डॉ फ़िरदौस ख़ान
सरफ़राज़ ख़ान
देश को स्वतंत्र हुए छह देशक से भी ज्यादा का समय हो गया है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फ़हराया जाता है. मगर क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि 15 अगस्त, 1947 की रात को जब देश आज़ाद हुआ था, उस वक़्त भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर जो तिरंगा लहराया फहराया था, वह कहां है?
इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. राष्ट्रीय ध्वज पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसा प्रतीक चिन्ह होता है जो पूरे देश की अस्मिता से जुड़ा होता है. यूं तो आज़ादी के बाद से हर बरस लाल क़िले पर फहरया जाने वाला तिरंगा देश की धरोहर है, लेकिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराये राष्ट्रीय ध्वज का अपना अलग ही एक महत्व है.
कुछ लोगों का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर लहराया गया तिरंगा नेहरू स्मारक में रखा गया है, जबकि स्मारक के अधिकारी इस बात से इंकार करते हैं. हैरत की बात तो यह भी है कि यह विशेष तिरंगा राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी मौजूद नहीं है. इस अभिलेखागार में 1946 में नौसेना विद्रोह के दौरान बाग़ी सैनिकों द्वारा फहराया गया ध्वज रखा हुआ है. बंबई में 1946 में नौसेना विद्रोह के वक्त तीन ध्वज फहराये गए थे. इनमें कांग्रेस का ध्वज, मुस्लिम लीग का ध्वज और कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज शामिल थे. इनमें से कांग्रेस का ध्वज अभिलेखागार में मौजूद है.
प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर फहराया गया ध्वज राष्ट्रीय संग्रहालय में भी नहीं है. राष्ट्रीय संग्रहालय के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़ आम तौर पर ऐतिहासिक महत्व की ऐसी धरोहर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने की बात हुई थी, लेकिन बाद में इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया था. इसके बाद इसे स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के प्रबंध की देखरेख करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को सौंप दिया गा, लेकिन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग तथा सर्च द फ्लैग मिशन के पास उस तिरंगे के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है.
15 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश के नाम संदेश देने दिया था और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने अपनी स्वर लहरियों से आज़ादी का स्वागत किया था.
फ़ारूक़ी साहब की पैदाइश 17 अगस्त 1915 को राजस्थान के झुंझुनू शहर के मोहल्ला पीरज़ादगांव में एक मज़हबी परिवार में हुई थी। इनकी बुनियादी शिक्षा इनके वालिद हाज़ी मुनीरुद्दीन के द्वारा घर पर ही हुई। इन्हें बचपन से ही गाने का बेहद शौक था। संगीत की दुनिया उन्हें बेहद लुभाती थी। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने राजस्थान के तमाम स्टेज समारोहों में गाना शुरू किया। पर उनके वालिद साहब उनके गाने के सख़्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई पूरी करके एक शिक्षक बनें। पर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। और एक दिन 1945 में वे अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के नाम एक सिफारिशी ख़त लेकर गायक के रूप में किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। बम्बई में उनके जानने वाले एकमात्र शख़्स थे, आज़ाद फ़ारूक़ी, जो पुराने खार इलाके में रहते थे। तो वे कुछ समय के लिए उन्हीं के साथ रहने लगे।
आख़िरकार एक साल संघर्ष के उपरांत खेमचंद प्रकाश जी ने उन्हें अपने घर मिलने के लिए बुलाया। जब वे वहां पहुंचे, तो वहां पर मशहूर गायक व अभिनेता के एल सहगल जी भी मौजूद थे। सहगल साहब ने उन्हें कुछ गाने के लिए कहा, तो फ़ारूक़ी साहब ने उन्हीं की गाई, मशहूर लोरी, 'सो जा राजकुमारी सो जा ...' गा के सुनाई। सहगल साहब बेहद प्रभावित हुए, और बोले, बहुत बढ़िया, तुम्हारी आवाज़ में कुछ नयापन है। बस फिर क्या था, सहगल साहब की इतनी सी तारीफ बहुत थी, और उनका 'रंजीत मूवीटोन' के साथ मासिक वेतन पर अनुबंध हो गया।
कुछ समय बाद सह-गायक के रूप में उन्हें पहली फिल्म मिली। पर उन्हें असली सफलता 1947 में मिली। ये उनके संगीत सफर का सुनहरा दौर रहा। इस साल उनकी 'छीन ले आज़ादी', 'दुनिया एक सराय', 'लाखों में एक' और 'पहली पहचान' फिल्में रिलीज हुईं। इनमें इनके गाये सभी गानों को ख़ूब सराहा गया। ख़ासकर फिल्म 'छीन ले आज़ादी' का गाना, 'कमजोरों की नहीं है दुनिया ...', स्वतंत्रता सेनानियों के बीच बेहद मशहूर हुआ था। और हमने जल्द ही स्वतंत्र राष्ट्र का लक्ष्य भी हासिल कर लिया था। इसके बाद एक और गीत, जिसने, फ़ारूक़ी साहब को बुद्धिजीवियों व मज़दूर वर्ग का चहेता बना दिया। वो था, फिल्म 'दुनिया एक सराय' का गीत, 'एक मुसाफ़िर आये बाबा एक मुसाफ़िर जाए ...'। फ़िर 1948 की फिल्म 'जय हनुमान' के भजन और 'मिट्टी के खिलौने' के भजन 'इस ख़ाक के पुतले को ...' भी लोगों ने ख़ूब सराहा। इनकी अगली दो फिल्में 'भूल भुलैया' 1949 और 'अलख निरंजन' भी बेहद सफल रहीं।
फ़ारूक़ी साहब उन गायकों में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के सफलता पाई थी। अभी वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि 1950 के आख़री महीने में उन्हें अपने वालिद के काफी बीमार होने का पैगाम मिला। लगातार मिल रही सफलता के बावजूद उन्हें वापस जाना पड़ा। और फिर वो दुबारा वापस बम्बई नहीं लौटे। उपरोक्त फिल्मों के अलावा 'बिछड़े बलम', 'परदेसी मेहमान' 1948 और 1947 की दो फिल्मों 'नील कमल' और पिया घर आजा' में उन्होंने अभिनय भी किया था। अपनी बाकी की ज़िंदगी उन्होंने समाज सेवा में व्यतीत की। और 8 फरवरी 1990 को 75 वर्ष की आयु में इस फ़ानी दुनिया से हमेशा के लिए रुख़सत हो गए।
उनके निधन के उपरांत उनके किसी मित्र ने उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा था ...
ख़बर क्या थी मोहम्मद आप हमें तन्हा छोड़ जाएंगे,
दिल-ए-रहबर को ग़मगीन और पुरनम बनाएंगे...
अब न सुबहा आएगी इस शाम के बाद,
बस हम तो सिर्फ़ आप के गीत गुनगुनायेंगे...
जब भी हिंदी सिनेमा के गुमनाम प्रतिभाओं को याद किया जाएगा, तो उस फ़ेहरिस्त में 'मोहम्मद हुसैन फ़ारूक़ी साहब' का नाम अवश्य दर्ज होगा.
बजा बिगुल विद्रोह का, नारों ने भरी हुंकार
हिली हुकूमत अंग्रेजों की, जब चले शब्दों के बाण
जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं. शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है. ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है, जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी शब्दों की शक्ति का ऐसा ही दौर चला. नारों की शक्ल अख्तियार किए कुछ शब्दों ने जनांदोलन में ऐसी जान फूंकी कि ब्रिटिश हुक्मरानों के इरादे शिथिल पड़ गए. नारों की एक-एक गूंज ने ब्रिटिश सत्ता पर आघात किया, जिसका परिणाम आखिरकार अंग्रेजी शासन के खात्मे के रूप में सामने आया.
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कुछ लोकप्रिय नारों की उत्पत्ति और उनका इतिहास कुछ इस तरह रहा-
“इंकलाब जिंदाबाद”
1929 में क्रांतिकारी भगत सिंह ने सेंट्रल असेंबली, दिल्ली में धमाके के बाद जब “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दोहराया तो अवाम की जुबां पर उसके बाद बस यही नारा गूंजने लगा. दरअसल “इंकलाब जिंदाबाद” के असली जनक ‘हसरत मोहानी’ माने जाते हैं, जिन्होंने 1921 में इसकी रचना की थी. लेकिन भगत सिंह की जुबां से “इंकलाब जिंदाबाद” की गूंज के बाद जो लोकप्रियता इस नारे को मिली और जिस प्रकार इस नारे ने जनसाधारण में आजादी की अलख जगाई, उसका वर्णन इतिहास के पन्नों पर अमूल्य योगदान के तौर पर दर्ज है.
मॉडर्न रिव्यू के संपादक श्री रामानंद चट्टोपाध्याय ने संपादकीय टिप्पणी में जब "इंकलाब जिंदाबाद' नारे की आलोचना की, तब दिसंबर, 1929 को अपने और साथी बटुकेश्वर दत्त की तरफ से भगत सिंह ने जो पत्र श्री चट्टोपाध्याय को भेजा, उसके एक अंश में “इंकलाब जिंदाबाद” की व्याख्या कुछ इस प्रकार से की-
“उदाहरण के लिए हम यतिन्द्रनाथ जिंदाबाद का नारा लगाते हैं, इससे हमारा तात्पर्य यह होता है उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिए बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी. यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए अचूक उत्साह को अपनाएं. यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं. इस प्रकार हमें ‘इंकलाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए. इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं. क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है.
“वंदे मातरम्”
‘वंदे मातरम्’ इन दो शब्दों की ताकत और अहमियत का जितना वर्णन किया जाए उतना कम है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस नारे की लोकप्रियता का आलम कुछ इस कदर रहा कि एक समय ब्रिटिश सरकार को इस पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में सोचना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद वंदे मातरम् ने जनमानस में जिस जनचेतना की लहर उत्पन्न की, उसे रोक पाना अंग्रेजों के लिए असंभव हो गया था.
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में की थी. वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में थे. इस गीत का प्रकाशन 1882 में बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘आनंद मठ” में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ था. बंगाल में चले आजादी के आंदोलन में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा. धीरे-धीरे यह गीत लोगों में बेहद लोकप्रिय हो गया. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ 1896 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया था. 14 अगस्त,1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ गीत के साथ ही हुई थी.
‘वंदे मातरम्’ नारे ने जनजागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ‘वंदे मातरम्’ न केवल अवाम की जुबां पर गूंजने वाला अत्यधिक लोकप्रिय नारा था, बल्कि उस दौर की कई पत्र-पत्रिकाओं,पुस्तकों सहित कई प्रकाशनों का शीर्षक भी बना. इसके व्यापक उदाहरण मौजूद हैं- लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम वंदे मातरम् रखा. सन् 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम्’ ही लिखा हुआ था. आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘वंदे मातरम्’ था.
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”
स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से एक बाल गंगाधर तिलक का "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा" का उद्घोष बेहद लोकप्रिय हुआ. आदर से लोग इन्हें "लोकमान्य" बुलाने लगे थे. उनके मतानुसार ‘स्वराज” भारतीयों का अधिकार है और ब्रिटिश सरकार को सत्ता भारतीयों को सौंप कर देश से चले जाना चाहिए. इसके लिए हक लड़कर भी लेना पड़े तो लिया जाएगा’. आजादी के महानायकों में से एक बाल गंगाधर तिलक ने संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पण कर दिया. जनजागृति के लिए उन्होंने अपनी पत्रकारिता की प्रतिभा का अद्भुत उपयोग किया. उनके दो समाचारपत्रों ‘मराठा’ और ‘केसरी’ ने लोगों को आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई. तिलक ने अपने भाषणों और लेखों द्वारा जनता से आग्रह किया कि वह आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, निर्भय और निस्वार्थी बने. उन्होंने आम जनता में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करने के लिए शिवाजी पर्व और गणेश उत्सव की शुरुआत की.
“अंग्रेजों भारत छोड़ो”
‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ मात्र एक नारा नहीं था, बल्कि एक आंदोलन था जिसका शंखनाद अहिंसा के प्रतीक महात्मा गांधी द्वारा किया गया था. क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधी जी ने एक और बड़ा आंदोलन शुरू करने का निश्चय किया. इसको ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नाम दिया गया और यहीं से शुरुआत हुई ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे की. 9 अगस्त 1942 को आंदोलन की शुरुआत के साथ जब “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के नारे लगने लगे तब अंग्रेजों के हौसले बिल्कुल पस्त हो गए.
हालांकि, अंग्रेजों ने इस आन्दोलन के खिलाफ कड़ा रुख इख्तियार किया और आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी नीतियों का प्रयोग किया, लेकिन वे लोगों के हौसले को दबाने में असफल रहे. द्वितीय विश्व युद्ध में उलझने के कारण इंग्लैंड की ताकत और सत्ता की पकड़ में आई कमी को भांपते हुए एक ही समय पर, महात्मा गांधी द्वारा ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ तथा सुभाष चंद्र बोस द्वारा ‘दिल्ली चलो’ नारे दिए गए थे, जिन्होंने अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अंग्रेजों की ताकत को कमजोर करने में उम्मीद के मुताबिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
“करो या मरो”
‘करो या मरो’ का नारा भी गांधी जी द्वारा ही दिया गया था, जो भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम का ही एक हिस्सा था. 1942 में ‘बॉम्बे में अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक को संबोधित करते हुए ‘करो या मरो’ की बात कही थी. उन्होंने कहा था – “एक मंत्र है, छोटा सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूं. उसे आप अपने हृद्य में अंकित कर सकते हैं और प्रत्येक सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं. यह मंत्र है: ‘करो या मरो’. या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे, अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे.” यहीं से ‘करो या मरो’ वो नारा बना जिसने जनता में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी जला दी.
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”
स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में जब मुल्क अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मजबूती से खड़ा था और स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों को धूल-चटाने में जुटे थे, तब आजादी के एक और महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद फौज के गठन के साथ ही ब्रिटिश राज के खात्मे की पूरी तैयारी कर ली थी.
4 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद फौज के साथ बर्मा पहुंचने पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा दिया. इस नारे से ऐसी जनजागृति हुई कि लोगों का हुजूम आजादी के महासंघर्ष में कूद पड़ा.
नेताजी के संबोधन के वो आखिरी प्रभावशाली शब्द कुछ ऐसे थे–
“स्वतंत्रता के युद्ध में मेरे साथियों! आज मैं आपसे एक चीज मांगता हूं, सबसे ऊपर मैं आपसे खून मांगता हूं. यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो शत्रु ने बहाया है. खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है. तुम मुझे खून दो मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं.”
“जय हिंद”
‘जय हिंद’ का नारा भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सन् 1941 में दिया था, वैसे तो इस नारे का प्रयोग सर्वप्रथम क्रांतिकारी चेम्बाकरमण पिल्लई द्वारा किया गया था, लेकिन सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज के लिए युद्ध घोष के तौर पर प्रयोग हुए इस नारे ने अधिक लोकप्रियता प्राप्त की. देशप्रेम की भावना से सराबोर होने के कारण ‘जय हिंद’ नारा अवाम में बेहद प्रचलित हुआ.
सन् 1933 में जब चेम्बाकरमण पिल्लई को आस्ट्रिया की राजधानी वियना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, तब उन्होंने “जय हिन्द” कह कर नेताजी का अभिवादन किया था. अभिवादन स्वरूप कहे गए इन दो शब्दों से नेताजी बेहद प्रभावित हुए थे. बाद में यही शब्द आजाद हिन्द फौज के युद्ध घोष के रूप में जाने गए.
आजाद हिंद फौज के सैनिकों में देशप्रेम की भावना भरने और आजादी की लौ जगाने के लिए ‘जय हिंद’ का प्रयोग हुआ था, लेकिन सैनिकों के साथ-साथ जनता के बीच भी यह नारा बेहद लोकप्रिय हुआ.
“दिल्ली चलो”
1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही आजाद हिंद फौज को “दिल्ली चलो” का आह्वान करते हुए यह नारा दिया था. सन् 1942 में आजाद हिंद फौज के मुखर नेता होते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महसूस किया कि इंग्लैंड द्वितीय विश्व युद्ध में उलझता जा रहा है, तब उस समय यह नारा देकर उन्होंने फौज का मार्गदर्शन किया.
सुभाष चन्द्र बोस मानते थे कि अंग्रेज खुद भारत को आजाद नहीं करेंगे, इसलिए अंग्रेजों से लड़कर ही आजादी पाई जा सकती है. इसी लक्ष्य के साथ उन्होंने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सत्ता पर धावा बोलने के इरादे से ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया.
“साइमन कमीशन वापस जाओ”
लाला लाजपत राय द्वारा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा सन् 1928 में दिया गया था. दरअसल, इस नारे की उत्पत्ति 8 नवंबर, 1927 को घोषित साइमन कमीशन के गठन का परिणाम था. 1927 में भारत में संवैधानिक सुधारों के अध्ययन के लिए सात ब्रिटिश सांसदों के समूह वाले साइमन कमीशन का गठन किया गया था. कमीशन को इस बात की जांच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिए जाए. लेकिन कमीशन में केवल ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सात सदस्यों को ही शामिल किया गया और यही जनता के बीच आक्रोश का प्रमुख कारण बना.
कांग्रेस के 1927 के मद्रास अधिवेशन में ‘साइमन कमीशन’ के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया गया. इस कमीशन से भारतीयों के आत्मसम्मान को बेहद ठेस पहुंची थी. इसलिए जब फरवरी 1928 में आयोग के सदस्य बंबई पहुंचे तो उनके खिलाफ अभूतपूर्व हड़ताल का आयोजन किया गया. विरोध में काले झंडे दिखाए गए और ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगाकर आक्रोश जताया गया.
इसी विरोध के दौरान पुलिस की लाठियों से जख्मी होने के कारण लाला लाजपत राय शहीद हो गए. लेकिन अंतिम समय तक अंग्रेजों को ललकारते हुए उन्होंने कहा “‘मेरे सिर पर लाठी का एक-एक प्रहार, अंग्रेजी शासन के ताबूत की कील साबित होगा.”
ये मात्र कुछ ऐसे नारे हैं, जिन्होंने लोकप्रियता की बुलंदी को छूते हुए जनमानस के रग-रग में देशप्रेम की धारा प्रवाहित की. हालांकि, इसके अलावा भी कई और ऐसे नारे थे, जिनके योगदान को कम नहीं आंका जा सकता. कभी गीत, कभी गजल तो कभी कथन के तौर पर उभरे इन नारों ने शब्दरूपी बाणों की तरह प्रहार किया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत छलनी और सत्ता जमींदोज हो गई.
(लेखिका पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली में सूचना सहायक के पद पर कार्यरत हैं.)
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री व ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त, 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रवींद्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.
कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी, 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर. मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं :-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…
मीना कुमारी की ग़ज़लों में मुहब्बत है, शोख़ी है. वह कहती हैं-
रूह का चेहरा किताबी होगा
जिस्म का रंग अनाबी होगा
शरबती रंग से लिखूं आंखें
और अहसास शराबी होगा
चश्मे-पैमाने से टपका आंसू
कोई बेचारा सवाबी होगा...
धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं :-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…
ज़िन्दगी में मुहब्बत हो, तो ज़िन्दगी सवाब होती है. और जब न हो, तो उसकी तलाश होती है... और इसी तलाश में इंसान उम्रभर भटकता रहता है. अपनी एक ग़ज़ल में मीना कुमारी उम्र भर मुहब्बत को तरसती हुई औरत की तड़प बयां करते हुए कहती हैं-
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुंवारे सजदे
एक-एक बुत को ख़ुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए कांटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा...
कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…
बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…
मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है-
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…
चांद तन्हा है, आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा।
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं।
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।
हमसफ़र कोई मिल गया जो कहीं
दोनों चलते रहे यहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा
दिन गुज़रता नज़र नहीं आता
रात काटे सेभी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक खौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिस राह से उठाया है
शाम का यह उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख बढ़ता जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो कुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों के तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आगोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
मुसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है,
न जाने कौन-सी उम्मीदों पे दिल ठहरा है
तेरी आंखों में झलकते हुए इस गम की क़सम
ए दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है
वक़्त ने छीन लिया हौसला-ए-जब्ते सितम
अब तो हादिसा-ए- ग़म पे तड़प उठता है दिल
हर नए ज़ख्म पे अब रूह बिलख उठती है
होंठ अगर हंस भी पड़े आंख छलक उठती है
ज़िन्दगी एक बिखरता हुआ दर्दाना है
ऐसा लगता है कि अब ख़त्म पर अफ़साना है
मानव सभ्यता में रंगों का काफ़ी महत्व रहा है. हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया. दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है. कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया. विक्टोरियन काल में ज़्यादातर लोग काला या स्लेटी रंग इस्तेमाल करते थे. एक तरह से ये रंग इनकी पहचान थे. फ़िरऔन हमेशा काले कपड़े पहनता था. वैसे भी हर रंग के अपने सकारात्मक और नकारात्मक असर होते हैं. इसलिए यह नहीं कर सकते कि काला रंग हमेशा बुरा ही होता है. हालांकि कई सभ्यताओं में इसे शोक का रंग माना जाता है. शिया मोहर्रम के दिनों में ज़्यादातर काले कपड़े ही पहनते हैं. विरोध जताने के लिए भी काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे काले झंडे दिखाना, सर पर काला कपड़ा या काली पट्टी बांध लेना. ऐसा इस्लामी देशों में ज़्यादा होता है, लेकिन अब भारत में भी इस तरह विरोध जताया जाने लगा है, विशेषकर बाबरी मस्जिद की शहादत की बरसी यानी छह दिसंबर को मुस्लिम समुदाय के लोग काली पट्टी बांधकर ही अपना विरोध ज़ाहिर करते हैं.
महान दार्शनिक अरस्तु ने 4 ईसा पूर्व में नीले और पीले रंगों की गिनती शुरुआती रंगों में की. उन्होंने इसकी तुलना प्राकृतिक वस्तुओं से की, जैसे सूरज-चांद और दिन-रात आदि. उस वक़्त ज़्यादातर कलाकारों ने उनके सिद्धांत को माना और तक़रीबन दो हज़ार साल तक इसका असर देखने को मिला. इसी बीच मेडिकल प्रेक्टि्स के पितामाह कहे जाने वाले 11वीं शताब्दी के ईरान के चिकित्सा विशेषज्ञ हिप्पोकेट्स ने अरस्तु के सिद्धांत से अलग एक नया सिद्धांत पेश किया. उन्होंने रंगों का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया और इसे इलाज के लिए बेहतर ज़रिया क़रार दिया. उनका मानना था कि सफ़ेद फूल और वॉयलेट फूल के अलग-अलग असर होते हैं. उन्होंने एक और सिद्धांत दिया, जिसके मुताबिक़ हर व्यक्ति की त्वचा के रंग से भी उसकी बीमारी का पता लगाया जा सकता है और रंगों के ज़रिये ही इसका इलाज भी मुमकिन है. उन्होंने इसका ख़ूब इस्तेमाल भी किया.
15वीं शताब्दी में स्विट्जरलैंड के चिकित्सक वॉन होहेनहैम ने ह्यूमन स्टडी पर काफ़ी शोध किया, लेकिन उनके तरीक़े हमेशा विवादों में रहे. उन्होंने ज़ख्म भरने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया. 17-18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धांत ने अरस्तु के विशेष रंगों को सामान्य रंगों में बदल दिया. 1672 में न्यूटन ने रंगों पर अपना पहला परचा पेश किया. यह काफ़ी विवादों में रहा, क्योंकि अरस्तु के सिद्धांत के बाद इसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं था. रंगों के विज्ञान पर काम करने वाले लोगों में जॉन्स वॉल्फगैंग वॉन गौथे भी शामिल थे. उन्होंने न्यूटन के सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हुए थ्योरी ऑफ कलर पेश की. उनके सिद्धांत अरस्तु की थ्योरी से मिलते जुलते थे. उन्होंने कहा कि अंधेरे में से सबसे पहले नीला रंग निकलता है, वहीं सुबह के उगते हुए सूरज की किरणों से पीला रंग सामने आता है. नीला रंग गहरे रंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पीला रंग हल्के रंगों का. 19वीं शताब्दी में कलर थैरेपी का असर कम हुआ, लेकिन इसके बाद 20वीं शताब्दी में यह नए रूप में सामने आया. आज भी कई चिकित्सक कलर थैरेपी को इलाज का अच्छा ज़रिया मानते हैं और इससे अनेक बीमारियों का उपचार भी करते हैं. आयुर्वेद चिकित्सा में भी रंगों का विशेष महत्व है. रंग चिकित्सा के मुताबिक़ शरीर में रंगों के असंतुलन के कारण ही बीमारियां पैदा होती हैं. रंगों का समायोजन ठीक करके बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है. ऑस्टवाल्ड ने आठ आदर्श रंगों को विशेष क्रम में संयोजित किया. इस चक्र को ऑस्टवाल्ड वर्ण कहा जाता है. इसमें पीला, नारंगी, लाल, बैंगनी, नीला, आसमानी, समुद्री हरा और हरा रंग शामिल है. 60 के दशक में एंथ्रोपॉलिजिस्ट्स केन ने रंगों पर अध्ययन किया. उनके मुताबिक़ सभी सभ्यताओं ने रंगों को दो वर्गों में बांटा-पहला हल्के रंग और दूसरा गहरे रंग.
कौन-सा रंग क्या कहता है?
मूल रूप से इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है. ये सात रंग हैं लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैंगनी. लाल रंग को रक्त रंग भी कहते हैं, क्योंकि ख़ून का रंग लाल होता है. यह शक्ति का प्रतीक है, जो जीने की इच्छाशक्ति और अभिलाषा को बढ़ाता है. यह प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो क्यान रंग का संपूरक है. यह रंग क्रोध और हिंसा को भी दर्शाता है. हरा रंग प्रकृति से जुड़ा है. यह ख़ुशहाली का प्रतीक है. हमारे जीवन में इसका बहुत महत्व है. यह प्राथमिक रंग है. हरे रंग में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, सोडियम, कैल्शियम, निकिल आदि होते हैं. इस्लाम में इसे पवित्र रंग माना जाता है. नीला रंग आसमान का रंग है. यह विशालता का प्रतीक है. भारत का क्रीड़ा रंग भी नीला ही है. यह धर्मनिरपेक्षता का भी प्रतीक है. यह एक संयोजी प्राथमिक रंग है. इसका संपूरक रंग पीला है. गहरा नीला रंग अवसाद और निराशा को भी प्रकट करता है. पीला रंग ख़ुशी और रंगीन मिज़ाजी को दर्शाता है. यह आत्मविश्वास बढ़ाता है. यह वैराग्य से भी संबंधित है. हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है. विष्णु और कृष्ण को यह रंग प्रिय है. बसंत पंचमी तो इसी रंग से जुड़ा पर्व है. डल पीला रंग ईर्ष्या को दर्शाता है. स़फेद रंग पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है. यह शांति और सुरक्षा का भाव पैदा करता है. यह अकेलेपन को भी प्रकट करता है. काला रंग रहस्य का प्रतीक है. यह बदलाव से रोकता है. यह नकारात्मकता को भी दर्शाता है.
हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरुजी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरुजी के घर गए.
वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर सफ़ेद शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरुजी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरुजी के बड़े भाई श्री हरिकृष्ण बजाज की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.
रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरुजी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरुजी पीछे तबले थामे बैठे थे.
अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.
गुरुजी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरुजी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.
गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.
संत कबीर जी ने ऐसे ही समर्पित गुरु के बारे में कहा है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.
यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत ग्रहण करने का मौक़ा मिला. कई साल हमने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना की है. संगीत की देवी सरस्वती की वन्दना से सुर साधना का सफ़र शुरू हुआ. हमारे गुरुजी श्री बालकृष्ण बजाज जी देवी सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे. इस दौरान कई संगीत के कार्यक्रमों में जाने का मौक़ा मिला. कई सम्मान भी मिले, लेकिन सबसे बड़ा सम्मान यही था कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को क़रीब से जानने, समझने और सीखने का मौक़ा मिला.
हिन्दुस्तान में आज भी पारम्परिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परम्परा क़ायम है. हमें भी एक ऐसे गुरु मिले, जिस पर किसी भी शिष्य को नाज़ होगा.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
बचपन में पढाई के दौरान कक्षा नौ तक गणित के विषय से हमें बहुत डर लगता था। यूँ समझिए जैसे बिल्ली को देखकर चूहा भागता है वही हाल हमारा होता था, कभी गणित में पास नहीं हुए हमेशा बैक आती थी और मार पडती थी सो अलग।
एक दिन की बात है हमारे टीचर एक सवाल बोर्ड पर समझा रहे थे और उन्हें हमारी काबिलियत का पता था लिहाजा जान पूछकर हमसे उसी सवाल के बारे में पूछते और हम ढुंट की तरह उल्टे सीधे जवाब देते या फिर खामोश हो जाते और पूरी क्लास में हमारा मजाक बनाया जाता था।
टीचर हमसे बोले तुम्हें गणित समझ क्यूँ नहीं आता है.? हम बोले..जी बहुत डर लगता है, वो बोले डर किस बात का लगता है। हमने बडी मासूमियत से बोला- "मार का डर लगता है।" वो बोले "मार का डर।" हम बोले स्कूल में सवाल हल नहीं होता तो आपसे पिटते हैं और घर पर पापा से, लेकिन क्या करूँ समझ ही नहीं आता।
थोडी देर सोचकर वो बोले ठीक है बेटा आज के बाद हम आपको न डाँटेंगे और ना ही मारेंगे। बस एक बात हमारी मानोगे। हमने कहा- जी। वो बोले- अपने मन से डर को निकाल दो। देखो डर के आगे जीत है, आप कोई भी सवाल को अपने आप हल करो, एक बार नहीं आयेगा, दो बार नहीं आयेगा। आखिर कब तक समझ नहीं आयेगा। वो हमारे मनोविज्ञान को समझ चुके थे। हमने कोशिश की।कुछ दिन तो समझ नहीं आया और फिर बडे प्यार से हमको उन्हीं सवालों को समझाते रहे और धीरे धीरे हमारी झिझक और डर दिल से निकल गया और कुछ ही महीनों में वही गणित जो हमको हव्वा लगता था हमारा मनपसंद सब्जैक्ट बन गया, आलम ये हो गया कि कठिन से कठिन सवाल भी चुटकियों में हल करने लगे और इस नाचीज ने दसवीं और इंटर बोर्ड की परीक्षा में स्कूल में सबसे ज्यादा अंकों से पास की थी।
आज भी वो मेरे टीचर वो मेरे गुरू जब भी याद आते हैं उनके प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है जिन्होंने मुझे एक सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया। मौजूदा दौर में जब न पढने वाले रहे न पढाने वाले रहे बस सबका ध्येय केवल और केवल धन कमाना ही रह गया है तो बडा कोफ्त होता है और उस दौर की यादों को समेटे हुए खुद को आज खुशकिस्मत समझता हूँ।
ये सतरह साल के उस लड़के की प्रेरणादायी कहानी है, जिसने पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया। कहते हैं कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती, और इस बात को सच साबित किया है स्पेन के युवा फुटबॉलर लैमिन यमाल ने। जिस उम्र में अधिकांश बच्चे अपने भविष्य के सपने देख रहे होते हैं, उस उम्र में लैमिन यमाल दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनकी कहानी केवल फुटबॉल की नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत, आत्मविश्वास और बड़े सपने देखने की कहानी है।
सिर्फ सात साल की उम्र में उन्हें दुनिया की सबसे प्रसिद्ध फुटबॉल अकादमी ला मासिया में दाखिला मिला, जहाँ से लियोनेल मेसी, ज़ावी और इनिएस्ता जैसे महान खिलाड़ी निकले हैं। वहाँ तक पहुँचना ही बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन खुद को साबित करना उससे भी कठिन था। रोज़ सैकड़ों प्रतिभाशाली बच्चे मैदान पर उतरते थे, मगर लैमिन की रफ्तार, शानदार ड्रिब्लिंग और खेल को समझने की क्षमता उन्हें सबसे अलग बना देती थी। उनके कोच बहुत जल्द समझ गए कि यह बच्चा भविष्य में कुछ बड़ा करने वाला है।
साल 2023 में, केवल 15 साल की उम्र में, उन्हें बार्सिलोना की सीनियर टीम से खेलने का मौका मिला। मैदान पर उतरते ही उन्होंने इतिहास रच दिया और क्लब के सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों में अपना नाम दर्ज करा लिया। इतनी कम उम्र में जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने बड़े खिलाड़ियों के बीच खेल दिखाया, उसने पूरी फुटबॉल दुनिया का ध्यान उनकी ओर खींच लिया।
कुछ ही समय बाद उन्हें स्पेन की राष्ट्रीय टीम से बुलावा मिला। अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मैच में गोल करके उन्होंने स्पेन के इतिहास के सबसे कम उम्र के गोल स्कोरर बनने का रिकॉर्ड बना दिया। इसके बाद दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमी और विशेषज्ञ उन्हें भविष्य का सुपरस्टार मानने लगे।
फिर आया यूरो 2024, जहाँ लाखों लोगों की निगाहें इस किशोर खिलाड़ी पर थीं। कई लोगों को लगा कि इतनी कम उम्र का खिलाड़ी बड़े टूर्नामेंट का दबाव नहीं झेल पाएगा, लेकिन लैमिन यमाल ने अपने शानदार खेल से हर आलोचक को जवाब दिया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर टीम के लिए बेहतरीन प्रदर्शन किया, यादगार गोल और असिस्ट किए और पूरे टूर्नामेंट में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। स्पेन ने यूरो 2024 का खिताब जीतकर इतिहास रचा और केवल 17 साल की उम्र में लैमिन यमाल यूरोपियन चैंपियन बन गए। यह जीत केवल एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि उन संघर्षों और सपनों की जीत थी जो उन्होंने बचपन से देखे थे।
अब पूरी दुनिया की नज़र फीफा वर्ल्ड कप 2026 पर है। फुटबॉल प्रेमियों को उम्मीद है कि लैमिन यमाल स्पेन को विश्व कप जिताने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। हालांकि, यह याद रखना ज़रूरी है कि उन्होंने अभी तक फीफा वर्ल्ड कप नहीं जीता है। विश्व कप जीतना उनका सपना है, जिसे पूरा करने का मौका उन्हें आने वाले वर्षों में मिलेगा।
लैमिन यमाल की कहानी हमें सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता। एक साधारण परिवार से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल सितारों में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि सफलता उम्र नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास की मोहताज होती है।
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प्रस्तुति : सरफ़राज़ ख़ान
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है. इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के चलते मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने की क़गार पर है.
कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है. कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का ज़िक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी. कहानी 'सिंहासन बत्तीसी' में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है. सतवध्दर्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ. आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है. इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है. वहां कठपुतली मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है.
भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएं और किवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फ़रहाद की कथाएं ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन अब साम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाने लगे हैं. रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के प्रदर्शन में भी काफ़ी बदलाव आ गया है. अब यह खेल सड़कों, गली-कूचों में न होकर फ़्लड लाइट्स की चकाचौंध में बड़े-बड़े मंचों पर होने लगा है.
छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों, रंग-बिरंगे कपड़ों पर गोटे और बारीक काम से बनी कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध कर लेती हैं. कठपुतली के खेल में हर प्रांत के मुताबिक़ भाषा, पहनावा व क्षेत्र की संपूर्ण लोक संस्कृति को अपने में समेटे रहते हैं. राजा-रजवाड़ों के संरक्षण में फली-फूली इस लोककला का अंग्रेजी शासनकाल में विकास रुक गया. चूंकि इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार नट, भाट, जोगी समाज के दलित वर्ग के थे, इसलिए समाज का तथाकथित उच्च कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था.
महाराष्ट्र को कठपुतली की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन सिनेमा के आगमन के साथ वहां भी इस पारंपरिक लोककला को क्षति पहुंची. बच्चे भी अब कठपुतली का तमाशा देखने की बजाय ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखना ज़्यादा पसंद करते हैं. कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकर इस कला के क़द्रदानों की घटती संख्या के कारण अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ने पर मजबूर हैं. अनके परिवार ऐसे हैं, जो खेल न दिखाकर सिर्फ़ कठपुतली बनाकर ही अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. देश में इस कला के चाहने वालों की तादाद लगातार घट रही है, लेकिन विदेशी लोगों में यह लोकप्रिय हो रही है. पर्यटक सजावटी चीज़ों, स्मृति और उपहार के रूप में कठपुतलियां भी यहां से ले जाते हैं, मगर इन बेची जाने वाली कठपुतलियों का फ़ायदा बड़े-बड़े शोरूम के विक्रेता ही उठाते हैं. बिचौलिये भी माल को इधर से उधर करके चांदी कूट रहे हैं, जबकि इनको बनाने वाले कलाकर दो जून की रोटी को भी मोहताज हैं.
कठपुतली व अन्य इसी तरह की चीज़ें बेचने का काम करने वाले बीकानेर निवासी राजा का कहना है कि जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-क़स्बों से पलायन करना पड़ रहा है. कलाकरों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है. रोज़गार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकरों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है. जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी ज़रूरत है. उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं. वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संसकृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.
पुरानी फ़िल्मों और दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में कठपुतलियों का अहम किरदार रहा है, मगर वक़्त के साथ-साथ कठपुतलियों का वजूद ख़त्म होता जा रहा है. इन विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बात यह है कि कठपुतली कला को समर्पित कलाकारों ने उत्साह नहीं खोया है. भविष्य को लेकर इनकी आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजे हैं. इन्हें उम्मीद है कि आज न सही तो कल लोककलाओं को समाज में इनकी खोयी हुई जगह फिर से मिल जाएगी और अपनी अतीत की विरासत को लेकर नई पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटेगी.












