पूरे चाँद की रात
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*डॉ फ़िरदौस ख़ान*आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती
हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल...
डॉ फ़िरदौस ख़ान
जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का ख़त्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे बड़ा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी. लेखन के आविष्कार का श्रेय 4000 ईस्वी पूर्व में मेसापोटामिया के सूमेरियनों को जाता है. आज हम जिस समय की गणना करते हैं, उसकी शुरुआत सुमेरियनों-बेबलीलोनियनों के काल में हुई थी. एक घंटे को 60 मिनट और एक मिनट को 60 सेकेंड में इन्हीं लोगों ने बांटा था. लेकिन अ़फसोस की बात है कि आधुनिकता की अंधी दौ़ड में इंसान अपनी मातृभाषा को ही भूलता चला गया. नतीजतन, आज दुनिया भर में हज़ारों भाषाएं अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच गईं.
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फ़रवरी की पूर्व संध्या पर जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की रिपोर्ट एटलस ऑफ वल्ड्र्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर-2009 में कहा गया है कि मौजूदा सभी भाषाओं में से तक़रीबन 90 फ़ीसद भाषाएं अगले 100 बरसों में अपना वजूद खो सकती हैं. दुनिया की तक़रीबन 97 फ़ीसद आबादी इनमें से सिर्फ़ चार फ़ीसद भाषाएं बोलती है. एक अंदाज़ के मुताबिक़, दुनिया भर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से 2500 भाषाओं की हालत बेहद चिंताजनक है. ये वह भाषाएं हैं, जो पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी. दुनिया भर में 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 150 से कम है. जिन देशों में भाषाएं ख़तरे में हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है. यहां तक़रीबन 196 भाषाएं दम तो़ड़ रही हैं. भारत के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है, जहां भाषाओं की हालत चिंताजनक है. अमेरिका में 192 भाषाएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है, जहां 147 भाषाएं अपना वजूद खो रही हैं. दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक दर्जन से भी कम लोग बोलते हैं. इनमें कैरेम भी एक ऐसी ही भाषा है, जिसे उक्रेन के सिर्फ़ छह लोग ही बोलते हैं. ओकलाहामा में विचिता भाषा को महज़ दस लोग ही बोलते हैं. इसी तरह लेंगिलू बोलने वाले भी सिर्फ़ चार लोग ही बचे हैं. पिछले एक दशक में भाषाओं की हालत बेहद गंभीर होती चली गई है. एक दशक पहले ख़त्म होने वाली भाषाओं की संख्या 900 थी, जो अब बढ़कर 2500 हो गई है. ग़ौरतलब है कि अकेले इंडोनेशिया में 365 भाषाएं हैं. अफ्रीका में एक हज़ार से भी ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. दुनिया में अंग्रेजी के बाद मेंडारिन भाषा बोलने वाली आबादी सबसे ज़्यादा है. क्षेत्रीय भाषाओं में स्पेनिश दूसरे स्थान पर है. नई भाषाओं में अफ्रीकन ज़्यादा बोली जाती है. सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के दक्षिण हिस्से में डच कॉलोनी की स्थापना के लिए रोमन कैथोलिक और जर्मन भाषाओं को शामिल किया गया. बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकन को डच और जर्मन से मिलाकर नई भाषा विकसित की गई. लंदन में 700 भाषाएं बोली जाती हैं.
भारत में ख़त्म होने वाली भाषाओं में से ज़्यादातर क्षेत्रीय और क़बीलाई बोलियां हैं. फ़रवरी 2010 में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तक़रीबन 70 हज़ार साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा का अस्तित्व ख़त्म हो गया. संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक़, अंडमान में रहने वाले बो क़बीले की आख़िरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर की मौत के साथ ही इस आदिवासी समुदाय की भाषा बो ने भी दम तो़ड़ दिया. इसी के साथ इस समाज की संस्कृति और सभ्यता भी ख़त्म हो गई. ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस आखिरी सदस्य ने 2004 की सुनामी में अपना घरबार खो दिया था. वह स्ट्रैट द्वीप पर सरकार द्वारा बनाए गए शिविर में ज़िंदगी के आख़िरी दिन गुज़ार रही थीं. भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि बो भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक के वक़्त से इस समुदाय द्वारा बोली जा रही थी. अंडमान पर रहने वाले आदिवासियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस. तक़रीबन 10 भाषाई समूहों में विभाजित ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की आबादी साल 1858 में यहां ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से ज़्यादा थी. फ़िलहाल ग्रेटर अंडमान में 52 मूल निवासी बचे हैं. लेकिन इनका वजूद भी ख़तरे में है. यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है. भारत के हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड आदि में तक़रीबन 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जनजीवन से ग़ायब हो रही हैं, जबकि ओडिसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी तक़रीबन 42 भाषाएं ख़त्म हो रही हैं. 1961 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 1652 भाषाएं थीं, जो 2001 में घटकर महज़ 234 ही रह गईं. पिछले चार दशक में भारत में 1418 भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं. हो सकता है कि यह संख्या कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं को बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलने वाले लोगों की तादाद दस हज़ार से कम है. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डी पुरंदेश्वरी के मुताबिक़, भारत की 196 भाषाओं में से 84 भाषाएं असुरक्षित श्रेणी में हैं, जबकि 62 भाषाएं निश्चित तौर पर लुप्त होने के कगार पर हैं. इसी तरह छह भाषाओं को गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में रखा गया है, जबकि 35 भाषाएं अत्यंत गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में शामिल हैं.
1991 की जनगना में भारत में 1956 भाषाओं के वजूद को स्वीकार किया गया, जबकि 1796 भाषाओं को मातृभाषा के तौर पर स्वीकारा गया. 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में तक़रीबन 450 ऐसी भाषाएं हैं, जिनके बोलने वालों की तादाद दस हज़ार से भी कम है. बदलते वक़्त के साथ ये भाषाएं अपना अस्तित्व खो रही हैं. दुनिया भर में सिर्फ़ 65 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें एक करोड़ से ज़्यादा लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. इनमें 11 भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं. इनमें से एक भाषा हिंदी भी है. मगर भारत में हिंदी का स्थान अंग्रेज़ी भाषा लेती जा रही है. संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है. भारत के संविधान के मुताबिक़, देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद-344 (1) और 351 के मुताबिक़, भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है. संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे. विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिंदी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए. भारतीय संविधान के मुताबिक़, कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है. मगर हिंदी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है. उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-343 में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. संविधान के लिए अनुच्छेद-351 के तहत हिंदी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है.
ग़ौरतलब है कि भारत में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था. देश में हिंदी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं. दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है. दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसकी वजह से वे हिंदी का विरोध करने से भी नहीं चूकते. 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे. उनकी मांग थी कि हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए.
संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था. तब से केंद्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में हर साल 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद-343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपी देवनागरी होगी. साथ ही अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा. संसद का काम हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद-120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है. यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है.
दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है कि देश इस तरफ़ उतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं, जितना देना चाहिए. दनिया में ऐसे भी देश हैं, जहां के बाशिंदों को अपनी भाषा अपनी जान से भी प्यारी है. बंगालियों में अपनी भाषा से बेहद लगाव है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 1952 में बांग्ला भाषा को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग को लेकर एक मुहिम चलाई गई थी. बांग्ला भाषा की एक हज़ार साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है, जो बेहद समृद्ध है. बंगालियों में अपनी मातृभाषा के प्रति बेहद श्रद्धा और प्रेम है. इसलिए बांग्ला साहित्य बेहद समृद्ध है. लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया. इसके ख़िलाफ़ में 21 फ़रवरी, 1952 को भाषायी जुलूस निकाला गया. यह प्रदर्शन हिंसक हो उठा और अबुल बरकत, रफ़ीकुद्दीन और शफ़ी उर्रहमान पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए. बांग्ला देश ने इन्हें भाषायी शहीद का दर्जा देते हुए देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का ख़िताब दिया. इनकी याद में 21 फ़रवरी, 1953 से बांग्लादेश में मातृभाषा दिवस मनाया जाने लगा. बांग्लादेश की सरकार के आग्रह पर 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को की 30वीं आम सभा ने सर्वसम्मति से 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने का फ़ैसला किया, तभी यह हर साल 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा. संयुक्त राष्ट्र ने भाषाई जागरूकता बढ़ाने के मक़सद से 2008 को अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया था.
बीते साल 21 जून को गूगल ने दुनिया से ख़त्म होती भाषाओं को बचाने की मुहिम शुरू की है. इसके लिए गूगल ने भाषाविदों और रिसर्च स्कोलर्स के साथ समझौता किया है. गूगल एंडेजर्ड लैंग्वेज प्रोजेक्ट के तहत काम कर रही है. इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है-एंडेजर्डलैंग्वेजेज डॉट कॉम (www.endangeredlanguages.com). इस पर उन सभी 3054 भाषाओं की जानकारी दी गई है, जिन्हें बचाने की क़वायद जारी है. इस पर लोग भाषाओं के बारे में अपनी जानकारी दे सकते हैं और जानकारी हासिल भी कर सकते हैं. वेबसाइट पर सुविधा दी गई है कि लोग खत्म हो रही भाषाओं-बोलियों के बारे में जानकारी पाने के अलावा उनसे संबंधित पांडुलिपियां, ऑडियो, वीडियो फाइल आदि शेयर या पोस्ट कर सकते हैं. प्रोजेक्ट मैनेजर क्लारा रिवेरा रोड्रिग्वेज और जैसन रिजमैन का कहना है कि गूगल की इस पहल के ज़रिये दुनिया की तमाम भाषाओं को एक मंच मिलेगा. साथ ही उस भाषाई संस्कृति को समझने का मौक़ा मिलेगा. कोरो एक ऐसी भाषा है, जिसे विज्ञान में नहीं जाना जाता था. यह हमारे ही उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाक़ों में बोली जाती थी, लेकिन अब दुनियाभर में 1000 लोग भी इसे बोलने वाले नहीं हैं. ऐसी ही एक और भाषा है नवाजो. आज दुनियाभर में इसे बोलने वाले लोग 1,20,000 से ज़्यादा लोग नहीं हैं. ऐसी ही भाषाओं की दिलचस्प जानकारी इस वेबसाइट पर मिलती है.
किसी भी भाषा को बचाने के लिए ज़रूरी है कि लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति आदर और सम्मान की भावना हो, मगर यह अफ़सोस की बात है कि भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से भारतीय भाषाएं हाशिये पर जा रही हैं.
17 अक्टूबर 2018
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
देश को आज़ाद हुए आठ दशक होने वाले हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।
हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।
ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर के 132 देशों में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं, जिनमें तक़रीबन तीन करोड़ अप्रवासी शामिल हैं। दुनिया के 157 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है।
देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।
संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।
भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।
ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।
संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।
हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।
अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हर भाषा की अपनी अहमियत होती है। फिर भी मातृभाषा हमें सबसे प्यारी होती है, क्योंकि उसी ज़ुबान में हम बोलना सीखते हैं। बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है। इसलिए भी मां बोली हमें सबसे अज़ीज़ होती है। लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िन्दगी बसर करते हैं, यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को 'तुच्छ' समझते हैं। बार-बार अपनी मातृभाषा का अपमान करते हुए अंग्रेजी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हैं। हिन्दी के साथ ऐसा सबसे ज़्यादा हो रहा है। वे लोग जिनके पुरखे अंग्रेजी का 'ए' नहीं जानते थे, वे भी हिन्दी को गरियाते हुए मिल जाएंगे। हक़ीक़त में ऐसे लोगों को न तो ठीक से हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी। दरअसल, वह तो हिन्दी को गरिया कर अपनी 'कुंठा' का 'सार्वजनिक प्रदर्शन' करते रहते हैं।
अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है। इंसान को अंग्रेजी ही नहीं, दूसरी देसी-विदेशी भाषाएं भी सीखनी चाहिए। इल्म हासिल करना तो अच्छी बात है, लेकिन अपनी मातृभाषा की क़ुर्बानी देकर किसी दूसरी भाषा को अपनाए जाने को किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। यह अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। हालत यह है कि अब तो गांव-देहात में भी अंग्रेज़ी का चलन बढ़ने लगा है। पढ़े-लिखे लोग अपनी मातृभाषा में बात करना पसंद नहीं करते, उन्हें लगता है कि अगर वे ऐसा करेंगे तो गंवार कहलाएंगे। क्या अपनी संस्कृति की उपेक्षा करने को सभ्यता की निशानी माना जा सकता है, क़तई नहीं। हमें ये बात अच्छे से समझनी होगी कि जब तक हिन्दी भाषी लोग ख़ुद हिन्दी को सम्मान नहीं देंगे, तब तक हिन्दी को वो सम्मान नहीं मिल सकता, जो उसे मिलना चाहिए।
देश को आज़ाद हुए साढ़े सात दशक बीत चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।
हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।
ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। स्टैटिस्टा के मुताबिक़ दुनियाभर में हिन्दी भाषा तेज़ी से बढ़ रही है। साल 1900 से 2021 के दौरान इसकी रफ़्तार 175.52 फ़ीसदी रही, जो अंग्रेज़ी की रफ़्तार 380.71 फ़ीसदी के बाद सबसे ज़्यादा है। अंग्रेज़ी और मंदारिन भाषा के बाद हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। साल 1961 में ही हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई। उस वक़्त दुनियाभर में 42.7 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे। साल 2021 में यह तादाद बढ़कर 117 करोड़ हो गई। इनमें से 53 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। हालत यह है कि हिन्दी अब शीर्ष 10 कारोबारी भाषाओं में शामिल है। इतना ही नहीं दुनियाभर के 10 सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बारों में शीर्ष-6 हिन्दी के अख़बार हैं। भारत के अलावा 260 से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। विदेशों में 28 हज़ार से ज़्यादा शिक्षण संस्थान हिन्दी भाषा सिखा रहे हैं। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है। गूगल पर हिन्दी के 10 लाख करोड़ से ज़्यादा पन्ने मौजूद हैं।
देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।
संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।
भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।
ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।
संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।
हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।
अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।
रूस में अपनी मातृभाषा भूलना बहुत बड़ा शाप माना जाता है। एक महिला दूसरी महिला को कोसते हुए कहती है- अल्लाह, तुम्हारे बच्चों को उनकी मां की भाषा से वंचित कर दे। अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उनसे महरूम कर दे, जो उन्हें उनकी ज़ुबान सिखा सकता हों। नहीं, अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उससे महरूम करे, जिसे वे अपनी ज़ुबान सिखा सकते हों। मगर पहा़डों में तो किसी तरह के शाप के बिना भी उस आदमी की कोई इज्ज़त नहीं रहती, जो अपनी ज़ुबान की इज्ज़त नहीं करता। पहाड़ी मां विकृत भाषा में लिखी अपने बेटे की कविताएं नहीं पढ़ेगी। रूस के प्रसिद्ध लेखक रसूल हमज़ातोव ने अपनी किताब मेरा दाग़िस्तान में ऐसे कई क़िस्सों का ज़िक्र किया है, जो मातृभाषा से जुड़े हैं। कैस्पियन सागर के पास काकेशियाई पर्वतों की ऊंचाइयों पर बसे दाग़िस्तान के एक छोटे से गांव त्सादा में जन्मे रसूल हमज़ातोव को अपने गांव, अपने प्रदेश, अपने देश और उसकी संस्कृति से बेहद लगाव रहा है। मातृभाषा की अहमियत का ज़िक्र करते हुए ‘मेरा दाग़िस्तान’ में वह लिखते हैं, मेरे लिए विभिन्न जातियों की भाषाएं आकाश के सितारों के समान हैं। मैं नहीं चाहता कि सभी सितारे आधे आकाश को घेर लेने वाले अतिकाय सितारे में मिल जाएं। इसके लिए सूरज है, मगर सितारों को भी तो चमकते रहना चाहिए। हर व्यक्ति को अपना सितारा होना चाहिए। मैं अपने सितारे अपनी अवार मातृभाषा को प्यार करता हूं। मैं उन भूतत्वेत्ताओं पर विश्वास करता हूं, जो यह कहते हैं कि छोटे-से पहाड़ में भी बहुत-सा सोना हो सकता है।
एक बेहद दिलचस्प वाक़िये के बारे में वह लिखते हैं, किसी बड़े शहर मास्को या लेनिनग्राद में एक लाक घूम रहा था। अचानक उसे दाग़िस्तानी पोशाक पहने एक आदमी दिखाई दिया। उसे तो जैसे अपने वतन की हवा का झोंका-सा महसूस हुआ, बातचीत करने को मन ललक उठा। बस भागकर हमवतन के पास गया और लाक भाषा में उससे बात करने लगा। इस हमवतन ने उसकी बात नहीं समझी और सिर हिलाया। लाक ने कुमीक, फिर तात और लेज़गीन भाषा में बात करने की कोशिश की। लाक ने चाहे किसी भी ज़बान में बात करने की कोशिश क्यों न की, दाग़िस्तानी पोशाक में उसका हमवतन बातचीत को आगे न बढ़ा सका। चुनांचे रूसी भाषा का सहारा लेना पड़ा। तब पता चला कि लाक की अवार से मुलाक़ात हो गई थी। अवार अचानक ही सामने आ जाने वाले इस लाक को भला-बुरा कहने और शर्मिंदा करने लगा। तुम भी कैसे दाग़िस्तानी, कैसे हमवतन हो, अगर अवार भाषा ही नहीं जानते, तुम दाग़िस्तानी नहीं, मूर्ख ऊंट हो। इस मामले में मैं अपने अवार भाई के पक्ष में नहीं हूं। बेचारे लाक को भला-बुरा कहने का उसे कोई हक़ नहीं था। अवार भाषा की जानकारी हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है। अहम बात यह है कि उसे अपनी मातृभाषा, लाक भाषा आनी चाहिए। वह तो दूसरी कई भाषाएं जानता था, जबकि अवार को वे भाषाएं नहीं आती थीं।
अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग़्रेज़ ही उनके सामने आ गया। इसमें हैरानी की तो कोई बात नहीं। मास्को की सड़कों पर तो विदेशियों की कोई कमी नहीं है।
अंग्रेज़ अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेज़ी, फिर फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में भी पूछताछ करने लगा। अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेज़गीन, दार्ग़िन और कुमीक भाषाओं में अपनी बात को समझाने की कोशिश की। आख़िर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत दाग़िस्तानी ने जो अंग्रेज़ी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए यह कहा-देखो संस्कृति का क्या महत्व है। अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज़ से बात कर पाते। समझे न? समझ रहा हूं। अबूतालिब ने जवाब दिया। मगर अंग्रेज़ को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी ज़ुबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की?
रसूल हमज़ातोव लिखते हैं, एक बार पेरिस में एक दाग़िस्तानी चित्रकार से मेरी भेंट हुई। क्रांति के कुछ ही समय बाद वह पढ़ने के लिए इटली गया था, वहीं एक इतावली लड़की से उसने शादी कर ली और अपने घर नहीं लौटा। पहाड़ों के नियमों के अभ्यस्त इस दाग़िस्तानी के लिए अपने को नई मातृभूमि के अनुरूप ढालना मुश्किल था। वह देश-देश में घूमता रहा, उसने दूर-दराज़ के अजनबी मुल्कों की राजधानियां देखीं, मगर जहां भी गया, सभी जगह घर की याद उसे सताती रही। मैंने यह देखना चाहा कि रंगों के रूप में यह याद कैसे व्यक्त हुई है। इसलिए मैंने चित्रकार से अपने चित्र दिखाने का अनुरोध किया। एक चित्र का नाम ही था मातृभूमि की याद। चित्र में इतावली औरत (उसकी पत्नी) पुरानी अवार पोशाक में दिखाई गई थी। वह होत्सातल के मशहूर कारीगरों की नक़्क़ाशी वाली चांदी की गागर लिए एक पहाड़ी चश्मे के पास खड़ी थी। पहाड़ी ढाल पर पत्थरों के घरों वाला उदास-सा अवार गांव दिखाया गया था और गांव के ऊपर पहाड़ी चोटियां कुहासे में लिपटी हुई थीं। पहाड़ों के आंसू ही कुहासा है-चित्रकार ने कहा, वह जब ढालों को ढंक देता है, तो चट्टानों की झुर्रियों पर उजली बूंदें बहने लगती हैं। मैं कुहासा ही हूं। दूसरे चित्र में मैंने कंटीली जंगली झाड़ी में बैठा हुआ एक पक्षी देखा। झाड़ी नंगे पत्थरों के बीच उगी हुई थी। पक्षियों को गाता हुआ दिखाया गया था और पहाड़ी घर की खिड़की से एक उदास पहाडिन उसकी तरफ़ देख रही थी। चित्र में मेरी दिलचस्पी देखकर चित्रकार ने स्पष्ट किया-यह चित्र पुरानी अवार की किंवदंती के आधार पर बनाया गया है।
किस किंवदंती के आधार पर?
एक पक्षी को पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया गया। बंदी पक्षी दिन-रात एक ही रट लगाए रहता था-मातृभूमि, मेरी मातृभूमि, मातृभूमि… बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि इन तमाम सालों के दौरान मैं भी यह रटता रहा हूं। पक्षी के मालिक ने सोचा, जाने कैसी है उसकी मातृभूमि, कहां है? अवश्य ही वह कोई फलता-फूलता हुआ बहुत ही सुन्दर देश होगा, जिसमें स्वार्गिक वृक्ष और स्वार्गिक पक्षी होंगे। तो मैं इस परिन्दे को आज़ाद कर देता हूं, और फिर देखूंगा कि वह किधर उड़कर जाता है। इस तरह वह मुझे उस अद्भुत देश का रास्ता दिखा देगा। उसने पिंजरा खोल दिया और पक्षी बाहर उड़ गया। दस एक क़दम की दूरी पर वह नंगे पत्थरों के बीच उगी जंगली झाड़ी में जा बैठा। इस झाड़ी की शाख़ाओं पर उसका घोंसला था। अपनी मातृभूमि को मैं भी अपने पिंजरे की खिड़की से ही देखता हूं। चित्रकार ने अपनी बात ख़त्म की।
तो आप लौटना क्यों नहीं चाहते?
देर हो चुकी है। कभी मैं अपनी मातृभूमि से जवान और जोशीला दिल लेकर आया था। अब मैं उसे सिर्फ़ बूढ़ी हड्डियां कैसे लौटा सकता हूं?
रसूल हमज़ातोव ने अपनी कविताओं में भी अपनी मातृभाषा का गुणगान किया है। अपनी एक कविता में वह कहते हैं-
मैंने तो अपनी भाषा को सदा हृदय से प्यार किया है
हमें भी अपनी मातृ भाषा के प्रति अपने दिल में यही जज़्बा पैदा करना होगा।
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भी पनाह मांगती है. कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है. जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो, उसे दोज़ख़ की आग का क्या खौफ़. जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो उससे हुआ है. उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है. उस महबूब से जो सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह तो ख़ुदा के नूर का वह क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है. किसी इंसान से हो या ख़ुदा से. जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है. इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है, जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बुल्ले शाह कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी
वह तो अल्लाह को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता. बुल्ले शाह के जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़, बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वह बुल्ले शाह कहलाए. वह जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिद्ध क़िस्सा हीर-रांझा के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की. बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के मुरीद थे. इश्क़े-हक़ीक़ी के बारे में बुल्ले शाह कहते हैं-
इश्क़े-हक़ीक़ी ने मुथ्थी कु़डे
मैनूं दस्सो पिया दा देसा
कियो इश्क़ असां ते आया है
तूं आया है मैं पाया है...
यानी प्रेम के देवता ने मेरा मन चुरा लिया है. मुझे बताओ कि पिया का देश कहां है. इश्क़ मेरे पास क्यों आया है. ओ इश्क़, तू आया है और मैंने तुझे महसूस किया है.
अल्लाह का पहला वर्ण (अरबी, फ़ारसी, उर्दू) है अलिफ़ का आकार 1 के समान होता है. यह परमात्मा की अद्वैतता को इंगित करता है. चूंकि बुल्ले शाह अल्लाह से अलग नहीं होना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा है-
इक्को अलिफ़ पढ़ो छुटकारा आये
यानी मुक्ति के लिए सिर्फ़ अलिफ़ पढ़ना ही काफ़ी है.
इश्क़ में वियोग भी होता है. वियोग में ही प्रेमी गिले-शिकवे करता है. यहां तक कि वह अपने प्रियतम को संगदिल और बेरहम भी कह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
कीह बेदर्दां संग यारी
रोवन अखियां ज़ारो ज़ारी
सानूं गए बेदर्दी छडके
हिजरे संग सीने विच ग़ड के
जिस्मो जिंद नू लै गए क़ढ के
इह गल कर गए हैंसयारी...
यानी बेदर्दी के साथ इश्क़ का क्या कहना. मेरी आंखें तो अविरल आंसू बहाती हैं. वह बेरहम महबूब मेरे सीने में वियोग रूपी कटार घोंपकर, मेरी जान निकालकर ले गया. उसने यह सब ब़डी बेरहमी के साथ किया. प्रेमी को दुनिया की कोई परवाह नहीं होती. वह हर तरह की निंदा सहन कर लेता है. ईश्वर वियोग में उसे तकली़फ महसूस होती है. बुल्ले शाह कहते हैं-
बिरहों आ व़डया विच वेह़डे
ज़ोरों ज़ोर देवे तन घेरे
दारू दर्द नां बझो तेरे
मैं सजनां बाझ मारीनी हां
मित्तर पियारे कारन नी
मैं लोक पियारे कारन नी
मैं लोक अलाहमे लैनी हां...
यानी विरह ने मेरे आंगन में आकर मुझे अपने प्रकोप से बेहोश कर दिया. इसके अलावा तकली़फ दूर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मैं तो प्रियतम के बिना मर रही हूं. मैं अपने प्रिय के लिए लोगों के उलाहने सुन रही हूं. कभी-कभी प्रेमी प्रियतम के उन गहन प्रेम सपनों को देखता है, जिसमें प्रियतम पलभर के लिए दर्शन देकर ओझल हो जाता है. उस व़क्त प्रेमी पी़डा से कराह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
देखो नीं पियारा मैनूं सुफने में छल गया
प्रेमी की ज़िंदगी में एक व़क्त ऐसा भी आता है, जब वह वियोग की रात गुज़र जाती है और फिर मिलन की सुबह आती है. उस व़क्त प्रेमी खुशी से नाच उठता है. वह दूसरों से मुबारकबाद लेना चाहता है. बुल्ले शाह कहते हैं- आओ सैयो रल दियो वधाई
मैं वर पाया रांझा माही...
यानी आओ दोस्तों, सब मिलकर मुझे मुबारकबाद दो. मैंने अपने महबूब यानी अपने खुदा को पा लिया है. हीर की तरह यह रहस्यवादी भी अपने प्रियतम रांझा की तलाश में भटकता रहा. प्रियतम एक जोगी के वेश में आया और प्रेमी ख़ुद को प्रियतम की जोगन कहता है. बुल्ले शाह के शब्दों में-
रांझा जोगिण बण आया
वाह सांगी सांग रचाया
रांझा जोगी ते मैं जुगियाणीं
इस दी खातर भरसां पाणीं
ऐवें पिछली उमर विहाणी
इस हुण मैनूं भरमाया...
यानी प्रियतम योगी के रूप में आया है. बहरुपिए ने ब़डा सुंदर नाटक रचाया है. रांझा एक जोगी है और मैं उसकी जोगन. उसके लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. मेरा पिछला जन्म तो बेकार हो गया. उसने मुझे अब मोहित कर लिया है. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में हिंदुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है.
बुल्ले शाह के मुताबिक़ आत्मा ता परमात्मा की ही एक अभिन्न अंग है. परमात्मा प्रत्येक आत्मा में विराजमान है और स्वेच्छा से बोलता है. वह कहते हैं-
नाल महबूब सिरे दी बाज़ी
जिस ने कुल तबक लै साजी
मन मेरे विच जोत बिराजी
आपे ज़ाहिर हाल बताया...
यानी अपने महबूब के लिए अपने सिर की बाज़ी लगा दी है, जिसने सारी कायनात को बनाया है. मेरे दिल में वह रूहानी रौशनी मौजूद है, जो जिस्म के ज़रिये खुद को दर्शाती है. यह रूहानी रौशनी खुदा के इश्क़ से वाबस्ता है. लेकिन इसकी अपनी कोई ख्वाहिश नहीं है. यह ख़ुदा के हुक्म से ही अपने अलग-अलग रूपों में रहती है. ख़ुदा के हुक्म से ही मिट्टी की देह के रूप में नाचती है. वह कहते हैं-
मैं मेरी है ना तेरी है
एह अंत ख़ाक दी ढेरी है
एक ढेरी होई खेरी है
ढेरी नु नाच नचाई दा
हुण किस तो आप लुकाई दा...
यानी मैं यानी देह न मेरी है, न तेरी है. इसका अंत तो मिट्टी के ढेर के रूप में होता है, जो इधर-उधर बिखर जाती है. मिट्टी के इस ढेर में जब आत्मा प्रविष्ट होती है तो यह ढेर नाचता है. अब तुम ख़ुद को किससे छुपा रहे हो. बुल्ले शाह दुनिया को भ्रम या मायावी नहीं मानते. ख़ुदा ने ही इस दुनिया को बनाया है. इंसान जन्म लेता है और फिर एक रोज़ मर जाता है. यही इस सृष्टि का नियम है. वह कहते हैं-
मैं सुपना सभ जग वी सुपना
सुपना लोक बिबाणा
ख़ाकी ख़ाक सियों रल जागा
कुझ नहीं ज़ोर घीणांणा...
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भी पनाह मांगती है. कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है. जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो, उसे दोज़ख़ की आग का क्या खौफ़. जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो उससे हुआ है. उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है. उस महबूब से जो सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह तो ख़ुदा के नूर का वह क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है. किसी इंसान से हो या ख़ुदा से. जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है. इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है, जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बुल्ले शाह कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी
वह तो अल्लाह को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता. बुल्ले शाह के जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़, बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वह बुल्ले शाह कहलाए. वह जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिद्ध क़िस्सा हीर-रांझा के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की. बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के मुरीद थे. इश्क़े-हक़ीक़ी के बारे में बुल्ले शाह कहते हैं-
इश्क़े-हक़ीक़ी ने मुथ्थी कु़डे
मैनूं दस्सो पिया दा देसा
कियो इश्क़ असां ते आया है
तूं आया है मैं पाया है...
यानी प्रेम के देवता ने मेरा मन चुरा लिया है. मुझे बताओ कि पिया का देश कहां है. इश्क़ मेरे पास क्यों आया है. ओ इश्क़, तू आया है और मैंने तुझे महसूस किया है.
अल्लाह का पहला वर्ण (अरबी, फ़ारसी, उर्दू) है अलिफ़ का आकार 1 के समान होता है. यह परमात्मा की अद्वैतता को इंगित करता है. चूंकि बुल्ले शाह अल्लाह से अलग नहीं होना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा है-
इक्को अलिफ़ पढ़ो छुटकारा आये
यानी मुक्ति के लिए सिर्फ़ अलिफ़ पढ़ना ही काफ़ी है.
इश्क़ में वियोग भी होता है. वियोग में ही प्रेमी गिले-शिकवे करता है. यहां तक कि वह अपने प्रियतम को संगदिल और बेरहम भी कह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
कीह बेदर्दां संग यारी
रोवन अखियां ज़ारो ज़ारी
सानूं गए बेदर्दी छडके
हिजरे संग सीने विच ग़ड के
जिस्मो जिंद नू लै गए क़ढ के
इह गल कर गए हैंसयारी...
यानी बेदर्दी के साथ इश्क़ का क्या कहना. मेरी आंखें तो अविरल आंसू बहाती हैं. वह बेरहम महबूब मेरे सीने में वियोग रूपी कटार घोंपकर, मेरी जान निकालकर ले गया. उसने यह सब ब़डी बेरहमी के साथ किया. प्रेमी को दुनिया की कोई परवाह नहीं होती. वह हर तरह की निंदा सहन कर लेता है. ईश्वर वियोग में उसे तकली़फ महसूस होती है. बुल्ले शाह कहते हैं-
बिरहों आ व़डया विच वेह़डे
ज़ोरों ज़ोर देवे तन घेरे
दारू दर्द नां बझो तेरे
मैं सजनां बाझ मारीनी हां
मित्तर पियारे कारन नी
मैं लोक पियारे कारन नी
मैं लोक अलाहमे लैनी हां...
यानी विरह ने मेरे आंगन में आकर मुझे अपने प्रकोप से बेहोश कर दिया. इसके अलावा तकली़फ दूर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मैं तो प्रियतम के बिना मर रही हूं. मैं अपने प्रिय के लिए लोगों के उलाहने सुन रही हूं. कभी-कभी प्रेमी प्रियतम के उन गहन प्रेम सपनों को देखता है, जिसमें प्रियतम पलभर के लिए दर्शन देकर ओझल हो जाता है. उस व़क्त प्रेमी पी़डा से कराह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
देखो नीं पियारा मैनूं सुफने में छल गया
प्रेमी की ज़िंदगी में एक व़क्त ऐसा भी आता है, जब वह वियोग की रात गुज़र जाती है और फिर मिलन की सुबह आती है. उस व़क्त प्रेमी खुशी से नाच उठता है. वह दूसरों से मुबारकबाद लेना चाहता है. बुल्ले शाह कहते हैं- आओ सैयो रल दियो वधाई
मैं वर पाया रांझा माही...
यानी आओ दोस्तों, सब मिलकर मुझे मुबारकबाद दो. मैंने अपने महबूब यानी अपने खुदा को पा लिया है. हीर की तरह यह रहस्यवादी भी अपने प्रियतम रांझा की तलाश में भटकता रहा. प्रियतम एक जोगी के वेश में आया और प्रेमी ख़ुद को प्रियतम की जोगन कहता है. बुल्ले शाह के शब्दों में-
रांझा जोगिण बण आया
वाह सांगी सांग रचाया
रांझा जोगी ते मैं जुगियाणीं
इस दी खातर भरसां पाणीं
ऐवें पिछली उमर विहाणी
इस हुण मैनूं भरमाया...
यानी प्रियतम योगी के रूप में आया है. बहरुपिए ने ब़डा सुंदर नाटक रचाया है. रांझा एक जोगी है और मैं उसकी जोगन. उसके लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. मेरा पिछला जन्म तो बेकार हो गया. उसने मुझे अब मोहित कर लिया है. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में हिंदुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है.
बुल्ले शाह के मुताबिक़ आत्मा ता परमात्मा की ही एक अभिन्न अंग है. परमात्मा प्रत्येक आत्मा में विराजमान है और स्वेच्छा से बोलता है. वह कहते हैं-
नाल महबूब सिरे दी बाज़ी
जिस ने कुल तबक लै साजी
मन मेरे विच जोत बिराजी
आपे ज़ाहिर हाल बताया...
यानी अपने महबूब के लिए अपने सिर की बाज़ी लगा दी है, जिसने सारी कायनात को बनाया है. मेरे दिल में वह रूहानी रौशनी मौजूद है, जो जिस्म के ज़रिये खुद को दर्शाती है. यह रूहानी रौशनी खुदा के इश्क़ से वाबस्ता है. लेकिन इसकी अपनी कोई ख्वाहिश नहीं है. यह ख़ुदा के हुक्म से ही अपने अलग-अलग रूपों में रहती है. ख़ुदा के हुक्म से ही मिट्टी की देह के रूप में नाचती है. वह कहते हैं-
मैं मेरी है ना तेरी है
एह अंत ख़ाक दी ढेरी है
एक ढेरी होई खेरी है
ढेरी नु नाच नचाई दा
हुण किस तो आप लुकाई दा...
यानी मैं यानी देह न मेरी है, न तेरी है. इसका अंत तो मिट्टी के ढेर के रूप में होता है, जो इधर-उधर बिखर जाती है. मिट्टी के इस ढेर में जब आत्मा प्रविष्ट होती है तो यह ढेर नाचता है. अब तुम ख़ुद को किससे छुपा रहे हो. बुल्ले शाह दुनिया को भ्रम या मायावी नहीं मानते. ख़ुदा ने ही इस दुनिया को बनाया है. इंसान जन्म लेता है और फिर एक रोज़ मर जाता है. यही इस सृष्टि का नियम है. वह कहते हैं-
मैं सुपना सभ जग वी सुपना
सुपना लोक बिबाणा
ख़ाकी ख़ाक सियों रल जागा
कुझ नहीं ज़ोर घीणांणा...
यानी मैं एक सपना हूं और पूरी दुनिया भी एक सपना है. सब इंसान भी एक सपना ही हैं. जो मिट्टी में जन्म लेगा, वह एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा. यह सब बिना किसी ज़ोर के ख़ुद-ब-ख़ुद ही हो जाएगा.
भले ही बुल्ले शाह की धरती अब पाकिस्तान हो, लेकिन हिंदुस्तान में भी उन्हें उतना ही माना जाता है, जितना पाकिस्तान में. उनका कलाम, उनका संदेश तो पूरी दुनिया के लिए है. दरअसल, बुल्ले शाह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के महान सूफ़ी कवि होने के साथ इन दोनों मुल्कों की सांझी विरासत के भी प्रतीक हैं. बुल्ले शाह के बारे में कहा जाता है कि मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह.
वे कहते हैं-
पढ़-पढ़ इल्म किताबां वाला नाम रखायो काज़ी
मक्के जाके हज पढ़ आया नाम रखायो हाजी
फड़ तलवार मुजाहिद वाली नाम रखायो ग़ाज़ी
बुल्ले शाह ने कुछ नहीं कीता, यार नु कीता राज़ी
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा की गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है. होली के दिन 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश क्र फ़र्रूख़ाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है. वह कवयित्री होने के साथ एक विशिष्ट गद्यकार भी थीं. उनके काव्य संग्रहों में नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत, दीपशिखा, यामा और सप्तपर्णा शामिल हैं. गद्य में अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी और मेरा परिवार उल्लेखनीय है. उनके विविध संकलनों में स्मारिका, स्मृति चित्र, संभाषण, संचयन, दृष्टिबोध और निबंध में श्रृंखला की कड़ियां, विवेचनात्मक गद्य, साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध शामिल हैं. उनके पुनर्मुद्रित संकलन में यामा, दीपगीत, नीलाम्बरा और आत्मिका शामिल हैं. गिल्लू उनका कहानी संग्रह है. उन्होंने बाल कविताएं भी लिखीं. उनकी बाल कविताओं के दो संकलन भी प्रकाशित हुए, जिनमें ठाकुर जी भोले हैं और आज ख़रीदेंगे हम ज्वाला शामिल हैं.
ग़ौरतलब है कि महादेवी वर्मा ने सात साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. उनके काव्य का मूल स्वर दुख और पीड़ा है, क्योंकि उन्हें सुख के मुक़ाबले दुख ज़्यादा प्रिय रहा. ख़ास बात यह है कि उनकी रचनाओं में विषाद का वह भाव नहीं है, जो व्यक्ति को कुंठित कर देता है, बल्कि संयम और त्याग की प्रबल भावना है.
मैं नीर भरी दु:ख की बदली
प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा की गिनती हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है. होली के दिन 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश क्र फ़र्रूख़ाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है. वह कवयित्री होने के साथ एक विशिष्ट गद्यकार भी थीं. उनके काव्य संग्रहों में नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत, दीपशिखा, यामा और सप्तपर्णा शामिल हैं. गद्य में अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी और मेरा परिवार उल्लेखनीय है. उनके विविध संकलनों में स्मारिका, स्मृति चित्र, संभाषण, संचयन, दृष्टिबोध और निबंध में श्रृंखला की कड़ियां, विवेचनात्मक गद्य, साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध शामिल हैं. उनके पुनर्मुद्रित संकलन में यामा, दीपगीत, नीलाम्बरा और आत्मिका शामिल हैं. गिल्लू उनका कहानी संग्रह है. उन्होंने बाल कविताएं भी लिखीं. उनकी बाल कविताओं के दो संकलन भी प्रकाशित हुए, जिनमें ठाकुर जी भोले हैं और आज ख़रीदेंगे हम ज्वाला शामिल हैं.
ग़ौरतलब है कि महादेवी वर्मा ने सात साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. उनके काव्य का मूल स्वर दुख और पीड़ा है, क्योंकि उन्हें सुख के मुक़ाबले दुख ज़्यादा प्रिय रहा. ख़ास बात यह है कि उनकी रचनाओं में विषाद का वह भाव नहीं है, जो व्यक्ति को कुंठित कर देता है, बल्कि संयम और त्याग की प्रबल भावना है.
मैं नीर भरी दु:ख की बदली
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा
क्रंदन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक-से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली
मेरा पग-पग संगीत-भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रँग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिंता का भार, बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली
पथ को न मलिन करता आना
पद-चिह्न न दे जाता जाना
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
मैं नीर भरी दु:ख की बदली
उन्होंने ख़ुद लिखा है, मां से पूजा और आरती के समय सुने सुर, तुलसी तथा मीरा आदि के गीत मुझे गीत रचना की प्रेरणा देते थे. मां से सुनी एक करुण कथा को मैंने प्राय: सौ छंदों में लिपिबद्ध किया था. पड़ोस की एक विधवा वधु के जीवन से प्रभावित होकर मैंने विधवा, अबला शीर्षकों से शब्द चित्र लिखे थे, जो उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. व्यक्तिगत दुख समष्टिगत गंभीर वेदना का रूप ग्रहण करने लगा. करुणा बाहुल होने के कारण बौद्ध साहित्य भी मुझे प्रिय रहा है.
उनकी रचनाएं मन को सहज ही छू जाती हैं. बानगी देखें-
झिलमिलाती रात मेरी
साँझ के अंतिम सुनहले
हास-सी चुपचाप आकर
मूक चितवन की विभा—
तेरी अचानक छू गई भर
बन गई दीपावली तब आँसुओं की पाँत मेरी
अश्रु घन के बन रहे स्मित—
सुप्त वसुधा के अधर पर
कंज में साकार होते
वीचियों के स्वप्न सुंदर
मुस्कुरा दी दामिनी में साँवली बरसात मेरी
क्यों इसे अंबर न निज
सूने हृदय में आज भर ले
क्यों न यह जड़ में पुलक का
प्राण का संचार कर ले
है तुम्हारी श्वास के मधु-भार-मंथर वात मेरी
उन्होंने 1955 में इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की. उन्होंने पंडित इला चंद्र जोशी की मदद से संस्था के मुखपत्र साहित्यकार के संपादक का पद संभाला. देश की आज़ादी क बाद 1952 में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं. 1956 में भारत सरकार ने उनकी साहित्यिक सेवा के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया. 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि दी. इससे पहले उन्हें नीरजा के 1934 में सक्सेरिया पुरस्कार और 1942 में स्मृति की रेखाओं के लिए द्विवेदी पदक प्रदान किया गया. 1943 में उन्हें मंगला प्रसाद पुरस्कार और उत्तर प्रदेश के भारत भारती पुरस्कार से भी नवाज़ा गया. यामा नामक काव्य संकलन के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप भी प्रदान की गई.
उन्होंने एक आम विवाहिता का जीवन नहीं जिया. 1916 में उनका विवाह बरेली के पास नवाबगंज क़स्बे के निवासी वरुण नारायण वर्मा से हुआ. महादेवी वर्मा को विवाहित जीवन से विरक्ति थी, इसलिए पति से उनका कोई वैमनस्य नहीं था. वह एक संन्यासिनी का जीवन गुज़ारती थीं. उन्होंने पूरी ज़िंदगी सफ़ेद कपड़े पहने. वह तख़्त सोईं. कभी श्रृंगार नहीं किया. 1966 में पति की मौत के बाद वह स्थाई रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं. 11 सितम्बर 1987 को प्रयाग में उनका निधन हुआ. बीसवीं सदी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार रहीं महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य में धुव्र तारे की तरह प्रकाशमान हैं.
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जन्म : 26 मार्च 1907
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जन्म : 26 मार्च 1907
मृत्यु : 11 सितम्बर 1987
प्रख्यात पत्रकार-शायरा फ़िरदौस ख़ान ने पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक और संस्कृति कर्मी, मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी की किताब 'उर्दू पत्रकारिता का भविष्य' की समीक्षा की है.
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
-फ़िरदौस ख़ान
उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी. उस वक़्त लोग एक-दूसरे से बातचीत के ज़रिये अपनी बात अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों तक पहुंचाते थे. बादशाहों के अपने क़ासिद होते थे, जो ख़बरों को दूर-दराज के मुल्कों के बादशाहों तक पहुंचाते थे. गुप्तचर भी बादशाहों के लिए ख़बरें एकत्रित करने का काम करते थे. बादशाहों के शाही फ़रमानों से अवाम में मुनादी के ज़रिये बात पहुंचाई जाती थी. फ़र्क़ बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं. वक़्त गुज़रता गया, इसके साथ ही सूचनाओं का दायरा बढ़ता गया और तरीक़ा बदलता गया. कबूतरों ने भी संदेश या ख़बरें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम किया. आज यही काम अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये किया जा रहा है.
हाल में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी की उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक किताब उर्दू पत्रकारिता का भविष्य प्रकाशित हुई है. इसमें तहसीन मुनव्वर, फ़िरोज़ अशऱफ, डॉ. अख्तर आलम, असद रज़ा, शाहिद सिद्दीक़ी, फ़िरदौस ख़ान, रघु ठाकुर, एहतेशाम अहमद ख़ान, डॉ. ए अज़ीज़ अंकुर, डॉ. मरज़िया आरिफ़, डॉ. हिसामुद्दीन फ़ारूक़ी, डॉ. आरिफ़ अज़ीज़, डॉ. राजेश रैना, शारिक नूर, इशरत सग़ीर, एज़ाज़ुर रहमान, संजय कुमार, डॉ. माजिद हुसैन, आऱिफ ख़ान मंसूरी, डॉ. जीए क़ादरी, मासूम मुरादाबादी और धनंजय चोपड़ा आदि के उर्दू की हालत को बयां करते कई लेख शामिल हैं. उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करना, वाक़ई उर्दू की लोकप्रियता को दर्शाता है.
किताब के संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि इस किताब के बहाने हमने एक छोटी शुरुआत की है, इस भरोसे के साथ कि उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी ज़रूर. वह कहते हैं कि आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का ख़तरा मंडरा रहा है. कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाज़ार की ताक़तों को चुभ रहा है. उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेज़ी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं. अपनी मातृभाषा को भूलकर अंग्रेज़ी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं, जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं. अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ़ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है. उसे ग़ालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी की बजाय पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है. जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताक़त से बचाया जा सकता है. अपनी भाषाओं, ज़मीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है. उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है. उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाज़ारवाद के ख़िलाफ़, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के ख़िलाफ़ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है. यह प्रतिरोध हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का है, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगी.
उर्दू के भविष्य को लेकर जहां कुछ लोग फ़िक्रमंद नज़र आते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और शायर तहसीन मुनव्वर कहते हैं कि फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की ज़रूरत है. इसलिए यही कहा जा सकता है कि उर्दू पत्रकारिता का भविष्य रौशन है, मगर सवाल इस बात का है कि जिनके हाथ में यह भविष्य है, वह रौशन ज़ेहन और रौशन क़लम और क़लम के धनी हैं कि नहीं? इसी तरह आकाशवाणी केंद्र भोपाल में संवाददाता शारिक नूर कहते हैं कि यदि उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफ़ी हद तक दूर है. केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं. उर्दू अख़बारों की बेवसाइट्स और ई-संस्करण हैं. हिंदी के कुछ अख़बार भी उर्दू भाषियों को आकर्षित करने के लिए उर्दू पन्ने प्रकाशित कर रहे हैं. भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक हिंदी अख़बार उर्दू अदब नाम से हिंदी का पन्ना प्रकाशित करता है, तो एक अन्य मीडिया समूह रविवार के दिन फ़ारसी लिपि में ही उर्दू का एक पृष्ठ दे रहा है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल साज़गार है.
हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्जवल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए. मौजूदा दौर में उर्दू अख़बारों के सामने कई मुश्किलें हैं. इस मुल्क में उर्दू के हज़ारों अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को साल में गिने-चुने दिनों में ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतों ने अख़बारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं.
उर्दू मूल रूप से तुर्की भाषा का शब्द है. इसका मतलब है-शाही शिविर या ख़ेमा. तुर्कों के साथ यह शब्द भी हिंदुस्तान आया. उर्दू भारतीय संघ की 18 भाषाओं में से एक है. उर्दू के लिए फ़ारसी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी हैं, जिनकी लिपि फ़ारसी न होकर हिंदी है. फ़िलहाल देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए यह शेअर काफ़ी है-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
बहरहाल, यह किताब उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक बेहतर दस्ताव़ेज है. संजय द्विवेदी कहते हैं कि यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संघर्ष का आकलन कर सकें. बेशक, इस बेहतरीन कोशिश के लिए संजय द्विवेदी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.
समीक्ष्य कृति : उर्दू पत्रकारिता का भविष्य
संपादक : संजय द्विवेदी
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
क़ीमत : 295 रुपये
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
-फ़िरदौस ख़ान
उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी. उस वक़्त लोग एक-दूसरे से बातचीत के ज़रिये अपनी बात अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों तक पहुंचाते थे. बादशाहों के अपने क़ासिद होते थे, जो ख़बरों को दूर-दराज के मुल्कों के बादशाहों तक पहुंचाते थे. गुप्तचर भी बादशाहों के लिए ख़बरें एकत्रित करने का काम करते थे. बादशाहों के शाही फ़रमानों से अवाम में मुनादी के ज़रिये बात पहुंचाई जाती थी. फ़र्क़ बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं. वक़्त गुज़रता गया, इसके साथ ही सूचनाओं का दायरा बढ़ता गया और तरीक़ा बदलता गया. कबूतरों ने भी संदेश या ख़बरें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम किया. आज यही काम अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये किया जा रहा है.
हाल में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी की उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक किताब उर्दू पत्रकारिता का भविष्य प्रकाशित हुई है. इसमें तहसीन मुनव्वर, फ़िरोज़ अशऱफ, डॉ. अख्तर आलम, असद रज़ा, शाहिद सिद्दीक़ी, फ़िरदौस ख़ान, रघु ठाकुर, एहतेशाम अहमद ख़ान, डॉ. ए अज़ीज़ अंकुर, डॉ. मरज़िया आरिफ़, डॉ. हिसामुद्दीन फ़ारूक़ी, डॉ. आरिफ़ अज़ीज़, डॉ. राजेश रैना, शारिक नूर, इशरत सग़ीर, एज़ाज़ुर रहमान, संजय कुमार, डॉ. माजिद हुसैन, आऱिफ ख़ान मंसूरी, डॉ. जीए क़ादरी, मासूम मुरादाबादी और धनंजय चोपड़ा आदि के उर्दू की हालत को बयां करते कई लेख शामिल हैं. उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करना, वाक़ई उर्दू की लोकप्रियता को दर्शाता है.
किताब के संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि इस किताब के बहाने हमने एक छोटी शुरुआत की है, इस भरोसे के साथ कि उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी ज़रूर. वह कहते हैं कि आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का ख़तरा मंडरा रहा है. कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाज़ार की ताक़तों को चुभ रहा है. उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेज़ी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं. अपनी मातृभाषा को भूलकर अंग्रेज़ी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं, जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं. अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ़ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है. उसे ग़ालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी की बजाय पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है. जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताक़त से बचाया जा सकता है. अपनी भाषाओं, ज़मीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है. उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है. उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाज़ारवाद के ख़िलाफ़, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के ख़िलाफ़ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है. यह प्रतिरोध हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का है, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगी.
उर्दू के भविष्य को लेकर जहां कुछ लोग फ़िक्रमंद नज़र आते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और शायर तहसीन मुनव्वर कहते हैं कि फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की ज़रूरत है. इसलिए यही कहा जा सकता है कि उर्दू पत्रकारिता का भविष्य रौशन है, मगर सवाल इस बात का है कि जिनके हाथ में यह भविष्य है, वह रौशन ज़ेहन और रौशन क़लम और क़लम के धनी हैं कि नहीं? इसी तरह आकाशवाणी केंद्र भोपाल में संवाददाता शारिक नूर कहते हैं कि यदि उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफ़ी हद तक दूर है. केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं. उर्दू अख़बारों की बेवसाइट्स और ई-संस्करण हैं. हिंदी के कुछ अख़बार भी उर्दू भाषियों को आकर्षित करने के लिए उर्दू पन्ने प्रकाशित कर रहे हैं. भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक हिंदी अख़बार उर्दू अदब नाम से हिंदी का पन्ना प्रकाशित करता है, तो एक अन्य मीडिया समूह रविवार के दिन फ़ारसी लिपि में ही उर्दू का एक पृष्ठ दे रहा है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल साज़गार है.
हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्जवल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए. मौजूदा दौर में उर्दू अख़बारों के सामने कई मुश्किलें हैं. इस मुल्क में उर्दू के हज़ारों अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को साल में गिने-चुने दिनों में ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतों ने अख़बारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं.
उर्दू मूल रूप से तुर्की भाषा का शब्द है. इसका मतलब है-शाही शिविर या ख़ेमा. तुर्कों के साथ यह शब्द भी हिंदुस्तान आया. उर्दू भारतीय संघ की 18 भाषाओं में से एक है. उर्दू के लिए फ़ारसी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी हैं, जिनकी लिपि फ़ारसी न होकर हिंदी है. फ़िलहाल देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए यह शेअर काफ़ी है-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
बहरहाल, यह किताब उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक बेहतर दस्ताव़ेज है. संजय द्विवेदी कहते हैं कि यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संघर्ष का आकलन कर सकें. बेशक, इस बेहतरीन कोशिश के लिए संजय द्विवेदी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.
समीक्ष्य कृति : उर्दू पत्रकारिता का भविष्य
संपादक : संजय द्विवेदी
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
क़ीमत : 295 रुपये
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है. इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए. इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.
गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.
सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है. बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारम्परिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं. उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 100 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अनेक राज्य इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा. स्थानीय जलवायु के अनुकूल इसकी नई क़िस्में तैयार की जा रही हैं.
आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारम्परिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती. सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.
राहुल मिश्रा
उस आदमी की नौकरी यह थी कि वो अंधेरे में बैठा रहे, और सामने रोशनी फेंकता रहे।
हर शाम शहर के सबसे बड़े सिनेमाघर में हजारों लोग उसी रोशनी में चेहरे देखते थे। हंसते थे। रोते थे।
उन चेहरों में एक भी उसका अपना नहीं था।
शो खत्म होने के बाद वो घर लौटता, और तब तक उसके बच्चे सो चुके होते थे।
और फिर एक दिन उसी परदे पर एक चेहरा उभरा, जिसे उसने पालने में देखा था।
वो चेहरा आज सौ साल का हो रहा है।
अब शुरू से शुरू करते हैं
अहिरीटोला। उत्तरी कलकत्ता। 1926 का सितंबर।
एक बच्चा अपने ननिहाल में पैदा हुआ। नाना ने उसका नाम रखा, उत्तम।
उत्तम, यानी सबसे अच्छा।
मां को वो नाम पसंद नहीं आया।
नाम बदलकर अरुण कर दिया गया।
पर उस घर में उस नाम को लेकर एक और बात दर्ज है।
ननिहाल के कुलगुरु उस बच्चे को देखने आए। उन्होंने उसकी हंसी देखी।
और कहा कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में इसी नाम से पहचाना जाएगा उत्तम।
उस दिन उस कमरे में जो लोग बैठे थे, उनमें से किसी ने इस बात को गंभीरता से लिया होगा, यह मानना मुश्किल है।
क्योंकि आगे जो हुआ, वो इसका ठीक उल्टा था।
उसकी जिंदगी में सबसे ज्यादा बार जो चीज बदली, वो कोई फिल्म नहीं थी।
उसका नाम था।
वो नाम अभी चार बार और बदलेगा, चार बार पिटेगा, और एक भोर में पूरा बंगाल उसे ठुकरा भी देगा।
पिता का नाम सतकड़ि चट्टोपाध्याय। जड़ें हुगली में। पेशा एक ही, और पूरी उम्र वही रहा।
वो चौरंगी के मेट्रो सिनेमा में प्रोजेक्शनिस्ट थे। वही मेट्रो, जहां तब तक एक भी बंगाली फिल्म नहीं दिखाई गई थी।
मां चपला देवी। दो छोटे भाई, बरुण और तरुण। घर भवानीपुर में, गिरीश मुखर्जी रोड पर। बड़ा परिवार, छोटी कमाई।
पर उस घर में एक चीज थी, जो पैसे से नहीं आती।
पिता और चाचा ने मिलकर मोहल्ले का एक नाटक दल बनाया था। नाम, सुहृद समाज। रिहर्सल क्लबघर में होती, और मंचन गली में।
मां-बाप सख्त थे। शाम को किताब खुलनी चाहिए थी।
तो बच्चा चुपके से निकलकर क्लबघर की खिड़की पर खड़ा हो जाता।
कभी दरवाजे पर कान लगा देता, संवाद सुनता, और घर आकर अकेले दोहराता। डर लगा रहता था कि पकड़ा जाएगा हालांकि उसने खुद बताया है कि जिंदगी में उसके मां-बाप ने उसे कभी नहीं मारा।
बचपन के ये दृश्य कहीं बाहर से नहीं आए हैं।
आखिरी बरसों में उसने अपनी आत्मकथा लिखवाई थी। नाम, आमार आमि। यह सब उसी में दर्ज है, उसी की जबान से।
उस किताब का क्या हुआ, यह इस कहानी के आखिर में आएगा।
एक दिन वो पकड़ा गया।
पकड़ने वाली उसकी बड़ी बहन थी। पुतुल।
उसने घर में शिकायत नहीं की।
उल्टे उससे कहा कि जो देखकर आए हो, वो करके दिखाओ।
बच्चे ने उसके सामने एक दृश्य निभाया।
बहन हंस पड़ी। और फिर उसने वो बात कही, जो उस बच्चे की जिंदगी की पहली अभिनय-सलाह थी।
उसने कहा कि एक ही जगह खड़े मत रहो। थोड़ा घूमो-फिरो।
कुछ ही अरसे बाद वो स्कूल से लौटा और बहन को आवाज लगाई।
बहन नहीं आई। मां आई, चेहरा उतरा हुआ।
टाइफाइड।
एक दिन के बुखार में वो पीली पड़ चुकी थी।
उसने भाई को कमरे में बुलाया, और कहा कि तुम जात्रा सीखो, उसमें बहुत मजा आएगा।
वो ठीक नहीं हुई।
आगे चलकर, जिंदगी के अकेले पलों में, खुले आसमान की तरफ देखते हुए उसे बहन की वही आखिरी बात सुनाई देती रही।
जिस आदमी को देखने के लिए एक दिन पूरा बंगाल सड़कों पर टूट पड़ेगा, उसका पहला दर्शक जा चुका था।
और यह याद रखिएगा कि उसे अभिनय की पहली सलाह किसी निर्देशक ने नहीं दी थी। एक बहन ने दी थी, जो उसे बचाने के लिए झूठ बोल चुकी थी।
स्कूल चकरबेड़िया में था, घर से पैदल की दूरी पर।
बहुत छोटी उम्र में हेडमास्टर क्लास में आए और पूछा कि नाटक में कौन काम करेगा।
पूरी क्लास चुप।
एक लड़का खड़ा हुआ, और छाती धड़कते हुए बोला कि वो कर लेगा।
उसे गयासुर के बचपन वाला हिस्सा मिला।
नाटक के बीच में बांस का बना मंच टूटकर गिर गया, क्योंकि बड़े गयासुर वाला लड़का ऊपर बहुत उछल रहा था। मंच दोबारा जोड़ा गया, और नाटक पूरा हुआ।
उस दिन उसे मेडल मिला। वो उसे लेकर घर तक दौड़ता आया।
फिर मोहल्ले के लड़कों ने अपना दल बनाया, लूनार क्लब।
मंच के परदे के लिए घर-घर से साड़ियां और चादरें मांगी गईं, और उन्हें सेफ्टी पिन से जोड़ा गया। मुकुट चांदी के कागज से बने, और मेकअप पाउडर से हुआ।
उसी इंतजाम में उन्होंने अपना पहला नाटक खेला रवींद्रनाथ का मुकुट।
नाटक इतना चला कि पड़ोस के एक घर ने रिहर्सल के लिए अपना कमरा दे दिया।
और अब उस क्लब की एक ऐसी बात, जो हिंदी में लगभग कहीं नहीं लिखी गई।
1943 में उन लड़कों ने बंकिमचंद्र के आनंदमठ का एक विशेष मंचन किया।
उससे सत्रह सौ रुपये जुटे। पूरे के पूरे आजाद हिंद फौज के कोष में भेज दिए गए।
सत्रह बरस का एक लड़का, जिसका अपना घर मुश्किल से चल रहा था, नेताजी की फौज के लिए चंदा जुटा रहा था।
पढ़ाई साउथ सबर्बन स्कूल से होते हुए कॉमर्स कॉलेज तक पहुंची।
पर वहां रुक गई।
बरसों बाद उसने खुद कहा कि हालात ऐसे थे कि पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और नौकरी पकड़नी पड़ी।
नौकरी वो थी, जो उस दौर के कलकत्ता में सबसे सुरक्षित मानी जाती थी।
खिदिरपुर। पोर्ट कमिश्नर्स का दफ्तर। कैश विभाग। एक क्लर्क की कुर्सी।
महीने के दो सौ पचहत्तर रुपये। उसी बातचीत में उसने यह भी कहा कि उस वक्त अभिनय उसके लिए करियर नहीं था, सिर्फ शौक था। दफ्तर में भी एक क्लब था जो नाटक करता था, और वो उसमें भी खेलता था।
दिन में हिसाब। शाम को मंच।
और इसी बीच उसने अपने ऊपर वो मेहनत शुरू की, जो आज के किसी भी नौजवान को पढ़नी चाहिए।
आवाज साधने के लिए उसने निधानबंधु बनर्जी से शास्त्रीय संगीत सीखा।
तैराकी में वो जॉनी वाइजमुलर का दीवाना था वही तैराक, जो परदे पर टार्जन बना था। और भवानीपुर स्विमिंग एसोसिएशन में सौ गज की फ्रीस्टाइल का चैंपियन वो लगातार तीन साल रहा।
लाठी खेला सीखा। कुश्ती लड़ी। योग किया।
फुटबॉल में वो राइट-बैक खेलता था, और आखिरी सांस तक मोहन बागान का समर्थक रहा
पर एक चीज थी, जो इस पूरी मेहनत के बावजूद उसके साथ अटकी रही।
उसका उच्चारण।
उसके साथ काम करने वाली दो बड़ी अभिनेत्रियों ने बाद में साफ कहा है कि शुरुआती दिनों में उसका उच्चारण साफ नहीं था।
और उसने उस कमी पर जो काम किया, वो अजीब था।
उसने गीता और चंडीपाठ का अभ्यास शुरू किया।
यह वाक्य अभी बिल्कुल मामूली लग रहा है।
तीस बरस बाद यही अभ्यास उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा घाव बनने वाला था।
अब उस लड़की की बात, जिसके बिना यह कहानी वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन उसने अपने ही घर से एक लड़की को निकलते देखा, चचेरी बहन अन्नपूर्णा के साथ।
पूछने पर नाम मिला। गौरी रानी गांगुली।
उसके बाद वो शाम को क्लब की रिहर्सल छोड़ने लगा, और घर के आसपास मंडराने लगा, इस उम्मीद में कि वो लड़की फिर आएगी।
वो नहीं आई।
कई हफ्ते बाद वो आई।
लड़के ने हारमोनियम उठाया और गाना शुरू कर दिया।
उसे पक्का यकीन था कि उसकी आवाज सुनकर वो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ जाएगी, और वो हारमोनियम से नजर उठाएगा तो वो दरवाजे पर खड़ी होगी।
वो गाता रहा। कोई नहीं आया।
आखिर में अन्नपूर्णा ऊपर आई, और अपने साथ उसका संदेश लेकर आई।
संदेश यह था कि तुम बहुत अच्छा गाते हो, और वो तुम्हें ठीक से जानना चाहती है।
फिर वो फिर गायब हो गई।
एक दिन बेचैनी में वो घूमते-घूमते गंगा किनारे जा बैठा। और वहीं से सीधे उसके स्कूल पहुंच गया।
साथ में उनके घर का चौकीदार खड़ा था। लड़की ने सिर्फ आंख से इशारा किया, कि छुट्टी के वक्त आना।
वो आया।
और उसने वो सवाल पूछा, जो उस उम्र में कोई नहीं पूछता।
उसने कहा कि वो फिल्मों में जाना चाहता है। क्या तुम्हें मंजूर है?
उसने कहा कि अगर तुम हीरो बन गए, तो उससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी।
उसने यह सवाल इसलिए पूछा था, क्योंकि उसे अपनी पहली भूमिका मिल चुकी थी।
1947। एक हिंदी फिल्म। भरतलक्ष्मी स्टूडियो में पांच दिन का काम, वो भी एक्स्ट्रा के तौर पर।
किरदार यह था कि वो दूल्हा बनेगा, जिसे मंडप पर पीटा जाता है। और वो फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हुई।
अगले साल एक बंगाली फिल्म आई। निर्देशक नितिन बोस। कहानी रवींद्रनाथ की।
उसमें उसने असित बरन के बचपन वाला हिस्सा निभाया।
फिल्म का विज्ञापन अखबार में छपा।
वो उसमें अपना नाम ढूंढ रहा था।
नाम नहीं था।
भूमिका छोटी थी और वो अनजान था, इसलिए परदे पर चलने वाली नामावली में भी उसका नाम नहीं गया।
पहली रिलीज हुई फिल्म। और उसमें उसका कोई नाम ही नहीं था।
पर एक इंसान ने उसे उस भीड़ में पहचान लिया।
गौरी अपनी दादी के साथ वो फिल्म देखने गई थी। दादी ने मजाक में पूछा कि परदे पर कौन सा अभिनेता अच्छा लगा।
गौरी ने उसकी तरफ इशारा कर दिया।
और दादी को समझ आ गया कि यह मजाक का जवाब नहीं था।
उसी दिन से गौरी का घर से निकलना बंद, और रिश्ता कहीं और तय।
वो चुपके से निकलकर उसके पास पहुंची।
लड़के के पास न कमाई थी, न कोई नाम। फिर भी वो सीधे उसके पिता के पास गया, और हाथ मांग लिया।
पिता संपन्न आदमी थे। पर उन्हें उस लड़के की नीयत पर भरोसा हो गया, और उन्होंने हां कह दी।
1 जून 1948 को शादी हुई।
अब उन नामों की बात, जो एक के बाद एक फेल हुए।
1949 में वो पहली बार हीरो बना। परदे पर नाम गया, उत्तम चटर्जी। फिल्म नहीं चली।
अगली फिल्म में नाम बदलकर अरूप कुमार कर दिया गया। वो भी नहीं चली।
फिर वो लौटकर अरुण हो गया।
और 1951 में दो चीजें एक साथ हुईं, जिन्होंने उसकी जिंदगी बदल दी।
पहली। एक बड़े अभिनेता की नजर उस पर पड़ी।
पहाड़ी सान्याल। उस दौर के जाने-माने कलाकार।
उन्हीं की वजह से उसे न्यू थियेटर्स में मौका मिला।
और उन्हीं ने उसे सलाह दी कि परदे पर वो एक नाम तय कर ले, और वो नाम यही रखे।
दूसरी। उसी साल एक फिल्म बन रही थी, सहयात्री। हीरो असित बरन तय थे, पर वो दूसरी तारीखों में फंस गए और अनुबंध पर दस्तखत नहीं कर सके।
वो भूमिका उस संघर्ष कर रहे लड़के के पास आ गई।
और उसी फिल्म में, जिंदगी में पहली बार, उसका नाम परदे की नामावली में छपा। फिल्म की पुस्तिका के कवर पर उसका चेहरा गया।
इस बार उसने वही नाम चुना, जो जन्म के पहले ही दिन उसकी अपनी मां ने लौटा दिया था।
नाम उत्तम कुमार।
उसी फिल्म में हेमंत मुखर्जी ने पहली बार उसके लिए तीन गाने गाए।
न फिल्म चली, न गाने।
और यहां इस कहानी की सबसे चुप बात आती है।
1947 से 1951 के बीच उसकी जितनी भी फिल्में बनीं, सब पिटीं।
सिनेमा पढ़ाने वाले जो लोग आज उस दौर पर काम करते हैं, वो एक बात दर्ज करते हैं।
उन बरसों की उसकी फिल्में अब मौजूद नहीं हैं। प्रिंट खो चुके हैं।
उसकी नाकामी का कोई सबूत आज दुनिया में नहीं बचा। जो बचा, वो सिर्फ वो है जो उसने उस नाकामी के बाद बनाया।
पर उस वक्त उसे यह कोई नहीं बता सकता था।
उस वक्त स्टूडियो में उसका एक खिताब बन चुका था, जो पीठ पीछे नहीं, मुंह पर बोला जाता था।
फ्लॉप मास्टर जनरल।
और एक दूसरा ताना भी था। लोग उसे देखकर कहते लो, नया दुर्गादास आ गया।
दुर्गादास बनर्जी उस जमाने के बड़े सितारे थे, जो मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक कामयाबी से पहुंचे थे। बड़े घर के, रईस, तराशे हुए आदमी।
यानी वो ताना सिर्फ नाकामी का नहीं था। वो यह याद दिलाने के लिए था कि तुम कहां से आए हो।
वो टूट गया।
उसने तय कर लिया कि सिनेमा छोड़ देगा और पोर्ट की पक्की नौकरी में लौट जाएगा।
उस मोड़ पर उसे गौरी ने रोका।
उन्होंने कहा कि जिस काम में मन नहीं लगता, उसमें लौटने से कुछ नहीं मिलेगा।
जिस आदमी को पूरी इंडस्ट्री नाकाम मान चुकी थी, उसके लिए उस साल की सबसे बड़ी पूंजी यही एक वाक्य था।
1952। निर्देशक निर्मल दे ने उसे बुलाया।
बाकी लोगों को उसमें कुछ नहीं दिखा था। निर्मल दे को दिखा।
फिल्म का नाम था बासु परिबार।
और वो चल गई।
पच्चीस साल की उम्र में, आठ बरस की लगातार पिटाई के बाद, उसे पहली कामयाबी मिली।
उसने उसी साल पोर्ट की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
बरसों बाद उसने कहा कि किरदार को तोड़कर समझना उसने सबसे पहले निर्मल दे से ही सीखा।
और ठीक इसी दौर में उसने वो काम किया, जो उसकी असली मरम्मत थी।
1953 में वो मंच पर लौटा। नाटक का नाम था श्यामली।
वो नाटक लगातार करीब पांच सौ रातें चला।
पांच सौ रातें, हर रात एक ही किरदार, एक ही संवाद, एक जीवित भीड़ के सामने।
जो उच्चारण उसकी सबसे बड़ी कमजोरी था, वो पचास के दशक के मध्य तक पूरी तरह ठीक हो चुका था।
और आगे चलकर उसकी बांग्ला बोलने का ढंग खुद एक मानक बन गया वो नमूना, जिसे सुनकर लोग बोलना सीखते हैं।
1953 में ही शाड़े चुयात्तोर आई। और उसमें एक नई अभिनेत्री उसके सामने खड़ी थी।
सुचित्रा सेन।
वो फिल्म महीनों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी। और उसने एक और काम किया, जिस पर कम ध्यान गया है।
कलकत्ता के पैराडाइस सिनेमा में साल भर ज्यादातर हिंदी फिल्में चलती थीं। वहां दिखाई जाने वाली वो पहली बंगाली फिल्म थी।
अगले साल अग्निपरीक्षा आई, जिसने उसे रोमांटिक हीरो बना दिया।
और वो फिल्म संयोग से उसी दिन रिलीज हुई, जिस दिन उसका जन्मदिन था।
आगे चलकर वो दोनों तीस फिल्मों में साथ आए।
उस जोड़ी के बारे में उसने खुद जो कहा, उसमें एक भी शब्द बनावटी नहीं है।
उसने कहा कि अगर सुचित्रा उसके साथ न होतीं, तो वो उत्तम बन ही नहीं पाता।
पर सिर्फ सुचित्रा के साथ की कहानी अधूरी है।
उसने लगभग उतनी ही फिल्में एक और अभिनेत्री के साथ कीं। सावित्री चटर्जी।
और उनके बारे में एक किस्सा है, जो बताता है कि यह आदमी असल में क्या था।
एक शाम वो अपनी रोज की महफिल में बैठा था। गाना चल रहा था, हंसी-मजाक चल रहा था।
अचानक वो उठ खड़ा हुआ।
लोग हैरान रह गए, क्योंकि उसके जाने का वक्त नहीं हुआ था।
उसने वजह बताई। कल सुबह सावित्री के साथ एक दृश्य है। घर जाकर तैयारी करनी है।
वरना वो पूरा दृश्य उसके हाथ से ले जाएंगी।
बंगाल का सबसे बड़ा सितारा, महफिल छोड़कर घर जा रहा था, क्योंकि उसे अपनी सह-कलाकार से डर लगता था।
उसकी तस्वीरें आज हर जगह हैं। पर एक बात उन तस्वीरों से नहीं दिखती।
वो पारंपरिक अर्थों में सुंदर नहीं था।
लंबा जरूर था, पर नाक चपटी थी, होंठ मोटे थे, और कद-काठी कोई खास नहीं थी।
उसके अपने दौर के कई नौजवान अभिनेता उससे कहीं ज्यादा सुडौल थे।
जो चीज उसके पास थी, उसे परदे की मौजूदगी कहते हैं। और आम तौर पर माना जाता है कि यह चीज या तो होती है, या नहीं होती।
पर उसकी शुरुआती नाकामियां यही साबित करती हैं कि उसके पास वो चीज पैदाइशी नहीं थी।
उसने वो बनाई।
बालों की वो लापरवाह सी लट, होंठों के कोने पर टिकी सिगरेट, वो हल्का सा तनाव, सिर का वो आधा मुड़ना, और आखिर में वो अचानक खुलने वाली मुस्कान यह सब किसी वरदान से नहीं आया था।
यह बरसों की मेहनत का नतीजा था।
उस दौर में एक और नाम था, जिसे बंगाल हमेशा उसी के साथ जोड़कर लेता था।
सौमित्र चटर्जी।
बंगाल ने उन दोनों को हमेशा आमने-सामने खड़ा किया। सौमित्र ने खुद कहा है कि उनका और उत्तम का नाम राज्य की दो संस्थाओं जैसा हो गया था मोहन बागान और ईस्ट बंगाल।
पर वही सौमित्र यह भी कहते रहे कि लोकप्रियता में उत्तम कुमार से आगे कोई नहीं निकल सका। वो खुद पास तक पहुंचे, पर आगे हमेशा वही रहा।
और असल जिंदगी में वो दोनों दुश्मन नहीं थे।
वो अक्सर साथ बैठते थे। शहर के एक पुराने होटल में, देर तक, गिलास सामने रखकर।
जिन दो नामों को पूरा बंगाल आपस में लड़ाता रहा, वो दोनों शाम को एक ही मेज पर होते थे।
अब उस अंधेरे कमरे पर लौटिए, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी।
1957। मेट्रो सिनेमा ने तय किया कि वो पहली बार एक बंगाली फिल्म दिखाएगा।
फिल्म का नाम था चंद्रनाथ। शरतचंद्र के उपन्यास पर बनी। हीरो वही लड़का, हीरोइन सुचित्रा सेन।
और उस शाम प्रोजेक्शन रूम में वही लंबा, दुबला, गंभीर आदमी बैठा था, जो बरसों से उस परदे पर रोशनी फेंकता आया था।
रोशनी उसने फेंकी। और उस रोशनी में जो चेहरा खड़ा हुआ, वो उसका अपना बेटा था।
बाप ने कभी परदे पर अपना नाम नहीं देखा। पर वो परदा रोज उसी ने जिंदा किया था।
अगले ही साल एक और चीज हुई, जो हिंदी के पाठकों के लिए खास है।
उसकी एक बंगाली फिल्म में एक हिंदी गाना रखा गया।
गाने वाले थे मोहम्मद रफी। और उन्होंने उसके लिए एक पैसा नहीं लिया।
किसी बंगाली फिल्म में वो पहला हिंदी गाना था।
और फिर 1959 में उसे वो नाम मिला, जिससे आज पूरा हिंदुस्तान उसे जानता है।
वो नाम किसी सरकार ने नहीं दिया था। किसी पुरस्कार समिति ने नहीं दिया था।
एक बांग्ला पत्रिका ने उसे पहली बार महानायक लिखा।
और वो शब्द चिपक गया।
तीस साल पहले जिस बच्चे की मां ने उसका नाम लौटा दिया था, उसे अब लोग एक नया नाम दे रहे थे।
अब सत्यजित रे इस कहानी में दाखिल होते हैं।
साठ के दशक की शुरुआत में रे ने उसे रवींद्रनाथ के एक उपन्यास पर बनने वाली फिल्म के लिए बुलाया, और खलनायक की भूमिका दी।
उसने मना कर दिया। उसका कहना था कि इस किरदार के साथ कोई और ज्यादा इंसाफ करेगा।
और फिर उसने रे से यह गुजारिश की कि वो फिल्म उसे बनाने दें, अपने बैनर तले।
जो आदमी किरदार के लिए खुद को नाकाफी बता रहा था, वो उसी फिल्म पर अपना पैसा लगाने को तैयार था।
वो फिल्म तब बनी नहीं। पर रे ने वो नाम याद रखा।
1966। नायक।
एक सुपरस्टार, जो पुरस्कार लेने ट्रेन से दिल्ली जा रहा है, और रास्ते में एक नौजवान पत्रकार के सामने अपने डर, अपनी गलतियां और अपना अकेलापन खोलता जाता है।
रे ने खुद लिखा है कि उन्होंने वो भूमिका इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें लगा कि यह अभिनेता उससे आसानी से जुड़ पाएगा।
क्योंकि वो कहानी एक साधारण मध्यवर्गीय नौजवान की थी, जिसे फिल्मों में मौका मिलता है और जो तेजी से ऊपर चढ़ जाता है।
रे ने साफ लिखा कि यह फर्श से अर्श तक की कहानी है, और इसमें उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
इस बात को याद रखिएगा। कहानी के आखिर में खुद उत्तम कुमार इसका ठीक उल्टा कहने वाले हैं।
उस फिल्म में एक दृश्य है जो आज तक दोहराया जाता है। एक पुराना कलाकार नए लड़के को डांटता है कि यह क्या तरीका है, यह हॉलीवुड है क्या, तुम बुदबुदा क्यों रहे हो।
मजा यह है कि असल जिंदगी में उत्तम कुमार की पहचान ही यही थी संवाद को ऊंचा उछालने की जगह उसे दबाकर, ठहराकर बोलना।
रे ने वो असली ताना उठाकर फिल्म में रख दिया था।
और उस फिल्म के लिए उसने जो किया, वो शायद उस दौर का कोई सितारा नहीं करता।
शूटिंग से कुछ समय पहले उसे चेचक हुई थी। चेहरे पर उसके निशान साफ दिख रहे थे।
उसने मेकअप न करने पर हामी भर दी।
बंगाल का सबसे बड़ा हीरो, कैमरे के सामने अपने दाग लेकर खड़ा हो गया।
नायक के प्रीमियर के दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले नहीं देखा था।
भीड़ ने उसकी कमीज नोच ली।
वो फिल्म बर्लिन तक गई और वहां सम्मानित हुई। और उसे देखकर हॉलीवुड की एलिजाबेथ टेलर ने कहा कि वो इस अभिनेता से मिलना चाहती हैं, उसके साथ काम करना चाहती हैं।
1967 इस कहानी का सबसे अजीब साल है। उसमें दो चीजें एक साथ हुईं।
पहली। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तब तक कई बरसों से दिए जा रहे थे, पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी उस साल पहली बार बनी।
वो पुरस्कार पाने वाला देश का पहला अभिनेता यही आदमी था। और एक नहीं, दो फिल्मों के लिए एक साथ।
उसने बंबई में अपनी सबसे बड़ी छलांग लगाने की कोशिश की।
उसने एक हिंदी फिल्म खुद बनाई। रंगीन, महंगी, बड़ी लोकेशन। सामने वैजयंतीमाला।
और वो फिल्म असल में उसी अग्निपरीक्षा का हिंदी रूपांतर थी, जिसने तेरह साल पहले उसे बंगाल का हीरो बनाया था।
जो जादू बंगाल में चला था, वो बंबई में नहीं चला।
फिल्म बुरी तरह पिटी।
जो पैसा उसने बरसों में जोड़ा था, वो उसी में चला गया। और ऊपर से कर्ज।
उसी दौर में, एक शूटिंग के बीच, उसे पहला दिल का दौरा पड़ा।
और यह भी जान लीजिए कि उससे पहले वो बंबई के कई बड़े मौके ठुकरा चुका था जिनमें राज कपूर की संगम भी थी।
अब समझिए कि कर्ज में डूबा हुआ आदमी आगे क्या करता है।
वो सिर्फ अपना कर्ज नहीं उतारता। वो दूसरों के लिए एक संस्था खड़ी करता है।
साठ के दशक के आखिर में उसने कलाकारों की पुरानी संस्था छोड़ी, और अपनी खुद की बनाई। शिल्पी संसद। फिल्म इंडस्ट्री के गरीब कर्मचारियों और छोटे कलाकारों के लिए।
वो उसका आजीवन अध्यक्ष रहा।
शो करके पैसा जुटाया जाता था, पर उतना जमा नहीं होता था।
तो उसने तय किया कि संस्था के लिए एक पूरी फिल्म बनाएगा, और उसकी सारी कमाई वहीं जाएगी।
1973। बोन पलाशिर पदाबली।
निर्देशन उसने किया, पटकथा उसने लिखी, और पार्श्व संगीत भी उसी ने दिया।
बड़े से बड़ा कलाकार बिना पैसे लिए काम करने आया। खुद उसने भी एक पैसा नहीं लिया।
और वो फिल्म खूब चली।
यह कोई एक बार का काम नहीं था।
साठ के दशक में जब तकनीशियनों का वितरकों से झगड़ा हुआ, तो वो तकनीशियनों के साथ खड़ा हो गया।
और अपनी ही फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ धरने पर बैठ गया।
उसकी मौत के बाद इंडस्ट्री के एक निर्देशक ने जो कहा, उससे पूरी बात एक लाइन में खुल जाती है।
उन्होंने कहा कि संस्थाओं ने, फिल्मी विद्वानों ने और बौद्धिक तबके के एक हिस्से ने उसे लगातार नजरअंदाज किया।
पर स्टूडियो के मजदूरों, तकनीशियनों और दिहाड़ी वालों ने उसे बेशर्त प्यार दिया।
और यह भी जान लीजिए कि वो दौर उसके लिए आसान नहीं था।
सत्तर का दशक बंगाल में नौजवानों के गुस्से का दशक था। पढ़े-लिखे लड़के सड़कों पर थे, और पुरानी हर चीज सवालों के घेरे में आ गई थी।
उस गुस्से से वो भी नहीं बचा। स्टूडियो की दीवारों पर उसके खिलाफ लिखा गया, और कई बार सामने भी सुनना पड़ा।
उसी दौर में उसने ऐसी फिल्में करनी शुरू कीं, जिनमें वो हीरो नहीं, दादा था।
एक फिल्म में वो ऐसा बड़ा भाई है, जिसे कभी मोहल्ले के लड़के पूजते थे, और अब वही लड़के उसे नीचा दिखाते हैं। उसका कारोबार डूब चुका है, और उसकी बात का कोई वजन नहीं बचा।
परदे पर वो अपने ही दौर का दृश्य निभा रहा था।
सत्तर के दशक के मध्य में शक्ति सामंत उसे एक ऐसी फिल्म में ले आए, जो एक साथ बंगाली और हिंदी दोनों में बनी। नाम, अमानुष। सामने शर्मिला टैगोर।
उस फिल्म में उसका किरदार एक टूटा हुआ, शराब में डूबा हुआ, पर भीतर से खरा आदमी था।
और उस फिल्म का एक गाना आज भी हिंदुस्तान के हर कोने में बजता है।
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा।
उसी गाने पर किशोर कुमार को फिल्मफेयर मिला।
पचास के करीब पहुंच चुके, कर्ज में डूबे एक आदमी ने बंबई से आखिरकार वो चीज ले ली, जो कुछ बरस पहले उसके हाथ से फिसल गई थी।
और 1975 उसके करियर का सबसे अजीब साल है।
उस साल उसकी छह फिल्में आईं।
छहों चलीं।
एक हास्य फिल्म, एक ऐसे डॉक्टर की कहानी जो जिंदगी भर झुका नहीं, एक राजा जो साधु बनकर लौटता है, और एक ऐसा किरदार जिसमें वो सिरे से खलनायक था।
उस आखिरी फिल्म के लिए उसे मना किया गया था, कि दर्शक तुम्हें इस रूप में कभी नहीं देखना चाहेंगे।
उसने वो फिल्म फिर भी की।
1979 में, उसने एक और काम किया जिसका जिक्र कम होता है।
पिछले साल बंगाल में भीषण बाढ़ आई थी।
राहत के पैसे जुटाने के लिए उसने एक चैरिटी क्रिकेट मैच कराया। एक तरफ बंगाली फिल्म इंडस्ट्री, दूसरी तरफ बंबई की फिल्म इंडस्ट्री।
बंगाल की टीम की कप्तानी उसने खुद की।
और बंबई की टीम की कप्तानी की दिलीप कुमार ने।
और अब वो हिस्सा, जिसे इस कहानी से निकाल देना बेईमानी होगी।
1948 में जिस लड़की के लिए वो बिना कमाई और बिना नाम के उसके पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया था, उसी गौरी के साथ उसका घर आगे चलकर वैसा नहीं रहा।
1963 में पर्दे के बाहर उसकी जिंदगी में सुप्रिया देवी आईं। वही अभिनेत्री, जो 1952 की उसी पहली कामयाब फिल्म में उसके साथ परदे पर थीं, जिसने उसे फ्लॉप मास्टर जनरल से उत्तम कुमार बनाया था।
उसके बाद उसकी जिंदगी दो घरों में बंट गई।
उसने गौरी से कानूनी अलगाव कभी नहीं लिया।
इस पर बंगाल में बरसों बहस हुई, और आज भी होती है। मैं उस बहस में नहीं पड़ूंगा। यह पन्ना किसी के निजी फैसलों पर अदालत लगाने के लिए नहीं है, और तीनों में से कोई आज सफाई देने के लिए मौजूद नहीं है।
पर एक बात दर्ज करना जरूरी है, क्योंकि वो उसी ने दर्ज की है।
आमार आमि का पहला मसौदा जब सुप्रिया देवी ने पढ़ा, तो उन्हें लगा कि उसमें उनकी जगह बहुत कम है।
उसने किताब में एक हिस्सा और जोड़ा।
यानी जो आदमी जिंदगी भर लोगों की उम्मीदों के हिसाब से जिया, वो अपनी आत्मकथा भी पूरी तरह अकेले नहीं लिख पाया।
1967 में उसने एक बच्ची को कानूनी तौर पर गोद भी लिया था।
और उसके जाने के बाद उसके दोनों घर कभी एक जगह नहीं आ पाए।
अब उस आदमी की अपनी जबान से सुनिए, क्योंकि वो मौका बहुत कम मिला है।
20 जुलाई 1980 को उसने एक लंबी बातचीत दी। वो इंटरव्यू लगभग नहीं देता था, और उस पत्रकार को डेढ़ साल से टाल रहा था।
वो उसकी आखिरी प्रकाशित बातचीत निकली।
उससे पूछा गया कि इतनी बड़ी लोकप्रियता कैसी लगती है।
उसने कहा कि अच्छी लगती है। पर जब वो हद पार कर जाती है तो मुसीबत बन जाती है। लोग छूते नहीं, चिकोटी काटते हैं, कपड़े फाड़ देते हैं, कभी गाड़ी का शीशा तोड़ देते हैं।
उसने उसे एक ही शब्द दिया। घुटन।
फिर उससे पूछा गया कि क्या यह छवि उसके अभिनय को भी बांधती है।
उसने कहा, हां।
उसने कहा कि वो किसी किरदार को अपने ढंग से नहीं कर पाता, अगर वो उत्तम कुमार की बनी-बनाई छवि से टकराता हो।
उसने यह भी कहा कि वो कभी एक शातिर, सचमुच का खलनायक करना चाहता है। पर उसे मालूम है कि लोग मंजूर नहीं करेंगे।
फिर उससे पूछा गया कि अब तक का कौन सा किरदार करने में उसे सबसे ज्यादा मजा आया।
उसका जवाब एक शब्द का था।
कोई नहीं।
पूछा गया, एक भी नहीं?
उसने कहा कि कुछ फिल्मों के कुछ हिस्से अच्छे लगे, बस इतना ही।
और नायक?
अब वो बात याद कीजिए जो रे ने लिखी थी कि यह कहानी उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
उत्तम कुमार ने कहा कि उसे उस किरदार में अपनी कोई झलक नहीं दिखती।
उसने कहा कि उसकी समझ में यह आया ही नहीं कि वो आदमी आखिर किस बात से इतना परेशान है।
अब आखिरी हफ्ते पर आइए।
दो साल पहले उसे एक और दौरा पड़ चुका था। उसके बाद डॉक्टरों ने दिल से जुड़ी एक और तकलीफ पकड़ी थी, और जेब में हमेशा एक दवा रहने लगी थी, जो सीने में अचानक ऐंठन उठने पर काम आती।
डॉक्टरों ने उसे दो चीजों से रोका था।
इतना काम मत करो। और शराब छोड़ दो।
उसने दोनों में से एक भी बात नहीं मानी।
काम इसलिए नहीं छोड़ सका कि कर्ज था, संस्था थी, और उस अकेले नाम पर टिकी एक पूरी इंडस्ट्री थी।
और बाकी जो था, वो शायद उसी घुटन का दूसरा नाम था, जिसका जिक्र उसने चार दिन पहले खुद किया था।
22 जुलाई। सेट पर मेकअप करने वाले ने देखा कि वो उखड़ा हुआ है।
उसने पूछा कि आप थोड़ा आराम क्यों नहीं करते, इतना काम करके खुद को क्यों तोड़ते हैं।
जवाब में उसने कहा कि बहुत लंबा वक्त हो गया, अब शायद उसकी जरूरत खत्म हो गई है।
23 जुलाई की सुबह घर के पास खड़ी उसकी गाड़ी से उसका टेप रिकॉर्डर चोरी हो गया।
वो टेप रिकॉर्डर वो हर जगह साथ रखता था। उस पर गाने सुनता था, और अपनी आवाज भी रिकॉर्ड करता था।
उस चोरी ने उसे तोड़ दिया।
स्टूडियो पहुंचा तो उसका मेकअप रूम किसी और के पास था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
फिर उस दिन का दृश्य आया। एक सीढ़ी। चढ़ना और उतरना।
उसके हिसाब से यह मामूली दृश्य था।
पर हर बार उसे लगा कि ठीक नहीं हुआ।
सात बार।
आखिर में निर्देशक ने बाकी लोगों से चुपके से कहा कि जोर से ताली बजा दो, ताकि वो और रीटेक न मांगे।
जिस फिल्म का वो दृश्य था, वो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के पिग्मेलियन पर बनी थी।
कहानी उस आदमी की, जो एक लड़की का उच्चारण सुधारता है।
यानी वो आदमी, जिसने अपनी जबान खुद घिसकर तैयार की थी, जिसे शुरू में साफ न बोल पाने का ताना मिला था, आखिरी बार परदे पर किसी और की जबान सुधार रहा था।
और तिरपन साल की उम्र में, दिल के कई दौरे झेल चुका वो आदमी, सातवीं बार भी सीढ़ी चढ़-उतरकर यही सोच रहा था कि अभी ठीक नहीं हुआ।
उस शाम वो एक दोस्त की महफिल में गया, और देर रात तक वहीं रहा।
आधी रात के आसपास तबीयत बिगड़ी।
वो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल गया घर से पांच मिनट का रास्ता।
रात तीन बजे उसे भर्ती किया गया। शहर के बड़े हृदय-रोग विशेषज्ञों का एक बोर्ड बैठा।
और उस बोर्ड में जो एक डॉक्टर उसे संभाल रहा था, उसका नाम था लालमोहन मुखर्जी।
यह वही लड़का था, जिससे उसकी दोस्ती सातवीं क्लास में साउथ सबर्बन स्कूल में हुई थी।
स्कूल से लेकर आखिरी रात तक, वो साथ था।
पूरी रात और अगला पूरा दिन कोशिश चलती रही।
24 जुलाई 1980। रात साढ़े नौ बजे के करीब वो चला गया।
अगले दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले कभी नहीं देखा था।
एक खुली ट्रक। सफेद फूलों के ढेर। और दक्षिण कलकत्ता की सारी सड़कें रुक गईं।
अगली सुबह आनंदबाजार पत्रिका के पहले पन्ने पर जो शीर्षक छपा, उसका मतलब सिर्फ इतना था सिनेमा का इंद्र गिर गया।
और उसी दिन एक और चीज गायब हो गई।
वो अपनी आत्मकथा लिख रहा था। नाम, आमार आमि।
जिस दिन वो गया, उस पांडुलिपि का कोई पता नहीं चला। वो चोरी हो गई।
फिर बरसों बाद, एक अखबारनवीस को वो मिली। और तीस साल बाद, कोलकाता पुस्तक मेले में वो छपकर सामने आई।
उन पन्नों में वो अपने डर के बारे में लिखता है। कि यह रोशनी, यह चमक, कुछ भी टिकने वाला नहीं। कि यह किसी भी पल बुझ सकती है, और उसे और गहरे अंधेरे में फेंक सकती है।
जिसे पूरा बंगाल महानायक कहता था, वो अकेले में अंधेरे की गिनती कर रहा था।
और एक तारीख, जो इस कहानी में अक्सर छूट जाती है।
जिस औरत ने उसे पोर्ट की नौकरी में लौटने से रोका था, जिसकी वजह से यह पूरा नाम बना गौरी वो उसके जाने के नौ महीने बाद ही चली गईं।
अब आज पर आइए।
3 सितंबर 2026, उस बच्चे के जन्म को आज सौ साल पूरे हो रहे हैं।
अहिरीटोला और टॉलीगंज में उसकी मूर्तियों पर माला चढ़ेगी, और बिजली सिनेमा के सामने बीस फुट ऊंचा कटआउट खड़ा होगा।
न्यू टाउन में उसके नाम के फिल्म केंद्र की नींव रखी जा रही है, और डाक विभाग भी उसके नाम पर स्मृति-सामग्री जारी कर रहा है।
डाक टिकट तो सत्रह साल पहले ही आ चुका था।
चार दिन का उत्सव जिस फिल्म से शुरू होगा, वो वही है नायक। जिसकी नई, साफ की हुई कॉपी हाल में परदे पर लौटी है, और एक नई पीढ़ी उसे पहली बार बड़े परदे पर देख रही है।
***
जन्म : 3 सितम्बर 1926
स्थान : अहिरितोला, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
मृत्यु : 24 जुलाई 1980
स्थान : बेल व्यू क्लिनिक, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)












