Dr Firdaus Khan
Festivals keep our culture and traditions alive. These are the treasures of happiness. They give us opportunities for happiness. They are an integral part of our lives. These festivals reveal the culture and civilization of any country and society. But with changing times, festivals are also being left behind. In fact, it would be better to say that they are coming to an end. Despite this, there are still many people who are keeping their traditions alive. If we talk about Muslim festivals, only two festivals are named. One is Eid ul Fitr, which is celebrated on the first date of Shawwal after the end of the month of Ramadan. It is also called Meethi Eid. And the second festival is Eid ul Azha, which is also known as Bakrid. This Eid is celebrated in the joy of Hajj and people offer sacrifices for three days. Ahle-Hadees offer sacrifice for four days. Apart from these festivals, there are many other festivals which some people celebrate with full devotion. One such festival is Aakhiri Chahshamba or Aakhiri Chahar Shamba.

What is the Aakhiri Chahshamba
The last Chahshamba is celebrated on the last Wednesday of the second month of the Hijri calendar. It is believed that Allah's Messenger Hazrat Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam fell ill in the month of Safar. He (peace be upon him) had a fever and a headache. On the last Wednesday of this month, He (peace be upon him) recovered and took a bath.
Then they prayed, ate food and went for a walk. Special Nafil Salat are also offered on this day. The last Wednesday of the month of Safar is also known as 'Walk Wednesday'.

His (peace be upon him) followers keep a holiday on this day. They also took bath and wore good clothes. Delicious food was cooked in their homes. Sweet dishes were also cooked. they distributed sweets. They also went for a walk with their family members. What I mean to say is that His (peace be upon him) followers celebrated his recovery and this tradition continues even today.

It is significant that this festival started in Arabia, but now there is no information available about celebrating this festival there. But this festival is celebrated with great joy in many regions of India. This is the effect of the soil of this country, and the impact of the culture here is that even those festivals which have disappeared and ended from Arabia are celebrated here.
Actually India is a country of festivals. Festivals are celebrated throughout the year in our country. Many festivals are related to religion, while many festivals are related to folk life. The Akhiri Chahshamba may not be related to religion, but it is definitely related to faith. This is a festival of love. This is a festival related to the love of our beloved Prophet Hazrat Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam. There is love for every thing related to the lover. Apart from India, this festival is also celebrated in Pakistan and Bangladesh, because both these countries were also once a part of India.


डॉ. फ़िरदौस ख़ान

तीज-त्यौहार हमारी तहज़ीब और रिवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. ये ख़ुशियों के ख़ज़ाने हैं. ये हमें ख़ुशी के मौक़े फ़राहम करते हैं. हमें ख़ुश होने के बहाने देते हैं. ये हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा हैं. इन तीज-त्यौहारों से किसी भी देश और समाज की संस्कृति व सभ्यता का पता चलता है. मगर बदलते वक़्त के साथ-साथ तीज-त्यौहार भी पीछे छूट रहे हैं या यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि ख़त्म होते जा रहे हैं. लेकिन आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनी रिवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. अगर मुस्लिम त्यौहारों की बात करें, तो सिर्फ़ दो ही त्यौहारों के नाम लिए जाते हैं. एक है ईद उल फ़ित्र, जो माहे रमज़ान के ख़त्म होने के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को मनाई आती है. इसे मीठी ईद भी कहा जाता है. और दूसरा त्यौहार है ईद उल अज़हा, जिसे बक़रीद के नाम से भी जाना जाता है. ये ईद हज की ख़ुशी में मनाई जाती है और तीन दिन तक लोग क़ुर्बानी करते हैं. अहले-हदीस चार दिन क़ुर्बानी करते हैं. इन त्यौहारों के अलावा भी कई त्यौहार हैं, जिन्हें कुछ लोग पूरी अक़ीदत के साथ मनाते हैं. ऐसा ही एक त्यौहार है आख़िरी चहशंबा या आख़िरी चहार शंबा.

आख़िरी चहशंबा क्या है 
हिजरी कैलेंडर के दूसरे महीने के आख़िरी बुध को आख़िरी चहशंबा मनाया जाता है. माना जाता है कि सफ़र के महीने में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तबीयत नासाज़ हो गई थी. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुख़ार हो गया था और सिर में भी दर्द था. इस माह के आख़िरी बुध को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सेहतयाब हुए और ग़ुस्ल किया. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने परवरदिगार की इबादत की, खाना खाया और सैर के लिए चले गए. इस दिन ख़ास नफ़िल नमाज़ें भी पढ़ी जाती हैं. माहे सफ़र के आख़िरी बुध को ‘सैर बुध’ के नाम से भी जाना जाता है.

इस रोज़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाहने वाले लोगों ने अपने काम बंद रखे. उन्होंने भी ग़ुस्ल किया और अच्छे-अच्छे कपड़े पहने. उनके घरों में लज़ीज़ खाने पकाये गए. मीठे पकवान भी पकाये गए. उन्होंने शीरनी तक़सीम की. वे लोग भी अपने घरवालों के साथ तफ़रीह के लिए गए. कहने का मतलब यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सेहतयाब होने की ख़ुशी में आपके चाहने वालों ने ख़ुशियां मनाई थीं और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. 

क़ाबिले ग़ौर बात ये भी है कि इस त्यौहार की शुरुआत अरब की सरज़मीन में हुई थी, लेकिन अब वहां इस त्यौहार को मनाने के बारे में कोई जानकारी मुहैया नहीं है. लेकिन हिन्दुस्तान के बहुत से इलाक़ों में ये त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. ये इस देश की मिट्टी का असर है, यहां की आबोहवा का असर है कि यहां वह त्यौहार भी मनाए जाते हैं, जो अरब से लुप्त हो चुके हैं, ख़त्म हो चुके हैं. 

दरअसल भारत तीज-त्यौहारों का देश है. यहां अमूमन हर महीने कोई न कोई त्यौहार आता रहता है. बहुत से त्यौहारों का ताल्लुक़ मज़हब से है, तो बहुत से त्यौहारों का नाता लोक जीवन से है. आख़िरी चहशंबा का ताल्लुक़ भले ही मज़हब से न हो, लेकिन इसका नाता अक़ीदत से ज़रूर है. ये मुहब्बत का त्यौहार है. ये प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत से वाबस्ता त्यौहार है. और महबूब से वाबस्ता हर चीज़ से मुहब्बत हुआ करती है. 

हिन्दुस्तान के अलावा ये त्यौहार पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी मनाया जाता है, क्योंकि ये दोनों देश भी कभी हिन्दुस्तान का ही हिस्सा हुआ करते थे. बांग्लादेश में इस दिन एक वैकल्पिक मुस्लिम अवकाश है. मुसलमान इस दिन छुट्टी लेते हैं और इस त्यौहार को ख़ुशी-ख़ुशी मनाते हैं. 

कुछ जगहों पर इस दिन शीशे की सफ़ेद प्लेटों पर ज़ाफ़रान से क़ुरआन करीम की आयतें लिखने की रिवायत है. इसे सात सलाम के नाम से जाना जाता है. फिर इस प्लेट में पानी डालते हैं. जब प्लेट पर लिखी सब आयतें पानी में घुल जाती हैं, तो इस पानी को तावीज़ की सूरत में पी लिया जाता है. बुज़ुर्ग बताते हैं कि मुग़ल बादशाहों के दौर में ये त्यौहार ख़ूब हर्षोल्लास से मनाया जाता था. 

इसके बरअक्स बहुत से लोग मानते हैं कि सफ़र के आख़िरी चहार शंबा को अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मर्ज़ का आग़ाज़ हुआ था और इस दिन आसमान से बहुत सी बलायें ज़मीन पर उतरती हैं.  
  
मशहूर मौरिख़ इब्ने साद फ़रमाते हैं कि चहार शंबा 28 सफ़र को रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मर्ज़ का आग़ाज़ हुआ था. 
(तबक़ात इब्ने साद 206) 

मुहम्मद इदरीस कंधालवी तहरीर फ़रमाते हैं कि माहे सफ़र के आख़िरी अशरा में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार रात में उठे और फ़रमाया कि मुझे हुक्म हुआ है कि अहले बक़ी यानी मदीना मुनव्वरा के क़ब्रिस्तान के लिए अस्तग़फ़ार करूं. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वहां से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाज नासाज़ हो गए. सिर में दर्द और बुख़ार की शिद्दत पैदा हो गई. ये उम्म-उल-मोमिनीन हज़रत मैमूना रज़ियल्लाहु अन्हु की बारी का दिन था और बुध का रोज़ था. 
(सीरत अल मुस्तफ़ा 3/157 )

मुहम्मद शफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि 28 सफ़र हिजरी चहार शंबा की रात में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ब्रिस्तान बक़ी में तशरीफ़ ले गए और अहले क़बूर के लिए मग़फ़िरत की दुआ की. वहां से तशरीफ़ लाए, तो सिर में दर्द, फिर बुख़ार हो गया. ये बुख़ार सहीह रिवायत के मुताबिक़ 13 रोज़ तक मुसलसल रहा और इसी हालत में वफ़ात हो गई.
(सीरत-ए- ख़ातिमुल अम्बिया 141)      

बरेली मकतबा फ़िक्र के अहमद रज़ा ख़ान का फ़तवा है कि आख़िरी चहार शंबा की कोई असल नहीं है और न ही सेहतयाबी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कोई सबूत है, बल्कि मर्ज़ अक़दस जिसमें वफ़ात हुई, उसकी इब्तिदा इसी दिन से बताई जाती है.   
(अहकाम-ए-शरीअत 3/183)   

बरेली मकतबा फ़िक्र के आलमे-दीन मौलाना अमजद फ़रमाते हैं कि माहे सफ़र के आख़िरी चहार शंबा हिन्दुस्तान में बहुत मनाया जाता है. लोग अपने कारोबार बंद कर देते हैं और सैर व तफ़रीह को जाते हैं. पूरियां पकती हैं और नहाते- धोते हैं, ख़ुशियां मनाते हैं और कहते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस रोज़ ग़ुस्ले सेहत फ़रमाया था और बैरूने मदीने सैर के लिए तशरीफ़ ले गए थे. ये सब बातें बेअसल हैं, बल्कि उन दिनों में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मर्ज़ शिद्दत के साथ था. लोग जो बातें बताते हैं, वे सब ख़िलाफ़े-वाक़ा हैं.    

बहरहाल, मुसलमानों के मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों की मुख़्तलिफ़ बातें हैं और सब अपनी-अपनी अक़ीदत के हिसाब से ज़िन्दगी बसर करते हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यहां बसने वाले बहुत से मुसलमानों के रीति-रिवाजों में हिन्दुस्तानी तहजीब की झलक मिलती है. उनके त्यौहारों पर भी इसका साफ़ असर देखा जा सकता है. शायद इसी को गंगा-जमुनी तहज़ीब कहा जाता है. 
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल 


कोलकाता के पत्रकार राहुल मिश्रा ने सुप्रसिद्ध कॉमेडियन महमूद के बेटे मक़सूद अली उर्फ़ अली अली के हवाले से एक तहरीर लिखी है. ये सिर्फ एक तहरीर ही नहीं है, बल्कि इसमें ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा छुपा है. इसमें ज़िन्दगी को लेकर तीन नज़रिये बयां किए गये है, एक नज़रिया महमूद साहब का है, एक उनके बेटे लकी अली का है और तीसरा नज़रिया राहुल मिश्रा जी का है. इस तहरीर को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए. 

पत्रकार राहुल मिश्रा लिखते हैं- पिता के पास सत्ताईस गाड़ियां थीं। बेटे को छूने की इजाजत नहीं।..वो बेटा अगले महीने अड़सठ का हो जाएगा। और जब सफर पर निकलता है, तो बैग में एक चीज कभी नहीं भूलता। अपना कफन।
उसे पिता से रोज सुबह पांच रुपये मिलते थे।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं, 
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है। 
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए- 
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ 
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं, 
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया। 
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए 
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।


डॉ फ़िरदौस ख़ान
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...

जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...

हिन्दी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिन्दुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी’ गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया था. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. साल 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है’ ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फ़िल्म जागृति (1954) के गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तानकी’ और ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ़ इंडिया का गीत ‘नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं’ बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत ‘कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फ़िल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं’ बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी का गीत ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी’ आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फ़िल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...

राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फ़िल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...

इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फ़िल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबाड़ी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...

इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तूफ़ान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फ़रिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फ़िल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.

बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा… 


सरफ़राज़ ख़ान
देश को स्वतंत्र हुए छह देशक से भी ज्यादा का समय हो गया है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फ़हराया जाता है. मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि 15 अगस्त, 1947 की रात को जब देश आज़ाद हुआ था, उस वक़्त भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर जो तिरंगा लहराया फहराया था, वह कहां है?
इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. राष्ट्रीय ध्वज पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसा प्रतीक चिन्ह होता है जो पूरे देश की अस्मिता से जुड़ा होता है. यूं तो आज़ादी के बाद से हर बरस लाल क़िले पर फहरया जाने वाला तिरंगा देश की धरोहर है, लेकिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराये राष्ट्रीय ध्वज का अपना अलग ही एक महत्व है.
कुछ लोगों का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर लहराया गया तिरंगा नेहरू स्मारक में रखा गया है, जबकि स्मारक के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं. हैरत की बात तो यह भी है कि यह विशेष तिरंगा राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी मौजूद नहीं है. इस अभिलेखागार में 1946 में नौसेना विद्रोह के दौरान बाग़ी सैनिकों द्वारा फहराया गया ध्वज रखा हुआ है. बंबई में 1946 में नौसेना विद्रोह के वक्त तीन ध्वज फहराये गए थे. इनमें कांग्रेस का ध्वज, मुस्लिम लीग का ध्वज और कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज शामिल थे. इनमें से कांग्रेस का ध्वज अभिलेखागार में मौजूद है.

प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर फहराया गया ध्वज राष्ट्रीय संग्रहालय में भी नहीं है. राष्ट्रीय संग्रहालय के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ आम तौर पर ऐतिहासिक महत्व की ऐसी धरोहर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने की बात हुई थी, लेकिन बाद में इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया था. इसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के प्रबंध की देखरेख करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को सौंप दिया गा, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग तथा सर्च द फ्लैग मिशन के पास उस तिरंगे के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है.

15 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश के नाम संदेश देने दिया था और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने अपनी स्वर लहरियों से आज़ादी का स्वागत किया था.




सरफ़राज़ ख़ान
देश को स्वतंत्र हुए छह देशक से भी ज़्यादा का समय हो गया है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाता है. मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि 15 अगस्त, 1947 की रात को जब देश आज़ाद हुआ था, उस वक़्त भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल क़िले पर जो तिरंगा  फहराया था, वह कहां है?

इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. राष्ट्रीय ध्वज पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसा प्रतीक चिन्ह होता है, जो पूरे देश की अस्मिता से जुड़ा होता है. यूं तो आज़ादी के बाद से हर बरस लाल क़िले पर फहरया जाने वाला तिरंगा देश की धरोहर है, लेकिन 15 अगस्त, 1947 को लाल किले पर फहराए राष्ट्रीय ध्वज का अपना अलग ही एक महत्व है.
कुछ लोगों का कहना है कि 15 अगस्त, 1947 को लाल किले पर लहराया गया तिरंगा नेहरू स्मारक में रखा गया है, जबकि स्मारक के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं. हैरत की बात तो यह भी है कि यह विशेष तिरंगा राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी मौजूद नहीं है. इस अभिलेखागार में 1946 में नौसेना विद्रोह के दौरान बागी सैनिकों द्वारा फहराया गया ध्वज रखा हुआ है. बंबई में 1946 में नौसेना विद्रोह के वक्त तीन ध्वज फहराए गए थे. इनमें कांग्रेस का ध्वज, मुस्लिम लीग का ध्वज और कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज शामिल था. इनमें से कांग्रेस का ध्वज अभिलेखागार में मौजूद है.

प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर फहराया गया ध्वज राष्ट्रीय संग्रहालय में भी नहीं है. राष्ट्रीय संग्रहालय के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ आम तौर पर ऐतिहासिक महत्व की ऐसी धरोहर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने की बात हुई थी, लेकिन बाद में इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया था. इसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के प्रबंध की देखरेख करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को सौंप दिया गा, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग तथा सर्च फ्लैग मिशन के पास उस तिरंगे के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है.

15 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश के नाम संदेश देने दिया था और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने अपनी स्वर लहरियों से आज़ादी का स्वागत किया था.

राजेश कुमार गुप्ता  
हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में बहुत से ऐसे गुमनाम कलाकार हुए, जिन्होंने उस दौर में बेहद शानदार काम किया। और वक़्त के साथ कहीं ग़ुम हो गए। मशहूर कलाकारों को तो हम फिर भी याद कर लेते हैं। पर जिनका योगदान बहुत ज्यादा नहीं रहा। उनके बारे में हम अनजान ही रह जाते हैं। ऐसे ही एक गायक थे, "मोहम्मद हुसैन फ़ारूक़ी"। 1947 से 1950 के दौरान फ़ारूक़ी साहब ने कई फिल्मों में गीत गाये, व दो फिल्मों में अभिनय भी किया। आज उनकी यौमे-पैदाइश पर ख़िराज-ऐ-अक़ीदत.

फ़ारूक़ी साहब की पैदाइश 17 अगस्त 1915 को राजस्थान के झुंझुनू शहर के मोहल्ला पीरज़ादगांव में एक मज़हबी परिवार में हुई थी। इनकी बुनियादी शिक्षा इनके वालिद हाज़ी मुनीरुद्दीन के द्वारा घर पर ही हुई। इन्हें बचपन से ही गाने का बेहद शौक था। संगीत की दुनिया उन्हें बेहद लुभाती थी। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने राजस्थान के तमाम स्टेज समारोहों में गाना शुरू किया। पर उनके वालिद साहब उनके गाने के सख़्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई पूरी करके एक शिक्षक बनें। पर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। और एक दिन 1945 में वे अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के नाम एक सिफारिशी ख़त लेकर गायक के रूप में किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। बम्बई में उनके जानने वाले एकमात्र शख़्स थे, आज़ाद फ़ारूक़ी, जो पुराने खार इलाके में रहते थे। तो वे कुछ समय के लिए उन्हीं के साथ रहने लगे।

आख़िरकार एक साल संघर्ष के उपरांत खेमचंद प्रकाश जी ने उन्हें अपने घर मिलने के लिए बुलाया। जब वे वहां पहुंचे, तो वहां पर मशहूर गायक व अभिनेता के एल सहगल जी भी मौजूद थे। सहगल साहब ने उन्हें कुछ गाने के लिए कहा, तो फ़ारूक़ी साहब ने उन्हीं की गाई, मशहूर लोरी, 'सो जा राजकुमारी सो जा ...' गा के सुनाई। सहगल साहब बेहद प्रभावित हुए, और बोले, बहुत बढ़िया, तुम्हारी आवाज़ में कुछ नयापन है। बस फिर क्या था, सहगल साहब की इतनी सी तारीफ बहुत थी, और उनका 'रंजीत मूवीटोन' के साथ मासिक वेतन पर अनुबंध हो गया।

कुछ समय बाद सह-गायक के रूप में उन्हें पहली फिल्म मिली। पर उन्हें असली सफलता 1947 में मिली। ये उनके संगीत सफर का सुनहरा दौर रहा। इस साल उनकी 'छीन ले आज़ादी', 'दुनिया एक सराय', 'लाखों में एक' और 'पहली पहचान' फिल्में रिलीज हुईं। इनमें इनके गाये सभी गानों को ख़ूब सराहा गया। ख़ासकर फिल्म 'छीन ले आज़ादी' का गाना, 'कमजोरों की नहीं है दुनिया ...', स्वतंत्रता सेनानियों के बीच बेहद मशहूर हुआ था। और हमने जल्द ही स्वतंत्र राष्ट्र का लक्ष्य भी हासिल कर लिया था। इसके बाद एक और गीत, जिसने, फ़ारूक़ी साहब को बुद्धिजीवियों व मज़दूर वर्ग का चहेता बना दिया। वो था, फिल्म 'दुनिया एक सराय' का गीत, 'एक मुसाफ़िर आये बाबा एक मुसाफ़िर जाए ...'। फ़िर 1948 की फिल्म 'जय हनुमान' के भजन और 'मिट्टी के खिलौने' के भजन 'इस ख़ाक के पुतले को ...' भी लोगों ने ख़ूब सराहा। इनकी अगली दो फिल्में 'भूल भुलैया' 1949 और 'अलख निरंजन' भी बेहद सफल रहीं।

फ़ारूक़ी साहब उन गायकों में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के सफलता पाई थी। अभी वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि 1950 के आख़री महीने में उन्हें अपने वालिद के काफी बीमार होने का पैगाम मिला। लगातार मिल रही सफलता के बावजूद उन्हें वापस जाना पड़ा। और फिर वो दुबारा वापस बम्बई नहीं लौटे। उपरोक्त फिल्मों के अलावा 'बिछड़े बलम', 'परदेसी मेहमान' 1948 और 1947 की दो फिल्मों 'नील कमल' और पिया घर आजा' में उन्होंने अभिनय भी किया था। अपनी बाकी की ज़िंदगी उन्होंने समाज सेवा में व्यतीत की। और 8 फरवरी 1990 को 75 वर्ष की आयु में इस फ़ानी दुनिया से हमेशा के लिए रुख़सत हो गए।

उनके निधन के उपरांत उनके किसी मित्र ने उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा था ...
ख़बर क्या थी मोहम्मद आप हमें तन्हा छोड़ जाएंगे,
दिल-ए-रहबर को ग़मगीन और पुरनम बनाएंगे...
अब न सुबहा आएगी इस शाम के बाद,
बस हम तो सिर्फ़ आप के गीत गुनगुनायेंगे...

जब भी हिंदी सिनेमा के गुमनाम प्रतिभाओं को याद किया जाएगा, तो उस फ़ेहरिस्त में 'मोहम्मद हुसैन फ़ारूक़ी साहब' का नाम अवश्य दर्ज होगा.

अर्चना महतो
बजा बिगुल विद्रोह का, नारों ने भरी हुंकार
हिली हुकूमत अंग्रेजों की, जब चले शब्दों के बाण
 जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं. शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है. ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है, जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी शब्दों की शक्ति का ऐसा ही दौर चला. नारों की शक्ल अख्तियार किए कुछ शब्दों ने जनांदोलन में ऐसी जान फूंकी कि ब्रिटिश हुक्मरानों के इरादे शिथिल पड़ गए. नारों की एक-एक गूंज ने ब्रिटिश सत्ता पर आघात किया, जिसका परिणाम आखिरकार अंग्रेजी शासन के खात्मे के रूप में सामने आया.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कुछ लोकप्रिय नारों की उत्पत्ति और उनका इतिहास कुछ इस तरह रहा-
“इंकलाब जिंदाबाद”
1929 में क्रांतिकारी भगत सिंह ने सेंट्रल असेंबली, दिल्ली में धमाके के बाद जब “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दोहराया तो अवाम की जुबां पर उसके बाद बस यही नारा गूंजने लगा. दरअसल “इंकलाब जिंदाबाद” के असली जनक ‘हसरत मोहानी’ माने जाते हैं, जिन्होंने 1921 में इसकी रचना की थी. लेकिन भगत सिंह की जुबां से “इंकलाब जिंदाबाद” की गूंज के बाद जो लोकप्रियता इस नारे को मिली और जिस प्रकार इस नारे ने जनसाधारण में आजादी की अलख जगाई, उसका वर्णन इतिहास के पन्नों पर अमूल्य योगदान के तौर पर दर्ज है.

मॉडर्न रिव्यू के संपादक श्री रामानंद चट्टोपाध्याय ने संपादकीय टिप्पणी में जब "इंकलाब जिंदाबाद' नारे की आलोचना की, तब दिसंबर, 1929 को अपने और साथी बटुकेश्वर दत्त की तरफ से भगत सिंह ने जो पत्र श्री चट्टोपाध्याय को भेजा, उसके एक अंश में “इंकलाब जिंदाबाद” की व्याख्या कुछ इस प्रकार से की-

“उदाहरण के लिए हम यतिन्द्रनाथ जिंदाबाद का नारा लगाते हैं, इससे हमारा तात्पर्य यह होता है उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिए बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी. यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए अचूक उत्साह को अपनाएं. यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं. इस प्रकार हमें ‘इंकलाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए. इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं. क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है.
“वंदे मातरम्”
‘वंदे मातरम्’ इन दो शब्दों की ताकत और अहमियत का जितना वर्णन किया जाए उतना कम है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस नारे की लोकप्रियता का आलम कुछ इस कदर रहा कि एक समय ब्रिटिश सरकार को इस पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में सोचना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद वंदे मातरम् ने जनमानस में जिस जनचेतना की लहर उत्पन्न की, उसे रोक पाना अंग्रेजों के लिए असंभव हो गया था.

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में की थी. वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में थे. इस गीत का प्रकाशन 1882 में बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘आनंद मठ” में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ था. बंगाल में चले आजादी के आंदोलन में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा. धीरे-धीरे यह गीत लोगों में बेहद लोकप्रिय हो गया. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ 1896 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया था. 14 अगस्त,1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ गीत के साथ ही हुई थी.
‘वंदे मातरम्’ नारे ने जनजागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ‘वंदे मातरम्’ न केवल अवाम की जुबां पर गूंजने वाला अत्यधिक लोकप्रिय नारा था, बल्कि उस दौर की कई पत्र-पत्रिकाओं,पुस्तकों सहित कई प्रकाशनों का शीर्षक भी बना. इसके व्यापक उदाहरण मौजूद हैं- लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम वंदे मातरम् रखा. सन् 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम्’ ही लिखा हुआ था. आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘वंदे मातरम्’ था.



“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”

स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से एक बाल गंगाधर तिलक का "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा" का उद्घोष बेहद लोकप्रिय हुआ. आदर से लोग इन्हें "लोकमान्य" बुलाने लगे थे.  उनके मतानुसार ‘स्वराज” भारतीयों का अधिकार है और ब्रिटिश सरकार को सत्ता भारतीयों को सौंप कर देश से चले जाना चाहिए. इसके लिए हक लड़कर भी लेना पड़े तो लिया जाएगा’. आजादी के महानायकों में से एक बाल गंगाधर तिलक ने संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पण कर दिया. जनजागृति के लिए उन्होंने अपनी पत्रकारिता की प्रतिभा का अद्भुत उपयोग किया. उनके दो समाचारपत्रों ‘मराठा’ और ‘केसरी’ ने लोगों को आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई. तिलक ने अपने भाषणों और लेखों द्वारा जनता से आग्रह किया कि वह आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, निर्भय और निस्वार्थी बने. उन्होंने आम जनता में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करने के लिए शिवाजी पर्व और गणेश उत्सव की शुरुआत की.
 “अंग्रेजों भारत छोड़ो”
‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ मात्र एक नारा नहीं था, बल्कि एक आंदोलन था जिसका शंखनाद अहिंसा के प्रतीक महात्मा गांधी द्वारा किया गया था. क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधी जी ने एक और बड़ा आंदोलन शुरू करने का निश्चय किया. इसको ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नाम दिया गया और यहीं से शुरुआत हुई ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे की. 9 अगस्त 1942 को आंदोलन की शुरुआत के साथ जब “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के नारे लगने लगे तब अंग्रेजों के हौसले बिल्कुल पस्त हो गए.

हालांकि, अंग्रेजों ने इस आन्दोलन के खिलाफ कड़ा रुख इख्तियार किया और आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी नीतियों का प्रयोग किया, लेकिन वे लोगों के हौसले को दबाने में असफल रहे. द्वितीय विश्व युद्ध में उलझने के कारण इंग्लैंड की ताकत और सत्ता की पकड़ में आई कमी को भांपते हुए एक ही समय पर, महात्मा गांधी द्वारा ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ तथा सुभाष चंद्र बोस द्वारा ‘दिल्ली चलो’ नारे दिए गए थे, जिन्होंने अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अंग्रेजों की ताकत को कमजोर करने में उम्मीद के मुताबिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
 “करो या मरो”
‘करो या मरो’ का नारा भी गांधी जी द्वारा ही दिया गया था, जो भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम का ही एक हिस्सा था. 1942 में ‘बॉम्बे में अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक को संबोधित करते हुए ‘करो या मरो’ की बात कही थी. उन्होंने कहा था – “एक मंत्र है, छोटा सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूं. उसे आप अपने हृद्य में अंकित कर सकते हैं और प्रत्येक सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं. यह मंत्र है: ‘करो या मरो’. या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे, अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे.” यहीं से ‘करो या मरो’ वो नारा बना जिसने जनता में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी जला दी.
 “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”
स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में जब मुल्क अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मजबूती से खड़ा था और स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों को धूल-चटाने में जुटे थे, तब आजादी के एक और महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद फौज के गठन के साथ ही ब्रिटिश राज के खात्मे की पूरी तैयारी कर ली थी.

4 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद फौज के साथ बर्मा पहुंचने पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा दिया. इस नारे से ऐसी जनजागृति हुई कि लोगों का हुजूम आजादी के महासंघर्ष में कूद पड़ा.

नेताजी के संबोधन के वो आखिरी प्रभावशाली शब्द कुछ ऐसे थे–
“स्वतंत्रता के युद्ध में मेरे साथियों! आज मैं आपसे एक चीज मांगता हूं, सबसे ऊपर मैं आपसे खून मांगता हूं. यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो शत्रु ने बहाया है. खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है. तुम मुझे खून दो मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं.”
“जय हिंद”
‘जय हिंद’ का नारा भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सन् 1941 में दिया था, वैसे तो इस नारे का प्रयोग सर्वप्रथम क्रांतिकारी चेम्बाकरमण पिल्लई द्वारा किया गया था, लेकिन सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज के लिए युद्ध घोष के तौर पर प्रयोग हुए इस नारे ने अधिक लोकप्रियता प्राप्त की. देशप्रेम की भावना से सराबोर होने के कारण ‘जय हिंद’ नारा अवाम में बेहद प्रचलित हुआ.
 सन् 1933 में जब चेम्बाकरमण पिल्लई को आस्ट्रिया की राजधानी वियना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, तब उन्होंने “जय हिन्द” कह कर नेताजी का अभिवादन किया था. अभिवादन स्वरूप कहे गए इन दो शब्दों से नेताजी बेहद प्रभावित हुए थे. बाद में यही शब्द आजाद हिन्द फौज के युद्ध घोष के रूप में जाने गए.

आजाद हिंद फौज के सैनिकों में देशप्रेम की भावना भरने और आजादी की लौ जगाने के लिए ‘जय हिंद’ का प्रयोग हुआ था, लेकिन सैनिकों के साथ-साथ जनता के बीच भी यह नारा बेहद लोकप्रिय हुआ.
“दिल्ली चलो”
1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही आजाद हिंद फौज को “दिल्ली चलो” का आह्वान करते हुए यह नारा दिया था. सन् 1942 में आजाद हिंद फौज के मुखर नेता होते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महसूस किया कि इंग्लैंड द्वितीय विश्व युद्ध में उलझता जा रहा है, तब उस समय यह नारा देकर उन्होंने फौज का मार्गदर्शन किया.

सुभाष चन्द्र बोस मानते थे कि अंग्रेज खुद भारत को आजाद नहीं करेंगे, इसलिए अंग्रेजों से लड़कर ही आजादी पाई जा सकती है. इसी लक्ष्य के साथ उन्होंने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सत्ता पर धावा बोलने के इरादे से ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया.
 “साइमन कमीशन वापस जाओ”
लाला लाजपत राय द्वारा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा सन् 1928 में दिया गया था. दरअसल, इस नारे की उत्पत्ति 8 नवंबर, 1927 को घोषित साइमन कमीशन के गठन का परिणाम था. 1927 में भारत में संवैधानिक सुधारों के अध्ययन के लिए सात ब्रिटिश सांसदों के समूह वाले साइमन कमीशन का गठन किया गया था. कमीशन को इस बात की जांच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिए जाए. लेकिन कमीशन में केवल ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सात सदस्यों को ही शामिल किया गया और यही जनता के बीच आक्रोश का प्रमुख कारण बना.

कांग्रेस के 1927 के मद्रास अधिवेशन में ‘साइमन कमीशन’ के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया गया. इस कमीशन से भारतीयों के आत्मसम्मान को बेहद ठेस पहुंची थी. इसलिए जब फरवरी 1928 में आयोग के सदस्य बंबई पहुंचे तो उनके खिलाफ अभूतपूर्व हड़ताल का आयोजन किया गया. विरोध में काले झंडे दिखाए गए और ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगाकर आक्रोश जताया गया.

इसी विरोध के दौरान पुलिस की लाठियों से जख्मी होने के कारण लाला लाजपत राय शहीद हो गए. लेकिन अंतिम समय तक अंग्रेजों को ललकारते हुए उन्होंने कहा “‘मेरे सिर पर लाठी का एक-एक प्रहार, अंग्रेजी शासन के ताबूत की कील साबित होगा.”

ये मात्र कुछ ऐसे नारे हैं, जिन्होंने लोकप्रियता की बुलंदी को छूते हुए जनमानस के रग-रग में देशप्रेम की धारा प्रवाहित की. हालांकि, इसके अलावा भी कई और ऐसे नारे थे, जिनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता. कभी गीत, कभी गजल तो कभी कथन के तौर पर उभरे इन नारों ने शब्दरूपी बाणों की तरह प्रहार किया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत छलनी और सत्ता जमींदोज हो गई.
(लेखिका पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली में सूचना सहायक के पद पर कार्यरत हैं.)




डॉ. फ़िरदौस ख़ान
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री व ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त, 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रवींद्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.

कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी, 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर. मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं :-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…

मीना कुमारी की ग़ज़लों में मुहब्बत है, शोख़ी है. वह कहती हैं-
रूह का चेहरा किताबी होगा
जिस्म का रंग अनाबी होगा
शरबती रंग से लिखूं आंखें
और अहसास शराबी होगा
चश्मे-पैमाने से टपका आंसू
कोई बेचारा सवाबी होगा...

धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं :-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…

ज़िन्दगी में मुहब्बत हो, तो ज़िन्दगी सवाब होती है. और जब न हो, तो उसकी तलाश होती है... और इसी तलाश में इंसान उम्रभर भटकता रहता है. अपनी एक ग़ज़ल में मीना कुमारी उम्र भर मुहब्बत को तरसती हुई औरत की तड़प बयां करते हुए कहती हैं-
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुंवारे सजदे
एक-एक बुत को ख़ुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए कांटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा...

कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…

बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…

मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है-
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…

प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी की आज बरसी है. आज ही के दिन 1972 में इस महान अभिनेत्री ने आखिरी सांस ली थी.  मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन के नाम से जाना जाता है. दुखांत फिल्मों में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिए उन्हें यह नाम दिया गया था.

मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था. उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मंजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था. उनकी मां प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो) भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थीं. उनका संबंध टैगोर परिवार से था. माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिए छह साल की उम्र में काम किया था. उनका नाम मीना कुमारी विजय भट्ट की लोकप्रिय फिल्म 'बैजू बावरा' पड़ा. मीना कुमारी की शुरुआती फिल्में ज़्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं. मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नई अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरू हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं.

1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ. परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूंकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गई थी. लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत किरदार करने वाले की होकर सीमित हो गई.

मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गईं. शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं, लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की. उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में प्रकाशित हुईं.
पेश है मीना कुमारी की चंद नज़्में

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जितना-जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूंदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आंखें हंस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आंखों में, सादा सी जो बात मिली

चांद तन्हा है, आसमां तन्हा

दिल मिला है कहां-कहां तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा।
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं।
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।
हमसफ़र कोई मिल गया जो कहीं
दोनों चलते रहे यहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा

दिन गुज़रता नज़र नहीं आता
रात काटे सेभी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक खौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिस राह से उठाया है
शाम का यह उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख बढ़ता जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो कुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों के तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आगोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है

मुसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है,
न जाने कौन-सी उम्मीदों पे दिल ठहरा है
तेरी आंखों में झलकते हुए इस गम की क़सम
ए दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है

वक़्त ने छीन लिया हौसला-ए-जब्ते सितम
अब तो हादिसा-ए- ग़म पे तड़प उठता है दिल
हर नए ज़ख्म पे अब रूह बिलख उठती है
होंठ अगर हंस भी पड़े आंख छलक उठती है
ज़िन्दगी एक बिखरता हुआ दर्दाना है
ऐसा लगता है कि अब ख़त्म पर अफ़साना है


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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