डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
घुड़सवारी एक खेल ही नहीं है, बल्कि यह एक कला है. यह एक ऐसी कला है, जिसमें व्यक्ति घोड़े की पीठ पर सधकर बैठता और फिर उसकी सवारी करता है. इसमें सवार को पूरी तल्लीनता से काम लेना होता है, क्योंकि ज़रा सी भी चूक होते ही वह घोड़े की पीठ से सीधा नीचे गिर जाता है. घुड़सवारी कब से शुरू हुई, इसकी कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि इंसान हज़ारों सालों से घोड़े की सवारी कर रहा है. क़ुरआन में भी इसका ज़िक्र मिलता है.

घुड़सवारी सिर्फ़ मर्दों का ही शग़ल नहीं है, औरतें भी बख़ूबी घुड़सवारी करती रही हैं. इस्लामी तारीख़ में ऐसी औरतों का ज़िक्र बड़ी इज़्ज़त से किया जाता है, जो बहुत उम्दा घुड़सवारी किया करती थीं. इनमें हज़रत नुसायबाह बिन्त काब रज़ियाल्लाहु अन्हा का नाम प्रमुख है. उन्हें उम्म और अम्मारा नाम से भी जाना जाता है. वे मदीना के बानू नज्जर क़बीले से ताल्लुक़ रखती थीं. वे बेहद उम्दा घुड़सवार थीं. उन्होंने दूसरी बैत-उल-अक़ाबा, जंगे-उहुद, जंगे-हुनैन, जंगे-यमामा और जंगे-हुदैबियाह की संधि जैसी कई जंगों में शिरकत की थी. वे जंगे-उहुद में अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की साथी थीं. उन्होंने पैग़म्बर को दुश्मनों के हमले से बचाया था. इसी तरह हज़रत ख़ौला बिन अल अज़वार रज़ियाल्लाहु अन्हा भी अपनी बेमिसाल घुड़सवारी और बहादुरी के लिए जानी जाती हैं. जब उनके भाई को दुश्मनों ने गिरफ़्तार कर लिया, तो वे अपने भाई को छुड़ाने के लिए निकलीं. वे इतनी तेज़ घुड़सवारी करती थीं कि दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे. उन्हें देखकर कोई ये नहीं कह सकता था कि वह औरत हैं, क्योंकि वह मर्दों की तरह ही तेज़ घुड़सवारी करती थीं. सबको यही लगता था कि कोई मर्द घुड़सवारी कर रहा है. जब उनके चेहरे से नक़ाब हटा तो दुश्मन उन्हें देखकर दंग रह गए. उन्होंने इससे पहले किसी औरत को इतनी उम्दा घुड़सवारी करते हुए नहीं देखा था. ये औरतें एक हाथ में तलवार लेकर घुड़सवारी किया करती थीं. दायें हाथ में तलवार होती थी और बायें हाथ में घोड़े की लगाम. एक हाथ से मैदाने-जंग में घुड़सवारी करते देख लोग दांतों टेल उंगलियां दबा लिया करते थे.  

इस्लामी तारीख़ में ऐसी औरतों की बहुत सी मिसालें हैं, जो बेहद शानदार घुड़सवारी किया करती थीं. उन्हें बाक़ायदा घुड़सवारी सिखाई जाती थी, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह उनके काम आ सके. यह इस बात की भी दलील है कि इस्लाम ने औरतों को किसी भी जायज़ काम से रोका नहीं है. आज जो लोग लड़कियों और औरतों पर बिना वजह की पाबंदियां लगाते हैं, दरअसल वे इस्लाम को जानते ही नहीं हैं. औरतों को कमतर समझने की सोच ने मुस्लिम औरतों की क़ाबिलियत के क़िस्सों को पुरानी किताबों में ही दफ़न करके रख दिया है. वे औरतों की दानिशमंदी, उनकी बहादुरी और उनकी क़ाबिलियत की तारीफ़ करना ही नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से वे औरतों को घर की चहारदीवारी तक क़ैद करके नहीं रख पाएंगे. आज इस बात की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है कि इस्लाम की बुनियादी तालीम को जन-जन तक पहुंचाया जाए. लोगों को बताया जाए कि इस्लाम में भी औरतों को अपनी क़ाबिलियत दिखाने का पूरा मौक़ा दिया गया है.

शानदार घुड़सवारी करती बेटियां 
यह ख़ुशनुमा बात है कि तमाम पाबंदियों के बावजूद आज मुस्लिम समाज की लड़कियां आगे आ रही हैं.  वे अपनी कामयाबी के परचम लहरा रही हैं. ऐसी ही एक घुड़सवार हैं साइमा सैयद, जो राजस्थान के सीकर जिले के क़स्बे खाटू की रहने वाली हैं. साइमा ने एक्वेस्ट्रियन फ़ैडरेशन ऑफ़ इंडिया और ऑल इंडिया राजस्थानी हॉर्स सोसाइटी के गुजरात चेप्टर के तत्वावधान में 17-18 फ़रवरी 2021 को अहमदाबाद में आयोजित ऑल इंडिया ओपन ऐंड्यूरेन्स प्रतियोगिता में शिरकत की थी. उन्होंने 80 किलोमीटर के इस मुक़ाबले में देश के कई विख्यात घुड़सवारों को टक्कर देते हुए कांस्य पदक जीता था. इसके साथ ही उन्होंने इस मुक़ाबले में क्वालीफ़ाई भी किया था. अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर वह देश की ऐसी पहली महिला घुड़सवार बन गईं, जिसने वन स्टार केटेगरी हासिल की है. इससे पहले उन्होंने 40 किलोमीटर, 60 किलोमीटर और 80 किलोमीटर के मुक़ाबलों में पदक हासिल करते हुए क्क्वालीफ़ाई किया था. वन स्टार राइडर बनने के लिए 40 और 60 किलोमीटर की एक-एक और 80 किलोमीटर के दो मुक़ाबलों में क्वालीफ़ाई करना होता है.

क़ाबिले- ग़ौर बात यह है कि घुड़सवारी के एंड्यूरेंस मुक़ाबले में पुरुषों और महिलाओं के अलग-अलग मुक़ाबले नहीं होते, बल्कि महिलाओं को भी पुरुषों के साथ ही जद्दोजहद करके जीत हासिल करनी होती है. इससे पहले साइमा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 'वंडर वूमेन' का ख़िताब हासिल किया था. इसके साथ ही वह शो जम्पिंग और हेक्स आदि मुक़ाबलों में भी हिस्सा लेकर कई पदक जीत चुकी हैं. साइमा को बचपन से ही घुड़सवारी का शौक़ था. उन्हें बख़ूबी आता है कि कैसे घोड़ों को दौड़ाना है और कैसे उन्हें क़ाबू में करना है. घुड़सवारी की उनकी शुरुआत स्कूल से हो गई थी. उन्होंने बाक़ायदा घुड़सवारी का प्रशिक्षण लिया है. उन्होंने महज़ दस साल की उम्र में 100 मीटर की दौड़ में अपना पहला पदक जीता था. उसके बाद उन्होंने बहुत से मुक़ाबलों में हिस्सा लिया और तक़रीबन 50 पदक जीतकर अपने ख़ानदान और शहर का नाम रौशन किया. 

पिछले दिसम्बर में ग़ाज़ियाबाद में आयोजित उत्तर प्रदेश राज्य स्तरीय घुड़सवारी प्रतियोगिता में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा कुलसुम सलाहुद्दीन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया.
दक्षिण लंदन की ख़दीजा मल्लाह की गिनती इस समय दुनिया की चुनिंदा महिला घोड़सवारों में होती है. 21 साल की ख़दीजा ब्रिटिश मुस्लिम महिलाओं की प्रेरणा बनी हुई हैं. कमाल यह है कि यह हिजाब में घुड़सवारी करती हैं.

दरअसल लड़कियों और महिलाओं की कामयाबी में इनके परिवार वालों का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. उनकी मां और घर की दूसरी औरतें उन पर घर के कामकाज का बोझ नहीं डालतीं. इस तरह उन्हें अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दूसरी चीज़ों के लिए भी काफ़ी वक़्त मिल जाता है. उनके पिता, भाई व परिवार के अन्य पुरुष भी उन पर पाबंदियां नहीं लगाते, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ही करते हैं. इस तरह परिजनों का साथ मिलने पर उनके कुछ कर गुज़रने के उनके जज़्बे को पंख मिल जाते हैं. 

पुरुषों के वर्चस्व वाले इस खेल में महिलाएं बहुत कम हैं. लेकिन कहते हैं कि वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. वक़्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है. अब घुड़सवारी में भी लड़कियां आगे आ रही हैं. देश में ऐसी कई महिला घुड़सवार हैं, जो अपने शानदार प्रदर्शन से अपने घर, शहर, राज्य और देश का नाम रौशन कर रही हैं. पिछले सितम्बर माह में भारतीय घुड़सवारी टीम ने जॉर्डन की वादी रम में आयोजित महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय टेंट पेगिंग चैम्पियनशिप में पदार्पण में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रौशन किया. भारतीय टीम में रितिका दहिया, प्रियंका भारद्वाज और खुशी सिंह शामिल थीं. भारतीय घुड़सवारी महासंघ के मुताबिक़ इस प्रतियोगिता में कुल 14 देशों ने हिस्सा लिया था. भारतीय टीम ने पदार्पण में ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और 136 अंक हासिल किए. इस प्रतियोगिता में 170.5 अंक के साथ दक्षिण अफ्रीका की टीम पहले और 146 अंक के साथ ओमान की टीम दूसरे स्थान पर रही. प्रतियोगिता के पहले दिन कप्तान दहिया और भारद्वाज ने व्यक्तिगत और पेयर्स लांस स्पर्धा में हिस्सा लिया. टीम पहले दिन के आख़िर में सातवें स्थान पर चल रही थी. दूसरे दिन भारत ने व्यक्तिगत और टीम स्वॉर्ड मुक़ाबले में हिस्सा लिया और 24 अंक से दूसरा स्थान हासिल कर लिया. व्यक्तिगत स्पर्धा में खुशी सिंह ने 18 अंक से पहला स्थान हासिल किया. उन्होंने ने भारत के लिए एक स्वर्ण पदक, रजत पदक और एक कांस्य पदक जीता. 

सुदीप्ति हजेला
मध्य प्रदेश के इंदौर की सुदीप्ति हजेला भी शानदार घुड़सवार हैं. साल 2020 में उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया था. साल 2017 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें एकलव्य पुरस्कार से सम्मानित किया. उन्होंने शौक़िया घुड़सवारी सीखी थी, जो बाद में उनका करियर बन गई. साल 2013 में पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उन्होंने अपना पहला नेशनल शो किया था, जिसमें उन्हें कांस्य पदक जीता था. उन्होंने 52 राष्ट्रीय और 7 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं.

सुदीप्ति हजेला के मुताबिक़ घुड़सवारी में तीन मूव होते हैं, जिनमें शो जंपिंग, इवेंटिंग और ड्रैसेस शामिल हैं. वह ड्रैसेस करती हैं. ड्रैसेस बेसिकली बहुत ही क्लासिकल फ़ॉर्म ऑफ़ हॉर्स राइडिंग है, जिसमें घोड़े के साथ बेस्ट परफ़ॉर्म करना होता है. प्रदर्शन के आधार पर जज 1 से लेकर 10 के बीच के अंक देते हैं, जिसे सबसे ज़्यादा अंक मिलते हैं, वही विजेता होता है. 

श्वेता हुड्डा
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा की पत्नी व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की पुत्रवधू श्वेता हुड्डा भी बहुत अच्छी घुड़सवार हैं. उन्होंने भारतीय अश्वारोही संघ द्वारा 2 नवंबर 2019 को दिल्ली में आयोजित ड्रैसेस व‌र्ल्ड चैलेंज चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम ऊंचा किया था. इस प्रतियोगिता में 50 से ज़्यादा देशों के घुड़सवारों ने हिस्सा लिया था. उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे ज़्यादा 62.426 अंक हासिल करते हुए पहला स्थान हासिल किया, जबकि एमएस राठौर 62.353 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. इस खेल में भी महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी लिहाज़ से पुरुषों से कम नहीं हैं. इससे पहले उन्होंने साल 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर दो स्वर्ण पदक हासिल किए थे. साल 2018 में ही उन्होंने सीनियर व‌र्ल्ड चैलेंज ड्रैसेस रिप्ले में रजत पदक और इसी साल 2018 एफ़ईआई वर्ल्ड चैंलेंज ड्रेसेज रिप्ले में रजत पदक जीता था. साल 2014 में उन्होंने मीडियम ड्रेसेज में रजत पदक हासिल किया था. 

ज्योतिका हसन वालिया
महज़ 14 साल की उम्र से घुड़सवारी करने वाली ज्योतिका हसन वालिया भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की घुड़सवार हैं. वह साल 1996 में जूनियर भारतीय टीम की कप्तान रह चुकी हैं. उत्तराखंड की रहने वाली ज्योतिका ने दिसम्बर 2019 में दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड जंपिंग चैंपियनशिप में 130 मीटर की ऊंचाई में घुड़सवारी करके कांस्य पदक जीता था. इससे पहले उन्होंने अप्रैल 2017 में बेल्ज़ियम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चौथा स्थान हासिल किया था.

ये सब महिला घुड़सवार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हुई हैं. इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए इन्होंने कड़ी मेहनत की है. अगर लड़कियों को खेलों व अन्य क्षेत्रों में काम करने का मौक़ा मिले, तो वे साबित कर देती हैं कि वह भी किसी से कम नहीं हैं. बस ज़रूरत होती है उन्हें काम करने का मौक़ा देने की और उनका हौसला बढ़ाने की. उन्हें बस रास्ते पर चलने की इजाज़त भर मिल जाए. फिर वह ख़ुद रास्ता तय कर लेती हैं और रास्ते में आने वाली तमाम तरह की रुकावटों का सामना भी कर लेती हैं. वे जानती हैं कि वे अपनी मंज़िल हासिल कर सकती हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार : आवाज़       


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
माइग्रेन यानी अधकपार यानी आधे सिर का दर्द. माइग्रेन से पीड़ित व्यक्ति को बार-बार सिर में तेज़ दर्द होता है. आमतौर पर यह दर्द आधे सिर में होता है और रह-रहकर उठता है. हालांकि कई लोगों को पूरे सिर में भी दर्द होता है. माइग्रेन का मरीज़ तेज़ रौशनी और तेज़ आवाज़ को बर्दाश्त नहीं कर पाता. सिरदर्द की वजह से वह चिड़चिड़ा हो जाता है.

माइग्रेन का इलाज हमारे घर में ही मौजूद है. अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ सौंफ़ लें. जितनी भी सौंफ़ ली हो, उसमें से आधी सौंफ़ को देसी घी में हल्का सुनहरा होने तक भून लें. ठंडा होने पर भुनी हुई सौंफ़ को कच्ची सौंफ़ में मिला लें. इसे किसी डिब्बे या जार में भरकर रख लें. दिन में तीन से चार बार तक इसे खाएं. इंशा अल्लाह कुछ दिन में फ़र्क़ महसूस होने लगेगा.

हमने अपने बचपन से लेकर अब तक माइग्रेन के बहुत से मरीज़ों को इस इलाज से ठीक होते हुए देखा है. हमारी प्यारी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान ने  हमें ये इलाज बताया था.   
ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें.

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर में आबादी लगातार बढ़ रही है. आबादी को रहने के लिए घर भी चाहिए और पेट भरने के लिए अनाज भी. बसावट के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, खेतों की जगह बस्तियां बसाई जा रही हैं. ऐसे में लगातार छोटे होते खेत आबादी का पेट कैसे भर पाएंगे.  इंसान को ज़िन्दा रहने के लिए हवा और पानी के अलावा भोजन भी चाहिए. ज़रा सोचिए, जब कृषि भूमि कम हो जाएगी, तब अनाज, फल और सब्ज़ियां कहां से आएंगी. ऐसी हालत में खेतीबाड़ी की ऐसी तकनीक की ज़रूरत होगी, जिससे बिना मिट्टी के भी फ़सलें उगाई जा सकें. काफ़ी अरसे से कृषि वैज्ञानिक ऐसी तकनीक की खोज में जुटे हैं, जिनके ज़रिये उन हालात में भी फ़सलें उगाई जा सकें, जब कृषि योग्य ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध न हों. कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज ऐसी कई तकनीक मौजूद हैं, जिनके ज़रिये कम पानी और बंजर ज़मीन में भी फ़सलें लहलहा रही हैं. इतना ही नहीं, अब तो बिना मिट्टी के भी फ़सलें उगाई जा रही हैं. अमेरिका, ऒस्ट्रेलिया, चीन, जापान, इज़राइल, थाइलैंड, कोरिया, इंडोनेशिया और मलेशिया आदि देशों में बिना मिट्टी के सब्ज़ियां उगाई जा रही हैं. इन देशों की देखादेखी और देश भी इस तकनीक को अपना रहे हैं. इस तकनीक के ज़रिये टमाटर, गोभी, बैंगन, भिंडी, करेला, मिर्च, ककड़ी, शिमला मिर्च, खीरा और पालक व अन्य़ पत्तेदार सब्ज़ियों की खेती की जा रही है.

बिना मिट्टी वाली खेती में मिट्टी की जगह ठोस पदार्थ के रूप में बालू, बजरी, धान की भूसी, कंकड़, लकड़ी का चूरा, पौधों का वेस्ट जैसे नारियल का जट्टा, जूट आदि का इस्तेमाल किया जाता है. जूट और नारियल के जट्टे में पानी सोखने की क्षमता ज़्यादा होती है. यह भुरभुरा होता है, जिससे जड़ों को हवा मिलती रहती है. बिना मिट्टी के खेती करने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक्स यानी जलकृषि कहा जाता है. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. मिट्टी की जगह पानी ही खेती की बुनियाद होता है. पौधों को पानी से भरे एक बर्तन में उगाया जाता है. पौधों को बढ़ने के लिए जिन पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, उन्हें पानी में मिला दिया जाता है. पोषक तत्वों और ऑक्सीज़न को पौधों की जड़ों तक पहुंचाने के लिए एक पतली नली का इस्तेमाल किया जाता है. जलकृषि दो तरीक़ों से की जाती है. पहली है घोल विधि और दूसरी माध्यम विधि. घोल विधि के तहत पौधों को पानी से भरे एक बर्तन में रखा जाता है और फिर पोषक तत्वों का घोल प्रवाहित किया जाता है. पौधों की जड़ों तक ऑक्सीज़न और पोषक तत्वों को पहुंचाया जाता है. घोल विधि तीन तरह की है- स्थैतिक घोल विधि, सतत बहाव विधि और एयरोपोनिक्स. स्थैतिक घोल विधि में पौधों को पानी से भरे बर्तन में रखा जाता है और फिर पोषक तत्वों के घोल को धीरे-धीरे नली से प्रवाहित किया जाता है. जब पौधे कम हों, तो यह विधि इस्तेमाल में लाई जाती है. ऐसा होने से जड़ों को ऑक्सीज़न भी मिलती रहती है. सतत बहाव घोल विधि के तहत पोषक तत्वों के घोल को लगातार जड़ों की तरफ़ प्रवाहित किया जाता है. जब बड़े से बर्तन में ज़्यादा पौधे उगाने हों, तो इसका इस्तेमाल करते हैं. इन्हें डीप वाटर विधि भी कहा जाता है. अमूमन एक हफ़्ते बाद जब घोल निर्धारित स्तर से कम हो जाता है, तो पानी और पोषक तत्वों को इसमें मिला दिया जाता है. एयरोपोनिक्स यानी बिना मिट्टी के हवा और नमी वाले वातावरण में फलों, सब्ज़ियों और फूलों की फ़सल उगाना. इस तकनीक के तहत पौधों को प्लास्टिक के पैनल के ऊपर बने छेदों में टिकाया जाता है और उनकी जड़ें हवा में लटका दी जाती हैं. सबसे नीचे पानी का टैंक रखा जाता है, जिसमें घुलने वाले पोषक तत्व डाल दिए जाते हैं. टैंक में लगे पंप के ज़रिये पौधों की हवा में लटकी जड़ों पर पानी का छिड़काव किया जाता है. पानी में मिले पोषक तत्वों से ख़ुराक और हवा से ऑक्सीज़न मिलने की वजह पौधे बड़ी तेज़ी से बढ़ते हैं और काफ़ी कम वक़्त में भरपूर पैदावार देते हैं. कमरे में होने वाली इस खेती में रौशनी के लिए एलईडी बल्ब इस्तेमाल किए जाते हैं.

वर्टिकल फ़ार्मिंग भी एक बेहतर विकल्प है. इसमें मिट्टी की ज़रूरत नहीं होती. वर्टिकल फ़ार्म एक बहुमंज़िला ‘ग्रीन हाउस’ है. इस विधि के तहत कमरों में एक बहु-सतही ढांचा खड़ा किया जाता है, जो कमरे की ऊंचाई के बराबर हिसाब से बनाया जाता है. इसकी दीवारें कांच की होती हैं, जिससे सूरज की रौशनी अंदर तक आती है. वर्टिकल यानी खड़े ढांचे के सबसे निचले ख़ाने में पानी से भरा टैंक रख दिया जाता है. उसमें मछलियां डाली जाती हैं. मछलियों की वजह से पानी में नाइट्रेट की अच्छी ख़ासी मात्रा होती है, जो पौधों के जल्दी बढ़ने में मददगार है. टैंक के ऊपरी ख़ानों में पौधों के छोटे-छोटे बर्तन रख दिए जाते हैं. टैंक से पंप के ज़रिये इस बर्तन तक पानी पहुंचाया जाता है.

जलकृषि में ऐसे पोषक तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है, जो पानी में घुलनशील होते हैं. इनका रूप अकार्बनिक और आयनिक होता है. कैल्सियम, मैग्निशियम और पोटैशियम प्राथमिक घुलनशील तत्व हैं. वहीं प्रमुख घोल के रूप में नाइट्रेट, सल्फ़ेट और डिहाइड्रोजन फ़ॊस्फ़ेट इस्तेमाल में लाए जाते हैं. पोटेशियम नाइट्रेट, कैल्सियम नाइट्रेट, पोटेशियम फ़ॊस्फ़ेट और मैग्निशियम सल्फ़ेट रसायनों का भी इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा आयरन, मैगनीज़, कॉपर, ज़िंक, बोरोन, क्लोरीन और निकल का भी इस्तेमाल होता है. इस तकनीक की ख़ासियत यह है कि इसमें मिट्टी के बिना और कम पानी के इस्तेमाल से सब्ज़ियां उगाई जाती हैं. इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए इसके ज़रिये छत पर भी खेती की जा सकती है. इस तकनीक की खेती में मेहनत कम लगती है. फ़सल की बुआई के लिए खेतों में जुताई करने और सिंचाई की भी ज़रूरत नहीं है. खरपतवान निकालने की मेहनत से भी आज़ादी है. इसमें पानी भी बहुत कम लगता है. मिसाल के तौर पर मिट्टी वाले खेत में एक किलो सब्ज़ी उगाने में जितने पानी की ज़रूरत होती है, उतने ही पानी में जलकृषि के ज़रिये सौ किलो से ज़्यादा सब्ज़ियां उगाई जा सकती हैं. इसमें खरपतवार नहीं उगते और फ़सल पर नुक़सानदेह कीटों का भी कोई प्रकोप नहीं होता. ऐसे में कीटनाशकों के छिड़काव की मेहनत और ख़र्च दोनों बच जाते हैं. कीटनाशकों का इस्तेमाल न होने की वजह से सब्ज़ियां पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती हैं और लम्बे वक़्त तक ताज़ी रहती हैं. ये सब्ज़ियां ऒर्गेनिक सब्ज़ियों जैसी ही होती हैं और इनकी गुणवत्ता भी मिट्टी में उगने वाली फ़सल की तुलना में बेहतर साबित हुई है. ग़ौरतलब है कि सामान्य खेती में कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने फ़सलों को ज़हरीला बना दिया है. अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्ज़ियां भी ज़हरीली हो चुकी हैं. इनका सीधा असर सेहत पर पड़ रहा है.

इसके अलावा एक और विधि से बहुत कम पानी और कम मिट्टी में भी सब्ज़ियां उगाई जाती हैं. इस विधि का नाम है ट्रे कल्टीवेशन यानी ट्रे में फ़सल उगाना. इसके तहत ट्रे में हरी जाली बिछाई जाती है. फिर उसमें जूट बिछा दिया जाता है. इसके बाद केंचुए की खाद डाली जाती है. फिर इसमें बीज बो दिए जाते हैं. समय-समय पर इसमें पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाता है. फिर से ट्रे को जाली से ढक दिया जाता है. जाली से ढकी होने की वजह से पौधे कीट-पतंगों से सुरक्षित रहते हैं. राजस्थान में किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं. राज्स्थान में इस तकनीक से खेती हो रही है.

देश के कई हिस्सों में अब बिना मिट्टी के खेती हो रही है. हरियाणा के पानीपत ज़िले के जोशी गांव के किसान अनुज भी बिना मिट्टी के खेती कर रहे हैं. उन्होंने ऒस्ट्रेलिया में बिना मिट्टी वाली खेती देखी और इसका प्रशिक्षण लिया. फिर स्वदेश लौटने पर उन्होंने इस नई तकनीक से खेती शुरू की. वह 15 एकड़ से भी ज़्यादा भूमि पर मिट्टी रहित जैविक खेती कर रहे है.  इस प्रगतिशील किसान का कहना है कि उनके गांव की मिट्टी में खरपतवार बहुत है, जिससे उत्पादन होता है. इसी वजह से उन्होंने मिट्टी रहित खेती की इस तकनीक को अपनाया.  उन्होंने बताया कि इस खेती में मिट्टी की जगह नारियल के अवशेष का इस्तेमाल होता है और इसे छोटी-छोटी थैलियों में डालकर पॊली हाऊस में सब्ज़ी के पौधे उगाए जाते हैं. नारियल के इस अवशेष को खेती के लिए लगातार तीन साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि इस तकनीक से लगातार सात महीनों तक सब्ज़ियों की पैदावार होती है. वह हर तीन साल बाद केरल से नारियल के अवशेष मंगवाते हैं. इसका एक बैग तक़रीबन 5 किलो का होता है, जिसकी क़ीमत 30 रुपये है. उन्होंने बताया कि वह टमाटर, शिमला मिर्च, गोभी, मटर और खीरा आदि सब्ज़ियां उगाते हैं. सब्ज़ियों को बेचने के लिए उन्हें बाज़ार जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. व्यापारी ख़ुद उनके फ़ार्म से सब्ज़ियां ख़रीद कर ले जाते हैं. उन्हें सब्ज़ियों की अच्छी क़ीमत मिलती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले अनिमेष तिवारी अपने घर की छत पर सब्ज़ियां उगाते हैं. वह गोभी, बैंगन,  शिमला मिर्च और चाइनीज़ कैबिज, ब्रोकोली आदि की खेती करते हैं. उन्होंने छत पर एक स्टैंड पर प्लास्टिक के मोटे पाइप रखे हुए हैं, जिनमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ख़ास आकार में छेद किए गए हैं. वह जालीदार बर्तन में नारियल की भूसी डालते हैं. फिर इसी भूसी में सब्ज़ियों के बीज बो देते हैं. इन बर्तनों में पानी डाला जाता है. जब बीज से छोटे पौधे निकलने लगते हैं, तो बर्तन को प्लास्टिक के पाइप में बने छेद पर फिट कर दिया जाता है. इससे उन्हें काफ़ी मुनाफ़ा हो रहा है.

इस तकनीक के ज़रिये अब चारा भी उगाया जाएगा. कम पानी वाले शुष्क इलाक़ों में उगने वाली सेवण घास की पौध भी इस तकनीक से तैयार की जा चुकी है. राजस्थान के वेटरनरी विश्वविद्यालय के पशुधन चारा संसाधन प्रबंधन एवं तकनीक केंद्र के वैज्ञानिकों ने सेवण के बीजों को बिना मिट्टी के धूप, पानी और पोषक तत्वों का इस्तेमाल करके नियंत्रित तापक्रम पर सात दिन की अवधि में सेवण की पौध तैयार की थी.  वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक से तैयार हुई पौध से चारागाह में सेवण घास को पनपाने और हल्के-फुल्के बीजों की बिजाई में आने वाली मुश्किलों से छुटकारा मिल जाएगा. ग़ौरतलब है कि सेवण घास रेगिस्तानी इलाक़ों के पालतू पशुओं गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट और वन्य पशुओं का पौष्टिक आहार है. सेवण का पौधा एक बार पनपने के बाद बूझे का स्वरूप ले लेता है, जो बहुत लंबे वक़्त तक शुष्क क्षेत्र में पौष्टिक एवं स्वादिष्ट चारे का उत्पादन देने में सक्षम होता है. सेवण के बीज परिपक्व होते ही झड़ कर तेज़ हवा और आंधी में उड़ जाते हैं.

जलकृषि के ज़रिये लगातार पैदावार ली जा सकती है और किसी भी मौसम में सब्ज़ियां उगाई जा सकती हैं. इसमें खेती के आधुनिक उपकरणों की भी कोई ज़रूरत नहीं होती. इस तकनीक की एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि फ़सलें प्राकृतिक आपदाओं जैसे ओलावृष्टि, बेमौसमी बारिश और सूखे से भी बची रहती हैं. किसानों को बिना मिट्टी के खेती की यह तकनीक बहुत पसंद आ रही है. मिट्टी पारंपरिक खेती के मु़क़ाबले इसमें लागत बहुत कम आती है, जबकि मुनाफ़ा ज़्यादा होता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों की ज़मीन बंजर है, वे जलकृषि को अपनाकर फ़सलें उगा सकते हैं. कृषि विभाग के अधिकारी किसानों को बिना मिट्टी के खेती करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. हरियाणा के किसानों ने तक़रीबन 1800 एकड़ बंजर ज़मीन में पॊली हाउस बनाए हुए हैं.

जलकृषि वक़्त की ज़रूरत है. दुनिया की आबादी तक़रीबन आठ अरब है, जो लगातार बढ़ ही रही है. अगले एक-दो दशक में आबादी बढ़कर नौ अरब होने की संभावना है. आने वाले दो दशकों में खाद्यान्न उत्पादन में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी होने पर ही लोगों को भोजन मिल पाएगा. फ़िलहाल दुनिया भर में तक़रीबन 25000 लाख टन खाद्यान्न की पैदावार हो रही है, जो भविष्य़ की बढ़ी आबादी के लिए बहुत कम रहेगी. लगातार जलवायु परिवर्तन, बंजर होती ज़मीन, घटती कृषि भूमि, जल संकट को देखते हुए कृषि के नये तरीक़े अपनाकर ही आबादी के लिए खाद्यान्न जुटाया जा सकेगा.

वर्टिकल फ़ार्मिंग के ज़रिये भी किसान कम जगह में सब्ज़ियां उगा सकते हैं. कम जगह, कम लागत, कम मेहनत में अच्छी पैदावार मुनाफ़े का सौदा है. आज़माकर ज़रूर देखें.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.    

इत्र का इतिहास 
इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है. ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.        
चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है. 
क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.

इत्र से मुग़लों का रिश्ता   
मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.
इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.
 
इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है. उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.     
आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था. 

इत्र कैसे बनता है 
इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं. इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है. फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है.  

मिट्टी का इत्र
फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है. ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है. 
यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं. दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.           
 
अगरऊद
कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है. इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50 लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है. 
कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.   
कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15 हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है. 

फूलों की खेती 
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. 

देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-   
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.  
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है. 
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है. 
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है. 
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है. 
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम 
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है. 
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट  दिल्ली में स्थित है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)
साभार आवाज़ 
 

स्टार न्यूज़ एजेंसी की सम्पादक फ़िरदौस ख़ान की सुप्रसिद्ध अभिनेता राकेश श्रीवास्तव जी से ख़ास बातचीत   
कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन  
सुप्रसिद्ध अभिनेता राकेश श्रीवास्तव ने साल 1990 में 'एक लड़का एक लड़की' से हिन्दी सिनेमा में अपना डेब्यू किया था. वे सब टीवी के सीरियल 'लापतागंज' के लल्लन जी के नाम से मशहूर हैं. उन्होंने लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी से ड्रामाटिक आर्ट में डिप्लोमा किया है. वे कई नाटकों और धारावाहिकों में काम कर मुम्बई आए और फिर यहीं के होकर रह गए. वे कहते हैं- 
बचपन से ही फ़ितरत है मुस्कुराने की 
हंसने की और लोगों को हंसाने की

शायद इसीलिए अब वे अपने अभिनय से लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं. जब उनसे गर्मियों की छुट्टियों के बारे में पूछा गया तो उनके चेहरे पर रौनक़ आ गई. बचपन होता ही ऐसा है कि इंसान उसे कभी भूल नहीं पाता. बचपन की यादें सबसे ख़ूबसूरत होती हैं. बचपन में पढ़ाई और खेल के सिवा कोई दूसरा काम भी तो नहीं होता. वे कहते हैं कि आपने बचपन याद दिला दिया. गर्मियों की छुट्टियों के दिन बच्चों के लिए ख़ुशियों के दिन होते हैं. सभी बच्चे छुट्टियों के इस मौसम का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं. मैं भी बचपन में गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार करता था. मेरे पापा रिज़र्व बैंक में कार्यरत थे. अत: तीन-चार साल के बाद अलग-अलग प्रदेश की राजधानी में स्थानान्तरण हुआ करता था. 

वे कहते हैं कि हर गर्मी की छुट्टियों में अपने ददिहाल बाबा-दादी से मिलने गोरखपुर जाया करते थे. मैं अपने दादा जी को बाबा कहता था. जब पापा की नियुक्ति पटना में थी तब हम पानी के जहाज़ से गंगा पार कर महेन्द्रू घाट से सोनपुर जाया करते थे. बचपन में जहाज़ से गंगा पार करने का जो आनन्द मानस पटल पर छपा है, वो याद करके मन रोमांच से भर जाता है. दूर तक पानी ही पानी नज़र आता था. ऊपर नीला अम्बर और नीचे नीला पानी. नीले आसमान के अक्स से पानी नीला दिखाई देता था. आसमान पर जब सफ़ेद बादल होते तो उसके सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते थे. मैं कभी आसमान को देखता, तो कभी नदी के बहते पानी को. इस तरह जहाज़ कब घाट पर पहुंच जाता था, पता ही नहीं चलता था.    

उन्हें बचपन से ही खाने-पीने का बहुत शौक़ था. वे कहते हैं कि बचपन से ही मैं बहुत चटोरा था. सोनपुर पहुंचते ही खाजा खाने के लिए लालायित रहता था. ये मैदे की बहुत ही स्वादिष्ट मिठाई है. गोरखपुर पहुंचने पर बाबा-दादी, चाचा-चाची, बहन सीमा की आंखों में ख़ुशी देखकर हम रास्ते की सारी थकान भूल जाया करते थे. शाम को बाबा घोष कम्पनी चौराहा ले जाया करते और दालमोठ, समोसा और इमरती खिलाते. कभी-कभार घंटाघर रबड़ी-खुरचन खिलाने ले जाते. सुबह-सुबह ही सारे रिश्तेदार मिलने आ जाते थे और हम उनके बच्चों संग घर में ही हुड़दंग मचाया करते थे. मेरी बुआ और दादी के हाथ का बना मिर्च का अचार, इमली की पीड़िया के बारे में सोचकर आज भी मुंह में पानी आ जाता है.

वे ज़िन्दगी के हर पल को जी लेने में यक़ीन रखते हैं. वे कहते हैं कि गर्मियों की छुट्टियों में हम दिन भर खेलते. कभी रिश्तेदारों के बच्चों के साथ, तो कभी मोहल्ले के बच्चों के साथ. बड़े लू के कारण दोपहर में घर से बाहर निकलने से मना करते, लेकिन हमें खेल के आगे कुछ दिखाई ही कहां देता था. बड़ों की नज़र बचाते हुए हम बाहर भाग जाते. हमें न गर्मी का अहसास होता था और न ही लू लगने की कोई फ़िक्र थी. हम तो अपनी छुट्टियों को भरपूर जी लेना चाहते थे और जीते भी थे. 


वे सफ़र में भी ख़ूब चटोरबाज़ी किया करते थे. वे बताते हैं कि  चार साल बाद पापा का स्थानान्तरण अहमदाबाद में हो गया. वहां से छुट्टियों में जब गोरखपुर जाते, तो हम चटोरे ट्रेन में संडीला के लड्डू, खुर्जा का खुरचन, उरई के गुलाब जामुन का आनन्द लेते हुए गोरखपुर पहुंचते और फिर वही हुड़दंग करते. बाबा-दादी के प्यार, आशीर्वाद और ख़ुशियों का भंडार भरकर हम अहमदाबाद आते और फिर से गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार करते थे.
 
अपनी शरारतों की वजह से वे कई मुसीबतें उठा चुके हैं, लेकिन फिर भी शरारत करने से पीछे नहीं रहे. वे बचपन का एक ऐसा ही वाक़िया सुनाते हुए कहते हैं कि बचपन में सब कुछ आसानी से मिलने में मज़ा नहीं आता है. बाबा के घर के सामने एक अमरूद का बाग़ीचा था. माली से बचकर चुपके से घुसते और अमरूद के पेड़ की पतली टहनियों पर चढ़कर गर्मी के मौसम में अमरूद खोजते और भद्द से गिरते. हमारे गिरने की आवाज़ सुनकर माली दौड़कर आता और हमें ख़ूब दौड़ाता तो हम गिरते पड़ते भागते. एक बार भागते हुए बंदर के बच्चे से टकरा गए. बंदर को बहुत ग़ुस्सा आया और उसने दौड़ाकर मेरे पिछवाड़े काट लिया. इसके बाद पेट में चौदह सुइयां लगीं. इसके दर्द का अहसास आज भी है. आज भी सुई के डर से कुत्ते, बिल्ली और बंदर को देखते ही दूर भागता हूं.

दरअसल बचपन की ये खट्टी-मीठी यादें ज़िन्दगी में बहुत बड़ा सहारा हुआ करती हैं. जब कभी मन उदास हो और कुछ अच्छा न लगे, तो बचपन से जुड़ी चीज़ें देखकर, बचपन की बातें याद करके चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है. राकेश श्रीवास्तव कहते हैं- 
मन के
गुल्लक में 
भर लो
इतना प्यार,
ख़ुशियां
न 
मांगनी पड़े
उधार...


वे यह भी कहते हैं-
उदास
देखो जो
किसी को,
मुस्कान का 
उपहार दो,
जीवन उनका 
निखार दो...


वे कहते हैं कि प्रेम से बढ़कर दुनिया में कुछ भी नहीं है. वे कहते हैं-
सम्मान 
प्यार
व्यवहार,
जीवन के 
सुन्दर 
उपहार,
बांटोगे 
तो मिलेगा 
बार-बार...


वे कहते हैं कि गर्मी की छुट्टियों में पूरे परिवार का मिलन अगली पीढ़ी के संबंध को और मज़बूत करता है. एक ही फूल वाली थाली में बचपन से हमारा और सीमा का साथ-साथ खाना भाई-बहन के बंधन को और प्रगाढ़ करता गया. वे कहते हैं-
कोई लौटा दे मेरा बीता हुआ बचपन 
वो प्यार, ख़ुशियां, अपनापन के क्षण 
वो गर्मी की छुट्टियों का प्यारा मौसम 
फिर से जी लेंगे निराला सा बचपन 



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 

क़ुरआन में कुल 15 सजदे हैं. क़ुरआन करीम की तिलावत करते हुए जैसे ही सजदे की आयत आए, तो फ़ौरन सजदा कर लेना चाहिए. सजदे का अफ़ज़ल तरीक़ा यही है. अगर तिलावत करते हुए सजदा न किया हो, तो पारा या क़ुरआन करीम मुकम्मल होने पर भी सजदा किया जा सकता है.     
पहला सजदा- पारा 9 में 7वीं सूरह अल आराफ़ की आयत 206 में है.
दूसरा सजदा- पारा 13 में 13वीं सूरह अर रअद की आयत 15 में है .
तीसरा सजदा- पारा 14 में 16 वीं सूरह नहल की आयत 50 में है. 
चौथा सजदा- पारा 15 में 17वीं सूरह बनी इस्राईल की आयत 109 में है.
पांचवां सजदा- पारा 16 में 19वीं सूरह मरियम की आयत 58 में है.
छठा सजदा- पारा 17 में 22वीं सूरह अल हज की आयत 18 में है.
सातवां सजदा- पारा 17 में 22वीं सूरह अल हज की आयत 77 में है.
आठवां सजदा- पारा 19 में 25वीं सूरह अल फ़ुरक़ान की आयत 60 में है.
नौवां सजदा- पारा 19 में 27वीं सूरह अन नम्ल की आयत 26 में है. 
दसवां सजदा- पारा 21 में 32वीं सूरह अस सजदा की आयत 15 में है.
ग्यारहवां सजदा- पारा 23 में 38वीं सूरह सुआद की आयत 24 में है.
बारहवां सजदा- पारा 24 में 41वीं सूरह हा मीम की आयत 38 में है.
तेरहवां सजदा- पारा 24 में 53वीं सूरह अन नज्म की आयत 62 में है. 
चौदहवां सजदा- पारा 30 में 84वीं सूरह अल इंशिक़ाक़ की आयत 21 में है.
पन्द्रहवां सजदा- पारा 30 में 96वीं सूरह अल अलक़ की आयत 19 में है. 

सजदा कैसे करें 
सजदे के लिए सीधे खड़े हो जाएं. फिर अल्लाहु अकबर कहते हुए सजदे में चले जाएं और तीन बार सुब्हाना रब्बी यल आला पढ़ें और  फिर अल्लाहु अकबर कहते हुए सीधे खड़े हो जाएं. 

 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान को लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जाना जाता है. वे शायरा, लेखिका और पत्रकार हैं. वे एक आलिमा भी हैं. वे रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है. ये उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है, जो इंशा अल्लाह रहती दुनिया तक तमाम आलमों के लोगों को अल्लाह के पैग़ाम से रूबरू कराता रहेगा. वे कहती हैं कि हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं. हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया. वे आधी रात में तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठ जाया करती थीं और अल सुबह फ़ज्र तक इबादत में मशग़ूल रहती थीं. उन्हें देखकर हमारी भी दिलचस्पी इबादत में हो गई. साथ ही बहुत कम उम्र से हमें रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त पापा बहुत याद आते थे. बचपन में पापा क़ुरआन करीम के बारे में हमें बताया करते थे. वे कहा करते थे कि क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी है. वे कहती हैं कि क़ुरआन पाक सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं है, बल्कि ये सबके लिए है, तमाम आलमों के लिए है. हर किसी को अपनी ज़िन्दगी में कम से कम एक बार क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए. अगरचे आप किसी भी मज़हब को मानने वाले हैं और कोई भी ज़बान बोलते हैं, फिर भी आपको अपनी ज़बान में क़ुरआन पाक ज़रूर पढ़ना चाहिए यानी क़ुरआन का तर्जुमा पढ़ना चाहिए, क्योंकि नसीहत हासिल करने वालों के लिए इसमें सबकुछ है.

वे कहती हैं कि फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की. दरअसल हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है. हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है. कायनात की फ़ानी चीज़ों में हमें न पहले कभी दिलचस्पी थी और न आज है और इंशा अल्लाह न कभी होगी.    

वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान को अपना पहला मुर्शिद और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना दूसरा मुर्शिद मानती हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन अपने वालिदैन को समर्पित किया है.

उन्होंने सूफ़ी-संतों की ज़िन्दगी और उनके दर्शन पर आधारित एक किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था. यह किताब आज तक चर्चा में बनी हुई है. सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं. वे  इससे प्रेरणा और मार्गदर्शन हासिल कर रहे हैं.   

उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था. उनकी अम्मी तालीमयाफ़्ता ख़ातून थीं. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक़ था. वे उम्दा शायरा थीं. फ़िरदौस पर भी घर के माहौल का गहरा असर पड़ा. उन्होंने अपनी पहली नज़्म उस वक़्त लिखी थी, जब वे छठी जमात में पढ़ती थीं. उन्होंने नज़्म अपनी अम्मी और अब्बू को सुनाई. उनके अब्बू को नज़्म बहुत पसंद आई और उन्होंने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई. नज़्म ख़ूब सराही गई. इस तरह उनके लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है. सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया. 

यह फ़िरदौस ख़ान के लेखन की ख़ासियत है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में इस तरह बयां करती हैं कि पढ़ने वाला उसी में डूबकर रह जाता है. उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है. फ़िरदौस ख़ान को जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है कि उनकी शायरी सीधे दिल की गहराइयों में उतर जाती है, रूह में समा जाती है.

जो ज़िन्दगी की पथरीली राहों पर चलकर दुख-तकलीफ़ों की वजह से बेज़ार हो चुका हो, उसे फ़िरदौस ख़ान का कलाम ज़रूर पढ़ना चाहिए, वह कलाम जो गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, जो प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, जो कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है. 

फ़िरदौस ख़ान अपनी अम्मी के बाद हज़रत राबिया बसरी को अपना आदर्श मानती हैं. उनकी शायरी में रूहानियत है, पाकीज़गी है. वे कहती हैं-
ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है
घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है

वे मुहब्बत को इबादत का दर्जा देती हैं. वे कहती हैं कि कुछ रिश्ते आसमानों के लिए ही हुआ करते हैं. उनका अहसास रूह में और वजूद आसमानों में होता है. अपने महबूब से मुख़ातिब होते हुए वे कहती हैं-
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा 
मेरा क़ुरआन है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

मेरे महबूब !
तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना हो जाना चाहती हूं…

वे कहती हैं कि हिज्र भी हर किसी के नसीब में नहीं हुआ करता. सच, बड़े क़िस्मत वाले होते हैं वे लोग, जिनके नसीब में हिज्र की नेअमत आती है. वे कहती हैं- 
जान !
मैं नहीं जानती 
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा 
भी है या नहीं...
मैं सिर्फ़ ये जानती हूं 
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्में पढ़ने वाले को चांद के उस पार चैन व सुकून के आलम में ले जाने की सलाहियत रखती हैं. नज़्म देखिए-
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...

फ़िरदौस ख़ान की नज़्मों की मानिन्द उनकी ग़ज़लें भी बेमिसाल हैं. उनकी ग़ज़लें मुहब्बत के अहसास से सराबोर हैं, इश्क़ से लबरेज़ हैं. उनकी ग़ज़लें पढ़ने वालों को एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जहां से वे लौटना ही नहीं चाहते. आलम यह है कि लोग अपने महबूब को ख़त लिखते वक़्त उसमें उनके शेअर लिखना नहीं भूलते. यही तो उनकी क़लम का जादू है. चन्द अश्आर देखें-   
जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

मुट्ठी में क़ैद करने को जुगनूं कहां से लाऊं
नज़दीक-ओ-दूर कोई भी जंगल नहीं रहा

दीमक ने चुपके-चुपके वो अल्बम ही चाट ली
महफ़ूज़ ज़िन्दगी का कोई पल नहीं रहा

मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
वो जुस्तजू, वो मोड़, वो संदल नहीं रहा

फ़िरदौस ख़ान की शायरी में समर्पण है, विरह है, तड़प है. उनका गीत पढ़कर ऐसा लगता है मानो ख़ुद राधा रानी ने ही अपने कृष्ण के लिए इसे रचा है. गीत देखिए-    
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौग़ात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

दरअसल फ़िरदौस ख़ान की शायरी में एक औरत की मुहब्बत, उसके ख़्वाब और उसका दर्द झलकता है. उनका कलाम ज़िन्दगी के तमाम इन्द्रधनुषी रंगों को अपने में समेटे हुए है. उसमें मुहब्बत का रंग भी शामिल है, तो जुदाई का रंग भी है. उसमें ख़ुशी का रंग भी दमकता है, तो दुखों का रंग भी झलकता है. चन्द अश्आर देखें-
जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में 
हर एक क़तरा मेरी जां क़तरा-ए-शबनम नहीं होता 

चैन कब पाया है मैंने, ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा, तो नाराज़ ख़ुदा होता है 

जंगल में भटकते हैं सदा रात को जुगनूं 
मेरी ही तरह उनका भी घरबार नहीं है 

बक़ौल फ़िरदौस ख़ान ज़िन्दगी हमेशा वैसी नहीं हुआ करती, जैसी हम चाहते हैं. ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा भी हुआ करता है, जो हमें लाख चाहने पर भी नहीं मिलता. और जो मिलता है, उससे कभी उन्सियत नहीं होती, वह पराया ही लगता है. वे कहती हैं- 
मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...

फ़िरदौस ख़ान जानी मानी कहानीकार हैं. उनकी शायरी की तरह ही उनकी कहानियों में भी अल्फ़ाज़ का जादू बाख़ूबी देखने को मिलता है. उनकी भाषा शैली ऐसी है कि पढ़ने वाला उसके सहर से ख़ुद को अलग कर ही नहीं पाता. उनकी कहानी अट्ठारह सितम्बर की एक झलक देखें-
“आज अट्ठारह सितम्बर है. वही अट्ठारह सितम्बर जो आज से छह साल पहले था. वह भी मिलन की ख़ुशी से सराबोर थी और यह भी, लेकिन उस अट्ठारह सितम्बर और इस अट्ठारह सितम्बर में बहुत बड़ा फ़र्क़ था. दो सदियों का नहीं, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा, शायद समन्दर और सहरा जितना. सूरज ने अपनी सुनहरी किरनों से धरती के आंचल में कितने ही बेल-बूटे टांके थे. उस अट्ठारह सितम्बर को भी दोपहर आई थी, वही दोपहर जिसमें प्रेमी जोड़े किसी पेड़ की ओट में बैठकर एक-दूसरे की आंखों में डूब जाते हैं. फिर रोज़मर्रा की तरह शाम भी आई थी, लेकिन यह शाम किसी मेहमान की तरह थी बिल्कुल सजी संवरी. माहौल में रूमानियत छा गई थी. फिर शाम की लाली में रफ़्ता-रफ़्ता रात की स्याही शामिल हो गई. रात की अगुवानी में आसमान में चमकते लाखों-करोड़ों सितारों ने झिलमिलाती हुई नन्हीं रौशनियों की आरती से की थी. यह रात महज़ एक रात नहीं थी. यह मिलन की रात थी, एक सुहाग की रात.”
इसे भी देखें- 
“बरसात में बरसते पानी की रिमझिम, जाड़ो में बहती शीत लहर के टकराने से हिलते पेड़ों की शां-शां और गर्मियों में लू के गर्म झोंके सब उसके बहुत क़रीब थे, बिल्कुल उसांसों की तरह. उसकी आंखों ने एक सपना देखा था, जो नितांत उसका अपना था. दूर तलक समन्दर था और समन्दर पर छाया नीला आसमान. बंजारन तमन्नाओं के परिन्दे आसमान में उन्मुक्त होकर उड़ रहे थे. दिन के दूसरे पहर की सुनहरी किरनें समन्दर की दूधियां लहरों को सुनहरी कर रही थीं.”

अपनी कहानियों में भी उन्होंने एक आम इंसान की ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को शामिल किया है. उनकी कहानियां ज़िन्दगी के सफ़र की मानिन्द हैं, जिसमें रफ़्तार भी है, तो ठहराव भी है. इनमें मुहब्बत का ख़ुशनुमा अहसास भी है, तो विरह की वेदना भी है. कहीं क़ुर्ब की चाह है, तो कहीं टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है.   
उनकी कहानी ‘त्यौहारी’ एक ऐसी अकेली लड़की की दास्तां है, जो हर त्यौहार पर ‘त्यौहारी’ का इंतज़ार करती है. कहानी की एक झलक देखें-    
“जब भी कोई त्यौहार आता, लड़की उदास हो जाती. उसे अपनी ज़िन्दगी की वीरानी डसने लगती. वो सोचती कि कितना अच्छा होता, अगर उसका भी अपना एक घर होता. घर का एक-एक कोना उसका अपना होता, जिसे वो ख़ूब सजाती-संवारती. उस घर में उसे बेपनाह मुहब्बत करने वाला शौहर होता, जो त्यौहार पर उसके लिए नये कपड़े लाता, चूड़ियां लाता, मेहंदी लाता. और वो नये कपड़े पहनकर चहक उठती, गोली कलाइयों में रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां पहननती, जिसकी खनखनाहट दिल लुभाती. गुलाबी हथेलियों में मेहंदी से बेल-बूटे बनाती, जिसकी महक से उसका रोम-रोम महक उठता.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसकी ज़िन्दगी किसी बंजर ज़मीन जैसी थी, जिसमें कभी बहार नहीं आनी थी. बहार के इंतज़ार में उसकी उम्र ख़त्म हो रही थी. उसने हर उम्मीद छोड़ दी थी. अब बस सोचें बाक़ी थीं. ऐसी उदास सोचें, जिन पर उसका कोई अख़्तियार न था.”  


उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा. कहानी की एक झलक देखें- 
“आज जब वह सोने के लिए ढाबे की छत पर खुले आसमान के नीचे लेटा, तो उसे आकाश रूपी काली चादर पर चमकते चांद-सितारे बहुत भा रहे थे. उसे अपना भविष्य भी चांद-सितारों की तरह जगमगाता लग रहा था. अब वह भविष्य को लेकर चिंचित न होकर सुनहरे कल की कल्पना कर रहा था.  कल्लू के लिए उसके मन में कृतज्ञता के भाव थे, जिसके थोड़े से प्रोत्साहन से उसकी ज़िन्दगी में बदलाव आ गया था. वह ख़ुद को एक ऐसे संघर्षशील व्यक्ति के रूप में देख रहा था, जिसकी ज़िन्दगी का मक़सद रास्ते की हर मुसीबत और ख़तरे का धैर्य और साहस से मुक़ाबला करते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचना होता है.  अपने उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए वह न जाने कब नींद की आग़ोश में समा गया.“  
  
यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि ज़िन्दगी के तमाम दुखों और तकलीफ़ों के बावजूद इन कहानियों में उम्मीद की एक ऐसी किरन भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. यह सूरज की रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ सुबह का उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. उनकी कहानियां पाठक को अपने साथ अहसास के दरिया में बहा ले जाती हैं.
 
फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार दैनिक भास्कर, अमर उजाला, हरिभूमि, चौथी दुनिया सहित अनेक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दी हैं. उन्होंने अनेक पुस्तकों, साप्ताहिक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. वे दूरदर्शन में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक रही हैं. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनलों के लिए भी काम किया है. वे देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फ़ीचर्स एजेंसी के लिए लिखती हैं. देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों. वे मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी सम्पादक रही हैं और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं. फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं .'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' नाम से उनके दो न्यूज़ पॉर्टल भी हैं. 

उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर, 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया. राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन (पंजीकृत) द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. 

वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली. वे कई भाषाओं की जानकार हैं और उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और इंग्लिश में लिखती हैं. 
वे बलॉग भी लिखती हैं. उनके कई बलॉग हैं. ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन पाक का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है. ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है. ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है. ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है. ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है. ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है. ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का बलॉग है. उन्होंने अनेक लेखों का अंग्रेज़ी, उर्दू और पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद किया है. उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ.  
 
बेशक उनकी शायरी किसी को भी अपना मुरीद बना लेने की तासीर रखती है, लेकिन जब वे हालात पर तब्सिरा करती हैं, तो उनकी क़लम तलवार से भी ज़्यादा तेज़ हो जाती है. उनके लेखों में ज्वलंत सवाल मिलते हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. उन्होंने विभिन्न विषयों पर हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में हज़ारों लेख लिखे हैं. वे नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन रही हैं. इसके अलावा वे ख़िदमत-ए- ख़ल्क से भी जुड़ी हैं. वे राहे-हक़ नामक स्वयंसेवी संस्था की संस्थापक व निदेशक हैं. वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक भी हैं.   

वे कहती हैं कि हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला. ज़मीन चाही, तो आसमान मिला. इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की चाह ही नहीं रही. अपने बारे में वे कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…
वे ये भी कहती हैं-
मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...


सरफ़राज़ ख़ान
टोटकों का चलन पुराना और अंधविश्वास से जुडा है. मगर हैरत की बात तो यह भी है कि अनेक विश्व विख्यात लेखक भी इन पर यक़ीन करते थे और लेखन के समय इनका नियमित रूप से पालन करते थे, जो बाद में उनकी आदत में शुमार भी हो गया. महान फ्रांसीसी लेखक एलेक्जेंडर डयूमा का विचार था कि सभी प्रकार की रचनाएं एक ही रंग के काग़ज़ पर नहीं लिखनी चाहिए. उनके मुताबिक़ उपन्यास आसमानी रंग के काग़ज़ पर और अन्य रचनाएं गुलाबी रंग के काग़ज़ पर लिखनी चाहिए.
मगर प्रख्यात हिन्दी लेखक रांगेय राघव को फुलस्केप आकार का काग़ज़ भी बेहद छोटा लगता था. ब्राह्म ग्रीन बलकभ साफ़ लकीरदार वाले काग़ज़ पर लिखते थे. अगर उस पर ज़रा-सा भी कोई धब्बा लग जाता था, तो वे उसे फ़ौरन फाड़ देते थे और फिर नए साफ़ काग़ज़ पर लिखना शुरू करते थे. उनका यह भी मानना था कि जब वे ख़ुद को उदास महसूस करते थे और डेस्क पर बैठते, तो शब्द झरने की तरह फूट पड़ते थे. उदासी भरा दिन उनके लेखन के लिए बेहद कारगर साबित होता था.
इसी तरह चार्ल्स आउडिलायर (1821-1867) नामक फ्रेंच कवि को हरा रंग लिखने की प्रेरणा देता था. इसलिए उन्होंने अपने बाल ही हरे रंग में रंग डाले थे. प्रख्यात समीक्षक डॉ. सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज़ पर बिठाकर ही लिख पाते थे. गार्डन सेल्फ़िज़ शनिवार को दोपहर में और शेष दिनों में रात के समय लिखते थे. शनिवार को दोपहर में वह ख़ुद को विशेष उत्साहित महसूस करते थे.
विख्यात अंग्रेज़ी उपन्यासकार और समीक्षक मैक्स पैंबर सिर्फ़ सुबह दस बजे तक ही लिखते थे. इसलिए एक उपन्यास को पूरा करने में उन्हें बहुत ज़्यादा समय लगता था. इटली के लेखक जियो ऑक्चिनी रौसिनी (1791-1868) लिखने का मूड बनाने के लिए हमेशा नक़ली बालों की तीन विग पहना करते थे. प्रसिद्ध जर्मन कवि फेडरिक वान शिल्लर (1759-1805) की आदत भी कम अजीब नहीं थी. वे अपने पैरों को बर्फ़ के पानी में डुबोकर ही कविताएं लिख सकते थे. अगर वे ऐसा नहीं करते थे, तो उन्हें कविता का एक भी शब्द नहीं सूझता था.
फ्रांसीसी भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा रमणी रसिक चिरकुमार मोंपासा मूड फ्रैश होने पर ही लिखते थे. अपने को तरोताज़ा करने के लिए वे नाव चलाते, मछलियां पकड़ते या फिर मित्रों के साथ हंसी-ठिठौली करते थे. राइज एंड फास्स ऑफ रोमन एंपायर के लेखक नाटककार गिब्सन को लिखने के लिए पहले एकाएक संजीदा होना पड़ता था. महान फ्रांसीसी लेखक बाल्लाजाक की आदत भी विचित्र थी. वह दिन में फैशन के कपड़े पहनते और रात को लिखते समय पादरियों जैसा लिबास पहनते थे.
सुप्रसिद्ध लेखक बर्टेड रसेल का अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में कहना था कि उनका लेखन मौसम पर ही आधारित होता है खु़शगवार मौसम में वे रात-दिन लिखते थे और गर्मी वाले उमस भरे दिन में वे लिखने से कतराते थे. एईडब्ल्यू मेसन भी मूडी स्वभाव के थे. जब उनका मन करता, तभी लिखने बैठते. वे रात या दिन मूड होने पर कभी भी लिख सकते थे.
गोल्जस्मिथ को लिखने से पहले सैर करने का भी शौक़ था. अपने उपन्यास, कविताएं और नाटक रचने के दौरान उन्होंने दूर-दराज़ के इलाक़ों की यात्राएं कीं. गिलबर्टफ़्रेंको सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक लिखा करते थे. दोपहर के भोजन के बाद एक घंटे लिखते थे और फिर वह शाम को भी दो घंटे तक लिखते थे. रात को लिखना उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं था. सर ऑर्थर पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था. दिन में अगर वे लिखने बैठते, तो उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था. इसी तरह की आदत लुई पार्कर को भी थी. वे दिनभर सोते और रात को जागकर लिखते थे. अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन को औंधे मुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी.
अर्नेस्ट हेमिंगवे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूमो और पंजाबी के उपन्यासकार नानक सिंह को खड़े होकर लिखने की आदत थी. विस्मयली लैक्स सुबह चार बजे से दिन के 11 बजे तक और शाम को साढ़े सात बजे तक तथा रात को फिर 11 बजे तक लिखते थे. उनका बाक़ी का समय सोने और चाय पीने में बीतता था. प्रख्यात रूसी लेखक फीडिन ने जब उपन्यास असाधारण ग्रीष्म ऋतु लिखा, तब वह समुद्र किनारे रह रहे थे. उनका मानना था कि समुद्र की लहरों की गूंज की आवाज़ उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती थी.
हैरसवासिल सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को पांच बजे से सात बजे तक लिखते थे. डेलिस ब्रेडकी केवल तीन घंटे ही लिखते थे और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक. सर ऑर्थर कान डायल केवल सुकून महसूस करने पर ही लिखते थे. अगर किसी बात से उनका मन जरा भी विचलित होता, तो वे एक पंक्ति भी नहीं लिख पाते थे. जर्मनी के कार्लबेन को लिखने की प्रेरणा संगीत से मिलती थी. उन्होंने अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड कर रखे थे. पहले वे टेप चलाते और फिर लिखने बैठते.



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है.  ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
वे लोग बहुत ख़ुशनसीब हुआ करते हैं, जो किसी के काम आते हैं, क्योंकि अल्लाह ही ख़िदमते-ख़ल्क यानी अपनी मख़लूक की मदद के लिए कुछ लोगों को चुनता है. यही वे लोग हैं, जो अल्लाह की तरफ़ से रहमत का ज़रिया बनकर मुसीबतज़दा और परेशान हाल लोगों तक पहुंचते हैं और उनकी मदद करते हैं. ये मदद कई तरह की हुआ करती है. कोई जान से मदद करता है, तो कोई मालो-दौलत से मदद करता है. कोई किसी ज़रूरतमंद को उस जगह तक पहुंचा देता है, जहां से उसकी मदद हो जाती है. 

इस्लाम में ख़िदमते-ख़ल्क को इबादत का दर्जा दिया गया है. इसीलिए अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने की ताक़ीद की. एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर तुम किसी की मदद करने के क़ाबिल न हो, तो किसी और से उसकी सिफ़ारिश कर दो. एक अन्य हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अपने किसी भाई को जिसके जिस्म पर ज़रूरत के मुताबिक़ कपड़े न हों, उसे कपड़े पहनाएगा या देगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनाएगा. और जो किसी भूखे को खाना खिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत के मेवे खिलाएगा. जो किसी प्यासे को पानी पिलाएगा, तो अल्लाह उसे जन्नत का शर्बत पिलाएगा. 

ये मदद ऐसी होनी चाहिए कि ज़रूरतमंद लोगों को शर्मिन्दगी का अहसास न हो. इसीलिए तो कहते हैं कि मदद इस तरह करनी चाहिए कि एक हाथ से कुछ दो, तो दूसरे हाथ को ख़बर भी न हो. मिसाल के तौर पर किसी लड़की की शादी है या किसी को इलाज की ज़रूरत है या किसी के घर कोई कमाने वाला नहीं है और उन्हें दो वक़्त का खाना भी नहीं मिल पा रहा है, तो ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाई जानी चाहिए, बिना किसी शोर-शराबे के, बिना तस्वीरें वायरल किए. यही तो असल मदद है. 

आज के दौर में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो दूसरों की मदद करना अपना फ़र्ज़ मानते हैं और इस नेकी के काम में आगे रहते हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह ने फ़रमाया है कि नेकी सिर्फ़ यही नहीं है कि तुम अपना रुख़ मशरिक़ और मग़रिब की तरफ़ फेर लो, बल्कि असल नेकी तो ये है कि कोई शख़्स अल्लाह और क़यामत के दिन और फ़रिश्तों और अल्लाह की किताब और नबियों पर ईमान लाए और अल्लाह की मुहब्बत में अपना माल क़राबतदारों यानी रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों और साइलों यानी मांगने वालों पर और ग़ुलामों को आज़ाद कराने में ख़र्च करे और पाबंदी से नमाज़ पढ़े और ज़कात देता रहे और जब कोई वादा करे, तो उसे पूरा करे और तंगी और मुसीबत और जंग की सख़्ती के वक़्त सब्र करने वाला हो. यही लोग सच्चे हैं और यही लोग परहेज़गार हैं. 
(क़ुरआन 2:117)
दिल्ली के आज़ाद मार्केट इलाक़े में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो ख़ामोशी से इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं. एक ख़ुदाई ख़िदमतगार बरसों से हर रोज़ बिला नाग़ा एक देग़ बनाते हैं और तक़सीम करते हैं. जो भी उनसे खाने का सवाल करता है, वे उससे सिर्फ़ इतना पूछते हैं कि कितने लोगों के लिए चाहिए? इलाक़े में बहुत से ऐसे घर हैं, जिनमें अकेली बुज़ुर्ग औरतें हैं, कई घरों में छोटे बच्चे हैं और उनके घर कमाने वाला कोई नहीं है. ऐसे ज़रूरतमंद लोगों तक वे खाना पहुंचा रहे हैं. वे अपना नाम ज़ाहिर तक नहीं करना चाहते.         
  
इलाक़े की बाशिन्दा राबिया भी इस तरह के नेक कामों में पीछे नहीं रहतीं. वे अपनी कई परिचित महिलाओं के साथ मिलकर ज़रूरतमंद लोगों तक कपड़े और सामान पहुंचाती हैं. शादी-ब्याह में दुल्हन को बरी में भारी-भरकम जोड़े चढ़ाए जाते हैं, जो बस एक-दो बार ही पहने जाते हैं. ऐसे में ये जोड़े किसी सन्दूक़ में बंद करके रख दिए जाते हैं. इसी तरह महिलाएं भी हर शादी-ब्याह या किसी और समारोह के लिए भारी-भरकम जोड़े तो बना लेती हैं, लेकिन उसे दो-चार बार से ज़्यादा नहीं पहनतीं. बस इसी तरह के कपड़ों को इकट्ठा किया जाता है और फिर उन्हें ऐसे घरों में भेज दिया जाता है, जहां उनकी ज़रूरत है. कपड़ों के अलावा कम्बल, बर्तन और खाद्य सामग्री भी ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाई जाती है. बहुत से लोग ऐसे हैं, जो सरकारी डिपो से मिला राशन इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं है. ऐसे में उनसे राशन लेकर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचा दिया जाता है. इसमें गेहूं और चावल भी शामिल हैं.

दरअसल, हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं. हर मौसम में उस मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं. सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कम्बल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या. बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया. हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती, लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए. इस मौसम में कुछ नया ही पहनना है. पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वह पुराना लगने लगा. वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं. ये घर-घर की कहानी है. जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वे पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है. कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए, किसके पास इतना वक़्त है. अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो. बस इसी सोच के साथ ये ख़ुदाई ख़िदमतगार काम कर रहे हैं. बहुत लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें ये ख़ुदाई ख़िदमतगार ज़ाती तौर पर नहीं जानते और न ही कभी उनसे मिले हैं. कोई बता देता है कि उनके इलाक़े में ऐसे लोग हैं, जिन्हें मदद की ज़रूरत है, तो वे उन लोगों तक सामान पहुंचा देते हैं. इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि वे वाक़ई बहुत ज़रूरतमंद हों. 

सबसे ख़ास बात ये है कि किसी को कपड़े या दूसरी चीज़ें देते वक़्त इस बात का पूरा ख़्याल रखा जाता है कि कपड़े ज़्यादा पुराने, फटे हुए या फिर रंग से बेरंग हुए न हों. चीज़ें भी ऐसी होनी चाहिए, जिनका ख़ुशी-ख़ुशी इस्तेमाल किया जा सके. चीज़ें वहीं अच्छी लगती हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है.

इलाक़े के डॉ. शफ़ीक़ अहमद इस्लाही भी ख़िदमते-ख़ल्क करते हैं. वे क़ुरान हाफ़िज़ हैं. वे एक मुअज़ज़िन भी हैं. वे मस्जिद में अज़ान देते हैं और जुमे को ख़ुत्बा भी पढ़ते हैं. वे ज़रूरतमंदों की हर मुमकिन मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. वे साल 1972 से ख़िदमते-ख़ल्क कर रहे हैं. उनके पास कोई ऐसा मरीज़ आता है, जिसके पास दवा के लिए पैसे न हों, तो वे उससे दवा की क़ीमत नहीं लेते. किसी मरीज़ को किसी बड़े अस्पताल में दिखाना हो, तो वे उसकी भी मदद करते हैं. वे उसके इलाज के लिए पैसों भी दे देते हैं. वे रमज़ान में खाद्य सामग्री तक़सीम करते हैं, तो सर्दियों में कम्बल बांटते हैं. बच्चों के टीकाकरण और पोलियो की दवाई पिलाने के मामले में भी वे आगे रहते हैं. स्वास्थ्यकर्मियों की टीम उनके क्लीनिक पर आ जाती है और मस्जिद के लाउडस्पीकर के ज़रिये ऐलान कर दिया जाता है कि उनके क्लीनिक में बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं या दवा पिलाई जा रही है. आधी रात को भी किसी को उनकी ज़रूरत होती है, तो वे इलाज के लिए पहुंच जाते हैं. हालांकि वे बहुत ही ज़ईफ़ हैं, लेकिन अपना फ़र्ज़ निभाने में पीछे नहीं रहते. इलाक़े के हिन्दू लोग उन्हें भगवान की तरह मानते हैं. पप्पू का कहना है कि उनकी एक पुकार पर डॉक्टर साहब आ जाते हैं. वे बिना किसी भेदभाव के सबकी मदद करते हैं. कोरोना काल के दौरान उन्होंने उनमें से कई लोगों की दुकानों का किराया तक अपने पास से दिया है.        

इलाक़े की बाशिन्दा क़सीम फ़ातिमा भी इस नेक काम में डॉक्टर साहब का हाथ बटाती हैं. वे ज़रूरतमंद लोगों को उन ख़ुदाई ख़िदमतगारों तक पहुंचाती हैं, जो मदद मुहैया कराते हैं. उनके पास दूर-दूर से ज़रूरतमंद महिलाएं आती हैं. कई साहिबे-हैसियत लोग उनके ज़रिये लोगों तक मदद पहुंचाते हैं. वे बताती हैं कि मदद लेने वाले लोगों की तस्वीरें नहीं खींची जातीं, क्योंकि इससे उनकी ख़ुद्दारी को ठेस पहुंचती है. कोई भी व्यक्ति बहुत ही बेबसी और मजबूरी की हालत में ही किसी से मदद क़ुबूल करता है. हां, इतना ज़रूर है कि खाद्य सामग्री और कम्बल वग़ैरह तक़सीम करते वक़्त लोगों से उनके किसी पहचान-पत्र की छायाप्रति ले ली जाती है. इससे पारदर्शिता भी बनी रहती है और यह भी सुनिश्चित रहता है कि एक वक़्त में एक व्यक्ति को एक बार ही मदद दी जाए. खाद्य सामग्री में आटा, चावल, दाल, चना, बेसन, तेल, वनस्पति घी, चीनी, नमक और मसाले आदि दिए जाते हैं. 
  
कोरोना काल में लगी तालाबंदी के वक़्त में भी यहां के ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने ज़रूरतमंद लोगों को खाद्य सामग्री और ऑक्सीज़न सिलेंडर मुहैया करवाए हैं. ईद के मौक़े पर यह सुनिश्चत किया गया कि ज़कात और फ़ितरे की रक़म अपने आसपास के ऐसे लोगों तक पहुंचाई, जो बेसहारा हैं, मजबूर हैं और बेबस हैं, जिनके यहां कोई कमाने वाला नहीं है या जो मेहनत-मशक़्क़त करके भी मुश्किल से गुज़ारा कर पा रहे हैं. तालाबंदी की वजह से कितने ही घरों में फ़ाक़ों तक की नौबत आ गई थी. वैसे भी हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा पड़ौसी अच्छा है या बुरा है. मैदाने हश्र में इसका जवाब वह ख़ुद देगा, लेकिन अगर वह भूख से मर गया, तो इसका जवाब हमें ही देना होगा. 

दानिश ख़ान का कहना है कि मदद करने के लिए बहुत से पैसों की नहीं, बल्कि नीयत की ज़रूरत होती है. अगर इंसान किसी की मदद करना चाहे, तो वह अपनी थाली में से आधा खाना किसी भूखे को खिला सकता है. उनका कहना है कि हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम ज़कात और फ़ितरे की रक़म से अपने आसपास के ज़रूरतमंद लोगों की इतनी मदद कर दें कि वे दो वक़्त भरपेट खाना खा सकें, बीमार अपना इलाज करा सकें और ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद सकें. अल्लाह भी उन्हीं लोगों को पसंद करता है, जो उसके बंदों से मुहब्बत करते हैं और उनकी मदद करते हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार आवाज़ 


फ़िरदौस ख़ान 
कहते हैं कि दुआएं तक़दीर बदल दिया करती हैं. अगर किसी दुरवेश की दुआ से ज़मीन के एक टुकड़े की हालत ही बदल जाए, तो वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं. वे इस बात के क़ायल हो जाते हैं कि क़ुदरत के करिश्मे को न कोई समझ पाया है और न कभी समझ सकता है. आज हम एक ऐसे ही करिश्मे की बात कर रहे हैं, जो नूह जिले के एक गांव में हुआ था और आज भी बरक़रार है.   

देश की राजधानी दिल्ली के समीपवर्ती राज्य हरियाणा के नूह ज़िले का मढ़ी एक ऐसा गांव हैं, जहां फ़सल अन्य इलाक़ों के मुक़ाबले बहुत पहले पहले पक जाती है. जब आसपास और दूर-दराज़ के गांवों के खेतों में फ़सलें लहलहा रही होती हैं, तब इस गांव के किसान अपनी फ़सल काटकर घर ले जा चुके होते हैं. इस गांव के बाशिन्दे जैकम ख़ान का कहना है कि उन्होंने बुज़ुर्गों से सुना है कि किसी ज़माने में यहां भी आसपास के इलाक़ों की तरह ही अपने वक़्त पर फ़सल पका करती थी. एक बार की बात है कि यहां एक दरवेश आए और वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए. वे वहां घंटों तक इबादत करते रहे. गांव के लोगों ने उन्हें देखा, तो वे उनके पास गए और उन्हें पीने के लिए पानी और खाने के लिए भोजन दिया. वह दरवेश कहीं दूर से आए थे और भूखे और प्यासे भी थे. गांववालों की मेहमान नवाज़ी से वह बहुत ख़ुश हुए. उन्होंने गांववालों को दुआ देते हुए कहा कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. कुछ वक़्त बाद वे दुरवेश गांव से चले गए. उनके जाने के कुछ माह बाद किसानों ने देखा कि उनकी फ़सल आसपास के गांवों की फ़सल से पहले पककर तैयार हो गई. इस बात की चर्चा दूर-दूर तलक होने लगी. पहले तो सबने इसे कोई इत्तेफ़ाक़ समझा, लेकिन जब लगातार फ़सल अन्य गांवों की फ़सल से पहले पकने लगी, तो लोग सोचने पर मजबूर हो गए. उन्हें दरवेश की दुआ याद आई कि उन्होंने कहा था कि मालिक तुम्हें औरों से पहले रिज़्क़ देगा. वे मान गए कि यह दरवेश की दुआ का ही असर है, जो उन्हें औरों से पहले रिज़्क़ यानी फ़सल मिल पाती है. 

इस गांव की एक ख़ास बात यह भी है कि मढ़ी महामारी से महफ़ूज़ रहता है. जब कभी कोई महामारी फैलती है, तो भले ही आसपास के गांव उसकी चपेट में आ जाएं, लेकिन मढ़ी सुरक्षित रहता है. यहां के लोग कम बीमार पड़ते हैं. इसे भी गांववाले दुरवेश की दुआओं का ही असर मानते हैं. सूबे ख़ान कहते हैं कि मढ़ी ही नहीं, पूरे मेवात इलाक़े के लोग सादगी पसंद हैं. वे फ़क़ीरों और साधु-संतों का मान-सम्मान करने वाले हैं. यहां कोई फ़कीर, साधु-संत या कोई मुसाफ़िर आ जाए, तो गांववाले उसे भोजन करवाते हैं, उसे पानी पिलाते हैं, उसका आदर-सत्कार करते हैं. गांववाले कहते हैं कि मेहमान नवाज़ी करना तो हमारा फ़र्ज़ है. अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई मौक़ों पर मेहमान का स्वागत करने, उसकी ख़िदमत करने और उसका ख़्याल रखने का हुक्म दिया है. गांववाले अपनी इस परम्परा को क़ायम रखे हुए हैं और वे अपने बच्चों को भी इसकी तालीम देते हैं.        

कुछ लोग कहते हैं कि फ़सल को पर्याप्त सिंचाई जल न मिल पाने की वजह से मढ़ी में फ़सल जल्द पककर तैयार हो जाती है. लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि मढ़ी के आसपास के दर्जनों गांवों की यही हालत है. वहां भी फ़सलों की पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पाती और उन्हें भी बहुत कम पानी मिल पाता है. फिर एक जैसी हालत में वहां की फ़सलें जल्द पककर तैयार क्यों नहीं होती? इस सवाल का उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं होता, सिवाय इसके कि यह बात उनकी समझ से परे है. 
गांववाले बताते हैं कि दूर-दूर से कृषि वैज्ञानिक उनके गांव में आए और उन्होंने हालात का जायज़ा लिया, लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे वापस लौट गए.   

जल संकट 
गांव बाई के सरपंच आबिद बताते हैं कि इलाक़े के मढ़ी सहित तक़रीबन 66 गांवों में अब तक सिंचाई का नहरी पानी नहीं पहुंच पाया है. इसलिए इस इलाक़े के किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर हैं. इस वजह से यहां साल में एक ही फ़सल हो पाती है. इस इलाक़े में भूजल-स्तर बहुत गहरा है. यहां का पानी बहुत खारा होने की वजह से पीने के लायक़ भी नहीं है. ऐसे में फ़सल कहां से हो. यहां के किसान अनाज में गेहूं और जौ की फ़सल उगाते हैं. दलहन में मसूर और तिलहन में सरसों की खेती की जाती है.    

क़ाबिले-ग़ौर है कि 1507 वर्ग किलोमीटर में फैले मेवात यानी नूह इलाक़े का भू-जल स्तर बहुत नीचे है. इतना ही नहीं, यहां के ज़्यादातर इलाक़े का पानी बहुत खारा और फ़्लोराइडयुक्त है, जिससे यह पीने लायक़ बिल्कुल भी नहीं है. सिर्फ़ अरावली पहाड़ों की तलहटी में बसे गांवों का पानी ही पीने के लायक़ है. एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ मेवात में जल संकट की हालत बहुत गंभीर हैं. यहां के 443 गांवों में से महज़ 57 गांव ही ऐसे हैं, जहां का भू-जल पीने लायक़ है. इलाक़े के 104 गांवों का पानी बहुत ज़्यादा खारा है. यहां के 31 गांवों के पानी में फ़्लोराइड की मात्रा बहुत ज़्यादा है, जो सेहत के लिए बहुत नुक़सानदेह है. इलाक़े के 52 गांवों का पानी खारा भी है और उसमें फ़्लोराइड भी बहुत ही ज़्यादा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ पानी में फ़्लोराइड की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से यह धीमे ज़हर का काम करता है. इस पानी के सेवन से गुर्दों में पथरी हो जाती है. इससे हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं. शरीर में दर्द रहने लगता है और ज़रा सी चोट से हड्डी टूट भी सकती है. इसके अलावा फ़्लोराइडयुक्त पानी के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियां भी हो जाती हैं.

हालांकि मेवात के तक़रीबन अढ़ाई सौ गांवों में रेनीवेल परियोजना के तहत पेयजल की आपूर्ति की जा रही है. यह पानी यमुना के किनारे बड़े बोरवेल के बूस्टिंग स्टेशनों के ज़रिये गांवों में पहुंचाया जा रहा है. 
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने इस योजना की आधारशिला रखी थी. इसका मक़सद यमुना किनारे रेनीवेल बनाकर मेवात में पानी पहुंचाना था. यह परियोजना 2019 की आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी. इसके तहत प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 55 लीटर स्वच्छ पेयजल देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन बढ़ती आबादी की लगातार बढ़ती पानी की मांग की वजह से यहां जल संकट बना रहता है.    
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार : आवाज़
तस्वीर गूगल  

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.

जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.

सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है.  इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए.  इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.

गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.

सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है.  बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारम्परिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं.  उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 100 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अनेक राज्य इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा. स्थानीय जलवायु के अनुकूल इसकी नई क़िस्में तैयार की जा रही हैं. 

आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया  देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारम्परिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती.  सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.



أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं