डॉ. फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.    

इत्र का इतिहास 
इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है. ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.        
चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है. 
क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.

इत्र से मुग़लों का रिश्ता   
मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.
इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.
 
इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है. उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.     
आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था. 

इत्र कैसे बनता है 
इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं. इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है. फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है.  

मिट्टी का इत्र
फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है. ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है. 
यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं. दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.           
 
अगरऊद
कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है. इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50 लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है. 
कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.   
कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15 हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है. 

फूलों की खेती 
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. 

देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-   
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.  
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है. 
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है. 
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है. 
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है. 
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम 
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है. 
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट  दिल्ली में स्थित है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)
साभार आवाज़ 
 


फ़िल्म लेखक-निर्देशक सागर सरहदी एक टीवी चैनल से मुख़ातिब थे- "हम एक अजीब संकट से गुज़र रहे हैं। एक मोबाइल हमारी ज़िंदगी पर हावी हो गया है। नई पीढ़ी के हाथ में मोबाइल आया तो सिनेमा, किताब, जज़्बात और कल्चर सब ख़त्म हो गए। 
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गंगासागर तलवार उर्फ़ सागर सरहदी का जन्म 11 मई 1933 को सूबा सरहद के बफा गांव में हुआ। उनकी फ़िल्म 'नूरी' की कहानी उसी गांव की है। उस गांव में दरिया है, पहाड़ है, हरियाली है और उनका बचपन है। 14 साल की उम्र में एक दिन अचानक उन्हें इन चीज़ों से महरूम कर दिया गया। सागर सरहदी जानना चाहते हैं कि वह कौन सी ताक़त है जिसने एक हंसते खेलते आदमी को एक रिफ़्यूज़ी में तब्दील कर दिया। इसके लिए उनके अंदर बेहद ग़ुस्सा है। इस ग़ुस्से को ठंडा रखने के लिए वे बात बात में गाली देते हैं। दोस्तों से मिलते हैं तो हालचाल पूछने के पहले मां-बहन की गालियाँ देते हैं। मगर ये गालियां वे बड़ी मुहब्बत से हंसते हुए देते हैं इसलिए कोई बुरा नहीं मानता।

संवाद के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड 
यश चोपड़ा की फ़िल्म 'कभी-कभी' (1976), 'सिलसिला' (1981) और 'चांदनी' (1989) में उन्होंने संवाद लिखे। फ़िल्म 'कभी-कभी' में संवाद लेखन के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला। सागर सरहदी ने कहा- "मैं पटकथा-संवाद लेखन को सृजनात्मक कार्य नहीं मानता। ऐसी फ़िल्मों में गिनती के संवाद लिखने पड़ते हैं। मुझसे कहा गया कि नायक के लिए 8 लाइन का, नायिका के लिए 6 लाइन का और सहनायक के लिए 4 लाइन का संवाद लिख दीजिए। ऐसे में कोई लेखक कैसे ख़ुश रह सकता है।" 
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अभिनेत्री राखी के लिए उन्होंने एक संवाद लिखा- "तुम्हारी आंखें अजीब हैं। जहां देखती हैं एक रिश्ता कायम कर लेती हैं।" फिर निर्देशक की डिमांड पर उन्होंने रेखा के लिए लिखा- "तुम्हारी आंखों में आसमान झांकता है।" उन्हें महसूस हुआ कि जब तक दूसरों की मांग पर वे दूसरों की आंखों के बारे में लिखते रहेंगे तब तक उनके अपने ख़्वाब मुकम्मल नहीं होंगे।

'बाज़ार' यानी एक लेखक का ख़्वाब
सागर सरहदी का ख़्वाब था- अपनी मर्ज़ी की फ़िल्म लिखें। अपनी मर्ज़ी से उसने निर्देशित करें। उसमें किसी का दख़ल न हो। इस ख़्वाब को उन्होंने फ़िल्म 'बाज़ार' के ज़रिए 1982 में बड़े पर्दे पर साकार किया। यश चोपड़ा के प्रस्ताव के बावजूद उन्होंने इस फ़िल्म में यश चोपड़ा के बैनर का इस्तेमाल नहीं किया। फिर भी यश चोपड़ा ने बाहर से उनकी मदद की और बिना किसी आर्थिक संकट के 'बाज़ार' फ़िल्म रिलीज़ हो गई। दस लाख की इस फ़िल्म ने कई गुना ज़्यादा कमाया।
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'बाज़ार' से पहले 'नूरी' फ़िल्म (1979) बेहद कामयाब रही। यह फ़िल्म सागर सरहदी की कहानी 'राखा' पर आधारित है। निर्माता यश चोपड़ा और निर्देशक थे मनमोहन कृष्णा। नायिका के रूप में पूनम ढिल्लो की क़िस्मत रोशन हुई। जां निसार अख़्तर के दिलकश गीत थे। ख़य्याम साहब का मनभावन संगीत था। गोल्डन जुबली मना कर फ़िल्म 'नूरी' एक यादगार अफ़साना बन गई। 'बाज़ार' की कामयाबी के बाद सागर सरहदी ने तय किया कि अब कमर्शियल फ़िल्में नहीं लिखेंगे। 'बाज़ार' से जो पैसा आ रहा है उसे अगली फ़िल्म के निर्माण में लगाएंगे।
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सागर सरहदी ने सन् 1984 में 'लोरी' फ़िल्म बनाई। शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, फारुख़ शेख़ और स्वरूप संपत अभिनीत यह फ़िल्म अच्छी होने के बावजूद फ्लाप हो गई। इसके तीन कारण थे। पहला- उस वक़्त एकदिवसीय क्रिकेट मैच चल रहे थे। दूसरा- उसी समय वीडियो ने ज़ोर पकड़ा। तीसरा- उसी समय दूरदर्शन पर 'हम लोग', 'यह जो है ज़िंदगी' और 'ख़ानदान' जैसे पारिवारिक धारावाहिक चल रहे थे। इस दौरान वीडियो और टीवी के कारण एक-एक करके कई फ़िल्में धराशाई हुईं।
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'लोरी' फ़िल्म के पिटने से सागर सरहदी को 15 लाख का घाटा हुआ। उन्होंने जुहू स्थित अपना फ्लैट बेच दिया। मलाड लिंक रोड पर चले गए। कांचपाड़ा के इसी फ्लैट में उनसे मेरी पहली मुलाक़ात हुई। उन्होंने सारा क़िस्सा बयान किया। हमारी ये बातचीत दैनिक जनसत्ता की नगर पत्रिका 'सबरंग' में 3 मार्च 1991 को प्रकाशित हुई।

टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती 
उस समय सागर सरहदी की दो फ़िल्में प्रदर्शन के लिए तैयार थीं- 'तेरे शहर में' और 'अगला मौसम'। उन्होंने बताया- 'तेरे शहर में' स्मिता पाटिल की फ़िल्म है। इसमें उनके चरित्र के तीन पड़ाव हैं। यह 'बाज़ार' से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। स्मिता के साथ इसमें कुलभूषण खरबंदा, नसीर, दीप्ति नवल और रोहिणी हट्टंगड़ी हैं। गांव की लड़की, फिर वेश्या, और फिर वृद्धा के रूप में स्मिता ने यादगार अभिनय किया है। यह मेरी कहानी 'समझौता' पर आधारित है। मेरी यह कहानी पढ़कर चित्रा मुद्गल बहुत विचलित हो गईं थीं। उन्होंने ही मुझसे कहा था कि आप इस पर फ़िल्म क्यों नहीं बनाते। उनकी बात मुझे जंच गई और इस तरह यह फ़िल्म बनी। 'अगला मौसम' हिंदी और पंजाबी में साथ साथ बनी है। पंकज कपूर और सुप्रिया पाठक अभिनीत यह फ़िल्म गांव की सामंतशाही और औरतों के शोषण पर आधारित है। गांव में आज भी औरतें देहरी में क़ैद हैं। उन पर बहुत ज़ुल्म हो रहे हैं। इस फ़िल्म की पूरी शूटिंग पंजाब के ख़ूबसूरत इलाक़ों में की गई।
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इंसान जैसा सोचता है बिल्कुल वैसा नहीं होता। 'तेरे शहर में' फ़िल्म के निर्माता ने सागर सरहदी पर मुक़दमा कर दिया है। मुक़दमे का सामना करने के लिए सागर सरहदी ने मलाड वाला फ्लैट बेच दिया। 'तेरे शहर में' और 'अगला मौसम' दोनों फ़िल्में हालात के शिकंजे में क़ैद होकर रह गईं। वे कभी सिनेमा हॉल तक नहीं पहुंच पाईं।

अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है
सागर सरहदी समाज में अपनी भूमिका कल्चरल एक्टीविस्ट की मानते हैं। चाहे फ़िल्म हो या नाटक वे चाहते हैं कि सामाजिक समस्याओं पर बात हो। वे कहते हैं- मैंने जीवन को नज़दीक से देखा है। मेरा जीवन मुझसे बड़ा है। विलासिता मेरे जीवन और मिज़ाज से मेल नहीं खाती। व्यवसायिक फ़िल्में लिखकर मैंने पैसा कमाया तो घुटन होने लगी। इस घुटन से बाहर निकलने के लिए मैंने 'बाज़ार' फ़िल्म बनाई।
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मैंने सार्थक सिनेमा का ज़िक्र किया तो सागर सरहदी बोले- 'बाज़ार' व्यावसायिक और सार्थक सिनेमा के बीच की एक कड़ी थी। सार्थक सिनेमा न इधर का रहा न उधर का। श्याम बेनेगल सरकारी दामाद बन गए। सईद मिर्ज़ा की फ़िल्म देखकर मेरी समझ में नहीं आया कि 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है'। ऐसी फ़िल्में सामान्य आदमी में अरुचि पैदा करती हैं। 'नुक्कड़' सीरियल देखकर लगा कि इस देश का ग़रीब आदमी सबसे ज़्यादा ख़ुश है। 
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हमारी सबसे बड़ी कमी यह है कि हम मासेज यानी भारी जनसमूह को आकर्षित नहीं कर पाए। इसलिए हमें व्यवसायिक सफलता नहीं मिल पाई। इस मामले में मृणाल सेन अच्छे हैं। वे थीम के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करते हैं। फ़िल्म शुरू करने से पहले ही वह पूरे यूरोप में पत्र-पत्रिकाओं के ज़रिए उसकी थीम का प्रचार कर देते हैं। उससे प्रभावित होकर कोई न कोई वितरक फ़िल्म ख़रीदने के लिए तैयार हो जाता है। थीम के प्रति आम लोगों का रुझान बहुत ज़रूरी है। गोविंद निहलानी के 'तमस' ने जन सामान्य का ध्यान खींचा। दूसरे लोग साहित्यिक कृतियों को भुना रहे हैं। रिश्तेदारियां निभाई जा रही हैं। मंडी हाउस कला मंडी न होकर दालमंडी हो गया है। ख़रीद फ़रोख़्त जारी है।

इप्टा' यानी फ़िल्मों में प्रवेश का प्लेटफॉर्म 
मुंबई आने पर सागर सरहदी 'इप्टा' से जुड़ गए थे।  उन दिनों को याद करते हुए वे बोले 'इप्टा' बहुत प्रतिष्ठित संस्था थी। आज यह फ़िल्मों में प्रवेश का प्लेटफॉर्म बन गई है। मेरे ज़्यादातर नाटक 'इप्टा' ने मंचित किए। 'तनहाई' कई भाषाओं में खेला गया। 'भूखे भजन न होय गोपाला' आदि नाटकों की कई प्रस्तुतियां हुईं। लेकिन इससे मैं ख़ुश नहीं हूँ। 
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हमारे यहां थिएटर का कंसेप्ट ही किसी के पास नहीं है। आज की संवेदना को थिएटर नहीं ला पा रहा है। विदेशी नाटक भी होने चाहिए लेकिन अंग्रेजी नाटक खेलते हुए हमें अंग्रेज नहीं बनना चाहिए। अच्छा साहित्य विश्वभर में साझा होता है। 'महाभारत' और 'अभिज्ञान शाकुंतल' विश्व की कई भाषाओं में मंचित किए गए। हबीब तनवीर ने फॉक फार्म को ज़िंदा करके महत्वपूर्ण कार्य किया, लेकिन वे छत्तीसगढ़ी से आगे नहीं बढ़ सके। सफ़दर हाशमी ने दिन प्रतिदिन की समस्याओं से जुड़े नाटक करके अच्छा कल्चरल एक्टीविस्ट होने का सबूत दिया। अख़बार की तरह नुक्कड़ नाटक भी जरूरी हैं।
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मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले सागर सरहदी ने शादी नहीं की। उनका कहना है- एक संवेदनशील रचनाकार को शादी नहीं करनी चाहिए क्योंकि शादी में तलाक़ की भी संभावना मौजूद रहती है। मेरी बीवी होती तो मुझे न तो 'बाज़ार' बनाने देती न 'लोरी' के लिए फ्लैट बेचने देती। मेरे लिए शाम को गर्लफ्रेंड के साथ घूमना या दोस्तों से बतियाना सबसे अच्छा काम है।

बदल गया है वक़्त का चेहरा
सन् 2000 में प्रदर्शित "कहो ना प्यार है" फ़िल्म में सागर सरहदी के संवाद थे। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने वक़्त का चेहरा बदल दिया। लोगों की रुचियां बदल गईं। उन्होंने 'राज दरबार' नाटक लिखा। दर्शकों को उसमें लुत्फ़ नहीं आया। उन्होंने 'चौसर' फ़िल्म बनाई। वितरक नहीं मिला। 'चौसर' सिनेमा हाल तक नहीं पहुंच पाई। सागर सरहदी ने अपने भतीजे रमेश तलवार के अंधेरी लिंक रोड वाले ऑफिस में हर रविवार कविता-कहानी की महफ़िल जमाई। युवा पीढ़ी को यह महफ़िल अधिक दिनों तक रास नहीं आई। उनके पुराने क़िस्सों में नए लोगों को मज़ा नहीं आया।
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सागर सरहदी से जब मेरी पहली मुलाक़ात हुई थी तो उन्होंने कहा- हिंदी वाले अपने कार्यक्रमों में मुझे क्यों नहीं बुलाते? हमने उन्हें बुलाया। कथाकार धीरेंद्र अस्थाना के कहानी संग्रह 'उस रात की गंध' के लोकार्पण समारोह में वे मंच पर मौजूद थे। उसके बाद वे हिंदी के कई कार्यक्रमों में पधारे। सागर सरहदी ने किताबें बहुत पढ़ी हैं। मगर नई पीढ़ी की किताबों में दिलचस्पी नहीं है। भौगोलिक दूरियों के साथ व्यक्तिगत दूरियां भी बढ़ीं। मोबाइल के चलते मेलजोल कम हुआ। मुंबई में धीरे धीरे साहित्यिक आयोजन समाप्त हो गए। सागर सरहदी जैसे जीनियस की ज़रूरत कम होती गई।
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सरदार नगर (कोलीवाड़ा) सायन के अपने घर में 88 साल के सागर सरहदी अब किताबों से अपने तनहाइयों को आबाद करते हैं। वे कहते हैं- मैंने बहुत नाम कमाया मगर अब मैं बेकार हूं। मेरे पास कोई काम नहीं है। मोबाइल ने मुझसे सब कुछ छीन लिया। मेरे पास उर्दू की दो सौ किताबें हैं। मैं किसी लाइब्रेरी को दान करना चाहता हूं मगर कोई लेने को तैयार नहीं।" 
कहा जाता है कि फ़िल्म जगत में सिर्फ उगते सूरज की पूजा होती है। ढलते सूरज की तरफ़ कोई नहीं देखता। अपने अकेलेपन से बेज़ार सागर सरहदी ने अंततः मौत को गले लगा लिया। शनिवार 20 मार्च 2021 की रात को उनका इंतक़ाल हो गया। उनकी यादों को सलाम।
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फ़िल्म बाज़ार का एक गीत
करोगे याद तो, हर बात याद आयेगी 
गुज़रते वक़्त की, हर मौज ठहर जायेगी 
करोगे याद तो ...
ये चाँद बीते ज़मानों का आईना होगा   
भटकते अब्र में, चहरा कोई बना होगा
उदास राह कोई दास्तां सुनाएगी   
करोगे याद तो ...
बरसता-भीगता मौसम धुआँ-धुआँ होगा   
पिघलती शमओं पे दिल का मेरे ग़ुमां होगा
हथेलियों की हिना, याद कुछ दिलायेगी    
करोगे याद तो ...
गली के मोड़ पे, सूना सा कोई दरवाज़ा    
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी   
करोगे याद तो …
संगीतकार : ख़य्याम 
गीतकार : बशर नवाज़
गायक : भूपेंद्र 
-देवमणि पांडेय 


जन्म : 11 मई 1933
निधन : 20 मार्च 2021


डॉ. फ़िरदौस ख़ान

भारत गांवों का देश है। यहां तक़रीबन साढ़े छह लाख गांव हैं। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार मई 2025 तक देश में कुल छह लाख 44 हज़ार 131 गांव थे। केन्द्रीय बजट 2025-26 के मुताबिक़ तक़रीबन दो लाख 68 हज़ार ग्राम पंचायतें हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा तक़रीबन एक लाख गाँव हैं। वक़्त के साथ इनकी तादाद बदलती रहती है।    
  
अकसर गांवों में जाना होता है। बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई देता है। पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं। खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं। दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं। परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है। हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है। रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है। दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी। दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाख़ों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले कई दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है। गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं। गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है। पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल इख़्तियार कर रहे हैं। गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं। शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं। ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं। पहले ग्रामीण अंचलों में लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे। प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परम्परा वाले प्रदेशों में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं। लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं। शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले गांवों के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है। पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है।

हरियाणा जैसे राज्य विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति के प्रदेश माने जाते हैं। यहां के गांव प्राचीन काल से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केन्द्र रहे हैं। गीता का जन्म स्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं। लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआख़ोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है। नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं। लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है। इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फ़ार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं। अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फ़ार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है।

शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है। तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली रौनक़ नहीं रही है। शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं। शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं। अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं। समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है। समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं। होना तो यही चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें। मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा। आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।

विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए। ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है। लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे। काश, वह दिन जल्द आ जाए। हम तो यही दुआ करते हैं, अमीन।   


अशोक भाटिया
मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों और कांग्रेस की बदलती रणनीतियों (विशेषकर तमिलनाडु में DMK से दूरी) के बाद इंडिया  गठबंधन गंभीर संकट में है और इसके भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। बंगाल, केरल और पंजाब में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस का तालमेल न होना गठबंधन की एकता को कमजोर कर रहा है।

बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की काफी समय तक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की चर्चाएं चल रही थीं। कुछ सीटों पर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। ऊपर से तो दोनों ही दल चुप्पी साधे रहे, लेकिन अंदर ही अंदर खटपट होती रही। अचानक एक दिन ममता ने कह दिया- 'एकला चलो', यानी बंगाल में INDIA गठबंधन को खारिज करते हुए अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान। ममता को लग रहा था कि कांग्रेस बंगाल में लेफ्ट के साथ भी 'गलबहियां' कर रही है, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। वाम दल के विरोध की लहर पर सवार होकर ही ममता सत्ता के शिखर तक पहुंची थीं। ऐसे में ये नजदीकी ममता को खटकी और उन्होंने फौरन किसी भी तरह के गठबंधन से दूरी बना ली। 

ममता की INDIA गठबंधन से दूरी का मुख्य कारण बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन बचाना और कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार न करना था। ममता के लिए राज्य की सत्ता और क्षेत्रीय वर्चस्व, राष्ट्रीय गठबंधन की तुलना में हमेशा प्राथमिकता पर रहे हैं। अब न सत्ता रही, ना ही वर्चस्व। इसी वजह से ममता को अचानक से INDIA गठबंधन की याद आई। 

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की हार के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ी है कि इंडिया गठबंधन का क्या होगा। अभी तक संसद में इंडिया गठबंधन के घटक दलों के रूप में समाजवादी पार्टी और डीएमके हमेशा से कांग्रेस के पीछे खड़ी रही। जबकि तृणमूल कांग्रेस का स्टैंड मुद्दों के आधार पर बदलता रहता था। वहीं अभी हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस ने दो राज्यों में अपने ही इंडिया गठबंधन के साथियों के खिलाफ चुनाव लड़ा। केरल में वह वाममोर्चा को हरा कर सत्ता में आई, जबकि बंगाल में वह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी और 292 सीटों पर उम्मीदवार उतारे।

राहुल गांधी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी की सरकार पर तीखे प्रहार किए। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है, क्योंकि राज्यों में राजनीतिक दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, मगर केंद्र में बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो जाते हैं। मगर अब इंडिया गठबंधन में दिक्कत ये है कि कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके का साथ छोड़ कर एक्टर विजय के साथ सरकार में शामिल होने जा रही है। जबकि डीएमके के साथ मिलकर उन्होंने अभी चुनाव लड़ा है। वैसे लोग इसे कांग्रेस की मौक़ापरस्त राजनीति भी कह सकते हैं, मगर यह राजनीति है। यदि मौका चूक गए तो चूकते ही रहेंगे और इतिहास गवाह है कांग्रेस ने ऐसे कई मौके चूके हैं।

अगर कांग्रेस एक्टर विजय के साथ सरकार में जाती है तो संसद में उसे लोकसभा में डीएमके के 22 और राज्यसभा के 8 सांसदों का समर्थन नहीं मिल पाएगा। दरअसल डीएमके के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस में चुनाव से पहले भी दो राय थी। कांग्रेस का एक धड़ा डीएमके के साथ चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं था, खासकर तमिलनाडु के कांग्रेसी। मगर अंत में राहुल गांधी को मानना पड़ा और कांग्रेस डीएमके का गठबंधन हुआ। अब देखना है कि तमिलनाडु की राजनीति क्या करवट लेती है। कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि कांग्रेस को एक्टर विजय के साथ जाना चाहिए हम अगली लोकसभा में तमिलनाडु की सभी 39 सीटें जीत सकते हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी अब  तृणमूल कांग्रेस की तरफ से  नरम हैं और भारतीय जनता पार्टी पर बंगाल में वोट चोरी के साथ साथ सरकार चोरी का आरोप लगा दिया है। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तो कोलकाता ही पहुंच गए। कुल मिलाकर यहां पर इंडिया गठबंधन पर एकसाथ दिखाई दे रहा है। मगर अगले चुनाव तक क्या होगा यह अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा टेस्ट उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव में होना है। यहां देखना होगा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एकसाथ लड़तीं है या अलग-अलग।
राहुल और अखिलेश पहले भी एक साथ लड़ चुके हैं। कांग्रेस अकेले भी लड़ चुकी है।अभी लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के 6 सांसद हैं।समाजवादी पार्टी के 37 सांसद मिलाकर कुल 43 सांसद होते हैं, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दिलचस्प हो सकता है। लेकिन इस सब के लिए इंडिया गठबंधन को 2027 और उसके आगे तक जिंदा रहना पड़ेगा।

बात करें तमिलनाडु तो वहां  कांग्रेस के एक वर्ग ने चुनाव से पहले टीवीके के साथ गठबंधन करने की इच्छा खुलकर व्यक्त की थी, लेकिन अब जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, तो उसने टीवीके का समर्थन किया है।जहां कुछ विशेषज्ञ इसे "तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का निर्णय" मानते हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि "यह एक अवसरवादी निर्णय है, नीतिगत निर्णय नहीं।"विजय की नवगठित पार्टी, जिसने हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाग लिया था, उसने 108 सीटें जीती हैं।कांग्रेस ने टीवीके को सरकार बनाने में समर्थन दिया है। डीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 5 सीटें जीती हैं।

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरीश चोडंकर के नाम से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि पार्टी टीवीके का समर्थन इस शर्त पर करेगी कि "भारतीय संविधान में विश्वास न रखने वाली सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखा जाए।"वे आगे  कहते कि वे तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। वे इसे ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करना चाहते हैं।"अपने बयान में गिरीश चोडंकर ने कहा, "यह गठबंधन आपसी सम्मान, उचित हिस्सेदारी और दोनों पक्षों की ज़िम्मेदारी की भावना पर आधारित है। यह न केवल वर्तमान सरकार के गठन के लिए बल्कि भविष्य के स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के लिए भी जारी रहेगा।"
 
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के समर्थन को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में पत्रकार मालन ने कहा, "कांग्रेस द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक टीवीके को समर्थन देने का कारण शायद आगामी चुनावों में अधिक सीटें जीतना हो सकता है। उन्हें लगता है कि विजय के साथ गठबंधन करने से उन्हें आसानी होगी। उन्होंने डीएमके को अपने भविष्य के रुख़ से अवगत कराने के लिए भी ऐसा कहा होगा।"तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की सबसे बड़ी सहयोगी रही है।इंदिरा गांधी के समय से लेकर राहुल गांधी के वर्तमान युग तक, कुछ मतभेदों के बावजूद डीएमके-कांग्रेस संबंध लंबे समय तक कायम रहे हैं।डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बीच का रिश्ता भी तमिलनाडु में कई बार चर्चा का विषय रहा है। दोनों ने सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एक-दूसरे को "भाई" कहा है।

एलंगोवन राजशेखरन ने राज्य की बड़ी पार्टियों का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा, "कांग्रेस ने 'इंडिया' गठबंधन में शामिल पार्टियों के खिलाफ काम किया। राज्य की पार्टियां कांग्रेस से नाराज़ हो गई हैं। इस तरह के रवैये के साथ, कांग्रेस पार्टी कभी भी भाजपा गठबंधन के विकल्प के रूप में उभर नहीं पाएगी। कांग्रेस ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है।"
 
जा मीडिया ने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस के इस फैसले से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।हालांकि, उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता युवा पीढ़ी के नेताओं से सहमत नहीं हैं। वे इस अवसर का लाभ उठाकर पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं। 1967 में तमिलनाडु में डीएमके के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस ने सरकार में कोई भूमिका नहीं निभाई है। अब यह स्थिति बदल सकती है।"
 
हालांकि, कांग्रेस के मोहन कुमारमंगलम का कहना है कि मंत्रिमंडल में भूमिका उनके लिए कोई शर्त नहीं है।एलंगोवन राजशेखरन का कहना है कि कांग्रेस की यह शर्त कि "सांप्रदायिक ताकतें जो भारतीय संविधान में विश्वास नहीं करतीं" इस गठबंधन में शामिल न हों, अस्वीकार्य है।वे कहते हैं, "अगर विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने का फैसला करते हैं तो कांग्रेस क्या करेगी?"

चेन्नई इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च की वरिष्ठ प्रोफेसर आनंदी कहती हैं, "टीवीके-कांग्रेस गुट ने नीतियों पर क्या चर्चा की? दोनों पक्षों ने निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण, भाषा नीति, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद आदि पर क्या बात की? यह सवाल उठता है कि क्या वे ऐसी आपातकालीन स्थिति में इन विषयों पर चर्चा कर सकते थे। यह तो सिर्फ संख्या का खेल है।"मोहन कुमारमंगलम कहते हैं, "विजय ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनका राजनीतिक शत्रु भाजपा है। हमने अपने समर्थन की शर्त यह रखी है कि सांप्रदायिक ताकतें गठबंधन में शामिल न हों। इसका मतलब है कि भाजपा को गठबंधन में नहीं आना चाहिए।"

इंडिया गठबंधन में अब विजय आएंगे या डीएमके निकलेगी ये भी एक बड़ा सवाल है राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए गठित 'इंडिया' गठबंधन का क्या होगा?के सवाल पर मालन कहते हैं, "विजय इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। हालांकि उस गठबंधन में शामिल पार्टियां अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के मुद्दे पर एकजुट हैं। हालांकि, अब अगर टीवीके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल हो जाता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि डीएमके गठबंधन में रहेगी या नहीं। इसका समाधान अगले लोकसभा चुनावों तक हो सकता है।"
 
मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "डीएमके की नीति भाजपा के खिलाफ नहीं है। ऐसे में वे 'इंडिया' गठबंधन में क्यों नहीं शामिल होते? दोनों दलों (टीवीके और डीएमके) को एक साथ आकर भाजपा का विरोध करना चाहिए। 'इंडिया' गठबंधन में हर तरह की नीतियों वाले दल शामिल हैं। क्या डीएमके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बजाय भाजपा के साथ गठबंधन करेगी? भविष्य में कुछ भी हो सकता है।"



अशोक भाटिया 
लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार 
वसई पूर्व, मुम्बई (महाराष्ट्र)  


कमीज़ के कपड़े में
यौवन की सिलवटें थीं
हर धागे में
एक अधूरी कहानी उगा करती थी।
दर्जी की कैंची काटती थी कपड़े को
पर सपनों को नहीं ।
बची कतरनें
जैसे मन के कोने में अटके हुए ख्याल
न छोड़े जाते - न सिले जाते।
मैंने कहा -
"इनसे रूमाल बना दो या स्कार्फ़
जो गले में लिपटे
तो यादों का बोझ हल्क़ा हो।"
कतरनें जमा होती रहीं 
जैसे भीतर
मोह की छोटी-छोटी गठरियाँ ।
हर कतरन में
एक रंग
एक गंध
एक आधा-लिखा ख़त ।
कभी नीला
जैसे सुबह का आसमान
कभी लाल
जैसे साँझ की लज्जा ।
इन कतरनों को
कभी तह नहीं किया
बस बिखेर दिया मन के आँगन में
कभी हवा में उड़तीं 
कभी ठहरकर - पुरानी बातें सुनातीं।
एक कतरन बोली - मुझे छोड़ दे,मैं बोझ हूँ।
पर मैंने उसे
दिल के तहखाने में सँभाल लिया ।
कतरनों का मोह
जैसे नदी का किनारा
जो बहता नहीं-बस ठहरता है।
हर कतरन
एक छोटा-सा मंदिर
जहाँ पूजा जाता है
वो, जो कभी पूरा नहीं हुआ।
कभी सोचता हूँ
इन कतरनों को
उड़ने दूँ हवा में - पंछी की तरह।
पर फिर डर लगता है -
क्या बचेगा
अगर मोह की ये गठरियाँ खुल गईं?
तो मैं बस इन्हें सिलता हूँ धीरे-धीरे
एक अनगढ़ कविता में
कतरनें अब भी बिखरी हैं
पर अब वे
मेरे मन की धुन में नाच उठती हैं।
-जयप्रकाश मानस  


 -डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
पहली मई को पापा सुबह-सवेरे तैयार होकर मई दिवस के कार्यक्रमों में जाते थे. पापा ठेकेदार थे. लोगों के घर बनाते थे. छोटी-बड़ी इमारतें बनाते थे. उनके पास हमेशा कमज़ोर और बूढ़े मिस्त्री-मज़दूर हुआ करते थे. हमने पापा से पूछा कि लोग ताक़तवर और जवानों को रखना पसंद करते हैं, फिर आप कमज़ोर और बूढ़े लोगों को काम पर क्यों रखते हैं. पापा जवाब देते कि इसीलिए तो इन्हें रखता हूं, क्योंकि सबको जवान और ताक़तवर मिस्त्री-मज़दूर चाहिए. ऐसे में कमज़ोर और बूढ़े लोग कहां जाएंगे. अगर इन्हें काम नहीं मिलेगा, तो इनका और इनके परिवार का क्या होगा. 
हमें अपने पापा पर फ़ख़्र है... उन्होंने कभी किसी का शोषण नहीं किया. किसी से तयशुदा घंटों से ज़्यादा काम नहीं करवाया, बल्कि कभी-कभार वक़्त से पहले ही उन्हें छोड़ दिया करते थे. अगर कोई मज़दूर भूखा होता, तो उसे अपना खाना खिला दिया करते थे. फिर ख़ुद शाम को जल्दी आकर खाना खाते. पापा ने न कभी कमीशन लिया और न ही किसी से एक पैसा ज़्यादा लिया. इसीलिए हमेशा नुक़सान में रहते. अपने बच्चों के लिए न तो दौलत जोड़ पाए और न ही कोई जायदाद बना पाए. 
हमें इस बात पर फ़ख़्र है कि पापा ने हलाल की कमाई से अपने बच्चों की परवरिश की.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
मेहनतकशों को मज़दूर दिवस की मुबारकबाद


-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के विकास में मज़दूरों की सबसे बड़ी भूमिका है. ये मज़दूर ही हैं, जिनके ख़ून-पसीने से विकास की प्रतीक गगनचुंबी इमारतों की तामीर होती है. ये मज़दूर ही हैं, जो खेतों में काम करने से लेकर किसी आलीशान इमारत को चमकाने का काम करते हैं. इस सबके बावजूद सरकार और प्रशासन से लेकर समाज तक इनके बारे में नहीं सोचता. बजट में भी सबसे ज़्यादा इन्हीं की अनदेखी की जाती है. सियासी दल भी चुनाव के वक़्त तो बड़े-बड़े वादे कर लेते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल जाते हैं. रोज़गार की कमी की वजह से लोगों को अपने पुश्तैनी गांव-क़स्बे छोड़कर दूर-दराज के इलाक़ों में जाना पड़ता है. अपने परिजनों से दूर ये मज़दूर बेहद दयनीय हालत में जीने को मजबूर हैं.
 
बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लाखों लोग मध्य भारत के हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में रोज़गार की तलाश में आते हैं. इनमें से कुछ लोग यहां की छोटे-बड़े कारख़ानों में नौकरी कर लेते हैं, तो कुछ अपना कोई छोटा-मोटा धंधा कर लेते हैं. कोई रिक्शा चलाता है, कोई फल-सब्ज़ी बेचता है, तो कोई मज़दूरी करने लगता है. इन सभी का बस एक ही मक़सद होता है कि कुछ पैसे कमाकर अपने घर को भेज दिए जाएं. अफ़सोस की बात है कि ज़्यादातर बाहरी मज़दूरों के पास रहने का ठिकाना तक नहीं है. दिल्ली में ऐसे हज़ारों मज़दूर हैं, जो सड़कों पर ही रहते हैं, जहां भी जगह मिल जाती है, बस वहीं सो जाते हैं. सर्दियों में उन्हें रैन बसेरों का आसरा होता है. मगर कई बार वहां भी इतनी भीड़ हो जाती है कि जगह ही नहीं मिल पाती. ऐसे में वे किसी पुल के नीचे ही आश्रय तलाशते हैं. गर्मियों की की रातें किसी पेड़ की छाया तले या फ़ुटपाथ पर कट जाती हैं. इसी तरह वे बरसात में भी कहीं न कहीं सर छुपाने की जगह तलाश ही लेते हैं. 


कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूरों की हालत भी अच्छी नहीं है. कारख़ाने में दिनभर मेहनत करने के बावजूद उन्हें बहुत कम तनख़्वाह मिलती है. इसलिए ज़्यादातर मज़दूर ओवर टाइम करते हैं. छोटे-छोटे दड़बानुमा कमरों में कई-कई मज़दूर रहते हैं. नियुक्तियां ठेकेदारों के ज़रिये होती हैं, इसलिए उन्हें कोई सुविधा नहीं दी जाती. इतना ही नहीं, उनकी नौकरी भी ठेकेदार की मर्ज़ी पर ही निर्भर करती है, वह जब चाहे उन्हें निकाल सकता है. अकसर कारख़ानों में छंटनी भी होती रहती है. जब काम कम होता है, तो मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया जाता है. ऐसी हालत में उनके सामने एक बार फिर से रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो जाता है.

भवन निर्माण में लगे मज़दूरों की हालत और भी बदतर है.  देश में हर साल काम के दौरान हज़ारों मज़दूरों की मौत हो जाती है. सरकारी, अर्ध सरकारी या इसी तरह के अन्य संस्थानों में काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों या उनके आश्रितों को देर सवरे कुछ न कुछ मुआवज़ा तो मिल ही जाता है, लेकिन दिहाड़ी मज़दूरों को कुछ नहीं मिल पाता. पहले तो इन्हें काम ही मुश्किल से मिलता है और अगर मिलता भी है तो काफ़ी कम दिन. अगर काम के दौरान मज़दूर दुर्घटनाग्रस्त हो जाएं, तो उन्हें मुआवज़ा भी नहीं मिल पाता. देश में कितने ही ऐसे परिवार हैं, जिनके कमाऊ सदस्य दुर्घटनाग्रस्त होकर विकलांग हो गए हैं या फिर मौत का शिकार हो चुके हैं, लेकिन अब कोई भी उनकी सुध लेने वाला नहीं है.
 
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से हर साल क़रीब 22 लाख मज़दूर मारे जाते हैं. इनमें क़रीब 40 हज़ार मौतें अकेले भारत में होती हैं, लेकिन भारत की रिपोर्ट में यह आंकड़ा हर साल केवल 222 मौतों का ही है. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया में हर साल हादसों और बीमारियों से मरने वालों की तादाद 22 लाख से ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत से विकासशील देशें में सतही अध्ययन के कारण इसका सही-सही अंदाज़ा नहीं लग पाता. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक के मुताबिक़ कार्य स्थलों पर समुचित सुरक्षा प्रबंधों के लक्ष्य से हम काफ़ी दूर हैं. आज भी हर दिन कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से दुनियाभर में पांच हज़ार महिला-पुरुष मारे जाते हैं. औद्योगिक देशों ख़ासकर एशियाई देशों में यह संख्या ज़्यादा है. रिपोर्ट में अच्छे और सुरक्षित काम की सलाह के साथ-साथ यह भी जानकारी दी गई है कि विकासशील देशों में कार्य स्थलों पर संक्रामक बीमारियों के अलावा मलेरिया और कैंसर जैसी बीमारियां जानलेवा साबित हो रही हैं. अमूमन कार्य स्थलों पर प्राथमिक चिकित्सा, पीने के पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं का घोर अभाव होता है, जिसका मज़दूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.
 
हमारे कार्य स्थल कितने सुरक्षित हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. ऊंची इमारतों पर चढ़कर काम कर रहे मज़दूरों को सुरक्षा बैल्ट तक मुहैया नहीं कराई जाती. पटाख़ा फ़ैक्ट्रियों, रसायन कारख़ानों और जहाज़ तोड़ने जैसे कामों में लगे मज़दूर सुरक्षा साधनों की कमी के कारण हुए हादसों में अपनी जान गंवा बैठते हैं. भवन निर्माण के दौरान मज़दूरों के मरने की ख़बरें आए दिन अख़बारों में छपती रहती हैं. इस सबके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. 
 
दरअसल, देशी मंडी में भारी मात्रा में उपलब्ध सस्ता श्रम विदेशी निवेशकों को भारतीय बाज़ार में पैसा लगाने के लिए आकर्षित करता है. साथ ही श्रम क़ानूनों के लचीलेपन के कारण भी वे मज़दूरों का शोषण करके ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा बटोरना चाहते हैं. अर्थशास्त्री रिकार्डो के मुताबिक़ मज़दूरी और उनको दी जाने वाली सुविधाएं बढ़ती हैं, तो उद्योगपतियों को मिलने वाले फ़ायदे का हिस्सा कम होगा. हमारे देश के उद्योगपति ठीक इसी नीति पर चल रहे हैं. औद्योगीकरण ने बंधुआ मज़दूरी को बढ़ावा दिया. देश में ऐसे ही कितने भट्ठे व अन्य उद्योग धंधे हैं, जहां मज़दूरों को बंधुआ बनाकर उनसे कड़ी मेहनत कराई जाती है और मज़दूरी की एवज में नाममात्र पैसे दिए जाते हैं, जिससे उन्हें दो वक़्त भी भरपेट रोटी नसीब नहीं हो पाती. अफ़सोस की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी प्रशासन इन मामले में मूक दर्शक बना रहता है, लेकिन जब बंधुआ मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन मीडिया के ज़रिये प्रशासन पर दबाव बनाते हैं, तो अधिकारियों की नींद टूटती है और कुछ जगहों पर छापा मारकर वे रस्म अदायगी कर लेते हैं. मज़दूर सुरेंद्र कहता है कि मज़दूरों को ठेकेदारों की मनमानी सहनी पड़ती है. उन्हें हर रोज़ काम नहीं मिल पाता इसलिए वे काम की तलाश में ईंट भट्ठों का रुख करते हैं, मगर यहां भी उन्हें अमानवीय स्थिति में काम करना पड़ता है. अगर कोई मज़दूर बीमार हो जाए, तो उसे दवा दिलाना तो दूर की बात उसे आराम तक करने नहीं दिया जाता.
 
दरअसल, अंग्रेज़ी शासनकाल में लागू की गई भूमि बंदोबस्त प्रथा ने भारत में बंधुआ मज़दूर प्रणाली के लिए आधार प्रदान किया था. इससे पहले तक ज़मीन को जोतने वाला ज़मीन का मालिक भी होता था. ज़मीन की मिल्कियत पर राजाओं और उनके जागीरदारों का कोई दावा नहीं था. उन्हें वही मिलता था जो उनका वाजिब हक़ बनता था और यह कुल उपज का एक फ़ीसद होता था. हिंदू शासनकाल में किसान ही ज़मीन के स्वामी थे. हालांकि ज़मीन का असली स्वामी राजा था. फिर भी एक बार जोतने के लिए तैयार कर लेने के बाद वह मिल्कियत किसान के हाथ में चली गई. राजा के आधिराज्य और किसान के स्वामित्व के बीच किसी भी तरह का कोई विवाद नहीं था. वक़्त के साथ राजा और राजत्व में परिवर्तन होता रहा, लेकिन किसानों की ज़मीन की मिल्कियत पर कभी असर नहीं पड़ा, लेकिन किसानों की ज़मीन की मिल्कियत पर कभी असर नहीं पड़ा. राजा और किसान के बीच कोई बिचौलिया भी नहीं था. भूमि प्रशासन ठीक से चलाने के लिए राजा गांवों में मुखिया नियुक्त करता था, लेकिन वक़्त के साथ इसमें बदलाव आता गया और भूमि के मालिक का दर्जा रखने वाला किसान महज़ खेतिहर मज़दूर बनकर रह गया.
 
यह अफ़सोस की बात है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश में मज़दूरों की हालत बेहद दयनीय है. हालांकि मज़दूरों के कल्याण के नाम पर योजनाएं तो कई बनीं, लेकिन उनका फ़ायदा मज़दूरों तक नहीं पहुंच पाया. जब मज़दूर भला चंगा होता है, तो वह जैसे-तैसे मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल लेता है, लेकिन दुर्घटनाग्रस्त होकर या बीमार होकर वे काम करने क़ाबिल नहीं रहता, तो उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है.  सरकार को चाहिए कि वह मज़दूरों को वे तमाम बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए, जिनकी उन्हें ज़रूरत है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तक देश का मज़दूर ख़ुशहाल नहीं होगा, तब तक देश की ख़ुशहाली का तसव्वुर करना भी बेमानी है.


ईश्वर की कृति का तू पोषण करे जगत में
इस हेतु पूर्ति हेतु, ईश्वर ऋणी है तेरा
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।
तू धूप में जलता है, शीत में गलाता तन है
हर ऋतु से कर युद्ध, विजित करता अन्न है
अट्टालिका विशाल में धन के अतुल भंडार भी
उजड़ते अन्न बिन, न बस सके कोई बसेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

स्कंध पर निर्भर है तेरे, देश की समृद्धि
बूंदे तेरे पसीने की, उपजाऊ करें धरती
उर्वक धरा से होता प्रकट, स्वर्ण अन्नरूपी
शोभित मां भारती के भाल, स्वेद तिलक तेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

तू है मेरी इस मातृभूमि का सपूत सच्चा
तू भूख के दानव से करता है हमारी रक्षा
कठोर श्रम तेरा करे मानव की क्षुधापूर्ति
जब जागता है तू, तभी धरती पे हो सवेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

तू पुत्र, प्रेमी, सखा और पिता है इस धरा का
हर रूप तेरा धरा का अद्भुत श्रृंगार रचता
बंजर धरा  की गोद भी तेरा प्रताप भर दे
हरियाली के सुंदर स्वरूप का है तू चितेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

साधक है तू और साधना तेरी कठिन है
तेरे ही तप से उर्जित हमारे रातदिन हैं
उपज तेरे श्रम की सबके प्राण करती पोषित
है आत्मनिर्भर तेरे कर्म से ये देश मेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।

हे व्योम पर विराज परमशक्ति परमेश्वर
कृषक के कष्टों का तू, पूर्ण अब शमन कर
स्व अंत न करे कृषक कोई प्राण अपने
उर के इसी उद्गार से पूजन करें हम तेरा।
श्रम स्वेद कणों का तेरे, ये देश ऋणी मेरा।
-किश्वर अंजुम
 भिलाई (छत्तीसगढ़) 


महुए के फूल नहीं ये
जंगल की ज़ेब में टकराते सिक्के हैं।
टप-टप गिरते हैं
जैसे कोई पुरखा अंँधेरे में साँस गिन रहा हो।
सुबह होती है,
और जंगल पूछता है —
आज क्या?
पेट भरेगा या फिर सिर्फ़ हवा में महक बचेगी?
इन फूलों की गंध में
नदी की उदासी है
जो पत्थरों से हार नहीं मानती।
इनमें बच्चों की हँसी है
जो भूख के पास बैठकर भी
आसमान की बात करती है।
ये सिक्के नहीं
पर इनसे ख़रीदते हैं - एक दिन की ज़िंदगी।
कभी ये थाली में चढ़ते हैं - कभी देवता के माथे पर।
कभी बस यों ही हाथों में रह जाते हैं
जैसे कोई जवाब
जो सवाल से बड़ा हो।
जंगल की राहें
इन फूलों से पूछती हैं : कहाँ जाना है?
और फूल कहते हैं—
वहीं, जहाँ हवा गाती है
जहाँ मांदल की थाप पर
पैर ख़ुद-ब-ख़ुद थिरकते हैं।
ये फूल एक वादा हैं
कि जो गिरता है वह फिर उठता है।
जैसे जंगल
जो हर रात के बाद सुबह को जन्म देता है।
महुए के फूल जंगल की कविता हैं
जो हवा में तैरती है
और चुपके से
ज़मीन की छाती पर बिखर जाती है।
-जयप्रकाश मानस 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान को 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहा जाता है। वे एक विद्वान, कवयित्री, कहानीकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं जिनका काम आध्यात्मिकता और साहित्य को जोड़ता है।

सूफ़ी परम्परा से जुड़ी फ़िरदौस ने 'फ़हम अल-क़ुरआन' और 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' जैसी किताबें लिखी हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी से जुड़ी रहीं फिरदौस ने उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में लिखकर सद्भाव और सेवा का संदेश दिया है।

एक झलक देखें 


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.
गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.
और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.

चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com

इंद्रेश कुमार
लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) रोज़ा, (4) ज़कात और (5) हज. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
-इंद्रेश कुमार

(लेखक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
घुड़सवारी एक खेल ही नहीं है, बल्कि यह एक कला है. यह एक ऐसी कला है, जिसमें व्यक्ति घोड़े की पीठ पर सधकर बैठता और फिर उसकी सवारी करता है. इसमें सवार को पूरी तल्लीनता से काम लेना होता है, क्योंकि ज़रा सी भी चूक होते ही वह घोड़े की पीठ से सीधा नीचे गिर जाता है. घुड़सवारी कब से शुरू हुई, इसकी कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि इंसान हज़ारों सालों से घोड़े की सवारी कर रहा है. क़ुरआन में भी इसका ज़िक्र मिलता है.

घुड़सवारी सिर्फ़ मर्दों का ही शग़ल नहीं है, औरतें भी बख़ूबी घुड़सवारी करती रही हैं. इस्लामी तारीख़ में ऐसी औरतों का ज़िक्र बड़ी इज़्ज़त से किया जाता है, जो बहुत उम्दा घुड़सवारी किया करती थीं. इनमें हज़रत नुसायबाह बिन्त काब रज़ियाल्लाहु अन्हा का नाम प्रमुख है. उन्हें उम्म और अम्मारा नाम से भी जाना जाता है. वे मदीना के बानू नज्जर क़बीले से ताल्लुक़ रखती थीं. वे बेहद उम्दा घुड़सवार थीं. उन्होंने दूसरी बैत-उल-अक़ाबा, जंगे-उहुद, जंगे-हुनैन, जंगे-यमामा और जंगे-हुदैबियाह की संधि जैसी कई जंगों में शिरकत की थी. वे जंगे-उहुद में अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की साथी थीं. उन्होंने पैग़म्बर को दुश्मनों के हमले से बचाया था. इसी तरह हज़रत ख़ौला बिन अल अज़वार रज़ियाल्लाहु अन्हा भी अपनी बेमिसाल घुड़सवारी और बहादुरी के लिए जानी जाती हैं. जब उनके भाई को दुश्मनों ने गिरफ़्तार कर लिया, तो वे अपने भाई को छुड़ाने के लिए निकलीं. वे इतनी तेज़ घुड़सवारी करती थीं कि दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे. उन्हें देखकर कोई ये नहीं कह सकता था कि वह औरत हैं, क्योंकि वह मर्दों की तरह ही तेज़ घुड़सवारी करती थीं. सबको यही लगता था कि कोई मर्द घुड़सवारी कर रहा है. जब उनके चेहरे से नक़ाब हटा तो दुश्मन उन्हें देखकर दंग रह गए. उन्होंने इससे पहले किसी औरत को इतनी उम्दा घुड़सवारी करते हुए नहीं देखा था. ये औरतें एक हाथ में तलवार लेकर घुड़सवारी किया करती थीं. दायें हाथ में तलवार होती थी और बायें हाथ में घोड़े की लगाम. एक हाथ से मैदाने-जंग में घुड़सवारी करते देख लोग दांतों टेल उंगलियां दबा लिया करते थे.  

इस्लामी तारीख़ में ऐसी औरतों की बहुत सी मिसालें हैं, जो बेहद शानदार घुड़सवारी किया करती थीं. उन्हें बाक़ायदा घुड़सवारी सिखाई जाती थी, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह उनके काम आ सके. यह इस बात की भी दलील है कि इस्लाम ने औरतों को किसी भी जायज़ काम से रोका नहीं है. आज जो लोग लड़कियों और औरतों पर बिना वजह की पाबंदियां लगाते हैं, दरअसल वे इस्लाम को जानते ही नहीं हैं. औरतों को कमतर समझने की सोच ने मुस्लिम औरतों की क़ाबिलियत के क़िस्सों को पुरानी किताबों में ही दफ़न करके रख दिया है. वे औरतों की दानिशमंदी, उनकी बहादुरी और उनकी क़ाबिलियत की तारीफ़ करना ही नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से वे औरतों को घर की चहारदीवारी तक क़ैद करके नहीं रख पाएंगे. आज इस बात की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कि इस्लाम की बुनियादी तालीम को जन-जन तक पहुंचाया जाए. लोगों को बताया जाए कि इस्लाम में भी औरतों को अपनी क़ाबिलियत दिखाने का पूरा मौक़ा दिया गया है.

शानदार घुड़सवारी करती बेटियां 
यह ख़ुशनुमा बात है कि तमाम पाबंदियों के बावजूद आज मुस्लिम समाज की लड़कियां आगे आ रही हैं.  वे अपनी कामयाबी के परचम लहरा रही हैं. ऐसी ही एक घुड़सवार हैं साइमा सैयद, जो राजस्थान के सीकर जिले के क़स्बे खाटू की रहने वाली हैं. साइमा ने एक्वेस्ट्रियन फ़ैडरेशन ऑफ़ इंडिया और ऑल इंडिया राजस्थानी हॉर्स सोसाइटी के गुजरात चेप्टर के तत्वावधान में 17-18 फ़रवरी 2021 को अहमदाबाद में आयोजित ऑल इंडिया ओपन ऐंड्यूरेन्स प्रतियोगिता में शिरकत की थी. उन्होंने 80 किलोमीटर के इस मुक़ाबले में देश के कई विख्यात घुड़सवारों को टक्कर देते हुए कांस्य पदक जीता था. इसके साथ ही उन्होंने इस मुक़ाबले में क्वालीफ़ाई भी किया था. अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर वह देश की ऐसी पहली महिला घुड़सवार बन गईं, जिसने वन स्टार केटेगरी हासिल की है. इससे पहले उन्होंने 40 किलोमीटर, 60 किलोमीटर और 80 किलोमीटर के मुक़ाबलों में पदक हासिल करते हुए क्क्वालीफ़ाई किया था. वन स्टार राइडर बनने के लिए 40 और 60 किलोमीटर की एक-एक और 80 किलोमीटर के दो मुक़ाबलों में क्वालीफ़ाई करना होता है.

क़ाबिले- ग़ौर बात यह है कि घुड़सवारी के एंड्यूरेंस मुक़ाबले में पुरुषों और महिलाओं के अलग-अलग मुक़ाबले नहीं होते, बल्कि महिलाओं को भी पुरुषों के साथ ही जद्दोजहद करके जीत हासिल करनी होती है. इससे पहले साइमा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 'वंडर वूमेन' का ख़िताब हासिल किया था. इसके साथ ही वह शो जम्पिंग और हेक्स आदि मुक़ाबलों में भी हिस्सा लेकर कई पदक जीत चुकी हैं. साइमा को बचपन से ही घुड़सवारी का शौक़ था. उन्हें बख़ूबी आता है कि कैसे घोड़ों को दौड़ाना है और कैसे उन्हें क़ाबू में करना है. घुड़सवारी की उनकी शुरुआत स्कूल से हो गई थी. उन्होंने बाक़ायदा घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया है. उन्होंने महज़ दस साल की उम्र में 100 मीटर की दौड़ में अपना पहला पदक जीता था. उसके बाद उन्होंने बहुत से मुक़ाबलों में हिस्सा लिया और तक़रीबन 50 पदक जीतकर अपने ख़ानदान और शहर का नाम रौशन किया. 

पिछले दिसम्बर में ग़ाज़ियाबाद में आयोजित उत्तर प्रदेश राज्य स्तरीय घुड़सवारी प्रतियोगिता में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा कुलसुम सलाहुद्दीन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया.
दक्षिण लंदन की ख़दीजा मल्लाह की गिनती इस समय दुनिया की चुनिंदा महिला घोड़सवारों में होती है. 21 साल की ख़दीजा ब्रिटिश मुस्लिम महिलाओं की प्रेरणा बनी हुई हैं. कमाल यह है कि यह हिजाब में घुड़सवारी करती हैं.

दरअसल लड़कियों और महिलाओं की कामयाबी में इनके परिवार वालों का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. उनकी मां और घर की दूसरी औरतें उन पर घर के कामकाज का बोझ नहीं डालतीं. इस तरह उन्हें अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दूसरी चीज़ों के लिए भी काफ़ी वक़्त मिल जाता है. उनके पिता, भाई व परिवार के अन्य पुरुष भी उन पर पाबंदियां नहीं लगाते, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ही करते हैं. इस तरह परिजनों का साथ मिलने पर उनके कुछ कर गुज़रने के उनके जज़्बे को पंख मिल जाते हैं. 

पुरुषों के वर्चस्व वाले इस खेल में महिलाएं बहुत कम हैं. लेकिन कहते हैं कि वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. वक़्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है. अब घुड़सवारी में भी लड़कियां आगे आ रही हैं. देश में ऐसी कई महिला घुड़सवार हैं, जो अपने शानदार प्रदर्शन से अपने घर, शहर, राज्य और देश का नाम रौशन कर रही हैं. पिछले सितम्बर माह में भारतीय घुड़सवारी टीम ने जॉर्डन की वादी रम में आयोजित महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय टेंट पेगिंग चैम्पियनशिप में पदार्पण में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रौशन किया. भारतीय टीम में रितिका दहिया, प्रियंका भारद्वाज और खुशी सिंह शामिल थीं. भारतीय घुड़सवारी महासंघ के मुताबिक़ इस प्रतियोगिता में कुल 14 देशों ने हिस्सा लिया था. भारतीय टीम ने पदार्पण में ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और 136 अंक हासिल किए. इस प्रतियोगिता में 170.5 अंक के साथ दक्षिण अफ्रीका की टीम पहले और 146 अंक के साथ ओमान की टीम दूसरे स्थान पर रही. प्रतियोगिता के पहले दिन कप्तान दहिया और भारद्वाज ने व्यक्तिगत और पेयर्स लांस स्पर्धा में हिस्सा लिया. टीम पहले दिन के आख़िर में सातवें स्थान पर चल रही थी. दूसरे दिन भारत ने व्यक्तिगत और टीम स्वॉर्ड मुक़ाबले में हिस्सा लिया और 24 अंक से दूसरा स्थान हासिल कर लिया. व्यक्तिगत स्पर्धा में खुशी सिंह ने 18 अंक से पहला स्थान हासिल किया. उन्होंने ने भारत के लिए एक स्वर्ण पदक, रजत पदक और एक कांस्य पदक जीता. 

सुदीप्ति हजेला
मध्य प्रदेश के इंदौर की सुदीप्ति हजेला भी शानदार घुड़सवार हैं. साल 2020 में उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया था. साल 2017 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें एकलव्य पुरस्कार से सम्मानित किया. उन्होंने शौक़िया घुड़सवारी सीखी थी, जो बाद में उनका करियर बन गई. साल 2013 में पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उन्होंने अपना पहला नेशनल शो किया था, जिसमें उन्हें कांस्य पदक जीता था. उन्होंने 52 राष्ट्रीय और 7 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं.

सुदीप्ति हजेला के मुताबिक़ घुड़सवारी में तीन मूव होते हैं, जिनमें शो जंपिंग, इवेंटिंग और ड्रैसेस शामिल हैं. वह ड्रैसेस करती हैं. ड्रैसेस बेसिकली बहुत ही क्लासिकल फ़ॉर्म ऑफ़ हॉर्स राइडिंग है, जिसमें घोड़े के साथ बेस्ट परफ़ॉर्म करना होता है. प्रदर्शन के आधार पर जज 1 से लेकर 10 के बीच के अंक देते हैं, जिसे सबसे ज़्यादा अंक मिलते हैं, वही विजेता होता है. 

श्वेता हुड्डा
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा की पत्नी व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की पुत्रवधू श्वेता हुड्डा भी बहुत अच्छी घुड़सवार हैं. उन्होंने भारतीय अश्वारोही संघ द्वारा 2 नवंबर 2019 को दिल्ली में आयोजित ड्रैसेस व‌र्ल्ड चैलेंज चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम ऊंचा किया था. इस प्रतियोगिता में 50 से ज़्यादा देशों के घुड़सवारों ने हिस्सा लिया था. उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे ज़्यादा 62.426 अंक हासिल करते हुए पहला स्थान हासिल किया, जबकि एमएस राठौर 62.353 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. इस खेल में भी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी लिहाज़ से पुरुषों से कम नहीं हैं. इससे पहले उन्होंने साल 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर दो स्वर्ण पदक हासिल किए थे. साल 2018 में ही उन्होंने सीनियर व‌र्ल्ड चैलेंज ड्रैसेस रिप्ले में रजत पदक और इसी साल 2018 एफ़ईआई वर्ल्ड चैंलेंज ड्रेसेज रिप्ले में रजत पदक जीता था. साल 2014 में उन्होंने मीडियम ड्रेसेज में रजत पदक हासिल किया था. 

ज्योतिका हसन वालिया
महज़ 14 साल की उम्र से घुड़सवारी करने वाली ज्योतिका हसन वालिया भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की घुड़सवार हैं. वह साल 1996 में जूनियर भारतीय टीम की कप्तान रह चुकी हैं. उत्तराखंड की रहने वाली ज्योतिका ने दिसम्बर 2019 में दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड जंपिंग चैंपियनशिप में 130 मीटर की ऊंचाई में घुड़सवारी करके कांस्य पदक जीता था. इससे पहले उन्होंने अप्रैल 2017 में बेल्ज़ियम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चौथा स्थान हासिल किया था.

ये सब महिला घुड़सवार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हुई हैं. इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए इन्होंने कड़ी मेहनत की है. अगर लड़कियों को खेलों व अन्य क्षेत्रों में काम करने का मौक़ा मिले, तो वे साबित कर देती हैं कि वह भी किसी से कम नहीं हैं. बस ज़रूरत होती है उन्हें काम करने का मौक़ा देने की और उनका हौसला बढ़ाने की. उन्हें बस रास्ते पर चलने की इजाज़त भर मिल जाए. फिर वह ख़ुद रास्ता तय कर लेती हैं और रास्ते में आने वाली तमाम तरह की रुकावटों का सामना भी कर लेती हैं. वे जानती हैं कि वे अपनी मंज़िल हासिल कर सकती हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार : आवाज़       


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