डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
माहे रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार पकवानों की बहार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ पकवानों के बग़ैर मुकम्मल ही नहीं होता. रमज़ान का ख़ास पकवान है फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है. अमूमन रोज़ा खजूर से ही खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों की चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले हुए मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ पकवान शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ौरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में मुरादाबादी बिरयानी और हैदराबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़्वान की ज़ीनत बढ़ाते हैं.

जन्नत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगवाना ज़्यादा पसंद करते हैं. रोज़े की हालत में देर तक बावर्चीख़ाने में आंच के पास खड़ा नहीं हुआ जाता. इससे प्यास की शिद्दत बढ़ जाती है और कभी-कभार चक्कर भी आने लगते हैं.     

वज़न और मर्ज़ का बढ़ना 
रमज़ान में महीनेभर रोज़े रखे जाते हैं. रोज़ेदार दिनभर भूखे और प्यासे रहते हैं. इसके बावजूद देखने में आता है कि बहुत से लोगों के वज़न में इज़ाफ़ा हो जाता है. इतना ही नहीं, शुगर भी बहुत बढ़ जाती है. जिन लोगों को शुगर नहीं है, उनके ख़ून में भी शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. और जिन्हें शुगर है, उनकी हालत तो बहुत ही बुरी हो जाती है. बहुत से लोगों को तो अस्पताल में दाख़िल होना पड़ जाता है. इसकी वजह ये है कि वे अपने खाने-पीने पर तवज्जो नहीं देते. रमज़ान में इफ़्तारी में शर्बत पिये जाते हैं, तरबूज़ और ख़रबूज़े खाए जाते हैं. फलों की चाट खाई जाती है. दिल्ली में बनने वाली फलों की चाट को कचालू कहा जाता है. इसमें कई तरह के फल शामिल होते हैं. इसमें चाट मसाले के साथ बहुत सी शक्कर भी मिलाई जाती है, जिससे इसकी मिठास बहुत बढ़ जाती है. इफ़्तारी में जलेबियां भी शामिल होती हैं, जो शीरे में तर होती हैं. फिर सहरी में दूध जलेबी, खजला, फैनी, मीठी डबल रोटी खाई जाती है. मीठा दूध पिया जाता है. अब जब इतना मीठा खाया जाएगा, तो शुगर बढ़ना तो लाज़िमी ही है.

चिकित्सकों का कहना है कि रमज़ान में मीठे का इस्तेमाल ज़्यादा होने की वजह से शुगर बढ़ जाती है. ईद के आसपास जो भी व्यक्ति शुगर की जांच करवाता है, तो उसकी शुगर बढ़ी हुई आती है. अकसर लोग रिपोर्ट देखकर डर जाते हैं और गुमान करते हैं कि उन्हें शुगर का मर्ज़ हो गया है, जबकि ऐसा नहीं होता. इसलिए ईद के 20-25 दिन बाद ही शुगर की जांच करवानी चाहिए, तभी ख़ून में शुगर की सही मात्रा का पता चल सकेगा.   
             
इसी तरह इफ़्तारी में पकौड़े, समौसे, कचौरियां, कबाब और तले हुए पापड़ वग़ैरह ख़ूब खाए जाते हैं. इनमें तेल का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी हालत में वज़न बढ़ना तो तय है. इसलिए रमज़ान में खान-पान पर ख़ास तवज्जो देकर सेहत संबंधी परेशानियों से बचा जा सकता है.  

क्या खायें 
अल्लाह ने इंसानों को ख़ूब रिज़्क़ अता किया है, जिसमें तमाम तरह के फल, मेवे, सब्ज़ियां, अनाज और गोश्त शामिल है. इनमें से इंसान को वही चीज़ें खाने का हुक्म है, जो हलाल क़रार दी गई हैं.  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और जो हलाल पाकीज़ा रिज़्क़ अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ व पियो और अल्लाह से डरते रहो, जिस पर तुम ईमान रखते हो.”
(क़ुरआन 5:88)

खाने के भी आदाब हुआ करते हैं. जो निवाला हम खाते हैं, वह कितने ही मरहलों से गुज़र कर हम तक पहुंचता है. अनाज, सब्ज़ियां, फल और मेवे खेतों और बाग़ों से होते हुए बाज़ार पहुंचते हैं और फिर न जाने कितने हाथों से होकर हमारे दस्तरख़्वान तक आते हैं. इन्हें अपने दस्तरख़्वान तक लाने के लिए हमें कितनी मेहनत करनी पड़ती है. ये खाना ही तो है, जिसके लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है और देस से परदेस जाता है, अपना घर-परिवार छोड़कर न जाने कहां-कहां की ख़ाक छानता फिरता है. इसलिए वक़्त पर जो खाना मिले, अल्लाह का शुक्र अदा करके उसे खा लेना चाहिए. खाने में ऐब नहीं निकालने चाहिए. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने परवरदिगार के ज़िक्र के साथ खाना नोश फ़रमाया करते थे. बन्दा जब खाना खाता है, तो उसे इस बात का अहसास होना चाहिए कि ये रिज़्क़ अल्लाह ने अता किया है. ये उसका हम पर कितना बड़ा करम है कि वह अपने बन्दों को रिज़्क़ देना नहीं भूलता. 

खाना ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खाना चाहिए. अकसर लोग कहते हैं कि पेट भर गया, लेकिन नीयत नहीं भरी, इसलिए ज़्यादा खाना खा लिया. अगर इतना ही खाना खाए जाए, जितनी जिस्म को ज़रूरत है, तो ये सेहत के लिए बेहतर है. पेट का एक तिहाई हिस्सा खाने के लिए, एक तिहाई पानी के लिए और एक तिहाई हवा के लिए रखना चाहिए. जब भूख लगे, तभी खाना चाहिए और थोड़ी सी भूख बाक़ी रहने पर खाना छोड़ देना चाहिए. ऐसा करने से जो कुछ खाया है, वह जिस्म को लगेगा और सेहत भी अच्छी रहेगी. 

सहरी के वक़्त ऐसी चीज़ें खानी चाहिए, जिससे दिनभर जिस्म को ताक़त मिलती रहे. इसलिए सहरी में प्रोटीन और फ़ाइबर से भरपूर चीज़ें खानी चाहिए. इन्हें खाने से लम्बे वक़्त तक प्यास और भूख नहीं लगती. इस दौरान ज़्यादा से ज़्यादा दूध पीना चाहिए. पानी भी ख़ूब पीना चाहिए, ताकि प्यास की शिद्दत देर से शरू हो. सहरी में खजूर खाना भी बहुत ही मुफ़ीद है.  

एक हदीस में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “खजूर बेहतरीन सहरी है.“ एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ”खजूर मोमिन की अच्छी सेहरी है.“ 

इंसान के जिस्म में बहुत से ज़हरीले तत्व इकट्ठे होते रहते हैं, जिससे कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “नाश्ते में खजूर खाओ, ताकि तुम्हारे जिस्म में मौजूद जरासीम का ख़ात्मा हो जाए. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिस शख़्स ने नहार मुंह अज्वा खजूर के सात दाने खाए, उस दिन उसे न कोई ज़हर नुक़सान पहुंचाएगा और न कोई जादू.”
(मुस्लिम, अबू दाऊद)   

खजूर इफ़्तारी की जान है. इसके बिना इफ़्तारी मुकम्मल ही नहीं होती. खजूर फल भी है और मेवा भी है. इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, प्रोटीन, मैंगनीज़, मैग्नीशियम, फ़ॉस्फ़ोरस, विटामिन बी6, विटामिन ए, विटामिन के और फ़ाइबर आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे जिस्म को बीमारियों से बचाते हैं. खजूर की तरह अंगूर भी फल और मेवा दोनों ही तौर पर बेहद फ़ायदेमंद है. तरबूज़ रोज़े के दौरान जिस्म में हुई पानी की कमी को पूरा करता है. 

क्या न खाएं 
रमज़ान में अल्लाह रिज़्क़ में इज़ाफ़ा कर देता है. इसलिए अल्लाह की अता की हुई हर नेअमत चखें. लेकिन इस बात का ख़्याल रखें कि इतना ही खाएं, जितनी ज़रूरत हो. जिन लोगों को शुगर है, उन्हें मीठा खाने से परहेज़ करना चाहिए. रक्तचाप के मरीज़ों को भी अपनी सेहत का ख़्याल रखते हुए ऐसी चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए, जिनसे उनका रक्तचाप बढ़ सकता है. जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है, उन्हें तले हुए खाने से बचना चाहिए. ऐसा न करने पर उन्हें हृदय संबंधी समस्या हो सकती है. दिल के मरीज़ों को भी तली हुई और मसालेदार चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए. थायरॉइड के मरीज़ भी खाने पीने का ख़ास ख़्याल रखें. जिन लोगों का वज़न बहुत ज़्यादा है, उन्हें तली हुई और मिर्च-मसालेदार चीज़ों से दूर रहना चाहिए, वरना उनके वज़न में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो जाएगा, जो उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. 

जो लोग नियमित रूप से दवाएं खा रहे हैं, उन्हें सहरी में और इफ़्तार के बाद फ़ौरन दवा खा लेनी चाहिए. बेहतर होगा कि जो लोग किसी बीमारी में मुब्तिला हैं, वे चिकित्सक की सलाह पर ही रोज़ा रखने का फ़ैसला करें. वैसे भी अल्लाह ने बीमारी की हालत में रोज़ा रखने में छूट दी है. अगर कोई शख़्स बीमारी या ऐसी ही किसी और वजह से रोज़ा रखने की ताक़त न रखता हो, तो उस पर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.

ख़ास बात ये भी है कि खाना खाते वक़्त पानी न पिया जाए. खाना खाने के कम से कम आधे घंटे बाद पानी पीना चाहिए. लेकिन इफ़्तार के वक़्त ऐसा नहीं हो पाता. प्यास की शिद्दत की वजह से रोज़ेदार एक साथ बहुत ज़्यादा पानी पी लेते हैं. ऐसा करने से बचना चाहिए, क्योंकि ये सेहत के लिए ठीक नहीं है. कोशिश करें कि घूंट-घूंट पानी पियें. इससे प्यास बुझ जाती है. नीम्बू का शर्बत या शिकंजी बेहतरीन ग़िज़ा है. इससे प्यास भी बुझती है और जिस्म में पोषक तत्वों की कमी भी कुछ हद तक पूरी होती है. 

रमज़ान में ज़्यादा चाय, कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ये सभी चीज़ें जिस्म में मौजूद पानी को सोख लेती हैं. इन चीज़ों से एसिडिटी की समस्या भी हो सकती है. रमज़ान में कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाने से भी बचना चाहिए. वैसे भी कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाकर मस्जिद में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इनकी बू से दूसरों को परेशानी होती है.

सबसे अहम बात ये भी है कि इंसान को सिर्फ़ हलाल रिज़्क़ ही खाना चाहिए. बेईमानी से कमाए गये पैसे से ख़रीदा गया रिज़्क़ हलाल तो नहीं हो सकता. इसलिए ख़ुद को उन कामों से बचाएं, जिन्हें अल्लाह ने हराम क़रार दिया है. अल्लाह ने मेहनत-मशक़्क़त की कमाई में बरकत दी है. बहरहाल, रमज़ान में अपनी सेहत का ख़ास ख़्याल रखें. अगर सेहत सही होगी, तभी तो इबादत भी हो पाएगी. 
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)  
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल   


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान में मसरूफ़ियत बहुत बढ़ जाती है. देर तक जागने की वजह से कई बार सहरी के वक़्त आंख नहीं खुल पाती. ऐसे में लोग बिना सहरी खाये ही रोज़ा रख लेते हैं. अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या बिना सहरी खाये रोज़ा रखा जा सकता है? अगर रखा जा सकता है, तो किन हालात में रखा जा सकता है? क्या सहरी खाना लाज़िमी है? क्या सहरी खाना सुन्नत है? 
  
क़ुरआन में सहरी खाने का हुक्म  
रोज़ेदार को सहरी खाकर ही रोज़ा रखना चाहिए, क्योंकि क़ुरआन करीम में फ़ज्र की अज़ान से पहले सहरी खाने का हुक्म है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, उसे मांगों और खाओ और पियो, यहां तक कि सुबह की सफ़ेद धारी रात की स्याह धारी से अलग होकर आसमान पर नज़र आने लगे.
(क़ुरआन 2:187)

यानी अल्लाह तआला ने सहरी खाने का हुक्म दिया है. जो शख़्स बिना किसी मजबूरी के जानबूझ कर सहरी नहीं खाता, तो उसने सरासर नाफ़रमानी की और नाफ़रमानी करना गुनाह है. क़ुरआन पाक में बार-बार नाफ़रमानी करने वाले लोगों को दोज़ख़ के अज़ाब से ख़बरदार किया गया है.

सहरी खाना सुन्नत है     
हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “हमारे और अहले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों के रोज़ों में फ़र्क़ सहरी के लुक़मे का है.  
(मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)

यानी मुसलमान सहरी के वक़्त खाना खाते हैं, जबकि यहूदी और ईसाई सहरी के वक़्त खाना नहीं खाते और बिना सहरी खाये ही रोज़ा रखते हैं. क़ाबिले ग़ौर यह भी है कि यहूदी और ईसाई आधी रात में रोज़ा शुरू करते हैं यानी वे आधी रात गुज़रने से पहले ही खाना खा लेते हैं. जिस वक़्त मुसलमान सहरी खाते हैं, उस वक़्त वे रोज़े से होते हैं. इसलिए मुसलमानों का सहरी खाना मुस्तहब यानी पसंद किया जाने वाला अमल है. अल्लाह का अता किया हुआ रिज़्क़ खाकर रोज़ा रखना बहुत ही बरकत वाला काम है. सहरी खाना सुन्नत भी है.   

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “सहरी खाओ कि सहरी खाने में बरकत है.” 
(सहीह बुख़ारी)

अगर किसी की नीयत रोज़ा रखने की है और सहरी के वक़्त उसकी आंख न खुले, तो वह बिना सहरी खाये रोज़ा रख सकता है. लेकिन जान बूझकर सहरी छोड़ना मना है और सहरी का बहाना करके रोज़ा छोड़ना भी सही नहीं है.
एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये सहरी बरकत वाला खाना है, जो अल्लाह ने तुम्हें अता किया है, लिहाज़ा इसे छोड़ा मत करो.
(मुसनद अहमद)

सहरी खाने में देर करना मुस्तहब माना गया है. सहरी खाने और नमाज़ शुरू करने के दरमियान नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इतना फ़र्क़ रखते कि जितने वक़्त में आदमी पचास आयतों की तिलावत कर सकता है. 
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि हमने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सहरी खायी और उसके बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ के लिए गए. हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा कि सहरी और अज़ान के बीच कितना फ़ासला था ? उन्होंने जवाब दिया कि पचास आयतें पढ़ने के बराबर.
(सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम)

हज़रत सैयदना यअला बिन मुर्रह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तीन चीज़ों को अल्लाह महबूब रखता है. पहली इफ़्तार में जल्दी, दूसरी सहरी में ताख़ीर यानी देर और तीसरी नमाज़ के क़ियाम में हाथ पर हाथ रखना.”

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “सहरी बरकत ही बरकत है. लिहाज़ा इसे तर्क ना करो चाहे पानी का एक घूंट ही लो. दरअसल अल्लाह तआला और उसके फ़रिश्ते सहरी खाने वालों पर सलाम और दुरूद भेजते हैं. 
(मुसनद अहमद)

अब्दुल्लाह बिन हारिस साराह रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक सहाबा ने फ़रमाया कि वे अल्लाह के नबी के पास उस वक़्त पहुंचे, जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहरी कर रहे थे. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “ये अल्लाह की नेअमत है, जो तुम्हें दी गई है, इसलिए सहरी खाया करो” 
(सुनन नसाई)

हज़रत अरबाज़ बिन साराह रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मुझे अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में सहरी खाने के लिए बुलाया और इरशाद फ़रमाया- “बाबरकत ग़िज़ा पर आओ.” 
(अबू दाऊद)

अकसर देखा गया है कि बहुत से लोग देर से उठते हैं और जिस वक़्त वे सहरी खा रहे होते हैं तब अज़ान शुरू हो जाती है. ऐसी हालत में वे जल्दी-जल्दी खाते हैं. बहुत से लोग उन्हें टोकते हैं और तंज़ कसते हैं कि ये अज़ान के साथ-साथ खा रहे हैं. होना तो यही चाहिए कि वे लोग कुछ देर पहले उठ जाया करें, ताकि तसल्ली से सहरी खा लें. उन्हें टोकने वाले लोगों को भी तंज़ नहीं करने चाहिए. उन्हें आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस हदीस पर ग़ौर करना चाहिए.    
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम में से कोई जब फ़ज्र की अज़ान सुने और खाने पीने का बर्तन उसके हाथ में हो, तो उसे अपनी ज़रूरत पूरी किए बग़ैर न रखें.” (अबू दाऊद)

यानी जो लोग सहरी खा रहे हैं और तभी अज़ान शुरू हो जाए, तो हाथ के बर्तन को अपनी ज़रूरत पूरी होने के बाद ही रखें. यानी बर्तन में जो ग़िज़ा है, उसे खाने के बाद ही बर्तन को रखा जाए. ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है.     

अल्लाह तआला सहरी खाने वाले लोगों को इतना पसंद करता है कि उनसे खाने-पीने का हिसाब भी नहीं लिया जाएगा. अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “इंशा अल्लाह तआला तीन लोगों पर खाने में हिसाब नहीं है, जबकि हलाल खाया हो, रोज़ेदार, सहरी खाने वाला और सरहद पर घोड़ा बांधने वाला.     
(तबरानी कबीर)

इसी तरह इफ़्तार में जल्दी करनी चाहिए. ऐसा न हो कि मग़रिब की अज़ान शुरू हो जाए और रोज़ेदार किसी काम में उलझा रहे. इफ़्तार के आदाब ये हैं कि वक़्त पर दस्तरख़्वान पर बैठ जाएं और अल्लाह से दुआ मांगे. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “इफ़्तार के वक़्त रोज़ेदार की दुआ रद्द नहीं होती.” एक हदीस के मुताबिक़ इफ़्तार के वक़्त अल्लाह और रोज़ेदार के दरमियान कोई पर्दा नहीं होता, यानी इस वक़्त बन्दा अल्लाह के बहुत क़रीब होता है. ज़ाहिर है कि ऐसे वक़्त में की गई कोई भी दुआ रद्द नहीं होगी और अपने अंजाम को पहुंचेगी. 
    
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रावी है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया- “मेरे बन्दों में मुझे ज़्यादा प्यारा वह है, जो इफ़्तार मंस जल्दी करता है.”
(अहमद व तिर्मिज़ी)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रावी है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये दीन हमेशा ग़ालिब रहेगा, जब तक लोग इफ़्तार में जल्दी करेंगे और यहूद और नसारा यानी ईसाई देर करेंगे.  
(अबू दाऊद)

इसी बारे में हज़रत सहल इब्ने सअद रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “लोग उस वक़्त तक ख़ैर के साथ रहेंगे, जब तक इफ़्तार करने में जल्दी करते रहेंगे.”
(बुख़ारी, मुस्लिम व तिर्मिज़ी)    

इसकी वजह ये है कि इफ़्तारी में जल्दी करके वे लोग सुन्नत के पाबंद रहेंगे, लेकिन जब वे इस सुन्नत को छोड़ देंगे और इफ़्तार में देर करेंगे, तो यह इस बात की अलामत होगी कि ख़ैर उनसे मुंह फेरने लगी है. ऐसा करके वे उस सुन्नत की मुख़ालफ़त करेंगे, जिस पर अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को छोड़कर गए थे और जिसका उन्हें हुक्म दिया गया था. इस तरह ये लोग नाफ़रमान हो जाएंगे और अल्लाह नाफ़रमानों को पसंद नहीं करता. क़ुरआन करीम में बार-बार ये बात दोहराई गई है.  

सहरी खाना सेहत के लिए बहुत ज़रूरी और फ़ायदेमंद है. चूंकि रोज़े की हालत में दिनभर भूखा और प्यासा रहना पड़ता है, इसलिए सहरी के वक़्त खाना लाज़िमी है. सहरी के वक़्त खजूर खानी चाहिए, क्योंकि खजूर खाना सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खजूर बहुत पसंद थी. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “खजूर बेहतरीन सहरी है.“ एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ”खजूर मोमिन की अच्छी सेहरी है.“ 
ऐसा नहीं है कि सहरी में बहुत ज़्यादा खाना चाहिए. अगर किसी की तबीयत इजाज़त नहीं देती और किसी वजह से खाने का मन नहीं है, तो चार-पांच खजूर खाकर भी रोज़ा रखा जा सकता है. एक गिलास दूध भी पिया जा सकता है. रोटी के चन्द निवाले भी खाये जा सकते हैं. पानी भी पिया जा सकता है.
क़ाबिले ग़ौर है कि खजूर जिस्म के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद ग़िज़ा है. इसमें मौजूद पोषक तत्व जिस्म को क़ूवत देते हैं और बहुत सी बीमारियों से बचाते भी हैं. दूध भी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है. इससे भूख भी मिटती है और प्यास भी बुझ जाती है. 


ऐसा नहीं है कि सहरी या इफ़्तार में खजूरें ही खानी हैं. खजूर खाना सुन्नत है, फ़र्ज़ नहीं. ये सुन्नत इसलिए है, क्योंकि हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर से सहरी और इफ़्तार करने की तरग़ीब दी है. अगर रोज़ेदार के पास खजूर नहीं है, तो सहरी और इफ़्तारी में कुछ और भी खाया जा सकता है. यानी रोज़ेदार जो चाहे खा सकता है, ये उसकी अपनी ज़ाती पसंद और नापसंद का मसला है. चूंकि मुसलमान अल्लाह और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान रखते हैं, इसलिए सुन्नत की अहमियत बढ़ जाती है और ये तक़वा में शामिल हो जाती है. वैसे भी महबूब की पसंदीदा चीज़ से मुहब्बत होना तो लाज़िमी है और जब बात दीन की हो, तो ये पुख़्ता ईमान की अलामत बन जाती है. इसलिए बिना सहरी खाये रोज़ा नहीं रखना चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल    


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
सालभर के तमाम महीनों में रमज़ान ही एक ऐसा महीना है, जो बहुत ही बरकतों वाला है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने इसकी फ़ज़ीलत बयान की है. इस महीने में आसमान से रहमतों की बारिश होती है. ये बन्दे के हाथ में है कि वह कितनी रहमतें अपने दामन में समेटता है. इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करनी चाहिए. रोज़े रखें, तरावीह और नफ़िल नमाज़ें अदा करें, क़ुरआन पाक की तिलावत करें और अपने जानो माल से ख़िदमते ख़ल्क़ करें.    
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह की राह में गुज़रने वाली एक सुबह या एक शाम दुनिया से और जो कुछ दुनिया में है, सबसे बेहतर है. 
(सही बुख़ारी 2792)  

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “माहे रमज़ान बहुत ही बाबरकत और फ़ज़ीलत वाला महीना है, और सब्र व शुक्र और इबादत का महीना है. और इस माहे मुबारक की इबादत का सवाब सत्तर दर्जा अता होता है. और जो कोई अपने परवरदिगार की इबादत करके उसकी ख़ुशनूदी हासिल करेगा, तो उसे उसकी बहुत बड़ी जज़ा ख़ुदावन्द तआला अता फ़रमाएगा.

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “मेरी उम्मत में से जो मर्द या औरत ये ख़्वाहिश करे कि उसकी क़ब्र नूर से मुनव्वर हो, तो उसे चाहिए कि वह रमज़ान की शबे क़द्रों में कसरत के साथ इबादते इलाही में मुब्तिला हो जाए, ताकि उन मुबारक और मुतबरिक रातों की इबादत से अल्लाह पाक उसके आमालनामे से बुराइयां मिटाकर उसे नेकियों का सवाब अता फ़रमाए.”           

शबे क़द्र क्या है?   
रमज़ान के मुक़द्दस महीने के आख़िरी दस दिनों में शबे क़द्र आती है. शबे क़द्र के बारे में क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है ? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. ये रात फ़ज्र होने तक सलामती है. 
(क़ुरआन 97:1-5 )

शबे क़द्र की फ़ज़ीलत इसलिए भी बहुत ज़्यादा है, क्योंकि इस रात में अल्लाह तआला ने अपने महबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ुरआन नाज़िल किया था. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इसे मुबारक रात में नाज़िल किया. बेशक हम ख़बरदार करने वाले हैं. इस रात में हर हिकमत वाले काम का फ़ैसला कर दिया जाता है.”
(क़ुरआन 44:3-4)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! यह मुबारक किताब है, जिसे हमने तुम पर नाज़िल किया है, ताकि अक़्लमंद इसकी आयतों में ग़ौर व फ़िक्र करें और नसीहत हासिल करें.”
(क़ुरआन 38:29)

बेशक क़ुरआन पाक तमाम आलमों के लिए नसीहत है. क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी. इसमें ज़िन्दगी जीने का तरीक़ा बताया गया है. इसमें वह सबकुछ है, जिसकी इंसान को ज़रूरत है. इसमें बताए गये रास्ते पर चलकर इंसान कामयाबी हासिल कर सकता है. 

कहते हैं कि रमज़ान में एक रात ऐसी भी आती है, जिसमें बन्दा अल्लाह से जो कुछ मांगता है, वह सब उसे मिल जाता है. ये रात कौन-सी है, इस बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' 
इसलिए शबे क़द्र की हर रात को वही रात मानकर ख़ूब इबादत करनी चाहिए. अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने के साथ-साथ मनचाही मुरादें भी मांगनी चाहिए. अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में वादा किया है- “और तुम्हारा परवरदिगार फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं मांगो, मैं ज़रूर क़ुबूल करूंगा.”
(क़ुरआन 40:60)    

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि एक मर्तबा रमज़ान का महीना आया, तो अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारे ऊपर एक महीना आया है, जिसमें एक रात है जो हज़ार महीनों से अफ़ज़ल है. जो शख़्स इस रात से महरूम रह गया, गोया सारी ख़ैर से महरूम रह गया.”  

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.'' आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “ये ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से निजात का है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. इस दौरान रोज़ेदार एतिकाफ़ में भी बैठते हैं.

एतिकाफ़ क्या है?
रमज़ान के आख़िरी अशरे में दुनियादारी से कटकर अल्लाह की इबादत के लिए बैठने को एतिकाफ़ कहा जाता है. ये रमज़ान की इबादतों में से एक इबादत है. एतिकाफ़ सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िन्दगीभर एतिकाफ़ को अंजाम दिया. 

हज़रत अली इब्ने हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु तआला अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स रमज़ान के दस दिन का एतिकाफ़ करे, तो उसे दो हज और दो उमरे के मानिन्द सवाब होगा.” आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एतिकाफ़ करने वाले शख़्स के हक़ में फ़रमाया- “वह तमाम गुनाहों से रुका रहता है और उसे इस तरह सवाब मिलता है, जैसे वह नेकियां कर रहा हो.”

एतिकाफ़ की भी वही शर्तें हैं, जो रोज़े की हैं. मर्द सिर्फ़ मस्जिद में ही एतिकाफ़ में बैठ सकते हैं, जबकि औरतें अपने घर में एतिकाफ़ में बैठ सकती हैं. सबसे अफ़ज़ल एतिकाफ़ मक्का की मस्जिद अल हराम का माना जाता है. इसके बाद मस्जिदे नबवी, मस्जिदे अक़सा और किसी भी जामा मस्जिद की बारी आती है. इसके बाद वह मस्जिद आती है, जिसमें बन्दा पांच वक़्त नमाज़ अदा करता है. ये अपने मुहल्ले की मस्जिद भी हो सकती है.

मर्द की एतिकाफ़ में बैठने की हद मस्जिद है. मस्जिद की हद भी वही मानी जाती है, जहां पर नमाज़ अदा की जाती है. वुज़ू की जगह, ग़ुसलख़ाने और पाख़ाने मस्जिद की हद से बाहर माने जाते हैं. भले ही वह मस्जिद की चहारदीवारी के भीतर होते हैं. एतिकाफ़ के दौरान बिना ज़रूरत एक लम्हे के लिए भी मस्जिद से बाहर क़दम न रखा जाए, क्योंकि ऐसा करने पर एतिकाफ़ टूट जाता है.    

एतिकाफ़ के लिए रोज़ा ज़रूरी है यानी रोज़ेदार ही एतिकाफ़ मैं बैठ सकता है. बीसवें रोज़े को इफ़्तार के फ़ौरन बाद मस्जिद में चले जाएं और मग़रिब की नमाज़ के बाद एतिकाफ़ की नीयत कर लें. अगर सूरज डूबने के बाद दस मिनट भी देर हो गई, तो एतिकाफ़ अदा नहीं हो पाएगा. इसी तरह जब ईद का चांद नज़र आ जाता है, तो फ़ौरन एतिकाफ़ भी ख़त्म हो जाता है.

रमज़ान में रोज़े रखने वालों के लिए बेशुमार सवाब है. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत के आठ दरवाज़े हैं, जिनमें से एक दरवाज़े का नाम रैयान है, जिसमें से सिर्फ़ रोज़ेदार ही दाख़िल होंगे.”

हदीस पाक में आता है कि जब कोई बन्दा रोज़े की हालत में होता है कि बिलों के अंदर चींटियां, हवा में परिन्दे और समन्दर में मछलियां भी उसके लिए मग़फ़िरत की दुआएं करती हैं. रोज़ा इतनी अहम इबादत है कि गोया सारी मख़लूक़ उसके लिए दुआएं करने में मुब्तिला हो जाती है.   

रिश्तेदारों और पड़ौसियों का ख़्याल रखें 
अल्लाह की मख़लूक़ का ख़्याल रखना भी इबादत का ही एक बहुत अहम हिस्सा है. जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लम्बे-चौड़े दस्तरख़्वान बिछते हैं. इफ़्तार और सहरी में खाने-पीने के लिए लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं. लेकिन जो ग़रीब हैं, वे इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. ऐसे में हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते.
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं- “रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्त करें. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भरकर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

याद रखें कि हमारा पड़ौसी अच्छा है या बुरा है. मैदाने हश्र में इसका जवाब वह ख़ुद देगा, लेकिन अगर वह भूख से मर गया, तो इसका जवाब हमें ही देना होगा.

हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारी रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें नसीहत दी कि अबूज़र शोरबा पकाओ, तो उसमें पानी बढ़ा दिया करो और उससे अपने हमसायों यानी पड़ौसियों की ख़बरगिरी करते रहो यानी उसमें से अपने हमसाये को भी कुछ दे दिया करो. 
(सही मुस्लिम 6688)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और तुम अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ और वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करो और रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और नज़दीकी पड़ौसियों और अजनबी पड़ौसियों और साथ उठने बैठने वालों और मुसाफ़िरों और अपने गु़लामों से अच्छा बर्ताव करो.” 
(क़ुरआन 4:36)

“फिर तुम अपने रिश्तेदारों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों को उनका हक़ देते रहो. ये उन लोगों के हक़ में बेहतर है, जो अल्लाह की ख़ुशनूदी चाहते हैं. और वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं.” 
(क़ुरआन 30:38)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक सब मोमिन आपस में भाई-भाई हैं. इसलिए तुम अपने दो भाइयों के दरम्यान सुलह करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम पर रहम किया जाए. 
(क़ुरआन 49:10)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने की ताकीद की. एक हदीस के मुताबिक़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अगर तुम किसी की मदद करने के क़ाबिल न हो, तो किसी और से उसकी सिफ़ारिश कर दो.” एक अन्य हदीस के मुताबिक़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो आदमी अपने किसी भाई को जिसके जिस्म पर ज़रूरत के मुताबिक़ कपड़े न हों, उसे कपड़े पहनाएगा या देगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनाएगा. और जो किसी भूखे को खाना खिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत के मेवे खिलाएगा. जो किसी प्यासे को पानी पिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का शर्बत पिलाएगा.”

क्या न करें
रमज़ान में रोज़े रखने का मक़सद ख़ुद को गुनाहों से बचाना है. जब कोई गुनाहों से बच जाता है, तो उसका जिस्म ही नहीं, उसकी रूह भी पाक हो जाती है. लेकिन जो लोग रोज़े रखकर भी ख़ुद को बुराइयों से नहीं बचाते, तो उन्हें रोज़े का कोई अज्र भी हासिल नहीं हो पाता. एक हदीस में कहा गया है कि जो बन्दा झूठ और अपने अमल के खोट को नहीं छोड़ता, तो अल्लाह को उसके भूखा या प्यासा रहने की कोई परवाह नहीं है. एक हदीस में कहा गया है कि कितने ही रोज़ेदार ऐसे होते हैं, जिन्हें रोज़े में भूखा और प्यासा रहने के सिवा कुछ नसीब नहीं होता, क्योंकि वे रोज़े की हालत में चीज़ें फ़रोख़्त करते वक़्त कम तोलते और कम नापते हैं, सामान में मिलावट करते हैं, रिश्वत लेते हैं, बोहतान लगाते हैं, चुग़लियां करते हैं, लोगों का माल और रिश्तेदारों का हक़ खा जाते हैं. 

दरहक़ीक़त ये है कि रमज़ान का मक़सद लोगों को राहे-हक़ पर लाना है. जब कोई पूरे महीने ख़ुद को गुनाहों से रोकता है, तो ये अच्छाई उसके वजूद में शामिल होने लगती है. फिर वह आम दिनों में भी ख़ुद को बुराइयों से बचाकर नेकी के रास्ते पर चल पड़ता है और यही तो असल कामयाबी है.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)  
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल          


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
  
इस्लामी तारीख़ में माहे रमज़ान की बहुत अहमियत है. इस महीने में कई ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जो यादगार बन गए. इन वाक़ियात ने तमाम आलमों को दर्स दिया. इसी मुक़द्दस महीने में अल्लाह ने अपने रसूलों पर आसमानी किताबें और सहीफ़े नाज़िल किए.
 
सहीफ़े 
अल्लाह के उन पैग़ाम को सहीफ़े कहा जाता है, जो अल्लाह के मुअज़्ज़िज़ फ़रिश्ते हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम नबियों के पास लाया करते थे. चार रसूलों को छोड़कर बाक़ी सभी नबियों पर सहीफ़े नाज़िल हुए. हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की पहली रात को सहीफ़े नाज़िल हुए.

क़ुरआन करीम   
माहे रमज़ान में अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया. हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास अल्लाह के पैग़ाम लाया करते थे. बाद में इन्हीं आयतों का ज़ख़ीरा क़ुरआन बना. क़ुरआन करीम 23 साल में नाज़िल हुआ, क्योंकि ये लोहे महफ़ूज़ से थोड़ा-थोड़ा नाज़िल किया गया. इसकी ज़बान अरबी है. क़ुरआन करीम को कई नामों से जाना जाता है, जैसे अल किताब, अल फ़ुरक़ान, अल तंजील, अल ज़िक्र, अल नूर, अल हुदा, अल रहमा, अहसनुल हदीस, अल वही, अल रूह, अलमुबीन, अल मजीद और अल हक़. क़ुरआन पाक में 114 सूरतें हैं और इसके 30 पारे हैं.     

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उसी अल्लाह ने यह किताब तुम पर हक़ के साथ नाज़िल की है. ये उन सब आसमानी किताबों की तसदीक़ करती है, जो इससे पहले नाज़िल हुई हैं और उसी ने तौरात और इंजील नाज़िल की है.” 
(क़ुरआन 3:3)

रमज़ान एक मुक़द्दस महीना है. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “रमज़ान वह मुक़द्दस महीना है, जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया है, जो लोगों के लिए सरापा हिदायत है और जिसमें रहनुमाई करने वाली और हक़ व बातिल की तमीज़ सिखाने वाली वाज़ेह निशानियां हैं.” 
(क़ुरआन 2: 185)

क़ुरआन शबे क़द्र में नाज़िल हुआ. शबे क़द्र के बारे में क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है ? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. ये रात फ़ज्र होने तक सलामती है.” 
(क़ुरआन 97:1-5 )

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक हमने इसे मुबारक रात में नाज़िल किया. बेशक हम ख़बरदार करने वाले हैं. इस रात में हर हिकमत वाले काम का फ़ैसला कर दिया जाता है.”
(क़ुरआन 44:3-4)

बेशक क़ुरआन पाक तमाम आलमों के लिए नसीहत है. क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी. क़ुरआन एक ऐसी किताब है, जिसमें कोई तब्दीली नहीं हो सकती. ऐसा करना नामुमकिन है. लोगों ने इससे पहले नाज़िल हुई किताबों में अपने फ़ायदे के लिए बदलाव कर लिए, इसलिए क़ुरआन की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा अल्लाह तआला ने ख़ुद लिया है. 
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ बेशक हमने ही ज़िक्रे अज़ीम यानी क़ुरआन नाज़िल किया है और बेशक हम ही उसके मुहाफ़िज़ हैं.”
(क़ुरआन 15:9) 

क़ुरआन सिर्फ़ काग़ज़ पर ही नहीं लिखा है, ये लोगों के दिलों में भी महफ़ूज़ है. क़ुरआन हिफ़्ज़ किया जाता है और क़ुरआन हिफ़्ज़ करने वाले को हाफ़िज़ कहा जाता है. हदीसों के मुताबिक़ क़ुरआन आसमान पर मौजूद लोहे महफ़ूज़ का हिस्सा है और क़यामत से कुछ अरसा पहले ये दुनिया से उठा लिया जाएगा.      

इंजील 
अल्लाह तआला ने क़ुरआन से पहले इंजील नाज़िल की थी. ये हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 13 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. कुछ रिवायत के मुताबिक़ इंजील रमज़ान की 4 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. इंजील सुरयानी ज़बान में है. 

क़ुरआन करीम में इंजील का ज़िक्र भी है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और हमने उन पैग़म्बरों के पीछे उनके नक़्शे क़दम पर ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम को भेजा, जो ख़ुद से पहले की किताब यानी तौरात की तसदीक़ करने वाले थे और हमने उन्हें इंजील अता की, जिसमें हिदायत और नूर था और यह इंजील भी ख़ुद से पहले की किताब यानी तौरात की तसदीक़ करने वाली थी और यह परहेज़गारों के लिए हिदायत और नसीहत थी. और अहले इंजील को भी इस हुक्म के मुताबिक़ फ़ैसला करना चाहिए, जो अल्लाह ने उसमें नाज़िल किया है. और जो शख़्स अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब के मुताबिक़ हुक्म न दे यानी फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नाफ़रमान हैं.”
(क़ुरआन 5:46-47)

क़ाबिले ग़ौर है कि इंजील अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें बदलाव कर लिए गए. इसलिए इसके बाद अल्लाह ने क़ुरआन नाज़िल किया.   

ज़बूर 
इससे पहले अल्लाह तआला ने ज़बूर नाज़िल की थी. ये हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 13 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. ये इबरानी ज़बान में है. इसकी कुल 150 सूरतें हैं. 

क़ुरआन करीम में ज़बूर का ज़िक भी मिलता है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और तुम्हारा परवरदिगार उन्हें ख़ूब जानता है, जो आसमानों और ज़मीन में आबाद हैं. और बेशक हमने कुछ नबियों को दूसरे नबियों पर फ़ज़ीलत बख़्शी है और हमने दाऊद अलैहिस्सलाम को ज़बूर अता की.”
(क़ुरआन 17: 55)

क़ाबिले ग़ौर है कि ज़बूर अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें बदलाव कर लिए गए थे. इसलिए ज़बूर के बाद अल्लाह तआला ने तौरात नाज़िल की थी.   
 
मुसलमानों पर सभी आसमानी सहीफ़ों और किताबों पर यक़ीन रखना लाज़िमी है. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे नाफ़रमान माने जाएंगे और दीन से ख़ारिज हो जाएंगे.  
  
क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मुसलमानो ! तुम कह दो कि हम अल्लाह पर ईमान लाए हैं और उस किताब यानी क़ुरआन पर, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल किया गया और जो सहीफ़े इब्राहीम अलैहिस्सलाम और इस्माईल अलैहिस्सलाम और इसहाक़ अलैहिस्सलाम और याक़ूब अलैहिस्सलाम और उनकी औलादों पर नाज़िल हुए और जो किताबें तौरात और इंजील मूसा अलैहिस्सलाम और ईसा अलैहिस्सलाम को अता की गईं और इसी तरह जो सहीफ़ें दूसरे नबियों को उनके परवरदिगार की तरफ़ से अता किए गए, उन सब पर ईमान लाए हैं और हम उनमें कोई फ़र्क़ नहीं करते और हम अल्लाह ही के मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हैं.” 
(क़ुरआन 2:136)

तौरात 
अल्लाह तआला ने ज़बूर से पहले तौरात नाज़िल की थी. ये हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर रमज़ान की 6 तारीख़ को नाज़िल हुई थी. ये इबरानी ज़बान में है. कुछ रिवायत के मुताबिक़ तौरात सुरयानी ज़बान में नाज़िल हुई थी.

क़ुरआन करीम में तौरात का भी ज़िक मिलता है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और वह वक़्त भी याद करो कि जब हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और हक़ व बातिल को जुदा करने वाले अहकाम दिए, ताकि तुम हिदायत पा सको.
(क़ुरआन 2:53)

“और वह वक़्त याद करो कि जब हमने तुमसे तौरात पर अमल करने का अहद लिया था और हमने कोहे तूर को तुम्हारे ऊपर उठा लिया था और हुक्म दिया था कि जो कुछ हमने तुम्हें अता किया है, उसे मज़बूती से पकड़े रहो और जो कुछ इस किताब यानी तौरात में है, उसे याद रखो, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ. 
(क़ुरआन 2:63)

“और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और उनके बाद हमने बहुत से रसूलों को भेजा. और मरयम अलैहिस्सलाम के बेटे ईसा अलैहिस्सलाम को भी रौशन निशानियां अता कीं. और हमने पाक रूहुल क़ुदुस यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम के ज़रिये उनकी ताईद व मदद की. 
(क़ुरआन 2:87)

क़ाबिले ग़ौर है कि तौरात भी अपनी असल हालत में मौजूद नहीं है, क्योंकि इसमें भी बदलाव कर लिए गए. इसलिए इसके बाद अल्लाह ने इंजील नाज़िल की.   

जंगे बदर
रमज़ान की 17 तारीख़ को जंगे बदर हुई. ये इस्लामी तारीख़ की अहम जंग है. मदीने से काफ़ी दूर एक कुआं था, जिसका नाम बदर था. इस कुएं के नाम पर ही इस इलाक़े को बदर कहा जाता था. इसी मैदान में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व उनके सहाबियों और मक्के के कुफ़्फ़ार के बीच जंग हुई थी. एक तरफ़ 313 मुसलमान थे और दूसरी तरफ़ कुफ़्फ़ार की तादाद उनसे कई गुना यानी हज़ारों में थी. इस जंग में 14 सहाबा शहीद हुए. इनमें से छह मुहाजिर और आठ अंसार थे. 

क़ुरआन करीम में जंगे बदर का ज़िक्र है. अल्लाह तआला फ़रमाता है-  “बेशक तुम्हारे लिए उन दो जमातों में एक निशानी है, जो जंगे बदर में आपस में मुक़ाबिल हुईं. एक जमात ने अल्लाह की राह में जंग की और दूसरी काफ़िर थी. कुफ़्फ़ार को अपनी खुली आंखों से मुसलमान दोगुने नज़र आ रहे थे. और अल्लाह अपनी मदद के ज़रिये जिसे चाहता है ताईद करता है. और बेशक इसमें बसीरत वाले लोगों के लिए बड़ी इबरत है.”
(क़ुरआन 3:13)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने परवरदिगार से इस जंग में मदद मांगी थी और उनकी दुआ क़ुबूल हुई.  
अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब तुम अपने परवदिगार से मदद के लिए फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी फ़रियाद क़ुबूल कर ली और फ़रमाया कि एक हज़ार मुसलसल आने वाले फ़रिश्तों के ज़रिये तुम्हारी मदद की जाएगी.”  
(क़ुरआन 8: 9)

मक्का फ़तह
रमज़ान की 20 तारीख़ को मुसलमानों ने मक्का फ़तह किया था. क़ाबिले ग़ौर है कि मदीने के मुसलमानों और मक्का के क़ुरैश के बीच दस साल के लिए जंग न करने की सुलह हुई थी, जिसे तारीख़ में सुलह हुदैबिया के नाम से जाना जाता है. लेकिन क़ुरैश इस पर क़ायम नहीं रह सके और क़ुरैश के मददगार बनू बक़र ने हाल ही में मुसलमानों के मददगार बने बनू ख़ुजा पर हमला कर दिया. इसके बाद नौबत यहां तक आन पहुंची कि मुसलमानों को जंग करनी पड़ी. इस जंग में मुसलमानों को शानदार जीत हासिल हुई. क़ुरआन करीम में भी इस जीत का ज़िक्र है.       
अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक हमने तुम्हें रौशन फ़तह अता की.”
(क़ुरआन 48:1)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत 
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दामाद और मुसलमानों के ख़लीफ़ा हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत रमज़ान की 21 तारीख़ को हुई थी. हज़रत अली अलैहिस्सलाम रमज़ान की 19 तारीख़ को कूफ़ा की मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ पढ़ रहे थे. जब वे सजदे में गए, तो अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजम ने ज़हर में डूबी हुई तलवार से उनके सर पर वार किया. इस हमले में वे ज़ख़्मी हो गए और ज़हर उनके जिस्म में फैलने लगा. उन्होंने अपने साथियों को ताकीद की कि वे मुलजम को क़त्ल न करें, बल्कि उन्होंने उसे आरामदेह बिस्तर, लज़ीज़ खाना और शर्बत मुहैया करवाया. दो दिन बाद 19 तारीख़ को मौला अली अलैहिस्सलाम का विसाल हो गया. 

रमज़ान हुरमत वाला महीना है. हदीसों के मुताबिक़ माहे रमज़ान में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं. 
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “जब माहे रमज़ान आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है. 
(बुख़ारी)

बहरहाल, रमज़ान में नाज़िल हुए सभी सहीफ़ों और आसमानी किताबों ने तमाम आलमों को मुहब्बत का पैग़ाम दिया है. रमज़ान के वाक़ियात भी राहे-हक़ पर चलने का पैग़ाम देते हैं. मौला अली की शहादत की इस बात की अलामत है कि अल्लाह वाले अपने दुश्मनों के साथ भी नरमी से पेश आते हैं. 
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़
तस्वीर गूगल  


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान इबादत का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह तआला ने अपने बन्दों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल हैं. कलमा मुसलमानों का अक़ीदा है. नमाज़ तो रोज़ाना ही पढ़ी जाती है, लेकिन रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. हदीसों के मुताबिक़ रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उसी अल्लाह ने यह किताब तुम पर हक़ के साथ नाज़िल की है. यह उन सब आसमानी किताबों की तसदीक़ करती है, जो इससे पहले नाज़िल हुई हैं और उसी ने तौरात और इंजील नाज़िल की है.” 
(क़ुरआन 3:3)

इस्लामी तारीख़ के मुताबिक़ दूसरी हिजरी में रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ किए गए थे. इसी साल सदक़-ए-फ़ित्र और ज़कात का भी हुक्म नाज़िल हुआ था. रमज़ान के रोज़ों से पहले मुहर्रम की दस तारीख़ को आशूरा का रोज़ा रखा जाता था, लेकिन यह इख़्तियारी था. जब अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का से हिजरत करके मदीना तशरीफ़ लाए, तो आपने देखा कि मदीना के बाशिन्दे साल में दो दिन खेल-तमाशों के ज़रिये ख़ुशियां मनाते हैं, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे दरयाफ़्त किया कि इन दो दिनों की हक़ीक़त क्या है? सहाबा ने कहा- “हम जाहिलियत के ज़माने में इन दो दिनों में खेल-तमाशे किया करते थे.”
चुनांचे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला ने इन दो दिनों को बेहतर दिनों से बदल दिया है, वह ईदुल अज़हा और ईदुल फ़ित्र है. इस तरह दूसरी हिजरी के शव्वाल महीने की पहली तारीख़ को ईद मनाने की शुरुआत हुई. अल्लाह तआला ने ईद की ख़ुशियां मुसलमानों के सर पर फ़तेह और इज़्ज़त का ताज रखने के बाद अता फ़रमाईं.”

अल्लाह ने रोज़े क्यों फ़र्ज़ किए? इसका जवाब ख़ुद अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में दिया है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ ईमान वालो ! तुम पर उसी तरह रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं, जैसे तुमसे पहले के लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ.” 
(क़ुरआन 2:183)

यानी मुसलमानों से पहले नसरानियों यानी ईसाइयों, यहूदियों और उनसे पहले की क़ौमों पर भी रोज़े फ़र्ज़ किए गए थे. रोज़े में फ़ज्र की अज़ान से पहले से लेकर मग़रिब की अज़ान यानी सूरज ढलने तक खाने और पीने पर पूरी तरह से पाबंदी होती है. इतना ही नहीं, इस दौरान हर बुरे काम से ख़ुद को दूर रखना होता है, यहां कि झूठ बोलने और ग़ुस्सा करने से भी परहेज़ करना होता है. और रोज़े में बुराइयों से दूर रहकर बन्दा परहेज़गार बन जाता है.      

ऐसा नहीं है कि रोज़े सब लोगों पर ही फ़र्ज़ किए गए हैं. जो लोग बीमार हैं और उनमें रोज़े रखने की हिम्मत और ताक़त नहीं है, तो उन्हें छूट दी गई है. ऐसे लोग मोहताजों को खाना खिलाकर फ़िदया अदा कर सकते हैं. क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “गिनती के चन्द दिन रोज़े रखने हैं. फिर अगर तुम में से कोई बीमार हो या सफ़र में हो, तो दूसरे दिनों में रोज़े रखकर गिनती पूरी कर ले. और जिनमें रोज़ा रखने की क़ूवत न हो, तो वे एक मोहताज को खाना खिलाकर फ़िदया अदा करें. फिर कोई अपनी ख़ुशी से ज़्यादा नेकी करे, तो यह उसके लिए बेहतर है. और अगर तुम रोज़ा रखो, तो यह तुम्हारे हक़ में ज़्यादा बेहतर है. अगर तुम जानते हो. रमज़ान वह मुक़द्दस महीना है, जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया है, जो लोगों के लिए सरापा हिदायत है और जिसमें रहनुमाई करने वाली और हक़ व बातिल की तमीज़ सिखाने वाली वाज़ेह निशानियां हैं. ऐ मुसलमानो ! फिर तुममें से जो इस महीने में मौजूद हो, तो वह रोज़े ज़रूर रखे और जो बीमार हो या सफ़र में हो, तो वह दूसरे दिनों में रोज़े रखकर गिनती पूरी करे. अल्लाह तुम्हारे हक़ में आसानी चाहता है और तुम्हारे साथ दुश्वारी नहीं चाहता और शुमार का हुक्म इसलिए दिया गया है, ताकि तुम रोज़ों की गिनती पूरी कर लो. और उसके लिए अल्लाह की बड़ाई करो, जो हिदायत उसने तुम्हें दी है और तुम उसके शुक्रगुज़ार बनो.” 
(क़ुरआन 2: 184-185)

रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल यानी रात को नमाज़ पढ़ने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक़्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.'' आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ बेशक हमने इस क़ुरआन को शबे क़द्र में नाज़िल किया. और तुम क्या जानते हो कि शबे क़द्र क्या है? शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है. इस रात में फ़रिश्ते और रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार के हुक्म से हर काम के लिए ज़मीन पर उतरते हैं. यह रात फ़ज्र होने तक सलामती है. 
(क़ुरआन 97:1-5 )

मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं और अल्लाह से जहन्नुम से निजात की दुआएं मांगते हैं.   

रमज़ान का तअरूफ़ी ख़ुत्बा सैयदना हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि शाबान की आख़िरी तारीख़ को नबी ए अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मिम्बर पर तशरीफ़ फ़रमा हुए और इरशाद फ़रमाया- “ऐ लोगो!” तुम पर एक अज़ीम और मुबारक महीना साया फ़गन होने वाला है. ऐसा महीना जिसमें एक ऐसी रात है, जो एक हज़ार महीनों से बढ़कर है. अल्लाह तआला ने इस महीने के दिनों का रोज़ा फ़र्ज़ और रातों की इबादत नफ़िल क़रार दी है. जो शख़्स इस महीने में एक नेक अमल के ज़रिये अल्लाह तआला के क़ुर्ब का तालिब हो, वह ऐसा ही है जैसे दूसरे महीने में फ़र्ज़ अमल करे. और जो शख़्स कोई फ़र्ज़ अदा करे, वह ऐसा ही है जैसे दूसरे महीनों में 70 फ़र्ज़ अदा करे. ऐ लोगो ! यह सब्र का महीना है, और सब्र का सवाब और बदला जन्नत है. और यह लोगों के साथ हुस्ने सुलूक और ख़ैरख़्वाही का महीना है. इस महीने में मोमिन का रिज़्क़ बढ़ा दिया जाता है. जो आदमी इस मुबारक महीने में किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराए, तो उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, उसे जहन्नुम से आज़ादी का परवाना मिलता है, और रोज़ेदार के सवाब में कमी किए बग़ैर इफ़्तार कराने वाले को भी उसके बराबर सवाब से नवाज़ा जाता है. यह सुनकर सहाबा ने अर्ज़ किया- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हम में से हर आदमी ख़ुद में इतनी गुंजाइश नहीं पाता कि वह दूसरे को इफ़्तार कराए और उसके सवाब को हासिल करे.” इस सवाल पर रहमते आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को ऐसा जवाब दिया, जिससे उनकी मायूसी ख़ुशी में बदल गई. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला ये इनाम हर उस शख़्स पर फ़रमाता है, जो किसी भी रोज़ेदार को एक घूंट दूध या लस्सी, एक अदद खजूर, यहां तक कि एक घूंट पानी पिलाकर भी इफ़्तार करा दे. हां, जो शख़्स रोज़ेदार को पेट भर खिलाए, तो अल्लाह रब्बुल आलमीन उसे क़यामत के दिन मेरे हौज़ ए कौसर से पानी पिलाएगा, जिसके बाद उसे कभी प्यास नहीं लगेगी यहां तक कि वह हमेशा के लिए जन्नत में दाख़िल हो जाएगा. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “यह ऐसा महीना है जिसका पहला अशरा रहमत, दरमियानी अशरा मग़फफ़िरत और आख़िरी अशरा जहन्नुम से आज़ादी का है. जो शख़्स इस महीने में अपने ग़ुलाम के बोझ को हल्का कर दे, तो अल्लाह तआला उसकी मग़फ़िरत फ़रमाता है और आग से आज़ादी देता है. ऐ लोगो ! इस महीने में चार चीज़ों की कसरत रखा करो. पहली कालिमा ए तैय्यब ला इलाह इल्लल्लाह, दूसरी अस्तग़फ़ार, तीसरी जन्नत की तलब, चौथी आग से पनाह.
(मिश्कात:1/174, बैहक़ी शिअबुल ईमान: 3/ 305)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “जब माहे रमज़ान आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है. (बुख़ारी)

हज़रत उमर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- ‘‘क़यामत के दिन रोज़े और क़ुरआन बन्दे की शफ़ाअत करेंगे. रोज़े अर्ज़ करेंगे कि ऐ अल्लाह ! मैंने इसे दिन में खाने और शहवत से रोका. इसलिए तू इसके लिए मेरी शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमा और क़ुरआन कहेगा कि मैंने इसे रात में सोने से रोका. लिहाज़ा इसके हक़ में मेरी शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमा ले. फिर दोनों की शफ़ाअत क़ुबूल होगी. (मिश्कात शरीफ़)

अमीरुल मोमिनीन हज़रत सैयदना उमर फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “रमज़ान में अल्लाह का ज़िक्र करने वाले को बख़्श दिया जाता है और इस रमज़ान के महीने में अल्लाह पाक से मांगने वाला कभी भी महरूम नहीं रहता.”

शाहीन कहती हैं कि इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़ानदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने की हिदायत देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल  



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
रमज़ान का महीना बहुत ही मुक़द्दस है. इस महीने में मुसलमान रोज़े रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं. इसे इबादत का महीना भी कहा जाता है. यूं तो हर रोज़ ही अल्लाह की इबादत की जाती है, लेकिन रमज़ान में रोज़ों की वजह से इसमें इज़ाफ़ा हो जाता है. 
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अगर किसी बन्दे को रमज़ान क्या है और रमज़ान की कितनी बड़ी फ़ज़ीलत है, ये मालूम हो जाए तो वह तमन्ना करेगा कि बरसों-बरस रमज़ान ही रहें.

हज़रत सैयदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  ने फ़रमाया- “मेरी उम्मत को माहे रमज़ान में पांच चीजें ऐसी अता की गईं, जो मुझसे पहले किसी नबी को नहीं मिलीं. 
पहली, जब रमज़ानुल मुबारक की पहली रात होती है तो अल्लाह इनकी तरफ़ रहमत की नज़र फ़रमाता है और जिसकी तरफ़ अल्लाह नज़रे रहमत फ़रमाए तो उसे कभी अज़ाब नहीं देगा. 
दूसरी, शाम के वक़्त इनके मुंह की बू अल्लाह तआला के नज़्दीक मुश्क की ख़ुशबू से बेहतर है. यानी जो बू भूख की वजह से होती है.
तीसरी, फ़रिश्ते हर रात और दिन इनके लिए मग़फ़िरत की दुआएं करते रहते हैं. 
चौथी, अल्लाह तआला जन्नत को हुक्म देता है- “मेरे बन्दों के लिए आरास्ता हो जा. अनक़रीब वे दुनिया की मशक़्क़त से मेरे घर और करम में राहत पाएंगे." 
पांचवीं, जब माहे रमज़ान की आख़िरी रात आती है, तो अल्लाह तआला सबकी मग़फ़िरत फ़रमा देता है. क़ौम में से एक शख़्स ने खड़े होकर अर्ज़ किया कि “या रसूलल्लाह ! क्या वह लैलतुल क़द्र है ?" आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “नहीं, क्या तुम नहीं देखते कि मज़दूर जब अपने कामों से फ़ारिग़ हो जाते हैं, तो उन्हें उजरत दी जाती है."

रमज़ान के रोज़े किस पर फ़र्ज़ हैं
इस्लाम में इबादत के मामले में मर्दों और औरतों में कोई फ़र्क़ नहीं किया गया है. रमज़ान के रोज़े उन मर्दों और औरतों पर वाजिब और फ़र्ज़ हैं, जो इसकी छह शर्तें पूरी करते हैं. 
पहली शर्त इस्लाम यानी रमज़ान के रोज़े सिर्फ़ मुसलमानों पर ही फ़र्ज़ किए गए हैं. 
दूसरी शर्त बालिग़ यानी रमज़ान के रोज़े बालिग़ पर फ़र्ज़ हैं. इस्लाम के मुताबिक़ बारह साल से ज़्यादा उम्र के शख़्स को बालिग़ माना जाता है. 
तीसरी शर्त अक़्ल यानी अक़्ल रखने वाले शख़्स पर ही रोज़े फ़र्ज़ हैं, ज़ेहनी तौर पर कमज़ोर यानी दीवाने पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है. 
चौथी शर्त जिस्मानी क़ूवत यानी अगर कोई शख़्स बीमारी या ऐसी ही किसी और वजह से रोज़ा रखने की ताक़त न रखता हो, तो उस पर भी रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.
पांचवीं शर्त इक़ामत यानी मुक़ीम शख़्स पर ही रोज़ा फ़र्ज़ है, जबकि मुसाफ़िर पर रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.
छठी शर्त हैज़ और निफ़ास यानी हैज़ और निफ़ास वाली औरतों पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है. वे अपने क़ज़ा रोज़े रमज़ान के बाद शव्वाल के महीने में पूरे कर सकती हैं. 

अल्लाह तआला ने रोज़े के कुछ नियम मुक़र्रर किए हैं. अल सुबह फ़ज्र की अज़ान से पहले रोज़ेदार सहरी खाते हैं. सहरी अज़ान से पहले ही खा सकते हैं. सहरी खाकर वे रोज़े की दुआ पढ़ते हैं-
“और मैंने रमज़ान के कल के रोज़े की नीयत की है.” अगर कोई ये दुआ न पढ़े और नीयत कर ले कि या अल्लाह मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा है, तो भी रोज़ा ही माना जाएगा. 
लेकिन अगर वह रोज़े की नीयत न करे और दिनभर भूखा और प्यासा रहे, तो वह रोज़ा नहीं माना जाएगा. दरअसल ये एक तरह का फ़ाक़ा ही होगा और उसका कोई अज्र यानी सवाब नहीं है. उलेमा ने रोज़े की नीयत करने का बेहतर वक़्त वह बताया है, जब पहले रोज़े को इफ़्तार किया जाए, तो उसी वक़्त अगले दिन के रोज़े की नीयत कर ली जाए यानी दिल में ये नीयत कर ली जाए कि मुझे कल का रोज़ा रखना है.    

फ़ज्र की अज़ान शुरू होते ही रोज़े का वक़्त शुरू हो जाता है, जो मग़रिब की अज़ान तक जारी रहता है. शाम को जब सूरज ढल जाता है और आसमान पर रात की स्याही छाने लगती है, तो मग़रिब की अज़ान होती है. अज़ान की आवाज़ सुनते ही रोज़ेदार रोज़ा खोलते हैं. इसे इफ़्तार कहा जाता है. और इस वक़्त दस्तरख़्वान पर मौजूद खाने-पीने की चीज़ों को इफ़्तारी कहा जाता है. इफ़्तारी के वक़्त वे रोज़ा खोलने की दुआ पढ़ते हैं-
“और मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा था और तेरे रिज़्क़ से इफ़्तार करता हूं.”    

अमूमन रोज़ा खजूर खाकर खोला जाता है. खजूर से रोज़ा खोलना सुन्नत है. खजूर न होने पर बहुत से लोग नमक चखकर भी रोज़ा खोलते हैं. दरअसल खाने से पहले नमक चखना भी सुन्नत है. वैसे किसी भी चीज़ से रोज़ा खोला जा सकता है. 

हज़रत सैयदना यअला बिन मुर्रह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तीन चीज़ों को अल्लाह महबूब रखता है. 
पहली इफ़्तार में जल्दी, दूसरी सहरी में ताख़ीर यानी देर और तीसरी नमाज़ के क़ियाम में हाथ पर हाथ रखना.”

किन वजहों से रोज़ा मकरूह होता है
रोज़े के लिए सिर्फ़ नीयत करना ही काफ़ी नहीं है. रोज़ा मकरूह न हो इस बात का भी पूरा ख़्याल रखा जाना चाहिए. रोज़े की हालत में कुछ खाने और पीने से रोज़ा मकरूह हो जाता है. उल्टी होने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. इस बारे में दो राय हैं. अगर अपने आप उल्टी हो जाए तो रोज़ा नहीं टूटेगा, लेकिन जान बूझकर उल्टी की, तो रोज़ा टूट जाएगा. जिस्म के किसी भी हिस्से से ख़ून निकलने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. कुछ उलेमा मानते हैं कि चोट लगने की वजह से ख़ून निकले, तो रोज़ा मकरूह नहीं होगा. बीड़ी-सिगरेट और हुक़्क़ा पीने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. तम्बाक़ू और गुटखा खाने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. इंजेक्शन लगवाने, भाप लेने, इन्हेलर लेने, आंखों और नाक में दवा डालने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. रोज़े की हालत में दांत निकलवाने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. दांतों को ब्रश करने और मंजन करने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. एहतलाम हो जाने से रोज़ा नहीं टूटता, लेकिन जान बूझकर मनी निकाली जाए, तो रोज़ा मकरूह हो जाएगा. हमबिस्तरी करने से भी रोज़ा मकरूह हो जाता है. रोज़े की हालत में पति-पत्नी के मिलन पर पाबंदी है, लेकिन रात में वे मिल सकते हैं. पहले पूरे रमज़ान में इसकी मनाही थी, लेकिन बहुत से लोग इस पर अमल नहीं कर पाते थे और ख़ुद को नाफ़रमानों में शामिल कर लिया करते थे. बाद में अल्लाह ने एक आयत नाज़िल करके इस पाबंदी में ढील दे दी.  

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि “ऐ मुसलमानो ! तुम्हारे लिए रोज़ों की रातों में अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया है. वे तुम्हारा लिबास हैं और तुम उनका लिबास हो. अल्लाह जानता है कि तुम अपने हक़ में ख़यानत करते थे. इसलिए उसने तुम्हें मुआफ़ कर दिया और तुम्हारी ख़ताओं को दरगुज़र किया. फिर तुम उनसे मिलो और जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, उसे मांगों और खाओ और पियो, यहां तक कि सुबह की सफ़ेद धारी रात की स्याह धारी से अलग होकर आसमान पर नज़र आने लगे. फिर रात तक रोज़ा पूरा करो. और जब तुम मस्जिदों में ऐतकाफ़ में बैठे हो, तो उस दौरान औरतों से न मिलो. ये अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदें हैं. फिर उनके क़रीब भी मत जाओ. इसी तरह अल्लाह लोगों के लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान करता है, ताकि वे परहेज़गार बन जाएं.  
(क़ुरआन 2:187)

किन हालात में रोज़ा मकरूह नहीं होता 
बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं, जिनसे रोज़ा मकरूह नहीं होता, लेकिन हम गुमान कर बैठते हैं कि रोज़ा मकरूह हो गया. अगर कोई भूल से कुछ खा या पी ले, तो रोज़ा मकरूह नहीं होता. लेकिन शर्त ये है कि उसे रोज़े की याद आते ही वह फ़ौरन खाना या पीना खाना बंद कर दे और अपनी भूल से हुए ग़लती के लिए अल्लाह से माफ़ी मांग ले.  
अगर नहाते वक़्त पानी मुंह या नाक में चला जाता है, तो इससे भी रोज़ा मकरूह नहीं होता.
रोज़े की हालत में सुरमा लगाने, मेहंदी लगाने, ख़ुशबू लगाने, ख़ुशबू सूंघने, तेल लगाने, बाल और नाख़ून काटने, कान के बाहर के हिस्से में दवा लगाने आदि से रोज़ा मकरूह नहीं होता. 
अगर हमबिस्तरी की वजह से किसी का रोज़ा टूट गया, तो उसे शव्वाल के महीने में क़ज़ा रोज़ा रखना होगा और इसके लिए कफ़्राफ़ारा भी अदा करना होगा.
   
कफ़्फ़ारा क्या है 
दरअसल रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं और इन फ़र्ज़ रोज़ों को तोड़ने पर जो जुर्माना अदा किया जाता है, उसे कफ़्फ़ारा कहते हैं. कफ़्फ़ारे के तौर पर तीन चीज़ें दी गई हैं.
पहला किसी ग़ुलाम को आज़ाद किया जाए. 
दूसरा दो महीने तक मुसलसल रोज़े रखे जाएं और अगर एक भी रोज़ा छूट गया तो फिर से दो महीने तक मुसलसल रोज़े रखे जाएं. लेकिन औरतें मजबूरी में छूटे गए रोज़े पूरे कर सकती हैं. उन्हें दोबारा से रोज़े रखनी की ज़रूरत नहीं है. 
तीसरा अगर रोज़ा रखने की क़ूवत न हो, तो साठ मोहताजों को दो वक़्त का खाना खिलाएं. अगर साठ दिन तक किसी मोहताज को खाना खिलाया जाए या उसे खाने के पैसे दे दिए जाएं तो भी कफ़्फ़ारा अदा हो जाएगा. अगर खाना न खिला सके, तो साठ फ़क़ीरों को अनाज देकर भी कफ़्फ़ारा अदा किया जा सकता है. ये अनाज इतना होना चाहिए, जितना एक आदमी की तरफ़ से सदक़ा तुल फ़ित्र दिया जाता है या इसकी क़ीमत दे दी जाए.    

चूंकि रमज़ान इबादत का महीना है. क़ुरआन करीम में अल्लाह ने इसे मुक़द्दस महीना क़रार दिया है. इसलिए इस महीने की हुरमत की जानी चाहिए. रमज़ान में रोज़े रखने का मक़सद लोगों को परहेज़गार बनाना है, उन्हें बुराइयों से बचाकर नेकी के रास्ते पर ले जाना है. इसलिए रोज़े की हालत में तमाम तरह की बुराइयों से ख़ुद को बचाना चाहिए. यही कोशिश होनी चाहिए कि अपनी जानिब से किसी को ज़रा सी भी तकलीफ़ न पहुंचे, किसी का दिल न दुखे और किसी का कोई नुक़सान न हो.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल      



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
अबुल हसन ख़रक़ानी प्रसिद्ध सूफ़ी संत हैं. उनका असली नाम अबुल हसन हैं, मगर ख़रक़ान में जन्म लेने की वजह से वे अबुल हसन ख़रक़ानी के नाम से विख्यात हुए. सुप्रसिद्ध ग्रंथकार हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार के मुताबिक़ एक बार सत्संग में अबुल हसन ख़रक़ानी ने बताया कि उन्हें उस वक़्त की बातें भी याद हैं, जब वे अपनी मां के गर्भ में चार महीने के थे.

अबुल हसन ख़रक़ानी एक चमत्कारी संत थे, लेकिन उन्होंने कभी लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. वे कहते हैं कि अल्लाह अपने यश के लिए चमत्कार दिखाने वालों से चमत्कारी शक्तियां वापस ले लेता है. उन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग केवल लोककल्याण के लिए किया. एक बार उनके घर कुछ मुसाफ़िर आ गए, जो बहुत भूखे थे. उनकी पत्नी ने कहा कि घर में दो-चार ही रोटियां हैं, जो इतने मेहमानों के लिए बहुत कम पड़ेंगी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि सारी रोटियों को साफ़ कपड़े से ढककर मेहमानों के सामने रख दो. उनकी पत्नी ने ऐसा ही किया. मेहमानों ने भरपेट रोटियां खाईं, मगर वे कम न पड़ीं. मेहमान तृप्त होकर उठ गए, तो उनकी पत्नी ने कपड़ा हटाकर देखा, तो वहां एक भी रोटी नहीं थी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि अगर और भी मेहमान आ जाते, तो वे भी भरपेट भोजन करके ही उठते.

वे बाहरी दिखावे में विश्वास न रखकर कर्म में यकीन करते थे. वे कहते हैं कि जौ और नमक की रोटी खाने या टाट के वस्त्र पहन लेने से कोई सूफ़ी नहीं हो जाता. अगर ऐसा होता, तो ऊन वाले और जौ खाने वाले जानवर भी सूफ़ी कहलाते. अबुल हसन ख़रक़ानी कहते हैं कि सूफ़ी वह है जिसके दिल में सच्चाई और अमल में निष्ठा हो. वे शिष्य नहीं बनाते थे, क्योंकि उन्होंने भी स्वयं किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी. वे कहते थे कि उनके लिए अल्लाह ही सब कुछ है. मगर इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि सांसारिक लोग अल्लाह के इतने करीब नहीं होते, जितने संत-फ़कीर होते हैं. इसलिए लोगों को संतों के प्रवचनों का लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि संतों का तो बस एक ही काम होता है अल्लाह की इबादत और लोककल्याण के लिए सत्संग करना.

एक बार किसी क़ाफ़िले को ख़तरनाक रास्ते से यात्रा करनी थी. क़ाफ़िले में शामिल लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से आग्रह किया कि वे उन्हें कोई ऐसी दुआ बता दें, जिससे वे यात्रा की मुसीबतों से सुरक्षित रहें. इस पर उन्होंने कहा कि जब भी तुम पर कोई मुसीबत आए, तो तुम मुझे याद कर लेना. मगर लोगों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. काफ़ी दूरी तय करने के बाद एक जगह डाकुओं ने क़ाफ़िले पर धावा बोल दिया. एक व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा धन और क़ीमती सामान था, उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद किया. जब डाकू क़ाफ़िले को लूटकर चले गए, तो क़ाफ़िले वालों ने देखा कि उनका तो सब सामान लुट चुका है, लेकिन उस व्यक्ति का सारा सामान सुरक्षित है. लोगों ने उससे इसकी वजह पूछी, तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद कर उनसे सहायता की विनती की थी. इस वाक़िये के कुछ वक़्त बाद जब क़ाफ़िला वापस ख़रक़ान आया, तो लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से कहा कि हम अल्लाह को याद करते रहे, मगर हम लुट गए और उस व्यक्ति ने आपका नाम लिया, तो वह बच गया. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि तुम केवल ज़ुबानी तौर पर अल्लाह को याद करते हो, जबकि संत सच्चे दिल से अल्लाह को याद करते हैं. अगर तुमने मेरा नाम लिया होता, तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता.

एक बार वे अपने बाग की खुदाई कर रहे थे, तो वहां से चांदी निकली. उन्होंने उस जगह को बंद करके दूसरी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से सोना निकला. फिर तीसरी और चौथी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से भी हीरे-जवाहरात निकले, लेकिन उन्होंने किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया और फ़रमाया कि अबुल हसन इन चीज़ों पर मोहित नहीं हो सकता. ये तो क्या अगर दोनों जहां भी मिल जाएं, तो भी अल्लाह से मुंह नहीं मोड़ सकता. हल चलाते में जब नमाज़ का वक़्त आ जाता, तो वे बैलों को छोड़कर नमाज़ अदा करने चले जाते. जब वे वापस आते तो ज़मीन तैयार मिलती.

वे लोगों को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करने की सीख भी देते थे. अबुल हसन ख़रक़ानी और उनके भाई बारी-बारी से जागकर अपनी मां की सेवा करते थे. एक रात उनके भाई ने कहा कि आज रात भी तुम ही मां की सेवा कर लो, क्योंकि मैं अल्लाह की इबादत करना चाहता हूं. उन्होंने अपने भाई की बात मान ली. जब उनके भाई इबादत में लीन थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि ''अल्लाह ने तेरे भाई की मग़फ़िरत की और उसी के ज़रिये से तेरी भी मग़फ़िरत कर दी.'' यह सुनकर उनके भाई को बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह की इबादत की, इसलिए इसका पहला हकदार तो मैं ही था. तभी उसे ग़ैबी आवाज़ सुनाई दी कि ''तू अल्लाह की इबादत करता है, जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है. अबुल हसन ख़रक़ानी अपनी मां की सेवा कर रहा है, क्योंकि बीमार ज़ईफ़ मां को इसकी बेहद ज़रूरत है.'' यानी, अपने माता-पिता और दीन-दुखियों की सेवा करना भी इबादत का ही एक रूप है. वे कहते थे कि मुसलमान के लिए हर जगह मस्जिद है, हर दिन जुमा है और हर महीना रमज़ान है. इसलिए बंदा जहां भी रहे अल्लाह की इबादत में मशग़ूल रहे. एक रोज़ उन्होंने ग़ैबी आवाज़ सुनी कि ''ऐ अबुल हसन जो लोग तेरी मस्जिद में दाख़िल हो जाएंगे उन पर जहन्नुम की आग हराम हो जाएगी और जो लोग तेरी मस्जिद में दो रकअत नमाज़ अदा कर लेंगे उनका हश्र इबादत करने वाले बंदों के साथ होगा.''

अपनी वसीयत में उन्होंने ज़मीन से तीस गज़ नीचे दफ़न होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी. अबुल हसन ख़रक़ानी यह भी कहते थे कि किसी भी समाज को शत्रु से उतनी हानि नहीं पहुंचती, जितनी कि लालची विद्वानों और गलत नेतृत्व से होती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि लोग यह समझें कि हक़ीक़त में उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
त्यौहारों का ताल्लुक़ सिर्फ़ मज़हब से ही नहीं होता है, बल्कि ये संस्कृति से भी वाबस्ता होते हैं. मज़हब किसी एक देश से शुरू होता है. फिर वह धीरे-धीरे दुनियाभर में फैल जाता है. हर देश, हर प्रदेश और हर क्षेत्र की अपनी एक सांस्कृतिक पहचान होती है. वहां के बाशिन्दों की अपनी भाषा, अपना रहन-सहन और अपना खान-पान होता है.

किसी मज़हब को अपनाते हुए वे अपनी अक़ीदत तो बदल लेते हैं, लेकिन उनका रहन-सहन नहीं बदलता.     शबे-बरात भी एक ऐसा ही मुस्लिम त्यौहार है, जिसकी जड़ें भले ही अरब में रही हों, लेकिन यह हिन्दुस्तान में आकर यहां की संस्कृति में ढल गया और इसका एक अहम हिस्सा बन गया.
शबे-बरात का त्यौहार इस्लामी साल के आठवें माह शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ को मनाया जाता है. जैसा कि पहले भी ज़िक्र किया गया है कि शब का मतलब है रात और बरात का मतलब है बरी होना. इसीलिए इस रात को निजात वाली रात कहा जाता है.

इस रात अल्लाह की बेशुमार रहमतें नाज़िल होती हैं, इसलिए इसे रहमत वाली रात भी कहा जाता है. बेशुमार बरकतों की वजह से इसे बरकत वाली रात भी कहा जाता है. चूंकि इस रात आइन्दा जन्म लेने वाले बच्चों के नाम अल्लाह के यहां लिख दिए जाते हैं और आइन्दा मरने वाले लोगों के नाम काट दिए जाते हैं, इसलिए इसे परवाना रात भी कहा जाता है.

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि शाबान मेरा महीना है. इसलिए इस माह और ख़ासकर इस रात की बड़ी अहमियत है.  

साफ़-सफ़ाई 
शाबान का चाँद नज़र आते ही घरों में शबे-बरात और रमज़ान की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. शबे-बरात दिवाली जैसा त्यौहार लगता है. जिस तरह दिवाली से पहले हिन्दू अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करते हैं, उसी तरह मुसलमान भी शाबान का महीना शुरू होते ही अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करने लग जाते हैं.
घरों में रंग-रौग़न किया जाता है. चूंकि रमज़ान में रोज़ों और तरावीह की वजह से मसरूफ़ियात बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. इसलिए इसी माह रमज़ान के साथ-साथ ईद की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं. रमज़ान और ईद की ख़रीददारी जैसे काम भी शाबान में ही मुकम्मल कर लिए जाते हैं.

हलवा
दिवाली की तरह ही शबे-बरात को घर में शीरनी बनाई जाती है. सूजी और चने की दाल का हलवा बनाया जाता है. यह हलवा रिश्तेदारों और जान-पहचान वाले लोगों को भेजा जाता है. नर्गिस बताती हैं कि उनके घर तक़रीबन दस किलो सूजी और इतना ही चने की दाल का हलवा बनता है.
चने की दाल का हलवा बनाने में बहुत वक़्त और मेहनत लगती है. इसलिए इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती है. चने की दाल को भिगोया जाता है. फिर इसे इतने पानी में उबाला जाता कि वह ख़ुश्क हो जाए. फिर दाल को सिल बट्टे पर पीसा जाता है, क्योंकि इसे सूखा ही पीसना होता है.
इसके बाद इसे तश्तरी में फैलाकर सुखाया जाता है. फिर इसे कढ़ाही में भूना जाता है. इसी तरह सूजी को भी भून लिया जाता है. शबे-बरात से एक दिन पहले इन्हें चाशनी में मिलाकर सूखा हलवा यानी बर्फ़ी बनाई जाती है. फिर बड़ी-बड़ी तश्तरियों में इसे फैलाकर उस पर सूखे मेवे डाले जाते हैं और चाँदी के वर्क़ लगाए जाते हैं.
शबनम बताती हैं कि मुस्लिम इलाक़ों में शाबान में हलवाई भी शबे-रात का हलवा बनाते थे. हलवे के लिए उन्हें पहले से ही ऑर्डर दे दिए जाते थे. बाक़ी मिठाइयों के साथ-साथ वे हलवा बनाने में जुट जाते थे. लेकिन वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल गया है.
अब वह पहले वाली रौनक़े नहीं रहीं. बहुत से लोगों ने नियाज़-नज़र छोड़ दी है. इसलिए वे अब शबे-रात पर सूखा हलवा भी नहीं बनवाते. इस सबके बीच आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनी इन रिवायतों को ज़िन्दा रखे हुए हैं. 
    
नियाज़
हलवे के साथ-साथ शबे-बरात के दिन मसूर की दाल बनाने की रिवायत भी है. इस दिन मसूर की दाल, रोटी और हलवे पर नियाज़ दी जाती है. लोग शीरनी तक़सीम करते हैं. वे ज़रूरतमंदों को खाना भी खिलाते हैं.शाबान में क़ब्रिस्तान में क़ब्रों की मरम्मत का काम शुरू हो जाता है.
जिन क़ब्रों की मिट्टी गिर गई है और क़ब्रें टूट गई हैं, उन्हें ठीक किया जाता है. शबे-बरात को लोग क़ब्रिस्तान जाकर फ़ातिहा पढ़ते हैं और अहले क़ब्रिस्तान को ईसाले-सवाब पहुंचाते हैं और उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करते हैं.
क़ब्रिस्तान में मोमबत्तियां जलाकर रौशनी की जाती है और अगरबत्तियां भी जलाई जाती हैं. बहुत से लोग अपने अज़ीज़ों की क़ब्रों और अन्य क़ब्रों पर फूल रखते हैं. लोग एक-दूसरे से मिलकर अपनी उन ख़ताओं की माफ़ी मांगते हैं, जो उनसे जाने या अनजाने में हुई हैं.
वे एक-दूसरे से कहते हैं कि हमसे जाने या अनजाने में जो ग़लती हो गई हो और जिस बात से आपका दिल दुखा है, उसके लिए हमें माफ़ कर दें और राज़ी रहना. हम भी आपसे राज़ी हैं और हमारा अल्लाह भी राज़ी है. इस तरह कहने से उनके बीच का मनमुटाव आदि भी ख़त्म हो जाता है. और इस तरह वे एक नये बेहतर रिश्ते की शुरुआत करते हैं. इन बातों से ग़ुरूर भी ख़त्म होता है, जो तमाम बुराइयों की जड़ है. 

रौशनी
दिवाली की तरह शबे-बरात में घरों में रौशनी की जाती है. चूंकि रात में रहमत के फ़रिश्ते आते हैं, इसलिए घर में रौशनी होनी चाहिए. शिया मुसलमान मानते हैं कि इस दिन बारहवें इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम की विलादत होगी. इसलिए वे उनके जन्म लेने से पहले ही ख़ुशियां मनाते हुए अपने घरों को रौशन करते हैं. शबे-बरात में बच्चे आतिशबाज़ी करते हैं. रौशनी और आतिशबाज़ी देखकर दिवाली का गुमां होता है. 

सबीलें
शबे-बरात में मजलिसें होती हैं. रात में लोग इबादत करते हैं. लोगों का मस्जिदों में भी आना-जाना लगा रहता है. इसलिए रातभर चहल-पहल रहती है. शबे-रात में सबीलें लगाई जाती हैं, जैसे चाय की सबीलें, शर्बत की सबीलें और बिरयानी, ज़र्दा, रोटी आदि की सबीलें लगती हैं.   
दरअसल, हिन्दुस्तान की संस्कृति एक समन्दर की तरह है, जिसमें मिलकर दुनियाभर की संस्कृतियां एक हो जाती हैं. शबे-बरात इसकी एक मिसाल है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है
साभार : आवाज़ 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
इस्लामी साल के आठवें माह शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ को शबे-बरात कहते हैं. शब का मतलब है रात और बरात का मतलब है बरी होना यानी आज़ाद होना, यानी अपने सग़ीरा और कबीरा गुनाहों से तौबा करके अल्लाह से बख़्शीश मांगना. सग़ीरा छोटे गुनाहों को कहा जाता है, जैसे झूठ बोलना, किसी की बुराई करना, अपने वालिदैन और बड़ों की बात न मानना, किसी के साथ बुरा बर्ताव करना आदि.
कबीरा बड़े गुनाहों को कहा जाता है, जैसे शिर्क और वे तमाम गुनाह, जिनके लिए क़ुरआन करीम में दोज़क़ की सज़ा का ज़िक्र किया गया है. शबे-बरात को निजात वाली रात, रहमत वाली रात, बरकत वाली रात और परवाना रात भी कहा जाता है.

अल्लाह के आख़िरी नबी और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- :शाबान मेरा महीना है." इसलिए आशिक़े-रसूल के लिए इस माह की बहुत अहमियत है. इसी माह क़िब्ला बदला गया था. पहले कुछ अरसे तक बैतुल मुक़द्दस क़िब्ला रहा और फिर अल्लाह तआला ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काबा शरीफ़ की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म दिया। क़ुरआन करीम में इसका ज़िक्र है.

शबे-बरात में लोग क़ब्रिस्तान जाकर फ़ातिहा पढ़ते हैं और अहले क़ब्रिस्तान के लिए मग़फ़िरत की दुआ करते हैं. वे क़ब्रिस्तान में मोमबत्तियां जलाकर रौशनी करते हैं और अगरबत्तियां भी जलाते हैं. बहुत से लोग अपने अज़ीज़ों की क़ब्रों पर फूल रखते हैं.

वे रातभर जागकर इबादत करते हैं. वे क़ुरआन की तिलावत करते है, नफ़िल नमाज़ पढ़ते हैं और ज़िक्रे-इलाही में मशग़ूल रहते हैं. वे अपने गुनाहों के लिए तौबा करते हैं और अल्लाह तआला से बख़्शीश मांगते हैं. वे अगले दिन रोज़ा रखते हैं. शाबान की पन्द्रहवीं तारीख़ का रोज़ा हज़ारी रोज़ा कहलाता है, क्योंकि इसका सवाब एक हज़ार रोज़ों के बराबर माना जाता है. इस दिन लोग अपना ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहते हैं. 
              
शबे-बरात की फ़ज़ीलत
शबे-बरात की बड़ी अहमियत है. मुख़तलिफ़ हदीसों में शबे-बरात की फ़ज़ीलत बयान की गई है. हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम शाबान की पन्द्रहवीं रात को मेरे पास आए और अर्ज़ किया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आसमान की तरफ़ सर उठाएं.
मैंने पूछा- ये कौन सी रात है?
उन्होंने फ़रमाया- ये वह रात है, जिसमें अल्लाह तआला रहमत के दरवाज़ों में से तीन सौ दरवाज़े खोलता है और हर उस शख़्स को बख़्श देता है, जो मुशरिक न हो. अलबत्ता जादूगर, काहिन, शराबी, सूदख़ोर और ज़िना करने वाले की उस वक़्त तक बख़्शीश नहीं होती, जब तक वे अपने गुनाहों से तौबा न कर ले.
जब रात का चौथा हिस्सा गुज़र गया तो हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! अपना सर उठाएं. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सर उठाया, तो देखा कि जन्नत के दरवाज़े खुले हुए हैं और पहले दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात को रुकू करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है.
दूसरे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में सजदा करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. तीसरे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में दुआ करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. चौथे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात में ज़िक्रे-इलाही करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है.
पांचवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि अल्लाह तआला के ख़ौफ़ से रोने वालों के लिए ख़ुशख़बरी है. छठे दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि इस रात तमाम मुसलमानों के लिए ख़ुशख़बरी है. सातवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि क्या कोई मांगने वाला है, जिसके सवाल के मुताबिक़ अता किया जाए. आठवें दरवाज़े पर एक फ़रिश्ता आवाज़ दे रहा है कि क्या कोई बख़्शीश मांगने वाला है, जिसे बख़्श दिया जाए.
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा- ऐ जिब्राईल अलैहिस्सलाम! ये दरवाज़े कब तक खुले रहेंगे? उन्होंने फ़रमाया- रात के शुरू होने से लेकर सूरज के निकलने तक ये दरवाज़े खुले रहेंगे. फिर उन्होंने फ़रमाया- ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! इस रात अल्लाह क़बीला बनू कलब की बकरियों के बालों के बराबर लोगों को दोज़ख़ से आज़ाद करता है. (जामी तिर्मज़ी, इब्ने माजा)

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं- "रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- क्या तुम जानती हो कि शाबान की पन्द्रहवीं शब में क्या होता है? मैंने कहा- इस रात में क्या होता है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- आइन्दा साल में होने वाले हर बच्चे का नाम इस रात लिख दिया जाता है और इसी रात आइन्दा साल मरने वालों के नाम भी लिखे जाते हैं. इसी रात बन्दों का रिज़्क़ उतरता है और इसी रात लोगों के आमाल उठा लिए जाते हैं." (मुसनद अबू याला)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं- "मुझे ये बात पसंद है कि इन चार रातों में आदमी ख़ुद को तमाम दुनियावी मसरूफ़ियात से इलाही की इबादत के लिए फ़ारिग़ रखे. वे चार रातें हैं- ईदुल फ़ित्र की रात, ईदुल अज़हा की रात, शाबान की पन्द्रहवीं रात और रजब की पहली रात." (इब्न अल जावज़ी)

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि शाबान का चांद देखते ही सहाबा किराम तिलावते क़ुरआन में मशग़ूल हो जाते और अपने मालों की ज़कात निकालते, ताकि कमज़ोर व मोहताज लोग रमज़ान के रोज़े रखने पर क़ादिर हो सकें. हुक्मरान क़ैदियों को रिहा करते. ताजिर सफ़र करते, ताकि क़र्ज़ अदा कर सकें और रमज़ान में एतिकाफ़ कर सकें.

हज़रत ताऊस यमानी फ़रमाते हैं कि मैंने हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम से शबे-बरात और उसमें होने वाले अमल के बारे पूछा, तो आपने फ़रमाया कि मैं इस रात को तीन हिस्सों में तक़सीम करता हूं. एक हिस्से में नाना जान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद पढ़ता हूं.

दूसरे हिस्से में अपने रब से इस्तग़फ़ार करता हूं और तीसरे हिस्से में नमाज़ पढ़ता हूं. मैंने अर्ज़ किया कि जो शख़्स ये अमल करे उसके लिए क्या सवाब है? आपने फ़रमाया- मैंने वालिद माजिद हज़रत अली अलैहिस्सलाम से सुना और उन्होंने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना- ये अमल करने वालों को मुक़र्रेबीन लोगों में लिख दिया जाता है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार : आवाज़ 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आदि अदृश्य नदी सरस्वती के तट पर बसे हरित प्रदेश हरियाणा अकसर जाना होता है. बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई पड़ता है. पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं. खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं. दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं. परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है. हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है. रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है. दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी. दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाखों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है. पिछले तीन दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है. गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं. गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है. हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है. पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं. गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं. शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं. ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं. पहले ग्रामीण अंचलों में सांग न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे. प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परंपरा वाले प्रदेश हरियाणा में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं. लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं. शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले हरियाणा के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है. पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है.

हरियाणा विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति का प्रदेश रहा है. यहां के गांव प्राचीन समय से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र रहे हैं. गीता का जन्मस्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं. ये लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआखोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है. नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं. लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है. इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं. अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है.

शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है. तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली वह रौनक़ नहीं रही है. शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं. शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं. अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं. समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है. समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं. इसलिए हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें. मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा. आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं.

विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए. ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे. काश, वह दिन जल्द आ जाए. हम तो यही दुआ करते हैं. आमीन...


लाल बिहारी लाल
भारत में  सत्ता दिल्ली सलतनत से मुगल साम्राज्य फिर मुगल से जब सत्ता अंग्रैजो के हाथ में गई तो पहले अंग्रैजों का व्यापारिक उदेश्य था पर धीरे-धीरे उनका राजनैतिक रुप भी समने नजर आने लगा। और वे अपने इस कुटिल चाल में कामयाब भी हो गये । धीरे –धीरे उनके क्रिया-कलापों के प्रति जनमानस में असंतोष की भावना पनपने लगी इसी का परिणाम सन 1857 के सिपाही विद्रोह के रुप में देखने को मिला।
सन 1857के विद्रोह के बाद जनमानस संगठित होने लगा औऱ अग्रैजों के विरुद्ध लामबंद होने लगा। प्रबुद्ध लोगों औऱ आजादी के दीवानों द्वारा सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस की स्थापना की गई। प्रारंभिक 20 वर्षों में 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओ का दबदबा रहा। इसके बाद धीरे-धीरे चरमपंथी (गरमदल) नेताओ के हाथों में बागडोर जाने लगी। इसी बीच महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को स्वदेश (मुम्बई) में कदम रखा  तभी से हर साल 9 प्रवासी दिवस मनाते आ रहे हैं। जब गांधी जी स्वदेश आये तो उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने सुभाव दिया कि आप देश में जगह-जगह भ्रमण कर देश की स्थिति का अवलोकन करें। अपने राजनैतिक गुरु गोखले के सुझाव पर गांधी जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से भ्रमण करते हुए बंगला के मशहुर लेखक रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन पहुँचे। वही पर टैगोर ने सबसे पहले गांधी जी को महात्मा कहा था औऱ गांधी जी ने टैगोर को गुरु कहा था। गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में यात्रा करते थे ताकि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सके। मई 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद के पास कोचरब में अपना आश्रम स्थापित किया लेकिन वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण साबरमती क्षेत्र में आश्रम की स्थापना की। दिसम्बर 1915 में कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में गांधी जी ने भाग लिया गांधी जी ने यहाँ विभाजित भारत को महसूस किया देश अमीर-गरीब, स्वर्ण-दलित,, हिन्दू- मुस्लिम, नरम-गरम विचारधारा , रुढ़िवादी आधुनिक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक , ब्रिटिश विरोधी जिनको इस बात का बहुत कष्ट था कि देश गुलाम है। गांधी जी किसके पक्ष में खड़े हों या सबको साथ लेकर चले। गांधी जी उस समय के करिश्माई नेता थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सबको साथ लेकर सबके अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी।

गांधी जी ने पहली बार देश में सन 1917 में बिहार के चम्पारन में सत्याग्रह किया| उनका आन्दोलन जन आन्दोलन होता था। चंपारण में नील किसानों के तीन कठियाविधि से मुक्ति दिलाई औऱ अंग्रैजों से अपनी बात मनवाने में कामयाब हुए। गरीबों को सुत काटने एवं उससे कपड़े बनाने की प्रेरणा दी जिससे इनके जीवन-यापन में गुणात्मक सुधार आया।
गुजरात क्षेत्र का खेडा क्षेत्र -बाढ़ एवं अकाल से पीड़ित था जैसे सरदार पटेल एंव अनेक स्वयं सेवक आगे आये उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कर राहत की माँग की । गांधी जी के आगे अंग्रैजो को झुकना पड़ा किसानों को कर देने से मुक्ति मिली सभी कैदी मुक्त कर दिए गये गांधी जी की ख्याति देश भर में फैल गई। यही नहीं खेड़ा क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया। वहाँ के शराबियों को शराब की लत को भी छुडवाया। सन् 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने रालेटएक्ट के तहत प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया, बिना जाँच के किसी को भी कारागार में डाला जा सकता था । गांधी जी ने देशभर में रालेट एक्ट के विरुद्ध अभियान चलाया।पंजाब में इस एक्ट का विशेष रूप से विरोध हुआ पंजाब जाते समय में गांधी जी को कैद कर लिया गया साथ ही स्थानीय कांग्रेसियों को भी कैद कर लिया गया । 13 अप्रैल को 1919 बैसाखी के पर्व पर जिसे हिन्दू मुस्लिम सिख सभी मनाते थे अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग इकठ्ठे हुए थे। जलियांवालाबाग़ चारों तरफ से मकानों से घिरा था बाहर जाने के लिए एक ही गेट था वहाँ एक जनसभा में नेता भाषण दे रहे थे तभी जरनल डायर ने निकलने के एकमात्र रास्ते को रोक कर निर्दोष बच्चों स्त्रियों व पुरुषों को गोलियों से भून डाला एक के ऊपर एक गिर कर लाशों के ढेर लग गये जिससे पूरा देश आहत हुआ गांधी जी ने खुल कर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया अब एक ऐसे देशव्यापी आन्दोलन की जरूरत थी जिससे ब्रिटिश सरकार की जड़े हिल जाएँ।

खिलाफत आंदोलन के जरीये हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात हो या फिर असहयोग आंदोलन की गांधी जी ने अपना परचम अग्रैजों के विरुद्ध पूरे देश में लहरा दिया। दिसंबर 1921 में गांधी जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य अब स्वराज्य हासिल करना हो गया। गांधी जी ने अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस को राष्ट्रीय फलक पर पहुँचाने की बात की। इन्होंने एक अनुशासनात्मक समिति का गठन किया। 1925-1928 तक गांधी जी ने समाज सुधार के लिए भी काफी काम किया। धीरे –धीरे कांग्रेस का दबदबा पूरे देश में बढ़ता गया। औऱ राष्ट्र की भावना को प्रेरित कर देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने का काम गांधी जी ने बाखूबी किया। चौराचौरी के घटना से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया पर इन्होने अपनी बात को पूरजोर तरीके से रखना जारी रखा। इन्होने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पहले जपान पर परमाणु बम से हमले की निंदा की,आहत भी हुए पर अपना सत्य औऱ अहिंसा कामार्ग नहीं छोड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या सन 1942 में गांधी जी द्वारा अग्रैजों भारत छोड़ों आंन्दोलन में करो या मरो का नारा । आजादी की मांग में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अग्रैज विवश हो गये औऱ ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली  के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई। ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथु राम गोड्से द्वारा कर  कर दी गई ।फिर भी भारतीय राजनीति  में गांधी जी  आज भी प्रासांगिक एवं अद्वितीय है। गांधी जी भारत के हर जनमानस में विद्यमान है।
 (लेखक साहित्य टीवी के संपादक हैं)

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहरीकरण ने लोक मानस से बहुत कुछ छीन लिया है. चौपालों के गीत-गान लुप्त हो चले हैं. लोक में सहज मुखरित होने वाले गीत अब टीवी कार्यक्रमों में सिमट कर रह गए हैं. फिर भी गांवों में, पर्वतों और वन्य क्षेत्रों में बिखरे लोक जीवन में अभी भी इनकी महक बाक़ी है. हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पारम्परिक लोकगीतों और लोककथाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं, जबकि मौजूदा आधुनिक चकाचौंध के दौर में शहरों में लोकगीत अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं. संचार माध्यमों के अति तीव्र विकास और यातायात की सुविधा के चलते प्रियतम की प्रतीक्षा में पल-पल पलकें भिगोती नायिका अब केवल प्राचीन काव्यों में ही देखी जा सकती है. सारी प्रकृति संगीतमय है. इसके कण-कण में संगीत बसा है. मनुष्य भी प्रकृति का अभिन्न अंग है, इसलिए संगीत से अछूता नहीं रह सकता. साज़ और सुर का अटूट रिश्ता है. साज़ चाहे जैसे भी हों, संगीत के रूप चाहे कितने ही अलग-अलग क्यों न हों, अहम बात संगीत और उसके प्रभाव की है. जब कोई संगीत सुनता है तो यह सोचकर नहीं सुनता कि उसमें कौन से वाद्यों का इस्तेमाल हुआ है या गायक कौन है या राग कौन सा है या ताल कौन सी है. उसे तो केवल संगीत अच्छा लगता है, इसलिए वह संगीत सुनता है यानी असल बात है संगीत के अच्छे लगने की, दिल को छू जाने की. संगीत भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब लोकगीतों में झलकता है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है.

लोकगीत जनमानस को लुभाते रहे हैं. अस्सी वर्षीय कुमार का कहना है कि वर्षा ऋतु का आख्यान गीत आल्हा कभी जन-जन का कंठहार होता था. वीर रस से ओतप्रोत आल्हा जनमानस में जोश भर देता था. कहते हैं कि अंग्रेज़ अपने सैनिकों को आल्हा सुनवाकर ही जंग के लिए भेजा करते थे. हरियाणा के कलानौर में लोकगीत सुनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे राजस्थान के चुरू निवासी लोकगायक वीर सिंह कहते हैं कि लोकगायकों में राजपूत, गूजर, भाट, भोपा, धानक व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शामिल हैं. वे रोज़ी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर दूरदराज़ के शहरों और गांवों में निकल पड़ते हैं. वे बताते हैं कि लोकगीत हर मौसम और हर अवसर विशेष पर अलग-अलग महत्व रखते हैं. इनमें हर ऋतु का वर्णन मनमोहक ढंग से किया जाता है. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद चांदनी रात में चौपालों पर बैठे किसान ढोल-मंजीरे की तान पर उनके लोकगीत सुनकर झूम उठते हैं. फ़सल की कटाई के वक़्त गांवों में काफ़ी चहल-पहल देखने को मिलती है. फ़सल पकने की ख़ुशी में किसान कुसुम-कलियों से अठखेलियां करती बयार, ठंडक और भीनी-भीनी महक को अपने रोम-रोम में महसूस करते हुए लोक संगीत की लय पर नाचने लगते हैं. वे बताते हैं कि किसान उनके लोकगीत सुनकर उन्हें बहुत-सा अनाज दे देते हैं, लेकिन वह पैसे लेना ज़्यादा पसंद करते हैं. अनाज को उठाकर घूमने में उन्हें काफ़ी परेशानी होती है. वे कहते हैं कि युवा वर्ग सुमधुर संगीत सुनने के बजाय कानफोड़ू संगीत को ज़्यादा महत्व देता है. शहरों में अब लोकगीत-संगीत को चाहने वाले लोग नहीं रहे. दिन भर गली-मोहल्लों की ख़ाक छानने के बाद उन्हें बामुश्किल 50 से 60 रुपये ही मिल पाते हैं. उनके बच्चे भी बचपन से ही इसी काम में लग जाते हैं. चार-पांच साल की खेलने-पढ़ने की उम्र में उन्हें घड़ुवा, बैंजू, ढोलक, मृदंग, पखावज, नक्कारा, सारंगी और इकतारा आदि वाद्य बजाने की शिक्षा शुरू कर दी जाती है. यही वाद्य उनके खिलौने होते हैं.

दस वर्षीय बिरजू ने बताया कि लोकगीत गाना उसका पुश्तैनी पेशा है. उसके पिता, दादा और परदादा को भी यह कला विरासत में मिली थी. इस लोकगायक ने पांच साल की उम्र से ही गीत गाना शुरू कर दिया था. इसकी मधुर आवाज़ को सुनकर किसी भी मुसाफ़िर के क़दम ख़ुद ब ख़ुद रुक जाते हैं. इसके सुर और ताल में भी ग़ज़ब का सामंजस्य है. मानसिंह ने इकतारे पर हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद और लैला-मजनूं के क़िस्से सुनाते हुए अपनी उम्र के 55 साल गुज़ार दिए. उन्हें मलाल है कि सरकार और प्रशासन ने कभी लोकगायकों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में उन्हें घर से बेघर होना पड़ता है. उनकी ज़िन्दगी ख़ानाबदोश बनकर रह गई है. ऐसे में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करना पहाड़ से दूध की नहर निकालने से कम नहीं है. उनका कहना है कि दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण बच्चे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम रहते हैं. सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिलता. साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और इसी तरह की अन्य योजनाओं से वे अनजान हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोंकरे खाने वाले लोगों को शिक्षा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. अगर रोज़गार मिल जाए तो उन्हें पढ़ना भी अच्छा लगेगा. वे बताते हैं कि लोक सम्पर्क विभाग के कर्मचारी कई बार उन्हें सरकारी समारोह या मेले में ले जाते हैं और पारिश्रमिक के नाम पर 200 से 300 रुपये तक दे देते हैं, लेकिन इससे कितने दिन गुज़ारा हो सकता है. आख़िर रोज़गार की तलाश में भटकना ही उनकी नियति बन चुका है.

कई लोक गायकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. भूपेन हज़ारिका और कैलाश खैर इसकी बेहतरीन मिसालें हैं. असम के सादिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन में एक गीत लिखा और दस साल की उम्र में उसे गाया. बारह साल की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती में काम किया था. उन्हें 1975 में सर्वोत्कृष्ट क्षेत्रीय फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 2011 में पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. कैलाश खैर ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और लोकगीतों को विदेशों तक पहुंचाया, मगर सभी लोक गायक भूपेन हजारिका और कैलाश खैर जैसे क़िस्मत वाले नहीं होते. ऐसे कई लोक गायक हैं, जो अनेक सम्मान पाने के बावजूद बदहाली में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. राजस्थान के थार रेगिस्तान की ख़ास पहचान मांड गायिकी को बुलंदियों तक पहुंचाने वाली लोक गायिका रुक्मा उम्र के सातवें दशक में बीमारियों से लड़ते-लड़ते ज़िन्दगी की जंग हार गईं और 20 जुलाई 2011 को उनकी मौत के साथ ही मांड गायिकी का एक युग भी समाप्त हो गया. थार की लता के नाम से प्रसिद्ध रुक्मा ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक पेंशन के लिए कोशिश करती रहीं, लेकिन यह सरकारी सुविधा उन्हें नसीब नहीं हुई. वह मधुमेह और ब्लड प्रेशर से पीड़ित थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण वक़्त पर दवाएं नहीं ख़रीद पाती थीं. उनका कहना था कि वह प्रसिद्ध गायिका होने का ख़ामियाज़ा भुगत रही हैं. सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. हालत इतनी बदतर है कि बीपीएल में भी उनका नाम शामिल नहीं है. विधवा और विकलांग पेंशन से भी वह वंचित हैं. सरकारी बाबू सोचते हैं कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.

रुक्मा ने विकलांग होते हुए भी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम पेश कर मांड गायिकी की सरताज मलिका रेशमा, अलनजिला बाई, मांगी बाई और गवरी देवी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. बाड़मेर के छोटे से गांव जाणकी में लोक गायक बसरा खान के घर जन्मी रुक्मा की सारी ज़िन्दगी ग़रीबी में बीती. रुक्मा की दादी अकला देवी और माता आसी देवी थार इलाक़े की ख्यातिप्राप्त मांड गायिका थीं. गायिकी की बारीकियां उन्होंने अपनी मां से ही सीखीं. केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस… उनके इस गीत को सुनकर श्रोता भाव विभोर हो उठते थे. उन्होंने पारम्परिक मांड गायिकी के स्वरूप को बरक़रार रखा. उनका मानना था कि पारम्परिक गायिकी से खिलवाड़ करने से उसकी नैसर्गिक मौलिकता ख़त्म हो जाती है. विख्यात रंगमंच कर्मी मल्लिका साराभाई ने उनके जीवन पर डिस्कवरी चैनल पर वृत्तचित्र प्रसारित किया था. विदेशों से भी संगीत प्रेमी उनसे मांड गायिकी सीखने आते थे. ऑस्ट्रेलिया की सेरहा मेडी ने बाडमेर के गांव रामसर में स्थित उनकी झोपड़ी में रहकर उनसे संगीत की शिक्षा ली और फिर गुलाबी नगरी जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में आयोजित थार महोत्सव में मांड गीत प्रस्तुत कर ख़ूब सराहना पाई. रुक्मा की ज़िन्दगी के ये यादगार लम्हे थे. अब उनकी छोटी बहू हनीफ़ा मांड गायिकी को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रही हैं. एक तरफ़ सरकार कला संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े समारोहों का आयोजन कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देती है, वहीं दूसरी तरफ़ देश की कला-संस्कृति को विदेशों तक फैलाने वाले कलाकारों को ग़ुरबत में मरने के लिए छोड़ देती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि लोकगीत गाने वालों को लोक गायक कहा जाता है. लोकगीत से आशय है लोक में प्रचलित गीत, लोक रचित गीत और लोक विषयक गीत. कजरी, सोहर और चैती आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियां हैं. त्यौहारों पर गाये जाने वाले मांगलिक गीतों को पर्व गीत कहा जाता है. ये गीत रंगों के पावन पर्व होली, दीपावली, छठ, तीज व अन्य मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं. विभिन्न ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों को ऋतु गीत कहा जाता है. इनमें कजरी, चतुमार्सा, बारहमासा, चइता और हिंडोला आदि शामिल हैं. इसी तरह अलग-अलग काम-धंधे करने वालों के गीतों को पेशा गीत कहा जाता है. ये गीत लोग काम करते वक़्त गाते हैं, जैसे गेहूं पीसते समय महिलाएं जांत-पिसाई, छत की ढलाई करते वक़्त थपाई और छप्पर छाते वक़्त छवाई गाते हैं. इसी तरह गांव-देहात में अन्य कार्य करते समय सोहनी और रोपनी आदि गीत गाने का भी प्रचलन है. विभिन्न जातियों के गीतों को जातीय गीत कहा जाता है. इनमें नायक और नायिका की जाति का वर्णन होता है. इसके अलावा कई राज्यों में झूमर, बिरहा, प्रभाती, निर्गुण और देवी-देवताओं के गीत गाने का चलन है. ये गीत क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनसे वहां के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.



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