डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
त्यौहारों का ताल्लुक़ सिर्फ़ मज़हब से ही नहीं होता है, बल्कि ये संस्कृति से भी वाबस्ता होते हैं. मज़हब किसी एक देश से शुरू होता है. फिर वह धीरे-धीरे दुनियाभर में फैल जाता है. हर देश, हर प्रदेश और हर क्षेत्र की अपनी एक सांस्कृतिक पहचान होती है. वहां के बाशिन्दों की अपनी भाषा, अपना रहन-सहन और अपना खान-पान होता है.

किसी मज़हब को अपनाते हुए वे अपनी अक़ीदत तो बदल लेते हैं, लेकिन उनका रहन-सहन नहीं बदलता.     शबे-बरात भी एक ऐसा ही मुस्लिम त्यौहार है, जिसकी जड़ें भले ही अरब में रही हों, लेकिन यह हिन्दुस्तान में आकर यहां की संस्कृति में ढल गया और इसका एक अहम हिस्सा बन गया.
शबे-बरात का त्यौहार इस्लामी साल के आठवें माह शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ को मनाया जाता है. जैसा कि पहले भी ज़िक्र किया गया है कि शब का मतलब है रात और बरात का मतलब है बरी होना. इसीलिए इस रात को निजात वाली रात कहा जाता है.

इस रात अल्लाह की बेशुमार रहमतें नाज़िल होती हैं, इसलिए इसे रहमत वाली रात भी कहा जाता है. बेशुमार बरकतों की वजह से इसे बरकत वाली रात भी कहा जाता है. चूंकि इस रात आइन्दा जन्म लेने वाले बच्चों के नाम अल्लाह के यहां लिख दिए जाते हैं और आइन्दा मरने वाले लोगों के नाम काट दिए जाते हैं, इसलिए इसे परवाना रात भी कहा जाता है.

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि शाबान मेरा महीना है. इसलिए इस माह और ख़ासकर इस रात की बड़ी अहमियत है.  

साफ़-सफ़ाई 
शाबान का चाँद नज़र आते ही घरों में शबे-बरात और रमज़ान की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. शबे-बरात दिवाली जैसा त्यौहार लगता है. जिस तरह दिवाली से पहले हिन्दू अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करते हैं, उसी तरह मुसलमान भी शाबान का महीना शुरू होते ही अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करने लग जाते हैं.
घरों में रंग-रौग़न किया जाता है. चूंकि रमज़ान में रोज़ों और तरावीह की वजह से मसरूफ़ियात बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. इसलिए इसी माह रमज़ान के साथ-साथ ईद की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं. रमज़ान और ईद की ख़रीददारी जैसे काम भी शाबान में ही मुकम्मल कर लिए जाते हैं.

हलवा
दिवाली की तरह ही शबे-बरात को घर में शीरनी बनाई जाती है. सूजी और चने की दाल का हलवा बनाया जाता है. यह हलवा रिश्तेदारों और जान-पहचान वाले लोगों को भेजा जाता है. नर्गिस बताती हैं कि उनके घर तक़रीबन दस किलो सूजी और इतना ही चने की दाल का हलवा बनता है.
चने की दाल का हलवा बनाने में बहुत वक़्त और मेहनत लगती है. इसलिए इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती है. चने की दाल को भिगोया जाता है. फिर इसे इतने पानी में उबाला जाता कि वह ख़ुश्क हो जाए. फिर दाल को सिल बट्टे पर पीसा जाता है, क्योंकि इसे सूखा ही पीसना होता है.
इसके बाद इसे तश्तरी में फैलाकर सुखाया जाता है. फिर इसे कढ़ाही में भूना जाता है. इसी तरह सूजी को भी भून लिया जाता है. शबे-बरात से एक दिन पहले इन्हें चाशनी में मिलाकर सूखा हलवा यानी बर्फ़ी बनाई जाती है. फिर बड़ी-बड़ी तश्तरियों में इसे फैलाकर उस पर सूखे मेवे डाले जाते हैं और चाँदी के वर्क़ लगाए जाते हैं.
शबनम बताती हैं कि मुस्लिम इलाक़ों में शाबान में हलवाई भी शबे-रात का हलवा बनाते थे. हलवे के लिए उन्हें पहले से ही ऑर्डर दे दिए जाते थे. बाक़ी मिठाइयों के साथ-साथ वे हलवा बनाने में जुट जाते थे. लेकिन वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल गया है.
अब वह पहले वाली रौनक़े नहीं रहीं. बहुत से लोगों ने नियाज़-नज़र छोड़ दी है. इसलिए वे अब शबे-रात पर सूखा हलवा भी नहीं बनवाते. इस सबके बीच आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनी इन रिवायतों को ज़िन्दा रखे हुए हैं. 
    
नियाज़
हलवे के साथ-साथ शबे-बरात के दिन मसूर की दाल बनाने की रिवायत भी है. इस दिन मसूर की दाल, रोटी और हलवे पर नियाज़ दी जाती है. लोग शीरनी तक़सीम करते हैं. वे ज़रूरतमंदों को खाना भी खिलाते हैं.शाबान में क़ब्रिस्तान में क़ब्रों की मरम्मत का काम शुरू हो जाता है.
जिन क़ब्रों की मिट्टी गिर गई है और क़ब्रें टूट गई हैं, उन्हें ठीक किया जाता है. शबे-बरात को लोग क़ब्रिस्तान जाकर फ़ातिहा पढ़ते हैं और अहले क़ब्रिस्तान को ईसाले-सवाब पहुंचाते हैं और उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करते हैं.
क़ब्रिस्तान में मोमबत्तियां जलाकर रौशनी की जाती है और अगरबत्तियां भी जलाई जाती हैं. बहुत से लोग अपने अज़ीज़ों की क़ब्रों और अन्य क़ब्रों पर फूल रखते हैं. लोग एक-दूसरे से मिलकर अपनी उन ख़ताओं की माफ़ी मांगते हैं, जो उनसे जाने या अनजाने में हुई हैं.
वे एक-दूसरे से कहते हैं कि हमसे जाने या अनजाने में जो ग़लती हो गई हो और जिस बात से आपका दिल दुखा है, उसके लिए हमें माफ़ कर दें और राज़ी रहना. हम भी आपसे राज़ी हैं और हमारा अल्लाह भी राज़ी है. इस तरह कहने से उनके बीच का मनमुटाव आदि भी ख़त्म हो जाता है. और इस तरह वे एक नये बेहतर रिश्ते की शुरुआत करते हैं. इन बातों से ग़ुरूर भी ख़त्म होता है, जो तमाम बुराइयों की जड़ है. 

रौशनी
दिवाली की तरह शबे-बरात में घरों में रौशनी की जाती है. चूंकि रात में रहमत के फ़रिश्ते आते हैं, इसलिए घर में रौशनी होनी चाहिए. शिया मुसलमान मानते हैं कि इस दिन बारहवें इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम की विलादत होगी. इसलिए वे उनके जन्म लेने से पहले ही ख़ुशियां मनाते हुए अपने घरों को रौशन करते हैं. शबे-बरात में बच्चे आतिशबाज़ी करते हैं. रौशनी और आतिशबाज़ी देखकर दिवाली का गुमां होता है. 

सबीलें
शबे-बरात में मजलिसें होती हैं. रात में लोग इबादत करते हैं. लोगों का मस्जिदों में भी आना-जाना लगा रहता है. इसलिए रातभर चहल-पहल रहती है. शबे-रात में सबीलें लगाई जाती हैं, जैसे चाय की सबीलें, शर्बत की सबीलें और बिरयानी, ज़र्दा, रोटी आदि की सबीलें लगती हैं.   
दरअसल, हिन्दुस्तान की संस्कृति एक समन्दर की तरह है, जिसमें मिलकर दुनियाभर की संस्कृतियां एक हो जाती हैं. शबे-बरात इसकी एक मिसाल है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है
साभार : आवाज़ 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
इस्लामी साल के आठवें माह शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ को शबे-बरात कहते हैं. शब का मतलब है रात और बरात का मतलब है बरी होना यानी आज़ाद होना, यानी अपने सग़ीरा और कबीरा गुनाहों से तौबा करके अल्लाह से बख़्शीश मांगना. सग़ीरा छोटे गुनाहों को कहा जाता है, जैसे झूठ बोलना, किसी की बुराई करना, अपने वालिदैन और बड़ों की बात न मानना, किसी के साथ बुरा बर्ताव करना आदि.
कबीरा बड़े गुनाहों को कहा जाता है, जैसे शिर्क और वे तमाम गुनाह, जिनके लिए क़ुरआन करीम में दोज़क़ की सज़ा का ज़िक्र किया गया है. शबे-बरात को निजात वाली रात, रहमत वाली रात, बरकत वाली रात और परवाना रात भी कहा जाता है.

अल्लाह के आख़िरी नबी और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- :शाबान मेरा महीना है." इसलिए आशिक़े-रसूल के लिए इस माह की बहुत अहमियत है. इसी माह क़िब्ला बदला गया था. पहले कुछ अरसे तक बैतुल मुक़द्दस क़िब्ला रहा और फिर अल्लाह तआला ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काबा शरीफ़ की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया। क़ुरआन करीम में इसका ज़िक्र है.

शबे-बरात में लोग क़ब्रिस्तान जाकर फ़ातिहा पढ़ते हैं और अहले क़ब्रिस्तान के लिए मग़फ़िरत की दुआ करते हैं. वे क़ब्रिस्तान में मोमबत्तियां जलाकर रौशनी करते हैं और अगरबत्तियां भी जलाते हैं. बहुत से लोग अपने अज़ीज़ों की क़ब्रों पर फूल रखते हैं.

वे रातभर जागकर इबादत करते हैं. वे क़ुरआन की तिलावत करते है, नफ़िल नमाज़ पढ़ते हैं और ज़िक्रे-इलाही में मशग़ूल रहते हैं. वे अपने गुनाहों के लिए तौबा करते हैं और अल्लाह तआला से बख़्शीश मांगते हैं. वे अगले दिन रोज़ा रखते हैं. शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ का रोज़ा हज़ारी रोज़ा कहलाता है, क्योंकि इसका सवाब एक हज़ार रोज़ों के बराबर माना जाता है. इस दिन लोग अपना ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहते हैं. 
              
शबे-बरात की फ़ज़ीलत
शबे-बरात की बड़ी अहमियत है. मुख़तलिफ़ हदीसों में शबे-बरात की फ़ज़ीलत बयान की गई है. हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम शाबान की पन्द्रहवीं रात को मेरे पास आए और अर्ज़ किया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आसमान की तरफ़ सर उठाएं.
मैंने पूछा- ये कौन सी रात है?
उन्होंने फ़रमाया- ये वह रात है, जिसमें अल्लाह तआला रहमत के दरवाज़ों में से तीन सौ दरवाज़े खोलता है और हर उस शख़्स को बख़्श देता है, जो मुशरिक न हो. अलबत्ता जादूगर, काहिन, शराबी, सूदख़ोर और ज़िना करने वाले की उस वक़्त तक बख़्शीश नहीं होती, जब तक वे अपने गुनाहों से तौबा न कर ले.
जब रात का चौथा हिस्सा गुज़र गया तो हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! अपना सर उठाएं. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सर उठाया, तो देखा कि जन्नत के दरवाज़े खुले हुए हैं और पहले दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात को रुकू करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है.
दूसरे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में सजदा करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. तीसरे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में दुआ करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. चौथे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में ज़िक्रे-इलाही करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है.
पांचवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि अल्लाह तआला के ख़ौफ़ से रोने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. छठे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात तमाम मुसलमानों के लिए ख़ुशख़बरी है. सातवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि क्या कोई मांगने वाला है, जिसके सवाल के मुताबिक़ अता किया जाए. आठवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि क्या कोई बख़्शीश मांगने वाला है, जिसे बख़्श दिया जाए.
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा- ऐ जिब्राईल अलैहिस्सलाम! ये दरवाज़े कब तक खुले रहेंगे? उन्होंने फ़रमाया- रात के शुरू होने से लेकर सूरज के निकलने तक ये दरवाज़े खुले रहेंगे. फिर उन्होंने फ़रमाया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! इस रात अल्लाह क़बीला बनू कलब की बकरियों के बालों के बराबर लोगों को दोज़ख़ से आज़ाद करता है. (जामी तिर्मज़ी, इब्ने माजा)

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं- "रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- क्या तुम जानती हो कि शाबान की पन्द्रहवीं शब में क्या होता है? मैंने कहा- इस रात में क्या होता है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- आइन्दा साल में होने वाले हर बच्चे का नाम इस रात लिख दिया जाता है और इसी रात आइन्दा साल मरने वालों के नाम भी लिखे जाते हैं. इसी रात बन्दों का रिज़्क़ उतरता है और इसी रात लोगों के आमाल उठा लिए जाते हैं." (मुसनद अबू याला)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं- "मुझे ये बात पसंद है कि इन चार रातों में आदमी ख़ुद को तमाम दुनियावी मसरूफ़ियात से इलाही की इबादत के लिए फ़ारिग़ रखे. वे चार रातें हैं- ईदुल फ़ित्र की रात, ईदुल अज़हा की रात, शाबान की पन्द्रहवीं रात और रजब की पहली रात." (इब्न अल जावज़ी)

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि शाबान का चांद देखते ही सहाबा किराम तिलावते क़ुरआन में मशग़ूल हो जाते और अपने मालों की ज़कात निकालते, ताकि कमज़ोर व मोहताज लोग रमज़ान के रोज़े रखने पर क़ादिर हो सकें. हुक्मरान क़ैदियों को रिहा करते. ताजिर सफ़र करते, ताकि क़र्ज़ अदा कर सकें और रमज़ान में एतिकाफ़ कर सकें.

हज़रत ताऊस यमानी फ़रमाते हैं कि मैंने हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम से शबे-बरात और उसमें होने वाले अमल के बारे पूछा, तो आपने फ़रमाया कि मैं इस रात को तीन हिस्सों में तक़सीम करता हूं. एक हिस्से में नाना जान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद पढ़ता हूं.

दूसरे हिस्से में अपने रब से इस्तग़फ़ार करता हूं और तीसरे हिस्से में नमाज़ पढ़ता हूं. मैंने अर्ज़ किया कि जो शख़्स ये अमल करे उसके लिए क्या सवाब है? आपने फ़रमाया- मैंने वालिद माजिद हज़रत अली अलैहिस्सलाम से सुना और उन्होंने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना- ये अमल करने वालों को मुक़र्रेबीन लोगों में लिख दिया जाता है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार : आवाज़ 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आदि अदृश्य नदी सरस्वती के तट पर बसे हरित प्रदेश हरियाणा अकसर जाना होता है. बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई पड़ता है. पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं. खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं. दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं. परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है. हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है. रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है. दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी. दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाखों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है. पिछले तीन दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है. गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं. गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है. हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है. पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं. गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं. शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं. ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं. पहले ग्रामीण अंचलों में सांग न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे. प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परंपरा वाले प्रदेश हरियाणा में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं. लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं. शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले हरियाणा के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है. पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है.

हरियाणा विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति का प्रदेश रहा है. यहां के गांव प्राचीन समय से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र रहे हैं. गीता का जन्मस्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं. ये लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआखोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है. नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं. लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है. इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं. अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है.

शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है. तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली वह रौनक़ नहीं रही है. शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं. शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं. अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं. समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है. समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं. इसलिए हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें. मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा. आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं.

विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए. ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे. काश, वह दिन जल्द आ जाए. हम तो यही दुआ करते हैं. आमीन...


लाल बिहारी लाल
भारत में  सत्ता दिल्ली सलतनत से मुगल साम्राज्य फिर मुगल से जब सत्ता अंग्रैजो के हाथ में गई तो पहले अंग्रैजों का व्यापारिक उदेश्य था पर धीरे-धीरे उनका राजनैतिक रुप भी समने नजर आने लगा। और वे अपने इस कुटिल चाल में कामयाब भी हो गये । धीरे –धीरे उनके क्रिया-कलापों के प्रति जनमानस में असंतोष की भावना पनपने लगी इसी का परिणाम सन 1857 के सिपाही विद्रोह के रुप में देखने को मिला।
सन 1857के विद्रोह के बाद जनमानस संगठित होने लगा औऱ अग्रैजों के विरुद्ध लामबंद होने लगा। प्रबुद्ध लोगों औऱ आजादी के दीवानों द्वारा सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस की स्थापना की गई। प्रारंभिक 20 वर्षों में 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओ का दबदबा रहा। इसके बाद धीरे-धीरे चरमपंथी (गरमदल) नेताओ के हाथों में बागडोर जाने लगी। इसी बीच महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को स्वदेश (मुम्बई) में कदम रखा  तभी से हर साल 9 प्रवासी दिवस मनाते आ रहे हैं। जब गांधी जी स्वदेश आये तो उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने सुभाव दिया कि आप देश में जगह-जगह भ्रमण कर देश की स्थिति का अवलोकन करें। अपने राजनैतिक गुरु गोखले के सुझाव पर गांधी जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से भ्रमण करते हुए बंगला के मशहुर लेखक रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन पहुँचे। वही पर टैगोर ने सबसे पहले गांधी जी को महात्मा कहा था औऱ गांधी जी ने टैगोर को गुरु कहा था। गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में यात्रा करते थे ताकि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सके। मई 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद के पास कोचरब में अपना आश्रम स्थापित किया लेकिन वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण साबरमती क्षेत्र में आश्रम की स्थापना की। दिसम्बर 1915 में कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में गांधी जी ने भाग लिया गांधी जी ने यहाँ विभाजित भारत को महसूस किया देश अमीर-गरीब, स्वर्ण-दलित,, हिन्दू- मुस्लिम, नरम-गरम विचारधारा , रुढ़िवादी आधुनिक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक , ब्रिटिश विरोधी जिनको इस बात का बहुत कष्ट था कि देश गुलाम है। गांधी जी किसके पक्ष में खड़े हों या सबको साथ लेकर चले। गांधी जी उस समय के करिश्माई नेता थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सबको साथ लेकर सबके अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी।

गांधी जी ने पहली बार देश में सन 1917 में बिहार के चम्पारन में सत्याग्रह किया| उनका आन्दोलन जन आन्दोलन होता था। चंपारण में नील किसानों के तीन कठियाविधि से मुक्ति दिलाई औऱ अंग्रैजों से अपनी बात मनवाने में कामयाब हुए। गरीबों को सुत काटने एवं उससे कपड़े बनाने की प्रेरणा दी जिससे इनके जीवन-यापन में गुणात्मक सुधार आया।
गुजरात क्षेत्र का खेडा क्षेत्र -बाढ़ एवं अकाल से पीड़ित था जैसे सरदार पटेल एंव अनेक स्वयं सेवक आगे आये उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कर राहत की माँग की । गांधी जी के आगे अंग्रैजो को झुकना पड़ा किसानों को कर देने से मुक्ति मिली सभी कैदी मुक्त कर दिए गये गांधी जी की ख्याति देश भर में फैल गई। यही नहीं खेड़ा क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया। वहाँ के शराबियों को शराब की लत को भी छुडवाया। सन् 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने रालेटएक्ट के तहत प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया, बिना जाँच के किसी को भी कारागार में डाला जा सकता था । गांधी जी ने देशभर में रालेट एक्ट के विरुद्ध अभियान चलाया।पंजाब में इस एक्ट का विशेष रूप से विरोध हुआ पंजाब जाते समय में गांधी जी को कैद कर लिया गया साथ ही स्थानीय कांग्रेसियों को भी कैद कर लिया गया । 13 अप्रैल को 1919 बैसाखी के पर्व पर जिसे हिन्दू मुस्लिम सिख सभी मनाते थे अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग इकठ्ठे हुए थे। जलियांवालाबाग़ चारों तरफ से मकानों से घिरा था बाहर जाने के लिए एक ही गेट था वहाँ एक जनसभा में नेता भाषण दे रहे थे तभी जरनल डायर ने निकलने के एकमात्र रास्ते को रोक कर निर्दोष बच्चों स्त्रियों व पुरुषों को गोलियों से भून डाला एक के ऊपर एक गिर कर लाशों के ढेर लग गये जिससे पूरा देश आहत हुआ गांधी जी ने खुल कर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया अब एक ऐसे देशव्यापी आन्दोलन की जरूरत थी जिससे ब्रिटिश सरकार की जड़े हिल जाएँ।

खिलाफत आंदोलन के जरीये हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात हो या फिर असहयोग आंदोलन की गांधी जी ने अपना परचम अग्रैजों के विरुद्ध पूरे देश में लहरा दिया। दिसंबर 1921 में गांधी जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य अब स्वराज्य हासिल करना हो गया। गांधी जी ने अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस को राष्ट्रीय फलक पर पहुँचाने की बात की। इन्होंने एक अनुशासनात्मक समिति का गठन किया। 1925-1928 तक गांधी जी ने समाज सुधार के लिए भी काफी काम किया। धीरे –धीरे कांग्रेस का दबदबा पूरे देश में बढ़ता गया। औऱ राष्ट्र की भावना को प्रेरित कर देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने का काम गांधी जी ने बाखूबी किया। चौराचौरी के घटना से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया पर इन्होने अपनी बात को पूरजोर तरीके से रखना जारी रखा। इन्होने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पहले जपान पर परमाणु बम से हमले की निंदा की,आहत भी हुए पर अपना सत्य औऱ अहिंसा कामार्ग नहीं छोड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या सन 1942 में गांधी जी द्वारा अग्रैजों भारत छोड़ों आंन्दोलन में करो या मरो का नारा । आजादी की मांग में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अग्रैज विवश हो गये औऱ ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली  के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई। ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथु राम गोड्से द्वारा कर  कर दी गई ।फिर भी भारतीय राजनीति  में गांधी जी  आज भी प्रासांगिक एवं अद्वितीय है। गांधी जी भारत के हर जनमानस में विद्यमान है।
 (लेखक साहित्य टीवी के संपादक हैं)

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.

लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.

दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.

कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.

रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.



सरफ़राज़ ख़ान
देश को स्वतंत्र हुए छह देशक से भी ज्यादा का समय हो गया है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फ़हराया जाता है. मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि 15 अगस्त, 1947 की रात को जब देश आज़ाद हुआ था, उस वक़्त भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर जो तिरंगा लहराया फहराया था, वह कहां है?
इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. राष्ट्रीय ध्वज पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसा प्रतीक चिन्ह होता है जो पूरे देश की अस्मिता से जुड़ा होता है. यूं तो आज़ादी के बाद से हर बरस लाल क़िले पर फहरया जाने वाला तिरंगा देश की धरोहर है, लेकिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराये राष्ट्रीय ध्वज का अपना अलग ही एक महत्व है.
कुछ लोगों का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर लहराया गया तिरंगा नेहरू स्मारक में रखा गया है, जबकि स्मारक के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं. हैरत की बात तो यह भी है कि यह विशेष तिरंगा राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी मौजूद नहीं है. इस अभिलेखागार में 1946 में नौसेना विद्रोह के दौरान बाग़ी सैनिकों द्वारा फहराया गया ध्वज रखा हुआ है. बंबई में 1946 में नौसेना विद्रोह के वक्त तीन ध्वज फहराये गए थे. इनमें कांग्रेस का ध्वज, मुस्लिम लीग का ध्वज और कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज शामिल थे. इनमें से कांग्रेस का ध्वज अभिलेखागार में मौजूद है.

प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर फहराया गया ध्वज राष्ट्रीय संग्रहालय में भी नहीं है. राष्ट्रीय संग्रहालय के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ आम तौर पर ऐतिहासिक महत्व की ऐसी धरोहर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने की बात हुई थी, लेकिन बाद में इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया था. इसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के प्रबंध की देखरेख करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को सौंप दिया गा, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग तथा सर्च द फ्लैग मिशन के पास उस तिरंगे के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है.

15 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश के नाम संदेश देने दिया था और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने अपनी स्वर लहरियों से आज़ादी का स्वागत किया था.




सरफ़राज़ ख़ान   
साल 2026 के लिए पद्म पुरस्कारों को घोषणा हो गई है. ये पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोहों में प्रदान किए जाते हैं, जो आमतौर पर प्रत्येक वर्ष मार्च या अप्रैल के आसपास होते हैं.
पद्म पुरस्कार देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक हैं, जो तीन श्रेणियों में प्रदान किए जाते हैं: पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री. ये पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक मामलों, विज्ञान और इंजीनियरिंग, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल, सिविल सेवा आदि विभिन्न क्षेत्रों में दिए जाते हैं. पद्म विभूषण असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए, पद्म भूषण उच्च कोटि की विशिष्ट सेवा के लिए और पद्म श्री किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाता है. इन पुरस्कारों की घोषणा प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर की जाती है.

वर्ष 2026 के लिए राष्ट्रपति ने 131 पद्म पुरस्कारों के प्रदान करने की स्वीकृति दी है, जिनमें दो युगल पुरस्कार शामिल हैं. युगल पुरस्कार को एक ही माना जाता है. इस सूची में पांच पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री पुरस्कार शामिल हैं। पुरस्कार प्राप्त करने वालों में 19 महिलाएं हैं और सूची में विदेशी/एनआरआई/पीआईओ/ओसीआई श्रेणी के छह व्यक्ति और 16 मरणोपरांत पुरस्कार प्राप्तकर्ता भी शामिल हैं.
 पद्म विभूषण (5)
1. श्री धर्मेंद्र सिंह देओल (मरणोपरांत)- कला - महाराष्ट्र
2. श्री के टी थॉमस- सार्वजनिक मामले- केरल
3. सुश्री एन राजम- कला- उत्तर प्रदेश
4. श्री पी नारायणन- साहित्य एवं शिक्षा- केरल
5. श्री वी एस अच्युतानंदन (मरणोपरांत)- सार्वजनिक मामले- केरल
पद्म भूषण (13)
6. सुश्री अलका याग्निक- कला- महाराष्ट्र
7. श्री भगत सिंह कोश्यारी- सार्वजनिक मामले- उत्तराखंड
8. श्री कल्लीपट्टी रामासामी पलानीस्वामी- दवा- तमिलनाडु
9. श्री ममूटी- कला- केरल
10. डॉ. नोरी दत्तात्रेयुडु- दवा- संयुक्त राज्य अमेरिका
11. श्री पीयूष पांडे (मरणोपरांत)- कला- महाराष्ट्र
12. श्री एस के एम मैइलानंदन- सामाजिक कार्य- तमिलनाडु
13. श्री शतावधानी आर गणेश- कला- कर्नाटक
14. श्री शिबू सोरेन (मरणोपरांत)- सार्वजनिक मामले- झारखंड
 15. श्री उदय कोटक- व्यापार और उद्योग- महाराष्ट्र
 16. श्री वी. के. मल्होत्रा ​​(मरणोपरांत)- सार्वजनिक मामले- दिल्ली
 17. श्री वेल्लापल्ली नटेसन- सार्वजनिक मामले- केरल
 18. श्री विजय अमृतराज- खेल- संयुक्त राज्य अमेरिका
पद्मश्री- 113
19. श्री ए ई मुथुनायगम- विज्ञान और इंजीनियरिंग- केरल
20. श्री अनिल कुमार रस्तोगी- कला- उत्तर प्रदेश
21. श्री अंके गौड़ा एम- सामाजिक कार्य- कर्नाटक
22. सुश्री आर्मिडा फर्नांडीज- दवा- महाराष्ट्र
23. श्री अरविन्द वैद्य- कला- गुजरात
24. श्री अशोक खाडे- व्यापार और उद्योग- महाराष्ट्र
25. श्री अशोक कुमार सिंह- विज्ञान और इंजीनियरिंग- उत्तर प्रदेश
26. श्री अशोक कुमार हलधर- साहित्य और शिक्षा- पश्चिम बंगाल
27. श्री बलदेव सिंह- खेल- पंजाब
28. श्री भगवानदास रायकवार- खेल- मध्य प्रदेश
29. श्री भरत सिंह भारती- कला- बिहार
30. श्री भिकल्या लाडक्या ढिंडा- कला- महाराष्ट्र
31. श्री विश्व बंधु (मरणोपरांत)- कला- बिहार
32. श्री बृज लाल भट्ट- सामाजिक कार्य- जम्मू और कश्मीर
33. श्री बुद्ध रश्मी मणि- अन्य पुरातत्व- उत्तर प्रदेश
34. डॉक्टर बुधरी ताती- सामाजिक कार्य- छत्तीसगढ़
35. श्री चंद्रमौली गद्दामनुगु- विज्ञान और इंजीनियरिंग- तेलंगाना
36. श्री चरण हेम्ब्रम- साहित्य और शिक्षा- ओडिशा
37. श्री चिरंजी लाल यादव- कला- उत्तर प्रदेश
38. सुश्री दीपिका रेड्डी- कला- तेलंगाना
39. श्री धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या- कला- गुजरात
40. श्री गड्डे बाबू राजेंद्र प्रसाद- कला- आंध्र प्रदेश
41. श्री ग़फ़रुद्दीन मेवाती जोगी- कला- राजस्थान
42. श्री गंभीर सिंह योनज़ोन- साहित्य और शिक्षा- पश्चिम बंगाल
43. श्री गरिमेला बालकृष्ण प्रसाद (मरणोपरांत)- कला- आंध्र प्रदेश
44. सुश्री गायत्री बालासुब्रमण्यम और सुश्री रंजनी बालासुब्रमण्यम (द्वय)- कला- तमिलनाडु
45. श्री गोपाल जी त्रिवेदी- विज्ञान और इंजीनियरिंग- बिहार
46. श्री गुडुरु वेंकट राव- दवा- तेलंगाना
47. श्री एच वी हांडे- दवा- तमिलनाडु
48. श्री हैली वार- सामाजिक कार्य- मेघालय
49. श्री हरि माधब मुखोपाध्याय (मरणोपरांत)- कला- पश्चिम बंगाल
50. श्री हरिचरण सैकिया- कला- असम
51. सुश्री हरमनप्रीत कौर भुल्लर- खेल- पंजाब
52. श्री इंद्रजीत सिंह सिद्धू- सामाजिक कार्य- चंडीगढ़
53. श्री जनार्दन बापुराव बोथे-सामाजिक कार्य-महाराष्ट्र
54. श्री जोगेश देउरी- अन्य कृषि- असम
55. श्री जूजर वासी- विज्ञान और इंजीनियरिंग- महाराष्ट्र
56. श्री ज्योतिष देबनाथ- कला- पश्चिम बंगाल
57. श्री के पजानिवेल- खेल- पुदुचेरी
58. श्री के रामासामी- विज्ञान और इंजीनियरिंग- तमिलनाडु
59. श्री के विजय कुमार- सिविल सेवा- तमिलनाडु
60. श्री कवीन्द्र पुरकायस्थ (मरणोपरांत)- सार्वजनिक मामले- असम
61. श्री कैलाश चन्द्र पन्त- साहित्य और शिक्षा- मध्य प्रदेश
62. सुश्री कलामंडलम विमला मेनन- कला- केरल
63. श्री केवल कृष्ण ठकराल- दवा- उत्तर प्रदेश
64. श्री खेम राज सुन्दरियाल- कला- हरियाणा
65. सुश्री कोल्लाकल देवकी अम्मा जी- सामाजिक कार्य- केरल
66. श्री कृष्णमूर्ति बालासुब्रमण्यम- विज्ञान और इंजीनियरिंग- तेलंगाना
67. श्री कुमार बोस- कला- पश्चिम बंगाल
68. श्री कुमारसामी थंगराज- विज्ञान और इंजीनियरिंग- तेलंगाना
69. प्रोफ़ेसर लार्स-क्रिश्चियन कोच- कला- जर्मनी
70. सुश्री ल्यूडमिला विक्टोरोवना खोखलोवा- साहित्य और शिक्षा- रूस
71. श्री माधवन रंगनाथन- कला- महाराष्ट्र
72. श्री मगंती मुरली मोहन- कला- आंध्र प्रदेश
73. श्री महेंद्र कुमार मिश्र- साहित्य और शिक्षा- ओडिशा
74. श्री महेंद्र नाथ राय- साहित्य और शिक्षा- पश्चिम बंगाल
75. श्री ममीडाला जगदेश कुमार- साहित्य और शिक्षा- दिल्ली
76. सुश्री मंगला कपूर- साहित्य और शिक्षा- उत्तर प्रदेश
77. श्री मीर हाजीभाई कासमभाई- कला- गुजरात
78. श्री मोहन नगर- सामाजिक कार्य- मध्य प्रदेश
79. श्री नारायण व्यास- अन्य पुरातत्व- मध्य प्रदेश
80. श्री नरेश चंद्र देव वर्मा- साहित्य और शिक्षा- त्रिपुरा
81. श्री नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला- सामाजिक कार्य- गुजरात
82. श्री नूरुद्दीन अहमद- कला- असम
83. श्री ओथुवर थिरुथानी स्वामीनाथन- कला- तमिलनाडु
84. डॉ. पद्मा गुरमेत- दवा- लद्दाख़
85. श्री पलकोंडा विजय आनंद रेड्डी- दवा- तेलंगाना
86. सुश्री पोखिला लेकथेपी- कला- असम
87. डॉक्टर प्रभाकर बसवप्रभु कोरे- साहित्य और शिक्षा- कर्नाटक
88. श्री प्रतीक शर्मा- दवा- संयुक्त राज्य अमेरिका
89. श्री प्रवीण कुमार- खेल- उत्तर प्रदेश
90. श्री प्रेम लाल गौतम- विज्ञान और इंजीनियरिंग- हिमाचल प्रदेश
91. श्री प्रोसेनजीत चटर्जी- कला- पश्चिम बंगाल
92. डॉ. पुन्नियामूर्ति नटेसन- दवा- तमिलनाडु
93. श्री आर कृष्णन (मरणोपरांत)- कला- तमिलनाडु
94. श्री आर वी एस मणि- सिविल सेवा- दिल्ली
95. श्री रबीलाल टुडू- साहित्य और शिक्षा- पश्चिम बंगाल
96. श्री रघुपत सिंह (मरणोपरांत)- अन्य कृषि- उत्तर प्रदेश।
97. श्री रघुवीर तुकाराम खेडकर- कला- महाराष्ट्र
98. श्री राजस्तपति कलिअप्पा गौंडर- कला- तमिलनाडु
99. श्री राजेंद्र प्रसाद- दवा- उत्तर प्रदेश
100. श्री राम रेड्डी ममिदी (मरणोपरांत)- अन्य पशु पशुपालन- तेलंगाना
101. श्री राममूर्ति श्रीधर- अन्य रेडियो प्रसारण- दिल्ली
102. श्री रामचन्द्र गोडबोले एवं सुश्री सुनीता गोडबोले (द्वय)- दवा- छत्तीसगढ़
103. श्री रतिलाल बोरिसागर- साहित्य और शिक्षा- गुजरात
104. श्री रोहित शर्मा- खेल- महाराष्ट्र
105. सुश्री एस जी सुशीलम्मा- सामाजिक कार्य- कर्नाटक
106. श्री संग्युसांग एस पोन्गेनर- कला- नगालैंड
107. संत निरंजन दास- अन्य आध्यात्मवाद- पंजाब
108. श्री शरत कुमार पात्रा- कला- ओडिशा
109. श्री सरोज मंडल- दवा- पश्चिम बंगाल
110. श्री सतीश शाह (मरणोपरांत)- कला- महाराष्ट्र
111. श्री सत्यनारायण नुवाल- व्यापार और उद्योग- महाराष्ट्र
112. सुश्री सविता पुनिया- खेल- हरियाणा
113. प्रोफ़ेसर शफ़ी शौक़- साहित्य और शिक्षा- जम्मू और कश्मीर
114. श्री शशि शेखर वेम्पति- साहित्य और शिक्षा- कर्नाटक
115. श्री श्रीरंग देवबा लाड- अन्य कृषि- महाराष्ट्र
116. सुश्री शुभा वेंकटेश अयंगर- विज्ञान और इंजीनियरिंग- कर्नाटक
117. श्री श्याम सुन्दर- दवा- उत्तर प्रदेश
118. श्री सीमांचल पात्रो- कला- ओडिशा
119. सुश्री शिवशंकरी- साहित्य और शिक्षा- तमिलनाडु
120. डॉ. सुरेश हनागावडी- दवा- कर्नाटक
121. स्वामी ब्रह्मदेव जी महाराज- सामाजिक कार्य- राजस्थान
122. श्री टी.टी.जगन्नाथन (मरणोपरांत)- व्यापार और उद्योग- कर्नाटक
123. श्री तगा राम भील- कला- राजस्थान
124. श्री तरूण भट्टाचार्य- कला- पश्चिम बंगाल
125. श्री तेची गुबिन- सामाजिक कार्य- अरुणाचल प्रदेश
126. श्री तिरुवरूर बक्तवत्सलम- कला- तमिलनाडु
127. सुश्री तृप्ति मुखर्जी- कला- पश्चिम बंगाल
128. श्री वीझिनाथन कामकोटि- विज्ञान और इंजीनियरिंग- तमिलनाडु
129. श्री वेम्पति कुटुम्बा शास्त्री- साहित्य और शिक्षा- आंध्र प्रदेश
13. श्री व्लादिमीर मेस्टविरिश्विली (मरणोपरांत)- खेल- जॉर्जिया
131. श्री युमनाम जात्रा सिंह (मरणोपरांत)- कला- मणिपुर


डॉ. फ़िरदौस ख़ास 
पर्यटन भी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा है. कुछ लोग क़ुदरत की ख़ूबसूरती निहारने के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में जाते हैं, तो कुछ लोगों को अक़ीदत इबादतगाहों और मज़ारों तक ले जाती है. पर्यटन रोज़गार का भी एक बड़ा साधन है. हमारे देश भारत में लाखों लोग पर्यटन से जुड़े हैं. यहां मज़हबी पर्यटन ख़ूब फल-फूल रहा है. हर साल विदेशों से लाखों लोग भारत भ्रमण के लिए आते हैं, जिनमें एक बड़ी तादाद धार्मिक स्थलों पर आने वाले ज़ायरीनों यानी पर्यटकों की होती है.  

देश की राजधानी दिल्ली में जामा मस्जिद पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है. यह मस्जिद लाल पत्थरों और संगमरमर से बनी हुई है. मुग़ल बादशाह शाहजहां ने इसे बनवाया था. इसके ख़ूबसूरत गुम्बद, शानदार मीनारें और हवादार झरोखे इसे बहुत ही दिलकश बनाते हैं. मस्जिद में उत्तर और दक्षिण के दरवाज़ों से दाख़िल हुआ जा सकता है. पूर्व का दरवाज़ा सिर्फ़ जुमे के दिन ही खुलता है. यह दरवाज़ा शाही परिवार के दाख़िले के लिए हुआ करता था. 

इसके अलावा ज़ायरीन दिल्ली में दरगाहों पर भी हाज़िरी लगाते हैं. यहां बहुत सी दरगाहें अक़ीदत का मर्कज़ हैं, ख़ासकर सूफ़ियाना सिलसिले से जुड़े लोग यहां अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं. यहां महबूबे-इलाही हज़रत शेख़ निजामुद्दीन औलिया और उनके प्यारे मुरीद हज़रत अमीर खुसरो साहब की मज़ारें हैं. ज़ायरीन हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत ख़्वाजा अब्दुल अज़ीज़ बिस्तामी, हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह, हज़रत ख़्वाजा अलीअहमद एहरारी, हज़रत सैयद बदरुद्दीन शाह समरकंदी, हज़रत सैयद महमूद बहार, हज़रत सैयद सदरुद्दीन शाह, हज़रत सैयद आरिफ़ अली शाह, हज़रत सैयद अबुल कासिम सब्ज़वारी, हज़रत सैयद हसन रसूलनुमा, हज़रत सैयद शाह आलम, हज़रत मौलाना शेख़ जमाली और कमाली, हज़रत मौलाना फ़ख़रुद्दीन फ़ख़्र-ए-जहां, हज़रत मौलाना शेख़ मजदुद्दीन हाजी, हज़रत मौलाना नासेहुद्दीन, हज़रत शम्सुल आरफ़ीन तुर्कमान शाह, हज़रत शाह तुर्कमान बयाबानी सुहरवर्दी, हज़रत शाह सरमद शहीद, हज़रत शाह सादुल्लाह गुलशन, हज़रत शाह वलीउल्लाह, हज़रत शाह मुहम्मद आफ़ाक़, हज़रत शाह साबिर अली चिश्ती साबरी, हज़रत शेख़ सैयद जलालुद्दीन चिश्ती, हज़रत शेख़ कबीरुद्दीन औलिया, हज़रत शेख़ जैनुद्दीन अली, हज़रत शेख़ यूसुफ़ कत्ताल, हज़रत शेख़ नसीरुद्दीन महमूद चिराग़-ए-देहली, ख़लीफ़ा शेख़ चिराग़-ए-देहली, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल चिश्ती, हज़रत शेख़ नूरुद्दीन मलिक यारे-पर्रा, हज़रत शेख़ शम्सुद्दीन औता दुल्लाह, हज़रत शेख़ शहाबुद्दीन आशिक़उल्लाह, हज़रत शेख़ ज़ियाउद्दीन रूमी सुहरवर्दी, हज़रत मख़मूद शेख़ समाउद्दीन सुहरवर्दी, हज़रत शेख़ नजीबुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ रुकनुद्दीन फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ एमादुद्दीन इस्माईल फ़िरदौसी, हज़रत शेख़ उस्मान सय्याह, हज़रत शेख़ सलाहुद्दीन, हज़रत शेख़ अल्लामा कमालुद्दीन, हज़रत शेख़ बाबा फ़रीद (पोते), हज़रत शेख़ अलाउद्दीन, हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन बुख़ारी, हज़रत शेख़ अब्दुलहक़ मुहद्दिस देहलवी, हज़रत शेख़ सुलेमान देहलवी, हज़रत शेख़ मुहम्मद चिश्ती साबरी, हज़रत मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल, हज़रत शेख़ नूर मुहम्मद बदायूंनी, हज़रत शेख़ शाह कलीमुल्लाह, हज़रत शेख़ मुहम्मद फ़रहाद, हज़रत शेख़ मीर मुहम्मदी, हज़रत शेख़ हैदर, हज़रत क़ाज़ी शेख़ हमीदुद्दीन नागौरी, हज़रत अबूबकर तूसी हैदरी, हज़रत नासिरुद्दीन महमूद, हज़रत इमाम ज़ामिन, हज़रत हाफ़िज़ सादुल्लाह नक़्शबंदी, हज़रत शेख़ुल आलेमीन हाजी अताउल्लाह, हज़रत मिर्ज़ा मुल्लाह मज़हर जाने-जानां, हज़रत मीरानशाह नानू और शाह जलाल, हज़रत अब्दुस्सलाम फ़रीदी, हज़रत ख़ुदानुमा, हज़रत नूरनुमा और हज़रत मख़दूम रहमतुल्लाह अलैह की मज़ारों पर भी जाते हैं. यहां हज़रत बीबी हंबल साहिबा, हज़रत बीबी फ़ातिमा साम और हज़रत बीबी ज़ुलैख़ा की मज़ारें भी हैं, जहां महिला ज़ायरीन जाती हैं. यहां पंजा शरीफ़, शाहेमर्दां, क़दम शरीफ़ और चिल्लागाह पर भी ज़ायरीन हाज़िरी लगाते हैं. 

यूं तो हर रोज़ ही मज़ारों पर ज़ायरीनों की भीड़ होती है, लेकिन जुमेरात के दिन यहां का माहौल कुछ अलग ही होता है. क़व्वाल क़व्वालियां गाते हैं. दरगाह के अहाते में अगरबत्तियों की भीनी-भीनी महक और उनका आसमान की तरफ़ उठता सफ़ेद धुआं कितना भला लगता है. ज़ायरीनों के हाथों में फूलों और तबर्रुक की तबाक़ होते हैं. मज़ारों के चारों तरफ़ बनी जालियों के पास बैठी औरतें क़ुरान शरीफ़ की सूरतें पढ़ रही होती हैं. कोई औरत जालियों में मन्नत के धागे बांध रही होती है, तो कोई दुआएं मांग रही होती है. 

राजस्थान के अजमेर में ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह का मज़ार है. ख़्वाजा अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. ख़्वाजा की वजह से अजमेर को अजमेर शरीफ़ भी कहा जाता है. सूफ़ीवाद का चिश्तिया तरीक़ा हज़रत अबू इसहाक़ शामी ने ईरान के शहर चश्त में शुरू किया था. इसलिए इस तरीक़े या सिलसिले का नाम चिश्तिया पड़ गया. जब ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह हिन्दुस्तान आए, तो उन्होंने इसे दूर-दूर तक फैला दिया. हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी चिश्तिया सिलसिला ख़ूब फलफूल रहा है. दरअसल यह सिलसिला भी दूसरे सिलसिलों की तरह ही दुनियाभर में फैला हुआ है. यहां भी दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.     

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सैयद हाजी अली शाह बुख़ारी का मज़ार है. हाजी अली भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. यह मज़ार मुम्बई के वर्ली तट के क़रीब एक टापू पर बनी मस्जिद के अन्दर है. सफ़ेद रंग की यह मस्जिद बहुत ही ख़ूबसूरत लगती है. मुख्य सड़क से मज़ार तक जाने के लिए एक पुल बना हुआ है. इसके दोनों तरफ़ समन्दर है. शाम के वक़्त समन्दर का पानी ऊपर आने लगता है और यह पुल पानी में डूब जाता है. सुबह होते ही पानी उतरने लगता है. यहां भी हिन्दुस्तान के कोने-कोने के अलावा दुनियाभर से ज़ायरीन आते हैं.

हरियाणा के पानीपत शहर में शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर का मज़ार है. यह मज़ार एक मक़बरे के अन्दर है, जो साढ़े सात सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है. कहा जाता है कि शेख़ शराफ़ुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह ने लम्बे अरसे तक पानी में खड़े होकर इबादत की थी. जब उनकी इबादत क़ुबूल हुई, तो उन्हें बू अली का ख़िताब मिला. दुनिया में अब तक सिर्फ़ साढ़े तीन क़लन्दर हुए हैं. शेख़ शराफ़ुद्दीन बू अली क़लंदर, लाल शाहबाज़ क़लंदर और शम्स अली कलंदर. हज़रत राबिया बसरी भी क़लंदर हैं, लेकिन औरत होने की वजह से उन्हें आधा क़लंदर माना जाता है. बू अली क़लंदर रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार के क़रीब ही उनके मुरीद हज़रत मुबारक अली शाह का भी मज़ार है. यहां भी दूर-दूर से ज़ायरीन आते हैं.  

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवा नामक क़स्बे में हाजी वारिस अली शाह का मज़ार है. आप अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. उनके वालिद क़ुर्बान अल्ली शाह भी जाने-माने औलिया थे.     

उत्तर प्रदेश के ही कानपुर ज़िले के गांव मकनपुर में हज़रत बदीउद्दीन शाह ज़िन्दा क़ुतबुल मदार का मज़ार है. 
इनके बारे में कहा जाता है कि ये योगी दुर्वेश थे और अकसर योग के ज़रिये महीनों साधना में रहते थे. एक बार वह योग समाधि में ऐसे लीन हुए कि लम्बे अरसे से तक उठे नहीं. उनके मुरीदों ने समझा कि उनका विसाल हो गया है. उन्होंने हज़रत बदीउद्दीन शाह को दफ़न कर दिया. दफ़न होने के बाद उन्होंने सांस ली. उनके मुरीद यह देखकर हैरान रह गए कि वे ज़िन्दा हैं. वे क़ब्र खोदकर उन्हें निकालने वाले ही थे, तभी एक बुज़ुर्ग ने हज़रत बदीउद्दीन शाह से मुख़ातिब होकर कहा कि दम न मार यानी अब तुम ज़िन्दा ही दफ़न हो जाओ. फिर उस क़ब्र को ऐसे ही छोड़ दिया गया. इसलिए उन्हें ज़िन्दा पीर भी कहा जाता है. आपकी उम्र मुबारक तक़रीबन छह सौ साल थी.    

इनके अलावा देशभर में और भी औलियाओं की मज़ारें हैं, जहां दूर-दराज़ के इलाक़ों से ज़ायरीन आते हैं और सुकून हासिल करते हैं. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)


लाल बिहारी लाल
सदियों की गुलामी  के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई। वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है। प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो  लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।

द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक  पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी  मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में  सफेद शांति  का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि  चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग  हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक  । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है। इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास। 
(लेखक-साहित्य टीवी के सम्पादक हैं) 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दर्द से परेशान है. किसी के पूरे जिस्म में दर्द है, किसी की पीठ में दर्द है, किसी के घुटनों में दर्द है और किसी के हाथ-पैरों में दर्द है. हालांकि दर्द की कई वजहें होती हैं. इनमें से एक वजह यूरिक एसिड भी है.  

दरअसल, यूरिक एसिड एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो खाद्य पदार्थों के पाचन से पैदा होता है और इसमें प्यूरिन होता है. जब प्यूरिन टूटता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. किडनी यूरिक एसिड को फ़िल्टर करके इसे पेशाब के ज़रिये जिस्म से बाहर निकाल देती है. जब कोई व्यक्ति अपने खाने में ज़्यादा मात्रा में प्यूरिक का इस्तेमाल करता है, तो उसका जिस्म यूरिक एसिड को उस तेज़ी से जिस्म से बाहर नहीं निकाल पाता. इस वजह से जिस्म में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. ऐसी हालत में यूरिक एसिड ख़ून के ज़रिये पूरे जिस्म में फैलने लगता है और यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों में जमा हो जाते हैं, जिससे जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से गठिया भी हो जाता है. जिस्म में असहनीय दर्द होता है. इससे किडनी में पथरी भी हो जाती है. इसकी वजह से पेशाब संबंधी बीमारियां पैदा हो जाती हैं. मूत्राशय में असहनीय दर्द होता है और पेशाब में जलन होती है. पेशाब बार-बार आता है. यह यूरिक एसिड स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देता है. 

यूरिक एसिड से बचने के लिए अपने खान-पान पर ख़ास तवज्जो दें. दाल पकाते वक़्त उसमें से झाग निकाल दें. कोशिश करें कि दाल कम इस्तेमाल करें. बिना छिलकों वाली दालों का इस्तेमाल करना बेहतर है. रात के वक़्त दाल, चावल और दही आदि खाने से परहेज़ करें. हो सके तो फ़ाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें.  
जौ 
यूरिक एसिड से निजात पाने के लिए जौ का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें. जौ की ख़ासियत है कि यह यूरिक एसिड को सोख लेता है और उसे जिस्म से बाहर करने में कारगर है. इसलिए जौ को अपने रोज़मर्रा के खाने में ज़रूर शामिल करें. गर्मियों के मौसम में जौ का सत्तू पी सकते हैं, जौ का दलिया बना सकते हैं, जौ के आटे की रोटी बनाई जा सकती है.
ज़ीरा
यूरिक एसिड के मरीज़ों के लिए ज़ीरा भी बहुत फ़ायदेमंद है. ज़ीरे में आयरन, कैल्शियम, ज़िंक और फ़ॉस्फ़ोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट उच्च मात्रा में मौजूद होता है, जो यूरिक एसिड की वजह से होने वाले जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है. यह टॉक्सिंस को जिस्म से बाहर करने में भी मददगार है.
नींबू
नींबू में मौजूद साइट्रिक एसिड शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ने से रोकता है. इसलिए नींबू का इस्तेमाल करना चाहिए. 
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें. 
   


फूल पलाश के
वक़्त के समन्दर में
यादों का जज़ीरा हैं
जिसके हर ज़र्रे में
ख़्वाबों की धनक फूटती है
फ़िज़ाओं में
चाहत के गुलाब महकते हैं
जिसकी हवायें 
रूमानी नगमें गुनगुनाती हैं
जिसके जाड़ों पर
क़ुर्बतों का कोहरा छाया होता है
जिसकी गर्मियों में
तमन्नायें अंगडाइयां लेती हैं
जिसकी बरसात
रफ़ाक़तों से भीगी होती है
फूल पलाश के
इक उम्र का
हसीन सरमाया ही तो हैं...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... मौसम पर एक नज़्म पेश है...
दहकते पलाश का मौसम...
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में 
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से 
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और 
गुलाबी शामें 
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं. 

पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है.  एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं. 

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है. इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है. 

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं. 
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.


आया बसंत फल फूलने लगे
सिमटे हुए तन, ठहरे हुए मन
मंद -मंद झोंकों में झूमने लगे

कुहू-कुहू पीहू पीहू होने लगी
चेतना हरेक मन की खोने लगी
गाने लगे, गुनगुनाने लगे
सब अपनी मस्ती में झूमने लगे
आया बसंत फल-फूलने लगे

बागों में कलियां,चटकने लगी
वृक्षों की शाखें, मटकने लगी
हंसे फूल और येभंवरे तितलियां
फूलों के अधरों को चूमने लगे
आया बसंत फल फूलने लगे

सतरंगी फूलों की माला लिए
हाथों में मकरंदी प्याला लिए
आते हैं हर साल वैसे यह दिन
अबकी बार और भी ये घने लगे
आया बसंत फल फूलने लगे
-सत्यपाल सत्यम


यश मालवीय 
मेरा यह अनुभव रहा है कि जब जब मन उदास होने होने को होता है कि ज़ेहन के बंद दरवाजों पर वसंत दस्तक सी देने लगता है और मन कभी गेंदे के फूलों की तरह,तो कभी सरसों के फूलों की तरह खिल उठता है, खिल उठती है अंतरात्मा, गुनगुनाने लगता है मौसम, पिया वसंती रे...। दरअसल वसंत, फागुन की ही भूमिका है और इस भूमिका से हम सबकी भूमिकाएं अपनी अपनी तरह से जुड़ जाती हैं और हमारी रहगुज़र ही फूलों की घाटी सी खुशबू के बादल उठाने लगती है । भीगने लगते हैं हमारे मन प्राण। एक वासंती आलोक की रेशमी परिधि हमें अपने दायरे में लेने लगती है । पत्ती पत्ती में आंखें उग आती हैं और वो हमें अनुराग भरी आंखों से निहारने लगती हैं, हमारे अन्तर में कुछ पिघलने सा लगता है। एक अलौकिक अनुभूति होती है। ऐसा महसूस होने लगता है कि यह संपूर्ण प्रकृति ही एक कविता हो गई है,जिसे वसंत अपने थरथराते अधरों से बांच रहा है , सुगन्ध की एक नदी सी प्रवहमान हो उठती है, तटों पर उत्सव का कलरव सा छा जाता है।
सचमुच यह ऋतु सरसों के फूलों की पीली हल्दी से नहाई चिट्ठियां ही लिख रही है और ऋतुराज के सिर पर पीली पगड़ी से दिन शोभित होने लगे हैं। प्रियतम के मन में मोतीचूर के लड्डू चूर चूर होकर यानी फूट फूटकर मिठास घोल रहे हैं और ज़िंदगी का ज़ायका ही बदल गया है।
यह केवल ऋतु का बदलना नहीं, हमारे मन का बदलना भी है। एकरस हो गए समय का रस से सराबोर हो जाना भी है। आत्मा तक पैठी ठंड की यह विदा हो जाने की बेला है । पूस की रात बीत चुकी है। शुभ दिन धीरे धीरे कदम आगे बढ़ा रहे हैं। ऊन पर रेशम भारी पड़ रहा है। ऊनी यादों का मौसम जा रहा है, सूती समय आ रहा है। एक कहावत याद आ रही है, माघ तिलातिल बाढ़े, फागुन गोड़ी काढ़े। वास्तव में फागुन गोड़ी काढ़ रहा है, संध्या सुंदरी भी बाल काढ़ रही है। उसके बालों में सिंदूरी कंघा फंसा हुआ है, जैसे दूर दूर तक फैली नदी की लहरों पर पुल कंघे की तरह कसा हुआ है। न चुकने वाली यादों की एक तहसील सी  बस रही है, दोहा याद आ रहा है
दूर दूर तक बिछ गई, सरसों मीलों मील 
बसते बसते बस गई, यादों की तहसील।।
आमों पर बौर आने शुरू हो गए हैं। कोयलों का स्वर संधान आहट देने लगा है। सब कुछ गुलाबी गुलाबी सा है । फरवरी फरफरा रही है । मटर की मुठ्ठी कस रही है। घरैतिन घुघनी बना रही है। चाय में भी मदिर मदिर मामला सांस ले रहा है। अंशु की कविता याद आ रही है, जिसमें वो कहता है
जाने क्या होता है
उन उंगलियों की मादक छुवन में 
कि चाय शराब के आगे खड़ी हो जाती है ।
ऐसा ही कुछ है। कविवर नीरज की आवाज़ कहीं से गूंज रही है
शोखियों में घोला जाए फूलों का शवाब
उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब
होगा वो नशा जो तैयार, वो प्यार है।
वसन्त प्यार का ही मौसम है। भर मुंह कहता है, जो प्यार पा जाए उसका भी भला, जो न पाए उसका भी भला। उसका काम तो प्यार बांटना है, वह तो प्रेम का अग्रदूत है
ऐ इश्क़ कहीं ले चल, ये दैरो हरम छूटें 
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है।
तभी तो कविता के किसान कैलाश गौतम को कहना पड़ता है
लगे फूंकने कान में, बौर गुलाबी शंख
कैसे रहें क़िताब में, हम मयूर के पंख।।
वसंत की कोई भी बात बिना निराला के कैसे पूरी हो सकती है, वह तो हिन्दी कविता के वसन्त हैं। महाप्राण निराला वसन्त पंचमी पर ही अपना जन्मदिन मनाते थे। हमारा शहर इलाहाबाद उनका जन्मदिन भी मनाने जा रहा है। उनकी रची सरस्वती वंदना में गंगा यमुना के बीच लुप्त हुई सरस्वती उजागर होने जा रही है, स्वर फूट रहे हैं 
वर दे वीणावादिनि 
वर दे
प्रिय स्वतंत्र रव,अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे
वर दे! वीणावादिनि वर दे!!


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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