पूरे चाँद की रात
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*डॉ फ़िरदौस ख़ान*आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती
हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल...
अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है. शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया. अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने तक़रीबन एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है. उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई. इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे.
अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण
ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों में उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया. इससे पहले उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत किया गया. अमृता को 1988 में अंतरराष्ट्रीय बल्गारिया वैरोव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें 1982 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया. अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं. उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई.
अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखा है, यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से सदा दूसरे स्थान पर रही है. कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं. सिर्फ़ लेखक का रूप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है. पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अंदर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया. वहां उस वक़्त थोड़ी सी भी ख़ाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती. यह याद केवल अब कर सकती हूं, वर्षों की दूरी पर खड़ी होकर. पहला वक़्त तब देखा था जब मेरी उम्र पच्चीस वर्ष की थी. मेरे कोई बच्चा नहीं था और मुझे प्राय: एक बच्चे का स्वप्न आया करता था. जब मैं जाग जाती थी. मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली. एक सिर्फ़ औरत, जो अगर मां नहीं बन सकती थी तो जीना नहीं चाहती थी. और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई.
दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, उसे हल्का सा बुख़ार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने विक्स मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खड़े मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र ग़ुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़ क़लम की आवश्यकता नहीं थी.
और तीसरी बार यह सिर्फ़ औरत मैंने तब देखी थी, जब अपने स्टूडियो में बैठे हुए इमरोज़ ने अपना पतला सा ब्रश अपने काग़ज़ के ऊपर से उठाकर उसे एक बार लाल रंग में डुबोया था और फिर उठकर उस ब्रश से मेरे माथे पर बिंदी लगा दी थी. मेरे भीतर की इस सिर्फ़ औरत की सिर्फ़ लेखक से कोई अदावत नहीं. उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में खड़े होना स्वीकार कर लिया है. अपने बदन को अपनी आंखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आंखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अगली जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के सिर्फ़ लेखक ने पीछे हटकर उसके लिए जगह ख़ाली कर दी थी.
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम को लेकर कई क़िस्से हैं. अमृता प्रीतम ने भी बेबाकी से साहिर के प्रति अपने प्रेम को बयां किया है. वह लिखती हैं, मैंने ज़िंदगी में दो बार मुहब्बत की. एक बार साहिर से और दूसरी बार इमरोज़ से. अक्षरों के साये में जवाहर लाल नेहरू और एडविना पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए वह कहती हैं, मेरा और साहिर का रिश्ता भी कुछ इसी रोशनी में पहचाना जा सकता है, जिसके लंबे बरसों में कभी तन नहीं रहा था, सिर्फ़ मन था, जो नज़्मों में धड़कता रहा दोनों की.
लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था, तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी से निकला हुआ ख़ामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था. वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था. और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े-छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी, एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं. वह कहती हैं-
मेरे इस जिस्म में
तेरा सांस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी सांसों में
कुछ हवा में मिल गई
अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में इमरोज़ के बारे में भी विस्तार से लिखा है. एक जगह वह लिखती हैं-
मुझ पर उसकी पहली मुलाक़ात का असर-मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया, और तेज़ बुख़ार चढ़ गया. उस दिन-उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था-बहुत बुख़ार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं.
कभी हैरान हो जाती हूं. इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत, जो उसकी अपनी ख़ुशी का मुख़ालिफ़ है. एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता, और वह मुझे, मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा- मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता. सोचती हूं, क्या ख़ुदा इस जैसे इंसान से कहीं अलग होता है. अपनी एक कविता में वह अपने जज़्बात को कुछ इस तरह बयां करती हैं-
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूं
कि वक़्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी
एक बार जब अमृता प्रीतम से पूछा गया कि ज़िंदगी में उन्हें किस चीज़ ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया तो जवाब में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाते हुए कहा था, 1961 में जब मैं पहली बार रूस गई थी तब ताजिकिस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली, जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बनाकर रहते थे. औरत की नीली और मर्द कि काली आंखों में क्षण-क्षण जिए हुए इश्क़ का जलाल था. पता चला अब कि साठ-सत्तर बरस की उम्र इश्क़ का एक दस्तावेज़ है. मर्द की उठती जवानी थी, जब वह किसी काम से कश्मीर से यहां आया था और उस नीली आंखों वाली सुंदरी की आंखों में खोकर यहीं का होकर रहा गया था और फिर कश्मीर नहीं लौटा. वह दो देशों की नदियों की तरह मिले और उनका पानी एक हो गया. वे यहीं एक कुटिया बनाकर रहने लगे. अब यह कुटिया उनके इश्क़ की दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ़ बांधकर और गले में एक चोग़ा पहनकर जंगल के पेड़ों की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहनकर आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है. वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठकर उनके हाथों उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसी ज़िंदगी नसीब हो. यह ख़ुदा के फ़ज़ल से कहूंगी कि मुझे वह मुराद मिली है.
अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिल्कुल नई बीवी है। एक तो नई इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नई हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नई है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे।
पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरिया वाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अँगोछा पानी से ही भीगा होता है, इस पर साधारण-सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है... ‘‘उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं भीगा हुआ अँगोछा भी सुखा दिया है।’’
इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था। पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की माँ गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पाँच सालों पर जा पड़ी थी... फिर एक-एक कर पाँच साल भी निकल गए थे और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गाँव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, या फिर वह भी गांव से नहीं लौटेगा। मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते थे। पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछे वाली कच्ची जगह को पोतकर अपना चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गये थे। सो अंगूरी शहर आ गयी थी। चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या औरतों से भी घूँघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूँघट झीना हो गया था। वह पैरों में चाँदी के झाँझरें पहनकर छनक-छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गयी थी। एक झाँझर उसके पाँवों में पहनी होती, एक उसकी हँसी में। चाहे वह दिन के अधिकरतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक़ उसके पाँवों के साथ-साथ चलती थी।
‘यह क्या पहना है, अंगूरी ?’’
‘‘यह तो मेरे पैरों की छैल चूड़ी है।’’
‘‘और यह उँगलियों में ?’’
‘‘यह तो बिछुआ है।’’
‘‘और यह बाहों में ?’’
‘‘यह तो पछेला है।’’
‘‘और माथे पर ?’’
‘आलीबन्द कहते हैं इसे।’’
‘‘आज तुमने कमर में कुछ नहीं पहना ?’’
‘‘तगड़ी बहुत भारी लगती है, कल को पहनूंगी। आज तो मैंने तौक भी नहीं पहना। उसका टाँका टूट गया है कल शहर में जाऊँगी, टाँका भी गढ़ाऊँगी और नाक कील भी लाऊँगी। मेरी नाक को नकसा भी था, इत्ता बड़ा, मेरी सास ने दिया नहीं।’’
इस तरह अंगूरी अपने चाँदी के गहने एक नख़रे से पहनती थी, एक नखरे से दिखाती थी।
पीछे जब मौसम फिरा था, अंगूरी का अपनी छोटी कोठरी में दम घुटने लगा था। वह बहुत बार मेरे घर के सामने आ बैठती थी। मेरे घर के आगे नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, और इन पेड़ों के पास ज़रा ऊँची जगह पर एक पुराना कुआँ है। चाहे मुहल्ले का कोई भी आदमी इस कुएँ से पानी नहीं भरता, पर इसके पार एक सरकारी सड़क बन रही है और उस सड़क के मज़दूर कई बार इस कुएँ को चला लेते हैं जिससे कुएँ के गिर्द अकसर पानी गिरा होता है और यह जगह बड़ी ठण्डी रहती है।
‘‘क्या पढ़ती हो बीबीजी ?’’ एक दिन अंगूरी जब आयी, मैं नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर एक किताब पढ़ रही थी।
‘तुम पढ़ोगी ?’’
‘‘मेरे को पढ़ना नहीं आता।’’
‘‘सीख लो।’’
‘‘ना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘औरतों को पाप लगता है पढ़ने से।’’
‘‘औरतों को पाप लगता है, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘ना, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘यह तुम्हें किसने कहा है ?"
‘‘मैं जानती हूँ।’’
"फिर तो मैं पढ़ती हूँ मुझे पाप लगेगा?’’
‘‘सहर की औरत को पाप नहीं लगता, गांव की औरत को पाप लगता
मैं भी हँस पड़ी और अंगूरी भी। अंगूरी ने जो कुछ सीखा-सुना हुआ था, उसमें कोई शंका नहीं थी, इसलिए मैंने उससे कुछ न कहा। वह अगर हँसती-खेलती अपनी जिन्दगी के दायरे में सुखी रह सकती थी, तो उसके लिए यही ठीक था। वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का मांस गुथा हुआ था। कहते हैं- औरत आटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का मांस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का मांस बिलकुल ख़मीरे आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का मांस इतना सख़्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो।... मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिण्डलियों की ओर... वह इतने सख़्त मैदे की तरह गुथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने क़द का, ढलके हुए मुँह का, कसोरे जैसा और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर उसके ख़ाविन्द के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आटे की इस घनी गुथी लोई को पकाकर खाने का हक़दार नहीं- वह इस लोई को ढककर रखने वाला कठवत है। इस तुलना से मुझे खुद ही हंसी आ गई। पर मैंने अंगूरी को इस तुलना का आभास नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए उससे मैं उसके गाँव की छोटी-छोटी बातें करने लगी।
माँ-बाप की, बहन-भाइयों की, और खेतों-खलिहानों की बातें करते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘अंगूरी, तुम्हारे गांव में शादी कैसे होती है ?’’
‘‘लड़की छोटी-सी होती है। पाँच-सात साल की, जब वह किसी के पाँव पूज लेती है।’’
‘‘कैसे पूजती है पाँव?’’
‘लड़की का बाप जाता है, फूलों की एक थाली ले जाता है, साथ में रुपये, और लड़के के आगे रख देता है।’’
‘‘यह तो एक तरह से बाप ने पाँव पूज लिये। लड़की ने कैसे पूजे ?’’
‘‘लड़की की तरफ़ से तो पूजे।’’
‘‘पर लड़की ने तो उसे देखा भी नहीं?’’
‘‘लड़कियाँ नहीं देखतीं।’’
‘‘लड़कियाँ अपने होने वाला ख़ाविन्द को नहीं देखतीं।’’
‘‘ना’’
‘‘कोई भी लड़की नहीं देखती?’’
‘‘ना’’
पहले तो अंगूरी ने ‘ना’ कर दी पर फिर कुछ सोच-सोचकर कहने लगी, ‘‘जो लड़कियाँ प्रेम करती हैं, वे देखती हैं।’’
‘‘तुम्हारे गाँव में लड़कियाँ प्रेम करती हैं?’’
‘‘कोई-कोई’’
‘‘जो प्रेम करती हैं, उनको पाप नहीं लगता?’’ मुझे असल में अंगूरी की वह बात स्मरण हो आयी थी कि औरत को पढ़ने से पाप लगता है। इसलिए मैंने सोचा कि उस हिसाब से प्रेम करने से भी पाप लगता होगा।
‘‘पाप लगता है, बड़ा पाप लगता है।’’ अंगूरी ने जल्दी से कहा।
‘‘अगर पाप लगता है तो फिर वे क्यों प्रेम करती हैं ?’’
‘‘जे तो...बात यह होती है कि कोई आदमी जब किसी की छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।’’
‘‘कोई क्या खिला देता है उसको?’’
‘‘एक जंगली बूटी होती है। बस वही पान में डालकर या मिठाई में डाल कर खिला देता है। छोकरी उससे प्रेम करने लग जाती है। फिर उसे वही अच्छा लगता है, दुनिया का और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘सच?’’
‘‘मैं जानती हूँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है।’’
‘‘किसे देखा था ?’’
‘‘मेरी एक सखी थी। इत्ती बड़ी थी मेरे से।’
‘‘फिर?’’
‘‘फिर क्या? वह तो पागल हो गयी उसके पीछे। सहर चली गयी उसके साथ।’’
‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलाई थी ?’’
‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलाई थी ?’’
‘‘बरफी में डालकर खिलाई थी। और नहीं तो क्या, वह ऐसे ही अपने माँ-बाप को छोड़कर चली जाती? वह उसको बहुत चीज़ें लाकर देता था। सहर से धोती लाता था, चूड़ियाँ भी लाता था शीशे की, और मोतियों की माला भी।’’
‘‘ये तो चीज़ें हुईं न! पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि उसने जंगली बूटी खिलाई थी!’’
‘‘नहीं खिलाई थी तो फिर वह उसको प्रेम क्यों करने लग गयी?’’
‘‘प्रेम तो यों भी हो जाता है।’’
‘‘नहीं, ऐसे नहीं होता। जिससे माँ-बाप बुरा मान जाएँ, भला उससे प्रेम कैसे हो सकता है ?’’
‘‘तूने वह जंगली बूटी देखी है?’’
‘‘मैंने नहीं देखी। वो तो बड़ी दूर से लाते हैं। फिर छिपाकर मिठाई में डाल देते हैं, या पान में डाल देते हैं। मेरी माँ ने तो पहले ही बता दिया था कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाना।’’
‘‘तूने बहुत अच्छा किया कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाई। पर तेरी उस सखी ने कैसे खा ली?’’
‘‘अपना किया पाएगी’’
‘‘किया पाएगी’’ कहने को तो अंगूरी ने कह दिया पर फिर शायद उसे सहेली का स्नेह याद आ गया या तरस आ गया, दुखे मन से कहने लगी, ‘‘बावरी हो गई थी बेचारी! बालों में कंघी भी नहीं लगाती थी। रात को उठ-उठकर गाती थी।’’
‘‘क्या गाती थी?’’
‘‘पता नहीं, क्या गाती थी। जो कोई जड़ी बूटी खा लेती है, बहुत गाती है। रोती भी बहुत है।’’
बात गाने से रोने पर आ पहुँची थी। इसलिए मैंने अंगूरी से और कुछ न पूछा।
और अब थोड़े ही दिनों की बात है। एक दिन अंगूरी नीम के पेड़ के नीचे चुपचाप मेरे पास आ खड़ी हुई। पहले जब अंगूरी आया करती थी तो छन-छन करती, बीस गज़ दूर से ही उसके आने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी, पर आज उसके पैरों की झाँझरें पता नहीं कहाँ खोयी हुई थीं। मैंने किताब से सिर उठाया और पूछा, ‘‘क्या बात है, अंगूरी ?’’
अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही और फिर धीरे से बोली "मुझे पढना सीखा दो बीबी जी"... और चुपचाप फिर मेरी आँखों में देखने लगी...
लगता है इसने भी जंगली बूटी खा ली...
"क्यूँ अब तुम्हे पाप नहीं लगेगा, अंगूरी"... यह दोपहर की बात थी शाम को जब मैं बाहर आई तो वह वहीं नीम के पेड़ के नीचे बैठी थी और उसके होंठो पर गीत था पर बिलकुल सिसकी जैसा...मेरी मुंदरी में लागो नगीन्वा, हो बैरी कैसे काटूँ जोबनावा ..अंगूरी ने मेरे पैरों की आहट सुन ली और चुप हो गयी...
"तुम तो बहुत मीठा गाती हो... आगे सुनाओ न गा कर"
अंगूरी ने आपने कांपते आंसू वही पलकों में रोक लिए और उदास लफ़्ज़ों में बोली "मुझे गाना नहीं आता है"
"आता तो है"
"यह तो मेरी सखी गाती थी उसी से सुना था"
"अच्छा मुझे भी सुनाओ पूरा"
"ऐसे ही गिनती है बरस की... चार महीने ठंडी होती है, चार महीने गर्मी और चार महीने बरखा"... और उसने बारह महीने का हिसाब ऐसे गिना दिया जैसे वह अपनी उँगलियों पर कुछ गिन रही हो...
"अंगूरी?"
और वह एक टक मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी... मन मैं आया की पूछूँ की कहीं तुमने जंगली बूटी तो नहीं खा ली है... पर पूछा की "तुमने रोटी खाई?"
"अभी नहीं"
"सवेरे बनाई थी? चाय पी तुने?"
"चाय? आज तो दूध ही नहीं लिया"
"क्यों नहीं लिया दूध?"
"दूध तो वह रामतारा..."
वह हमारे मोहल्ले का चौकीदार था, पहले वह हमसे चाय ले कर पीता था पर जब से अंगूरी आई थी वह सवेरे कहीं से दूध ले आता था, अंगूरी के चूल्हे पर गर्म कर के चाय बनाता और अंगूरी, प्रभाती और रामतारा तीनो मिल कर चाय पीते... और तभी याद आया की रामतारा तो तीन दिन से अपने गांव गया हुआ है।
मुझे दुखी हुई हंसी आई और कहा कि क्या तूने तीन दिन से चाय नही पी है?
"ना"
"और रोटी भी नहीं खायी है न"
अंगूरी से कुछ बोला न गया... बस आँखों में उदासी भरे वही खड़ी रही...
मेरी आँखों के सामने रामतारे की आकृति घूम गयी... बड़े फुर्तीले हाथ पांव, अच्छा बोलने, पहनने का सलीका था।
"अंगूरी... कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली तूने?"
अंगूरी के आंसू बह निकले और गीले अक्षरों से बोली मैंने तो सिर्फ चाय पी थी... कसम लगे न कभी उसके हाथ से पान खाया, न मिठाई... सिर्फ चाय... जाने उसने चाय में ही... और अंगूरी की बाकी आवाज़ आंसुओ में डूब गयी।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
न हींग लगे, न फिटकरी और रंग चौखा. यह कहावत सनाय की खेती पर पूरी तरह से लागू होती है, क्योंकि सनाय की खेती में लागत बहुत कम आती है और आमदनी ख़ूब होती है. सबसे बड़ी बात, इसे न तो उपजाऊ ज़मीन की ज़रूरत होती है, न ज़्यादा सिंचाई जल की, न ज़्यादा खाद की और न ही ज़्यादा कीटनाशकों की. इसे किसी ख़ास देखभाल की भी ज़रूरत नहीं होती. तो हुआ न फ़ायदा का सौदा. इसके फ़ायदों को देखते हुए किसान सनाय की खेती करने लगे हैं. बहुत से किसानों ने सनाय की खेती करके बंजर ज़मीन को हराभरा बना दिया है. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं राजस्थान के जोधपुर के नारायणदास प्रजापति. उन्होंने बंजर ज़मीन पर सनाय की खेती की और इतनी कामयाबी हासिल कर ली कि आज उनका उद्योग भी है. उन्होंने अरब देशों से सनाय के बीज मंगवाकर इसकी खेती शुरू की थी. अब वह कई देशों में सनाय की पत्तियों का निर्यात करते हैं. शुरू में उन्हें अपनी फ़सल बेचने में परेशानी काफ़ी हुई. फिर उन्होंने ऐसे व्यापारियों को ढूंढा, जो सनाय की पत्तियां ख़रीदते हैं. जब एक बार व्यापारियों से उनका संपर्क हो गया, तो फिर उन्हें फ़सल बेचने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने अपना उद्योग स्थापित कर लिया. उन्होंने एक प्रशिक्षण केंद्र भी खोला, जहां किसानों को सनाय की खेती की जानकारी दी जाती है. उन्होंने सनाय पर आधारित एक संग्रहालय भी बनाया हुआ है. उनके परिवार के सदस्य भी उनका हाथ बटा रहे हैं. उनके यहां से प्रशिक्षण पाकर बहुत से किसान सनाय की खेती करने लगे हैं.
सनाय औषधीय पौधा है. इसे स्वर्णमुखी, सोनामुखी और सुनामुखी भी कहा जाता है. यह झाड़ीनुमा पौधा है. इसकी ऊंचाई 120 सेंटीमीटर तक होती है. भारत में यह अरब देश से आया और सबसे पहले तमिलनाडु में इसकी खेती शुरू हुई. इसके बाद देश के अन्य राज्यों में भी इसकी खेती शुरू हो गई. नतीजतन, आज भारत सनाय की खेती के मामले में दुनियाभर में पहले स्थान पर है. यह बहुवर्षीय पौधा है. एक बार बिजाई के बाद यह पांच साल तक उपज देता है. सनाय की ख़ासियत यह है कि यह बंजर ज़मीन में भी उगाया जा सकता है. रेतीली और दोमट भूमि इसके लिए सबसे ज़्यादा बेहतर है. लवणीय भूमि इसके लिए ठीक नहीं होती. जिस भूमि में बरसात का पानी थोड़ा भी रुकता है, उसमें सनाय नहीं उगाना चाहिए, क्योंकि वहां यह पनप नहीं पाता. इसकी जड़ें गल जाती हैं, जिससे पौधा सूख जाता है. इसे ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत नहीं होती. इसलिए यह बहुत कम वर्षा वाले इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. किसानों को इसकी सिंचाई पर ज़्यादा पैसे ख़र्च नहीं करने पड़ते. पौधे के बढ़ने पर इसकी जड़ें ज़मीन से पानी सोख लेती हैं. यह पौधा चार डिग्री से 50 डिग्री सैल्सियस तापमान में भी ख़ूब फलता-फूलता है. देश के शुष्क और बंजर इलाक़ों में इसकी खेती की जा सकती है.
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक़ सनाय की बिजाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितम्बर का वक़्त अच्छा माना जाता है. इसकी बिजाई के लिए किसी ख़ास तैयारी की ज़रूरत नहीं होती. खेत में एक-दो जुताई करना ही काफ़ी है. इसकी बिजाई एक फ़ुट की दूरी पर करनी चाहिए. सनाय की एक ख़ासियत यह भी है कि इसमें किसी भी तरह की कोई बीमारी नहीं लगती. हालांकि बरसात के मौसम में कभी-कभार इसके पत्तों पर काले धब्बे आ जाते हैं, लेकिन धूप निकलने पर ये धब्बे ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाते हैं. इसलिए फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है. सनाय को किसी भी तरह की ज़्यादा खाद और रसायनों की ज़रूरत नहीं होती. कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी इसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचाते. इसलिए इसे किसी विशेष देखभाल की ज़रूरत नहीं होती. बिजाई के तक़रीबन सौ दिन बाद इसकी पत्तियां काटी जा सकती हैं. पौधों को ज़मीन से पांच इंच ऊपर काटना चाहिए, ताकि फिर से पौधे में पत्तियां उग सकें. कटाई वक़्त पर कर लेनी चाहिए. दूसरी कटाई 70 दिन बाद की जा सकती है, जबकि तीसरी कटाई 60 दिन में की जा सकती है. दोबारा बिजाई के लिए इसके बीज प्राप्त करने के लिए स्वस्थ पौधों को छोड़ देना चाहिए. इनकी कटाई नहीं करनी चाहिए. इससे इनमें फलियां लग जाएंगी. पकने पर फलियां भूरे रंग की हो जाती हैं. इन फलियों को धूप में सुखाकर इनके बीज निकाल लेने चाहिए. यही बीज बाद में नई फ़सल उगाने में काम आएंगे.
पत्तियों को सुखाते वक़्त ध्यान रखना चाहिए कि इनका रंग हरा रहे. ताकि बाज़ार में इनकी अच्छी क़ीमत मिल सके. टहनियों की छोटी-छोटी ढेरियां बनाकर इन्हें छाया में सुखाना चाहिए. इनके सूख जाने पर इन्हें किसी तिरपाल पर झाड़ देना चाहिए, जिससे पत्तियां टहनी से अलग हो जाएं. फिर इन्हें बोरियों में भर देना चाहिए. अब सनाय बिक्री के लिए तैयार है. सनाय औषधीय पौधा है, इसलिए बाज़ार में इसकी ख़ासी मांग है. सनाय की पत्तियों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी और एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में किया जाता है. इससे पेट संबंधी दवाएं बनाई जाती हैं. बड़े स्तर पर खेती करने पर दवा निर्माता खेत से ही सनाय की पत्तियां ख़रीद लेते हैं, जिससे किसानों को बिक्री के लिए बाज़ार जाना नहीं पड़ता. सनाय अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, चीन सहित कई देशों में निर्यात किया जाता है. इससे भारत को हर साल तीस करोड़ रुपये से ज़्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है.
बहरहाल, जिन लोगों को कृषि की ज़्यादा जानकारी नहीं है, वे भी सनाय की खेती करके मुनाफ़ा हासिल कर सकते हैं.
राहुल मिश्रा
एक ट्रक ड्राइवर ने रात के ढाबे पर सुनी बातें एक कागज पर उतारीं, और उन्हें लिफाफे में बंद कर दिया।
पते की जगह लिखा के-25, हौज खास, नई दिल्ली।
वो उस औरत से कभी मिला नहीं था।
हफ्ते भर में जवाब आ गया। एक पोस्टकार्ड।
और उस ड्राइवर का नाम हमेशा के लिए बदल गया।
साल था 1979। वो कोलकाता में रहता था और सड़क पर ही उसकी जिंदगी कटती थी। किसी साहित्यिक हलके में उसे कोई नहीं जानता था, और उसने कोई अदबी दावा भी नहीं किया था। उसने बस वो लिखा जो ड्राइवर आपस में बोलते हैं। नींद। उधार। घर से दूरी। अगली फेरी।
पोस्टकार्ड पर लिखा था कि यह लिखत अनोखी है और अगले अंक में छपेगी।
वो पत्रिका थी नागमणि।
और उसे एक औरत अपने घर के भीतर से निकालती थी। रचना चुनने से लेकर सजावट, छपाई, डाक और लिफाफों पर पते लिखने तक। तैंतीस बरस।
उसके पास तब तक देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान आ चुके थे।
और वो फिर भी लिफाफों पर पते अपने हाथ से लिख रही थी।
क्यों?
इसका जवाब उस पोस्टकार्ड में नहीं है।
वो जवाब एक टेलीफोन बूथ में खड़ा है। जहां बरसों पहले उसने एक नंबर मिलाना शुरू किया था, और बीच में ही चोंगा रख दिया था।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
गुजरांवाला। 1919 की अगस्त की आखिरी तारीख। एक अकेली बच्ची पैदा हुई। मां स्कूल में पढ़ाती थीं। पिता कविता लिखते थे, ब्रजभाषा के जानकार थे, एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे, और सिख धर्म के प्रचारक भी थे।
घर में धर्म की हवा थी। पर बच्ची सवाल पूछती थी।
घर में मेहमान आते तो कुछ के लिए अलग बर्तन निकाले जाते थे। जो अपने नहीं थे, उनके लिए अलग। बच्ची ने पूछा कि ऐसा क्यों। यह उसकी पहली बगावत थी, और इसका जिक्र उसने बाद में खुद किया।
फिर वो हुआ जिसने सब बदल दिया।
मां बीमार पड़ीं। बच्ची ने बड़ों से सुन रखा था कि बच्चों की बात ईश्वर नहीं टालता। वो मां की खाट के पास खड़ी होकर दुआ मांगती रही। पूरे यकीन के साथ, कि अब कुछ नहीं होगा।
मां चली गईं। बच्ची ग्यारह की थी।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसी दिन उसका ईश्वर पर से भरोसा उठ गया।
और वो भरोसा जिंदगी भर लौटकर नहीं आया।
पिता ने उसे छंद सिखाया था, बहर सिखाई थी। आठ बरस की उम्र में वो पिता के साथ बैठकर तुक मिलाने लगी थी। मां के जाने के बाद वही तुकें उसका इकलौता साथ बन गईं।
पिता चाहते थे कि वो भक्ति की कविता लिखे।
उसने वो लिखा जो उसे लिखना था।
घर लाहौर आ गया। बचपन में ही उसकी मंगनी तय हो चुकी थी लड़का अनारकली बाजार के एक होजरी व्यापारी का बेटा था, जो आगे चलकर संपादक बना।
सोलह की उम्र में शादी हुई। और शादी के साथ उसका नाम बदल गया। अमृत कौर से अमृता प्रीतम।
जो नाम उसने खुद नहीं चुना था, वही आगे चलकर पंजाबी अदब की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
उसी बरस उसका पहला कविता संग्रह छपा। नाम था अमृत लहरां।
अब एक छोटा-सा दृश्य, जिस पर आगे चलकर बहुत कुछ टिकने वाला है।
उसने संगीत और नृत्य की तालीम ली थी, और लाहौर रेडियो पर लोकगीत गाने लगी थी। बाद में वो अपनी कविताएं भी रेडियो पर पढ़ने लगी।
पति को यह पसंद नहीं था।
उन्होंने एक पेशकश की कि रेडियो से जितने पैसे मिलते हैं, उतने वो खुद दे देंगे।
उसने मना कर दिया।
क्योंकि बात पैसे की थी ही नहीं। बात उन लोगों की थी जो दूसरी तरफ बैठकर सुन रहे थे।
यह उस औरत का पहला फैसला था जो उसने अपने घर के भीतर लिया, और जिसका कोई गवाह नहीं था।
फिर उसका सुर बदलने लगा।
1943 में बंगाल में अकाल पड़ा। लाखों लोग भूख से मरे। अगले बरस उसका जो संग्रह आया, उसमें प्रेम कविताएं नहीं थीं। उसमें लोगों की पीड़ा थी। नाम भी वही रखा लोक पीड़।
और फिर 1947 आया।
लाहौर छूटा। वो शहर, जहां उसकी जवानी थी, जहां उसका घर था, जहां उसकी किताबें छपी थीं। वो देहरादून पहुंची, फिर काम की तलाश में दिल्ली आई।
और उसी रास्ते पर चलती एक रेल में, अट्ठाईस बरस की उम्र में, उसने कागज के एक टुकड़े पर वो नज्म लिखी जो आज भी सरहद के दोनों तरफ पढ़ी जाती है।
उसने खुद लिखा है कि उस रात आंखों में नींद नहीं थी। बाहर घुप अंधेरा था। हवा ऐसे कराह रही थी जैसे इतिहास की गोद में बैठकर रो रही हो। कहीं ऊंचे पेड़ खड़े थे, और कहीं पेड़ भी नहीं थे सिर्फ उजाड़ था, और उस उजाड़ के टीले कब्रों जैसे लग रहे थे।
और उसके भीतर वारिस शाह की एक पंक्ति घूम रही थी। कि मरे हुओं और बिछड़े हुओं को कौन मिलाता है।
नज्म: "अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कितों कबरां विचों बोल!
ते अज्ज किताब-ए-इश्क दा, कोई अगला वरका फोल!
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण,
अज्ज लखां धियां रोंदियां, तेनूं वारिस शाह नूं कहण!
उठ दर्दमंदां देया दरदिया, उठ तक अपना पंजाब,
अज्ज बेले लाशां बिछियां, ते लहू दी भरी चनाब!..."
नज्म वारिस शाह के नाम लिखी गई। उसी वारिस शाह के, जिसकी और उसकी जन्मभूमि एक थी।
दिल्ली में उसे आकाशवाणी की पंजाबी सेवा में नौकरी मिली। और उन्हीं बरसों में लाहौर से उजड़कर आए लेखकों और कलाकारों को पुनर्वास आयुक्त एम.एस. रंधावा ने दिल्ली में प्लॉट दिलवाए।
पड़ोस में भी वही लोग थे, जिनके घर पीछे छूट गए थे।
उसका प्लॉट था के-25, हौज खास।
यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है, क्योंकि इस पर अक्सर बहस होती है। यह जमीन ज्ञानपीठ के पैसों से नहीं खरीदी गई थी। ज्ञानपीठ उन्हें इसके दो दशक से भी ज्यादा बाद मिला, जबकि नागमणि 1966 से इसी पते से निकल रही थी। जमीन पुनर्वास में मिली थी। घर उस जमीन पर उन्होंने खुद खड़ा किया।
पहले पिता का घर। फिर पति का घर। और अब पहली बार, अपना घर।
जिस औरत का पता उससे छिन गया था, उसे एक नया पता मिला। और आगे चलकर वो यही पता हजारों लिफाफों पर अपने हाथ से लिखने वाली थी।
1956 में उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला। पंजाबी में किसी रचना के लिए यह सम्मान पाने वाली वो पहली औरत थी।
जिस लंबी कविता पर यह सम्मान मिला, उसका नाम था सुनेहड़े। यानी संदेश।
पर संदेश किसके नाम थे?
इसके लिए बारह बरस पीछे चलना होगा।
1944। लाहौर और अमृतसर के बीच एक गांव है, प्रीत नगर। वहां एक मुशायरा हुआ, जिसमें पंजाबी और उर्दू दोनों तरफ के शायर जुटे थे।
वो तब पच्चीस के आसपास थी, और शादीशुदा थी।
उसी मंच पर उसने पहली बार एक शायर को सुना।
उसने बाद में लिखा कि उसे आज तक नहीं पता कि उसे उन लफ्जों के जादू ने बांधा था, या उस खामोश निगाह ने।
मुशायरा आधी रात के बाद खत्म हुआ। लौटती बस तक चलते हुए उसे सिर्फ इतना होश था कि वो उस आदमी की परछाईं में चल रही है।
नाम साहिर लुधियानवी।
वो उर्दू में लिखता था, वो पंजाबी में। और आगे के बरसों में उन दोनों के बीच जो सबसे ज्यादा चला, वो न शायरी थी, न बातचीत।
चुप्पी थी।
उसने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब साहिर लाहौर में उससे मिलने आता, तो लगता जैसे उसकी अपनी खामोशी का ही एक हिस्सा बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया हो, और फिर चुपचाप उठकर चला गया हो।
वो बैठकर सिगरेट पीता था। आधी पीकर बुझा देता, फिर नई सुलगा लेता।
वो चला जाता, तो कमरे में अधजली सिगरेटें बची रह जातीं।
और वो उन्हें उठाकर संभालकर रख लेती थी।
बाद में उन्हीं को सुलगाती थी।
उसने खुद लिखा है कि जब वो उनमें से कोई सिगरेट उंगलियों में पकड़ती, तो उसे लगता जैसे उसने उस आदमी का हाथ छू लिया हो। और इसी तरह उसे सिगरेट की आदत लगी।
यह किसी उपन्यास का दृश्य नहीं है। यह उसने अपनी किताब में खुद दर्ज किया है, अपने नाम के साथ यह जानते हुए कि उस जमाने में एक औरत का इतना साफ लिखना कितना बड़ा हंगामा खड़ा करेगा।
एक हिंदी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में उसने अपने और साहिर के रिश्ते को एक ही वाक्य में बांध दिया था। कि साहिर उसका सार्त्र था, और वो उसकी सीमोन।
पर सार्त्र कभी दिल्ली नहीं आया।
बंटवारे ने दोनों को अलग-अलग शहर दे दिए। वो फिल्मों की दुनिया में चला गया, वो दिल्ली में रह गई। बीच में रह गईं सिर्फ चिट्ठियां।
उन चिट्ठियों में उसने उसे अपना शायर लिखा। अपना महबूब लिखा। अपना खुदा लिखा।
और उसने?
उसने उम्र भर शादी नहीं की। पर उसे अपने साथ भी नहीं रखा। एक बार उसने अपनी मां को बताया जरूर था कि यह औरत उनकी बहू हो सकती थी।
बता देना और साथ ले जाना, दो अलग बातें हैं।
सुनेहड़े इसी खाली जगह में लिखी गई। संदेशों की एक लंबी कविता, उस आदमी के नाम, जो जवाब नहीं देता था।
उसने खुद कहा है कि इस रिश्ते में ज्यादा दीवानी वो थी, और सुनेहड़े उसी के नाम संदेशों से भरी हुई थी। पर उन संदेशों ने उसे पिघलाया नहीं।
और फिर उसने जो जोड़ा, वो इस पूरी कहानी का सबसे साहसी वाक्य है।
उसने कहा कि उसकी मुहब्बत फिर भी बेकार नहीं गई क्योंकि उसी किताब पर उसे साहित्य अकादेमी मिल गया।
अब वो टेलीफोन बूथ।
सम्मान की खबर मिलने पर उसने सोचा कि यह बात सबसे पहले उसी आदमी को बतानी चाहिए। वो बूथ पर गई और नंबर घुमाना शुरू किया।
घुमाते-घुमाते उसकी नजर वहीं बिकने वाली एक पत्रिका पर पड़ी।
उस पर छपी खबर का शीर्षक था कि साहिर को उसका नया प्यार मिल गया है।
उसने चोंगा रख दिया।
और घर लौट आई।
देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान जिस कविता पर मिला था, उसकी खबर उस आदमी तक पहुंची ही नहीं जिसके लिए वो कविता लिखी गई थी।
उन दोनों के बीच जो चुप्पी इसके बाद पसरी, उस पर उसने आगे चलकर एक पूरी रचना लिखी। नाम रखा सात बरस।
1960 में उसने वो शादी छोड़ दी जो बचपन में तय हुई थी।
और यहां उस आदमी का जिक्र जरूरी है, जिसका नाम इस कहानी में सबसे कम लिया जाता है।
प्रीतम सिंह।
उन्हें आसानी से खलनायक बनाया जा सकता था। पर तथ्य दूसरी तरफ जाते हैं।
अमृता ने खुद एक इंटरव्यू में कहा है कि उसे बहुत कम उम्र में ब्याह दिया गया था, और शादी के बाद उसे वो माहौल नहीं मिला जो एक लेखक को चाहिए होता है इसलिए उसने तय किया कि वो अपना माहौल खुद बनाएगी।
और यह भी दर्ज है कि वो घर से दुश्मनी लेकर नहीं निकली। दोनों बच्चे उसके साथ आए। और उस आदमी ने खुद उसे जाने के लिए कहा, ताकि वो लेखक की जिंदगी जी सके।
जिस आदमी ने कभी उसका रेडियो पर पढ़ना पसंद नहीं किया था, उसी ने आखिर में उसे लिखने के लिए जाने दिया। पर उस प्रीतम सिंह को वह अपने नाम में साथ ले आई और कभी नहीं हटाया।
अगले ही बरस रेडियो की नौकरी भी छूट गई।
अब उसके पास न पति था, न नौकरी, न वो शहर जिसमें वो पैदा हुई थी।
और न वो शायर।
पर एक आदमी था।
वो पेशे से चित्रकार था। बंबई में उसने फिल्मों के पोस्टर बनाए थे, गुरुदत्त जैसे लोगों के साथ काम किया था। किसी किताब का कवर बनाने के सिलसिले में उससे मुलाकात हुई थी। फिर वो उसे रोज दफ्तर छोड़ने और लेने लगा पहले साइकिल पर, फिर स्कूटर पर। बच्चों को स्कूल भी वही छोड़ता था।
उसका असली नाम इंदरजीत था। उसने अपना नाम बदलकर इमरोज रख लिया।
इमरोज फारसी और उर्दू का शब्द है। इसका मतलब है आज।
एक किस्सा और चलता है कि यह नाम अंग्रेजी के 'आई एम रोज' से बना। जिन लोगों ने यह लिखा है, उन्होंने खुद लिखा है कि उन्होंने यह कहीं सुना था। दर्ज कहीं नहीं है। जो दर्ज है वो यही है कि इमरोज का मतलब आज होता है।
और नाम बेवजह नहीं था।
एक औरत जिसका सारा बीता हुआ कल सरहद के उस पार छूट गया था, उसके साथ अब एक आदमी था जिसका नाम ही आज था।
अब वो बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे अजीब और सबसे सच्ची बात है।
इमरोज ने खुद बताया है कि जब वो उन्हें स्कूटर पर बिठाकर ले जाते थे, तो वो पीछे बैठी-बैठी अपनी उंगली से उनकी पीठ पर एक नाम लिखा करती थीं।
साहिर।
किसी ने इमरोज से पूछा कि यह उन्हें चुभता नहीं था।
उन्होंने कहा कि वो नाम उसकी पीठ पर भी था और मेरी पीठ पर भी। फिर एतराज किस बात का।
लेखिका उमा त्रिलोक ने यही सवाल दूसरे ढंग से पूछा। इमरोज ने कहा कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया था और जहाँ मुहब्बत में अहंकार न हो, बहस न हो, बनावटी इंतजाम न हों और हिसाब न हो, वहाँ मुश्किल पैदा ही नहीं होती।
पर सबसे बड़ी बात यह नहीं है।
सबसे बड़ी बात यह है कि आगे चलकर साहिर और इमरोज अच्छे दोस्त बन गए।
और साहिर की एक किताब का कवर इमरोज ने ही बनाया।
जिस आदमी का नाम उसकी पीठ पर लिखा जाता था, उसी की किताब उसने अपने हाथों से सजाई।
1980 में साहिर चला गया।
जिस दिन यह खबर आई, उसने अपनी डायरी में लिखा कि आज उसका खुदा मर गया।
जिस आदमी ने उसे कभी अपने साथ नहीं रखा, उसके जाने पर उसने अपना एक हिस्सा भी विदा कर दिया।
पर 1980 अभी दूर था। उससे चौदह बरस पहले, इसी घर में एक और काम शुरू हो चुका था।
1966। इमरोज और अमृता ने एक पत्रिका शुरू की। सुझाव उनके दोस्त और कवि सती कुमार का था। सजावट इमरोज ने संभाली। नाम रखा गया नागमणि।
नागमणि, यानी वो मणि जो लोककथाओं में साँप के सिर में होती है, और अंधेरे में चमकती है।
नाम भी बेवजह नहीं था।
पत्रिका का कागज हल्का भूरा रखा गया। एक कवि ने बताया कि इसकी वजह पूछने पर उसने कहा था कि रंगों के पास भी अपने भाव होते हैं।
किसी नामी लेखक ने ताना मारा कि इस कागज की वजह से रद्दी वाले तक नागमणि लेने से कतराते हैं।
उसका जवाब तुरंत आया नागमणि ही इकलौती पंजाबी पत्रिका है जो रद्दी में नहीं जाती।
पर असली बात कागज नहीं थी। असली बात डाक थी।
उस दौर की बाकी पत्रिकाओं में रचना भेजकर लेखक महीनों चुप्पी झेलते थे। नागमणि में तीन दिन के भीतर पोस्टकार्ड चला जाता था कि रचना मिल गई। और हफ्ते भर के भीतर हाँ या ना, वजह के साथ।
नौजवान लेखक उन चिट्ठियों को तमगे की तरह दिखाते थे। जिनकी रचनाएं लौट आतीं, वो चिढ़कर इन लेखकों को दरबारी कहते थे।
पर उन चिट्ठियों ने जो बनाया, वो अब पंजाबी साहित्य का इतिहास है।
जालंधर में एक दिहाड़ी मजदूर था। उसने सड़क किनारे छोड़ दिया गया एक नवजात देखा, और उस बच्चे के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनकर 1970 में नागमणि को भेज दी। छपने तक वो ज्ञानी कर रहा था, और उसका मास्टर पत्रिका में उसका नाम देखकर दंग रह गया।
आगे चलकर वो प्रेम गोरखी कहलाया, और दबे-कुचले लोगों का दर्द लिखने वाला बड़ा कहानीकार माना गया। उसने खुद कहा है कि वो ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं था, उस औरत ने उसे लेखक बना दिया।
सिक्किम में तैनात एक फौजी कप्तान ने 1971 में एक सिपाही की कहानी लिखी, जो अपनी गर्भवती पत्नी को घर छोड़कर गया और जंग की वजह से लौट नहीं सका। कप्तान का नाम था जसबीर भुल्लर। वो कहानी पंजाबी की सबसे अच्छी फौजी कहानियों में गिनी जाती है।
जवाब में उसे लिखा गया कि फौज की जिंदगी पर गहराई से लिखा ही नहीं गया है, इसलिए ऐसी और कहानियां आनी चाहिए।
एक राजमिस्त्री था, किरपाल कजाक। उसने घुमंतू कबीलों पर जो काम किया, उसे दुनिया ने सराहा।
और एक बागी कवि था, पाश। जब वो जेल में था, उसकी कविताएं नागमणि के मुखपृष्ठ पर छपीं।
एक बार उसने अपनी प्रेमिका की छोटी-सी तस्वीर भिजवाई, अपनी विदा वाली कविता के साथ, और झिझकते हुए गुजारिश की कि चेहरा ऐसे बनाया जाए कि कोई पहचान न सके।
अगले अंक में कविता के साथ एक पेड़ छपा। और उस पेड़ के तने में एक चेहरा छिपा था, जिसे शायद सिर्फ दो लोग पहचान सकते थे।
और वो कोलकाता वाला ट्रक ड्राइवर?
उसका नाम था बलदेव सिंह।
दूसरी रचना भेजने पर उसे पूरा स्तंभ मिल गया। नाम रखा गया सड़कनामा सड़क पर बीतती जिंदगी का ब्योरा। वो स्तंभ पत्रिका के आखिरी अंक तक चला।
और ड्राइवर ने वो नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया। बलदेव सिंह सड़कनामा।
आगे चलकर उसे साहित्य अकादेमी सम्मान मिला।
उसने बाद में कहा कि अगर नागमणि न होती, तो उसके वो सब अनुभव शायद वक्त में कहीं खो जाते।
यह कहानी किसी बड़ी लेखिका की नहीं है। यह उस लौटती डाक की कहानी है, जो किसी को पहली बार यह बताती थी कि वो लिख सकता है।
सम्मान उसे मिलते रहे। पद्मश्री। ज्ञानपीठ। बुल्गारिया और फ्रांस के सम्मान। छह बरस राज्यसभा में। और आखिरी बरसों में पद्मविभूषण।
सब उससे सहमत नहीं थे। लंदन में बसे कवि अमरजीत चंदन और चंडीगढ़ के गुरबचन जैसे लेखकों ने खुलकर कहा कि नागमणि का केंद्र हमेशा वो खुद रहीं, और उसकी नकल करने वाले नौजवान लेखकों की एक पूरी कतार खड़ी हो गई।
यह असहमति भी दर्ज होनी चाहिए। क्योंकि जिस पत्रिका ने असहमति को जगह दी, उसकी कहानी में असहमति छिपाना बेईमानी होगी।
नब्बे के दशक के आखिर में खबर आई कि सेहत और खर्च की वजह से पत्रिका बंद हो रही है।
पाठकों ने विरोध किया। पत्रिका चलती रही।
पर 2001 में एक अंक के पन्नों पर एक छोटा-सा नोट छपा। यह आखिरी अंक है।
एक पुराने लेखक ने कहा कि वो रिटायर हो रहा है, पत्रिका वो चला लेगा। कुछ पाठकों ने कहा कि वो ट्रस्ट बना देंगे।
अगले महीने पाठकों के घर डाक आई।
लिफाफे में पत्रिका नहीं थी।
उसमें इमरोज के दस्तखत वाला एक मनीऑर्डर था, और साथ में गुजारिश कि बची हुई सदस्यता की रकम वापस ले ली जाए।
तैंतीस बरस जिस डाक ने लोगों को लेखक बनाया था, वो डाक आखिरी बार पैसे लौटाने आई थी।
और अब वो बात, जिसका जवाब आज तक किसी ने ठीक से नहीं दिया।
अमृता ने वो घर छोड़ दिया था। उस रिश्ते से बाहर निकल आई थी। चालीस बरस किसी और के साथ रहीं।
पर उन्होंने अपने नाम के साथ से प्रीतम कभी नहीं हटाया।
आखिरी दिन तक नहीं।
वजह उन्होंने कहीं नहीं बताई। इसलिए मैं भी नहीं बताऊंगा अंदाजा लगाना इस पन्ने का काम नहीं है।
जो दर्ज है, वो सिर्फ इतना है। बरसों ने उस कड़वाहट को घिस दिया था। और जब प्रीतम सिंह आखिरी दिनों में बीमार पड़े, तो अमृता दिन में दो बार उनके पास जाती थीं। हर बार कुछ घंटे बैठती थीं।
आखिरी दिन तक।
फिर उसकी अपनी बारी आई।
आखिरी बरसों में वो बिस्तर पर थीं। पत्रकार निरुपमा दत्त उनसे मिलने गईं। उन्होंने लिखा है कि उस हालत में भी वो शरारत कर रही थीं, और पूछ रही थीं कि जिंदगी में कोई नया प्रेम आया या नहीं।
उन्होंने अपनी आखिरी नज्मों में से एक उन्हें सुनाई। वो नज्म इमरोज के लिए थी, और उसका मतलब इतना भर था कि वो लौटकर फिर मिलेंगी। कहां, कैसे, यह उन्हें भी नहीं पता था।
"मैं तैनू फिर मिलांगी,
कित्थे? किस तरह? पता नहीं...
शायद तेरे तख़्तयल दी चिंगारी बण के
तेरे कैनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे कैनवास दे उत्ते
इक रहस्यमयी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी!"
निरुपमा ने उसका अनुवाद किया, और उन्होंने वो अनुवाद नींद में जाने से पहले पढ़ लिया।
और एक छोटी-सी बात, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप बात है।
इमरोज अगर पानी का गिलास लेने भी कमरे से बाहर जाते, तो वो पीछे से लोकगीत की एक पंक्ति पुकार देतीं कि मरती हुई को छोड़कर मत जाना, मेरे साथी।
31 अक्टूबर 2005। वो नींद में चली गईं।
अंतिम संस्कार उनकी अपनी इच्छा के मुताबिक हुआ। कोई भाषण नहीं। कोई भीड़ नहीं। सिर्फ उनके बच्चे और इमरोज उनका शरीर लेकर गए।
जिस औरत की जिंदगी पर देश बहस करता रहा, उसने अपनी विदाई के लिए सिर्फ खामोशी मांगी थी।
और अब आखिरी बात।
उन्होंने वसीयत में लिखा था कि हौज खास वाला घर उनकी याद में वैसा ही रहे, और इमरोज वहीं रहें। उस घर के आँगन में दोनों ने मिलकर एक हरसिंगार लगाया था। खिड़कियों में बोगनवेलिया लटकता था। दीवारों पर इमरोज ने उनका चेहरा बार-बार उतारा था, और उनकी पंक्तियां लैंपशेड, कलमदान और घड़ियों तक पर लिख रखी थीं।
उनके जाने के पांच बरस बाद वो घर बिक गया।
और गिरा दिया गया।
इमरोज उसे गिरते हुए देखने गए थे। अस्सी पार कर चुके थे। रोक कुछ नहीं सकते थे।
मलबे से उन्होंने सिर्फ एक चीज उठाई। दरवाजे की वो नामपट्टी, जिस पर दो नाम साथ लिखे थे।
जिस पते को तैंतीस बरस तक हजारों लिफाफों पर हाथ से लिखा गया, वो पता अब एक ऐसी जगह है जहां जाकर खड़ा नहीं हुआ जा सकता।
अब मेरी बात।
मैं अठारह साल से इसी शहर के समाचार पत्र के दफ्तर में बैठकर तय करता हूं कि किसकी लिखी बात छपेगी और किसकी नहीं। और जिस ट्रक ड्राइवर की चिट्ठी ने यह पूरी कहानी शुरू की, वो चिट्ठी इसी शहर से चली थी।
मुझे यह सोचकर बेचैनी होती है कि आज कोई बलदेव चिट्ठी नहीं लिखता, क्योंकि उसे पता है जवाब नहीं आएगा। अब उनके लिखे के लिए कोई जगह नहीं है।
घर गिर गया। बाग उजड़ गया। हरसिंगार का कोई निशान नहीं बचा।
पर जालंधर का वो दिहाड़ी मजदूर आज एक नाम है। सिक्किम का वो कप्तान आज एक नाम है। कोलकाता का वो ट्रक ड्राइवर आज एक नाम है, और उस नाम का दूसरा हिस्सा उसी पत्रिका ने दिया था।
ये नाम इसलिए हैं क्योंकि किसी ने हफ्ते भर के भीतर जवाब दे दिया था।
उन्होंने अपने पाठकों के नाम एक चिट्ठी में लिखा था कि उनका असली साहित्यिक वारिस अगली पीढ़ी का कोई लेखक होगा।
वो वारिस किसी बड़े घर से नहीं आया। वो ढाबे से आया, मजदूरी से आया, बर्फ में तैनात एक चौकी से आया।
एक आदमी ने उसे कभी जवाब नहीं दिया। और उसने बदले में सैकड़ों लोगों को जवाब देना शुरू कर दिया।
मकान गिर सकता है। जवाब नहीं गिरता।
तीन बातें, जो उन्होंने कहीं नहीं और की थीं।
1. जो रचना आई, उसकी पावती तीन दिन में गई। किसी को महीनों टँगा नहीं छोड़ा गया।
2. ना भी कही, तो वजह के साथ कही। बिना वजह की ना सबसे बड़ी बेइज्जती है।
3. नाम नहीं देखा, लिखत देखी। जिस दिन ड्राइवर की डायरी छपी, उस दिन आलोचक पूछ रहे थे कि क्या यह भी साहित्य है।
यह कहानी उस आदमी तक पहुंचनी चाहिए जो सात समंदर पार बैठा है, जिसका पुराना पता अब किसी और के नाम पर है, और जो अब भी सोचता है कि वहां से जो छूट गया वो लौटेगा नहीं। कुछ चीजें मकान में नहीं रहतीं। वो डाक में रहती हैं।
इस पन्ने पर हर नाम असली होता है, हर तारीख जांची हुई, और जो पुष्ट नहीं होता वो लिखा ही नहीं जाता फिर चाहे वो कितनी भी खूबसूरत बात क्यों न हो।
कोई एक इंसान, जिसने आपको उस वक्त जवाब दिया था जब आप बिल्कुल अनजान थे।
और एक बात मैं जानना चाहता हूं।
डॉ फ़िरदौस ख़ान
आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... कल से वह दिल्ली से बाहर हैं... आज रात भी शायद नींद न आए... चाँद अब भी आसमान में मुस्करा रहा है... उसकी दूधिया चाँदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... चमेली की शाख़ें हवा से झूम रही हैं... मौसम बदल रहा है... हवा में ख़ुनकी है... सोचती हूं कोई किताब ही पढ़ ली जाए... मेज़ पर कृष्ण चंदर की कहानियों की उर्दू की एक किताब रखी है, जिसे कई बार पढ़ चुके हैं...
हमें कृष्ण चंदर की किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है... यह कृष्ण चंदर के लेखन की ख़ासियत रही कि उन्होंने जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी दुश्वारियों को पेश किया, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी जज़्बे को भी अपनी रचनाओं में इस तरह पेश किया कि पढ़ने वाला उसी में खोकर रह गया. उनके उपन्यास मिट्टी के सनम में एक नौजवान की बचपन यादें हैं, जिसका बचपन कश्मीर की हसीन वादियों में बीता. इसे प़ढकर बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं. इसी तरह उनकी कहानी पूरे चांद की रात तो दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया ही नहीं जा सकता है. बानगी देखिए:-
अप्रैल का महीना था. बादाम की डालियां फूलों से लद गई थीं और हवा में बर्फ़ीली ख़ुनकी के बावजूद बहार की लताफ़त आ गई थी. बुलंद व बाला तिनकों के नीचे मख़मली दूब पर कहीं कहीं बर्फ़ के टुकड़े सफ़ेद फूलों की तरह खिले हुए नज़र आ रहे थे. अगले माह तक ये सफ़ेद फूल इसी दूब में जज़्ब हो जाएंगे और दूब का रंग हरा सब्ज़ हो जाएगा और बादाम की शाख़ों पर हरे हरे बादाम पुखराज के नगीनों की तरह झिलमिलाएंगे नीलगूं पहाड़ों के चेहरों से कोहरा दूर होता जाएगा. लेकिन अभी अप्रैल का महीना था. अभी पत्तियां नहीं फूटी थीं. अभी पहाड़ों पर बर्फ़ का कोहरा था. अभी पगडंडियों का सीना भेड़ों की आवाज़ से गूंजा न था. अभी समल की झील पर कंवल के चिराग़ रौशन न हुए थे. झील का गहरा सब्ज़ पानी अपने सीने के अंदर उन लाखों रूपों को छुपाए बैठा था, जो बहार की आमद पर यकायक उसकी सतह पर एक मासूम और बेलोस हंसी की तरह खिल जाएंगे. पुल के किनारे-किनारे बादाम के पेड़ों की शाख़ों पर शिगूफ़े चमकने लगे थे. अप्रैल में ज़मिस्तान की आख़िरी शब में जब बादाम के फूल जागते हैं और बहार की नक़ीब बनकर झील के पानी में अपनी किश्तियां तैराते हैं. फूलों के नन्हे-नन्हे शिकारे सतह आब पर रक्सा व लरज़ा बहार की आमद के मुंतज़िर हैं.
और अब मैं अड़तालीस बरस के बाद लौट के आया हूं. मेरे बेटे मेरे साथ हैं. मेरी बीवी मर चुकी है, लेकिन मेरे बेटों की बेटियां और उनके बच्चे मेरे साथ हैं और हम लोग सैर करते-करते समल झील के किनारे आ निकले हैं और अप्रैल का महीना है और दोपहर से शाम हो गई है और मैं देर तक पुल के किनारे खड़ा बादामों के पेड़ों की क़तारें देखता जाता हूं और ख़ुनक हवा में सफ़ेद शगू़फों के गुच्छे लहराते जाते हैं और पगडंडी की ख़ाक पर से किसी के जाने पहचाने क़दमों की आवाज़ सुनाई नहीं देती. एक हसीन दोशीज़ा लड़की हाथों में एक छोटी सी पोटली दबाए पुल पर से भागती हुई गुज़र जाती है और मेरा दिल धक से रह जाता है. दूर बस्ती में कोई बीवी अपने ख़ाविंद को आवाज़ दे रही है. वह उसे खाने पर बुला रही है. कहीं से एक दरवाज़ा बुलंद होने की आवाज़ आती है और एक रोता हुआ बच्चा यकायक चुप हो जाता है. छतों से धुआं निकल रहा है और परिंदे शोर मचाते हुए एकदम दरख्तों की घनी शाख़ों में अपने पर फड़फड़ाते हैं और फिर एकदम चुप हो जाते हैं. ज़रूर कोई गा रहा है और उसकी आवाज़ गूंजती गूंजती उफ़क़ के उस पार गुम होती जा रही है. मैं पुल को पार करके आगे बढ़ता हूं. मेरे बेटे और उनकी बीवियां और बच्चे मेरे पीछे आ रहे हैं. वे अलग-अलग टोलियों में बटे हुए हैं. यहां पर बादाम के पेड़ों की क़तार ख़त्म हो गई. तल्ला भी ख़त्म हो गया. झील का किनारा है. यह ख़ूबानी का दरख्त है, लेकिन कितना बड़ा हो गया है. मगर किश्ती, यह किश्ती है. मगर क्या यह वही किश्ती है. सामने वह घर है. मेरी पहली बहार का घर. मेरी पूरे चांद की रात की मुहब्बत.
घर में रौशनी है. बच्चों की सदाएं हैं. कोई भारी आवाज़ में गाने लगता है. कोई बुढ़िया चीख़कर उसे चुप करा देती है. मैं सोचता हूं, आधी सदी हो गई. मैंने उस घर को नहीं देखा. देख लेने में क्या हर्ज है. मुझे घर के अंदर घुसते देखकर मेरे घर के सदस्य भी अंदर चले आए थे. बच्चे एक दूसरे से बहुत जल्द मिलजुल गए. हम दोनों आहिस्ता-आहिस्ता बाहर चले आए. आहिस्ता-आहिस्ता झील के किनारे चलते गए. मैंने कहा-मैं आया था. मगर तुम्हें किसी दूसरे नौजवान के साथ देखकर वापस चला गया था. वह बोली-अरे वह तो मेरा सगा भाई था. वह फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी. वह मुझसे मिलने आया था, उसी रोज़ तुम भी आने वाले थे. वह वापस जा रहा था. मैंने उसे रोक लिया कि तुमसे मिलके जाए. तुम फिर आए ही नहीं. वह एकदम संजीदा हो गई. छह बरस मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया. तुम्हारे जाने के बाद मुझे ख़ुदा ने एक बेटा दिया. तुम्हारा बेटा. मगर एक साल बाद वह भी मर गया. चार साल और मैंने तुम्हारी राह देखी, मगर तुम नहीं आए. फिर मैंने शादी कर ली.
हम दोनों चुप हो गए. बच्चे खेलते-खेलते हमारे पास आ गए. उसने मेरी पोती को उठा लिया, मैंने उसके पोते को. और हम ख़ुशी से एक दूसरे को देखने लगे. उसकी पुतलियों में चांद चमक रहा था और वह चांद हैरत और मुसर्रत से कह रहा था- इंसान मर जाते हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं मरती. बहार ख़त्म हो जाती है, लेकिन फिर दूसरी बहार आ जाती है. छोटी-छोटी मुहब्बतें भी ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िंदगी की बड़ी और अज़ीम सच्ची मुहब्बतें हमेशा क़ायम रहती हैं. तुम दोनों पिछले बहार में न थे. यह बहार तुमने देखी. उससे अगली बहार में तुम न होगे. लेकिन ज़िंदगी फिर भी होगी और जवानी भी होगी और ख़ूबसूरती और रानाई और मासूमियत भी. बच्चे हमारी गोद से उतर पड़े, क्योंकि वे अलग से खेलना चाहते थे. वे भागते हुए ख़ूबानी के दरख्त के क़रीब चले गए. जहां किश्ती बंधी थी. मैंने पूछा-यह वही दरख़्त है. उसने मुस्कराकर कहा- नहीं यह दूसरा दरख़्त है.
(पूनम की एक रात में लिखी तहरीर)
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते.
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.
दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं.
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.
ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त. संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.
कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.
एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भी पनाह मांगती है. कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है. जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो, उसे दोज़ख़ की आग का क्या खौफ़. जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो उससे हुआ है. उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है. उस महबूब से जो सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह तो ख़ुदा के नूर का वह क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है. किसी इंसान से हो या ख़ुदा से. जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है. इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है, जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बुल्ले शाह कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी
वह तो अल्लाह को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता. बुल्ले शाह के जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़, बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वह बुल्ले शाह कहलाए. वह जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिद्ध क़िस्सा हीर-रांझा के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की. बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के मुरीद थे. इश्क़े-हक़ीक़ी के बारे में बुल्ले शाह कहते हैं-
इश्क़े-हक़ीक़ी ने मुथ्थी कु़डे
मैनूं दस्सो पिया दा देसा
कियो इश्क़ असां ते आया है
तूं आया है मैं पाया है...
यानी प्रेम के देवता ने मेरा मन चुरा लिया है. मुझे बताओ कि पिया का देश कहां है. इश्क़ मेरे पास क्यों आया है. ओ इश्क़, तू आया है और मैंने तुझे महसूस किया है.
अल्लाह का पहला वर्ण (अरबी, फ़ारसी, उर्दू) है अलिफ़ का आकार 1 के समान होता है. यह परमात्मा की अद्वैतता को इंगित करता है. चूंकि बुल्ले शाह अल्लाह से अलग नहीं होना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा है-
इक्को अलिफ़ पढ़ो छुटकारा आये
यानी मुक्ति के लिए सिर्फ़ अलिफ़ पढ़ना ही काफ़ी है.
इश्क़ में वियोग भी होता है. वियोग में ही प्रेमी गिले-शिकवे करता है. यहां तक कि वह अपने प्रियतम को संगदिल और बेरहम भी कह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
कीह बेदर्दां संग यारी
रोवन अखियां ज़ारो ज़ारी
सानूं गए बेदर्दी छडके
हिजरे संग सीने विच ग़ड के
जिस्मो जिंद नू लै गए क़ढ के
इह गल कर गए हैंसयारी...
यानी बेदर्दी के साथ इश्क़ का क्या कहना. मेरी आंखें तो अविरल आंसू बहाती हैं. वह बेरहम महबूब मेरे सीने में वियोग रूपी कटार घोंपकर, मेरी जान निकालकर ले गया. उसने यह सब ब़डी बेरहमी के साथ किया. प्रेमी को दुनिया की कोई परवाह नहीं होती. वह हर तरह की निंदा सहन कर लेता है. ईश्वर वियोग में उसे तकली़फ महसूस होती है. बुल्ले शाह कहते हैं-
बिरहों आ व़डया विच वेह़डे
ज़ोरों ज़ोर देवे तन घेरे
दारू दर्द नां बझो तेरे
मैं सजनां बाझ मारीनी हां
मित्तर पियारे कारन नी
मैं लोक पियारे कारन नी
मैं लोक अलाहमे लैनी हां...
यानी विरह ने मेरे आंगन में आकर मुझे अपने प्रकोप से बेहोश कर दिया. इसके अलावा तकली़फ दूर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मैं तो प्रियतम के बिना मर रही हूं. मैं अपने प्रिय के लिए लोगों के उलाहने सुन रही हूं. कभी-कभी प्रेमी प्रियतम के उन गहन प्रेम सपनों को देखता है, जिसमें प्रियतम पलभर के लिए दर्शन देकर ओझल हो जाता है. उस व़क्त प्रेमी पी़डा से कराह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
देखो नीं पियारा मैनूं सुफने में छल गया
प्रेमी की ज़िंदगी में एक व़क्त ऐसा भी आता है, जब वह वियोग की रात गुज़र जाती है और फिर मिलन की सुबह आती है. उस व़क्त प्रेमी खुशी से नाच उठता है. वह दूसरों से मुबारकबाद लेना चाहता है. बुल्ले शाह कहते हैं- आओ सैयो रल दियो वधाई
मैं वर पाया रांझा माही...
यानी आओ दोस्तों, सब मिलकर मुझे मुबारकबाद दो. मैंने अपने महबूब यानी अपने खुदा को पा लिया है. हीर की तरह यह रहस्यवादी भी अपने प्रियतम रांझा की तलाश में भटकता रहा. प्रियतम एक जोगी के वेश में आया और प्रेमी ख़ुद को प्रियतम की जोगन कहता है. बुल्ले शाह के शब्दों में-
रांझा जोगिण बण आया
वाह सांगी सांग रचाया
रांझा जोगी ते मैं जुगियाणीं
इस दी खातर भरसां पाणीं
ऐवें पिछली उमर विहाणी
इस हुण मैनूं भरमाया...
यानी प्रियतम योगी के रूप में आया है. बहरुपिए ने ब़डा सुंदर नाटक रचाया है. रांझा एक जोगी है और मैं उसकी जोगन. उसके लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. मेरा पिछला जन्म तो बेकार हो गया. उसने मुझे अब मोहित कर लिया है. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में हिंदुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है.
बुल्ले शाह के मुताबिक़ आत्मा ता परमात्मा की ही एक अभिन्न अंग है. परमात्मा प्रत्येक आत्मा में विराजमान है और स्वेच्छा से बोलता है. वह कहते हैं-
नाल महबूब सिरे दी बाज़ी
जिस ने कुल तबक लै साजी
मन मेरे विच जोत बिराजी
आपे ज़ाहिर हाल बताया...
यानी अपने महबूब के लिए अपने सिर की बाज़ी लगा दी है, जिसने सारी कायनात को बनाया है. मेरे दिल में वह रूहानी रौशनी मौजूद है, जो जिस्म के ज़रिये खुद को दर्शाती है. यह रूहानी रौशनी खुदा के इश्क़ से वाबस्ता है. लेकिन इसकी अपनी कोई ख्वाहिश नहीं है. यह ख़ुदा के हुक्म से ही अपने अलग-अलग रूपों में रहती है. ख़ुदा के हुक्म से ही मिट्टी की देह के रूप में नाचती है. वह कहते हैं-
मैं मेरी है ना तेरी है
एह अंत ख़ाक दी ढेरी है
एक ढेरी होई खेरी है
ढेरी नु नाच नचाई दा
हुण किस तो आप लुकाई दा...
यानी मैं यानी देह न मेरी है, न तेरी है. इसका अंत तो मिट्टी के ढेर के रूप में होता है, जो इधर-उधर बिखर जाती है. मिट्टी के इस ढेर में जब आत्मा प्रविष्ट होती है तो यह ढेर नाचता है. अब तुम ख़ुद को किससे छुपा रहे हो. बुल्ले शाह दुनिया को भ्रम या मायावी नहीं मानते. ख़ुदा ने ही इस दुनिया को बनाया है. इंसान जन्म लेता है और फिर एक रोज़ मर जाता है. यही इस सृष्टि का नियम है. वह कहते हैं-
मैं सुपना सभ जग वी सुपना
सुपना लोक बिबाणा
ख़ाकी ख़ाक सियों रल जागा
कुझ नहीं ज़ोर घीणांणा...
यानी मैं एक सपना हूं और पूरी दुनिया भी एक सपना है. सब इंसान भी एक सपना ही हैं. जो मिट्टी में जन्म लेगा, वह एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा. यह सब बिना किसी ज़ोर के ख़ुद-ब-ख़ुद ही हो जाएगा.
भले ही बुल्ले शाह की धरती अब पाकिस्तान हो, लेकिन हिंदुस्तान में भी उन्हें उतना ही माना जाता है, जितना पाकिस्तान में. उनका कलाम, उनका संदेश तो पूरी दुनिया के लिए है. दरअसल, बुल्ले शाह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के महान सूफ़ी कवि होने के साथ इन दोनों मुल्कों की सांझी विरासत के भी प्रतीक हैं. बुल्ले शाह के बारे में कहा जाता है कि मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
डॉ फ़िरदौस ख़ान
रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं. भाई भी अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं.
रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.
विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.
रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.
आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है. रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है. आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है. वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है. दरअसल, व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं.
यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं. अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही. रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा. देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है. इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है. डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है. शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं. गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं. देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं. हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की. रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा. इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं. कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं. सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों के रूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं. यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है. बाज़ार में रंग-बिरंगे काग़ज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है.
कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा. पहले संयुक्त परिवार होते थे. सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाक़ों में बसना पड़ता है. इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं. ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं. महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है. ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी. बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है, तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं. आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.
रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.
विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.
रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.
आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है. रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है. आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है. वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है. दरअसल, व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं.
यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं. अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही. रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा. देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है. इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है. डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है. शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं. गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं. देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं. हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की. रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा. इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं. कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं. सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों के रूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं. यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है. बाज़ार में रंग-बिरंगे काग़ज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है.
कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा. पहले संयुक्त परिवार होते थे. सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाक़ों में बसना पड़ता है. इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं. ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं. महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है. ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी. बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है, तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं. आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.
लाल बिहारी लाल
भारत एकता में अनेकता का देश है जहां कई भिन्न -भिन्न धर्मों एंव मतों के लोग रहते हैँ। यहां अनेक धार्मिक त्योवहार भी मनाये जाते है। उन्हीं त्योवहारों में एक त्योवहार है -रक्षा बंधन । रक्षा बंधन हिन्दुओं एवं जैनियों का एक महत्वपूर्ण त्योवहार है। जो भाई-बहन के रिश्तों पर आधारित है। इसे हर साल सावन मास के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षा बंधन में रक्षा सूत्र या राखी का बहुत ही महत्व है। ये राखी आजकल अलग-अलग रुपों में देखने को मिल रहा है। कही धागे का तो कही सोने का तो कहीं चांदी के भी मिल रहे है। यह पर्व भाई-बहन के रिश्तों को मजबूत बनाता है। बहनें भाई को इस दिन रक्षा के रुप में भाई के कलाई पर राखी या रक्षा सूत्र बांधती है। औऱ ललाट पर रोली का तिलक लगाकर मिष्ठान खिलाती है और आरती उतारती है, आरती उतारते समय प्रभू से अपने भाई की रक्षा के लिए प्रार्थना करती है। और भाई अपने बहन को रक्षा का वचन देता है। इतिहास में इसके कई उदाहरण विद्यमान है।
राखी का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे तब भगवान इन्द्र घबरा कर देवो के गुरु बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति इन्द के हाथ पर बाँध दिया और युद्ध में देव विजयी हुए। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। ऐसा विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है। पौराणिक काल में राजा जब युद्ध पर जाते थे तो क्षत्राणियां उन्हें रक्षा-सूत्र या राखी बांधती थी।
दूसरी कथा इतिहास मे कृष्ण और द्रौपदी की कहानी प्रसिद्ध है, जिसमे युद्ध के दौरान श्री कृष्ण की उंगली घायल हो गई थी, श्री कृष्ण की घायल उंगली को द्रौपदी ने अपनी साड़ी को फाड़कर एक टुकड़ा बाँध दिया था, और इस उपकार के बदले श्री कृष्ण ने द्रौपदी को किसी भी संकट मे द्रौपदी की सहायता करने का वचन दिया था। औऱ समय आने पर द्रौपदी को चीर हरण से बचाया भी। स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं एक बार बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान विष्णु के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और बली ने उपहार स्वरुप विष्णु को लौटा दिया। औऱ लक्ष्मी जी अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ लेकर विष्णुलोक आ गयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह प्रथा भाई बहन के रक्षा के रुप में प्रसिद्ध है। आधुनिकता के बाद भी इस प्रथा को आज भी धूमधाम से मनाया चाता है।
(लेखक साहित्य टी.वी.के संपादक हैं)
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’ द्वारा अंग्रेज़ी के प्रथम उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के हिन्दी अनुवाद को राजभाषा विभाग का राजभाषा गौरव पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इस प्रथम पुरस्कार की राशि दो लाख रुपये है।
इस उपन्यास में समुद्र यात्राओं के साथ-साथ एक निर्जन द्वीप में रहने के संघर्ष एवं पराक्रम का सजीव चित्रण किया गया है। कहा जाता है कि स्कॉटिश जहाज़ के डूबने पर शेष बचे अलेक्जेंडर सेलकर्क को आधार बनाकर यह उपन्यास लिखा गया था। अलेकजेंडर सेलकार्क एक अंग्रेज़ जहाजी था। यात्रा के समय तूफ़ान में उसका जहाज़ डूब गया था। जहाज़ के शेष सब यात्री डूबकर मर गए, परन्तु वह बच गया। उसने एक निर्जन द्वीप पर शरण ली। इस द्वीप पर उसके अतिरिक्त कोई और नहीं था। इस निर्जन स्थान पर वह अनेक वर्षों तक रहा। अंत में इस स्थान से उसका उद्धार हुआ और वह सकुशल अपने देश पहुँचा।
डैनियल डेफॉ का निजी जीवन भी दुखों से भरा हुआ था। उनके माता-पिता के आपसी संबंध अच्छे नहीं थे, जिसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका विवाह मैरी टफ़ले के साथ हुआ था। उनकी पत्नी को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। व्यवसाय में लाभ न होने के कारण वे ऋण के बोझ तले दब गए थे। ऐसे समय में उनके उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उनका बहुत साथ दिया। इस उपन्यास से उन्हें सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया। इसे विश्वभर में पढ़ा गया। इसके विक्रय से उन्हें अच्छी आय हुई और उन्होंने अपना संपूर्ण ऋण चुका दिया। जीवन के अंतिम समय में उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था। 24 अप्रैल 1931 को लन्दन में उनका निधन हुआ।
डैनियल डेफॉ ने अपने जीवन में धर्म और नैतिकता को विशेष स्थान दिया। इस उपन्यास का समापन भी वे नीतिपरक उपदेश और शिक्षा के साथ ही करते हैं। उनके लेखन पर आदर्श और नीति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। उनकी सभी कथाओं का अंत सुखदायी है। उनकी कथाओं में धर्म के उपदेश हैं, जो पाठकों को परमार्थ के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी कथाओं में अन्याय एवं असत्य की पराजय होती है तथा सत्य एवं न्याय की विजय होती है। इस दृष्टि से वे भारतीय दर्शन के आदिक निकट प्रतीत होते हैं।
मूल उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के प्रकाशन के लगभग 141 वर्ष पश्चात भारत में श्री देवदत्त तिवारी ने इसका भावानुवाद किया। ‘रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’ नाम से उनकी यह पुस्तक वर्ष 1860 में बनारस मेडिकल कॉलेज के श्री जेजे माइकल प्रिंटर से प्रकाशित हुई थी। इसमें ‘क्रूसो’ के स्थान पर ‘बासो’ लिखा जाना, संभवत टंकण आदि की त्रुटि रही होगी, परन्तु इससे पुस्तक की महत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अव मूल पुस्तक के लगभग 306 वर्ष पश्चात और भावानुवाद के प्रकाशन के लगभग 165 वर्ष पश्चात पुनः इसका भावानुवाद किया गया है। श्री तिवारी जी के भावानुवाद और इस नवीन भावानुवाद में बहुत अंतर है। प्रथम अंतर इसकी भाषा शैली के विषय में है अर्थात श्री देवदत्त तिवारी ने तत्कालीन भाषा शैली में इसका भावानुवाद किया, जो पूर्वांचली प्रभाव और कथावाचकों की शैली से प्रभावित है। उस समय की भाषा और वर्तमान समय की भाषा में बहुत अंतर आ चुका है। इसलिए यह नवीन पुस्तक आज की भाषा में है। नवीन पुस्तक के भावानुवाद में पूर्वोक्त पुस्तक के भावानुवाद की ‘आत्मा’ को यथावत रखा गया है। दूसरा और सबसे बड़ा अंतर यह है कि पूर्वोक्त पुस्तक में बहुत कुछ छूट गया था अथवा छोड़ दिया गया था। इस नवीन पुस्तक में मूल उपन्यास के उन सभी महत्वपूर्ण अंशों, विशेषकर अंतिम भाग को भी सम्मिलित किया गया है, जो पूर्व भावानुवाद में नहीं है। इसमें पुस्तक का संपूर्ण भावानुवाद किया गया है। इसमें अनावश्यक विस्तार के अतिरिक्त और कोई भी अंश छोड़ा नहीं गया। संपूर्ण घटनाओं का वर्णन इसमें सम्मिलित है। नायक रॉबिन्सन क्रूसो की तत्कालीन मनोस्थिति को अधिक मार्मिक बनाने के लिए मैंने अध्याय दो, चार, सात और आठ में कुछ स्वरचित दोहे लिखे हैं, परन्तु वे कथा के प्रवाह और नायक के भावों को बाधित नहीं करते अपितु इनसे रसमयता बढ़ती ही है।
उपन्यास के नायक की अपराजेय जिजीविषा उच्च स्तर की है, परन्तु आपत्ति आने पर वह सदा अपने माता-पिता के उपदेशों का स्मरण करता है। विपत्तियों से घिर जाने पर वह किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता, अपितु कुछ समय के असमंजस के बाद तुरंत आपत्ति-निवारण का समाधान खोज लेता है। उपन्यास में तत्कालीन परिवेश यूरोपीय यात्रियों की साहसिक व्यापारिक यात्राएँ, समुद्री लुटेरे, कृषि, मानवभक्षी जातियाँ, यूरोपीय सभ्यता का प्रथम चरण आदि बहुत कुछ यहाँ रूपायित हुआ है। ध्यातव्य है कि भारत उस समय तक सभ्यता के कई स्वर्णिम युग पार कर चुका था ऐसे में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' की पंक्तियाँ अधिक प्रासंगिक लगतीं हैं-
"जब थे दिगम्बर रूप में वे जंगलों में घूमते
प्रासाद-केतन पट हमारे व्योम को थे चूमते”
फिर भी यह उपन्यास एक युग का समग्र परिवेश प्रस्तुत करने में सहायक हुआ है।
ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य यूरोपीय व्यापारियों का सम्पर्क पहले बंगाल से हुआ था। मीर जाफ़र की ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की धूर्तता के कारण उनका पहला राज्य भी बंगाल में ही बना। अतः पारस्परिक विनिमय में साहित्य और संस्कृति का प्रभाव भी एक दूसरे पर पड़ा। इसलिए 'रॉबिन्सन क्रूसो' का प्रथम अनुवाद बांग्ला भाषा में ही हुआ था, परन्तु उसके अनुवादकों के विषय में कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।
डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’ ने पुरस्कार प्राप्त होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि मेरी धर्मपुत्री फ़िरदौस ख़ान ने इस उपन्यास का भावानुवाद करने में मेरी बड़ी सहायता की है। उसे हार्दिक शुभाशीष। सदा प्रसन्न और सक्रिय जीवन जिये।
उनके अनुसार ‘रॉबिन्सन क्रूसो' लन्दन के सुप्रसिद्ध लेखक डैनियल डेफॉ की रचना है। यह उपन्यास सर्वप्रथम 25 अप्रैल 1719 को प्रकाशित हुआ था। यह अंग्रेज़ी का प्रथम उपन्यास माना जाता है। यह उपन्यास रॉबिन्सन क्रूसो नामक एक अंग्रेज़ पात्र का यात्रा वृतांत है, जो एक उष्णकटिबंधीय द्वीप पर 28 वर्ष से अधिक समय तक रहा। वास्तव में यह एक काल्पनिक आत्मकथा है, साथ ही इसमें डायरी और यात्रावृत्त के तत्व भी मिले हुए हैं। काल्पनिक होते हुए पाठक को यही लगता है कि वह एक वास्तविक आत्मकथा पढ़ रहा है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सबकुछ उसकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है।
डैनियल डेफॉ का जन्म 13 दिसम्बर 1660 को क्रिपलगेट (लन्दन) में हुआ था। वे अंग्रेज़ी पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार थे। उन्होंने धर्म, परालौकिक शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, अपराध और आर्थिक आदि विषयों पर पाँच सौ से अधिक पुस्तकें और लेख लिखे। उन्हें आर्थिक मामलों की पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जाता है।
उनके पिता जेम डेफॉ चर्बी से बत्ती बनाने का काम करते थे। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनके काम में सहायता करे। किन्तु डैनियल डेफॉ को इसमें तनिक भी रुचि नहीं थी। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उन्होंने हौजरी और इससे बने वस्त्रों का व्यवसाय किया। उन्होंने मदिरा का व्यवसाय किया। किन्तु इन कार्यों से शीघ्र ही उनका मोहभंग हो जाता था। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। लेखन में उनकी रुचि थी। सर्वप्रथम उन्हें 1697 में उस समय सफ़लता प्राप्त हुई, जब सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों पर उनके लेखों की श्रृंखला प्रकाशित हुई। इसके पश्चात 1719 से 1724 में उनके अनेक उपन्यास प्रकाशित हुए, जिससे विश्वभर में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 1719 में प्रकाशित उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उन्हें महान उपन्यासकारों की श्रेणी में सम्मिलित कर दिया। अपनी विशिष्ट आत्मकथात्मक विधा के कारण यह उपन्यास आज भी लोकप्रिय है।
डैनियल डेफॉ का जन्म 13 दिसम्बर 1660 को क्रिपलगेट (लन्दन) में हुआ था। वे अंग्रेज़ी पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार थे। उन्होंने धर्म, परालौकिक शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, अपराध और आर्थिक आदि विषयों पर पाँच सौ से अधिक पुस्तकें और लेख लिखे। उन्हें आर्थिक मामलों की पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जाता है।
उनके पिता जेम डेफॉ चर्बी से बत्ती बनाने का काम करते थे। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनके काम में सहायता करे। किन्तु डैनियल डेफॉ को इसमें तनिक भी रुचि नहीं थी। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उन्होंने हौजरी और इससे बने वस्त्रों का व्यवसाय किया। उन्होंने मदिरा का व्यवसाय किया। किन्तु इन कार्यों से शीघ्र ही उनका मोहभंग हो जाता था। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। लेखन में उनकी रुचि थी। सर्वप्रथम उन्हें 1697 में उस समय सफ़लता प्राप्त हुई, जब सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों पर उनके लेखों की श्रृंखला प्रकाशित हुई। इसके पश्चात 1719 से 1724 में उनके अनेक उपन्यास प्रकाशित हुए, जिससे विश्वभर में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 1719 में प्रकाशित उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उन्हें महान उपन्यासकारों की श्रेणी में सम्मिलित कर दिया। अपनी विशिष्ट आत्मकथात्मक विधा के कारण यह उपन्यास आज भी लोकप्रिय है।
इस उपन्यास में समुद्र यात्राओं के साथ-साथ एक निर्जन द्वीप में रहने के संघर्ष एवं पराक्रम का सजीव चित्रण किया गया है। कहा जाता है कि स्कॉटिश जहाज़ के डूबने पर शेष बचे अलेक्जेंडर सेलकर्क को आधार बनाकर यह उपन्यास लिखा गया था। अलेकजेंडर सेलकार्क एक अंग्रेज़ जहाजी था। यात्रा के समय तूफ़ान में उसका जहाज़ डूब गया था। जहाज़ के शेष सब यात्री डूबकर मर गए, परन्तु वह बच गया। उसने एक निर्जन द्वीप पर शरण ली। इस द्वीप पर उसके अतिरिक्त कोई और नहीं था। इस निर्जन स्थान पर वह अनेक वर्षों तक रहा। अंत में इस स्थान से उसका उद्धार हुआ और वह सकुशल अपने देश पहुँचा।
डैनियल डेफॉ का निजी जीवन भी दुखों से भरा हुआ था। उनके माता-पिता के आपसी संबंध अच्छे नहीं थे, जिसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका विवाह मैरी टफ़ले के साथ हुआ था। उनकी पत्नी को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। व्यवसाय में लाभ न होने के कारण वे ऋण के बोझ तले दब गए थे। ऐसे समय में उनके उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उनका बहुत साथ दिया। इस उपन्यास से उन्हें सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया। इसे विश्वभर में पढ़ा गया। इसके विक्रय से उन्हें अच्छी आय हुई और उन्होंने अपना संपूर्ण ऋण चुका दिया। जीवन के अंतिम समय में उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था। 24 अप्रैल 1931 को लन्दन में उनका निधन हुआ।
डैनियल डेफॉ ने अपने जीवन में धर्म और नैतिकता को विशेष स्थान दिया। इस उपन्यास का समापन भी वे नीतिपरक उपदेश और शिक्षा के साथ ही करते हैं। उनके लेखन पर आदर्श और नीति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। उनकी सभी कथाओं का अंत सुखदायी है। उनकी कथाओं में धर्म के उपदेश हैं, जो पाठकों को परमार्थ के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी कथाओं में अन्याय एवं असत्य की पराजय होती है तथा सत्य एवं न्याय की विजय होती है। इस दृष्टि से वे भारतीय दर्शन के आदिक निकट प्रतीत होते हैं।
मूल उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के प्रकाशन के लगभग 141 वर्ष पश्चात भारत में श्री देवदत्त तिवारी ने इसका भावानुवाद किया। ‘रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’ नाम से उनकी यह पुस्तक वर्ष 1860 में बनारस मेडिकल कॉलेज के श्री जेजे माइकल प्रिंटर से प्रकाशित हुई थी। इसमें ‘क्रूसो’ के स्थान पर ‘बासो’ लिखा जाना, संभवत टंकण आदि की त्रुटि रही होगी, परन्तु इससे पुस्तक की महत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अव मूल पुस्तक के लगभग 306 वर्ष पश्चात और भावानुवाद के प्रकाशन के लगभग 165 वर्ष पश्चात पुनः इसका भावानुवाद किया गया है। श्री तिवारी जी के भावानुवाद और इस नवीन भावानुवाद में बहुत अंतर है। प्रथम अंतर इसकी भाषा शैली के विषय में है अर्थात श्री देवदत्त तिवारी ने तत्कालीन भाषा शैली में इसका भावानुवाद किया, जो पूर्वांचली प्रभाव और कथावाचकों की शैली से प्रभावित है। उस समय की भाषा और वर्तमान समय की भाषा में बहुत अंतर आ चुका है। इसलिए यह नवीन पुस्तक आज की भाषा में है। नवीन पुस्तक के भावानुवाद में पूर्वोक्त पुस्तक के भावानुवाद की ‘आत्मा’ को यथावत रखा गया है। दूसरा और सबसे बड़ा अंतर यह है कि पूर्वोक्त पुस्तक में बहुत कुछ छूट गया था अथवा छोड़ दिया गया था। इस नवीन पुस्तक में मूल उपन्यास के उन सभी महत्वपूर्ण अंशों, विशेषकर अंतिम भाग को भी सम्मिलित किया गया है, जो पूर्व भावानुवाद में नहीं है। इसमें पुस्तक का संपूर्ण भावानुवाद किया गया है। इसमें अनावश्यक विस्तार के अतिरिक्त और कोई भी अंश छोड़ा नहीं गया। संपूर्ण घटनाओं का वर्णन इसमें सम्मिलित है। नायक रॉबिन्सन क्रूसो की तत्कालीन मनोस्थिति को अधिक मार्मिक बनाने के लिए मैंने अध्याय दो, चार, सात और आठ में कुछ स्वरचित दोहे लिखे हैं, परन्तु वे कथा के प्रवाह और नायक के भावों को बाधित नहीं करते अपितु इनसे रसमयता बढ़ती ही है।
उपन्यास के नायक की अपराजेय जिजीविषा उच्च स्तर की है, परन्तु आपत्ति आने पर वह सदा अपने माता-पिता के उपदेशों का स्मरण करता है। विपत्तियों से घिर जाने पर वह किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता, अपितु कुछ समय के असमंजस के बाद तुरंत आपत्ति-निवारण का समाधान खोज लेता है। उपन्यास में तत्कालीन परिवेश यूरोपीय यात्रियों की साहसिक व्यापारिक यात्राएँ, समुद्री लुटेरे, कृषि, मानवभक्षी जातियाँ, यूरोपीय सभ्यता का प्रथम चरण आदि बहुत कुछ यहाँ रूपायित हुआ है। ध्यातव्य है कि भारत उस समय तक सभ्यता के कई स्वर्णिम युग पार कर चुका था ऐसे में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' की पंक्तियाँ अधिक प्रासंगिक लगतीं हैं-
"जब थे दिगम्बर रूप में वे जंगलों में घूमते
प्रासाद-केतन पट हमारे व्योम को थे चूमते”
फिर भी यह उपन्यास एक युग का समग्र परिवेश प्रस्तुत करने में सहायक हुआ है।
ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य यूरोपीय व्यापारियों का सम्पर्क पहले बंगाल से हुआ था। मीर जाफ़र की ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की धूर्तता के कारण उनका पहला राज्य भी बंगाल में ही बना। अतः पारस्परिक विनिमय में साहित्य और संस्कृति का प्रभाव भी एक दूसरे पर पड़ा। इसलिए 'रॉबिन्सन क्रूसो' का प्रथम अनुवाद बांग्ला भाषा में ही हुआ था, परन्तु उसके अनुवादकों के विषय में कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।
ईद मिलाद-उन नबी के मौक़े पर सरकारे-दो आलम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम
रहमतों की बारिश कर
हमारे आक़ा
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर
जब तक
कायनात रौशन रहे
सूरज उगता रहे
दिन चढ़ता रहे
शाम ढलती रहे
और रात आती-जाती रहे
मेरे मौला !
सलाम नाज़िल फ़रमा
हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और आले-नबी की रूहों पर
अज़ल से अबद तक...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
आधी सदी देखना भी तो
जादू जादू जैसा लगता...
एक सिनेमा जैसा_
जो सादे पर्दे पर शुरू हुआ था
नाम नहीं
ना चेहरा मोहरा
ना कोई आवाज़
ना हरक़त
सिर्फ़ अंधेरा
सिर्फ़ उजाला
और अचानक कितने चेहरे
कितनी बातें
नाम,सदाएं
सब से पर्दा भर भर जाता!
इतने भरे भरे पर्दे में
पूरी आधी सदी बिताना
कम होता है?
पूरी आधी सदी बिताना जादू सा है
जादू ही तो
आख़िर ये जीवन होता है!!
-ओमा अक्क
(२१ अगस्त २०२६... एक पूरी सदी के आधे सफ़र पर अपना ही जन्मदिन मनाते हुए एक छोटी सी नज़्म.. बस!)
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर... मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की... वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं...
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था. स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.
चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.
श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.
अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.
राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.
आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.

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