जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है, उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है. उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है. वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है, किसी इंसान से हो या ख़ुदा से.


अगर इंसान अल्लाह या ईश्वर से इश्क़ करे, तो फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर उसकी इबादत की है या फिर किसी मन्दिर में बैठकर कर उसे याद किया है.
 
एक गीत
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की... गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूजरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद वह भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...

हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.

गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.

सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक़्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.

एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा, तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फ़िरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.

1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, क़िलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.

दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलाक़े में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.

किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फ़िरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक़्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फ़िरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...


अच्छी बातें जहां भी मिलें वहां से लेनी चाहिए। यह प्रवृत्ति हमें लानी पड़ेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम इस देश में कितनी भी अच्छी बातें कर लें सौहार्द, प्रेम और गंगा-जमुनी तहजीब की- पर वो आएगी नहीं। आज आप सब यहां इकट्ठा हैं और मुझे लगता है आप में 95% मुस्लिम लोग हैं। तारीफ तो आप लोग सुन सुन के अब तक अघा गए होंगे और बहुत बुरी वाली नफरत भी देख देख के अघा गए होंगे। थोड़ी देर हम लोगों को बैठकर समीक्षात्मक दृष्टि से एक बार अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है दुनिया की हर कौम को, समाज को हर कम्युनिटी को बीच-बीच में अपनी समीक्षा करनी चाहिए कि अगर उसका पतन हो रहा है, उसके खिलाफ लोगों की आवाज बुलंद हो रही है तो सारी कमी हमारे विपक्षी की नहीं होती। बहुत सी कमियां हमारे भीतर व्याप्त होती हैं।

मुझे लगता है कि आज वह समय है कि देश और दुनिया के मुसलमान बैठें और सोचें कि उनसे कहां पर कौन सी गलती होती चली जा रही है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा तबका उसके खिलाफ हो चुका है, उसके मुखालिफ है। ये बातें सुनने में अजीब लग सकती हैं। मैं यहां से बहुत मीठी बातें कर सकता हूं। आप लोगों को बहुत अच्छा बता सकता हूं। इस्लाम धर्म की महानता गिना सकता हूं। पर, इसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि, यदि मेरे लिए इस्लाम दुनिया का सबसे महान धर्म होता तो मैं सुबह कलमा पढ़ के मुसलमान बन चुका होता। यकीनन मेरे और आपके, दोनों के दृष्टिकोण में कोई तो फर्क है और इस फर्क के साथ हमें इस देश में और इस दुनिया में रहना होगा। समस्या कहीं और छुपी हुई है।

हम मुसलमान हैं, या हम हिंदू हैं, या हम ईसाई हैं, या हम सिख हैं- इन बातों से दुनिया में किसी को कोई बैर नहीं होता। इन बातों से किसी को कोई समस्या नहीं होती कि हम कौन हैं। सारी समस्या यहां से शुरू होती है जब हम कहते हैं कि- हमसे बेहतर कोई नहीं है। आपके मुसलमान होने से इस दुनिया को कोई तकलीफ नहीं होती। याद रखिए, आज मुसलमानों के बीच में एक सामान्य बात फैला दी गई है। मेरे पास अक्सर बहुत सारे मुस्लिम ऐसे मीम, ऐसे मैसेज। ऐसे वीडियोज फॉरवर्ड करते हैं जिसमें हिंदू लोग मुसलमानों को मार रहे हैं- या कोई गुरु उकसा रहा है- या कोई गुरु इस्लाम को गालियां दे रहा है- या कोई नेता मुसलमानों के विरुद्ध बोल रहा है। मैं कई बार सोचता हूं कि जवाब में फिर मैं वो सारे वीडियोज निकाल दूं जिसमें कि मुसलमान नेता पूरी दुनिया को गाली दे रहे हैं- मुस्लिम नेता-मौलाना पूरी दुनिया से नाराज घूम रहे हैं- उनको दुनिया में कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसी बातें भरी पड़ी हैं।

मुझे नहीं लगता है कि आप में से जितने लोग अभी यहां मेरी प्रशंसा कर रहे थे इस देश में ऐसे दस-बारह मौलाना निकालिए जो ठीक यही कर रहे हों। मैंने तो अपने यहां ये दावत इफ्तार आज नहीं, 20 साल से रखा है। लेकिन और कितने मौलाना हैं, कितने मुस्लिम स्कॉलर हैं, जिनके घर में आप होली मिलने गए थे और कितने हिंदू लोगों को बुलाकर होली मिलन कराया गया था। आप में से कितने लोगों ने रंग गुलाल लगा के ये करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं लगता कि आप में से अधिकांश लोगों ने ऐसा किया होगा। बहुत शरीफ मुसलमानों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए होंगे ताकि रंग का छींटा ना पड़े, होली की आवाज ना सुनाई दे। कुछ एक होंगे, जो बाहर निकल के गए होंगे, होली खेली होगी। पर, उनको बाद में कितनी गालियां सुननी पड़ी होंगी अपनी कम्युनिटी में… जरा उनसे जाकर यह भी पूछिएगा।

मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि पिछले काफी समय से ना केवल मुसलमान, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वामपंथी धड़ा भी बहुसंख्यक यानी हिन्दुओं के खिलाफ है। पूरी दुनिया में ऐसा है। दुनिया में जहां भी वामपंथी होते हैं… वामपंथी समझते हो ना लेफ्टिस्ट!… जैसे आजकल जो पत्रकार आपको अच्छे लग रहे हैं वो लेफ्टिस्ट हैं। दरअसल भारत के मुसलमानों को अजीत अंजुम अच्छा लगता है, रवीश कुमार अच्छा लगता है, बरखा दत्त अच्छी लगती है। ये सब लोग अच्छे लगते हैं क्योंकि वो इस वक्त मोदी को, बीजेपी सरकार को, हिंदुओं को, हिंदुओं की संकीर्णता को गाली देते हुए आपकी प्रशंसा या आपकी सुरक्षा करते हैं। पर, आप में से किसी को (वो जो गुजर गए) पाकिस्तान के तारिक़ फ़तह शायद ही अच्छे लगते होंगे। लेफ्ट की एक विशिष्टता समझिएगा। लेफ्ट हमेशा अल्पसंख्यकों को, माइनॉरिटी को पकड़ता है, क्योंकि उसके पास अपनी कमजोरी होती है। वह बहुसंख्यक के साथ नहीं है, तभी वह लेफ्ट है। इसलिए वो उस देश के अल्पसंख्यक को पकड़ता है और अल्पसंख्यक को हमेशा सत्ता के खिलाफ बरगलाता रहता है।

बहुत बदकिस्मती की बात है कि भारत में ज्यादातर मुसलमान पढ़ते नहीं है। मैं बीस बाईस सालों से मुसलमानों के संपर्क में हूं। मैंने निरंतर यह कहा कि पढ़ो। तुम्हारी किताब का ही नाम पढ़ो। कुरान के मानी होता है पढ़ना, स्टडी करना। पर तुम नहीं पढ़ते हो। जब तुम नहीं पढ़ते हो तो तुम इतिहास भी नहीं पढ़ते हो। और जब तुम इतिहास नहीं पढ़ते हो, तो तुम अपनी रूट्स नहीं खोज पाते हो, अपनी जड़ नहीं खोज पाते हो। फिर तुम्हें जो बता दिया जाता है तुम उसमें खुश हो जाते हो। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी केवल हिंदुओं के घर नहीं चल रही है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मुसलमानों के घर भी चल रही है, सिखों के घर भी चल रही है, ईसाइयों के घर भी चल रही है, दलितों के घर भी चल रही है। सबके घर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चल रही है।

अच्छी बातें करने का जमाना जा चुका है। अब समझने का जमाना है। यकीनन वो लोग मूर्ख हैं जो किसी बादशाह की कब्र खोद कर उसे सपाट करके उस पे तुलसी का बिरवा लगा देना चाहते हैं। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है। ये तो लगभग वही काम हो गया जो उस बादशाह ने खुद किया था। लेकिन उससे बड़े मूर्ख वो हैं जो उस कब्र को बचाने में लगे हुए हैं- जिन्हें ऐसा लगता है कि उस कब्र को बचा लेने से उनका इतिहास सुरक्षित हो जाएगा। इतिहास कब्रों में नहीं रहता। इतिहास इंसानों में रहता है। कब्रों के अंदर इतिहास नहीं रहते। इस्लाम की मूलभूत परंपरा में कब्रों, समाधियों इन सब चीजों का विरोध किया गया था। इसका मतलब क्या था? मोहम्मद कहना क्या चाहते थे? क्या वो अपने लिए एक बड़ा सा मंदिर, एक बड़ा सा मस्तबा नहीं बनवा सकते थे? पिरामिड से ऊंचा उनका एक समाधि स्थल बन सकता था। इतनी ताकत मोहम्मद की अपनी जिंदगी में आ चुकी थी। नहीं बनवाया तो क्यों? इसलिए क्योंकि मोहम्मद जानते थे कि इस्लाम समाधियों में, बुतों में, कब्रों में, महलों में, दरवाजों में, शिलालेखों में नहीं होगा। इस्लाम अगर जिंदा रहेगा तो वो किसी मुसलमान के किरदार के अंदर जिंदा रहेगा।

मगर ऐसा होता नहीं है। निजामुद्दीन औलिया ने मोहब्बत, प्रेम-सहिष्णुता, सद्भाव की भावना का प्रचार किया। उसे आपने स्वीकार नहीं किया। पर उनकी मजार पर चादर ले ले के आप हर बृहस्पतिवार, हर जुमरात, हर जुम्मा, हर शनिवार, हर खड़े हैं। सवाल किसी बुतपरस्ती, किसी मजारपरस्ती का नहीं है। मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो खुद बुतपरस्त हूं। मेरा इन सब से कोई मुखालिफत नहीं। मेरी मुखालिफत इस बात से है कि ठीक है, आपका अकीदा है, आपको अच्छा लगता है। आप ले जाइए गुलाब और चढ़ा के आ जाइए… निजामुद्दीन के दरवाजे पर… अमीर खुसरो के दरवाजे पर… किसी भी बाबा के, पीर के दरवाजे पर… कोई फर्क नहीं पड़ता। जाइए बोसा ले आइए जाकर के खाना-ए काबे में लगे हुए वो संग असद का। पर इससे क्या होना है? दरअसल जब तक आपके किरदार के भीतर वो मूल बातें नहीं आती हैं जिससे कि इस्लाम दुनिया में इतना फैला… या, एक हिंदू के भीतर जब तक वो बातें उसके चरित्र में नहीं उतरती हैं जिससे राम दुनिया में पूजनीय बने या कृष्ण दुनिया में पूजनीय बने… या एक ईसाई के अंदर नहीं आतीं जिससे ईसा पूरी दुनिया में इतने प्यारे, पूजनीय बने… तब तक किसी समुदाय के होने का अर्थ वास्तव में केवल और केवल दुष्टों की एक बड़ी फौज खड़ा करना होता है। याद रखिएगा आप में से तमाम लोग केवल यह रोज़े रख के, इफ्तार मना करके और दावत इफ्तार करने के बाद बहुत सारी गालियां उन लोगों को देते हो जो आपके खिलाफ बोलते हैं… या चुगलियां करते हुए निकल जाएंगे… या उन लोगों से प्रभावित हो जाएंगे जो बिना मतलब आपको सांत्वना दे रहे हैं… ऐसा है तो आप अपना नुकसान करते जा रहे हैं।

इस वक्त मेरे सामने मुसलमान हैं, इसलिए मैं सिर्फ मुसलमानों से बातें कर रहा हूं। भारत में वो तथाकथित संघीय विचारधारा या संकीर्ण विचारधारा आपकी दुश्मन हो सकती है। पाकिस्तान में कौन सा आरएसएस काम करता है? अफगानिस्तान में कौन सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा है? सूडान में कौन सा मोदी है? इराक में कौन कर रहा है? ईरान में कौन है? दुनिया में शायद 50 से कुछ ज्यादा देश इस्लामिक हो चुके हैं। उन देशों में कौन नरेंद्र मोदी जाकर के बैठा है, कौन योगी आदित्यनाथ बैठा है, कौन सा आरएसएस काम कर रहा है? अरब के कुछ बहुत अमीर, ओबाश और अय्याश देशों को छोड़ दीजिए। उसके बाहर कौन सा ऐसा देश है जहां आपस में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल नहीं कर रहा है- उसकी हत्या नहीं कर रहा है- उसे मार नहीं रहा है। इसकी समस्या कहां छुपी हुई है यह आप खोजेंगे। इसे मैं खोजूंगा तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा। आपको ऐसा लगेगा कि यह तो काफिर है- यह तो हमें बरगला रहा है- तो बेहतर है इसे आप ही खोजिए कि किस समस्या के चलते आपको पूरी दुनिया में जिल्लत, बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा है।

आपको पता है आपको यूरोप और अमेरिका का वीजा लेना पड़े को तो कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। आपकी टोपी और दाढ़ी कितनी बड़ी समस्या बन जाएगी। ऐसा हमेशा से तो नहीं था अचानक से कैसे हो गया? सन 2000 में बीबीसी अपने सर्वे में दुनिया का सबसे सफल और सबसे ताकतवर इतिहास का व्यक्ति चुनता है प्रॉफेट मोहम्मद को। सन 2000 से 2015-16 और फिर 2023-24 आते-आते यूरोप, अमेरिका आपको वीजा नहीं देता है। क्या हो गया इतने दिनों के अंदर? इस समस्या को समझिएगा। यह समस्या हिंदू में भी है, मुसलमान में भी है, सिख में भी है और ईसाई में भी है। मैं सब में एक बराबर समझता हूं।

हमारे बुत परस्त होने से, हमारे आतिश परस्त होने से, हमारे मजार परस्त होने से या हमारे तथाकथित खुदा परस्त होने से किसी को कोई तकलीफ नहीं होती है। तकलीफ शुरू तब होती है जब बहार भाई ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया उस निराकार खुदा को मानने लगे, या जब ओमा द अक्क सोचते हैं कि पूरी दुनिया मेरे भगवान राम को मानने लगे… सारी समस्या वहां से शुरू होती है। दूसरे को अपने जैसा बनाने की धुन इस दुनिया में हमें एक दूसरे का शत्रु बनाती है। तुम्हारा बच्चा तुम्हारी तरह नहीं होता, वो तुम्हारी बात नहीं मानता है और तुम चाहते हो पूरा मुल्क तुम्हारी बात मान ले। ना केवल मुल्क बल्कि पूरी दुनिया तुम्हारी बात मान ले। ये घमंड शायद अच्छा भी लगेगा। यकीनन अच्छा लगेगा। हो सकता है तुम में से कोई उठ के कह दे कि हमारे तो रसूल की सुन्नत है उन्होंने तो खुद इतनी बड़ी जंग लड़ी थी। तो मेरा सवाल होगा कि क्या तुम्हारा किरदार तुम्हारे रसूल की तरह है? क्या तुम दौलत से दूर हो? क्या तुम खुशामद से दूर हो? क्या तुम तारीफों से फूलते नहीं हो? क्या तुम बड़े-बड़े लोगों की चापलूसी नहीं करते हो? क्या तुम्हारा चरित्र तुम्हारे सर के ऊपर बोलता रहता है- कि तुम्हारी लालच तुम्हारी नाक पर चढ़ी रहती है- कि तुम्हारी वासनाएं तुम्हारे सर पर बैठी रहती हैं। किस चीज पर तुम तुलना कर रहे हो क्योंकि तुम्हारा चेहरा देख के तो बार-बार ऐसा ही लगेगा कि इस्लाम यकीनन औरंगजेब की तरह के लोगों ने फैलाया होगा जिनके हाथ में तलवारें थीं, जिन्होंने अपने बाप का कत्ल किया, अपनी बहनों का कत्ल किया, अपने भाइयों का कत्ल किया… और फिर भी टोपी बुन करके अपने को औलिया बताता रहा। इतिहास यही है तुम इसको बदल नहीं सकते हो। लेकिन खुश होने की जगह नहीं है यहां किसी हिंदू को- क्योंकि यही काम बिंबसार भी कर रहा था- यही काम समुद्रगुप्त भी कर रहा था- अजात शत्रु भी कर रहा था… यह काम तो चलता ही रहा है। सत्ताओं में यही होता है। हमेशा एक सत्ता दूसरी सत्ता को निगलने के लिए यही करती है। सत्ताओं में कोई बाप, बेटा, भाई, बहन नहीं होता। मैंने पिछले दिनों कहा भी था कि अकृतज्ञता, एहसान फरामोशी सियासतदान की पहली निशानी होती है। तुम सियासत नहीं कर सकते हो जब तक तुम में एहसान फरामोशी ना आ जाए।

तुम्हारा आदर्श कोई महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी या औरंगजेब या अकबर नहीं है। यकीन करना तुम्हारे हिसाब से, इस्लाम के हिसाब से तुम्हारा आदर्श केवल और केवल एक ही हो सकता है- वो है मोहम्मद पैगंबर… और कोई नहीं। उसके बाद के लोग तुम्हारे लिए मोहब्बत करने के लिए हैं। तुम रूमी से मोहब्बत कर सकते हो। तुम मंसूर से मोहब्बत कर सकते हो। तुम निजामुद्दीन से मोहब्बत कर सकते हो। तुम गालिब से मोहब्बत कर सकते हो। तुम जिससे मन करे उससे मोहब्बत कर सकते हो। गांधी से मोहब्बत कर सकते हो- किसी से भी कर सकते हो। और जब तुम अपने प्रॉफिट, अपने पैगंबर के किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करोगे- मान लो आज से शुरू करोगे- एक साल बाद तुम देखोगे कि तुम्हारे दुश्मन कम हो गए हैं। इसलिए नहीं कि अब लोग तुमसे अदावत नहीं रखते, बल्कि इसलिए कि अब तुम्हें दूसरों की दुश्मनी से खौफ नहीं लगता है। अब तुम्हें अपने खुदा की जात पर इतना यकीन है कि वो तुम्हें हर मुसीबत से बचा लेगा। तुम्हारा डर तुम्हारे दुश्मन बढ़ाता चला जाता है और तुम्हारी हिम्मत तुम्हारे दुश्मनों को घटाती चली जाती है। याद रखना जिसके अंदर हिम्मत होगी उसके दुश्मन घटते चले जाएंगे। जिसके अंदर खौफ होगा उसके दुश्मन बढ़ते चले जाएंगे।

भारत, पाकिस्तान और इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या है कि एक लंबे समय से मुसलमानों को कुछ चंद मुसलमानों ने खौफजदा करके रखा है। डरा करके रखा है। जैसे उनके ऊपर बड़ी कयामत लगी हुई है। सारी दुनिया उनके खिलाफ नेजे (भाले) लेकर खड़ी है। तुम किसी कर्बला में नहीं खड़े हो- इसको अपने दिमाग में रख लेना। तुम एक अच्छी दुनिया में रहते हो। यकीनन ये दुनिया बहुत खराब है लेकिन वो फिर सिर्फ तुम्हारे लिए खराब नहीं है, वो फिर मेरे लिए भी खराब है। वो हर किसी के लिए खराब है। वायु प्रदूषण तुम्हारे लिए ही नहीं है मेरे लिए भी है। वातावरण में गर्मी बढ़ रही है तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी। महंगाई तुम्हारे लिए भी है और मेरे लिए भी। बीमारी तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी। दुनिया में जो कुछ खराब है वो सब हम में बंटा हुआ है। लेकिन साथ ही साथ इसके दुनिया में जो कुछ अच्छा है वो भी अभी हम में, तुम में बटा हुआ है। ये खत्म नहीं हुआ है भारत के अंदर।

यदि यहां का बहुसंख्यक औरंगजेब से नफरत करता है तो ये नहीं सोचो कि आज नफरत करता है। हम लोग उस समय स्कूल में पढ़ते थे। यहां मौजूद मुमताज भी स्कूल में पढ़ा हुआ है, बहार भाई भी स्कूल में पढ़े हुए हैं। हम लोग के स्कूल में भी औरंगजेब खराब ही बादशाह था। इतिहास में कभी अच्छा बादशाह नहीं बताया गया था। लेकिन उस जमाने में भी हम मोहम्मद रफी की तस्वीर अपने घर में लगाते थे। दिलीप कुमार की लगाते थे। मिर्जा गालिब के ऊपर ऐसे ही हिंदुस्तान फिदा था। मीर तकी मीर को खुदा-ए सुखन यही हिंदुस्तान कह रहा था। अमीर खुसरो के गाने गा करके यही हिंदुस्तान बड़ा हो रहा था। यह मत समझो कि इस देश का हिंदू मुसलमानों से नफरत करता है। लेकिन हां, यकीन करो कि हम में से जितने भी लोग हैं उन सबको जब एक समुदाय बनाकर, एक कम्युनिटी बनाकर रख दिया जाता है, तब हम अपने इतिहास की तरफ देखने लगते हैं। और, इतिहास में दंश होते हैं- चोट होती है- तकलीफें होती है। फिर हम औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर निकालने लगते हैं, ये एक समस्या होती है।

औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर ना निकले इसके लिए एक काम मुमताज को भी करना पड़ता है कि उसे अपना किरदार औरंगजेब के किरदार से जोड़कर नहीं दिखाना होता है। फिर उसे अपना किरदार किसी गालिब से, किसी मीर से, किसी खुसरो से… या फिर और ऊंचा उठ सके तो अपने पैगंबर से जोड़ के दिखाना पड़ता है। जिनके पास सबके लिए मोहब्बत थी। जिन्होंने यह कहा कि मेरा खुदा रहमतुल आलमीन है, मेरा खुदा पूरी दुनिया के लिए रहमत है। यह जबानी जमा खर्च नहीं है कि तुमने मुंह से बोल दिया? क्या तुम इस पर यकीन करते हो कि तुम्हारा खुदा पूरी दुनिया पर रहमत करता है… और यदि ऐसा करता है तो उसकी रहमत से ही तो सब होंगे- वो भी जो उसमें यकीन नहीं करते हैं।

एक पुरानी सूफियों की कहानी है। मूसा ने अल्लाह की तरफ देखा और कहा कोई हुक्म दो, जो मैं पूरा करता रहूं, बार-बार पूरा करता रहूं। अल्लाह ने कहा कुछ नहीं लोगों को खाना खिला देना। इतना किया करो वो सब जो मेरे बंदे हैं उनको तू खाना खिलाया कर। मूसा ने कहा ठीक है। मैं सबको बुलाऊंगा और खाना खिलाऊंगा। वह सबको बुलाते खाने के लिए। मूसा यहूदी थे। वो लोगों को बुलाते, प्रार्थना करने को कहते और फिर सबको भोजन देते। एक दिन एक बूढ़ा आया। उसने आकर के कहा- खाना दो। मूसा ने कहा कि ठीक है। आओ प्रार्थना करो और खाना खाओ। उसने कहा- नहीं, मैं तुम्हारे ईश्वर में यकीन नहीं करता हूं। मेरा यकीन तेरे खुदा में नहीं है। इस पर मूसा ने कहा कि तब तो तुम काफिर हो। तुम्हें कैसे मैं खाना दे दूं। मूसा ने उसे लौटा दिया। जब मूसा फिर गए तूर पर अल्लाह से बात करने के लिए। मूसा कलीमुल्लाह थे, कलाम करते थे। अल्लाह से बात करने के लिए गए। मूसा ने सवाल पूछा- अल्लाह ने कोई जवाब नहीं दिया। सिलसिला चलता रहा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। जब एक हफ्ते तक कोई जवाब ना आया तो मूसा को लगा कि लगता है मुझसे कोई गुनाह हो गया है। अब उन्होंने रोना शुरू किया। पुकारना शुरू किया। मेरी गलती माफ करो, मुझे बताओ क्या हुआ? तो फिर आवाज आई कि मैंने तुझे कहा था सबको खाना खिलाने के लिए, तूने नहीं खिलाया। तो उसने कहा कि मैंने तो सबको खिलाया। बस एक को नहीं खिलाया था जो तुझ में यकीन नहीं करता है। अल्लाह ने मूसा से कहा कि क्या मुझे नहीं पता कि वो मुझ में यकीन नहीं करता, लेकिन मैं तो उसे बरसों से खिला रहा हूँ। तूने ये ठेकेदारी कैसे ले ली। सवाल ये है।

दुनिया के सारे धर्म दरअसल इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने सबको अपनी तरफ बुलाया- सबको छांव देने की कोशिश की- सबको आश्रय देने की कोशिश की। और यही किरदार अगर किसी हिंदू में, किसी मुसलमान में, किसी सिख में या किसी ईसाई में पैदा हो जाता है तो लोग उसकी तरफ घूमते हैं। लोग उसकी इज्जत करते हैं। और फिर उसके सदके वो उसके दीन की, उसके मज़हब की भी इज़्ज़त करने लगते हैं। फिर यह रुकने वाला सिलसिला नहीं रह जाता है!!
-ओमा अक्


राहे-हक़ में हो गए क़ुर्बान जो
उनको सलाम
आसमाँ पर सर उठाए ताज़िया देता पयाम

वो पयम्बर के नवासे, वो बहत्तर जाँ निसार
वो अनलहक़ की सदाओं से महकता रेगज़ार 

अर-रिहाया से अली असग़र तलक कितने शहीद
अर्श से माहे मुहर्रम में दिया करते हैं दीद 

या मोहम्मद कह रहे थे प्यास से तड़पे हलक़ 
जीत ना पाएंगे बातिल जीतता है सिर्फ़ हक़ 

हाय ये ख़ुदग़र्ज़ दुनिया, हाय ये ज़ुल्मो सितम
कर्बला ही कर्बला है ज़िन्दग़ी हर एक गाम

राहे हक़ में हो गए क़ुर्बान जो उनको सलाम
आसमाँ पर सर उठाए, ताज़िया देता पयाम...!!
-ओमा अक्
(मुहर्रम के मौक़े पर कर्बला की याद में)


इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जनाबे मुहम्मद मोहम्मद हनफ़िया को वसीयत
जब इमाम हुसैन ने मदीने से मक्के की तरफ़ चलने का इरादा किया तो आपने एक वसीयत लिखी और अपनी अंगूठी से उस पर मोहर लगाई, फिर उसको लपेटा और अपने भाई मोहम्मद बिन हनफिया को दिया और उसके बाद आपने उनसे विदा लिया और तीन शाबान 60 हिजरी को अपने अहलेबैत के साथ मक्के की तरफ़ चल पड़े। उस वसीयत में आपने लिखा था-

بِسْمِ اللَهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ. هَذَا مَا أَوْصَي بِهِ الْحُسَيْنُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ إلَي أَخِيهِ مُحَمَّدٍ الْمَعْرُوفِ بِابْنِ الْحَنَفِيَّه:

यह है वह वसीयत जिसे हुसैन इब्ने अली अपने भाई मोहम्मद जो कि इब्ने हनफ़िया के नाम से प्रसिद्ध हैं के नाम कर रह हैं.

إنَّ الْحُسَيْنَ بْنَ عَلِيٍّ يَشْهَدُ أَنْ لاَ إلَهَ إلاَّ اللَهُ، وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ. وَأَنَّ مُحَمَّدًا صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، جَآءَ بِالْحَقِّ مِنْ عِنْدِ الْحَقِّ. وَأَنَّ الْجَنَّه وَالنَّارَ حَقٌّ. وَأَنَّ السَّاعَه ءَاتِيَه لاَ رَيْبَ فِيهَا. وَأَنَّ اللَهَ يَبْعَثُ مَنْ فِي الْقُبُورِ.

निःसंदेह हुसैन बिन अली गवादी देता है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई और ख़ुदा नहीं है वह अकेला है जिसका कोई शरीक नहीं है, और निःसंदेह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके बंदे और रसूल हैं, जो सच के साथ हक़  की तरफ़ से आए हैं। और निःसंदेह स्वर्ग और नर्क हक़ है, और क़यामत आने वाली है और उसमें कोई संदेह नहीं है, और यह कि ख़ुदा उन सभी को जो क़ब्रों में हैं दोबारा उठाएगा।

إنِّي لَمْ أَخْرُجْ أَشِرًا وَلاَبَطِرًا وَلاَمُفْسِدًا وَلاَظَالِمًا وَإنَّمَا خَرَجْتُ لِطَلَبِ الاْءصْلاَحِ فِي أُمَّه جَدِّي مُحَمَّدٍ صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ؛ أُرِيدُ أَنْ ءَامُرَ بِالْمَعْرُوفِ وَأَنْهَي عَنِ الْمُنْكَرِ، وَأَسِيرَ بِسِيرَه جَدِّي وَسِيرَه أَبِي عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ عليه السلام.

मैं तफ़रीह और खिलवाड़ के लिये नहीं निकला हूँ, और न अत्याचार और न फ़साद एवं ख़राबी और न ज़ुल्म व सितम के लिये! बल्कि मैं अपने नाना हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत के सुधार एवं इस्लाह के लिये निकला हूँ, मैं अम्र बिल मारूफ़ करना चाहता हूँ, और न ही अनिल मुनकर करना चाहता हूँ (अच्छाई की तरफ़ बुलाना और बुराई से रोकना चाहता हूँ) और मैं अपने नाना और अपने पिता अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की सुन्नत और सीरत पर चलना चाहता हूँ,

فَمَنْ قَبِلَنِي بِقَبُولِ الْحَقِّ فَاللَهُ أَوْلَي بِالْحَقِّ، وَمَنْ رَدَّ عَلَيَّ هَذَا أَصْبِرُ حَتَّي يَقْضِيَ اللَهُ بَيْنِي وَبَيْنَ الْقَوْمِ بِالْحَقِّ؛ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ

तो जो भी मुझे स्वीकार कर ले और हक़ को क़ुबूल कर ले तो ख़ुदा हक़ के लिये अधिक योग्य है, और जो भी इस कार्य में मेरा साथ न हे और स्वीकार न करे तो मैं सब्र और धैर्य का दामन नहीं छोड़ूंगा, यहां तक कि अल्लाह मेरे और इस गुट के बीच सच्चा फैसला करे, और वही है जो फ़ैसला करने वालों के बीच बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।

وَ هَذِهِ وَصِيَّتِي إلَيْكَ يَا أَخِي ؛ وَمَا تَوْفِيقِي إلاَّ بِاللَهِ، عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإلَيْهِ أُنِيبُ. وَالسَّلاَمُ عَلَيْكَ وَعَلَي مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَي . وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّه إلاَّ بِاللَهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ. 1

और यह मेरी वसीयत है तुम को मेरे भाई! और कोई तौफ़ीक़ नहीं है मेरे लिये मगर अल्लाह की तरफ़ से, मैंने उसपर भरोसा किया और उसी की तरफ़ वापस पलटूँगा, सलाम हो तुम पर और हर उस पर जो हिदायत की पैरवी करे, और कोई शक्ति और ताक़त नहीं है सिवाय महान और अज़ीम ख़ुदा के।


बहन सैय्यदा ज़ैनब की दुआएँ लेकर जब इमाम घोड़े पर सवार हुए, लगाम कसी तो घोड़ा आगे नहीं बढ़ा, फिर कसकर लगाम खींची तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. जोश में फिर से लगाम खींची, तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. नीचे देखा तो आपकी बेटी सैय्यदा सकीना घोड़े के पांव लपेटे खड़ी हैं. 

रोते हुए घोड़े से कह रहीं हैं- घोड़े मेरे बाबा को मत ले जाना. वो रोज़ मुझे सीने से लपेटकर सुलाते हैं, जो गया है वो वापस नहीं आया. बाबा वापस नहीं आए, तो मैं किसके सीने से लिपटकर सोऊंगी?

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सैय्यदा को गोद में उठाकर फ़रमाया- बेटा जितने दिन सीने से लिपटकर सोने थे, वो बीत चुके. अब मैं तुम्हें फूफी के सुपुर्द कर रहा हूं. इमाम ने सकीना को सैय्यदा ज़ैनब के सुपुर्द किया और घोड़े पर सवार होकर यज़ीदियों की तरफ़ गए. सैय्यदा सकीना दहाड़ मारकर रोने लगीं.
इमाम ने आसमान की जानिब देखकर मालिक से पूछा- ऐ मालिक तू तो राज़ी है न ? 

ग़ैब से निदा आई- ऐ रूह-ए-हुसैन ! तू कामयाब हो गया, तुझपे इंसानियत को फ़ख़्र है, विलायत को फ़ख़्र है, अली को फ़ख़्र है, फ़ातिमा को फ़ख़्र है, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़ख़्र है तू बता तू राज़ी है न..
-ज़ैद पठान 



हजरत मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु का ताल्लुक़ बनू असद क़बीले से था. आपने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत पाई थी और कई जंगों में हिस्सा लिया था.

जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला पहुंचे, तब मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु उनके साथ थे. आपकी उम्र 80 साल से ज़्यादा थी. सफ़ेद दाढ़ी होने के बावजूद जंग के मैदान में सबसे आगे थे. आशूरा के दिन मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु ने यज़ीदी फ़ौज के ख़िलाफ़ बहुत बहादुरी से जंग लड़ी. रिवायतों के मुताबिक़ आपने कर्बला में पहली क़तार में होकर दुश्मनों का मुक़ाबला किया. दुश्मन की फ़ौज उनके दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकी. जब आप ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिरे, तो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हबीब इब्न मज़ाहिर रज़ियल्लाहु अन्हु आपके पास पहुंचे. हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया- ऐ मुस्लिम अल्लाह तुम पर रहम करे और इसी हालत में आपने शहादत पाई.

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 

 



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
इंसान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बचपन ही होता है, क्योंकि बचपन हर फ़िक्र से आज़ाद और बेगाना होता है। बचपन की यादें हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसे नक़्श हो जाती हैं कि उन्हें वक़्त की धूल भी मिटा नहीं पाती।
 
और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की हो, तो फिर कहना ही क्या। दूसरे बच्चों की तरह हमें भी सालभर गर्मियों की छुट्टी का इंतज़ार रहता था, क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में हमें अपनी नानी जान के घर जाने का मौक़ा मिलता था। हम नानी जान के घर जाते थे। इससे पहले बहुत-सी तैयारियां की जाती थीं। उस वक़्त बैग्स का चलन ज़्यादा नहीं था। इसलिए सन्दूक़ में कपड़े रखे जाते थे। प्लास्टिक की टोकरी में खाने-पीने का सामान होता था यानी रास्ते के लिए पूड़ी-सब्ज़ी और पानी की बोतलें होती थीं। सामान क़ुली उठाता था। उस वक़्त रेलगाड़ियों में आज जैसी भीड़-भाड़ नहीं होती थी। रेल में हमें बहुत अच्छा लगता था। खिड़की की सीट हमें ही मिलती थी। खिड़की से भागते हुए दरख़्तों को देखना कितना भला लगता था। ख़ैर, आज भी उतना ही भला लगता है। रस्ते में गंगा आती, तो हम उसमें सिक्के डालते थे। हापुड़ के पापड़ और गजरौले के पेड़े खाते। सफ़र में खाने का भी अपना ही लुत्फ़ है।         
  
हमारे नाना के बाग़ थे, जिनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और शरीफ़े के अलावा और भी बहुत से फलों के दरख़्त थे। हम अपने भाइयों और मामाज़ाद बहनों के साथ दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़ते और खाते थे। दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़कर खाने के लुत्फ़ को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी फलों के दरख़्तों को देखकर बचपन में उन पर चढ़ना याद आता है।  

बाग़ के पास एक बड़ा तालाब भी था। एक बार वहां खेलते हुए तालाब में गिर भी गए थे। अल्लाह का शुक्र है कि हमें पानी में से निकाल लिया गया। वहां का लज़ीज़ खाना, रबड़ी, छोले-समौसे, नारियल के बुरादे की कुल्फ़ी और बरगद के पत्तों पर रखी मलाई बर्फ़ बहुत याद आती है।      

जिस साल नानी के घर नहीं जाते, उस साल अपने ही घर में ख़ूब मज़े करते। हमारा घर बहुत बड़ा था। उसका आंगन भी बहुत बड़ा था। घर में बग़ीचा था। बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और गूलर के कई दरख़्त थे। गर्मियों की छुट्टियों में हम ख़ूब मस्ती करते, शरारतें करते, धमा चौकड़ी करते। दरख़्तों पर चढ़ते और फल तोड़ते। दादी जान कहती थीं कि जामुन और गूलर के दरख़्त पर नहीं चढ़ना चाहिए, क्योंकि इसकी लकड़ी कमज़ोर होती है। हमारे घर के पास एक बड़ा मैदान था। उस मैदान में बहुत से दरख़्त थे। वहां पीपल, बरगद, नीम, शीशम, करंद और खजूर आदि के भी बहुत से दरख़्त थे। शीशम की डालों पर झूला डालकर भी खूब झूलते थे।
  
हमारे घर में माशा अल्लाह फुलवारी भी बहुत थी। इनमें बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा जैसे बहुत से फूलों के पौधे व बेलें थीं। हमारा घर ही नहीं, बल्कि आसपास का इलाक़ा भी इन फूलों की ख़ुशबू से महकता रहता था। अम्मी को मोगरा के फूल पहनने का बहुत शौक़ था। वे चाँदी के तार की बालियों में बेला के फूलों को पिरोकर कानों में पहना करती थीं और बालों में बेला के गजरे भी लगाती थीं। हमारी दादी जान भी कानों में फूल पहना करती थीं। वे मेज़ पर रखे पंखों पर फूलों के गजरे डाल देतीं, जिससे सारा घर-आँगन महक उठता था। हमारे घर से बहुत से लोग फूल ले जाते थे और फिर उनके गजरे व हार बनाते थे। घर के पास एक मन्दिर था। बहुत से लोग मन्दिर में देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए फूल लेकर जाते थे।   
  
हमें लू की वजह से गर्मियों की भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए हम घर के भीतर ही रहते और दोपहर ढलने का इंतज़ार करते थे। कई बार हम घरवालों की नज़र से बचकर बाहर खेलने चले जाते थे। आँगन में तख़्त बिछे होते थे। उन पर सफ़ेद चादरें बिछी होतीं और गाव तकिये क़रीने से लगे हुए होते थे। शाम को घर के सब लोग इन्हीं पर बैठते थे। शाम को दादी तरह-तरह के पकौड़े बनाती थीं। रूह अफ़ज़ा शर्बत भी बनता था। उसमें बहुत-सी बर्फ़ डाली जाती थी।    

गर्मियों में हम छत पर सोया करते थे। शाम को छत की साफ़-सफ़ाई की जाती। फिर पानी छिड़का जाता, ताकि छत ठंडी हो जाए। छत पर चटाइयां बिछाई जातीं। फिर उन पर दरियां बिछाई जातीं। दरियों पर रंग-बिरंगी कढ़ाई वाली चादरें बिछाई जातीं और तकिये रखे जाते। क़रीब में ही पानी से भरी मिट्टी की सुराहियां रखी जातीं, गिलास रखे जाते। हम बच्चे अपनी-अपनी छोटी सुराहियां अपने सिरहाने रख लिया करते थे, ताकि रात में प्यास लगे तो अपनी ही सुराही से पानी पी लें। हमें दादी-नानी ने ही नहीं, बल्कि पापा ने भी बचपन में कहानियां सुनाई हैं।   

हमारे घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। ननिहाल और ददिहाल में सब लोग पढ़े-लिखे थे। नाना जान और दादा जान दोनों ही दानिशमंद थे। हमारी अम्मी को भी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक़ था। वे शायरा थीं और बहुत शानदार लिखती थीं।

हमारे घर किताबों की एक अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी थी। उनमें अरबी, उर्दू, इंग्लिश और हिन्दी की किताबों की भरमार थी। आज भी यही हाल है। बरसों पहले इनमें पंजाबी की किताबें भी शामिल हो गईं। अम्मी की देखा-देखी हमें भी किताबों से मुहब्बत हो गई। बचपन में ही हमने लिखना शुरू कर दिया था। हमें डायरी लिखने का भी शौक़ था, जो आज भी है। डायरी में हम अपनी बातों के अलावा अपने पसंदीदा शायरों की ग़ज़लें, गीत और नज़्में लिखा करते थे। आज भी लिखते हैं। हमारी डायरी में शायरा इशरत आफ़रीन की एक ग़ज़ल दर्ज है- 
यूं ही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें
नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें

सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छाँव का
लिपे पुते कच्चे आंगन में लोट लगाती दोपहरें
जीवन-डोर के पीछे हैरां भागती टोली बच्चों की
गलियों-गलियों नंगे पाँव धूल उड़ाती दोपहरें

सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नटखट दिन
दबे-दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दोपहरें

कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हंसते दिन
ख़ुद से लड़कर गौरैया-सी शोर मचाती दोपहरें

वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर
गुड़ियों के लब सी कर उनका ब्याह रचाती दोपहरें

खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं
मंढे हुए पीले काग़ज़ से छनकर आती दोपहरें

नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद
घेरा डाले छोटी-छोटी हाथ बटाती दोपहरें

फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढ़े दिन
पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दोपहरें

पानी की तक़सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर
और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दोपहरें

पुरवाई से लड़ते कितने वर्क़ पुरानी यादों के
सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दोपहरें

दुखती आंखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन
बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दोपहरें

ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में
चूड़ी की दुकानों से वो हमें बुलाती दोपहरें

सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं
ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दोपहरें

ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं
किस जानिब से आ निकली हैं ये गहनाती दोपहरें          

वाक़ई, बचपन से वाबस्ता यादें बहुत दिलकश होती हैं। बशीर बद्र साहब ने क्या ख़ूब कहा है- 
उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख़ हवा में 
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते...  


30 जून है, जब लखनऊ ने बिरतानियों को सबसे पहली शिकस्त दी थी। वह आज की ही सुबह थी जब एक तरफ फैज़ाबाद से चले मौलवी अहमद उल्ला शाह थे, सूबेदार बरकत अहमद और सामने ईस्ट इंडिया कम्पनी हेनरी लॉरेंस के साथ जंग कर रही थी।
लखनऊ के इस्माइलगंज, चिनहट में आज की सुबह यह लड़ाई शुरू हुई।

मौलवी अहमद उल्ला शाह जो बेहतरीन नेतृत्व कर्ता थे। उनकी ज़बरदस्त रणनीति और बरकत अहमद की सेना की सूझबूझ और साथ थे अवध के किसान और ज़मींदार,जी तोड़कर लड़े और लखनऊ के सबसे पहले किलेबंदी को चिनहट में बिखरा कर रख दिया।

हेनरी लॉरेंस मुट्ठी भर बचे सैनिक लेकर भागा सीधे, रेज़ीडेंसी और वहीं से शुरू हुई लखनऊ में अंग्रेजों की कैद। रेज़ीडेंसी में वह बंधक बना गए। यह अवध के किसानों की हिम्मत, जमींदारों की जद्दोजहद और आम आवाम का पहला जवाब था, जो बिरतानियों को लंदन तक महसूस हुआ कि वह चिनहट, लखनऊ में हार गए।
हमें यह तारीख़ इसलिए नही याद रखनी चाहिए कि हम इन तारीखों को केवल मनाएं,बल्कि सबक़ लें। जब कुशल, निडर, सच्चा नेतृत्व हो और आम इंसान साथ आ जाए, तो हर बड़ी से बड़ी, प्रचंड ताक़त की अहंकार की सत्ता हारती है। इस सबक़ को याद रखना चाहिए। जब तक नेतृत्व और आम अवाम में मुहब्बत का,एक दूसरे की तक़लीफ़ का रिश्ता है, कोई भला हमें कैसे हरा लेगा।

चिनहट में सब जीतोड़ लड़े, अपनी माटी के लिए लड़े, अपनी ज़िंदगी को आर या पार दांव पर लगाकर लड़े, हिन्दू और मुसलमान साथ लड़े, नतीजा यह था कि जिस लखनऊ की सुबह इस जंग से हुई थी, उसकी शाम में विजय का सेहरा अवाम के सर पर था।

आज 30 जून है। आज मौलवी अहमद उल्ला शाह, सूबेदार बरकत अहमद रिसालदार, नाना साहब, तात्या टोपे,मंगल पांडे, बेगम हज़रत महल,बहादुर शाह ज़फ़र, रानी लक्ष्मीबाई और बहुत से वीरों, हिन्दू मुसलमान एकता के जज़्बे से लबरेज़ अवाम,किसान, ज़मींदार और उन सभी पुरखो को याद करने का दिन है, जिन्होंने अपनी मेहनत,जज़्बे, हिम्मत और सूझबूझ से वह बीज डाले, जो हमारा गर्व ही हैं और रास्ता भी हैं।

30 जून, इस्माइल गंज, चिनहट में 1857 कई पहली विजय को याद करते हुए यह याद रखिये, हमारी एकता ही हर उसका जवाब है, जो हमारी तरफ बुरी नज़र से देखता है। हिन्दू मुसलमान की एकता से बिरतानी भी घबराते थे और हारते थे। इसी से उनके समर्थक आजतक घबराते और हारते हैं।
यह हमेशा रहेगा,जो मुल्क की भलाई चाहेगा,वह इस एकता पर ज़ोर देगा और जो मुल्क पर कब्ज़ा करना चाहेगा, वह इसे तोड़ेगा।
30 जून मुबारक!



प्रो० रामवचन राय
मध्यकाल के निर्गुणपंथी संत कबीर दास काशी में पैदा हुए, वहाँ रहे। बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के मगहर में उनका अंतिम समय बीता। इस बीच बिहार के अनेक क्षेत्रों में उनका आना-जाना होता रहा। बिहार आने का एक दिलचस्प प्रसंग कबीर साहेब के साथ जुड़ा बताया जाता है। काशी में उनके सत्संग में अनेक जगहों से लोग आते थे। इन भक्तों में कुछ लोग सेवादार बनकर आश्रम में ही रहने लगे। इन्हीं लोगों में एक भक्त बिहार से सीवान के धनौती गाँव के थे। एक दिन सेवादार भक्तों के बीच किसी बात पर कहा-सुनी हुई। भोजन से पहले सब एक साथ मिल कर 'बीजक' (कबीर-वाणी) का पाठ करते थे। उस दिन बीजक-पाठ और पदों के गायन के बाद 'बीजक' लाल-कपड़े में लपेट कर यथा-स्थान रख दिया गया। सुबह लोग उठे तो देखा- 'बीजक' वहाँ नहीं था। खोज शुरू हुई। सेवादारों में एक शख्स वहाँ नहीं था। उसका नाम भगवान दास था जो सीवान के धनौती गाँव का रहने वाला था। कबीर साहेब तक‌ यह बात पहुंची। शक हुआ कि सेवादारों के बीच झगड़े के बाद वह नाराज चल रहा था। रात में सबके सोने के बाद 'बीजक' लेकर वही भाग गया।

परेशानी यह थी कि 'बीजक' की वह पहली हस्तलिखित प्रति थी, जिसका पाठ और गायन सुबह-शाम भक्तों के बीच होता था। अतः कुछ शिष्यों के साथ कबीर साहेब भगवान दास की खोज में उसके गाँव धनौती पहुंचे थे। लेकिन इनके पहुंचने की खबर भगवान दास को मिल गयी और वह गाँव से भाग गये। कबीर ने कहा- चलो यहाँ से। वह भगवान दास नहीं भग्गू दास है। यह नाम कबीर-साहित्य में जहाँ-तहां मिलता है। 90 के दशक में धनौती मठ की जमीनों पर कब्जा करने का विवाद शुरू हुआ तो जे.पी. आंदोलन में काम करने वाले 77 के चुनाव में मीरगंज के विधायक बने हमलोगों के मित्र भवेश चंद्र प्रसाद ने एक प्रसंग में बताया था कि धनौती का कबीर मठ उनके परिवार का है। उनके पूर्वजों ने बनाया था। किंतु भगवान दास के नाम और कबीर दास से जुड़े प्रसंग का पता उन्हें नहीं था। मैंने जब 'बीजक' प्रसंग की चर्चा की और भग्गू दास का प्रसंग सुनाया तो भवेश जी आह्लादित हो उठे। भगवान दास उनके लकड़दादा थे जो काशी में कबीर के यहां रहे। धनौती का कबीर मठ उस यात्रा की निशानी है, जो बाद में भक्तों और अनुयायियों द्वारा स्थापित हुआ। बिहार में ऐसे कई मठ स्थापित हुए जहां स्वयं कबीर सत्संग करने गए थे अथवा अपनी यात्राओं के दौरान गये थे। सीवान के धनौती के अलावा पटना के फतुहा समस्तीपुर के रोसड़ा के साथ मधुबनी, सहरसा और सुपौल का भी नाम लिया जाता है। यही कारण है कि आज भी उत्तर बिहार में कबीर पंथ के अनुयायियों की संख्या ज्यादा है। खासकर पिछड़े, अतिपिछड़े और दलित समाज में कबीर की सबसे अधिक पैठ है। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर भारत में सामाजिक परिवर्तन लाने में कबीर की क्रांतिकारी भूमिका है।

वस्तुतः कबीर एक साथ बहुत कुछ हैं। वे संत हैं, कवि हैं, समाज सुधारक हैं, क्रांतिकारी हैं, गृहस्थ और कारीगर (बुनकर) हैं। कपड़ा बुनना उनका पेशा था। इसलिए पेट की चिंता उन्हें नहीं थी, दूसरे संतों की तरह। उनका स्वावलंबन स्वाभिमान से आगे अक्खड़ता की सीमा तक पहुंच गया था। इसलिए वे सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक पाखंडों और सत्ता के दमन को चुनौती देते थे। पंडितो, पुरोहितों, मौलानाओं और तत्कालीन शासक इब्राहिम लोदी के समक्ष भी कभी नहीं झुके। संभवतः कबीर की इस अक्खड़ता और क्रांतिकारी सोच ने समाज के प्रभुवर्ग को विचलित किया तथा उन्होंने कबीर की उपेक्षा की। इसलिए बहुत दिनों तक कबीर मठों में बंद रहे। उनके भक्त वहीं बैठकर उनके पद गाते थे और संगत-पंगत करते थे। वहीं से लोकजीवन में उनका प्रवेश हुआ। धीरे-धीरे उनकी ख्याति देश देशांतर में फैलती गई। प्रबुद्ध समाज का ध्यान कबीर की ओर गया। लेकिन हिंदी के अधिकांश आचार्यों का द्वार उनके लिए वर्षों तक बंद था। हिंदी के शीर्ष आलोचक पं. रामचंद्र शुक्ल ने अपने आलोचना-ग्रंथ 'त्रिवेणी' में कबीर को स्थान नहीं दिया। उसमें सूरदास, तुलसीदास और जायसी थे, लेकिन कबीर शुक्ल जी की गंभीर उपेक्षा के शिकार हुए। नतीजा हुआ कि कबीर के लिए विश्वविद्यालय का दरवाजा बहुत बाद में खुला। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह दरवाजा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने खोला - कबीर पुस्तक लिखकर। लेकिन मैं इससे असमत हूं। कबीर को विश्वविद्यालय के छात्रों, अध्यापकों और अन्य प्रबुद्ध हिंदी प्रेमियों में ले जाने का प्रयास द्विवेदी जी ने जरूर किया, लेकिन यह पहला प्रयास नहीं था। हिंदी वालों को यह श्रेय नहीं दिया जा सकता। 
 
मेरा मानना है कि कबीर को खोजने, पढ़ने, विश्लेषण करने और प्रकाशित कर प्रबुद्ध वर्ग तक पहुंचाने का काम पहली बार एक बांग्ला-भाषी विद्वान ने किया। वे थे आचार्य क्षितिमोहन सेन, जो शांतिनिकेतन में भारतीय संस्कृति और दर्शन के अध्यापक थे। वे आज के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन के नाना थे। कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर की प्रेरणा से उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लगभग दो सौ मठों के कबीर पंथी साधुओं से मुलाकात की और वहां से कबीर संबंधी पुस्तकों का संग्रह किया। फिर उनके पदों का परस्पर मिलान कर बांग्ला में चार खंडों में कबीर वाणी का प्रकाशन कराया जो कबीर का बोलपुर संस्करण कहा जाता है। इसका पहला खंड अक्टूबर 1910 ई. में, दूसरा खंड जनवरी 1911 ई. में, तीसरा खंड मई 1911 ई. में और चौथा खंड अगस्त1911 ई. में प्रकाशित हुआ। इस तरह आचार्य क्षितिमोहन सेन ने कुल चार खंडों में कबीर की उपलब्ध रचनाओं का प्रकाशन कराया। इस प्रकार आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रयास से कबीर बौद्धिक समाज के सामने आए। इससे पहले वे मठों के माध्यम से लोक जीवन में जन-श्रृति बन कर प्रचलित थे।

आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा संकलित पदों से ही एक सौ पदों को चुनकर रवींद्र नाथ टैगोर ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ' हंड्रेड पोयम्स ऑफ़ कबीर ' नामक पुस्तक छपावाई। तब तक उन्हें 'गीतांजलि' पर नोबेल पुरस्कार (1913 ई.) मिल चुका था। इस बार  'गीतांजलि' के बहाने फिर एक बार कबीर चर्चा में आ गए। दरअसल गीतांजलि की भूमिका अंग्रेजी के प्रख्यात कवि डब्लू.बी.येट्स. ने लिखी थी। कहते हैं कि इसके अंग्रेजी अनुवाद में उनका योगदान भी था। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि एजरा पाउंड ने पत्र लिख कर डब्लू.बी.येट्स से पूछा कि इस पुस्तक में क्या है कि जिस पर फिदा होकर तुमने ऐसी जबरदस्त भूमिका लिखी? येट्स का जवाब था कि गीतांजलि में मुझे नव-रहस्यवाद(Neo-Mysticism) की झलक मिली जो आज की दुनिया के लिए एक संदेश है। फिर एजरा पाउंड ने दूसरा पत्र लिखा - तब तुमने कबीर को नहीं पढ़ा है। कबीर तो पहले ही यह सब कुछ कह गए हैं। अब मैं कबीर पर पुस्तक लिखने जा रहा हूं। अंग्रेजी के दो महान कवियों के बीच जब गीतांजलि को लेकर पत्राचार हो रहा था, एजरा पाउंड इटली की जेल में थे। फिर मानसिक रोग के इलाज के लिए वाशिंगटन लाये गए और कबीर पर लिखने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ।

शांतिनिकेतन में आचार्य क्षितिमोहन सेन के समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी वहां हिंदी पढ़ाते थे। उन्होंने आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा कबीर मठों से संकलित पदों के आधार पर ही ' कबीर ' नामक पुस्तक लिखी, जिससे हिंदी पाठकों के बीच कबीर की चर्चा शुरू हुई और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनका प्रवेश हुआ। किंतु कबीर आज भी बहुतों के लिए प्रश्न बने हुए हैं। उन्हीं के शब्दों में -
हद-हद करते सब गए, बेहद गया न कोय, 
बेहद के मैदान में, रहा कबीरा सोय। 



वसंत-रजब ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
दो दोस्तों के शहादत की कहानी
1 जुलाई को वसंत-रजब का शहादत दिवस है। यह कहना उचित होगा कि इतिहास मे यह एकमात्र ऐसी घटना है जहाँ दो मित्रों ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वसंत रजब की मृत्यु 1946 में हुई थी। लेकिन उससे पहले, गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1931 में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यह हमारी स्वतंत्रता की एक निराली मिसाल है।

महात्मा गांधी ने अपने नेतृत्व में दास प्रथा के विरुद्ध संघर्ष को एक रचनात्मक दिशा दी। उन्होंने समाज को 18 रचनात्मक कार्यक्रम दिए। स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष करने वाला प्रत्येक कार्यकर्ता इन 18 सूत्री कार्यक्रमों के प्रति निष्ठावान था। इनमें से एक महत्वपूर्ण बिंदु कौमी एकता था, अर्थात् हिंदू-मुस्लिम एकता। इस स्वतंत्रता संग्राम से निकले योद्धाओं ने वीरतापूर्वक संघर्ष करते हुए समय आने पर हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना स्वयं को बलिदान कर दिया। इनमें से एक महत्वपूर्ण नाम वसंत और रजब नामक दो मित्रों का है!

यह कहानी सन् 1946 की है। गुजरात के अहमदाबाद में रथ यात्रा चल रही थी। रथ यात्रा के जमालपुर इलाके में पहुंचते ही हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव पैदा हो गया और जल्द ही दंगें भड़क उठे। दो मित्र, वसंत और राजब, ने हिंसक भीड़ को शांत करने की कोशिश की। बार-बार विनती करने के बावजूद लोग शांत नहीं हुए। तब उन्होंने कहा, "अगर तुम्हें इन्हें मारना ही है, तो पहले हमें मार डालो।" यह सुनकर हिंसक भीड़ शांत होने के बजाय और भी ज्यादा क्रोधित हो गई और उन्होंने पत्थरों, चाकुओं और कटारों से वसंत और रजब की जमकर हत्या कर दी।

अपनी जान बचाने की बजाय, उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे शहीद हो गए। वसंत हिंदू थे जबकि रजब मुसलमान थे। उनकी मृत्यु के समय वसंत 40 वर्ष के थे, जबकि रजब अली केवल 27 वर्ष के थे।

1946 हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अंधकारमय दौर था। अंग्रेजों ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग कर रही थी। कई स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम द्वेष चरम पर था। कई जगहों पर दंगे हो रहे थे। गांधीजी देश को इस कटुता से मुक्त करने का भरसक प्रयास कर रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम में उतरे कार्यकर्ता गांधीजी के संदेश के अनुसार, अपने प्राणों की परवाह किए बिना हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

वसंतराव कौन थे?
वसंतराव का पूरा नाम वसंतराव हेगिष्टे था। वे अहमदाबाद में रहते थे। पंद्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल छोड़ दिया और गुजरात विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय विद्यालय में दाखिला लिया। विश्वविद्यालय ने उनके भीतर देशभक्ति की भावना जगाई। उन्होंने गांधी जी के साथ दांडी मार्च में भाग लिया। 1930 के नमक सत्याग्रह में उन्हें कारावास की सजा हुई। वे कांग्रेस सेवा दल से जुड़े थे। उन्होंने साष्टांग नमस्कार प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता। एक बार वसंतराव और उनके मित्र गांधी जयंती मनाने के लिए घोलका गांव गए थे। वहां से लौटते समय वे एक गांव से गुजरे। एक मित्र ने कहा, चलो थोड़ी देर इस गांव में रुकते हैं, आराम करते हैं, पानी पीते हैं। बाद में उन्हें पता चला कि यह चम्हारों का गांव है। मित्र ने कहा, हम यहां पानी नहीं पिएंगे। वसंतराव ने कहा, मैं यहां पानी पीऊंगा और उनके आग्रह पर अन्य मित्रों ने भी पानी पिया। आजादी के साथ-साथ इन युवाओं के मन में जातिगत भेदभाव से परे एक समाज बनाने की इच्छा थी। जब वे व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए जेल में थे, तब अहमदाबाद में दंगे हुए। जेल से रिहा होने के बाद वसंतराव ने कहा, "इन दंगों में अहमदाबाद से एक भी कांग्रेसी की मौत न होना हमारे विरोधियों को मौका दे रहा है। मैं उस व्यक्ति की मौत चाहता हूँ जो अपने सिर पर हथौड़ा गिरते हुए भी 'मुझे मार डालो' कहता रहे।" और अंततः उनकी यही इच्छा पूरी हुई। उन्होंने एक बार एक मित्र से कहा था, मैंने अपने जीवन में व्यायाम और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी है।

रजब अली कौन थे 
रजब अली का पूरा नाम रजब अली लखानी था ! उनका जन्म सन् 1919 में हुआ था ! वे एक खोजा मुस्लिम थे। उनका जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के कराची शहर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के काठियावाड़ जिले के लिंबडी गांव से था। सन् 1934 में लखानी परिवार कराची छोड़कर अपने पैतृक गांव लिंबडी लौट आया। उस समय राजब अली की आयु मात्र सोलह वर्ष थी। सन् 1936 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और भावनगर महाविद्यालय में दाखिला लिया। छात्रावास में रहते हुए ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। वे ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के कट्टर विरोधी थे। इसीलिए उन्होंने बी.ए. की अंतिम वर्ष की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। उन्हें सन् 1938, सन् 1941 और सन् 1942 में जेल जाना पड़ा। वे धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति की पहचान करने के प्रबल विरोधी थे। वे स्वयं को 'हिंदुस्तानी' बताते थे। वसंतराव से मिलते ही उनकी गहरी दोस्ती हो गई और यह दोस्ती अंत तक, यानी मृत्यु तक कायम रही। छह फुट लंबे रजब अली का व्यक्तित्व आकर्षक था। वे साहसी स्वभाव के थे। सादगी और विनम्रता उनके स्वभाव में थी। वे विचारधारा से समाजवादी थे। रजब अली का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मुस्लिम परिवार में हिंदू नाम और हिंदू परिवार में मुस्लिम नाम होना अत्यंत आवश्यक है।

जीवन भर एक-दूसरे का सहारा रहे वसंत रजब ने मृत्यु में भी एक-दूसरे का साथ दिया। वसंतराव की बहन ने उनकी मृत्यु को याद करते हुए बताया, "घटना घटते ही हम अस्पताल गए। वहां हमने वसंतराव का शव देखा। तभी हमें लगा कि रजब अली भी यहीं होंगे, क्योंकि वे दोनों हमेशा साथ रहते थे।" और ऐसा ही हुआ। रजब अली का शव भी उसी अस्पताल में मिला।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वसंत रजब की शहादत हमारी विरासत है। आज के नफरत भरे माहौल में यह शहादत प्रेरणादायक है।
- जयंत दिवाण 



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.    

इत्र का इतिहास 
इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है. ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.        
चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है. 
क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.

इत्र से मुग़लों का रिश्ता   
मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.
इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.
 
इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है. उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.     
आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था. 

इत्र कैसे बनता है 
इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं. इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है. फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है.  

मिट्टी का इत्र
फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है. ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है. 
यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं. दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.           
 
अगरऊद
कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है. इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50 लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है. 
कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.   
कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15 हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है. 

फूलों की खेती 
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. 

देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-   
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.  
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है. 
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है. 
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है. 
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है. 
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम 
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है. 
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट  दिल्ली में स्थित है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार आवाज़ 
 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है.  ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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