सरफ़राज़ ख़ान
साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी कलम से निकले शब्द सीधे रूह में उतर जाते हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक ऐसा ही चमकता हुआ नाम हैं। उन्हें चाहने वाले 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहते हैं। यह ख़िताब उनकी शख़्सियत और उनके लेखन पर पूरी तरह खरा उतरता है। वे सिर्फ़ एक लेखिका या शायरा नहीं हैं। वे एक इस्लामी विदुषी, कवयित्री, कहानीकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक भी हैं। उनके लेखन में जहां एक तरफ़ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों का अक्स दिखता है, वहीं दूसरी तरफ़ मुहब्बत का बेहद कोमल अहसास भी महसूस होता है। उनकी शायरी दिमाग़ से ज़्यादा दिल पर असर करती है। उनके अअल्फ़ाज़ रूह पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

रूहानियत और पारिवारिक संस्कार
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का जीवन रूहानियत और सूफ़ी दर्शन के क़रीब रहा है। वे अपनी कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं। उनकी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान उनके सबसे बड़े आदर्श रहे हैं। वे कहती हैं कि उनकी अम्मी बहुत ही नेक और इबादतगुज़ार महिला थीं।
बचपन में उन्हें इबादत करते देखकर ही फ़िरदौस के मन में रूहानी इल्म हासिल करने की चाहत पैदा हुई। उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘फ़हम अल क़ुरआन’ है। वे इसे अपनी ज़िन्दगी का शाहकार (मास्टरपीस) मानती हैं। उनका मानना है कि इंसान की ज़िन्दगी का असली मकसद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। उनका लेखन इसी मंज़िल तक पहुंचने का एक रास्ता है।

बचपन से ही लेखन का जुनून
लिखने का शौक़ डॉ. फ़िरदौस को बचपन से ही लग गया था। जब वे महज़ छठी कक्षा में थीं, तभी उन्होंने अपनी पहली नज़्म लिखी थी। उनके पिता ने उस नज़्म की क़ाबिलियत को पहचाना और उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में छपने के लिए भेज दिया।
पहली ही नज़्म छपने के बाद उन्हें काफ़ी सराहना मिली। इसके बाद लिखने और छपने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। शुरुआती दौर में छोटे अख़बारों से शुरू हुआ उनका सफ़र आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तक पहुंच चुका है। उनकी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' काफ़ी चर्चा में रही है। यह किताब सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित है। पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को बहुत उपयोगी मानते हैं।

मीडिया जगत में अमिट छाप
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का मीडिया करियर भी बेहद शानदार रहा है। उन्होंने दूरदर्शन, आकाशवाणी और कई प्रतिष्ठित अख़बारों और पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम किया है। आकाशवाणी के साथ उनका एक भावनात्मक रिश्ता है। वे कहती हैं कि उन्होंने रेडियो सुनते हुए ही बचपन बिताया।
साल 1996 में जब रेडियो पर उनका पहला प्रोग्राम आया, तो उनके पिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसके बाद साल 2002 में वे दूरदर्शन से जुड़ीं। वहां उन्होंने सहायक समाचार सम्पादक और प्रोड्यूसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने न सिर्फ़ ख़बरें और लेख लिखे, बल्कि टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटकों का भी सफ़ल लेखन किया। देश का शायद ही कोई बड़ा अख़बार ऐसा हो, जिसमें उनके लेख प्रकाशित न हुए हों।

मुशायरों और कला की दुनिया
लेखन के साथ-साथ डॉ. फ़िरदौस ने संगीत की दुनिया में भी हाथ आज़माया है। उन्होंने कई सालों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली है। उनकी आवाज़ और शब्दों का जादू मुशायरों और कवि सम्मेलनों में ख़ूब चलता है।
जब उनकी रचनाएं गोपालदास नीरज जैसे महान कवि की पत्रिका ‘गीतकार’ में छपीं, तो उन्हें देशभर से न्योते आने लगे। उन्होंने सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में भी शिरकत की है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।

सम्मान और पुरस्कारों का सिलसिला
बेहतरीन पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। साल 2014 में एबीपी न्यूज़ चैनल ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के पुरस्कार से नवाज़ा था। साल 2005 में अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टीट्यूट ने उन्हें कामयाब महिलाओं की सूची में नामांकित किया था। उन्हें दो मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के अवॉर्ड से सम्मानित किया। लेकिन डॉ. फ़िरदौस का मानना है कि सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का प्यार है। वे कहती हैं कि उनके लफ़्ज़ ही उनकी असली पहचान हैं।

भाषाओं पर पकड़ और अनुवाद
वे एक बहुभाषी लेखिका हैं। वे हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखती हैं। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं को विदेशों में भी ख़ूब पसंद किया जाता है। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदेमातरम्' का पंजाबी में अनुवाद किया है।
उनके इस अनुवाद की साहित्यिक हलक़ों में ख़ूब चर्चा हुई। वे पंजाबी पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं।
राहुल गांधी पर लिखी गई उनकी एक नज़्म ने भी काफ़ी सुर्ख़ियां बटोरी थीं। भाषा की सरहदें उनके लिए कभी रुकावट नहीं बनीं।

डिजिटल युग और ब्लॉगिंग
आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो रहा है, डॉ. फ़िरदौस ने ब्लॉगिंग के ज़रिये भी अपनी बात पहुंचाई है। उनके कई मशहूर ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ ब्लॉग पर लोग क़ुरआन करीम की उनकी व्याख्या पढ़ सकते हैं। ‘फ़िरदौस डायरी’ में उनके लिखे गीत, गज़ल और कहानियां मौजूद हैं। ‘मेरी डायरी’ ब्लॉग पर वे समाज, पर्यावरण, राजनीति और समसामयिक विषयों पर अपने विचार साझा करती हैं। इसके अलावा उर्दू के लिए ‘जहांनुमा’ और पंजाबी के लिए ‘हीर’ जैसे ब्लॉग के ज़रिये  वे अपनी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ उनका इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है।
 
देश सेवा और सामाजिक सरोकार
डॉ. फ़िरदौस का व्यक्तित्व सिर्फ़ क़लम तक सीमित नहीं है। वे समाज सेवा में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने हिसार में नागरिक सुरक्षा विभाग में पोस्ट वार्डन के तौर पर काम किया है। वे 'अनुराग साहित्य केन्द्र' की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं। हाल ही में यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक प्रेरक लेखिका के रूप में शामिल किया गया है।

अपनी इच्छाओं के बारे में वे बहुत ही सादगी से कहती हैं कि उन्होंने ज़िन्दगी  में जितना मांगा, ख़ुदा ने उससे कहीं ज़्यादा दिया। वे नफ़रत और जलन जैसी भावनाओं से कोसों दूर रहती हैं। उनका मानना है कि इंसान का अख़लाक (आचरण) ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है। उनके जीवन का सफ़र उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपनी परम्पराओं से जुड़े रहकर दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान की क़लम आज भी समाज को नई दिशा दे रही है और मुहब्बत के पैग़ाम को आम कर रही है।
साभार आवाज़ 


Sarfaraz Khan
Dr Firdaus Khan is an Islamic scholar, poet, short-story writer, journalist, and translator. Known as “The Princess of the Isle of Words”, her writings are about life’s hardships. Through her poetry, she conveys the soft sensations of love. Her poetry touches the minds and hearts of listeners.

Dr Firdaus Khan is associated with the Sufi tradition. She considers her late parents, Khushnudi Khan alias Chandni Khan, and Sattar Ahmad Khan, as her ideals.

The author of Fahm al-Qur’an, a highly acclaimed book, says, “My mother was a very pious and devout woman. From childhood, I saw her immersed in worship. Watching her awakened our interest in worship, and at a very young age, a desire to acquire spiritual knowledge also took root. While writing Fahm al-Qur’an, I realised that I had not wasted my life on transient things. In truth, the purpose of our life is to seek Allah’s pleasure. My work is the path that leads me to that destination; it is part of that very discipline.”

She also wrote Pioneers of Ganga–Jamuni Culture, a book based on the lives and philosophies of Sufi saints, published in 2009 by Prabhat Prakashan Group’s Gyan Ganga. The book is widely discussed and is referred to by PhD scholars working on devotional and Sufi traditions.
She recalls: “I wrote my first poem in the sixth grade. I recited it to my parents, and they loved it. Father got it published in an evening newspaper. The poem was widely praised. Thus began my journey of writing and publication.”

Dr Firdaus Khan worked with Doordarshan, All India Radio, and prestigious newspapers and magazines of the country for many years.
“I share a heartfelt bond with All India Radio. I grew up listening to the radio, and later became associated with it. Our first radio program was broadcast on December 21, 1996. Everyone at home was so happy that day—Papa’s joy knew no bounds. I have countless beautiful memories connected with radio, and my affection for it remains just as strong today. Similarly, I have many cherished memories with Doordarshan.

“As children watching television, we never imagined we would one day become part of it ourselves. In November 2002, we joined Doordarshan as a producer and assistant news editor. That period, too, was a very beautiful and memorable time in my life.”

In addition, she has written scripts for many documentaries, television plays, and radio dramas. She also writes for newspapers, magazines, books, and news and feature agencies in India and abroad.

She has served as editor of the monthly Paigham-e-Madre-Watan and as an editorial advisor to the monthly Vanchit Janata. Currently, she is an editor with Star News Agency.

Dr Firdaus Khan has also participated in mushairas and poetry conferences. She trained in Hindustani classical vocal music for several years. She says:
“After my poem was published in the literary magazine Geetkar, I started receiving invitations for mushairas that began arriving from far and wide. We also had the opportunity to participate in a national poetry conference organised by India’s Ministry of Culture, along with many other literary gatherings.”

For excellence in journalism, skilled editing, and outstanding writing, she has received numerous awards. On Hindi Day, September 14, 2014, ABP News honoured her in Delhi with the Best Blogger award for her writing on literary subjects.

In 2005, the American Biographical Institute’s Professional Women’s Advisory Board nominated her for its list of successful women. Government College, Hisar, honoured her with the Best Writer award, and the Haryana Small Newspapers Association conferred upon her the Best Journalist award. She has received many other honours as well, including two honorary doctorates. She says:
“Our words translate our emotions and thoughts, because our words are our identity. Readers liking what we write is the greatest honour for us.”

Dr. Firdaus Khan writes in Urdu, Hindi, Punjabi, and English. Her English poems are especially appreciated abroad. She translated the national song Vande Mataram into Punjabi, which received wide acclaim.

She has also served as editor of Bhor Da Tara, a Punjabi journal of Government College, Hisar. She wrote a poem on Rahul Gandhi as well, which was widely praised.

She also writes blogs and maintains several of them. Fahm al-Qur’an is her blog on the Holy Qur’an, featuring her writings of the same name. Firdous Diary hosts songs, ghazals, poems, stories, and other literary pieces.

Meri Diary focuses on society, environment, health, literature, art and culture, politics, and contemporary issues. The Princess of Words features English poems and writings. Jahannuma is dedicated to Urdu writings, Heer to Punjabi writings, and Rahe-Haq to spiritual writings.

Dr Firdaus Khan has also been associated with public service. She worked for several years as a post warden with the Civil Defence Department in Hisar. She is also the founder and president of Anurag Sahitya Kendra.

Recently, she was included as a featured writer in Shri Yadvendra Yadav’s book Bharatiya Musalmanon Ki Gaurav Gathaein, which presents her as an author deeply connected to her culture and guiding society toward a new direction.

Courtesy Awaz


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
इस्लाम में क़ुर्बानी की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है. क़ुर्बानी लफ़्ज़ क़ुर्ब से बना है. क़ुर्ब का मतलब है क़रीब. लोग अपने चौपायों को अल्लाह के नाम पर क़ुर्बान करके क़ुर्बे इलाही हासिल करना चाहते हैं. इस्लाम में क़ुर्बानी का बहुत बड़ा अज्र है.
 
ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी करना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. हज़रत सैयदना ज़ैद बिन अरकम रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ये क़ुर्बानियां क्या हैं ? 
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम्हारे बाप हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. 
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हमारे लिए क्या सवाब है ?
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि हर बाल के बदले एक नेकी है. 
सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया कि और अदन में से ? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसके हर बाल के बदले भी एक नेकी है. 
(इब्ने माजा)

हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बक़रा ईद के दिन सींग वाले चितकबरे खसी किए हुए दो मेंढे ज़िबह किए. जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें क़िबला की तरफ़ लिटा दिया. फिर फ़रमाया- “मैंने अपना रुख़ उसकी तरफ़ किया जिसने ज़मीन और आसमान की तख़लीक़ की. दीन-ए-हनीफ़ पर चलते हुए और मैं मुशरिकों में से नहीं हूं. बेशक मेरी नमाज़ और मेरा हज और क़ुर्बानी और मेरी ज़िन्दगी और मेरी मौत सब अल्लाह ही के लिए है, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है. उसका कोई शरीक नहीं, और उसी का मुझे हुक्म दिया गया और मैं उसके सामने गर्दन झुकाने वालों में से हूं. अल्लाह ये तेरे लिए और तुझ ही से है. मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनकी उम्मत की जानिब से. अल्लाह के नाम के साथ, अल्लाह सबसे बड़ा है. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़ुर्बानी के जानवर को ज़िबह किया.

हदीसों में कहा गया है कि क़ुर्बानी करने से क़ुर्बानी करने वाले के गुनाह माफ़ हो जाते हैं. एक हदीस के मुताबिक़ क़ुर्बानी का ख़ून ज़मीन पर गिरने से पहले ही क़ुर्बानी करने वाले के गुनाह माफ़ हो जाते हैं. 
क़ुर्बानी का जानवर पुल सिरात पर क़ुर्बानी करने वाले की सवारी होगा. एक हदीस के मुताबिक़ इंसान बक़र ईद के दिन कोई ऐसी नेकी नहीं करता, जो अल्लाह को ख़ून बहाने से ज़्यादा पसंद हो. ये क़ुर्बानी क़यामत में अपने सींगों, बालों और खुरो के साथ आएगी और क़ुर्बानी का ख़ून ज़मीन पर गिरने से पहले ही वह अल्लाह की बारगाह में क़ुबूल हो जाती है. लिहाज़ा ख़ुश दिल से क़ुर्बानी करो.
(तिर्मिज़ी)  

हज़रत आयशा सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला के नज़दीक क़ुर्बानी के दिन इंसान के आमाल में सबसे ज़्यादा पसंदीदा चीज़ ख़ून बहाना है. और बेशक वह जानवर क़यामत के दिन अपने सींगों, बालों और खुरों के साथ आएगा. और बेशक क़ुर्बानी के जानवर का ख़ून ज़मीन पर गिरने से पहले ही वह अल्लाह तबारक व तआला की बारगाह में मक़बूल हो जाता है. ऐ लोगो ! क़ुर्बानी को दिल से करो, तो उस पर तुम्हें सवाब मिलेगा और अल्लाह तबारक व तआला की बारगाह में क़ुबूल होगा.
(मिश्कात शरीफ़)

हज़रत इमाम हसन बिन अली अलैहिस्सलाम से रिवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- “जिसने ख़ुशदिली से सवाब का तालिब होकर क़ुर्बानी की वह जहन्नुम की आग से हिजाब यानी रोक हो जाएगी.”

क़ुर्बानी की शर्तें 
क़ुर्बानी की कुछ शर्तें हैं. क़ुर्बानी करने वाला दीन-ए-इस्लाम की पैरवी करने वाला हो यानी मुसलमान हो. 
वह आज़ाद हो यानी ग़ुलाम न हो. वह मुक़ीम होना चाहिए यानी मुसाफ़िर न हो. सफ़र के दौरान क़ुर्बानी वाजिब नहीं है. वह साहिबे निसाब हो यानी सदक़ा-ए-फ़ित्र के लिए जो शर्तें हैं, वही शर्तें क़ुर्बानी के लिए भी हैं. उसके पास साढ़े सात तोले सोना या साढ़े बावन तोले चांदी हो या इतनी ही क़ीमत की ज़रूरत के सामान के अलावा कोई और चीज़ हो.    


क़ुर्बानी हर उस शख़्स पर वाजिब है, जो क़ुर्बानी की शर्तें पूरी करता है. हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स क़ुर्बानी करने की वुसअत रखता हो और फिर भी क़ुर्बानी न करे, तो वह हमारी ईदगाह के क़रीब न आए.”
(इब्ने माजा)

ऐसा नहीं है कि क़ुर्बानी के लिए कोई बड़ा जानवर ही हो, छोटे जानवर की भी क़ुर्बानी की जा सकती है. बकरे में एक ही हिस्सा होता है यानी एक शख़्स एक बकरे की क़ुर्बानी कर सकता है. इसमें कोई दूसरा शरीक नहीं हो सकता. लेकिन बड़े जानवर में सात लोग शरीक हो सकते हैं. इस तरह की क़ुर्बानी में इस बात का ख़्याल रखा जाना चाहिए कि गोश्त के बराबर के सात हिस्से हों. इसमें कोई हिस्सा वज़न में कम या ज़्यादा नहीं होना चाहिए.  

अमूमन लोग क़ुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से करते हैं. एक हिस्सा वे अपने पास रखते हैं. एक हिस्सा अपने उन रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए रखते हैं, जिनके यहां क़ुर्बानी नहीं हुई है. एक हिस्सा साइलों यानी मांगने वालों और ग़रीबों के लिए रखा जाता है. क़ुर्बानी के वे कितने हिस्से करते हैं, ये उनकी अपनी मर्ज़ी है. 

एक शख़्स ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया कि अगर मेरे पास दूध वाली बकरी के अलावा कोई और जानवर क़ुर्बानी के लिए न हो, तो फ़रमाइए क्या मैं उसे ही ज़िबह कर दूं ? 
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- नहीं, लेकिन तू क़ुर्बानी वाले दिन अपने बाल काट ले, नाख़ून और मूंछे तराश ले और ज़ेरे नाफ़ बाल साफ़ कर ले. अल्लाह तआला के यहां तेरी तरफ़ से यही मुकम्मल क़ुर्बानी शुमार होगी.
(सुनन निसाई)

इसका मतलब यह है कि जिस शख़्स की माली हालत ठीक न हो, तो वह ज़िल हिज्जा का चांद दिखने के बाद अपने नाख़ून और बाल न काटे. फिर वह ईद उल अज़हा के दिन अपने नाख़ून और बाल काटे, तो उसे क़ुर्बानी के बराबर ही सवाब अता किया जाएगा.      

क़ुर्बानी ईद उल अज़हा के दिन शुरू होती है यानी हिजरी महीने ज़िल हिज्जा की 10 तारीख़ से शुरू होकर 12 तारीख़ को ख़त्म हो जाती है. ईद उल अज़हा के पहले दिन क़ुर्बानी करना अफ़ज़ल माना जाता है. रात में क़ुर्बानी करना मकरूह है. इसलिए क़ुर्बानी दिन में ही की जाती है. क़ुर्बानी ईद की नमाज़ के बाद ही की जाती है. इससे पहले क़ुर्बानी करना सही नहीं है. 

एक हदीस के मुताबिक़ ईद उल अज़हा की नमाज़ के बाद ख़ुत्बे में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिस शख़्स ने हमारी नमाज़ की तरह नमाज़ पढ़ी और हमारी क़ुर्बानी की तरह क़ुर्बानी की, उसकी क़ुर्बानी सही हुई. लेकिन जो शख़्स नमाज़ से पहले क़ुर्बानी करे, वह नमाज़ से पहले ही गोश्त खाता है, मगर वह क़ुर्बानी नहीं है.
(सही बुख़ारी)     

क़ुर्बानी के लिए यह भी ज़रूरी है कि जिसके नाम से क़ुर्बानी की जा रही है, वह जानवर को क़ुर्बान करते वक़्त मौजूद रहे. जानवर भूखा और प्यासा न हो. वह सेहतमंद हो. उसमें कोई ऐब न हो यानी वह काना या लंगड़ा वग़ैरह न हो.

बहुत से लोग कहते हैं कि क़ुर्बानी न करके क़ुर्बानी के जानवर की रक़म को किसी ज़रूरतमंद को दे दो, इससे भी सवाब मिल जाएगा. बेशक किसी ज़रूरतमंद की मदद करने से सवाब मिल जाएगा, लेकिन ये अमल क़ुर्बानी के बराबर नहीं हो सकता. क़ुर्बानी करना अपनी जगह है और किसी ज़रूरतमंद की मदद करना अपनी जगह. क़ुर्बानी वाजिब है, सुन्नत है. इसलिए जो लोग क़ुर्बानी की शर्तें पूरी करते हैं, उन्हें ये सुन्नत अदा करनी चाहिए. 
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़   


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
 
ईद उल अज़हा का ताल्लुक़ हज से है. हज इस्लाम के पांच सुतूनों में से एक है. इस्लाम के पांच सुतूनों में कलमा, रोज़ा, नमाज़, ज़कात और हज शामिल है. हज के दूसरे दिन क़ुर्बानी होती है. क़ुर्बानी हज का एक अहम हिस्सा है. क़ुर्बानी के बग़ैर हज मुकम्मल नहीं होता. दुनियाभर के मुसलमानों के लिए हर साल हज करना मुमकिन नहीं है. इसलिए वे ईद उल अज़हा के दिन क़ुर्बानी करके अपनी अक़ीदत का इज़हार करते हैं. ये अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. क़ुर्बानी करने वाले मुसलमान हाजियों की तरह ही ज़ुल हिज्जा का चांद दिखने के बाद अपने बाल और नाख़ून नहीं काटते और ख़ुद को बुराइयों से बचाते हैं. 
    
क़ुरआन करीम में हज और क़ुर्बानी का ज़िक्र  
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के साथ मिलकर मक्का में पत्थर की एक घनाकार इमारत की तामीर की थी. इसे अल्लाह का घर कहा जाता है. क़ुरआन करीम में इसका ज़िक्र है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए ख़ाना ए काबा की तामीर की जगह मुहैया कर दी और उनसे कहा कि हमारे साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराना और हमारे घर को तवाफ़ करने वालों और क़याम करने वालों और रुकू करने वालों और सजदे करने वालों के लिए पाक साफ़ रखना. और लोगों के दरम्यान हज का ऐलान कर दो कि वे तुम्हारे पास पैदल और दुबले ऊंटों पर सवार होकर दूर दराज़ के रास्तों से चले आएं, ताकि वे दुनिया व आख़िरत के फ़ायदे के लिए हाज़िर हों और चन्द मुक़र्रर दिनों के अंदर अल्लाह का नाम लेकर उन चौपायों को ज़िबह करें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. फिर तुम लोग क़ुर्बानी का गोश्त ख़ुद भी खाओ और बदहाल फ़क़ीरों को भी खिलाओ.
फिर लोगों को चाहिए कि वे अपनी कशाफ़्त दूर करें और अपनी नज़रें पूरी करें और अल्लाह के क़दीम घर ख़ाना ए काबा का तवाफ़ करें. यही हुक्म है. और जो अल्लाह की हुरमत वाली चीज़ों की ताज़ीम करता है, तो यह उसके परवरदिगार के यहां उसके लिए बेहतर है. और तुम्हारे लिए तमाम चौपाये हलाल कर दिए गए हैं, सिवाय उन जानवरों के जिनकी तफ़सील तुम्हें पढ़कर सुना दी गई है. लिहाज़ा तुम बुतों की निजासत से बचा करो और झूठी बातों से भी परहेज़ किया करो. तुम सिर्फ़ अल्लाह ही के होकर रहो. उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ. और जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करता है, तो वह ऐसा है जैसे आसमान से गिर पड़े. फिर उसे कोई परिन्दा उचक ले जाए या हवा उसे किसी दूर दराज़ की जगह पर ले जाकर फेंक दे. यही हुक्म है. और जो अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करता है, तो बेशक यह ताज़ीम भी दिलों के तक़वे से ही हासिल होती है. तुम्हारे लिए इन क़ुर्बानी के चौपायों में मुक़र्रर मुद्दत तक बहुत से फ़ायदें हैं. फिर उन्हें क़ुर्बानी के लिए क़दीमी घर ख़ाना ए काबा तक पहुंचना है. और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी मुक़र्रर कर दी है, ताकि वे उन चौपायों को ज़िबह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. लिहाज़ा तुम्हारा माबूद माबूदे यकता है. फिर तुम उसी के फ़रमाबरदार बन जाओ. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम आजिज़ी करने वालों को जन्नत की खु़शख़बरी सुना दो. ये वे लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उन पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो सब्र करते हैं. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है, उसमें से अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं. और हमने क़ुर्बानी के ऊंट को भी अल्लाह की निशानियों में से क़रार दिया है. इसमें तुम्हारे लिए ख़ैर है. फिर तुम उन्हें क़तार में खड़ा करके अल्लाह का नाम लो. फिर जब वे ज़िबह होकर पहलू के बल ज़मीन पर गिर जाएं, तो उनके गोश्त में से तुम खु़द भी खाओ और सवाल न करने वाले मोहताजों को भी खिलाओ और सवाल करने वाले मोहताजों को भी खिलाओ. इसी तरह हमने उन्हें तुम्हारे ताबे कर दिया है, ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो. अल्लाह को न क़ुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न उसका ख़ून. लेकिन अल्लाह की बारगाह में तुम्हारा तक़वा पहुंचता है. अल्लाह ने चौपायों को इसलिए तुम्हारे क़ाबू में किया है, ताकि तुम उन्हें ज़िबह करते वक़्त अल्लाह की तकबीर कहो, जैसे उसने तुम्हें हिदायत दी है. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम मोहसिनों को जन्नत की ख़ु़शख़बरी सुना दो.
(22: 26-37)

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद के वक़्त में लोगों ने बुतों की पूजा शुरू कर दी. उन लोगों के अपने-अपने बुत थे. काबे में बहुत से बुत रख दिए गए, जिनकी तादाद 360 थी. फिर वक़्त ने करवट ली और अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में काबे से सारे बुत हटा दिए गए और उसे उसकी पहली हालत में लाया गया. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा के साथ एक सफ़र किया और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को फिर से क़ायम किया. इसे हज कहा जाता है. हज पांच दिन में मुकम्मल होता है और इसका आख़िरी अरकान क़ुर्बानी है. क़ुर्बानी का यही दिन ईद उल अज़हा के नाम से जाना जाता है. इसी दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को क़ुर्बान किया था.  
  
हज इंसान को तमाम तरह की बुराइयों से बचने की तरग़ीब देता है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “हज के चन्द महीने हैं यानी शव्वाल, ज़ुलक़ादा और ज़िलहिज्जा. फिर जो इन महीनों में नीयत करके ख़ुद पर हज लाज़िम कर ले, तो वह हज के दिनों में न बेहयाई करे, न कोई और गुनाह करे और न किसी से झगड़ा करे. और तुम जो भी नेकी करोगे, तो अल्लाह उसे ख़ूब जानता है. और तुम आख़िरत के सफ़र का सामान जुटा लो. और बेशक सबसे बेहतर ज़ाद राह परहेज़गारी है. और ऐ अक़्लमंदो ! हमसे डरते रहो. और तुम पर इस बात में कोई गुनाह नहीं है कि अगर तुम हज के दिनों में तिजारत के ज़रिये अपने परवरदिगार का फ़ज़ल भी तलाश करो. फिर जब तुम अराफ़ात से वापस आओ, मशअरुल हराम के पास अल्लाह का ज़िक्र किया करो और उसका ज़िक्र इस तरह करो जैसे तुम्हें हिदायत दी गई है. और बेशक इससे पहले तुम गुमराह थे. फिर तुम वहीं से जाकर वापस आया करो, जहां से और लोग वापस आते हैं. और अल्लाह से मग़फ़िरत चाहो और बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है. फिर जब तुम हज के अरकान मुकम्मल कर चुको, तो मिना में अल्लाह का ख़ूब ज़िक्र किया करो जैसे अपने बाप दादाओं का ज़िक्र करते हो या उससे भी ज़्यादा ज़िक्र किया करो. फिर लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो कहते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें दुनिया में ही अता कर दे और ऐसे शख़्स के लिए आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं है. और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो दुआ मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें दुनिया में भी अच्छाई अता कर और आख़िरत में भी अच्छाई दे और दोज़ख़ के अज़ाब से महफ़ूज़ रख. यही वे लोग हैं, जिनके लिए उनकी नेक कमाई में से हिस्सा है. और अल्लाह जल्द हिसाब करने वाला है. और गिनती के उन चन्द दिनों में अल्लाह का ख़ूब ज़िक्र किया करो. फिर जो मिना से वापसी में दो ही दिन में चल पड़ा, तो उस पर भी कोई गुनाह नहीं है. और जो तीसरे दिन तक ठहरा, तो उस पर भी कोई गुनाह नहीं है. लेकिन यह हुक्म उसके लिए है, जो परहेज़गार हो. और अल्लाह से डरते रहो और जान लो कि बेशक तुम सबको उसके हुज़ूर में जमा किया जाएगा. 
(2: 197-203)

जब इंसान कुछ दिन बुरे कामों से बचा रहता है, तो वह नेकी के रास्ते पर चलने लगता है. इंसान का अपना कुछ भी नहीं है. सब कुछ अल्लाह ही का है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि बेशक मेरी नमाज़ और मेरा हज और क़ुर्बानी और मेरी ज़िन्दगी और मेरी मौत सब अल्लाह ही के लिए है, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है.
(6: 162)

बेशक हज और क़ुर्बानी अल्लाह की रज़ा हासिल करने का ज़रिया है. ये हमारे दीन का एक अहम हिस्सा है. अल्लाह को क़ुर्बानी बहुत अज़ीज़ है. 
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर : गूगल 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बक़रीद और बक़र ईद का असल नाम ईद उल अज़हा है. ये मुसलमानों का ईद उल फ़ित्र के बाद दूसरा बड़ा त्यौहार है. ईद उल अज़हा हिजरी महीने ज़िल हिज्जा की दस तारीख़ से शुरू होती है और 12 तारीख़ को ख़त्म होती है. इस त्यौहार का ताल्लुक़ अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से है. जिस दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को क़ुर्बान किया था, उसी दिन की याद में ईद उल अज़हा मनाई जाती है.  
  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “फिर जब इस्माईल अलैहिस्सलाम अपने वालिद के साथ दौड़ धूप यानी काम करने के क़ाबिल हो गए, तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरे बेटे ! मैंने ख़्वाब में देखा है कि अल्लाह के हुक्म से मैं तुम्हें ज़िबह कर रहा हूं. इस बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है. इस्माईल अलैहिस्सलाम ने कहा कि अब्बा ! आप वह काम फ़ौरन करें, जिसका आपको हुक्म हुआ है. अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे. फिर जब दोनों ने अल्लाह का हुक्म मान लिया, तो उन्होंने बेटे को पेशानी के बल लिटा दिया. और हमने उन्हें आवाज़ देकर कहा कि ऐ इब्राहीम अलैहिस्सलाम ! वाक़ई तुमने ख़्वाब को सच कर दिखाया. बेशक हम मोहसिनों को इसी तरह जज़ा दिया करते हैं. बेशक यह बहुत बड़ी सरीह आज़माइश थी. और हमने एक बड़ी क़ुर्बानी के साथ इसका फ़िदया दिया. यानी इब्राहीम अलैहिस्सलाम के हाथ से इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह एक मेंढे को ज़िबह करवा दिया. और हमने उनके बाद आने वाले लोगों में उनका ज़िक्रे ख़ैर बाक़ी रखा. सलाम हो इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर. हम मोहसिनों को इसी तरह जज़ा दिया करते हैं. बेशक वे हमारे मोमिन बन्दों में से थे.
(37:102-111)
  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक शख़्स से फ़रमाया कि मुझे क़ुर्बानियों वाले दिन को ईद मनाने का हुक्म दिया गया है, जिसे अल्लाह तआला ने इस उम्मत के लिए मुक़र्रर फ़रमाया है. 
(सुनन निसाई)
  
क़ुरआन मुकम्मल हुआ  
क़ुरआन करीम माहे रमज़ान के मुबारक महीने में नाज़िल होना शुरू हुआ था. अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास अल्लाह के पैग़ाम लाया करते थे. बाद में इन्हीं पैग़ामों यानी आयतों का ज़ख़ीरा क़ुरआन बना. क़ुरआन करीम 23 साल में नाज़िल हुआ. ये हज के दिनों में मुकम्मल हुआ. इसके साथ ही आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह के हुक्म से दीन-ए-इस्लाम के मुकम्मल होने का ऐलान कर दिया.  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “आज हमने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीन के तौर पर इस्लाम को पसंद किया है.” 
(5:3)

ईद उल अज़हा पर लोग अपने चौपायों की क़ुर्बानी करते हैं. बहुत से लोग क़ुर्बानी नहीं करते. इस बारे में उनकी अपनी ज़ाती मसलहतें होती हैं, जैसे माली हालत ठीक न होना वग़ैरह. 

ईद उल अज़हा की क़ुर्बानी के बारे में आलिमों की मुख़्तलिफ़ राय हैं. कुछ आलिम कहते हैं कि ईद उल अज़हा की क़ुर्बानी वाजिब है. कुछ आलिम मानते हैं कि ये सुन्नत है. कुछ लोग कहते हैं कि बिना हज के क़ुर्बानी का क्या मतलब है. 

हदीसों के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिना हज के पाबन्दी से क़ुर्बानी किया करते थे. उनके सहाबा भी क़ुर्बानी करते थे. 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर फ़रमाते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दस साल मदीने में रहे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर साल क़ुर्बानी किया करते थे.
(मुसनद अहमद, सुन्न तिर्मज़ी)

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो मैंढों की क़ुर्बानी किया करते थे और मैं भी दो मैंढों की ही क़ुर्बानी किया करता था.
(सही बुख़ारी)

ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी करना सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिसने भी ईद की नमाज़ के बाद चौपाया ज़िबह किया उसकी क़ुर्बानी हो गई और उसने मुसलमानों की सुन्नत पर अमल कर लिया.”
(सही बुख़ारी)

क़ुर्बानी की क़दीमी रिवायत 
क़ाबिले ग़ौर है कि अल्लाह के पहले नबी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के वक़्त से ही क़ुर्बानी की रिवायत है.
क़ुरआन करीम में हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम के दो बेटों क़ाबील और हाबील का ज़िक्र है. हालांकि उनकी बहुत सी औलादें थीं. लेकिन यहां दो का ही ज़िक्र किया जा रहा है. क़ाबील अकुलीमा नाम की लड़की से शादी करना चाहता था, लेकिन उसके वालिदैन अपने छोटे बेटे हाबील से उसका निकाह करवाना चाहते थे, क्योंकि वह बहुत नेक और फ़रमाबरदार था. इस वजह से वह अपने वालिदैन और भाई का दुश्मन बन गया. 
अल्लाह तआला ने हुक्म दिया कि तुम दोनों क़ुर्बानी करके पहाड़ पर रख आओ, जिसकी क़ुर्बानी बारगाहे-इलाही में क़ुबूल होगी, उसी से अकुलीमा की शादी की जाएगी.

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उन लोगों से आदम अलैहिस्सलाम के दो बेटों हाबील और क़ाबील का सच्चा क़िस्सा बयान करो कि जब उन दोनों ने अल्लाह की बारगाह में एक-एक क़ुर्बानी पेश की, तो उनमें से एक हाबील की क़ुर्बानी क़ुबूल कर ली गई और दूसरी क़ाबील की क़ुर्बानी क़ुबूल नहीं की गई, तो हसद में जलते हुए वह हाबील से कहने लगा कि मैं तुझे ज़रूर क़त्ल कर दूंगा. हाबील ने जवाब देते हुए कहा कि बेशक अल्लाह परहेज़गारों से ही नियाज़ क़ुबूल करता है.
(5:27)

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ ईद उल अज़हा पर ही क़ुर्बानी करके जानवरों का ख़ून बहाया जाता है. दरअसल रोज़मर्राह की ज़िन्दगी में भी गोश्त के लिए लाखों करोड़ों जानवरों को ज़िबह किया जाता है. ये सिलसिला पहले ज़माने से ही चला आ रहा है. इसके अलावा कुछ मज़हबों में बलि का ज़िक्र मिलता है. मुशरिक अपने देवी-देवताओं को ख़ुश करने के लिए बलि दिया करते थे. उनका मानना था कि देवी-देवता ख़ून पीते हैं. बहुत सी जगह आज भी ऐसा होता है. 

लेकिन ईद उल अज़हा पर होने वाली क़ुर्बानी का ताल्लुक़ इंसान की नीयत से है. इसका ताल्लुक़ इस बात से है कि जिस फ़रमाबरदारी और ख़ुशी से वह अपना जानवर क़ुर्बान कर रहा है, क्या वह अल्लाह की ख़ुशी के लिए, उसकी मख़लूक़ की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान भी क़ुर्बान कर सकता है.  

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी मुक़र्रर कर दी है, ताकि वे उन चौपायों को ज़िबह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. लिहाज़ा तुम्हारा माबूद माबूदे यकता है. फिर तुम उसी के फ़रमाबरदार बन जाओ.” 
(22:34)

दरअसल क़ुर्बानी के ज़रिये अल्लाह अपने बन्दे की नीयत को ज़ाहिर करना चाहता है, क्योंकि अल्लाह तो सबकुछ जानने वाला है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “अल्लाह को न क़ुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न उसका ख़ून. लेकिन अल्लाह की बारगाह में तुम्हारा तक़वा पहुंचता है. अल्लाह ने चौपायों को इसलिए तुम्हारे क़ाबू में किया है, ताकि तुम उन्हें ज़िबह करते वक़्त अल्लाह की तकबीर कहो, जैसे उसने तुम्हें हिदायत दी है.”
(22:37)

ईद उल अज़हा का त्यौहार न सिर्फ़ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी की याद दिलाता है, बल्कि ये हमें ईमान के रास्ते पर चलने की तरग़ीब भी देता है. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने तौहीद के मामले में, ईमान के मामले में अपने मुंह बोले वालिद यानी अपनी परवरिश करने वाले अपने चाचा आज़र की पैरवी करने से साफ़ इनकार कर दिया था.   
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक सब लोगों से ज़्यादा इब्राहीम अलैहिस्सलाम के क़रीब वे लोग हैं, जिन्होंने उनके दीन की पैरवी की है और वही नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उन पर ईमान लाए हैं. और अल्लाह मोमिनों का कारसाज़ है.”
(3:68) 

अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को तरह-तरह से आज़माया और वे हर आज़माइश में कामयाब रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम को उनके परवरदिगार ने चन्द बातों में आज़माया, तो उन्होंने उन सबको पूरा कर दिया. अल्लाह ने फ़रमाया कि हम तुम्हें लोगों का इमाम बनाने वाले हैं. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि क्या मेरी औलाद में से भी ? अल्लाह ने फ़रमाया कि हां, लेकिन हमारा यह वादा ज़ालिमों तक नहीं पहुंचता.” 
(2:124)

यानी जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों की पैरवी करते हैं, वही दोनों जहां में कामयाबी हासिल करने वाले हैं. लेकिन दूसरों पर ज़ुल्म करने वाले लोग अपने दोनों जहां बर्बाद कर लेते हैं. दुनिया में भी उनके लिए रुसवाई है और आख़िरत में तो उनके लिए अज़ाब है ही.    
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “अल्लाह किसी को उसकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देता. जिसने नेकी कमाई, तो अपने फ़ायदे के लिए ही कमाई और जिसने गुनाह किया, तो उसका वबाल उसी पर होगा.”
(2:286)

ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी करना सिर्फ़ एक सुन्नत है. जो इस्लाम के पैरोकार है, उनके लिए ताउम्र अल्लाह के  रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत पर अमल करना लाज़िमी है. 
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “रसूल उस सब पर ईमान रखते हैं, जो उन पर उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया और उनके साथ मोमिन भी. सब अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं. वे कहते हैं कि हम अल्लाह के रसूलों के दरम्यान किसी तरह का फ़र्क़ नहीं करते और हमने तेरा हुक्म सुना और इताअत क़ुबूल की. ऐ हमारे परवरदिगार ! हम तुझसे मग़फ़िरत चाहते हैं और हमें तेरी तरफ़ ही लौटना है. 
(2:285)

बेशक ईद उल अज़हा का त्यौहार हमें तौहीद पर क़ायम रहने और अल्लाह की राह में अपना माल व दौलत और जान तक क़ुर्बान कर देने का दर्स देता है.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 


हज सर्वश्रेष्ठ उपासनाओं और महान आज्ञाकारिताओं में से है, और वह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, जिसके साथ अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा है और जिसके बिना बंदे का धर्म संपूर्ण नहीं हो सकता.
तथा दो चीज़ों के बिना किसी इबादत द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त नहीं होती और न ही वह इबादत स्वीकार होती है-
एक : अल्लाह सर्वशक्तिमान के लिए निःस्वार्थता (इख़्लास) है इस प्रकार कि उसके द्वारा उसका उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना और आख़िरत का दिन हो, वह उसके द्वारा दिखावा, पाखंड और सांसारिक लाभ का इच्छुक न हो.
दूसरा : करनी और कथन में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की जानकारी के बिना संपूर्ण नहीं हो सकती.

इसीलिए उस व्यक्ति पर, जो किसी इबादत हज या उसके अलावा के द्वारा अल्लाह की उपासना करना चाहता है, यह अनिवार्य है कि वह उसके अंदर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े को सीखे ताकि उसका कार्य सुन्नत के अनुसार हो.

हज के प्रकार
हज के तीन प्रकार हैं : तमत्तुअ, इफ्राद, क़िरान
तमत्तुअ : यह है कि हज करने वाला हज के महीनों में (और हज के महीने शव्वाल, ज़ुल-क़ादा, और ज़ुल-हिज्जा हैं. केवल उम्रा का एहराम बांधे. जब मक्का पहुंच जाए तो उम्रा के लिए तवाफ़ और सई करे, अपने सिर के बाल मुंडा ले या उन्हें छोटे करवा ले और अपने एहराम से हलाल हो जाए (अर्थात एहराम के कपड़े उतार दे और एहराम की पाबंदी ख़त्म कर दे). जब तर्विया अर्थात आठ ज़ुल-हिज्जा का दिन आए, तो केवल हज का एहराम बांधे और उसके सभी कार्यों को करे. तमत्तुअ करने वाला संपूर्ण उम्रा करता है और संपूर्ण हज करता है.
इफ्राद : हज करने वाला केवल हज का एहराम बांधे (अर्थात केवल हज की नीयत करे). जब मक्का पहुंच जाए, तो तवाफ़े-क़ुदूम (आगमन का तवाफ़) करे और हज के लिए सई करे, तथा सिर के बाल न मुंडाए और न उसे छोटा करवाए, और अपने एहराम से हलाल न हो, बल्कि वह मोहरमि बाक़ी रहे यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बा को कंकरी मारने के बाद हलाल हो, और यदि हज की सई को हज का तवाफ़ करने के बाद तक विलंब कर दे तो कोई आपत्ति की बात नहीं है.
क़िरान: हज करने वाला उम्रा और हज का एक साथ एहराम बांधे (अर्थात नीयत करे) या पहले उम्रा का एहराम बांधे फिर उसका तवाफ़ आरंभ करने से पहले उस के साथ हज को भी सम्मिलित कर ले, (इस प्रकार कि वह इस बात की नीयत करे कि उसका तवाफ़ और उसकी सई उसके हज और उम्रा की है).

क़िरान हज करने वाले का काम इफ्राद हज करने वाले के काम के समान है, केवल इतना अंतर है कि क़िरान करने वाले पर हदी (जानवर की क़ुर्बानी) अनिवार्य है और इफ्राद हज करने वाले पर हदी अनिवार्य नहीं है.

हज के इन तीनों प्रकार में सबसे श्रेष्ठ तमत्तुअ हज है, इसी का नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को आदेश दिया था और इसी पर बल दिया था, यहां तक कि यदि मनुष्य क़िरान हज या इफ्राद हज की नीयत करे तब भी उसके लिए महत्वाकांक्षिक बात यह है कि वह अपने एहराम को उम्रा में परिवर्तित कर दे फिर वह हलाल हो जाए ताकि वह तमत्तुअ हज्ज करने वाला हो जाए, चाहे यह तवाफ़े- क़ुदूम और सई करने के बाद ही क्यों न हो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब हज्जतुल वदाअ के साल तवाफ़ और सई कर लिया और आपके साथ आपके सहाबा भी थे, तो आपने हर उस व्यक्ति को जिसके पास हदी नहीं थी, अपने एहराम (हज की नीयत) को उम्रा में बदलने और बाल कटवाकर हलाल हो जाने का आदेश दिया और फरमाया : “यदि मैं अपने साथ हदी को न लाया होता, तो उसी तरह करता जिसका मैं ने तुम्हें आदेश दिया है.”
एहराम
यहां एहराम की उन सुन्नतों को किया जाएगा जैसे स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना.

फिर अपनी नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद या अपनी सवारी पर बैठने के बाद एहराम बांधे (अर्थात हज की इबादत में प्रवेश करने की नीयत करे)
फिर यदि वह तमत्तुअ करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि- उम्रह” कहे.
यदि वह हज क़िरान करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि-हज्जतिन व उम्रह” कहे.
और यदि वह इफ्राद हज करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” कहे.

फिर कहे : अल्लाहुम्मा हाज़िही हज्जतुन ला रियाआ फ़ीहा वला सुमअह (ऐ अल्लाह यह ऐसा हज है जिसमें कोई दिखावा और पाखंड नहीं है).

फिर वही तल्बिया पढ़े जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पढ़ी थी और वह यह है :
“लब्बैका, अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन्नेमता लका वल मुल्क, ला शरीका लक”
(मैं उपस्थित हूं, ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूं, मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं, हर प्रकार की स्तुति और सभी नेमतें तथा राज्य तेरा ही है, तेरा कोई साझी नहीं.)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तल्बिया में से ये शब्द भी हैं- “लब्बैका इलाहल हक़्क़” (ऐ सत्य पूज्य मैं उपस्थित हूं). तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु तल्बियह में इन शब्दों की वृद्धि करते थे- “लब्बैका व सा'दैक, वल-ख़ैरो बि-यदैक, वर्रग़्बाओ इलैका वल अमल”. पुरूष इसे ऊंचे स्वर में कहेगा, परंतु महिला इतनी आवाज़ में कहेगी कि अपनी बग़ल वाली को सुना सके, लेकिन यदि उसके बग़ल में कोई पुरूष है जो उसका महरम नहीं है, तो वह धीमी स्वर में तल्बिया पढ़ेगी.

यदि एहराम बांधने का इरादा रखने वाला आदमी किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है (जैसे- बीमारी, दुश्मन, या क़ैद इत्यादि) तो उसके लिए उचित यह है कि वह एहराम बांधते समय शर्त लगा ले और कहे-:
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)

अर्थात् यदि कोई रुकावट जैसे बीमारी या विलंब या कोई रुकावट ने मुझे अपने हज के कामों को पूरा करने से रोक दिया, तो मैं अपने एहराम से हलाल हो जाऊंगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बाअह बिंत ज़ुबैर को जबकि उन्हों ने एहराम बांधने का इरादा किया और वह बीमार थीं तो आपने उन्हें आदेश दिया कि वह शर्त लगा लें और फरमाया- तुम्हारे लिअ अपने पालनहार पर वह चीज़ है जिसे तुम मुस्तसना (अपवाद) कर दो.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5089) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1207) ने रिवायत किया है. अतः जब भी वह शर्त लगा ले और उसे वह रुकावट पेश आ जाए जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक दे तो वह अपने एहराम से हलाल हो जाएगा और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है.

किंतु जो व्यक्ति किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर महसूस नहीं कर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है, तो उसके लिए शर्त लगाना उचित नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शर्त नहीं लगाई और न तो हर एक को शर्त लगाने का आदेश ही दिया है, आपने ज़बाआ बिंत ज़ुबैर को उनके बीमारी से ग्रस्त होने के कारण इसका आदेश दिया था.

मेहरिम को चाहिए कि अधिक से अधिक तल्बियह पढ़े, विशेष रूप से स्थितियों और ज़माने के बदलने के समय उद्हारण के तौर पर जब किसी ऊंचाई पर चढ़े, यी नीची जगह उतरे, या रात या दिन आए. तथा उसके बाद अल्लाह तअला से उसकी प्रसन्नता और स्वर्ग का प्रश्न करे और उसकी दया व कृपा के द्वारा नरक से पनाह मांगे.

उम्रा के अंदर तल्बिया कहना एहराम से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक धर्म संगत है.
और हज में एहराम बांधने से लेकर ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने तक धर्म संगत है.

मक्का में प्रवेश करने के लिए स्नान करना
मोहरिम के लिए उचित है कि जब वह मक्का के निकट पहुंच जाए तो उसमें प्रवेश करने के लिए यदि उसके लिए आसान है तो स्नान कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का में प्रवेश करने के समय स्नान किया. इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1259) ने रिवायत किया है.

फिर जब मस्जिदुल हराम में प्रवेश करे तो अपने दाहिने पैर को पहले रखे और कहे- “बिस्मिल्लाह वस्सलातो वस्सलामो अला रसूलिल्लाह, अल्लाहुम्मग़ फिर्ली ज़ुनूबी वफ़-तह् ली अब्वाबा रहमतिक, अऊज़ो बिल्लाहिल अज़ीम वबि-वज्हेहिल करीम वबि-सुल्तानिहिल क़दीम मिनश्शैतानिर्रजीम” (मैं अल्लाह के नाम से - प्रवेश करता हूं - तथा दुरूद व सलाम हो अल्लाह के पैगंबर पर, ऐ अल्लाह ! तू मेरे लिए मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वारों को खोल दे, मैं महान अल्लाह, उसके दानशील चेहरे और उसके प्राचीन राज्य की शरण में आता हूं शापित शैतान से), फिर हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) की ओर जाए ताकि तवाफ़ शुरू करे.

फिर तवाफ़ करने और दो रक्अत नमाज़ पढ़ने के बाद सई करने के स्थल पर आए और सफ़ा व मर्वा के बीच सई करे.
जहां तक तमत्तुअ करने वाले का संबंध है तो वह उम्रा के लिए सई करेगा, लेकिन इफ्राद और क़िरान करने वाले हज के लिए सई करेंगे, तथा वे दोनों तवाफ़े-इफ़ाज़ा के बाद तक सई को विलंब भी कर सकते हैं.

सिर के बाल मुंडाना या छोटे करवाना
जब वह सात चक्कर अपनी सई पूरी कर ले तो यदि वह पुरुष है तो अपने सिर को मुंडाए, या उसके बालों को छोटा करवाए, तथा ज़रूरी है कि उसका सिर मुंडाना सिर के सभी बालों के लिए हो, इसी तरह बालों को सिर के सभी ओर से छोटा करवाया जाएगा. जबकि सिर के बालों को मुंडाना उन्हें छोटा करवाने से सर्वश्रेष्ठ है. क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने “सिर के बालों को मुंडाने वालों के लिए तीन बार दुआ की और बालों को छोटा करवाने वालों के लिए एक बार दुआ फ़रमाई.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1303) ने रिवायत किया है।

हां, यदि हज का समय इतना निकट हो कि सिर के बालों के उगने भर के लिए समय न हो तो सर्वश्रेष्ठ बालों को छोटा करवाना ही है, ताकि हज में मुंडाने के लिए उसके सिर में बाल बाक़ी रहें, इस प्रमाण के आधार पर कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्जतुल वदाअ़ के अवसर पर अपने साथियों (सहाबा) को उम्रा के लिए बाल छोटे करवाने का आदेश दिया था, इसलिए कि उन लोगों का आगमन ज़ुल-हिज्जा के चौथे दिन की सुबह को हुआ था. जहां तक महिला की बात है तो वह अपने बालो से उंगली के एक पोर के बराबर काट लेगी.

इन कामों के कर लेने से उम्रा संपूर्ण हो जाएगा और इसके बाद वह पूरी तरह हलाल हो जागा, और वह उसी तरह करेगा जिस तरह कि बिना एहराम वाले लोग कपड़े पहनते हैं, सुगंध लगाते हैं.

जहां तक क़िरान और इफ्राद हज करने वालों का संबंध है तो वे दोनों न सिर के बाल मुंडाएंगे न छोटे करवाएंगे और न ही वे दोनों अपने एहराम से हलाल होंगे (एहराम नहीं खोलेंगे), बल्कि वे दोनों अपने एहराम पर बाक़ी रहेंगे यहां तक कि ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने और सिर मुंडाने या सिर के बाल छोटे करवाने के बाद हलाल होंगे.

फिर जब तर्वियह अर्थात ज़ुल-हिज्जा का आठवां दिन होगा तो तमत्तुअ हज करने वाला चाश्त के समय मक्का में अपने स्थान से ही हज का एहराम बांधेगा, और उसके लिए अपने हज का एहराम बांधते समय वही चीज़ें करना मुस्तहब (ऐच्छिक) है जो उसने अपने उम्रा का एहराम बांधते समय किया था जैसे- स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना, चुनांचे वह हज का एहराम बांधने की नीयत करेगा और तल्बियह कहेगा, वह कहेगा- “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” (ऐ अल्लाह मैं हज्ज की नीयत से उपस्थित हूं).

और यदि वह किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज को पूरा करने से रोक सकती है तो वह शर्त लगा ले और कहे-
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)
और यदि उसे किसी ररुकावट के पेश आने का भय न हो तो शर्त न लगाए. तथा उसके लिए ऊंचे स्वर में तल्बियह कहना मुस्तहब है यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारना शुरू कर दे.

मिना जाना
फिर वह मिना जाए और वहां ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ें क़स्र करके पढ़े, दो नमाज़ों को एक साथ न पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिना में क़स्र करते थे, दो नमाज़ों को एकत्र करके नहीं पढ़ते थे.” क़स्र कहते हैं : चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत करके पढ़ना, तथा मक्का वाले और उनके अलावा अन्य लोग मिना, अरफ़ह और मुज़दलिफ़ा में नमाज़ को क़स्र करके पढ़ेंगे, क्योंकि हज्जतुल वदाअ़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को नमाज़ पढ़ाते थे और आपके साथ मक्का वाले भी थे और आपने उन्हें नमाज़ पूरी करने का आदेश नहीं दिया, यदि नमाज़ पूरी पढ़ना उनके ऊपर अनिवार्य होता तो आप उन्हें इसका आदेश देते जिस तरह कि आपने उन्हें मक्का पर विजय के साल इसका आदेश दिया था. लेकिन क्योंकि मक्का की आबादी बढ़ गई और वह मिना को भी सम्मिलित हो गई और वह ऐसे हो गई कि मानो वह उसका एह मुहल्ला है इसलिए मक्का वाले उसमें नमाज़ क़स्र नहीं करते हैं.

अरफ़ह जाना
जब अरफह (नौ ज़ुल-हिज्जा) के दिन सूरज उग आए तो वह मिना से अरफ़ह की ओर प्रस्थान करेगा और ज़ुहर के समय तक यदि उसके लिए आसान है तो नमिरह में पड़ाव करेगा (नमिरह: अरफा से तुरंत पूर्व एक जगह है), नहीं तो कोई बात नहीं है, क्योंकि नमिरह में पड़ाव करना सुन्नत है अनिवार्य नहीं है. जब सूरज ढल जाए (अर्थात ज़ुहर की नमाज़ का समय शुरू हो जाए) तो ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें दो-दो रक्अत पढ़ेगा और उन दोनों के बीच जमा तक़दीम करेगा (अर्थात दोनों को ज़ुहर के समय में पढ़ेगा जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया ताकि अरफ़ह में ठहरने और दुआ करने का समय लंबा हो जाए.

फिर नमाज़ के बाद ज़िक्र (जप), दुआ और अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने गिड़गिड़ाने (विनती करने) के लिए फ़ारिग़ हो जाए और उसे जो पसंद हो अपने दोनों हाथों को उठाकर क़िब्ला की ओर मुंह करके दुआ करे यद्यपि अरफ़ात की पहाड़ी उसके पीछे हो, क्योंकि सुन्नत क़िब्ला की ओर मुंह करना है पहाड़ी की ओर नहीं, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहाड़ी के पास ठहरे थे और फ़रमाया था- “मैं यहां ठहरा हूं और पूरा अरफ़ह ठहरने की जगह है.”

तथा उस महान ठहरने के स्थान पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अक्सर यह दुआ पढ़ते थे- “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्को व लहुल हम्द, वहुवा अला कुल्ले शैइन क़दीर” (अल्लाह के अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत (राज्य) है और उसी के लिए सभी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर शक्तिवान है.)

यदि उसे उकताहट और आलस्य लगे और वह अपने साथियों के साथ लाभदायक बातचीत के द्वारा या लाभदायक किताबों को पढ़कर विशेषकर जिनका संबंध अल्लाह सर्वशक्तिमान की दानशीलता और उसके व्यापक उपहारों से है, ताकि उस दिन में आशा का पहलू मज़बूत हो तो ऐसा करना अच्छा है. इसके बाद वह फिर से अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने, गिड़गिड़ाने और दुआ करने में व्यस्त हो जाए और दिन के अंतिम समय को दुआ में बिताने का इच्छुक और लालायित बने, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ दुआ अरफ़ह के दिन की दुआ है.

मुज़दलिफ़ा जाना
जब सूरज डूब जाए तो अरफ़ह की ओर रवाना हो. जब अरफ़ह पहुंच जाए तो एक अज़ान और दो इक़ामत से मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े.
और यदि उसे इस बात का भय हो कि वह मुज़दलिफ़ा आधी रात के बाद पहुंचेगा तो वह रास्ते में ही नमाज़ पढ़ लेगा, उसके लिए इशा की नमाज़ को आधी रात के बाद तक विलंब करना जाइज़ नहीं है.

और वह मुज़दलिफ़ा में रात बिताएगा, जब फ़ज्र स्पष्ट हो जाए तो अज़ान और इक़ामत के साथ फ़ज्र की नमाज़ सवेरे पढ़ेगा फिर मश्अरूल हराम का क़सद करेगा (और वह मुज़दलिफ़ा में मौजूद मस्जिद का स्थान है) तो अल्लाह की एकता का वर्णन करेगा और तक्बीर कहेगा और अपनी पसंदीदा दुआ करेगा यहां तक भली भांति रोशनी हो जाए (इस से अभिप्राय यह है कि सूरज उगने से पूर्व दिन की रोशनी स्पष्ट हो जाए)। यदि उसके लिए मश्अरूल हराम तक जाना आसान न हो तो वह अपने स्थान पर ही दुआ करेगा क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- मैं यहां ठहरा हूं और पूरा मुज़दलिफ़ा ठहरने की जगह है. ज़िक्र करने और दुआ करने की हालत में वह अपने दोनों हाथों को उठाए हुए क़िब्ला की ओर मुंह किए होगा.

मिना की तरफ़ प्रस्थान
जब अच्छी तरह रोशनी फैल जाए तो सूरज उगने से पहले वह मिना की ओर प्रस्थान करेगा, और वादी मुहस्सर (मुज़दलिफ़ा और मिना के बीच एक वादी है) में तेज़ी से चलेगा मिना पहुंचकर जमरतुल अक़बह को कंकरी मारेगा और वह मक्का के निकट सबसे अंतिम जमरह है (वह मक्का से सबसे निकट जमरह है) वह एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारेगा, हर कंकरी लगभग लूबिया के दाने के बराबर होगी, हर कंकरी के साथ तक्बीर कहेगा (जमरतुल अक़बह को कंकरी मारते समय सुन्नत यह है कि आदमी जमरह की ओर मुंह करे और मक्का को अपने बायें ओर और मिना को अपने दाहिने ओर कर ले). कंकरी मारने से फ़ारिग़ होने के बाद अपने हदी (क़ुर्बानी के जानवर) को ज़बह करे, फिर अपने सिर को मुंडाए या उसके बालों को छोटा करवाए यदि वह पुरुष है, रही बात महिला की तो वह अपने बालों से एक उंगल (पोर) के बराबर बाल काट लेगी. (इसके द्वारा मोहरिम को पहला तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा, अतः उसके लिए अपनी पत्नी से संभोग करने के अलावा एहराम की हालत में निषिद्ध हर चीज़ हलाल हो जाएगी) फिर वह मक्का जाए और हज का तवा और सई करे. (फिर उसे दूसरा तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा तो उसके लिए हर वह चीज़ हलाल हो जाएगी जो एहराम के कारण उसके लिए हराम थी).

सुन्नत यह है कि जब वह कंकरी मारने और सिर मुंडाने के बाद तवाफ़ के लिए मक्का जाने का इरादा करे तो ख़ुशबू लगाए, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का फ़रमान है कि “मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपके एहराम बांधने के समय तथा आपके हलाल होने के समय काबा का तवाफ़ करने से पूर्व ख़ुशबू लगाती थी.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1539) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1189) ने रिवायत किया है.

फिर तवाफ़ और सई करने के बाद मिना लौट आए और वहां ज़ुल-हिज्जा की ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ की रात गुज़ारे और दोनों दिनों में सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे, सर्वश्रेष्ठ यह है कि वह कंकरी मारने के लिए पैदल चलकर जाए और यदि वह सवारी कर लेता है तो कोई पाप की बात नहीं है. वह सर्व प्रथम पहले जमरह को कंकरी मारेगा और वह मक्का से सबसे दूर का जमरह है और वही मस्जिदे ख़ैफ़ के निकट है, एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के बाद अल्लाहु अकबर कहे, फिर थोड़ा आगे बढ़कर अपनी पसंद के अनुसार लंबी दुआ करे, यदि उसके लिए देर तक ठहरना कष्टदायक हो तो जितना भी उसके लिए आसान हो दुआ करे चाहे थोड़ा ही सही, ताकि सुन्नत पर अमल हो जाए.

फिर मध्य जमरह (अल-जमरतुल वुस्ता) को एक के पीछे एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर बायें ओर हो जाए और क़िब्ला की ओर मुंह करके अपने दोनों हाथों को उठाकर खड़ा हो और यदि उसके लिए आसान हो तो लंबी दुआ करे, नहीं तो जितना उसके लिए आसान हो उतना ही ठहरे, और उसके लिए दुआ के लिए ठहरने को त्याग करना उचित नहीं है क्योंकि यह सुन्नत है, जबकि बहुत से लोग अज्ञानता के कारण या लापरवाही में उसे छोड़ देते हैं, और जब भी किसी सुन्नत को नष्ट कर दिया जाए तो उसको करना और लोगों के बीच उसको प्रकाशित करना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि उसे छोड़ा न जाए और वह मिटने न पाए.

फिर जमरतुल अक़बह को एक के बाद एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर वहां से चला जाए और उसके बाद दुआ न करे.

जब बारहवें दिन सभी जमरात को कंकरी मार ले तो यदि चाहे तो जल्दी करे और मिना से बाहर निकल जाए, और यदि चाहे तो विलंब करे और वहां तेरह ज़ुलहिज्जा की रात बिताए और सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे जैसा कि पीछे गुज़र चुका. जबकि विलंब करना सर्वश्रेष्ठ है, और ऐसा करना अनिवार्य नहीं है सिवाय इसके कि बारह ज़ुलहिज्जा को सूरज डूब जाए और वह मिना ही में हो, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य है यहां तक कि वह अगले दिन सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मार ले, किंतु यदि बारह ज़ुल-हिज्जा को उसके ऊपर मिना में सूरज उसकी इच्छा के बिना डूब जाए, उदाहरण के तौर पर उसने प्रस्थान कर दिया हो और सवारी पर बैठ गया हो, किंतु गाड़ियों की भीड़ इत्यादि के कारण विलंब हो जाए तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि सूरज डूबने तक उसका विलंब होना उसकी इच्छा के बिना हुआ है.

फिर जब वह मक्का से निकल कर अपने देश जाने का इरादा करे तो वह बाहर न निकले यहां तक कि विदाई तवाफ़ कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- “कोई व्यक्ति कूच न करे यहां तक कि उसका अंतिम काम अल्लाह के घर (काबा) का तवाफ़ हो.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1327) ने रिवायत किया है, तथा एक रिवायत के शब्द यह हैं कि “लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम काम अल्लाह के घर का तवाफ़ करना हो सिवाय इसके कि मासिक धर्म वाली औरत के लिए रुख़्सत दी गई है.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1755) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1328) ने रिवायत किया है.

चुनांचे मासिक धर्म और प्रसव वाली औरत पर विदाई तवाफ़ अनिवार्य नहीं है, तथा उन दोनों के लिए विदाई के लिए मस्जिदुल हराम के द्वार के पास खड़ा होना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है.

तथा वह विदाई तवा को अल्लाह के घर का अंतिम काम बनाए, जब वह यात्रा के लिए कूच करने का इरादा करे, तो यदि वह विदाई तवाफ़ के बाद साथियों की प्रतीक्षा के लिए या अपनी सवारी को लादने के लिए ठहर जाए या रास्ते में कोई आवश्यकता की चीज़ ख़रीद ले तो उस पर कोई पाप नहीं है, और वह तवा को नहीं लौटाएगा सिवाय इसके  कि वह अपने सफ़र को स्थगित करने की नीयत कर ले, उदाहरण के तौर पर वह दिन के आरंभ में सफ़र करना चाहता है तो वह विदाई तवाफ़ कर ले फिर वह सफ़र को उदाहरण के तौर पर दिन के अंत तक निलंबित कर दे, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए तवाफ को लौटाना अनिवार्य है ताकि वह उसका अल्लाह के घर का अंतिम काम हो जाए.

लाभदायक जानकारी
हज या उम्रा का एहराम बांधने वाले पर निम्नलिखित बातें अनिवार्य हैं-
1. अल्लाह तअला ने अपने धर्म के जो प्रावधान उसके ऊपर अनिवार्य किए हैं जैसे कि जमाअत के साथ नमाज़ को उसके समय पर पढ़ना, उसका पालन करना.
2. अल्लाह तअला ने उसे जिन कामुक बातों, गुनाहों और उल्लंघनों से रोका है उनसे दूर रहे क्योंकि अल्लाह तअला का फ़रमान है-

﴿فمن فرض فيهن الحج فلا رفث ولا فسوق ولا جدال في الحج ﴾ [ البقرة: 197]
“अतः जिसने इन महीनों में हज को फ़र्ज़ कर लिया, तो हज में संभोग और कामुक बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवज्ञा और पाप) तथा लड़ाई-झगड़ा (वैध) नहीं है.” (सूरतुल बक़रा : 197)

3. मुसलमानों को अपने कथन या कर्म से, चाहे वह मशाइर के पास हो या उसके अलावा में, कष्ट पहुंचाने से बाज़ रहे.
4. एहराम की हालत में निषिद्ध सभी चीज़ों से बचना.
(क) - अपने बाल या नाख़ून से कोई चीज़ न काटे, जहां तक कांटे को निकालने की बात है तो उसमें कोई पाप की बात नही है, भले ही ख़ून निकल आए.
(ख) - अपना एहराम बांधने के बाद अपने शरीर, या कपड़े, या खाने या पीने की चीज़ में ख़ुशबू न लगाए और न ही ख़ुशबूदार साबून से सफ़ाई सुथराई करे, रही बात उस बाक़ी बचे सुगंध के प्रभाव की जो उसने अपने एहराम से पहले इस्तेमाल की थी तो उसमें कोई हानि नहीं है.
(ग) - शिकार को न मारे।
(घ) - अपनी पत्नी से संभोग न करे.
(ङ) - तथा कामुकता के साथ स्पर्श या चुंबन या आलिंग्न वग़ैरह न करे.
(च) - स्वयं अपना या किसी दूसरे का विवाह न करे, तथा किसी औरत से अपनी या किसी अन्य की मंगनी न करे.
(छ) - दस्ताने न पहने. रही बात दोनों हाथों को कपड़े (चीथड़े) से लपेटने की तो इसमें कोई बात नहीं है.

ये सातों निषिद्ध चीज़ें पुरुष और स्त्री दोनों के लिए निषिद्ध हैं.

जबकि निम्नलिखित चीज़ें पुरूष के लिए विशिष्ट हैं:
- अपने सिर को किसी चिपकने वाली (सिर से मिली या चिपकी हुई) चीज़ से न ढांपे, रही बात छत्री, गाड़ी की छत और खैमा से साया करने, सिर पर सामान उठाने की, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है.
- वह क़मीज, पगड़ी, टोपी (हैट) पायजामा और मोज़ा न पहने, सिवाय इसके कि यदि वह इज़ार (तहबंद) न पाए तो पायजामा पहन ले या यदि जूते न पाए तो मोज़े पहन ले.
- तथा कोई ऐसी चीज़ न पहने जो उन चीज़ों के अर्थ में हो जिनका पीछे उल्लेख किया गया है, चुनांचे वह बुरक़ा, कंटोप, बनियान इत्यादि न पहने.
-  तथा उसके लिए जूते, अंगूठी, चश्मा, हेड-फून पहनना जाइज़ है, तथा वह अपने हाथ में घड़ी पहने, या उसे अपनी गर्दन में लटका ले, तथा बेल्ट बांधना ताकि उसमें अपने ख़र्च का पैसा रख सके.
- तथा उसके लिए ऐसी चीज़ के द्वारा सफ़ाई करना जाइज़ है जिसमें सुगंध न हो, या अपने सिर या शरीर को धोना और खुजलाना जाइज़ है और यदि ऐसा करने से बिना इच्छा के कोई बाल गिर जाए तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है.

तथा महिला नक़ाब नहीं पहनेगी, नक़ाब उस कपड़े को कहते हैं जिस से वह अपना चेहरा छिपाती है जिसमें उसकी दोनों आंखों के लिए सूराख बना होता है, तथा वह बुरक़ा भी नहीं पहनेगी.
सुन्नत यह है कि वह अपने चेहरे को खोले रखे सिवाय इसके कि उसे उसके गैर मह्रम मर्द देख रहे हों तो ऐसी स्थिति में उसके ऊपर एहराम की हालत और उसके अलावा में भी चेहरा छिपाना अनिवार्य है.
साभार islamqa


सखा  सँगाती ना  रहे ,  ना बरगद  की  छाँव।
आँगन की तुलसी कहाँ , ना बचपन का गाँव।।

नहीं    प्रभाती  आरती , ना   सँझवाती  शाम। 
प्रेत   बसेरा   सा  लगे  ,   पीछे   छूटा   गाँव।।

कोदौ  कुटकी  ना  रहे  , ना  सामा  का भात।
नहीं पनपथी  ज्वार की , चना  चबैना   प्रात।।

मही    महेरी    ढूँढ़ते  ,  जाउर   मीठा   भात।
कढ़ी   फुलौरी  के  बिना , रूठे  नहीं   बरात।।

नहीं  दुधारू  भैंस  अब , नहीं   रँभाती   गाय।
टुरी   टुरैली   मौज   में , बीड़ी   गाँजा   पाय।।

विरहा   आल्हा   के  बिना  ,  सूना  है  चौबार।
ढोल  मँजीरा  के बिना ,  फीके  सब  त्यौहार।।

अमराई   कोयल  बिना , कागा  बिन  खपरैल।
अहिबाती   भूँखन  मरे  ,  खेलय फाग रखैल।।
-डॉ. स्वामी विजयानन्द

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.


चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.

कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.

श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, वे एक दयालु, सौम्य और स्नेही व्यक्ति थे, जिनकी असामयिक मृत्यु ने मेरे जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ा है. मुझे उनके साथ बिताया गया वक़्त याद है और भाग्यशाली था कि कई जन्मदिन उनके साथ मनाएं, जब वह ज़िन्दा थे. मैं उन्हें बहुत याद करता हूं, लेकिन वे मेरी यादों में हैं. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया. यह सबसे बेशक़ीमती तोहफ़ा है, जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है."


-डॉ फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर... मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की... वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं...
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.



-डॉ. चंद्रेश कुमार छतलान
वह रसोई से बाहर भागते हुए निकली और अपने पति से टकरा गई। पति ने हैरानी से पूछा, "क्या हुआ?"
पत्नी ने उत्तेजित स्वर में उत्तर दिया, "यह देखो! डस्टबीन से क्या मिला है?" कहते हुए उसने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें सोने का एक सिक्का था।
पति ने उस सिक्के को देखते हुए शांत स्वर में कहा, "हाँ! यह तो मैंने ही फैंका है।"
"क्याss!? तुम पागल हो गए हो। इतना महँगा सोने का सिक्का...!!"
"हाँ! क्योंकि यह पुराना हो गया था।" पति का स्वर अभी भी शांत ही था।
"सोना नहीं, मैल और कालेपन के कारण चांदी पुरानी होती है। सोना फैंकना अपशगुन भी होता है।", पत्नी ने तल्ख़ उपदेशात्मक स्वर में उत्तर दिया।
"अच्छा! लेकिन तुम भी तो सोने जैसे मेरे पापा को घर से निकाल फैंकने की बात करती हो।"
अब पत्नी झुंझला गई और बोली, "सोने के सिक्के और तुम्हारे पापा का कोई मेल भी है? वे तो पीतल से भी... उनकी कितनी सेवा करनी पड़ती है! औरss तुम्हारे दूसरे भाई... वे क्या करते हैं? वे क्यों नहीं लेकर जाते उन्हें?"
पति मज़बूत स्वर में बोला, "नहीं! मैं अपने सोने जैसे पापा को किसी को नहीं ले जाने दूंगा।"
पत्नी दाहिने होंठ के कोने को ऊपर चढ़ाते हुए बुदबुदाई, "तो दुनिया को दिखाने के लिए सेवा करते रहो।"
उसका हिकारत भरा बुदबुदाना सुन पति को गुस्सा आ गया और उसने अपनी पत्नी के दोनों बाजू पकड़ कर गुर्राते हुए धीमे लेकिन दृढ़ता से एक शब्द ऐसा कहा, जिसे सुनकर पत्नी निचले होंठ को ऊपर के दांतों से दबाती हुई सोने के सिक्के को मुट्ठी में बंदकर फिर से रसोई में चली गई।
और वह शब्द था –
पेंशन।

***


लेखक का संक्षिप्त परिचय 
नाम: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
शिक्षा: विद्या वाचस्पति (Ph.D.)
सम्प्रति: सह आचार्य (कम्प्यूटर विज्ञान)
साहित्यिक लेखन विधा: कविता, लघुकथा, बाल कथा, कहानी
18 पुस्तकें प्रकाशित, 10 संपादित पुस्तके
52+ शोध पत्र प्रकाशित
70+ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त
फ़ोन: 9928544749
ईमेल: writerchandresh@gmail.com
डाक का पता: 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313 002
यू आर एल:  https://sites.google.com/view/chandresh-c/about
ब्लॉग:  http://laghukathaduniya.blogspot.in/


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.    

इत्र का इतिहास 
इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है. ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.        
चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है. 
क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.

इत्र से मुग़लों का रिश्ता   
मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.
इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.
 
इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है. उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.     
आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था. 

इत्र कैसे बनता है 
इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं. इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है. फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है.  

मिट्टी का इत्र
फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है. ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है. 
यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं. दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.           
 
अगरऊद
कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है. इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50 लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है. 
कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.   
कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15 हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है. 

फूलों की खेती 
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. 

देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-   
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.  
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है. 
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है. 
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है. 
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है. 
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम 
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है. 
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट  दिल्ली में स्थित है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)
साभार आवाज़ 
 


-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
दुनिया के सभी मज़हबों में माँ को बहुत अहमियत दी गई है, क्योंकि माँ के दम से ही तो हमारा वजूद है. ख़ुदा ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा, तो यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़ेहन में उभर आया होगा. जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है. ठीक उसी तरह माँ से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा हुआ है. तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है माँ, तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां. एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है. मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी. जिसके आंचल में कायनात समा जाए. जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं. जिसके होठों पर दुआएं हों. जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी सपने सजे हों. ऐसी ही होती है माँ. बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी. ख़ुदा के बाद माँ ही इंसान के सबसे ज़्यादा क़रीब होती है.

इसीलिए सभी नस्लों में माँ को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में माँ का दर्जा बहुत ऊंचा है. क़ुरआन करीम की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने इंसान को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताकीद की है. उसकी माँ ने उसे तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया. उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि माँ के क़दमों के नीचे जन्नत है. आप सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने एक हदीस में इरशाद फ़रमाया है कि मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को माँ के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे. 
एक अन्य हदीस के मुताबिक़ एक शख़्स अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया और सवाल किया कि ऐ अल्लाह के नबी! मेरे अच्छे बर्ताव का सबसे ज़्यादा हक़दार कौन है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारी माँ.” उसने कहा कि फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारी माँ.” उसने कहा कि फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारी माँ.” उसने कहा कि फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम्हारा वालिद. फिर तुम्हारे क़रीबी रिश्तेदार." 

यानी इस्लाम में माँ को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली माँ के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली माँ को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी माँ के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक माँ अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती, तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

यहूदियों में भी माँ को सम्मान की नज़र से देखा जाता है. उनकी दीनी मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में भी माँ को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की माँ मदर मैरी को बहुत बड़ा रुतबा हासिल है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परम्परा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर माँ के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसम्बर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है.

भारत में माँ को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को माँ कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में माँ के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में माँ को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं कि दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण माँ होती है. तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में राम कहते हैं कि जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

माँ बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी माँ की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. माँ की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. माँ और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. माँ बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी माँ से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी माँ के लिए वो हमेशा उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. माँ अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. माँ बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बहुत तेज़ घुड़सवारी किया करते थे. एक दिन अल्लाह ने उनसे फ़रमाया कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उन्होंने इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी माँ ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रहीं उनकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, माँ इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. माँ को लाखों सलाम. दुनिया की सभी माओं को समर्पित हमारा एक शेअर पेश है- 
क़दमों को माँ के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई
उसने कभी मां को नहीं देखा था. उसने ज़मीन पर मां की तस्वीर बनाई और उसकी गोद में सो गई.
इराक़ी यतीमख़ाने में एक मासूम यतीम बच्ची की तस्वीर.


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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