वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा
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वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा
तुझको भूलें न कभी याद दिलाते गुज़रा
ज़िन्दगी ख़्वाब नहीं, ख़्वाब का धोखा है फ़क़्त
नाम उसका ही हक़ीक़त था, बताते गुज़रा
चाँ...
बात उन दिनों की है जब हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. हर रोज़ सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद रियाज़ शुरू होता था. सबसे पहले संगीत की देवी मां सरस्वती की वन्दना करनी होती थी. फिर. क़रीब दो घंटे तक सुरों की साधना. इस दौरान दिल को जो सुकून मिलता था. उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है.
इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस. ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना. संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता. हमारे गुरु जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे. वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे. उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं. गुरु जी के बेटे और बेटी हम सबके साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे. कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था.
हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरु जी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरु जी के घर गए.
वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर वहां शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरु जी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरु जी के बड़े भाई की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.
रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरु जी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरु जी पीछे तबले थामे बैठे थे.
अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.
गुरु जी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरु जी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.
गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.
इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस. ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना. संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता. हमारे गुरु जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे. वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे. उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं. गुरु जी के बेटे और बेटी हम सबके साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे. कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था.
हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरु जी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरु जी के घर गए.
वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर वहां शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरु जी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरु जी के बड़े भाई की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.
रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरु जी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरु जी पीछे तबले थामे बैठे थे.
अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.
गुरु जी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरु जी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.
गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है. इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के चलते मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने की क़गार पर है.
कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है. कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का ज़िक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी. कहानी 'सिंहासन बत्तीसी' में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है. सतवध्दर्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ. आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है. इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है. वहां कठपुतली मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है.
भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएं और किवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फ़रहाद की कथाएं ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन अब साम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाने लगे हैं. रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के प्रदर्शन में भी काफ़ी बदलाव आ गया है. अब यह खेल सड़कों, गली-कूचों में न होकर फ़्लड लाइट्स की चकाचौंध में बड़े-बड़े मंचों पर होने लगा है.
छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों, रंग-बिरंगे कपड़ों पर गोटे और बारीक काम से बनी कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध कर लेती हैं. कठपुतली के खेल में हर प्रांत के मुताबिक़ भाषा, पहनावा व क्षेत्र की संपूर्ण लोक संस्कृति को अपने में समेटे रहते हैं. राजा-रजवाड़ों के संरक्षण में फली-फूली इस लोककला का अंग्रेजी शासनकाल में विकास रुक गया. चूंकि इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार नट, भाट, जोगी समाज के दलित वर्ग के थे, इसलिए समाज का तथाकथित उच्च कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था.
महाराष्ट्र को कठपुतली की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन सिनेमा के आगमन के साथ वहां भी इस पारंपरिक लोककला को क्षति पहुंची. बच्चे भी अब कठपुतली का तमाशा देखने की बजाय ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखना ज़्यादा पसंद करते हैं. कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकर इस कला के क़द्रदानों की घटती संख्या के कारण अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ने पर मजबूर हैं. अनके परिवार ऐसे हैं, जो खेल न दिखाकर सिर्फ़ कठपुतली बनाकर ही अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. देश में इस कला के चाहने वालों की तादाद लगातार घट रही है, लेकिन विदेशी लोगों में यह लोकप्रिय हो रही है. पर्यटक सजावटी चीज़ों, स्मृति और उपहार के रूप में कठपुतलियां भी यहां से ले जाते हैं, मगर इन बेची जाने वाली कठपुतलियों का फ़ायदा बड़े-बड़े शोरूम के विक्रेता ही उठाते हैं. बिचौलिये भी माल को इधर से उधर करके चांदी कूट रहे हैं, जबकि इनको बनाने वाले कलाकर दो जून की रोटी को भी मोहताज हैं.
कठपुतली व अन्य इसी तरह की चीज़ें बेचने का काम करने वाले बीकानेर निवासी राजा का कहना है कि जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-क़स्बों से पलायन करना पड़ रहा है. कलाकरों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है. रोज़गार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकरों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है. जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी ज़रूरत है. उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं. वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संसकृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.
पुरानी फ़िल्मों और दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में कठपुतलियों का अहम किरदार रहा है, मगर वक़्त के साथ-साथ कठपुतलियों का वजूद ख़त्म होता जा रहा है. इन विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बात यह है कि कठपुतली कला को समर्पित कलाकारों ने उत्साह नहीं खोया है. भविष्य को लेकर इनकी आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजे हैं. इन्हें उम्मीद है कि आज न सही तो कल लोककलाओं को समाज में इनकी खोयी हुई जगह फिर से मिल जाएगी और अपनी अतीत की विरासत को लेकर नई पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटेगी.
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है. इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के चलते मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने की क़गार पर है.
कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है. कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का ज़िक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी. कहानी 'सिंहासन बत्तीसी' में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है. सतवध्दर्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ. आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है. इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है. वहां कठपुतली मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है.
भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएं और किवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फ़रहाद की कथाएं ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन अब साम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाने लगे हैं. रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के प्रदर्शन में भी काफ़ी बदलाव आ गया है. अब यह खेल सड़कों, गली-कूचों में न होकर फ़्लड लाइट्स की चकाचौंध में बड़े-बड़े मंचों पर होने लगा है.
छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों, रंग-बिरंगे कपड़ों पर गोटे और बारीक काम से बनी कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध कर लेती हैं. कठपुतली के खेल में हर प्रांत के मुताबिक़ भाषा, पहनावा व क्षेत्र की संपूर्ण लोक संस्कृति को अपने में समेटे रहते हैं. राजा-रजवाड़ों के संरक्षण में फली-फूली इस लोककला का अंग्रेजी शासनकाल में विकास रुक गया. चूंकि इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार नट, भाट, जोगी समाज के दलित वर्ग के थे, इसलिए समाज का तथाकथित उच्च कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था.
महाराष्ट्र को कठपुतली की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन सिनेमा के आगमन के साथ वहां भी इस पारंपरिक लोककला को क्षति पहुंची. बच्चे भी अब कठपुतली का तमाशा देखने की बजाय ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखना ज़्यादा पसंद करते हैं. कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकर इस कला के क़द्रदानों की घटती संख्या के कारण अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ने पर मजबूर हैं. अनके परिवार ऐसे हैं, जो खेल न दिखाकर सिर्फ़ कठपुतली बनाकर ही अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. देश में इस कला के चाहने वालों की तादाद लगातार घट रही है, लेकिन विदेशी लोगों में यह लोकप्रिय हो रही है. पर्यटक सजावटी चीज़ों, स्मृति और उपहार के रूप में कठपुतलियां भी यहां से ले जाते हैं, मगर इन बेची जाने वाली कठपुतलियों का फ़ायदा बड़े-बड़े शोरूम के विक्रेता ही उठाते हैं. बिचौलिये भी माल को इधर से उधर करके चांदी कूट रहे हैं, जबकि इनको बनाने वाले कलाकर दो जून की रोटी को भी मोहताज हैं.
कठपुतली व अन्य इसी तरह की चीज़ें बेचने का काम करने वाले बीकानेर निवासी राजा का कहना है कि जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-क़स्बों से पलायन करना पड़ रहा है. कलाकरों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है. रोज़गार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकरों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है. जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी ज़रूरत है. उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं. वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संसकृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.
पुरानी फ़िल्मों और दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में कठपुतलियों का अहम किरदार रहा है, मगर वक़्त के साथ-साथ कठपुतलियों का वजूद ख़त्म होता जा रहा है. इन विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बात यह है कि कठपुतली कला को समर्पित कलाकारों ने उत्साह नहीं खोया है. भविष्य को लेकर इनकी आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजे हैं. इन्हें उम्मीद है कि आज न सही तो कल लोककलाओं को समाज में इनकी खोयी हुई जगह फिर से मिल जाएगी और अपनी अतीत की विरासत को लेकर नई पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटेगी.
मन का यमुना तट सूना है
निःशब्द बांसुरी मौन हो गई।
रहे देखते स्मृतियों के दर्पण
मधु मिलन यामिनी बीत गईं।
गर्द गुबार बस शेष बचा है
मन के नीरव वीरानेपन में
कोलाहल है रुदन क्रन्दन है
मणि माणिक लड़ियाँ टूट गईं।
सांस सांस पर काल के पहरे
उर के स्पंदन क्षीण हो गए
श्रृंगार अधूरा पड़ा रह गया
कुसमित कलियाँ सूख गईं।
गिनते रहे पदचिह्न पुराने
आहट प्रियतम के आने की
प्रीति भरी गगरिया रीत गई।
निश्चेष्ट पड़ा है चंदन सा तन
अभिलाषाओं के मधुवन में
मनभावन की बस्ती छूट गई।
-डाॅ० स्वामी विजयानन्द
लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.
इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) रोज़ा, (4) ज़कात और (5) हज. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.
इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.
हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥
अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.
एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं
शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया
इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.
भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.
मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
-इंद्रेश कुमार
(लेखक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)
किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये
प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006
प्रभात प्रकाशन
4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555
मोहम्मद अफ़ज़ाल
प्रस्तुत पुस्तक ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में लेखिका फ़िरदौस ख़ान का उद्देश्य हिन्दुस्तान की उस तहज़ीब को प्रकाश में लाना है, जिसकी बुनियाद पर भारतीय समाज परवान चढ़ा. किसी भी देश की आत्मा को अगर समझना है, तो उसके लिए उस देश के समाज और उसकी प्रवृत्ति का अध्ययन अति आवश्यक है. जिस समाज का आधार प्रेम हो, वहां मानवता है. और अहिंसा मानवता का प्रतीक है. सम्राट अशोक के हाथ में जब तक तलवार रही, वह क्रूर और ज़ालिम कहलाया. जब उसने अहिंसा का दामन थामा, तो वह एक महान सम्राट अशोक बन गया. संसार में अगर कहीं कोई ऐसा समाज है, जहां मानवता, प्रेम और अहिंसा जिसके आचरण में विद्यमान है, वह हमारा प्रिय देश हिन्दुस्तान ही है. इसका वातावरण, जलवायु और इसकी मिट्टी जिसकी ख़ुशबू इतनी लुभावनी और मनभावन है कि जब उसकी ख़ुशबू वातावरण में रच-बसकर संसार में फैली तो इसकी ठंडक और महक को अरब तक महसूस किया गया और संसार के लिए देश आकर्षण आ केंद्र बन गया.
कोई व्यक्ति मानवता, प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ने के लिए इस देश की ओर आकर्षित हुआ, तो कोई ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए हाथ में कांसा-ए- गदाई (भिक्षा पात्र) के साथ इसकी संस्कृति को नये आयाम देने के लिए यहां आया. क्योंकि वे जानते थे कि जिस सम्मान और प्रेम की उन्हें तलाश है, वह इसी पवित्र धरती पर उन्हें मिल सकता है. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने तलवार के बल पर इसकी सभ्यता और संस्कृति को तबाह करने की कोशिश की, तो किसी ने छल-कपट और बल के द्वारा इस समाज की एकता की जड़ें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन ऋषि-मुनियों और औलिया, पीर-फ़क़ीरों ने अपनी अमर वाणी द्वारा मानवता, प्रेम और अहिंसा के इस दीपक को कभी बुझने नहीं दिया. उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया कि किसी जलधारा, मज़हब और धर्मों के उदगम स्थान अलग-अलग हो सकते हैं. मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करके निरंतर आगे बढ़ना उनके जीवन का प्रतीक है, लेकिन संगम ही उसको अमरता प्रदान करता है.
’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक के नाम से ही यह ज्ञात हो जाता है कि इसमें ऐसी महान हस्तियों का बखान है, जिन्होंने संसार के किसी अन्य भूमि के टुकड़े पर जन्म लिया हो, लेकिन इस देश की माटी, संस्कृति के आकर्षण, मोह, ज्ञान और प्रेरणा से अपने आपको अछूता न रख सके तथा उनके क़दम बरबस इस धरती की ओर खींच लाए. कुछ ऐसे महापुरुष भी इस पुस्तक के केंद्र में हैं, जिनका जन्म इस धरती पर मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनकी लेखनी और जीवन शैली पर हिन्दू देवी-देवताओं का राज था. रसखान मुस्लिम होते हुए भी दूसरे जन्म की कामना करते हैं. वह भी इस शर्त के साथ कि जन्म चाहे किसी भी रूप में हो, लेकिन जन्म स्थल ब्रज ही हो. सम्राट अकबर की पत्नी ताजबीबी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं, जिसे सम्राट अकबर ने भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा चित्र भेंट किया, जिसकी क़ीमत चित्रकार को इतनी दी कि उसे जीवन में कोई और चित्र बनाने की आवश्यकता ही न पड़े. इसके अलावा संत लालदास, भक्त लतीफ़ शाह, पेमी, अब्दुल समद, संत वाजिंद, संत बाबा मलेक ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुस्तान की संस्कृति की सेवा की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्होंने यह कार्य किसी मुस्लिम देश में किया होता, तो उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता. मगर हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि यही है कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर इस्लाम और मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दू संस्कृति का बखान किया गया है अर्थात अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.
लेखिका फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत पुस्तक में 55 महान हस्तियों का बखान किया है. उनमें से कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिन्होंने न तो इस धरती पर जन्म लिया और न ही वे कभी इस धरती पर आकर बसे, लेकिन उन्होंने भी अत्यंत कठिन मार्ग पर चलकर जनमानस की सेवा की. अर्थात जन्म, उदगम स्थान और मार्ग कोई भी हो दानवता रूपी क्रूर राक्षस को इस धरती से मिटाना उनका उद्देश्य रहा. संसार में जहां कहीं भी प्रेम, मानवता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता है, वहां भी भारतीय संस्कृति की ही आत्मा बसती है. लेखिका ने जिस सुंदर ढंग से 55 महान अनमोल मोतियों को पुस्तक रूपी अटूट माला में पिरो दिया, जिसका लाभ दिव्य दृष्टि रखने वाले पारखी पाठकजन अवश्य उठाएंगे.
लेखिका फ़िरदौस ख़ान का इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मुस्लिम संत-फ़क़ीरों द्वारा जगाई गई प्रेम, अहिंसा और भाईचारे की अलख से जनमानस को अवगत कराना है. ये संत-फ़क़ीर बेशक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक और गंगा-जमुनी तहज़ीब के स्तंभ हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि इनका ज़िक्र अकसर लोगों की ज़ुबान पर आता तो है, लेकिन वो इसकी आत्मा से दूर और इसके अर्थ से आज तक नावाक़िफ़ रहे हैं. इस तहज़ीब को परवान चढ़ाने के लिए सिर्फ़ हाथ से हाथ मिलाना काफ़ी नहीं, बल्कि साथ-साथ चलकर ऐसे मधुर संगम को प्राप्त करना है, जहां केवल प्रेम, अहिंसा और मानवता का वास हो.
(लेखक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)
किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये
प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006
प्रभात प्रकाशन
4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555
सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.
जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.
गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.
और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं.
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.
शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह
लेखक का परिचय
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं.
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं.
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हिन्दी सिनेमा के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने सशक्त अभिनय के ज़रिये उन्होंने कामयाबी की जो बुलंदियां हासिल कीं, वह हर किसी को नसीब नहीं हो पाती हैं. 29 दिसम्बर 1942 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था. उन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक़ था. फ़िल्मों में उनके आने का क़िस्सा बेहद रोचक है. युनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फ़िल्मफ़ेयर के बैनर तले 1965 में नए अभिनेता की खोज के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की गई. इसमें दस हज़ार लड़कों में से आठ लड़के फ़ाइनल मुक़ाबले तक पहुंचे, जिनमें एक राजेश खन्ना भी थे. आख़िर में कामयाबी का सेहरा राजेश खन्ना के सिर बंधा. अगले साल ही उन्हें फ़िल्म आख़िरी ख़त में काम करने का मौक़ा मिल गया. इसके बाद उन्होंने राज़, बहारों के सपने, औरत के रूप आदि कई फिल्में कीं, लेकिन कामयाबी उन्हें 1969 में आई फ़िल्म आराधना से मिली. इसके बाद एक के बाद एक 14 सुपरहिट फ़िल्में देकर उन्होंने हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार के तौर पर अपनी पहचान क़ायम कर ली. राजेश खन्ना ने फ़िल्म आनंद में एक कैंसर मरीज़ के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया था. इसमें मरते वक़्त आनंद कहता है-बाबू मोशाय, आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं. इस फ़ि में राजेश खन्ना द्वारा पहने गए गुरु कुर्ते ख़ूब मशहूर हुए. लड़के उन जैसे बाल रखने लगे.
उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उस ज़माने में अभिभावकों ने अपने बेटों के नाम राजेश रखे. फ़िल्म जगत में उन्हें प्यार से काका कहा जाता था. जब वह सुपरस्टार थे, तब एक कहावत बड़ी मशहूर थी-ऊपर आक़ा और नीचे काका. कहा जाता है कि अपने संघर्ष के दौर में भी वह महंगी गाड़ियों में निर्माताओं से मिलने जाया करते थे. वह रूमानी अभिनेता के तौर पर मशहूर हुए. उनकी आंखें झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने थे, ख़ासकर ल़डकियां तो उन पर जान छिड़कती थीं. राजेश खन्ना लड़कियों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए. लड़कियों ने उन्हें ख़ून से ख़त लिखे, उनकी तस्वीरों के साथ ब्याह रचाए, अपने हाथ पर उनका नाम गुदवा लिया. कहा जाता है कि कई लड़कियां तो अपने तकिये के नीचे उनकी तस्वीर रखा करती थीं. कहीं राजेश खन्ना की सफ़ेद रंग की कार रुकती थी, तो लड़कियां कार को चूमकर गुलाबी कर देती थीं. निर्माता-निर्देशक उनके घर के बाहर कतार लगाए खड़े रहते थे और मुंहमांगी क़ीमत पर उन्हें अपनी फ़िल्मों में लेना चाहते थे.
राजेश खन्ना ने तक़रीबन 163 फ़िल्मों में काम किया. इनमें से 128 फ़िल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, जबकि अन्य फ़िल्मों में भी उनका किरदार बेहद अहम रहा. उन्होंने 22 फ़िल्मों में दोहरी भूमिकाएं कीं. उन्हें तीन बार फ़िल्म फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से नवाज़ा गया. ये पुरस्कार उन्हें फ़िल्म सच्चा झूठा (1971), आनंद (1972) और अविष्कार (1975) में शानदार अभिनय करने के लिए दिए गए. उन्हें 2005 में फ़िल्मफ़ेयर के लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. उनकी फ़िल्मों में बहारों के सपने, आराधना, दो रास्ते, बंधन, सफ़र, कटी पतंग, आन मिलो सजना, आनंद, सच्चा झूठा, दुश्मन, अंदाज़, हाथी मेरे साथी, अमर प्रेम, दिल दौलत दुनिया, जोरू का ग़ुलाम, मालिक, शहज़ादा, बावर्ची, अपना देश, मेरे जीवन साथी, अनुराग, दाग़, नमक हराम, अविष्कार, अजनबी, प्रेम नगर, हमशक्ल, रोटी, आप की क़सम, प्रेम कहानी, महा चोर, महबूबा, त्याग, पलकों की छांव में, आशिक़ हूं बहारों का, छलिया बाबू, कर्म, अनुरोध, नौकरी, भोला भाला, जनता हवलदार, मुक़ाबला, अमर दीप, प्रेम बंधन, थोड़ी सी बेवफ़ाई, आंचल, फिर वही रात, बंदिश, क़ुदरत, दर्द, धनवान, अशांति, जानवर, धर्म कांटा, सुराग़, राजपूत, नादान, सौतन अगर तुम न होते, अवतार, नया क़दम, आज का एमएलए राम अवतार, मक़सद, धर्म और क़ानून, आवाज़, आशा ज्योति, ऊंचे लोग, नया बकरा, मास्टर जी, दुर्गा, बेवफ़ाई, बाबू, हम दोनों, अलग-अलग, ज़माना, आख़िर क्यों, निशान, शत्रु, नसीहत, अंगारे, अनोखा रिश्ता, अमृत गोरा, आवारा, बाप, अवाम, नज़राना, विजय, पाप का अंत, मैं तेरा दुश्मन, स्वर्ग, रुपये दस करोड़, आ अब लौट चलें, प्यार ज़िंदगी है और क्या दिल ने कहा आदि शामिल हैं.
राजेश खन्ना नब्बे के दशक में राजीव गांधी के कहने पर सियासत में आ गए. उन्होंने 1991 में नई दिल्ली से कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा. उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को कड़ी चुनौती दी थी, लेकिन मामूली अंतर से हार गए. आडवाणी ने यह सीट छोड़ दी और अपनी दूसरी सीट गांधीनगर से अपना प्रतिनिधित्व बनाए रखा. सीट ख़ाली होने पर उपचुनाव में वह एक बार फिर खड़े हुए और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को भारी मतों से शिकस्त दी. उन्होंने 1996 में तीसरी बार इसी सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा नेता जगमोहन से हार गए. इसके बाद हर बार चुनाव के मौक़े पर वह कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए दिल्ली आते रहे. उन्होंने 1994 में एक बार फिर ख़ुदाई फ़िल्म से परदे पर वापसी की, लेकिन उन्हें ख़ास कामयाबी नहीं मिल पाई. इसके अलावा अपने बैनर तले उन्होंने जय शिव शंकर नामक फ़िल्म शुरू की थी, जिसमें उन्होंने पत्नी डिम्पल को साइन किया. फ़िल्म आधी बनने के बाद रुक गई और आज तक रिली नहीं हुई. कभी अक्षय कुमार भी इस फ़िल्म में काम मांगने के लिए राजेश खन्ना के पास गए थे, लेकिन राजेश खन्ना से उनकी मुलाक़ात नहीं हो पाई. बाद में वह राजेश खन्ना के दामाद बने.
राजेश खन्ना की कामयाबी में संगीतकार आरडी बर्मन और गायक किशोर का अहम योगदान रहा. उनके बनाए और राजेश पर फ़िल्माये ज़्यादातर गीत हिट हुए. किशोर कुमार ने 91 फ़िल्मों में राजेश खन्ना को आवाज़ दी, तो आरडी बर्मन ने उनकी 40 फ़िल्मों को संगीत से सजाया. राजेश खन्ना अपनी फ़िल्मों के संगीत को लेकर हमेशा सजग रहते थे. वह गाने की रिकॉर्डिंग के वक़्त स्टुडियो में रहना पसंद करते थे. मुमताज़ और शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जो़ड़ी को बहुत पसंद किया गया. आशा पारेख और वहीदा रहमान के साथ भी उन्होंने काम किया. एक दौर ऐसा भी आया जब ज़ंजीर और शोले जैसी फ़िल्में हिट होने लगीं. दर्शक रूमानियत की बजाय एक्शन फ़िल्मों को ज़्यादा पसंद करने लगे तो राजेश खन्ना की फ़िल्में पहले जैसी कामयाबी से महरूम हो गईं. कुछ लोगों का यह भी मानना रहा कि राजेश खन्ना अपनी सुपर स्टार वाली इमेज से कभी बाहर नहीं आ पाए. वह हर वक़्त ऐसे लोगों से घिरे रहने लगे, जो उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे. अपने अहंकार की वजह से उन्होंने कई अच्छी फ़िल्में ठुकरा दीं, जो बाद में अमिताभ बच्चन की झोली में चली गईं. उनकी आदत की वजह से मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, ऋषिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा ने उन्हें छोड़कर अमिताभ बच्चन को अपनी फ़िल्मों में लेना शुरू कर दिया.
राजेश खन्ना की निजी ज़िन्दगी में भी काफ़ी उतार-च़ढाव आए. उन्होंने पहले अभिनेत्री अंजू महेन्द्रू से प्रेम किया, लेकिन उनका यह रिश्ता ज़्यादा वक़्त तक नहीं टिक पाया. बाद में अंजू ने क्रिकेट खिलाड़ी गैरी सोबर्स से सगाई कर ली. इसके बाद 1973 में उन्होंने डिम्पल कपा़ड़िया से प्रेम विवाह किया. डिम्पल और राजेश में ज़्यादा अच्छा रिश्ता नहीं रहा. बाद में दोनों अलग-अलग रहने लगे. उनकी दो बेटियां हैं टि्वंकल और रिंकी. मगर अलग होने के बावजूद डिम्पल से हमेशा राजेश खन्ना का साथ दिया. आख़िरी वक़्त में भी डिम्पल उनके साथ रहीं. टीना मुनीम भी राजेश खन्ना की ज़िंदगी में आईं. एक ज़माने में राजेश खन्ना ने कहा था कि वह और टीना एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करते हैं. वह अपनी हर फ़िल्म में टीना मुनीम को लेना चाहते थे. उन्होंने टीना मुनीम के साथ कई फ़िल्में कीं.
राजशे खन्ना ने अमृतसर के कूचा पीपल वाला की तिवाड़ियां गली में स्थित अपने पैतृक घर को मंदिर के नाम कर दिया था. उनके माता-पिता की मौत के बाद कई साल तक इस मकान में उनके चाचा भगत किशोर चंद खन्ना भी रहे, उनकी मौत के बाद से यह मकान ख़ाली पड़ा था. यहां के लोग आज भी राजेश खन्ना को बहुत याद करते हैं. राजेश खन्ना पिछले काफ़ी दिनों से बीमार चल रहे थे. 18 जुलाई 2012 को उन्होंने आख़िरी सांस ली. राजेश खन्ना का कहना था कि वह अपनी ज़िंदगी से बेहद ख़ुश हैं. दोबारा मौक़ा मिला तो वह फिर राजेश खन्ना बनना चाहेंगे और वही ग़लतियां दोहराएंगे, जो उन्होंने की हैं. उनकी मौत से उनके प्रशंसकों को बेहद तकलीफ़ पहुंची. हिन्दुस्तान ही नहीं पाकिस्तान और अन्य देशों के बाशिंदों ने भी अपने-अपने तरीक़े से उन्हें श्रद्घांजलि अर्पित की.
***
जन्म : 29 दिसम्बर 1942
स्थान : अमृतसर (पंजाब)
मृत्यु :18 जुलाई 2012
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)
ਪ੍ਰੇਰਨਾਦਾਇਕ, ਵਿਗਿਆਨਕ ਅਤੇ ਤਾਰਕਿਕ ਵਿਚਾਰਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਸੰਗ ਵਿੱਚ ਜੇਕਰ ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੁਆਰਾ ਤਿੰਨ ਭਾਗਾਂ ਵਿੱਚ ਰਚਿਤ ਪੁਸਤਕ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ'ਨੂੰ ਦੇਖਿਆ ਜਾਵੇ, ਤਾਂ ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਇਸੇ ਨਜ਼ਰੀਏ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਕਰਦੀ ਹੈ।
ਇਸ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ (ਗਿਆਨ, ਤਰਕ, ਸੰਘਰਸ਼ ਅਤੇ ਸੋਚ ਦੀ ਤਬਦੀਲੀ) ਦੇ ਅਧਾਰ 'ਤੇ ਪੁਸਤਕ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ' ਬਾਰੇ ਅਸੀਂ ਇਹ ਜਾਣ ਸਕਦੇ ਹਾਂ-
1. ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਇੱਕ ਪ੍ਰਯੋਗਸ਼ਾਲਾ: ਕਬੀਰ ਜੀ ਦਾ ਜੀਵਨ
ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਸਿੱਧ ਕਰਦੀ ਹੈ, "ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਪ੍ਰਯੋਗਸ਼ਾਲਾ ਤੁਹਾਡਾ ਆਪਣਾ ਜੀਵਨ ਹੈ।"
* ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਨੇ ਪੁਸਤਕ ਵਿੱਚ ਦਿਖਾਇਆ ਹੈ ਕਿ ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਕਿਸੇ ਗੁਫਾ ਵਿੱਚ ਬੈਠ ਕੇ ਗਿਆਨ ਹਾਸਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ, ਬਲਕਿ ਸਮਾਜ ਦੀ 'ਲੈਬ' ਵਿੱਚ ਰਹਿ ਕੇ ਪ੍ਰਯੋਗ ਕੀਤੇ।
* ਇੱਕ ਜੁਲਾਹੇ ਵਜੋਂ ਕਿਰਤ ਕਰਦਿਆਂ, ਗਰੀਬੀ ਅਤੇ ਜਾਤੀਗਤ ਵਿਤਕਰੇ ਨੂੰ ਹੰਢਾਉਂਦਿਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਹਰ ਹਾਰ ਅਤੇ ਹਰ ਠੋਕਰ ਨੂੰ ਇੱਕ 'Research' (ਖੋਜ) ਬਣਾਇਆ। ਲੇਖਕ ਅਨੁਸਾਰ, ਕਬੀਰ ਜੀ ਦਾ ਜੀਵਨ ਹਾਲਾਤ ਅੱਗੇ ਝੁਕਣ ਦਾ ਨਹੀਂ, ਬਲਕਿ ਹਰ ਔਖੀ ਪ੍ਰਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚੋਂ ਸਿੱਖ ਕੇ ਹੋਰ ਮਜ਼ਬੂਤ ਹੋਣ ਦੀ ਮਿਸਾਲ ਹੈ।
2. ਅੰਧਵਿਸ਼ਵਾਸ ਨਹੀਂ ਤਰਕ ਅਤੇ ਸਿੱਖਿਆ: ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ
ਪੁਸਤਕ ਦਾ ਮੂਲ ਤੱਤ ਹੈ, "ਤਰਕ ਨਾਲ ਸੋਚੋ, ਕਿਉਂਕਿ ਅੰਧਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਦੇ ਭਵਿੱਖ ਨਹੀਂ ਬਣਾਉਂਦਾ।"
* ਪੁਸਤਕ ਵਿੱਚ ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਨੇ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦਾ ਜੋ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਹ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ 'ਤਰਕ' (Logic) 'ਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਹੈ। ਕਬੀਰ ਜੀ ਆਪਣੇ ਦੌਰ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ 'ਵਿਗਿਆਨਕ ਸੋਚ' ਵਾਲੇ ਰਹਿਬਰ ਸਨ।
* ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਲੀਕ ਪਿੱਟਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛੇ—"ਜੌ ਤੂੰ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਬ੍ਰਾਹਮਣੀ ਜਾਇਆ ॥ ਤਉ ਆਨ ਬਾਟ ਕਾਹੇ ਨਹੀਂ ਆਇਆ ॥" ਇਹ ਸਵਾਲ ਪੁੱਛਣ ਦੀ ਹਿੰਮਤ ਹੀ ਨਵੀਂ ਖੋਜ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਸੀ। ਲੇਖਕ ਨੇ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕੀਤਾ ਹੈ ਕਿ ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਸਮਾਜ ਦੇ ਥੋਪੇ ਹੋਏ ਨਿਯਮਾਂ ਨੂੰ ਨਕਾਰ ਕੇ 'ਸੱਚ ਦੇ ਗਿਆਨ' ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਹਥਿਆਰ ਬਣਾਇਆ, ਜੋ ਕਿ ਅੱਜ ਦੇ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਬਾਬਾਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਦੇ 'ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੰਘਰਸ਼' ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਨਾਲ ਮੇਲ ਖਾਂਦਾ ਹੈ।
3. ਸੋਚ ਬਦਲੇਗੀ ਤਾਂ ਸਮਾਜ ਬਦਲੇਗਾ: ਇਤਿਹਾਸ ਸਿਰਜਣਾ
"ਕਿਸਮਤ ਨਹੀਂ, ਸੋਚ ਬਦਲਦੀ ਹੈ... ਜੇਕਰ ਮਿਹਨਤ ਇਨਸਾਨੀਅਤ 'ਤੇ ਹੋਵੇਗੀ, ਤਾਂ ਇਤਿਹਾਸ ਯਾਦ ਰੱਖੇਗਾ।"
* ਪੁਸਤਕ ਵਿੱਚ ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੇ ਫਲਸਫੇ ਦੇ ਅੰਤਿਮ ਨਿਸ਼ਾਨੇ ਯਾਨੀ 'ਮਨੁੱਖੀ ਬਰਾਬਰੀ' ਅਤੇ 'ਇਨਸਾਨੀਅਤ' ਨੂੰ ਉਭਾਰਦੇ ਹਨ। ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਕਿਸਮਤ ਦੇ ਭਰੋਸੇ ਬੈਠਣ ਵਾਲੀ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਜਗਾਇਆ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸੋਚ ਨੂੰ ਬਦਲਿਆ।
* ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਕੋਈ ਵੀ ਇਨਸਾਨ ਜਨਮ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਜਾਂ ਨੀਵਾਂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਜਦੋਂ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ਨੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਸੋਚ ਬਦਲੀ, ਤਾਂ ਇਤਿਹਾਸ ਬਦਲ ਗਿਆ। ਸਦੀਆਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਕਿਉਂਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮਿਹਨਤ 'ਇਨਸਾਨੀਅਤ' ਨੂੰ ਬਚਾਉਣ 'ਤੇ ਸੀ।
ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੀ ਇਹ ਪੁਸਤਕ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ' ਇਹ ਸਿੱਧ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਕਬੀਰ ਜੀ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਸਮੇਂ ਦੇ ਇੱਕ 'ਸੋਸ਼ਲ ਸਾਇੰਟਿਸਟ' (ਸਮਾਜਿਕ ਵਿਗਿਆਨੀ) ਸਨ। ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਨਫ਼ਰਤ ਨਹੀਂ, ਮੁਹੱਬਤ ਤੇ ਸਾਂਝੀਵਾਲਤਾ ਚੁਣੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਹਾਰ ਨਹੀਂ ਮੰਨੀ, ਵਿਚਾਰਿਕ ਸੰਘਰਸ਼ ਚੁਣਿਆ; ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਬਾਣੀ (ਕਿਤਾਬ) ਨਾਲ ਜਿਸ ਨੇ ਵੀ ਦੋਸਤੀ ਕੀਤੀ, ਉਸ ਦੀ ਸੋਚ ਅਤੇ ਤਕਦੀਰ ਦੋਵੇਂ ਬਦਲ ਗਏ।
ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਹਰ ਉਸ ਵਿਅਕਤੀ ਲਈ ਇੱਕ ਜ਼ਰੂਰੀ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ ਜੋ ਡਾ. ਬਾਬਾਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਦੇ ਦੱਸੇ 'ਤਰਕ, ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੰਘਰਸ਼' ਦੇ ਰਾਹ 'ਤੇ ਚੱਲਦਿਆਂ, ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੇ ਇਨਕਲਾਬੀ ਰੂਪ ਨੂੰ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ।
ਪੁਸਤਕ: ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਤੇ ਬਾਣੀ (ਤਿੰਨ ਭਾਗ)
-ਲੇਖਕ: ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ
ਭਾਰਤੀ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ ਵੀ ਮੁਕਤੀ ਅਤੇ ਬਗਾਵਤ ਦੇ ਸੁਰਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਚੱਲੇਗੀ, ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਨਾਮ ਸਭ ਤੋਂ ਮੂਹਰਲੀ ਸਫ਼ ਵਿੱਚ ਆਵੇਗਾ। ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਵੱਲੋਂ ਸੰਪਾਦਿਤ ਪੁਸਤਕ ‘ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਤੇ ਬਾਣੀ’ ਕੇਵਲ ਇੱਕ ਅਧਿਆਤਮਕ ਸੰਕਲਨ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਇਹ ਉਸ ਇਨਕਲਾਬੀ ਚੇਤਨਾ ਦਾ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਮੱਧਕਾਲੀਨ ਭਾਰਤ ਦੇ ਜਗੀਰੂ ਢਾਂਚੇ ਅਤੇ ਮਨੂਵਾਦੀ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਦੀਆਂ ਜੜ੍ਹਾਂ ਹਿਲਾ ਦਿੱਤੀਆਂ ਸਨ। ਲੋਕ-ਪੱਖੀ ਨਜ਼ਰੀਏ ਤੋਂ ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਭਾਰਤੀ ਸਮਾਜ ਦੇ ਦਬੇ-ਕੁਚਲੇ ਵਰਗਾਂ ਦੀ ਮੁਕਤੀ ਦੇ ਇਤਿਹਾਸਕ ਸੰਘਰਸ਼ ਨੂੰ ਸਮਝਣ ਲਈ ਇੱਕ ਅਹਿਮ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਸਾਬਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।
1. ਮਨੂਵਾਦੀ ਕੋੜ੍ਹ ਦੇ ਖਿਲਾਫ਼ ਜਮਾਤੀ ਸੰਘਰਸ਼
ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਕਿਸੇ ਅਜਿਹੇ ਰਹੱਸਵਾਦੀ ਸੰਤ ਵਜੋਂ ਪੇਸ਼ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ ਜੋ ਦੁਨੀਆ ਤੋਂ ਨਿਰਲੇਪ ਹੋਵੇ, ਸਗੋਂ ਉਹ ਸਮਾਜਿਕ ਬੁਰਾਈਆਂ ਖਿਲਾਫ਼ ਲੜਨ ਵਾਲੇ ਇੱਕ ਸਰਗਰਮ ਯੋਧਾ ਸਨ। ਲੇਖਕ ਨੇ ਬਾਖ਼ੂਬੀ ਦਿਖਾਇਆ ਹੈ ਕਿ ਕਿਵੇਂ ਕਬੀਰ ਨੇ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੀ ਮੁੱਖਧਾਰਾ ਵਿੱਚ ਛੁਪੇ ਮਨੂਵਾਦੀ ਕੋੜ੍ਹ—ਯਾਨੀ ਜਾਤ-ਪਾਤ, ਊਚ-ਨੀਚ ਅਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਪਖੰਡਵਾਦ—'ਤੇ ਕਰਾਰੀ ਸੱਟ ਮਾਰੀ। ਲੋਕ-ਪੱਖੀ ਪ੍ਰਤੀਮਾਨਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਇਹ ਜਾਤੀ ਵਿਵਸਥਾ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਹਾਕਮ ਜਮਾਤ ਵੱਲੋਂ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਲੁੱਟ-ਖਸੁੱਟ ਨੂੰ ਜਾਇਜ਼ ਠਹਿਰਾਉਣ ਦਾ ਇੱਕ ਵਿਚਾਰਧਾਰਕ ਹਥਿਆਰ ਸੀ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਕਬੀਰ ਨੇ ਬੇਪਰਦ ਕੀਤਾ।
2. ਕਿਰਤੀ-ਕਿਸਾਨ ਨਜ਼ਰੀਆ ਅਤੇ ਪਦਾਰਥਵਾਦੀ ਸੋਚ
ਪੁਸਤਕ ਦੇ ਤਿੰਨਾਂ ਭਾਗਾਂ ਵਿੱਚ ਕਬੀਰ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦੇ ਜਿਸ ਪੱਖ ਨੂੰ ਉਭਾਰਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਉਹ ਹੈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਜ਼ਦੂਰ-ਕਿਸਾਨਾਂ ਵਾਲਾ ਨਜ਼ਰੀਆ। ਕਬੀਰ ਖੁਦ ਇੱਕ ਜੁਲਾਹੇ ਸਨ, ਉਹ ਕਿਰਤ ਦੀ ਮਹਿਮਾ ਨੂੰ ਜਾਣਦੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਦਰਸ਼ਨ ਕਿਰਤ ਤੋਂ ਟੁੱਟਿਆ ਹੋਇਆ ਨਹੀਂ ਸੀ।
* ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੇ ਪ੍ਰਚਲਿਤ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਢਾਂਚੇ, ਧਰਮ ਦੇ ਠੇਕੇਦਾਰਾਂ ਅਤੇ ਬੁਰਜੂਆ ਸਾਹਿਤ ਨੂੰ ਵੰਗਾਰਿਆ।
* ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਬਾਣੀ ਮਹਿਲ-ਮੁਨਾਰਿਆਂ ਦੀ ਭਾਸ਼ਾ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਖੇਤਾਂ, ਖੱਡੀਆਂ ਅਤੇ ਕਾਰਖਾਨਿਆਂ (ਕਿਰਤ ਦੇ ਸਾਧਨਾਂ) ਵਿੱਚੋਂ ਉਪਜੀ ਲੋਕ-ਭਾਸ਼ਾ ਹੈ।
3. ਹਾਕਮ ਜਮਾਤ ਦਾ ਜਬਰ ਅਤੇ ‘ਖੱਬਲ’ ਵਰਗੀ ਪ੍ਰਤੀਰੋਧਤਾ
ਇਸ ਪੁਸਤਕ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਪ੍ਰਗਤੀਸ਼ੀਲ ਪੱਖ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਕਬੀਰ ਨੂੰ ਇੱਕ 'ਪੀੜਤ' (Victim) ਵਜੋਂ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਇੱਕ 'ਲੜਾਕੂ' ਵਜੋਂ ਪੇਸ਼ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਵਕਤ ਦੇ ਹਾਕਮਾਂ (ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਸੱਤਾ) ਅਤੇ ਸਮਾਜ ਦੇ ਠੇਕੇਦਾਰਾਂ (ਧਾਰਮਿਕ ਸੱਤਾ) ਨੇ ਗੱਠਜੋੜ ਕਰਕੇ ਕਬੀਰ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਦਬਾਉਣ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਰੋਲਣ ਦਾ ਯਤਨ ਕੀਤਾ, ਤਾਂ ਕਬੀਰ "ਖੱਬਲ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪੱਥਰ ਪਾੜ ਕੇ" ਬਾਹਰ ਨਿਕਲੇ। ਇਹ ਬਿੰਬ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਕਿਰਤੀ ਜਮਾਤ ਦੀ ਉਸ ਅਜਿੱਤ ਸ਼ਕਤੀ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਕੋਈ ਵੀ ਫਾਸੀਵਾਦੀ ਜਾਂ ਜਗੀਰੂ ਸੱਤਾ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਈ ਦਬਾ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ।
ਸਿੱਟਾ : ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੀ ਇਹ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਬੀਰ ਨੂੰ ਕੇਵਲ 'ਕਰਮਕਾਂਡਾਂ ਦੇ ਵਿਰੋਧੀ' ਵਜੋਂ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਇੱਕ 'ਸਮਾਜਿਕ-ਆਰਥਿਕ ਇਨਕਲਾਬੀ' ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪੁਨਰ-ਸਥਾਪਿਤ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਅੱਜ ਦੇ ਦੌਰ ਵਿੱਚ, ਜਦੋਂ ਪੂੰਜੀਵਾਦ ਅਤੇ ਫਿਰਕਾਪ੍ਰਸਤੀ ਦਾ ਗੱਠਜੋੜ ਮੁੜ ਲੋਕਾਈ ਨੂੰ ਕੁਚਲ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਕਬੀਰ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦਾ ਇਹ ਲੋਕਪੱਖੀ ਅਤੇ ਜਮਾਤੀ ਮੁਲਾਂਕਣ ਬੇਹੱਦ ਪ੍ਰਾਸੰਗਿਕ ਅਤੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਹਰ ਉਸ ਪਾਠਕ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਜੋ ਇਨਕਲਾਬ ਦੇ ਭਾਰਤੀ ਰੂਪਾਂਤਰਣ ਨੂੰ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ।
ਲੇਖਕ: ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ
ਕੇਂਦਰੀ ਵਿਸ਼ਾ: ਕਿਰਤ ਦੀ ਮਹਾਨਤਾ, ਜਾਤੀਵਾਦੀ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਦਾ ਖੰਡਨ ਅਤੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ
ਭੂਮਿਕਾ: ਇਤਿਹਾਸਕ ਅਨਿਆਂ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਇੱਕ ਬੌਧਿਕ ਹਥਿਆਰ
ਜਦੋਂ ਵੀ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਸਮਾਜਿਕ ਨਿਆਂ, ਜਮਾਤੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਅਤੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ਾਂ ਦੀ ਲੁੱਟ ਦੀ ਗੱਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ 15ਵੀਂ ਸਦੀ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਇਨਕਲਾਬੀ ਰਹਿਬਰ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਨਾਮ ਸਭ ਤੋਂ ਮੂਹਰੇ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੁਆਰਾ ਤਿੰਨ ਭਾਗਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਖੀ ਗਈ ਪੁਸਤਕ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ' ਮਹਿਜ਼ ਇੱਕ ਧਾਰਮਿਕ ਜਾਂ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਵਿਆਖਿਆ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਬਲਕਿ ਇਹ ਉਸ ਇਤਿਹਾਸਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਅਨਿਆਂ ਦੀ ਪਰਤ-ਦਰ-ਪਰਤ ਚੀਰ-ਫਾੜ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਉਪਰੋਕਤ ਵਿਚਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਦੱਸਦੀ ਹੈ ਕਿ ਕਿਵੇਂ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਸਦੀਆਂ ਪਹਿਲਾਂ 'ਕਿਰਤ ਦੀ ਮਹਾਨਤਾ' ਅਤੇ 'ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ' ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕੀਤਾ ਸੀ।
ਪੁਸਤਕ ਦੀ ਤਿੰਨ-ਭਾਗੀ ਬਣਤਰ ਅਤੇ ਮੁੱਖ ਨੁਕਤੇ
ਕੇਂਦਰੀ ਵਿਸ਼ਾ: ਕਿਰਤ ਦੀ ਮਹਾਨਤਾ, ਜਾਤੀਵਾਦੀ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਦਾ ਖੰਡਨ ਅਤੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ
ਭੂਮਿਕਾ: ਇਤਿਹਾਸਕ ਅਨਿਆਂ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਇੱਕ ਬੌਧਿਕ ਹਥਿਆਰ
ਜਦੋਂ ਵੀ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਸਮਾਜਿਕ ਨਿਆਂ, ਜਮਾਤੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਅਤੇ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ਾਂ ਦੀ ਲੁੱਟ ਦੀ ਗੱਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ 15ਵੀਂ ਸਦੀ ਦੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਇਨਕਲਾਬੀ ਰਹਿਬਰ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਨਾਮ ਸਭ ਤੋਂ ਮੂਹਰੇ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੁਆਰਾ ਤਿੰਨ ਭਾਗਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਖੀ ਗਈ ਪੁਸਤਕ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ' ਮਹਿਜ਼ ਇੱਕ ਧਾਰਮਿਕ ਜਾਂ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਵਿਆਖਿਆ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਬਲਕਿ ਇਹ ਉਸ ਇਤਿਹਾਸਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਅਨਿਆਂ ਦੀ ਪਰਤ-ਦਰ-ਪਰਤ ਚੀਰ-ਫਾੜ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਉਪਰੋਕਤ ਵਿਚਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਦੱਸਦੀ ਹੈ ਕਿ ਕਿਵੇਂ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਸਦੀਆਂ ਪਹਿਲਾਂ 'ਕਿਰਤ ਦੀ ਮਹਾਨਤਾ' ਅਤੇ 'ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ' ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕੀਤਾ ਸੀ।
ਪੁਸਤਕ ਦੀ ਤਿੰਨ-ਭਾਗੀ ਬਣਤਰ ਅਤੇ ਮੁੱਖ ਨੁਕਤੇ
ਭਾਗ 1: ਜੀਵਨ ਸੰਘਰਸ਼ ਅਤੇ ਕਿਰਤੀ ਦੀ ਪਛਾਣ
ਪਹਿਲੇ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਲੇਖਕ ਨੇ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਚਮਤਕਾਰੀ ਪਾਤਰ ਵਜੋਂ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਦੀ ਬਜਾਏ, ਇੱਕ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ 'ਜੁਲਾਹੇ' (ਕਿਰਤੀ) ਵਜੋਂ ਪੇਸ਼ ਕੀਤਾ ਹੈ।
* ਕਿਰਤ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ: ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਕਦੇ ਵੀ ਕੰਮ ਛੱਡ ਕੇ ਜੰਗਲਾਂ ਵਿੱਚ ਭੱਜਣ ਜਾਂ ਭਿੱਖਿਆ ਮੰਗ ਕੇ ਖਾਣ (ਜੋ ਕਿ ਵੱਡੀ ਜਾਤ ਦੇ ਵਿਹਲੜਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੀ) ਨੂੰ ਧਰਮ ਨਹੀਂ ਮੰਨਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਖੱਡੀ ਉੱਤੇ ਕੱਪੜਾ ਬੁਣਦਿਆਂ, ਯਾਨੀ ਉਤਪਾਦਨ ਕਰਦਿਆਂ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਅਤੇ ਸਮਾਜਿਕ ਨਿਆਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕੀਤੀ।
* ਵਿਹਲੜ ਜਮਾਤ 'ਤੇ ਚੋਟ: ਲੇਖਕ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕਿਵੇਂ ਪੁਰਾਣੇ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਨਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ (ਪੁਜਾਰੀ, ਜਗੀਰਦਾਰ) ਉੱਚੇ ਬਣ ਬੈਠੇ ਅਤੇ ਸੰਸਾਰ ਦਾ ਢਿੱਡ ਭਰਨ ਵਾਲੇ ਨੀਵੇਂ ਐਲਾਨੇ ਗਏ। ਕਬੀਰ ਜੀ ਇਸ ਵਿਵਸਥਾ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਪਹਿਲੀ ਬਗਾਵਤ ਸਨ।
ਭਾਗ 2: ਬਾਣੀ ਦੀ ਇਨਕਲਾਬੀ ਵਿਆਖਿਆ (ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਦਾ ਖੰਡਨ)
ਦੂਜੇ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਨੇ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦੇ ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਪੱਖਾਂ ਨੂੰ ਉਜਾਗਰ ਕੀਤਾ ਹੈ।
* ਜਾਤ ਅਤੇ ਜਮਾਤ ਦਾ ਗਠਜੋੜ: ਲੇਖਕ ਨੇ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੇ ਸਲੋਕਾਂ ਰਾਹੀਂ ਇਹ ਸਿੱਧ ਕੀਤਾ ਹੈ ਕਿ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਜਾਤੀਵਾਦ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਮਿਹਨਤ ਦੀ ਲੁੱਟ ਦਾ ਹੀ ਦੂਜਾ ਨਾਮ ਹੈ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਜ਼ਮੀਨਾਂ ਅਤੇ ਸਰਮਾਇਆ ਸੀ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਖ਼ੁਦ ਨੂੰ 'ਸਵਰਣ' (ਵੱਡੀ ਜਾਤ) ਐਲਾਨ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਜੋ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ 'ਛੋਟੀ ਜਾਤ' ਵਿੱਚ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ।
* ਸਟੇਟ ਅਤੇ ਧਰਮ ਦੇ ਗਠਜੋੜ 'ਤੇ ਹਮਲਾ: ਜਿਵੇਂ ਅੱਜ ਰਾਜਨੀਤੀ,ਧਰਮ ਅਤੇ ਪੂੰਜੀਪਤੀ ਮਿਲ ਕੇ ਪੇਂਡੂ, ਦਲਿਤ ਅਤੇ ਆਦਿਵਾਸੀਆਂ ਦਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੇ ਦੌਰ ਵਿੱਚ ਵਕਤ ਦੇ ਹਾਕਮ (ਸਿਕੰਦਰ ਲੋਧੀ) ਅਤੇ ਧਾਰਮਿਕ ਆਗੂਆਂ ਨੇ ਮਿਲ ਕੇ ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੂੰ ਤਸੀਹੇ ਦਿੱਤੇ ਸਨ। ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਉਸ ਸਾਂਝੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਨੂੰ ਬੇਪਰਦ ਕਰਦੀ ਹੈ।
ਭਾਗ 3: ਬੇਗਮਪੁਰਾ ਅਤੇ ਆਧੁਨਿਕ ਸਮਾਜਿਕ ਚੇਤਨਾ
ਤੀਜਾ ਭਾਗ ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ (ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਮਕਾਲੀ ਗੁਰੂ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ) ਦੇ ਉਸ ਸੰਕਲਪ ਦੀ ਬਾਤ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ 'ਸਮਾਜਵਾਦ' ਜਾਂ 'ਬਰਾਬਰੀ ਦਾ ਸਮਾਜ' ਕਹਿੰਦੇ ਹਾਂ।
* ਆਰਥਿਕ ਅਤੇ ਸਮਾਜਿਕ ਨਿਆਂ: ਇਸ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਦਿਖਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਕਬੀਰ ਜੀ ਅਜਿਹੇ ਸਮਾਜ ਦੇ ਮੁਦਈ ਸਨ ਜਿੱਥੇ ਕੋਈ ਦੂਜੇ ਦੀ ਕਮਾਈ ਨਾ ਲੁੱਟੇ।
* ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨਾਲ ਮੇਲ: ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਉਸੇ ਵਿਚਾਰ ਦੀ ਪ੍ਰੌੜ੍ਹਤਾ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਲੜਾਈ ਉਦੋਂ ਤੱਕ ਜਾਰੀ ਰਹੇਗੀ ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਇੱਕ ਇਨਸਾਨ ਦੁਆਰਾ ਦੂਜੇ ਇਨਸਾਨ ਦਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਬੰਦ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ—ਚਾਹੇ ਉਹ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਹੋਵੇ, ਚਾਹੇ ਅੱਜ ਦਾ ਦੇਸੀ ਪੂੰਜੀਪਤੀ ਜਾਂ ਲੋਟੂ ਨਿਜ਼ਾਮ।
ਪੁਸਤਕ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਜ਼ਬੂਤ ਪੱਖ: ਅਜੋਕੇ ਦੌਰ ਨਾਲ ਸਾਂਝ
ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੀ ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਪੜ੍ਹਦਿਆਂ ਪਾਠਕ ਨੂੰ ਸਮਝ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਵੀ ਜੇਲਾਂ ਵਿੱਚ ਦਲਿਤ, ਆਦਿਵਾਸੀ ਅਤੇ ਮੁਸਲਮਾਨ ਹੀ ਕਿਉਂ ਵੱਧ ਹਨ? ਮੈਡੀਕਲ ਜਾਂ ਇੰਜੀਨੀਅਰਿੰਗ ਕਾਲਜਾਂ ਵਿੱਚ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੇ ਬੱਚੇ ਆਪਣੀ ਆਬਾਦੀ ਦੇ ਅਨੁਪਾਤ ਮੁਤਾਬਕ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਹਨ? ਕਿਉਂਕਿ ਸਦੀਆਂ ਪੁਰਾਣੀ ਜਾਤੀ ਵਿਵਸਥਾ ਨੇ ਹੁਣ 'ਆਧੁਨਿਕ ਪੂੰਜੀਵਾਦ'ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਲਿਆ ਹੈ। ਜਿਹੜੇ ਕੱਲ੍ਹ ਜ਼ਮੀਨਾਂ ਦੇ ਮਾਲਕ ਸਨ, ਉਹ ਅੱਜ ਬੈਂਕਾਂ, ਫੈਕਟਰੀਆਂ ਅਤੇ ਕਾਰਪੋਰੇਟਾਂ ਦੇ ਮਾਲਕ ਹਨ।
ਲੇਖਕ ਬਹੁਤ ਬੇਬਾਕੀ ਨਾਲ ਸਵਰਣ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਦੇ ਉਸ ਡਰ ਨੂੰ ਨੰਗਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਹਿੰਦੂ-ਮੁਸਲਮਾਨ ਦੇ ਦੰਗਿਆਂ ਵਿੱਚ ਉਲਝਾ ਕੇ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਜੋ ਕੋਈ ਵੀ ਗਰੀਬ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਾਂ ਮਿਡਲ ਕਲਾਸ ਇਨਸਾਨ ਆਪਣੇ ਆਰਥਿਕ ਹੱਕਾਂ, ਸਕੂਲਾਂ, ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਅਤੇ ਮਿਹਨਤ ਦੀ ਲੁੱਟ ਬਾਰੇ ਸਵਾਲ ਨਾ ਪੁੱਛ ਸਕੇ।
ਸਿੱਟਾ : ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਦੁਆਰਾ ਲਿਖੀ 'ਕਬੀਰ: ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਬਾਣੀ' ਮਹਿਜ਼ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਨਹੀਂ, ਬਲਕਿ ਅਜੋਕੇ ਨਿਜ਼ਾਮ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਇੱਕ 'ਮੈਨੀਫੈਸਟੋ' (ਐਲਾਨਨਾਮਾ) ਹੈ। ਇਹ ਪੁਸਤਕ ਹਰ ਉਸ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਜੋ ਅੱਖਾਂ ਖੋਲ੍ਹ ਕੇ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਦੇਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਸੜਕਾਂ ਬਣਾਉਣ ਵਾਲੇ,ਚਮੜਾ ਕਾਮਿਆਂ,ਕਪੜਾ ਬੁਣਨ ਵਾਲਿਆਂ,ਕੋਠੀਆਂ ਚਿਣਨ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਝਾੜੂ ਲਾਉਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਜਾਤ ਅਤੇ ਜਮਾਤ ਦੇ ਰਿਸ਼ਤੇ ਨੂੰ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ।
ਇਹ ਕਿਤਾਬ ਹੋਕਾ ਦਿੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜੇਕਰ ਅਸੀਂ ਬਰਾਬਰੀ ਅਤੇ ਇਨਸਾਫ਼ ਦੀ ਲੜਾਈ ਛੱਡ ਦਿੱਤੀ, ਤਾਂ ਸਮਾਜ ਵਹਿਸ਼ੀ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਹ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਸਰਦਾਰੀ ਦਾ ਉਹ ਸੁਪਨਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਕਬੀਰ ਜੀ ਨੇ ਬੁਣਿਆ, ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਜੀਵਿਆ, ਅਤੇ ਜਗਦੀਸ਼ ਲਾਲ ਨੇ ਇਸ ਪੁਸਤਕ ਰਾਹੀਂ ਮੁੜ ਸਾਡੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿੱਚ ਫੜਾਇਆ ਹੈ। ਇਹ ਲਿਖਤ ਹਰ ਚੇਤੰਨ ਮਨੁੱਖ ਲਈ ਇੱਕ ਲਾਜ਼ਮੀ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
गुर्दे की पथरी अब एक आम मर्ज़ हो गया है. पथरी की वजह से नाक़ाबिले बर्दाश्त दर्द होता है. पेशाब में जलन होती है. इसकी वजह से गुर्दों को नुक़सान हो सकता है.
चिकित्सकों के मुताबिक़ पेशाब में कैल्शियम, ऑक्सालेट, यूरिक एसिड और सिस्टीन जैसे पदार्थ इकट्ठे होकर क्रिस्टल बन जाते हैं. फिर ये क्रिस्टल गुर्दे से जुड़कर रफ़्ता-रफ़्ता पथरी का रूप इख़्तियार कर लेते हैं. इनमें 80 फ़ीसद पथरी कैल्शियम से बनी होती है और कुछ पथरी कैल्शियम ऑक्सालेट और कुछ कैल्शियम फ़ॉस्फ़ेट से बनी होती हैं. बाक़ी पथरी यूरिक एसिड, संक्रमण और सिस्टीन से बनी होती हैं.
पथरी के कई इलाज हैं. आज हम कुछ ऐसे इलाज के बारे में बता रहे हैं, जिनसे लोगों को पथरी से निजात मिली है.
पथरी के मरीज़ को कितने दिन में इससे निजात मिलती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि गुर्दे में कितनी और किस आकार की पथरियां हैं. इसके साथ ही परहेज़ भी बहुत मायने रखता है. मसलन पथरी के मरीज़ को कैल्शियम और आयरन से बनी चीज़ें कम कर देनी चाहिए. इसके साथ ही पानी ज़्यादा से ज़्यादा पीना चाहिए.
ज़ैतून, शहद और नींबू
एक गिलास पानी में एक चम्मच ज़ैतून का तेल, एक चम्मच शहद और एक नींबू का रस मिलाकर रोज़ पीने से पथरी टूटकर पेशाब के साथ जिस्म से बाहर निकल जाती है.
खीरा
देसी खीरा पथरी के मरीज़ के लिए बहुत फ़ायदेमंद है. छिलके समेत देसी खीरा ज़्यादा से ज़्यादा खाना चाहिए. इससे भी पथरी टूटकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है.
मूली
मूली भी पथरी के मरीज़ के लिए बहुत फ़ायदेमंद है. सब्ज़ी या सलाद के रूप में ज़्यादा से ज़्यादा मूली खानी चाहिए. इससे भी पथरी टूटकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है.
ख़रबूज़ा
एक ख़रबूज़े को छिलके और बीजों समेत मिक्सर में बारीक पीस लें. इसे एक साथ पूरा चम्मच से खा लें. चाहें तो इसमें थोड़ी सी चीनी भी मिला सकते हैं. इससे भी पथरी टूटकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है.
सोडा
सोडा भी पथरी के मरीज़ के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है. लगातार सोडा पीने से पथरी टूटकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है.
अब बात करते हैं होम्योपैथी दवा की. Berberis Vulgaris Mother Tincture Q की पांच-पांच बूंदें दिन में तीन बार लेने से पथरी टूटकर पेशाब के साथ जिस्म से बाहर निकल जाती है.
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.
सोडा भी पथरी के मरीज़ के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है. लगातार सोडा पीने से पथरी टूटकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है.
अब बात करते हैं होम्योपैथी दवा की. Berberis Vulgaris Mother Tincture Q की पांच-पांच बूंदें दिन में तीन बार लेने से पथरी टूटकर पेशाब के साथ जिस्म से बाहर निकल जाती है.
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.
फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जिससे व्यक्ति की ज़िन्दगी बहुत बुरी तरह प्रभावित हो जाती है. वह अपनी पसंद की मिठाइयां, फल, आलू, अरबी और कई तरह की दूसरी चीज़ें नहीं खा पाता. इसके साथ ही उसे तरह-तरह की दवाएं भी खानी पड़ती हैं. दवा कोई भी नहीं खाना चाहता, जिसे मजबूरन खानी पड़ती हैं, इससे उसका ज़ायक़ा ख़राब हो जाता है. इससे व्यक्ति और ज़्यादा परेशान हो जाता है. पिछले कई दिनों से हम शुगर के रूहानी और घरेलू इलाज के बारे में अध्ययन कर रहे हैं. हमने शुगर के कई मरीज़ों से बात की. इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो महंगे से महंगा इलाज कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ. कई ऐसे लोग भी मिले, जिन्होंने घरेलू इलाज किया और बेहतर महसूस कर रहे हैं. शुगर के मरीज़ डॉक्टरों से दवा तो लेते ही हैं. लेकिन हम आपको ऐसे इलाज के बारे में बताएंगे, जिससे मरीज़ को दवा की ज़रूरत ही नहीं रहती.
पहला इलाज है जामुन
जी हां, जामुन शुगर का सबसे बेहतरीन इलाज है. अमूमन सभी पद्धतियों की शुगर की दवाएं जामुन से बनाई जाती हैं. बरसात के मौसम में जामुन ख़ूब आती हैं. इस मौसम में दरख़्त जामुन से लदे रहते हैं. जब तक मौसम रहे, शुगर के मरीज़ ज़्यादा से ज़्यादा जामुन खाएं. साथ ही जामुन की गुठलियों को धोकर, सुखाकर रख लें. क्योंकि जब जामुन का मौसम न रहे, तब इन गुठलियों को पीसकर सुबह ख़ाली पेट एक छोटा चम्मच इसका चूर्ण फांक लें. जामुन की चार-पांच पत्तियां सुबह और शाम खाने से भी शुगर कंट्रोल में रहती है. जामुन के पत्ते सालभर आसानी से मिल जाते हैं. जिन लोगों के घरों के आसपास जामुन के पेड़ न हों, तो वे जामुन के पत्ते मंगा कर उन्हें धोकर सुखा लें. फिर इन्हें पीस लें और इस्तेमाल करें. इसके अलावा मिट्टी के मटके में जामुन की छोटी-छोटी कुछ टहनियां डाल दें और उसका पानी पिएं. इससे भी फ़ायदा होगा.
दूसरा इलाज है नीम
नीम की सात-आठ हरी मुलायम पत्तियां सुबह ख़ाली पेट चबाने से शुगर कंट्रोल में रहती है. ध्यान रहे कि नीम की पत्तियां खाने के दस-पंद्रह मिनट बाद नाश्ता ज़रूर कर लें. नीम की पत्तियां आसानी से मिल जाती हैं.
तीसरा इलाज है अमरूद
रात में अमरूद के दो-तीन पत्तों को धोकर कूट लें. फिर कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में भिगोकर रख दें. ध्यान रहे कि बर्तन धातु का न हो. सुबह ख़ाली पेट इसे पीने से शुगर कंट्रोल में रहती हैं.
ये तीनों इलाज ऐसे हैं, जो आसानी से मुहैया हैं. शुगर का कोई भी मरीज़ इन्हें अपनाकर राहत पा सकता है. इन तीनों में से कोई भी इलाज करने के एक माह के बाद शुगर का टेस्ट करा लेने से मालूम हो जाएगा कि इससे कितना फ़ायदा हुआ है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
माइग्रेन यानी अधकपार यानी आधे सिर का दर्द. माइग्रेन से पीड़ित व्यक्ति को बार-बार सिर में तेज़ दर्द होता है. आमतौर पर यह दर्द आधे सिर में होता है और रह-रहकर उठता है. हालांकि कई लोगों को पूरे सिर में भी दर्द होता है. माइग्रेन का मरीज़ तेज़ रौशनी और तेज़ आवाज़ को बर्दाश्त नहीं कर पाता. सिरदर्द की वजह से वह चिड़चिड़ा हो जाता है.
माइग्रेन का इलाज हमारे घर में ही मौजूद है. अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ सौंफ़ लें. जितनी भी सौंफ़ ली हो, उसमें से आधी सौंफ़ को देसी घी में हल्का सुनहरा होने तक भून लें. ठंडा होने पर भुनी हुई सौंफ़ को कच्ची सौंफ़ में मिला लें. इसे किसी डिब्बे या जार में भरकर रख लें. दिन में तीन से चार बार तक इसे खाएं. इंशा अल्लाह कुछ दिन में फ़र्क़ महसूस होने लगेगा.
हमने अपने बचपन से लेकर अब तक माइग्रेन के बहुत से मरीज़ों को इस इलाज से ठीक होते हुए देखा है. हमारी प्यारी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान ने हमें ये इलाज बताया था.
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.
हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दर्द से परेशान है. किसी के पूरे जिस्म में दर्द है, किसी की पीठ में दर्द है, किसी के घुटनों में दर्द है और किसी के हाथ-पैरों में दर्द है. हालांकि दर्द की कई वजहें होती हैं. इनमें से एक वजह यूरिक एसिड भी है.
दरअसल, यूरिक एसिड एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो खाद्य पदार्थों के पाचन से पैदा होता है और इसमें प्यूरिन होता है. जब प्यूरिन टूटता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. किडनी यूरिक एसिड को फ़िल्टर करके इसे पेशाब के ज़रिये जिस्म से बाहर निकाल देती है. जब कोई व्यक्ति अपने खाने में ज़्यादा मात्रा में प्यूरिक का इस्तेमाल करता है, तो उसका जिस्म यूरिक एसिड को उस तेज़ी से जिस्म से बाहर नहीं निकाल पाता. इस वजह से जिस्म में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. ऐसी हालत में यूरिक एसिड ख़ून के ज़रिये पूरे जिस्म में फैलने लगता है और यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों में जमा हो जाते हैं, जिससे जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से गठिया भी हो जाता है. जिस्म में असहनीय दर्द होता है. इससे किडनी में पथरी भी हो जाती है. इसकी वजह से पेशाब संबंधी बीमारियां पैदा हो जाती हैं. मूत्राशय में असहनीय दर्द होता है और पेशाब में जलन होती है. पेशाब बार-बार आता है. यह यूरिक एसिड स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देता है.
यूरिक एसिड से बचने के लिए अपने खान-पान पर ख़ास तवज्जो दें. दाल पकाते वक़्त उसमें से झाग निकाल दें. कोशिश करें कि दाल कम इस्तेमाल करें. बिना छिलकों वाली दालों का इस्तेमाल करना बेहतर है. रात के वक़्त दाल, चावल और दही आदि खाने से परहेज़ करें. हो सके तो फ़ाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें.
जौ
यूरिक एसिड से निजात पाने के लिए जौ का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें. जौ की ख़ासियत है कि यह यूरिक एसिड को सोख लेता है और उसे जिस्म से बाहर करने में कारगर है. इसलिए जौ को अपने रोज़मर्रा के खाने में ज़रूर शामिल करें. गर्मियों के मौसम में जौ का सत्तू पी सकते हैं, जौ का दलिया बना सकते हैं, जौ के आटे की रोटी बनाई जा सकती है.
ज़ीरा
यूरिक एसिड के मरीज़ों के लिए ज़ीरा भी बहुत फ़ायदेमंद है. ज़ीरे में आयरन, कैल्शियम, ज़िंक और फ़ॉस्फ़ोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट उच्च मात्रा में मौजूद होता है, जो यूरिक एसिड की वजह से होने वाले जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है. यह टॉक्सिंस को जिस्म से बाहर करने में भी मददगार है.
नींबू
नींबू में मौजूद साइट्रिक एसिड शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ने से रोकता है. इसलिए नींबू का इस्तेमाल करना चाहिए.
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.













