हज़रत मख़दूम रहमतुल्लाह अलैह की मज़ारों पर भी जाते हैं. यहां हज़रत बीबी हंबल साहिबा, हज़रत बीबी फ़ातिमा साम और हज़रत बीबी ज़ुलैख़ा की मज़ारें भी हैं, जहां महिला ज़ायरीन जाती हैं. यहां पंजा शरीफ़, शाहेमर्दां, क़दम शरीफ़ और चिल्लागाह पर भी ज़ायरीन हाज़िरी लगाते हैं.
यूं तो हर रोज़ ही मज़ारों पर ज़ायरीनों की भीड़ होती है, लेकिन जुमेरात के दिन यहां का माहौल कुछ अलग ही होता है. क़व्वाल क़व्वालियां गाते हैं. दरगाह के अहाते में अगरबत्तियों की भीनी-भीनी महक और उनका आसमान की तरफ़ उठता सफ़ेद धुआं कितना भला लगता है. ज़ायरीनों के हाथों में फूलों और तबर्रुक की तबाक़ होते हैं. मज़ारों के चारों तरफ़ बनी जालियों के पास बैठी औरतें क़ुरान शरीफ़ की सूरतें पढ़ रही होती हैं. कोई औरत जालियों में मन्नत के धागे बांध रही होती है, तो कोई दुआएं मांग रही होती है.
राजस्थान के अजमेर में ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह का मज़ार है. ख़्वाजा अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. ख़्वाजा की वजह से अजमेर को अजमेर शरीफ़ भी कहा जाता है. सूफ़ीवाद का चिश्तिया तरीक़ा हज़रत अबू इसहाक़ शामी ने ईरान के शहर चश्त में शुरू किया था. इसलिए इस तरीक़े या सिलसिले का नाम चिश्तिया पड़ गया. जब ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह हिन्दुस्तान आए, तो उन्होंने इसे दूर-दूर तक फैला दिया. हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी चिश्तिया सिलसिला ख़ूब फलफूल रहा है. दरअसल यह सिलसिला भी दूसरे सिलसिलों की तरह ही दुनियाभर में फैला हुआ है. यहां भी दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सैयद हाजी अली शाह बुख़ारी का मज़ार है. हाजी अली भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. यह मज़ार मुम्बई के वर्ली तट के क़रीब एक टापू पर बनी मस्जिद के अन्दर है. सफ़ेद रंग की यह मस्जिद बहुत ही ख़ूबसूरत लगती है. मुख्य सड़क से मज़ार तक जाने के लिए एक पुल बना हुआ है. इसके दोनों तरफ़ समन्दर है. शाम के वक़्त समन्दर का पानी ऊपर आने लगता है और यह पुल पानी में डूब जाता है. सुबह होते ही पानी उतरने लगता है. यहां भी हिन्दुस्तान के कोने-कोने के अलावा दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.
हरियाणा के पानीपत शहर में शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर का मज़ार है. यह मज़ार एक मक़बरे के अन्दर है, जो साढ़े सात सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है. कहा जाता है कि शेख़ शराफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह ने लम्बे अरसे तक पानी में खड़े होकर इबादत की थी. जब उनकी इबादत क़ुबूल हुई, तो उन्हें बू अली का ख़िताब मिला. दुनिया में अब तक सिर्फ़ साढ़े तीन क़लन्दर हुए हैं. शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर, लाल शाहबाज़ क़लंदर और शम्स अली कलंदर. हज़रत राबिया बसरी भी क़लंदर हैं, लेकिन औरत होने की वजह से उन्हें आधा क़लंदर माना जाता है. बू अली क़लंदर रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार के क़रीब ही उनके मुरीद हज़रत मुबारक अली शाह का भी मज़ार है. यहां भी दूर-दूर से ज़ायरीन आते हैं.
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवा नामक क़स्बे में हाजी वारिस अली शाह का मज़ार है. आप अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. उनके वालिद क़ुर्बान अल्ली शाह भी जाने-माने औलिया थे.
उत्तर प्रदेश के ही कानपुर ज़िले के गांव मकनपुर में हज़रत बदीउद्दीन शाह ज़िन्दा क़ुतबुल मदार का मज़ार है.
इनके बारे में कहा जाता है कि ये योगी दुर्वेश थे और अकसर योग के ज़रिये महीनों साधना में रहते थे. एक बार वह योग समाधि में ऐसे लीन हुए कि लम्बे अरसे से तक उठे नहीं. उनके मुरीदों ने समझा कि उनका विसाल हो गया है. उन्होंने हज़रत बदीउद्दीन शाह को दफ़न कर दिया. दफ़न होने के बाद उन्होंने सांस ली. उनके मुरीद यह देखकर हैरान रह गए कि वे ज़िन्दा हैं. वे क़ब्र खोदकर उन्हें निकालने वाले ही थे, तभी एक बुज़ुर्ग ने हज़रत बदीउद्दीन शाह से मुख़ातिब होकर कहा कि दम न मार यानी अब तुम ज़िन्दा ही दफ़न हो जाओ. फिर उस क़ब्र को ऐसे ही छोड़ दिया गया. इसलिए उन्हें ज़िन्दा पीर भी कहा जाता है. आपकी उम्र मुबारक तक़रीबन छह सौ साल थी.
इनके अलावा देशभर में और भी औलियाओं की मज़ारें हैं, जहां दूर-दराज़ के इलाक़ों से ज़ायरीन आते हैं और सुकून हासिल करते हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दर्द से परेशान है. किसी के पूरे जिस्म में दर्द है, किसी की पीठ में दर्द है, किसी के घुटनों में दर्द है और किसी के हाथ-पैरों में दर्द है. हालांकि दर्द की कई वजहें होती हैं. इनमें से एक वजह यूरिक एसिड भी है.
दरअसल, यूरिक एसिड एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो खाद्य पदार्थों के पाचन से पैदा होता है और इसमें प्यूरिन होता है. जब प्यूरिन टूटता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. किडनी यूरिक एसिड को फ़िल्टर करके इसे पेशाब के ज़रिये जिस्म से बाहर निकाल देती है. जब कोई व्यक्ति अपने खाने में ज़्यादा मात्रा में प्यूरिक का इस्तेमाल करता है, तो उसका जिस्म यूरिक एसिड को उस तेज़ी से जिस्म से बाहर नहीं निकाल पाता. इस वजह से जिस्म में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. ऐसी हालत में यूरिक एसिड ख़ून के ज़रिये पूरे जिस्म में फैलने लगता है और यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों में जमा हो जाते हैं, जिससे जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से गठिया भी हो जाता है. जिस्म में असहनीय दर्द होता है. इससे किडनी में पथरी भी हो जाती है. इसकी वजह से पेशाब संबंधी बीमारियां पैदा हो जाती हैं. मूत्राशय में असहनीय दर्द होता है और पेशाब में जलन होती है. पेशाब बार-बार आता है. यह यूरिक एसिड स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देता है.
यूरिक एसिड से बचने के लिए अपने खान-पान पर ख़ास तवज्जो दें. दाल पकाते वक़्त उसमें से झाग निकाल दें. कोशिश करें कि दाल कम इस्तेमाल करें. बिना छिलकों वाली दालों का इस्तेमाल करना बेहतर है. रात के वक़्त दाल, चावल और दही आदि खाने से परहेज़ करें. हो सके तो फ़ाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें.
जौ
यूरिक एसिड से निजात पाने के लिए जौ का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें. जौ की ख़ासियत है कि यह यूरिक एसिड को सोख लेता है और उसे जिस्म से बाहर करने में कारगर है. इसलिए जौ को अपने रोज़मर्रा के खाने में ज़रूर शामिल करें. गर्मियों के मौसम में जौ का सत्तू पी सकते हैं, जौ का दलिया बना सकते हैं, जौ के आटे की रोटी बनाई जा सकती है.
ज़ीरा
यूरिक एसिड के मरीज़ों के लिए ज़ीरा भी बहुत फ़ायदेमंद है. ज़ीरे में आयरन, कैल्शियम, ज़िंक और फ़ॉस्फ़ोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट उच्च मात्रा में मौजूद होता है, जो यूरिक एसिड की वजह से होने वाले जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है. यह टॉक्सिंस को जिस्म से बाहर करने में भी मददगार है.
नींबू
नींबू में मौजूद साइट्रिक एसिड शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ने से रोकता है. इसलिए नींबू का इस्तेमाल करना चाहिए.
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
अबुल हसन ख़रक़ानी प्रसिद्ध सूफ़ी संत हैं. उनका असली नाम अबुल हसन हैं, मगर ख़रक़ान में जन्म लेने की वजह से वे अबुल हसन ख़रक़ानी के नाम से विख्यात हुए. सुप्रसिद्ध ग्रंथकार हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार के मुताबिक़ एक बार सत्संग में अबुल हसन ख़रक़ानी ने बताया कि उन्हें उस वक़्त की बातें भी याद हैं, जब वे अपनी मां के गर्भ में चार महीने के थे.
अबुल हसन ख़रक़ानी एक चमत्कारी संत थे, लेकिन उन्होंने कभी लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. वे कहते हैं कि अल्लाह अपने यश के लिए चमत्कार दिखाने वालों से चमत्कारी शक्तियां वापस ले लेता है. उन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग केवल लोककल्याण के लिए किया. एक बार उनके घर कुछ मुसाफ़िर आ गए, जो बहुत भूखे थे. उनकी पत्नी ने कहा कि घर में दो-चार ही रोटियां हैं, जो इतने मेहमानों के लिए बहुत कम पड़ेंगी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि सारी रोटियों को साफ़ कपड़े से ढककर मेहमानों के सामने रख दो. उनकी पत्नी ने ऐसा ही किया. मेहमानों ने भरपेट रोटियां खाईं, मगर वे कम न पड़ीं. मेहमान तृप्त होकर उठ गए, तो उनकी पत्नी ने कपड़ा हटाकर देखा, तो वहां एक भी रोटी नहीं थी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि अगर और भी मेहमान आ जाते, तो वे भी भरपेट भोजन करके ही उठते.
वे बाहरी दिखावे में विश्वास न रखकर कर्म में यकीन करते थे. वे कहते हैं कि जौ और नमक की रोटी खाने या टाट के वस्त्र पहन लेने से कोई सूफ़ी नहीं हो जाता. अगर ऐसा होता, तो ऊन वाले और जौ खाने वाले जानवर भी सूफ़ी कहलाते. अबुल हसन ख़रक़ानी कहते हैं कि सूफ़ी वह है जिसके दिल में सच्चाई और अमल में निष्ठा हो. वे शिष्य नहीं बनाते थे, क्योंकि उन्होंने भी स्वयं किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी. वे कहते थे कि उनके लिए अल्लाह ही सब कुछ है. मगर इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि सांसारिक लोग अल्लाह के इतने करीब नहीं होते, जितने संत-फ़कीर होते हैं. इसलिए लोगों को संतों के प्रवचनों का लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि संतों का तो बस एक ही काम होता है अल्लाह की इबादत और लोककल्याण के लिए सत्संग करना.
एक बार किसी क़ाफ़िले को ख़तरनाक रास्ते से यात्रा करनी थी. क़ाफ़िले में शामिल लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से आग्रह किया कि वे उन्हें कोई ऐसी दुआ बता दें, जिससे वे यात्रा की मुसीबतों से सुरक्षित रहें. इस पर उन्होंने कहा कि जब भी तुम पर कोई मुसीबत आए, तो तुम मुझे याद कर लेना. मगर लोगों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. काफ़ी दूरी तय करने के बाद एक जगह डाकुओं ने क़ाफ़िले पर धावा बोल दिया. एक व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा धन और क़ीमती सामान था, उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद किया. जब डाकू क़ाफ़िले को लूटकर चले गए, तो क़ाफ़िले वालों ने देखा कि उनका तो सब सामान लुट चुका है, लेकिन उस व्यक्ति का सारा सामान सुरक्षित है. लोगों ने उससे इसकी वजह पूछी, तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद कर उनसे सहायता की विनती की थी. इस वाक़िये के कुछ वक़्त बाद जब क़ाफ़िला वापस ख़रक़ान आया, तो लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से कहा कि हम अल्लाह को याद करते रहे, मगर हम लुट गए और उस व्यक्ति ने आपका नाम लिया, तो वह बच गया. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि तुम केवल ज़ुबानी तौर पर अल्लाह को याद करते हो, जबकि संत सच्चे दिल से अल्लाह को याद करते हैं. अगर तुमने मेरा नाम लिया होता, तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता.
एक बार वे अपने बाग की खुदाई कर रहे थे, तो वहां से चांदी निकली. उन्होंने उस जगह को बंद करके दूसरी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से सोना निकला. फिर तीसरी और चौथी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से भी हीरे-जवाहरात निकले, लेकिन उन्होंने किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया और फ़रमाया कि अबुल हसन इन चीज़ों पर मोहित नहीं हो सकता. ये तो क्या अगर दोनों जहां भी मिल जाएं, तो भी अल्लाह से मुंह नहीं मोड़ सकता. हल चलाते में जब नमाज़ का वक़्त आ जाता, तो वे बैलों को छोड़कर नमाज़ अदा करने चले जाते. जब वे वापस आते तो ज़मीन तैयार मिलती.
वे लोगों को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करने की सीख भी देते थे. अबुल हसन ख़रक़ानी और उनके भाई बारी-बारी से जागकर अपनी मां की सेवा करते थे. एक रात उनके भाई ने कहा कि आज रात भी तुम ही मां की सेवा कर लो, क्योंकि मैं अल्लाह की इबादत करना चाहता हूं. उन्होंने अपने भाई की बात मान ली. जब उनके भाई इबादत में लीन थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि ''अल्लाह ने तेरे भाई की मग़फ़िरत की और उसी के ज़रिये से तेरी भी मग़फ़िरत कर दी.'' यह सुनकर उनके भाई को बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह की इबादत की, इसलिए इसका पहला हकदार तो मैं ही था. तभी उसे ग़ैबी आवाज़ सुनाई दी कि ''तू अल्लाह की इबादत करता है, जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है. अबुल हसन ख़रक़ानी अपनी मां की सेवा कर रहा है, क्योंकि बीमार ज़ईफ़ मां को इसकी बेहद ज़रूरत है.'' यानी, अपने माता-पिता और दीन-दुखियों की सेवा करना भी इबादत का ही एक रूप है. वे कहते थे कि मुसलमान के लिए हर जगह मस्जिद है, हर दिन जुमा है और हर महीना रमज़ान है. इसलिए बंदा जहां भी रहे अल्लाह की इबादत में मशग़ूल रहे. एक रोज़ उन्होंने ग़ैबी आवाज़ सुनी कि ''ऐ अबुल हसन जो लोग तेरी मस्जिद में दाख़िल हो जाएंगे उन पर जहन्नुम की आग हराम हो जाएगी और जो लोग तेरी मस्जिद में दो रकअत नमाज़ अदा कर लेंगे उनका हश्र इबादत करने वाले बंदों के साथ होगा.''
अपनी वसीयत में उन्होंने ज़मीन से तीस गज़ नीचे दफ़न होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी. अबुल हसन ख़रक़ानी यह भी कहते थे कि किसी भी समाज को शत्रु से उतनी हानि नहीं पहुंचती, जितनी कि लालची विद्वानों और गलत नेतृत्व से होती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि लोग यह समझें कि हक़ीक़त में उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत.












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