प्रेरणादायी उपन्यास है रॉबिन्सन क्रूसो
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*-सरफ़राज़ ख़ान *हाल ही में अंग्रेज़ी के प्रथम उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ का
हिन्दी में भावानुवाद पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह भावानुवाद सुप्रसिद्ध
कवि, ...
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की जनाबे मुहम्मद मोहम्मद हनफ़िया को वसीयत
जब इमाम हुसैन ने मदीने से मक्के की तरफ़ चलने का इरादा किया तो आपने एक वसीयत लिखी और अपनी अंगूठी से उस पर मोहर लगाई, फिर उसको लपेटा और अपने भाई मोहम्मद बिन हनफिया को दिया और उसके बाद आपने उनसे विदा लिया और तीन शाबान 60 हिजरी को अपने अहलेबैत के साथ मक्के की तरफ़ चल पड़े। उस वसीयत में आपने लिखा था-
بِسْمِ اللَهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ. هَذَا مَا أَوْصَي بِهِ الْحُسَيْنُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ إلَي أَخِيهِ مُحَمَّدٍ الْمَعْرُوفِ بِابْنِ الْحَنَفِيَّه:
यह है वह वसीयत जिसे हुसैन इब्ने अली अपने भाई मोहम्मद जो कि इब्ने हनफ़िया के नाम से प्रसिद्ध हैं के नाम कर रह हैं.
إنَّ الْحُسَيْنَ بْنَ عَلِيٍّ يَشْهَدُ أَنْ لاَ إلَهَ إلاَّ اللَهُ، وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ. وَأَنَّ مُحَمَّدًا صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، جَآءَ بِالْحَقِّ مِنْ عِنْدِ الْحَقِّ. وَأَنَّ الْجَنَّه وَالنَّارَ حَقٌّ. وَأَنَّ السَّاعَه ءَاتِيَه لاَ رَيْبَ فِيهَا. وَأَنَّ اللَهَ يَبْعَثُ مَنْ فِي الْقُبُورِ.
निःसंदेह हुसैन बिन अली गवादी देता है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई और ख़ुदा नहीं है वह अकेला है जिसका कोई शरीक नहीं है, और निःसंदेह हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके बंदे और रसूल हैं, जो सच के साथ हक़ की तरफ़ से आए हैं। और निःसंदेह स्वर्ग और नर्क हक़ है, और क़यामत आने वाली है और उसमें कोई संदेह नहीं है, और यह कि ख़ुदा उन सभी को जो क़ब्रों में हैं दोबारा उठाएगा।
إنِّي لَمْ أَخْرُجْ أَشِرًا وَلاَبَطِرًا وَلاَمُفْسِدًا وَلاَظَالِمًا وَإنَّمَا خَرَجْتُ لِطَلَبِ الاْءصْلاَحِ فِي أُمَّه جَدِّي مُحَمَّدٍ صَلَّي اللَهُ عَلَيْهِ وَءَالِهِ؛ أُرِيدُ أَنْ ءَامُرَ بِالْمَعْرُوفِ وَأَنْهَي عَنِ الْمُنْكَرِ، وَأَسِيرَ بِسِيرَه جَدِّي وَسِيرَه أَبِي عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ عليه السلام.
मैं तफ़रीह और खिलवाड़ के लिये नहीं निकला हूँ, और न अत्याचार और न फ़साद एवं ख़राबी और न ज़ुल्म व सितम के लिये! बल्कि मैं अपने नाना हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत के सुधार एवं इस्लाह के लिये निकला हूँ, मैं अम्र बिल मारूफ़ करना चाहता हूँ, और न ही अनिल मुनकर करना चाहता हूँ (अच्छाई की तरफ़ बुलाना और बुराई से रोकना चाहता हूँ) और मैं अपने नाना और अपने पिता अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की सुन्नत और सीरत पर चलना चाहता हूँ,
فَمَنْ قَبِلَنِي بِقَبُولِ الْحَقِّ فَاللَهُ أَوْلَي بِالْحَقِّ، وَمَنْ رَدَّ عَلَيَّ هَذَا أَصْبِرُ حَتَّي يَقْضِيَ اللَهُ بَيْنِي وَبَيْنَ الْقَوْمِ بِالْحَقِّ؛ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ
तो जो भी मुझे स्वीकार कर ले और हक़ को क़ुबूल कर ले तो ख़ुदा हक़ के लिये अधिक योग्य है, और जो भी इस कार्य में मेरा साथ न हे और स्वीकार न करे तो मैं सब्र और धैर्य का दामन नहीं छोड़ूंगा, यहां तक कि अल्लाह मेरे और इस गुट के बीच सच्चा फैसला करे, और वही है जो फ़ैसला करने वालों के बीच बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।
وَ هَذِهِ وَصِيَّتِي إلَيْكَ يَا أَخِي ؛ وَمَا تَوْفِيقِي إلاَّ بِاللَهِ، عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإلَيْهِ أُنِيبُ. وَالسَّلاَمُ عَلَيْكَ وَعَلَي مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَي . وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّه إلاَّ بِاللَهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ. 1
और यह मेरी वसीयत है तुम को मेरे भाई! और कोई तौफ़ीक़ नहीं है मेरे लिये मगर अल्लाह की तरफ़ से, मैंने उसपर भरोसा किया और उसी की तरफ़ वापस पलटूँगा, सलाम हो तुम पर और हर उस पर जो हिदायत की पैरवी करे, और कोई शक्ति और ताक़त नहीं है सिवाय महान और अज़ीम ख़ुदा के।
बहन सैय्यदा ज़ैनब की दुआएँ लेकर जब इमाम घोड़े पर सवार हुए, लगाम कसी तो घोड़ा आगे नहीं बढ़ा, फिर कसकर लगाम खींची तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. जोश में फिर से लगाम खींची, तब भी घोड़ा आगे नहीं बढ़ा. नीचे देखा तो आपकी बेटी सैय्यदा सकीना घोड़े के पांव लपेटे खड़ी हैं.
रोते हुए घोड़े से कह रहीं हैं- घोड़े मेरे बाबा को मत ले जाना. वो रोज़ मुझे सीने से लपेटकर सुलाते हैं, जो गया है वो वापस नहीं आया. बाबा वापस नहीं आए, तो मैं किसके सीने से लिपटकर सोऊंगी?
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सैय्यदा को गोद में उठाकर फ़रमाया- बेटा जितने दिन सीने से लिपटकर सोने थे, वो बीत चुके. अब मैं तुम्हें फूफी के सुपुर्द कर रहा हूं. इमाम ने सकीना को सैय्यदा ज़ैनब के सुपुर्द किया और घोड़े पर सवार होकर यज़ीदियों की तरफ़ गए. सैय्यदा सकीना दहाड़ मारकर रोने लगीं.
इमाम ने आसमान की जानिब देखकर मालिक से पूछा- ऐ मालिक तू तो राज़ी है न ?
ग़ैब से निदा आई- ऐ रूह-ए-हुसैन ! तू कामयाब हो गया, तुझपे इंसानियत को फ़ख़्र है, विलायत को फ़ख़्र है, अली को फ़ख़्र है, फ़ातिमा को फ़ख़्र है, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़ख़्र है तू बता तू राज़ी है न..
-ज़ैद पठान
जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला पहुंचे, तब मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु उनके साथ थे. आपकी उम्र 80 साल से ज़्यादा थी. सफ़ेद दाढ़ी होने के बावजूद जंग के मैदान में सबसे आगे थे. आशूरा के दिन मुस्लिम बिन औसजा रज़ियल्लाहु अन्हु ने यज़ीदी फ़ौज के ख़िलाफ़ बहुत बहादुरी से जंग लड़ी. रिवायतों के मुताबिक़ आपने कर्बला में पहली क़तार में होकर दुश्मनों का मुक़ाबला किया. दुश्मन की फ़ौज उनके दबाव को बर्दाश्त नहीं कर सकी. जब आप ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिरे, तो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हबीब इब्न मज़ाहिर रज़ियल्लाहु अन्हु आपके पास पहुंचे. हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया- ऐ मुस्लिम अल्लाह तुम पर रहम करे और इसी हालत में आपने शहादत पाई.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
इंसान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बचपन ही होता है, क्योंकि बचपन हर फ़िक्र से आज़ाद और बेगाना होता है। बचपन की यादें हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसे नक़्श हो जाती हैं कि उन्हें वक़्त की धूल भी मिटा नहीं पाती।
और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की हो, तो फिर कहना ही क्या। दूसरे बच्चों की तरह हमें भी सालभर गर्मियों की छुट्टी का इंतज़ार रहता था, क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में हमें अपनी नानी जान के घर जाने का मौक़ा मिलता था। हम नानी जान के घर जाते थे। इससे पहले बहुत-सी तैयारियां की जाती थीं। उस वक़्त बैग्स का चलन ज़्यादा नहीं था। इसलिए सन्दूक़ में कपड़े रखे जाते थे। प्लास्टिक की टोकरी में खाने-पीने का सामान होता था यानी रास्ते के लिए पूड़ी-सब्ज़ी और पानी की बोतलें होती थीं। सामान क़ुली उठाता था। उस वक़्त रेलगाड़ियों में आज जैसी भीड़-भाड़ नहीं होती थी। रेल में हमें बहुत अच्छा लगता था। खिड़की की सीट हमें ही मिलती थी। खिड़की से भागते हुए दरख़्तों को देखना कितना भला लगता था। ख़ैर, आज भी उतना ही भला लगता है। रस्ते में गंगा आती, तो हम उसमें सिक्के डालते थे। हापुड़ के पापड़ और गजरौले के पेड़े खाते। सफ़र में खाने का भी अपना ही लुत्फ़ है।
हमारे नाना के बाग़ थे, जिनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और शरीफ़े के अलावा और भी बहुत से फलों के दरख़्त थे। हम अपने भाइयों और मामाज़ाद बहनों के साथ दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़ते और खाते थे। दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़कर खाने के लुत्फ़ को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी फलों के दरख़्तों को देखकर बचपन में उन पर चढ़ना याद आता है।
बाग़ के पास एक बड़ा तालाब भी था। एक बार वहां खेलते हुए तालाब में गिर भी गए थे। अल्लाह का शुक्र है कि हमें पानी में से निकाल लिया गया। वहां का लज़ीज़ खाना, रबड़ी, छोले-समौसे, नारियल के बुरादे की कुल्फ़ी और बरगद के पत्तों पर रखी मलाई बर्फ़ बहुत याद आती है।
जिस साल नानी के घर नहीं जाते, उस साल अपने ही घर में ख़ूब मज़े करते। हमारा घर बहुत बड़ा था। उसका आंगन भी बहुत बड़ा था। घर में बग़ीचा था। बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और गूलर के कई दरख़्त थे। गर्मियों की छुट्टियों में हम ख़ूब मस्ती करते, शरारतें करते, धमा चौकड़ी करते। दरख़्तों पर चढ़ते और फल तोड़ते। दादी जान कहती थीं कि जामुन और गूलर के दरख़्त पर नहीं चढ़ना चाहिए, क्योंकि इसकी लकड़ी कमज़ोर होती है। हमारे घर के पास एक बड़ा मैदान था। उस मैदान में बहुत से दरख़्त थे। वहां पीपल, बरगद, नीम, शीशम, करंद और खजूर आदि के भी बहुत से दरख़्त थे। शीशम की डालों पर झूला डालकर भी खूब झूलते थे।
हमारे घर में माशा अल्लाह फुलवारी भी बहुत थी। इनमें बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा जैसे बहुत से फूलों के पौधे व बेलें थीं। हमारा घर ही नहीं, बल्कि आसपास का इलाक़ा भी इन फूलों की ख़ुशबू से महकता रहता था। अम्मी को मोगरा के फूल पहनने का बहुत शौक़ था। वे चाँदी के तार की बालियों में बेला के फूलों को पिरोकर कानों में पहना करती थीं और बालों में बेला के गजरे भी लगाती थीं। हमारी दादी जान भी कानों में फूल पहना करती थीं। वे मेज़ पर रखे पंखों पर फूलों के गजरे डाल देतीं, जिससे सारा घर-आँगन महक उठता था। हमारे घर से बहुत से लोग फूल ले जाते थे और फिर उनके गजरे व हार बनाते थे। घर के पास एक मन्दिर था। बहुत से लोग मन्दिर में देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए फूल लेकर जाते थे।
हमें लू की वजह से गर्मियों की भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए हम घर के भीतर ही रहते और दोपहर ढलने का इंतज़ार करते थे। कई बार हम घरवालों की नज़र से बचकर बाहर खेलने चले जाते थे। आँगन में तख़्त बिछे होते थे। उन पर सफ़ेद चादरें बिछी होतीं और गाव तकिये क़रीने से लगे हुए होते थे। शाम को घर के सब लोग इन्हीं पर बैठते थे। शाम को दादी तरह-तरह के पकौड़े बनाती थीं। रूह अफ़ज़ा शर्बत भी बनता था। उसमें बहुत-सी बर्फ़ डाली जाती थी।
गर्मियों में हम छत पर सोया करते थे। शाम को छत की साफ़-सफ़ाई की जाती। फिर पानी छिड़का जाता, ताकि छत ठंडी हो जाए। छत पर चटाइयां बिछाई जातीं। फिर उन पर दरियां बिछाई जातीं। दरियों पर रंग-बिरंगी कढ़ाई वाली चादरें बिछाई जातीं और तकिये रखे जाते। क़रीब में ही पानी से भरी मिट्टी की सुराहियां रखी जातीं, गिलास रखे जाते। हम बच्चे अपनी-अपनी छोटी सुराहियां अपने सिरहाने रख लिया करते थे, ताकि रात में प्यास लगे तो अपनी ही सुराही से पानी पी लें। हमें दादी-नानी ने ही नहीं, बल्कि पापा ने भी बचपन में कहानियां सुनाई हैं।
हमारे घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। ननिहाल और ददिहाल में सब लोग पढ़े-लिखे थे। नाना जान और दादा जान दोनों ही दानिशमंद थे। हमारी अम्मी को भी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक़ था। वे शायरा थीं और बहुत शानदार लिखती थीं।
हमारे घर किताबों की एक अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी थी। उनमें अरबी, उर्दू, इंग्लिश और हिन्दी की किताबों की भरमार थी। आज भी यही हाल है। बरसों पहले इनमें पंजाबी की किताबें भी शामिल हो गईं। अम्मी की देखा-देखी हमें भी किताबों से मुहब्बत हो गई। बचपन में ही हमने लिखना शुरू कर दिया था। हमें डायरी लिखने का भी शौक़ था, जो आज भी है। डायरी में हम अपनी बातों के अलावा अपने पसंदीदा शायरों की ग़ज़लें, गीत और नज़्में लिखा करते थे। आज भी लिखते हैं। हमारी डायरी में शायरा इशरत आफ़रीन की एक ग़ज़ल दर्ज है-
यूं ही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें
नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें
सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छाँव का
लिपे पुते कच्चे आंगन में लोट लगाती दोपहरें
जीवन-डोर के पीछे हैरां भागती टोली बच्चों की
गलियों-गलियों नंगे पाँव धूल उड़ाती दोपहरें
सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नटखट दिन
दबे-दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दोपहरें
कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हंसते दिन
ख़ुद से लड़कर गौरैया-सी शोर मचाती दोपहरें
वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर
गुड़ियों के लब सी कर उनका ब्याह रचाती दोपहरें
खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं
मंढे हुए पीले काग़ज़ से छनकर आती दोपहरें
नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद
घेरा डाले छोटी-छोटी हाथ बटाती दोपहरें
फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढ़े दिन
पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दोपहरें
पानी की तक़सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर
और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दोपहरें
पुरवाई से लड़ते कितने वर्क़ पुरानी यादों के
सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दोपहरें
दुखती आंखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन
बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दोपहरें
ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में
चूड़ी की दुकानों से वो हमें बुलाती दोपहरें
सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं
ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दोपहरें
ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं
किस जानिब से आ निकली हैं ये गहनाती दोपहरें
वाक़ई, बचपन से वाबस्ता यादें बहुत दिलकश होती हैं। बशीर बद्र साहब ने क्या ख़ूब कहा है-
उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते...
30 जून है, जब लखनऊ ने बिरतानियों को सबसे पहली शिकस्त दी थी। वह आज की ही सुबह थी जब एक तरफ फैज़ाबाद से चले मौलवी अहमद उल्ला शाह थे, सूबेदार बरकत अहमद और सामने ईस्ट इंडिया कम्पनी हेनरी लॉरेंस के साथ जंग कर रही थी।
लखनऊ के इस्माइलगंज, चिनहट में आज की सुबह यह लड़ाई शुरू हुई।
मौलवी अहमद उल्ला शाह जो बेहतरीन नेतृत्व कर्ता थे। उनकी ज़बरदस्त रणनीति और बरकत अहमद की सेना की सूझबूझ और साथ थे अवध के किसान और ज़मींदार,जी तोड़कर लड़े और लखनऊ के सबसे पहले किलेबंदी को चिनहट में बिखरा कर रख दिया।
हेनरी लॉरेंस मुट्ठी भर बचे सैनिक लेकर भागा सीधे, रेज़ीडेंसी और वहीं से शुरू हुई लखनऊ में अंग्रेजों की कैद। रेज़ीडेंसी में वह बंधक बना गए। यह अवध के किसानों की हिम्मत, जमींदारों की जद्दोजहद और आम आवाम का पहला जवाब था, जो बिरतानियों को लंदन तक महसूस हुआ कि वह चिनहट, लखनऊ में हार गए।
हमें यह तारीख़ इसलिए नही याद रखनी चाहिए कि हम इन तारीखों को केवल मनाएं,बल्कि सबक़ लें। जब कुशल, निडर, सच्चा नेतृत्व हो और आम इंसान साथ आ जाए, तो हर बड़ी से बड़ी, प्रचंड ताक़त की अहंकार की सत्ता हारती है। इस सबक़ को याद रखना चाहिए। जब तक नेतृत्व और आम अवाम में मुहब्बत का,एक दूसरे की तक़लीफ़ का रिश्ता है, कोई भला हमें कैसे हरा लेगा।
चिनहट में सब जीतोड़ लड़े, अपनी माटी के लिए लड़े, अपनी ज़िंदगी को आर या पार दांव पर लगाकर लड़े, हिन्दू और मुसलमान साथ लड़े, नतीजा यह था कि जिस लखनऊ की सुबह इस जंग से हुई थी, उसकी शाम में विजय का सेहरा अवाम के सर पर था।
आज 30 जून है। आज मौलवी अहमद उल्ला शाह, सूबेदार बरकत अहमद रिसालदार, नाना साहब, तात्या टोपे,मंगल पांडे, बेगम हज़रत महल,बहादुर शाह ज़फ़र, रानी लक्ष्मीबाई और बहुत से वीरों, हिन्दू मुसलमान एकता के जज़्बे से लबरेज़ अवाम,किसान, ज़मींदार और उन सभी पुरखो को याद करने का दिन है, जिन्होंने अपनी मेहनत,जज़्बे, हिम्मत और सूझबूझ से वह बीज डाले, जो हमारा गर्व ही हैं और रास्ता भी हैं।
30 जून, इस्माइल गंज, चिनहट में 1857 कई पहली विजय को याद करते हुए यह याद रखिये, हमारी एकता ही हर उसका जवाब है, जो हमारी तरफ बुरी नज़र से देखता है। हिन्दू मुसलमान की एकता से बिरतानी भी घबराते थे और हारते थे। इसी से उनके समर्थक आजतक घबराते और हारते हैं।
यह हमेशा रहेगा,जो मुल्क की भलाई चाहेगा,वह इस एकता पर ज़ोर देगा और जो मुल्क पर कब्ज़ा करना चाहेगा, वह इसे तोड़ेगा।
30 जून मुबारक!
मध्यकाल के निर्गुणपंथी संत कबीर दास काशी में पैदा हुए, वहाँ रहे। बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के मगहर में उनका अंतिम समय बीता। इस बीच बिहार के अनेक क्षेत्रों में उनका आना-जाना होता रहा। बिहार आने का एक दिलचस्प प्रसंग कबीर साहेब के साथ जुड़ा बताया जाता है। काशी में उनके सत्संग में अनेक जगहों से लोग आते थे। इन भक्तों में कुछ लोग सेवादार बनकर आश्रम में ही रहने लगे। इन्हीं लोगों में एक भक्त बिहार से सीवान के धनौती गाँव के थे। एक दिन सेवादार भक्तों के बीच किसी बात पर कहा-सुनी हुई। भोजन से पहले सब एक साथ मिल कर 'बीजक' (कबीर-वाणी) का पाठ करते थे। उस दिन बीजक-पाठ और पदों के गायन के बाद 'बीजक' लाल-कपड़े में लपेट कर यथा-स्थान रख दिया गया। सुबह लोग उठे तो देखा- 'बीजक' वहाँ नहीं था। खोज शुरू हुई। सेवादारों में एक शख्स वहाँ नहीं था। उसका नाम भगवान दास था जो सीवान के धनौती गाँव का रहने वाला था। कबीर साहेब तक यह बात पहुंची। शक हुआ कि सेवादारों के बीच झगड़े के बाद वह नाराज चल रहा था। रात में सबके सोने के बाद 'बीजक' लेकर वही भाग गया।
परेशानी यह थी कि 'बीजक' की वह पहली हस्तलिखित प्रति थी, जिसका पाठ और गायन सुबह-शाम भक्तों के बीच होता था। अतः कुछ शिष्यों के साथ कबीर साहेब भगवान दास की खोज में उसके गाँव धनौती पहुंचे थे। लेकिन इनके पहुंचने की खबर भगवान दास को मिल गयी और वह गाँव से भाग गये। कबीर ने कहा- चलो यहाँ से। वह भगवान दास नहीं भग्गू दास है। यह नाम कबीर-साहित्य में जहाँ-तहां मिलता है। 90 के दशक में धनौती मठ की जमीनों पर कब्जा करने का विवाद शुरू हुआ तो जे.पी. आंदोलन में काम करने वाले 77 के चुनाव में मीरगंज के विधायक बने हमलोगों के मित्र भवेश चंद्र प्रसाद ने एक प्रसंग में बताया था कि धनौती का कबीर मठ उनके परिवार का है। उनके पूर्वजों ने बनाया था। किंतु भगवान दास के नाम और कबीर दास से जुड़े प्रसंग का पता उन्हें नहीं था। मैंने जब 'बीजक' प्रसंग की चर्चा की और भग्गू दास का प्रसंग सुनाया तो भवेश जी आह्लादित हो उठे। भगवान दास उनके लकड़दादा थे जो काशी में कबीर के यहां रहे। धनौती का कबीर मठ उस यात्रा की निशानी है, जो बाद में भक्तों और अनुयायियों द्वारा स्थापित हुआ। बिहार में ऐसे कई मठ स्थापित हुए जहां स्वयं कबीर सत्संग करने गए थे अथवा अपनी यात्राओं के दौरान गये थे। सीवान के धनौती के अलावा पटना के फतुहा समस्तीपुर के रोसड़ा के साथ मधुबनी, सहरसा और सुपौल का भी नाम लिया जाता है। यही कारण है कि आज भी उत्तर बिहार में कबीर पंथ के अनुयायियों की संख्या ज्यादा है। खासकर पिछड़े, अतिपिछड़े और दलित समाज में कबीर की सबसे अधिक पैठ है। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर भारत में सामाजिक परिवर्तन लाने में कबीर की क्रांतिकारी भूमिका है।
वस्तुतः कबीर एक साथ बहुत कुछ हैं। वे संत हैं, कवि हैं, समाज सुधारक हैं, क्रांतिकारी हैं, गृहस्थ और कारीगर (बुनकर) हैं। कपड़ा बुनना उनका पेशा था। इसलिए पेट की चिंता उन्हें नहीं थी, दूसरे संतों की तरह। उनका स्वावलंबन स्वाभिमान से आगे अक्खड़ता की सीमा तक पहुंच गया था। इसलिए वे सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक पाखंडों और सत्ता के दमन को चुनौती देते थे। पंडितो, पुरोहितों, मौलानाओं और तत्कालीन शासक इब्राहिम लोदी के समक्ष भी कभी नहीं झुके। संभवतः कबीर की इस अक्खड़ता और क्रांतिकारी सोच ने समाज के प्रभुवर्ग को विचलित किया तथा उन्होंने कबीर की उपेक्षा की। इसलिए बहुत दिनों तक कबीर मठों में बंद रहे। उनके भक्त वहीं बैठकर उनके पद गाते थे और संगत-पंगत करते थे। वहीं से लोकजीवन में उनका प्रवेश हुआ। धीरे-धीरे उनकी ख्याति देश देशांतर में फैलती गई। प्रबुद्ध समाज का ध्यान कबीर की ओर गया। लेकिन हिंदी के अधिकांश आचार्यों का द्वार उनके लिए वर्षों तक बंद था। हिंदी के शीर्ष आलोचक पं. रामचंद्र शुक्ल ने अपने आलोचना-ग्रंथ 'त्रिवेणी' में कबीर को स्थान नहीं दिया। उसमें सूरदास, तुलसीदास और जायसी थे, लेकिन कबीर शुक्ल जी की गंभीर उपेक्षा के शिकार हुए। नतीजा हुआ कि कबीर के लिए विश्वविद्यालय का दरवाजा बहुत बाद में खुला। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह दरवाजा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने खोला - कबीर पुस्तक लिखकर। लेकिन मैं इससे असमत हूं। कबीर को विश्वविद्यालय के छात्रों, अध्यापकों और अन्य प्रबुद्ध हिंदी प्रेमियों में ले जाने का प्रयास द्विवेदी जी ने जरूर किया, लेकिन यह पहला प्रयास नहीं था। हिंदी वालों को यह श्रेय नहीं दिया जा सकता।
मेरा मानना है कि कबीर को खोजने, पढ़ने, विश्लेषण करने और प्रकाशित कर प्रबुद्ध वर्ग तक पहुंचाने का काम पहली बार एक बांग्ला-भाषी विद्वान ने किया। वे थे आचार्य क्षितिमोहन सेन, जो शांतिनिकेतन में भारतीय संस्कृति और दर्शन के अध्यापक थे। वे आज के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन के नाना थे। कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर की प्रेरणा से उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लगभग दो सौ मठों के कबीर पंथी साधुओं से मुलाकात की और वहां से कबीर संबंधी पुस्तकों का संग्रह किया। फिर उनके पदों का परस्पर मिलान कर बांग्ला में चार खंडों में कबीर वाणी का प्रकाशन कराया जो कबीर का बोलपुर संस्करण कहा जाता है। इसका पहला खंड अक्टूबर 1910 ई. में, दूसरा खंड जनवरी 1911 ई. में, तीसरा खंड मई 1911 ई. में और चौथा खंड अगस्त1911 ई. में प्रकाशित हुआ। इस तरह आचार्य क्षितिमोहन सेन ने कुल चार खंडों में कबीर की उपलब्ध रचनाओं का प्रकाशन कराया। इस प्रकार आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रयास से कबीर बौद्धिक समाज के सामने आए। इससे पहले वे मठों के माध्यम से लोक जीवन में जन-श्रृति बन कर प्रचलित थे।
आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा संकलित पदों से ही एक सौ पदों को चुनकर रवींद्र नाथ टैगोर ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ' हंड्रेड पोयम्स ऑफ़ कबीर ' नामक पुस्तक छपावाई। तब तक उन्हें 'गीतांजलि' पर नोबेल पुरस्कार (1913 ई.) मिल चुका था। इस बार 'गीतांजलि' के बहाने फिर एक बार कबीर चर्चा में आ गए। दरअसल गीतांजलि की भूमिका अंग्रेजी के प्रख्यात कवि डब्लू.बी.येट्स. ने लिखी थी। कहते हैं कि इसके अंग्रेजी अनुवाद में उनका योगदान भी था। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि एजरा पाउंड ने पत्र लिख कर डब्लू.बी.येट्स से पूछा कि इस पुस्तक में क्या है कि जिस पर फिदा होकर तुमने ऐसी जबरदस्त भूमिका लिखी? येट्स का जवाब था कि गीतांजलि में मुझे नव-रहस्यवाद(Neo-Mysticism) की झलक मिली जो आज की दुनिया के लिए एक संदेश है। फिर एजरा पाउंड ने दूसरा पत्र लिखा - तब तुमने कबीर को नहीं पढ़ा है। कबीर तो पहले ही यह सब कुछ कह गए हैं। अब मैं कबीर पर पुस्तक लिखने जा रहा हूं। अंग्रेजी के दो महान कवियों के बीच जब गीतांजलि को लेकर पत्राचार हो रहा था, एजरा पाउंड इटली की जेल में थे। फिर मानसिक रोग के इलाज के लिए वाशिंगटन लाये गए और कबीर पर लिखने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ।
शांतिनिकेतन में आचार्य क्षितिमोहन सेन के समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी वहां हिंदी पढ़ाते थे। उन्होंने आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा कबीर मठों से संकलित पदों के आधार पर ही ' कबीर ' नामक पुस्तक लिखी, जिससे हिंदी पाठकों के बीच कबीर की चर्चा शुरू हुई और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनका प्रवेश हुआ। किंतु कबीर आज भी बहुतों के लिए प्रश्न बने हुए हैं। उन्हीं के शब्दों में -
हद-हद करते सब गए, बेहद गया न कोय,
बेहद के मैदान में, रहा कबीरा सोय।
वसंत-रजब ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
दो दोस्तों के शहादत की कहानी
दो दोस्तों के शहादत की कहानी
1 जुलाई को वसंत-रजब का शहादत दिवस है। यह कहना उचित होगा कि इतिहास मे यह एकमात्र ऐसी घटना है जहाँ दो मित्रों ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वसंत रजब की मृत्यु 1946 में हुई थी। लेकिन उससे पहले, गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1931 में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यह हमारी स्वतंत्रता की एक निराली मिसाल है।
महात्मा गांधी ने अपने नेतृत्व में दास प्रथा के विरुद्ध संघर्ष को एक रचनात्मक दिशा दी। उन्होंने समाज को 18 रचनात्मक कार्यक्रम दिए। स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष करने वाला प्रत्येक कार्यकर्ता इन 18 सूत्री कार्यक्रमों के प्रति निष्ठावान था। इनमें से एक महत्वपूर्ण बिंदु कौमी एकता था, अर्थात् हिंदू-मुस्लिम एकता। इस स्वतंत्रता संग्राम से निकले योद्धाओं ने वीरतापूर्वक संघर्ष करते हुए समय आने पर हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना स्वयं को बलिदान कर दिया। इनमें से एक महत्वपूर्ण नाम वसंत और रजब नामक दो मित्रों का है!
यह कहानी सन् 1946 की है। गुजरात के अहमदाबाद में रथ यात्रा चल रही थी। रथ यात्रा के जमालपुर इलाके में पहुंचते ही हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव पैदा हो गया और जल्द ही दंगें भड़क उठे। दो मित्र, वसंत और राजब, ने हिंसक भीड़ को शांत करने की कोशिश की। बार-बार विनती करने के बावजूद लोग शांत नहीं हुए। तब उन्होंने कहा, "अगर तुम्हें इन्हें मारना ही है, तो पहले हमें मार डालो।" यह सुनकर हिंसक भीड़ शांत होने के बजाय और भी ज्यादा क्रोधित हो गई और उन्होंने पत्थरों, चाकुओं और कटारों से वसंत और रजब की जमकर हत्या कर दी।
अपनी जान बचाने की बजाय, उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे शहीद हो गए। वसंत हिंदू थे जबकि रजब मुसलमान थे। उनकी मृत्यु के समय वसंत 40 वर्ष के थे, जबकि रजब अली केवल 27 वर्ष के थे।
1946 हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अंधकारमय दौर था। अंग्रेजों ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग कर रही थी। कई स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम द्वेष चरम पर था। कई जगहों पर दंगे हो रहे थे। गांधीजी देश को इस कटुता से मुक्त करने का भरसक प्रयास कर रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम में उतरे कार्यकर्ता गांधीजी के संदेश के अनुसार, अपने प्राणों की परवाह किए बिना हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने का भरसक प्रयास कर रहे थे।
वसंतराव कौन थे?
वसंतराव का पूरा नाम वसंतराव हेगिष्टे था। वे अहमदाबाद में रहते थे। पंद्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल छोड़ दिया और गुजरात विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय विद्यालय में दाखिला लिया। विश्वविद्यालय ने उनके भीतर देशभक्ति की भावना जगाई। उन्होंने गांधी जी के साथ दांडी मार्च में भाग लिया। 1930 के नमक सत्याग्रह में उन्हें कारावास की सजा हुई। वे कांग्रेस सेवा दल से जुड़े थे। उन्होंने साष्टांग नमस्कार प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता। एक बार वसंतराव और उनके मित्र गांधी जयंती मनाने के लिए घोलका गांव गए थे। वहां से लौटते समय वे एक गांव से गुजरे। एक मित्र ने कहा, चलो थोड़ी देर इस गांव में रुकते हैं, आराम करते हैं, पानी पीते हैं। बाद में उन्हें पता चला कि यह चम्हारों का गांव है। मित्र ने कहा, हम यहां पानी नहीं पिएंगे। वसंतराव ने कहा, मैं यहां पानी पीऊंगा और उनके आग्रह पर अन्य मित्रों ने भी पानी पिया। आजादी के साथ-साथ इन युवाओं के मन में जातिगत भेदभाव से परे एक समाज बनाने की इच्छा थी। जब वे व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए जेल में थे, तब अहमदाबाद में दंगे हुए। जेल से रिहा होने के बाद वसंतराव ने कहा, "इन दंगों में अहमदाबाद से एक भी कांग्रेसी की मौत न होना हमारे विरोधियों को मौका दे रहा है। मैं उस व्यक्ति की मौत चाहता हूँ जो अपने सिर पर हथौड़ा गिरते हुए भी 'मुझे मार डालो' कहता रहे।" और अंततः उनकी यही इच्छा पूरी हुई। उन्होंने एक बार एक मित्र से कहा था, मैंने अपने जीवन में व्यायाम और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी है।
रजब अली कौन थे
रजब अली का पूरा नाम रजब अली लखानी था ! उनका जन्म सन् 1919 में हुआ था ! वे एक खोजा मुस्लिम थे। उनका जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के कराची शहर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के काठियावाड़ जिले के लिंबडी गांव से था। सन् 1934 में लखानी परिवार कराची छोड़कर अपने पैतृक गांव लिंबडी लौट आया। उस समय राजब अली की आयु मात्र सोलह वर्ष थी। सन् 1936 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और भावनगर महाविद्यालय में दाखिला लिया। छात्रावास में रहते हुए ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। वे ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के कट्टर विरोधी थे। इसीलिए उन्होंने बी.ए. की अंतिम वर्ष की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। उन्हें सन् 1938, सन् 1941 और सन् 1942 में जेल जाना पड़ा। वे धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति की पहचान करने के प्रबल विरोधी थे। वे स्वयं को 'हिंदुस्तानी' बताते थे। वसंतराव से मिलते ही उनकी गहरी दोस्ती हो गई और यह दोस्ती अंत तक, यानी मृत्यु तक कायम रही। छह फुट लंबे रजब अली का व्यक्तित्व आकर्षक था। वे साहसी स्वभाव के थे। सादगी और विनम्रता उनके स्वभाव में थी। वे विचारधारा से समाजवादी थे। रजब अली का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मुस्लिम परिवार में हिंदू नाम और हिंदू परिवार में मुस्लिम नाम होना अत्यंत आवश्यक है।
जीवन भर एक-दूसरे का सहारा रहे वसंत रजब ने मृत्यु में भी एक-दूसरे का साथ दिया। वसंतराव की बहन ने उनकी मृत्यु को याद करते हुए बताया, "घटना घटते ही हम अस्पताल गए। वहां हमने वसंतराव का शव देखा। तभी हमें लगा कि रजब अली भी यहीं होंगे, क्योंकि वे दोनों हमेशा साथ रहते थे।" और ऐसा ही हुआ। रजब अली का शव भी उसी अस्पताल में मिला।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वसंत रजब की शहादत हमारी विरासत है। आज के नफरत भरे माहौल में यह शहादत प्रेरणादायक है।
- जयंत दिवाण
उत्तर प्रदेश में गंगा तट पर बसा कन्नौज दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है, जिसकी फ़िज़ाओं में इत्र घुला हुआ है, जिसकी हवायें ख़ुशबू से मुअत्तर हैं. इत्र नगरी के नाम से मशहूर कन्नौज में तरह-तरह का इत्र बनाया जाता है. इत्र कई चीज़ों से बनता है. फूलों के अलावा सुंगंधित पौधों के दूसरे हिस्सों से भी इत्र बनाया जाता है, जैसे जाफ़रान, ख़स, लकड़ी, गर्म मसाले और कस्तूरी आदि से भी इत्र तैयार किया जाता है.
इत्र का इतिहास
इत्र का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि दुनिया में सबसे पहले इत्र मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के लोगों ने बनाया था. यहां के लोग इत्र बनाने में माहिर थे. मेसोपोटामिया यानी सुमेरियन सभ्यऔता अब तक इंसानी इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है. ये भी कहा जाता है कि बेबीलोन मेसोपोटामिया में ताप्पुती नाम की एक महिला कैमिस्ट ने फूलों की ख़ुशबू को तेल में मिलाकर इत्र बनाया था. तक़रीबन चार हज़ार साल पहले मिस्र के अमीर और आला तबक़े के लोग अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. इत्र उनकी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा था. ख़ुशियों से लेकर ग़म तक के माहौल में इत्र का इस्तेमाल किया जाता था. शादी जैसी ख़ुशियां हों या मैयत रखी हो, हर मौक़े पर इत्र का इस्तेमाल होता था. ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जहां दुल्हन को इत्र लगाया जाता है वहीं मैयत के कफ़न पर भी इत्र छिड़का जाता है.
चूंकि इस्लाम में शराब को हराम क़रार दिया गया है. इसलिए इत्र बनाने में ख़ुशबू वाले तेल का इस्तेमाल किया जाता है.
क़ाबिले ग़ौर है कि फ़ारस के लोग सदियों तक इत्र के कारोबार में अव्वल रहे हैं. उन्होंने आसवन विधि का आविष्कार किया था. माना जाता है कि कन्नौज में इत्र बनाने का तरीक़ा फ़ारस से ही आया था. कन्नौज में आज भी इसी पुराने रिवायती तरीक़े से इत्र बनाया जाता है.
इत्र से मुग़लों का रिश्ता
मुग़ल बादशाहों को इत्र बहुत पसंद था. मुग़ल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां को ख़ुशबुओं का बेहद शौक़ था. वे बालों में फूल लगाया करती थीं. उनके कमरे में तरह-तरह के ख़ुशबूदार फूलों के गुलदस्ते सजे रहते थे. कहते हैं कि जब वे नहाया करती थीं तो पानी में फूलों की पंखुड़ियां डलवा लिया करती थीं, ताकि पानी में उनकी ख़ुशबू घुल जाए. कहा जाता है कि एक दिन उन्होंने देखा कि गर्म पानी में पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों से तेल निकल रहा है.
इस तेल में फूलों से भी ज़्यादा ख़ुशबू थी. इससे वे बहुत मुतासिर हुईं. उन्होंने इसका ज़िक्र बादशाह जहांगीर से किया. बादशाह ने उनकी बात को संजीदगी से लिया और उन्होंने फूलों से इत्र बनाने के काम को बढ़ावा दिया. कहा जाता है कि बादशाह ने नूरजहां के कहने पर फ़ारस से इत्र बनाने वाले कारीगर बुलाए थे और उन्होंने गुलाब से ख़ास तरह का इत्र बनाया था.
इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दुस्तान में गुलाब के इत्र को बढ़ावा देने का श्रेय नूरजहां की मां अस्मत बेगम को जाता है. उन्होंने देखा कि नूरजहां के नहाने के लिए आए गर्म पानी के बर्तनों में जब गुलाब की पंखुड़ियां डाली जाती हैं, तो पानी की ऊपरी सतह पर हल्का सा तेल जमा हो जाता है. उन्होंने इस तेल को छूकर देखा, तो इसमें बहुत तेज़ ख़ुशबू थी. ये ख़ुशबू इतनी तेज़ थी कि कई गुलाबों की महक भी इसके आगे फीकी मालूम होती थी. कहा जाता है कि तभी से हिन्दुस्तान में गुलाब का इत्र बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. हक़ीक़त ये है कि मुग़ल बादशाहों ने इत्र के कारोबार पर ख़ास तवज्जो दी और उनके शासनकाल में ख़ुशबू का ये कारोबार ख़ूब फलाफूला.
आइने-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है कि मुग़ल बादशाह इत्र के शौक़ीन थे. बादशाह अकबर रोज़ाना इत्र का इस्तेमाल किया करते थे. उन्हें ख़ुशबू बहुत पसंद थी. वे सोने और चांदी के बर्तनों में अगरबत्ती भी जलवाया करते थे. मुग़ल शहज़ादियां ख़ुशबू वाले पानी से नहाया करती थीं. वे इत्र भी लगाया करती थीं. उन्हें अगरऊद इत्र बहुत पसंद था.
इत्र कैसे बनता है
इत्र बनाने के लिए ताज़े फूलों को ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में डाला जाता है. फिर देग़ों को ढककर गीली मिट्टी से सील कर दिया जाता है. फिर इन्हें भट्ठियों पर कई घंटों तक पकाया जाता है. इन देग़ों के ढक्कनों में पाइप लगे हुए होते हैं, जो भट्टियों के पास बनी पानी की हौज़ में रखे सुराहीनुमा ताम्बे के बर्तनों से जुड़े होते हैं. इन्हें भपका कहा जाता है. इन बर्तनों में पहले से ही तेल होता है, जिसे बेस ऑयल कहा जाता है. जब देग़ के फूल पकने लगते हैं, तो उनमें से निकलने वाली भाप को इन बर्तनों में इकट्ठा किया जाता है. ये भाप बर्तन के तेल में अच्छी तरह से घुल-मिल जाती है. फिर भाप मिले इस तेल को चमड़े के सुराहीनुमा थैलों में भर दिया जाता है. ये थैले ऊंट के चमड़े के बने हुए होते हैं. इन थैलों को एक रस्सी के सहारे धूप में ऊंची जगहों पर लटका दिया जाता है. ये थैले भाप की नमी को सोख लेते हैं और इस तरह ख़ुशबूदार इत्र तैयार होता है.
मिट्टी का इत्र
फूलों से इत्र बनाने के बारे में तो सब ही जानते हैं, लेकिन कन्नौज में मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. बारिश के दिनों में जब आसमान से रिमझिम बूंदे बरसती हैं, तो इससे यहां की मिट्टी से एक अलग ही तरह की सौंधी-सौंधी ख़ुशबू उठती है. विज्ञान की बात करें तो कच्ची मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया जब बारिश के पानी में भीगते हैं, जो उनसे एक सौंधी सी महक पैदा होती है. ये महक दिलो-दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून देती है. ये महक ऐसी होती है कि उदास मन भी चहक उठता है. इस महक से इंसान का नाता उतना ही पुराना है, जितना पुराना बारिश और मिट्टी का रिश्ता है.
यहां के कारीगर इस ख़ुशबू को भी बोतलों में भरने का हुनर जानते हैं. दरअसल फूलों की तरह ही इस मिट्टी को भी ताम्बे की बड़ी-बड़ी देग़ों में भर दिया जाता है और फिर बारिश के पानी के साथ इसे पकाया जाता है. फिर इससे निकलने वाली भाप को इकट्ठा किया जाता है. इस तरह भाप को बेस ऑयल के साथ मिलाकर इत्र तैयार किया जाता है.
अगरऊद
कन्नौज में दुनिया का सबसे महंगा इत्र बनाया जाता है, जिसका नाम है अगरऊद. अगर एक पेड़ का नाम है और ऊद का मतलब है तेल. अगरऊद यानी अगर का इत्र. अदर के पेड़ असम में पाए जाते हैं. इसकी लकड़ी भी चन्दन की तरह ही ख़ुशबूदार होती है. इसकी लकड़ी बहुत ज़्यादा महंगी होती है. इसलिए इसका इत्र भी बहुत ही महंगा होता है. अगरऊद के एक किलो इत्र की क़ीमत तक़रीबन 50 लाख रुपये है. इसे शाही परिवार और दुनिया के अमीर लोग ही इस्तेमाल करते हैं. आम इंसान तो इसे ख़रीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता. इसके अलावा गुलाब से बनने वाले इत्र भी कम महंगे नहीं हैं. इनकी क़ीमत भी हज़ारों रुपये से लेकर लाखों रुपये है.
कन्नौज में गर्म मसालों से भी इत्र बनाया जाता है. ऐसे ही एक इत्र का नाम है शमामा. इसमें दालचीनी, जायफल, लौंग, चक्री फूल जैसे मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए इसकी तासीर बहुत गर्म है. अमूमन सर्दियों में इस इत्र का इस्तेमाल किया जाता है. गर्मियों में ख़स का इत्र बहुत अच्छा माना जाता है.
कन्नौज में इत्र के कारोबार से जुड़े व सन रेज़ परफ़्यूमर्स के मालिक मुरसलीन चिश्ती बताते हैं कि चूंकि इत्र में किसी भी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसलिए इसकी क़ीमत ज़्यादा होती है. गुलाब के इत्र की क़ीमत 15 हज़ार रुपये से लेकर चार लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. वे कहते हैं कि यहां जन्नतुल फ़िरदौस, केसर, बेला, मोगरा, चमेली, गेंदा, हिना, नर्गिस, गुलदाऊदी, ज़ाफरान, ख़स, केवड़ा, मजमुआ, शमामा, कस्तूरी आदि इत्र भी बनाए जाते हैं. यहां से विदेशों को करोड़ों रुपये का इत्र निर्यात किया जाता है. इन देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, ओमान, इराक़, ईरान, रूस आदि शामिल हैं. इत्र के कारोबार का सालाना टर्नओवर तक़रीबन एक हज़ार करोड़ रुपये बताया जाता है. कोरोना काल में इत्र के कारोबार पर ख़ासा असर पड़ा था, लेकिन अब ये फिर से अपने ढर्रे पर वापस आ रहा है.
फूलों की खेती
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं.
देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है.
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है.
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है.
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है.
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है.
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट दिल्ली में स्थित है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
इत्र बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत होती है. इसलिए यहां फूलों की बहुत ज़्यादा मांग है. कन्नौज और इसके आसपास के इलाक़ों में फूलों की खेती होती है. सलमान का कहना है कि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है, जो फूलों की खेती के लिए बहुत ही अच्छी है. वे कहते हैं कि यहां गुलाब के अलावा बेला, मोगरा, चमेली और गेंदे की भी खेती होती है. किसान अल सुबह फूल चुनना शुरू कर देते हैं. यहां फूलों की बड़ी मंडी है. यहां देश के अन्य इलाक़ों से भी भारी मात्रा में फूल आते हैं. इत्र बनाने के लिए कई इलाक़ों से लकड़ियां भी मंगाई जाती हैं. इत्र के कारोबार से परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं.
देश के सबसे बड़े इत्र निर्माता
यूं तो देश में इत्र के बहुत से कारोबारी हैं, लेकिन में इनमें दस सबसे बड़े इत्र निर्माताओं की फ़ेहरिस्त इस प्रकार है-
1. कन्नौज अत्तर
कन्नौज अत्तर देश की सबसे पुरानी प्राकृतिक अत्तर और तेल कंपनियों में से एक है. यह कन्नौज में स्थित है.
2. पराग फ़्रेगरेंस
पराग फ़्रेगरेंस मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के कालाखेत में स्थित है.
3. काज़िमा परफ़्यूमर्स
काज़िमा परफ़्यूमर्स दिल्ली के पटपड़गंज में स्थित है.
4. अजमल इत्र
अजमल इत्र उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित है. दुनियाभर में इसके इत्र की धूम है.
5. इंद्र सुगंध भंडार
इंद्र सुगंध भंडार मध्य प्रदेश के देवास में स्थित है.
6. मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम
मदीना कंपनी हाउस ऑफ़ परफ़्यूम तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित है. यहां इत्र की मुख़तलिफ़ क़िस्मों के अलावा बखूर और अगरबत्ती की भी कई क़िस्में हैं.
7. स्विस अरेबियन परफ़्यूम
स्विस अरेबियन परफ़्यूम दिल्ली में स्थित है.
8. अल रिहैब
अल रिहैब केरला के गुरुवायूर में स्थित है. यह कंपनी ऊद फ़क़ीर, अरूक़ अल ऊद, बहरीन मोती, अरूक़ अल दहाब और ऊद ख़ास आदि के लिए जानी जाती है.
9. जेबी फ़्रेगरेंस
जेबी फ़्रेगरेंस गुजरात के अहमदाबाद में स्थित है. इसके उत्पादों में स्प्रे सुगंध, एयर फ़्रेशनर सुगंध, अगरबत्ती सुगंध, साबुन सुगंध, डिटर्जेंट सुगंध आदि उत्पाद शामिल हैं.
10. एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट
एसएनएन नेचुरल प्रोडक्ट दिल्ली में स्थित है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार आवाज़
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है. ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.
इस्लाम में औरतों की असल भूमिका समझनी है तो कर्बला ज़रूर पढ़नी चाहिए।
कर्बला में ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली, उम्मे वहब बिन्ते अब्दुल्लाह, और उम्मे वहाब का किरदार बेहद अहम है, जबकि कर्बला के बाद उम्मुल मौमिनीन उम्मे सलमा यानी हिंद बिन्ते अबी उमैया उम्मुल बनीन यानी फातिमा बिन्ते हुज़ाम का ज़िक्र ज़रूरी है।
कर्बला में ख़वातीन की अहमियत इससे समझिए कि अगर ज़ैनब बिन्ते अली, उम्मे कुलसूम बिन्ते अली न होतीं तो शायद कर्बला का ज़िक्र भी हम तक न पहुंच पाता।
इमाम हुसैन को घर से दूर, मानवीय आबादियों से परे, जंगल में घेरकर मार दिया गया। उस ज़माने में टीवी, अख़बार, या संचार का कोई ऐसा माध्यम न था कि इस घटना की ख़बर किसी और तक भी पहुंच पाती।
इमाम हुसैन जिस वक़्त क़त्ल किए गए वो अपने शहर मदीने से तक़रीबन 1300 किलोमीटर दूर थे जबकि उनकी मंज़िल कूफा के लिए वहां से लगभग सौ किलोमीटर का सफर बाक़ी था। ये उस ज़माने की बात है जब न सड़कें थीं और न टेलीफोन। ऊंट और घोड़ों के सिवा सफर करने का का कोई दूसरा तरीक़ा न था। ऐसे में भला किसको पता चलता कि कर्बला में आख़िर हुआ क्या है ?
हम तक कर्बला का जितना भी ज़िक्र पहुंचा है उसके तीन अहम स्रोत हैं। एक कर्बला में ज़िंदा बच गए हुसैन इब्ने अली के परिवार के बच्चे और औरतें। दूसरा अबु मक़नाफ का मक़तल, और तीसरा हमीद (हुमैद) इब्ने मुस्लिम जैसे यज़ीद के सिपाही जो रोज़नामचा लिख रहे थे। अबु मक़नाफ ने उन लोगों का बताया वर्णन लिखा जो ख़ुद या जिनके परिजन क़त्ले इमाम हुसैन में शामिल थे।
ज़ाहिर है, इमाम हुसैन के परिजनों के अलावा कर्बला के बाक़ी तमाम वर्णन विजेता की ज़बानी हैं। इनमें जीत का दंभ, क़त्ल करने की शेख़ी और ज़ुल्म करने के तरीक़े बयान किए गए हैं। कर्बला के पीड़ितों का तो भी थोड़ा बहुत ज़िक्र हम तक पहुंचा है वो कर्बला में मौजूद इमाम हुसैन की दो बहनों से आया है। कर्बला में ज़िंदा बचे मर्दों में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अली इब्ने हुसैन अल सज्जाद) और इमाम मोहम्मद बाक़िर प्रमुख हैं, लेकिन जंग के वक़्त इमाम ज़ैनुल आबेदीन बीमार थे और इमाम बाक़िर की उम्र तक़रीबन दो से तीन साल थी। ऐसे में इन दोनों ने भी कर्बला के बारे में उतना ही तज़किरा किया है जो उनके परिवार की बची हुई महिलाओं ने उनको बता दिया। इसमें उनके सौतेले भाइयों अली अकबर की मां उम्मे लैला और अली असग़र की मां उम्मे रबाब की रुदाद शामिल हैं।
बहरहाल, कर्बला की जंग में जान क़ुर्बान करने वालों में महिला भी शामिल हैं। इनमें उम्मे वहब बिन्ते अब्दुल्लाह प्रमुख हैं। जब उनके शौहर को यज़ीद के सिपाही घेरकर क़त्ल कर रहे थे तब ये ख़ेमे की क़नात लेकर उनसे भिड़ गईं। इसी बीच किसी दुश्मन सिपाही ने वार किया और वो अपने शौहर के साथ ही शहीद हो गईं। इसी कर्बला के मैदान में वहबे क़लबी अपनी बीवी और मां के साथ पहुंचे थे। वो ईसाई थे और कूफा में किसी सराय में ठहरे हुए थे। उन्होंने सुना कि ये लोग नबी के नवासे को क़त्ल करने पर आमादा हैं तो ग़ैरत जाग गई और कर्बला आ गए। दुश्मन फौज के सालार शिम्र ने वहब के क़त्ल करके उनके सिर इमाम हुसैन की सेना की तरफ उछाल दिया। वहब की मां पीछे लगे ख़ेमों से ये मंज़र देख रही थीं। वो ख़ेमों से निकलकर मक़तल में आ गईं। उन्होंने अपने बेटे का सिर उठाया और वापस शिम्र की तरफ उछाल दिया। उन्होंने कहा कि “जो चीज़ सदक़ा कर दी जाती हैं वापस नहीं ली जातीं।”
शायद ही कोई मां अपने बेटे का कटा सिर देखकर इस तरह का हौंसला दिखा पाए। लेकिन ये कर्बला की मांएं हैं। शबे आशूर इनकी बहादुरी की गवाह है। जब मौत दरवाज़े पर खड़ी थी तो ये माएं अपने बच्चों को जंग की लोरियां सुना रही थीं। अपने बच्चों को समझा रही थीं कि अगली सुबह इमाम हुसैन की नुसरत में कैसे सिर कटाना है। इनमें उम्मे फरवा, उम्मे लैला, रबाब, रमला, और ज़ैनब बिन्ते अली के नाम प्रमुख हैं। कर्बला की जंग के बाद जंग के बाद दुश्मन फौज ने इमाम हुसैन के ख़ेमों में आग लगा दी और उनका तमाम माल-असबाब लूट लिया। चूंकी इमाम ज़ैनुल आबेदीन बीमार थे सो ज़ैनब बिन्ते अली के सिवा कोई ऐसा समझदार न था जो परिवार को संभाले।
हालांकि कर्बला की जंग में ज़ैनब बिन्ते अली ने भाइयों, भतीजों के अलावा अपने दो बेटे औन और मुहम्मद की भी क़ुर्बानी दी थी। दिन भर में सारे परिवार को गंवा देने के सदमे में थीं। लेकिन जब ख़ेमों में आग लगी तो लोगों ने देखा कि एक ख़वातीन है जो आग में से एक जिस्म को ख़ीच कर निकाल रही है। ये ज़ैनब बिन्ते अली थीं जो अपने बीमार भतीजे को आग से बचा कर लाईं। इसके अलावा भी उन्होंने कई बच्चों की जान बचाई। जब दुश्मन चले गए तो ज़ैनब बिन्ते अली ने औरतों और बच्चों को इकट्ठा किया। वही सबको दिलासा दे रही थीं।
अगले रोज़ इमाम हुसैन के साथियों के कटे हुए सिरों और ज़िंदा बच गए परिजनों को क़ैदी बनाकर इब्ने ज़ियाद के सामने कूफा लाया गया। इनमें इमाम ज़ैनुल आबेदीन के अलावा तक़रीबन दो दर्जन औरतें और बच्चे थे। इब्ने ज़ियाद ने इमाम सज्जाद को क़त्ल कराने की कोशिश की। यहां भी ज़ैनब बिन्ते अली उनकी ढाल बनकर खड़ी हो गईं। इसके बाद क़ैदियों को यज़ीद के सामने पेश होने के लिए दमिश्क भेज दिया गया। यह क़ाफिला जहां-जहां रुकता वहां ज़ैनब और उम्मे कुलसूम मौक़ा मिलते ही लोगों को संबोधित करतीं। उन्हें बतातीं कि कर्बला में नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिजनों के साथ हाकिम ने क्या सुलूक़ किया है। इसका लोगों के दिलो दिमाग़ पर गहरा असर हुआ। कुछ ही दिन बाद जगह-जगह बग़ावतें होने लगीं। नबी के नवासे के क़त्ल की ख़बर जैसे-जैसे फैलती गई लोगों में ग़ुस्सा बढ़ता गया।
यज़ीद के दरबार में ज़ैनब बिन्ते अली का ख़ुत्बा तारीख़ का शाहकार है। यज़ीद ने दरबार में मौजूद लोगों से कहा था ये बाग़ी थे, क़त्ल कर दिए गए। उसने कहा कि आज बद्रो हुनैन के उसके शहीद ज़िंदा होते को देखते कि बनु हाशिम से उनकी मौत का उसने क्या ख़ूब बदला लिया है। साथ ही यज़ीद ने दावा किया कि यक़ीनन अल्लाह इज़्ज़त और ज़िल्लत का देने वाला है। उसके दुश्मन ज़ेर हुए और वो कामयाब हुआ।
इस पर अली की बेटी ने मौजूद लोगों से कहा कि "बाग़ी नहीं थे, उस नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दिल के टुकड़े थे जिसके नाम पर ये हुकूमत कर रहा है। यज़ीद से मुख़ातिब होकर उन्होंने कहा कि ये यक़ीनन हमारा इम्तेहान है कि नबी के अज़ीज क़ैद में रहें और आज़ादकर्दा ग़ुलामों के बच्चे उनका मज़ाक़ उड़ाएं। उन्होंने आगे कहा कि हमें इस हाल में पहुंचाकर ये न समझ कि तू कामयाब हुआ। उन्होंने सूरह आले इमरान की 178वीं आयत पढ़कर कहा ख़ुदा गुनहगारों की रस्सी ढीली छोड़ देता है लेकिन उनकी सज़ा मुअइय्यन है।
बहरहाल, ज़ैनब बिन्ते अली के ख़ुत्बों का ही असर था कि यज़ीद कर्बला के बाद तक़रीबन तीन साल भी हुकूमत नहीं कर पाया। पागल होकर मरने से पहले उसके ख़िलाफ जगह-जगह बग़ावत हुईं और अगले कुछ साल में दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ताक़तवर हुकूमत बिखर गई। आज यज़ीद की नस्ल में शायद ही कोई ज़िन्दा हो।
इसी तरह उम्मे कुलसूम बिन्ते अली ने भी कूफा से शाम और शाम से मदीना वापसी के रास्ते में जगह-जगह लोगों को संबोधित किया। उन्हें बताया कि कर्बला में आख़िर हुआ क्या है। जब यह लोग तक़रीबन साल भर बाद घर लौटकर आए तो उन्होंने कर्बला की दास्तान मदीने के बाशिंदो बताई। मदीने में कर्बला की दास्तान सुनाने का दस्तूर बन गया। घर-घर ज़िक्रे हुसैन था। इस ज़िक्र को घर-घर की दास्तान बनाने में उम्मुल बनीन और उम्मुल मौमीनीन उम्मे सलमा का बेहद अहम रोल है। उम्मुल बनीन के चार बेटे अब्बास, जाफर, उसमान और अब्दुल्लाह शामिल थे। लेकिन उनके तब्सरे में हुसैन के ग़म के सिवा किसी ने कुछ न सुना। यक़ीनन ये औरतें न होतीं तो कर्बला की दास्तान इराक़ के बीहड़ों और विजेताओं के रोज़नामचों में दफ्न होकर रह जाती। इन ख़वातीन का अहसान है हमपर कि हम वो सब सुन पाए जिसको उस दौर की हूकूमत बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि कोई सुन पाए।
हालांकि कर्बला में महिलाओं की इस भूमिका पर बहुत सारे लोग हैरत जताते हैं। मगर वो भूल जाते हैं इस्लाम में महिलाओं का हिस्सा न हो तो हर उपलब्धि अधूरी है। ज़ैनब बिन्ते अली की नानी जनाबे ख़दीजा नबी ए करीम ﷺ की सदा पर लब्बैक कहने वाली इस दुनिया की पहली फर्द हैं। ख़दीजा न सिर्फ कलमा पढ़ने वाली पहली मुसलमान हैं बल्कि उनकी दौलत, और उनकी ताक़त को निकाल दें तो शुरुआती दौर में इस्लाम का हाल बस सोचा जा सकता है। जिस दौर में तमाम अहले मक्का मुसलमानों का बहिष्कार कर रहे थे उस काल में हज़रत ख़दीजा ने अपना सबकुछ इस्लाम के नाम कर दिया। इसी तरफ नबी की बेटी फातेमा ज़हरा ख़ुद में हिम्मत, पाकीज़गी, और क़ाबिलियत की मिसाल हैं। ऐसे में अगर अली की बेटियों को फातहे कूफा और शाम कहा जाए तो भला हैरत कैसी ?
कुल मिलाकर कर्बला के सैकड़ों दर्स हैं। उनमें एक यह भी है कि घर की औरतें क़ाबिल हों, हिम्मतवाली हों, और अच्छे-बुरे की तमीज़ रखती हों, और हर हालात का सामना करना जानती हों तो वो आपकी ताक़त हैं। अच्छी निस्वां न सिर्फ घर बनाती हैं बल्कि एक मज़बूत मुआशरे की नींव हैं।
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد ﷺ
-ज़ैद पठान
कर्बला के वह आंकड़े, जो शायद सबको न पता हो
➡ यज़ीद की बैअत से इन्कार से लेकर आशूर तक इमाम हुसैन का आंदोलन 175 दिनों तक चला।
1) - 12 दिन मदीने में
2) - 4 महीने 10 दिन मक्के में
3) - 23 दिन मक्के और कर्बला के रास्ते में
4) - और 8 दिन कर्बला में।
➡ कूफ़े से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को 12000 खत लिखे गये थे।
➡ कूफे में इमाम हुसैन के दूत मुस्लिम बिन अक़ील की बैअत करने वालों की तादाद 18000 या 25000 या 40000 बतायी गयी है।
➡ अबू तालिब की नस्ल से कर्बला में शहीद होने वालों की संख्या 30 है, 17 का नाम "ज़ेयारत नाहिया" में आया है 13 का नहीं।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मदद की वजह से शहीद होने वाले कूफियों की संख्या 138 थी जिनमें से 15 ग़ुलाम थे।
➡ शहादत के वक्त इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की उम्र 57 साल थी।
➡ शहादत के बाद उनके बदन पर भाले के 33 घाव और तलवार के 34 घाव थे। तीरों की संख्या अनगिनत बताया गया है कि शहादत तक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बदन पर कुल 1900 तक घाव थे।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की लाश पर दस घुड़सवारों ने घोड़े दौड़ाए थे।
➡ कूफे से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खिलाफ जंग के लिए कर्बला जाने वाले सिपाहियों की तादाद 33 हज़ार थी। कुछ लोगों ने संख्या और अधिक बतायी है।
➡ दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 10 शहीदों के लिए मर्सिया पढ़ा, उनके बारे में बात की और दुआ की - हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास, हज़रत क़ासिम, अब्दुल्लाह इब्ने हसन, अब्दुल्लाह, मुस्लिम बिन औसजा, हबीब इब्ने मज़ाहिर, हुर बिन यज़ीद रियाही, ज़ुहैर बिन क़ैन और जौन।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला के 7 शहीदों के सिरहाने पैदल और दौड़ते हुए गये - मुस्लिम बिन औसजा, हुर, वासेह रूमी, जौन, हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर और हज़रत क़ासिम।
➡ दसवी मुहर्रम को यज़ीद के सिपाहियों ने तीन शहीदों के सिर काट कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तरफ फेंका - अब्दुल्लाह बिन उमैर कलबी, उमर बिन जनादा, आस बिन अबी शबीब शाकेरी।
➡ दसवी मुहर्रम को 3 लोगों को यज़ीदी सिपाहियों ने टुकड़े - टुकड़े कर दिया - हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास और अब्दुर्रहमान बिन उमैर।
➡ कर्बला के 9 शहीदों की माँओं ने अपनी आंख से अपने बच्चों को शहीद होते देखा।
➡ कर्बला में 5 नाबालिग बच्चों को शहीद किया गया - अब्दुल्लाह इब्ने हुसैन, अब्दुल्लाह बिन हसन, मुहम्मद बिन अबी सईद बिन अकील, कासिम बिन हसन, अम्र बिन जुनादा अन्सारी।
➡ कर्बला में शहीद होने वाले 5 लोग पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबी थे - अनस बिन हर्स काहेली, हबीब इब्ने मज़ाहिर, मुस्लिम बिन औसजा, हानी बिन उरवा और अब्दुल्लाह बिन बक़तर उमैरी।
➡ दसवी मुहर्रम को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के 2 साथियों को गिरफ्तार करने के बाद शहीद किया गया - सवार बिन मुनइम और मौक़े बिन समामा सैदावी।
➡ कर्बला में 4 लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद शहीद किये गये - सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ, सुवैद बिन अबी मुताअ और मुहम्मद बिन अबी सअद बिन अक़ील, सुवैद बिन अबी मुताअ घायल होकर बेहोश हो गये तो, होश आया तो इमाम शहीद हो चुके थे, यह देख कर उन्होंने सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये।
➡ सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ यज़ीदी सिपाही थे, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत देख कर उनसे बर्दाश्त न हुआ और तौबा करके यज़ीदी सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये।
➡ मुहम्मद बिन अबी सअद बच्चे थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद जब बीबियां रोने लगीं तो वह खेमे के दरवाज़े पर खड़े हो गये और एक यज़ीदी सिपाही ने उन्हें शहीद कर दिया।
➡ कर्बला के 7 शहीद अपने बाप के सामने शहीद हुए।
➡ कर्बला में 5 महिलाओं ने खैमों से निकलकर दुश्मनों पर हमला किया और उन्हें बुरा भला कहा।
➡ कर्बला में शहीद होने वाले महिला, अदुल्लाह बिन उमैर कलबी की पत्नी और वहब की मां थीं।
➡ आबिस बिन शबीब, को यज़ीदी सिपाहियों ने पत्थर मार - मार कर शहीद किया।
➡ नाफे बिन हिलाह को कूफियों ने पकड़ लिया और बंदी बनाने के बाद शहीद कर दिया।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हाथों मारे जाने वाले यज़ीदी सिपाहियों की तादाद 1800 से 1950 तक बतायी गयी है।
➡ बनी हाशिम के पहले शहीद हज़रत अली अकबर
➡ सहाबियों में पहले शहीद मुस्लिम बिन औसजा
➡ उबैदुल्लाह हुर जाफी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का पहला ज़ायर कहा जाता है।
➡ पहली बार अब्बासी शासन काल में हारुन रशीद के आदेश पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का निशान मिटा दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई कर दी गयी।
➡ मामून के ज़माने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर उनका रौज़ा बनाया गया।
➡ अब्बासी खलीफा, मुतवक्किल के काल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र और आसपास के घरों को ध्वस्त कर दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई करा दी गयी और फिर नदी का पानी बहा दिया गया लेकिन क़ब्र पर पानी नहीं चढ़ा।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े को तबाह करने की ज़िम्मेदारी, नये नये मुसलमान बने इब्राहीम दीज़ज नाम के यहूदी को दी गयी थी।
➡ बसरा और कूफे के लोगों ने फिर से रौज़ा बनाया लेकिन सन 247 हिजरी में मुतवक्किल ने फिर से रौज़ा ध्वस्त कराके जुताई करा दी, लेकिन उसके बेटे मुन्तसिर के दौर में रौज़ा दोबारा बनाया गया।
लब्बैक या हुसैन
اَلسَّلاَمُ عَلَیکَ یَابنَ رَسُولِ اللّٰہِ ،
اَلسَّلاَمُ عَلَیکُم وَ رَحمَۃُ اللّٰہ وَ بَرَکٰاتُہ أبا عبد الله حسين وأوالديل حسين وأشابيل حسين وأنصار حسين علي الهي السلام
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد ﷺ
अल्लाहुम्मा ला अन क़तलतल हुसैन अलैहिस्सलाम व औलादिल हुसैन अलैहिस्सलाम व असहाबिल हुसैन
➡ कर्बला में 5 महिलाओं ने खैमों से निकलकर दुश्मनों पर हमला किया और उन्हें बुरा भला कहा।
➡ कर्बला में शहीद होने वाले महिला, अदुल्लाह बिन उमैर कलबी की पत्नी और वहब की मां थीं।
➡ आबिस बिन शबीब, को यज़ीदी सिपाहियों ने पत्थर मार - मार कर शहीद किया।
➡ नाफे बिन हिलाह को कूफियों ने पकड़ लिया और बंदी बनाने के बाद शहीद कर दिया।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हाथों मारे जाने वाले यज़ीदी सिपाहियों की तादाद 1800 से 1950 तक बतायी गयी है।
➡ बनी हाशिम के पहले शहीद हज़रत अली अकबर
➡ सहाबियों में पहले शहीद मुस्लिम बिन औसजा
➡ उबैदुल्लाह हुर जाफी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का पहला ज़ायर कहा जाता है।
➡ पहली बार अब्बासी शासन काल में हारुन रशीद के आदेश पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का निशान मिटा दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई कर दी गयी।
➡ मामून के ज़माने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर उनका रौज़ा बनाया गया।
➡ अब्बासी खलीफा, मुतवक्किल के काल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र और आसपास के घरों को ध्वस्त कर दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई करा दी गयी और फिर नदी का पानी बहा दिया गया लेकिन क़ब्र पर पानी नहीं चढ़ा।
➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े को तबाह करने की ज़िम्मेदारी, नये नये मुसलमान बने इब्राहीम दीज़ज नाम के यहूदी को दी गयी थी।
➡ बसरा और कूफे के लोगों ने फिर से रौज़ा बनाया लेकिन सन 247 हिजरी में मुतवक्किल ने फिर से रौज़ा ध्वस्त कराके जुताई करा दी, लेकिन उसके बेटे मुन्तसिर के दौर में रौज़ा दोबारा बनाया गया।
लब्बैक या हुसैन
اَلسَّلاَمُ عَلَیکَ یَابنَ رَسُولِ اللّٰہِ ،
اَلسَّلاَمُ عَلَیکُم وَ رَحمَۃُ اللّٰہ وَ بَرَکٰاتُہ أبا عبد الله حسين وأوالديل حسين وأشابيل حسين وأنصار حسين علي الهي السلام
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد ﷺ
अल्लाहुम्मा ला अन क़तलतल हुसैन अलैहिस्सलाम व औलादिल हुसैन अलैहिस्सलाम व असहाबिल हुसैन
-ज़ैद पठान
अस्सलामु अलैयका या शोहदा-ए-कर्बला
1. जनाबे मुस्लिम बिन औसजा - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी थे।
2. जनाबे अब्दुल्लाह बिन ओमैर कल्बी - हज़रत अली के शिया थे।
3. जनाबे वहब - इन्होंने इस्लाम क़बूल किया था, कर्बला में इमाम हुसैन की नुसरत में शहीद हुए।
4. जनाबे बोरैर इब्ने खोज़ैर हमदानी - हज़रत अली के शिया थे।
5. मन्जह इब्ने सहम - इमाम हुसैन की कनीज़ हुसैनिया के बत्न से थे।
6. उमर बिन ख़ालिद - कूफ़ा के रहने वाले और सच्चे मोहिब्बे अहलेबैत थे।
7. यज़ीद बिन ज़ेयाद अबू शाताए किन्दी - कूफ़ा के रहने वाले थे।
8. मजमा इब्ने अब्दुल्ला मज़जही - अली के शिया थे, यह जंगे सिफ़्फीन में भी शरीक थे।
9. जनादा बिन हारिसे सलमानी - कूफ़ा के मशहूर शिया थे, यह हज़रते मुस्लिम के साथ जेहाद में भी शरीक थे।
9. जनादा बिन हारिसे सलमानी - कूफ़ा के मशहूर शिया थे, यह हज़रते मुस्लिम के साथ जेहाद में भी शरीक थे।
10. जन्दब बिन हजर किन्दी - कूफ़ा के मश्हूर शिया व हज़रत अली के शिया थे।
11. ओमय्या बिन साद ताई – हज़रत अली के शिया थे।
12. जब्ला बिन अली शैबानी - कूफ़ा के बाशिन्दे और हज़रत अली के शिया थे, करबला में हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
12. जब्ला बिन अली शैबानी - कूफ़ा के बाशिन्दे और हज़रत अली के शिया थे, करबला में हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
13. जनादा बिन क़ाब बिन हारिस अंसारी ख़ज़रजी - मक्का से अपने कुन्बे के साथ करबला आए और हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
14. हारिस बिन इमरउल क़ैस किन्दी - करबला में उमरे साद की फ़ौज के साथ आए थे लेकिन इमाम हुसैन के साथ शामिल होकर शहीद हुए।
15. हारिस बिन नैहान - हज़रते हमज़ा के ग़ुलाम नैहान के बेटे और हज़रते अली के शिया थे।
16. हब्शा बिन क़ैस नहमी - आलिमे दीन थे, हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
17. हल्लास बिन अम्रे अज़्दी - हज़रत अली के शिया थे।
18. ज़ाहिर बिन अम्रे सल्मी किन्दी - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी और हदीस के रावी थे।
19. स्वार बिन अबी ओमेर नहमी - हदीस के रावी थे, हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
20. शबीब बिन अब्दुल्लाह - हारिस बिन सोरैय के ग़ुलाम थे, हज़रत अली के शिया और रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी थे।
21. शबीब बिन अब्दुल्लाह नहशली - हज़रत अली के शिया थे।
22. अब्दुर्रहमान बिन अब्दे रब अन्सारी ख़ज़रजी - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी थे।
17. हल्लास बिन अम्रे अज़्दी - हज़रत अली के शिया थे।
18. ज़ाहिर बिन अम्रे सल्मी किन्दी - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी और हदीस के रावी थे।
19. स्वार बिन अबी ओमेर नहमी - हदीस के रावी थे, हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
20. शबीब बिन अब्दुल्लाह - हारिस बिन सोरैय के ग़ुलाम थे, हज़रत अली के शिया और रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी थे।
21. शबीब बिन अब्दुल्लाह नहशली - हज़रत अली के शिया थे।
22. अब्दुर्रहमान बिन अब्दे रब अन्सारी ख़ज़रजी - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबी थे।
23. अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल्लाह बिन कदन अरहबी - जनाबे मुस्लिम के साथ कूफ़ा पहुँचे किसी तरह बचकर करबला पहुँचे और हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
24. अम्मार बिन अबी सलामा दालानी - रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हज़रत अली के साथ भी शरीक थे। कर्बला में हमल-ए-ऊला में शहीद हुए।
25. क़ासित बिन ज़ोहैर तग़लबी - यह और इनके दो भाई हज़रत अली के शिया थे।
26. कुरदूस बिन ज़ोहैर बिन हारिस तग़लबी - क़ासित इब्ने ज़ोहैर के भाई और हज़रत अली के शिया थे।
27. मसऊद बिन हज्जाज तैमी - उमरे साद की फ़ौज में शामिल होकर कर्बला पहुँचे लेकिन इमाम हुसैन की नुसरत में शहीद हुए।
27. मसऊद बिन हज्जाज तैमी - उमरे साद की फ़ौज में शामिल होकर कर्बला पहुँचे लेकिन इमाम हुसैन की नुसरत में शहीद हुए।
28. मुस्लिम बिन कसीर सदफ़ी अज़्दी - जंगे जमल में हज़रत अली के साथ थे, कर्बला में हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
29. मुस्कित बिन ज़ोहैर तग़लबी - कर्बला में हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
30. कनाना बिन अतीक़ तग़लबी - कर्बला में हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
31. नोमान बिन अम्रे अज़दी - हज़रत अली के शिया थे, हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
31. नोमान बिन अम्रे अज़दी - हज़रत अली के शिया थे, हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
32. नईम बिन अजलान अन्सारी - हमला-ए-ऊला में शहीद हुए।
33. अम्र बिन जनादा बिन काब ख़ज़रजी - कर्बला में बाप की शहादत के बाद माँ के हुक्म से शहीद हुए।
34. हबीब इब्ने मज़ाहिर असदी - हज़रत रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमके सहाबी, हज़रत अली, हज़रत इमामे हसन के शिया थे, इमामे हुसैन के बचपन के दोस्त थे और कर्बला में शहीद हुए।
35. मोसय्यब बिन यज़ीद रेयाही - हज़रत हुर के भाई थे।
36. हुज़्र बिन हुर यज़ीद रेयाही - जनाबे हुर के बेटे थे।
37. जनाबे हुर बिन यज़ीद रेयाही - यज़ीदी फ़ौज के सरदार थे, बाद में इमामे हुसैन की ख़िदमत में हाज़िर होकर शहादत का शरफ़ हासिल किया।
33. अम्र बिन जनादा बिन काब ख़ज़रजी - कर्बला में बाप की शहादत के बाद माँ के हुक्म से शहीद हुए।
34. हबीब इब्ने मज़ाहिर असदी - हज़रत रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमके सहाबी, हज़रत अली, हज़रत इमामे हसन के शिया थे, इमामे हुसैन के बचपन के दोस्त थे और कर्बला में शहीद हुए।
35. मोसय्यब बिन यज़ीद रेयाही - हज़रत हुर के भाई थे।
36. हुज़्र बिन हुर यज़ीद रेयाही - जनाबे हुर के बेटे थे।
37. जनाबे हुर बिन यज़ीद रेयाही - यज़ीदी फ़ौज के सरदार थे, बाद में इमामे हुसैन की ख़िदमत में हाज़िर होकर शहादत का शरफ़ हासिल किया।
38. अबू समामा सायदी - आशूर के दिन नमाज़े ज़ोहर के एहतेमाम में दुश्मनों के तीर से शहीद हुए।
39. सईद बिन अब्दुल्लाह हनफ़ी - ये भी नमाज़े ज़ोहर एहतेमाम में दुश्मनों के तीर से शहीद हुए।
40. ज़ोहैर बिन क़ैन बोजिल्ली - ये भी नमाज़ ज़ोहर में ज़ख़्मी होकर जंग में शहीद हुए।
41. उमर बिन करज़ाह बिन काब अंसारी - ये भी नमाज़े ज़ोहर में शहीद हुए।
40. ज़ोहैर बिन क़ैन बोजिल्ली - ये भी नमाज़ ज़ोहर में ज़ख़्मी होकर जंग में शहीद हुए।
41. उमर बिन करज़ाह बिन काब अंसारी - ये भी नमाज़े ज़ोहर में शहीद हुए।
42. नाफ़े बिन हेलाल हम्बली - नमाज़े ज़ोहर की हिफ़ाज़त में जंग की और बाद में शिम्र के हाथों शहीद हुए।
43. शौज़ब बिन अब्दुल्लाह - मुस्लिम इब्ने अक़ील का ख़त लेकर कर्बला पहुंचे और शहीद हुए।
44. आबिस बिन अबी शबीब शकरी - हज़रत इमाम अली के शिया थे, रोज़े आशूरा कर्बला में शहीद हुए।
45. हन्ज़ला बिन असअद शबामी - रोज़े आशूर ज़ोहर के बाद जंग की और शहीद हुए।
46. जौन ग़ुलामे अबूज़र ग़ेफ़ारी - हब्शी थे, हज़रत अबूज़र ग़ेफ़ारी के ग़ुलाम थे।
47. ग़ुलामे तुर्की - हज़रत इमामे हुसैन के ग़ुलाम थे, इमाम ने अपने फ़रज़न्द हज़रत इमामे ज़ैनुल आब्दीन के नाम हिबा कर दिया था।
48. अनस बिन हारिस असदी - बहुत बूढ़े थे, बड़े एहतेमाम के साथ शहादत नोश फ़रमाई।
49. हज्जाज बिन मसरूक़ जाफ़ी - मक्के से साथ हुए और वहीं से मोअज़्ज़िन का फ़र्ज़ अंजाम दिया।
50. ज़ेयाद बिन ओरैब हमदानी - इनके वालिद हज़रत रसूल अकरम ﷺ के सहाबी थे।
51. अम्र बिन जन्दब हज़मी - हज़रत अली के शिया थे।
52. साद बिन हारिस - हज़रत अली ग़ुलाम थे।
53. यज़ीद बिन मग़फल - हज़रत अली के शिया थे।
54. सोवैद बिन अम्र ख़सअमी - बूढ़े थे, कर्बला में इमाम हुसैन के तमाम सहाबियों में सबसे आख़िर में जंग में ज़ख्मी हुए थे। होश में आने पर इमाम हुसैन की शहादत की ख़बर सुनकर फिर जंग की और शहीद हुए।
बनी हाशिम यानी आले अबू तालिब के शोहदा
1. हज़रत अब्दुल्लाह - जनाबे मुस्लिम के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
2. हज़रत मोहम्मद - जनाबे मुस्लिम के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
3. हज़रत जाफ़र - हज़रत अक़ील के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
4. हज़रत अब्दुर्रहमान - हज़रत अक़ील के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
5. हज़रत मोहम्मद - हज़रत अक़ील के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
6. हज़रत मोहम्मद - अब्दुल्ला के बेटे, जाफ़र के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
7. हज़रत औन - अब्दुल्ला के बेटे जाफ़र के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
8. जनाबे क़ासिम - हज़रत इमाम हसन के बेटे, हज़रत इमाम अली के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
9. हज़रत अबू बक्र - हज़रत इमामे हसन के बेटे, हज़रत इमामे अली के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
10. हज़रत मोहम्मद - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
11. हज़रत अब्दुल्ला - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
12. हज़रत उसमान - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
13. हज़रत जाफ़र - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
14. हज़रत अब्बास - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
15. हज़रत अली अकबर - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
16. हज़रत अब्दुल्लाह - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
17. हज़रत अली असग़र - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
18. हज़रत इमामे हुसैन- हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
49. हज्जाज बिन मसरूक़ जाफ़ी - मक्के से साथ हुए और वहीं से मोअज़्ज़िन का फ़र्ज़ अंजाम दिया।
50. ज़ेयाद बिन ओरैब हमदानी - इनके वालिद हज़रत रसूल अकरम ﷺ के सहाबी थे।
51. अम्र बिन जन्दब हज़मी - हज़रत अली के शिया थे।
52. साद बिन हारिस - हज़रत अली ग़ुलाम थे।
53. यज़ीद बिन मग़फल - हज़रत अली के शिया थे।
54. सोवैद बिन अम्र ख़सअमी - बूढ़े थे, कर्बला में इमाम हुसैन के तमाम सहाबियों में सबसे आख़िर में जंग में ज़ख्मी हुए थे। होश में आने पर इमाम हुसैन की शहादत की ख़बर सुनकर फिर जंग की और शहीद हुए।
बनी हाशिम यानी आले अबू तालिब के शोहदा
1. हज़रत अब्दुल्लाह - जनाबे मुस्लिम के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
2. हज़रत मोहम्मद - जनाबे मुस्लिम के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
3. हज़रत जाफ़र - हज़रत अक़ील के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
4. हज़रत अब्दुर्रहमान - हज़रत अक़ील के बेटे और जनाबे अबू तालिब के पोते।
5. हज़रत मोहम्मद - हज़रत अक़ील के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
6. हज़रत मोहम्मद - अब्दुल्ला के बेटे, जाफ़र के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
7. हज़रत औन - अब्दुल्ला के बेटे जाफ़र के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
8. जनाबे क़ासिम - हज़रत इमाम हसन के बेटे, हज़रत इमाम अली के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
9. हज़रत अबू बक्र - हज़रत इमामे हसन के बेटे, हज़रत इमामे अली के पोते और जनाबे अबू तालिब के पर पोते।
10. हज़रत मोहम्मद - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
11. हज़रत अब्दुल्ला - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
12. हज़रत उसमान - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
13. हज़रत जाफ़र - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
14. हज़रत अब्बास - हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
15. हज़रत अली अकबर - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
16. हज़रत अब्दुल्लाह - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
17. हज़रत अली असग़र - हज़रत इमामे हुसैन के बेटे और हज़रत इमामे अली के पोते।
18. हज़रत इमामे हुसैन- हज़रत इमामे अली के बेटे और जनाबे अबु तालिब के पोते।
-ज़ैद पठान
ज़ैद पठान
• यज़ीद इब्ने माविया इब्ने अबु सूफियान। मां मैसून इब्ने बहदल सीरिया के कल्ब बद्दू क़बीले से थी और ईसाई थी। (H.U. Rahman, A Chronology Of Islamic History 570-1000 CE (1999), p. 72)। इसका दादा अबू सूफियान नबी ए करीम ﷺ ने ख़िलाफ उहद और ख़ंदक की लड़ाई में मुशरिकों का सरदार जिसने फतह मक्का के वक़्त माफी मांगी (Donner, Fred M. (1981). The Early Islamic Conquests )। दादी हिंदा ने उहद की जंग में नबी सअ के चचा हज़रत हमज़ा का कलेजा चबाया (Ibn Ishaq/Guillaume p. 371.), और उनके नाक कान काट कर अपने गले में हार बना कर पहन लिए।(Ibn Ishaq/Guillaume p. 375. -- The Life of Muhammad, Oxford University Press, 1955
• मरवान इब्ने हाकम इब्ने अबु अल आस इब्ने उमैया। (Kennedy, Hugh N. (2016). The Prophet and the Age of the Caliphates: The Islamic Near East from the 6th to the 11th Century (Third ed.). Oxford and New York: Routledge.) हज़रत उस्मान रअ के दौरे ख़िलाफत में उनका प्रमुख सलाहकार और मदीना का गवर्नर रहा।(Kennedy 2016, p. 79.) कर्बला के तीन साल बाद यानि 64 हिजरी में उमया वंश का चौथा ख़लीफा बना। हालांकि रसूल ए अकरम ﷺ ने मरवान और हाकम को तड़ीपार किया था। हज़रत उस्मान रअ के ज़माने में माफी मांगकर मदीने वापस लौटा। मदीना से इमाम हुसैन से यज़ीद बैयत लेने के लिए तत्कालीन गवर्नर वलीद इब्ने उत्बा पर दबाव बनाया। (Ibn Qutayba al-Dīnawarī, al-Imāma wa l-sīyāsa, vol. 1, p. 227.)
• वलीद इब्ने उत्बा इब्ने राबिया। इसकी बहन हिंद बिंते उत्बा अबु सूफियान की पत्नी और माविया की मां थी। 61 हिजरी में मदीना में यज़ीद का गवर्नर।(The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume III: H–Iram. Leiden: E. J. Brill. pp. 607–615.) इमाम हुसैन अस से मदीना में बैयत लेने की ज़िम्मेदारी दी गई लेकिन कामयाब न हो पाया।( The History of al-Ṭabarī, Volume 19: The Caliphate of Yazīd ibn Muʿāwiyah, A.D. 680–683/A.H. 60–64)
• उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान ( चूकि ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान और मरजाना की आधिकारिक शादी नहीं हुई थी इसलिए अक्सर मां के नाम से से यानि उबैदुल्लाह इब्ने मरजाना के तौर पर भी पहचाना जाता है)।(Robinson, C. F. (2000). "ʿUbayd Allāh b. Ziyād". In Bearman, P. J.; Bianquis, Th.; Bosworth, C. E.; van Donzel, E. & Heinrichs, W. P. (eds.). The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume X: T–U. Leiden: E. J. Brill. pp. 763–764.)
इब्ने ज़ियाद बसरा, कूफा और ख़ुरासान प्रांत का गवर्नर रहा। कर्बला की जंग के वक़्त कूफा प्रांत का गवर्नर था और यज़ीद के दिशानिर्देश लागू कराने के लिए ज़िम्मेदार था। कूफा में इमाम हुसैन के चचेरे भाई मुस्लिम इब्ने अक़ील और उनके दो बच्चों की हत्या कराई। उमर इब्ने साद को फरमान भेजकर कहा कि हुसैन या उनके बच्चों तक पानी की एक बूंद न पहुंचने पाए (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 334)
• अम्र या उमर इब्ने साद इब्ने अब्द वक़ास- कर्बला में यजीद की फौज का कमांडर। इमाम हुसैन पर पहला तीर चलाने वाला। कूफे का निवासी और नबी ए करीम ﷺ के प्रमुख सहाबी रहे साद इब्ने अब्द वक़ास का बेटा। जनाब साद इब्ने अब्द वक़ास का नाम अशरा मुबश्शेरा के दस लोगों में है। इनकी मां हामना अबू सूफियान की बेटी थीं। (Short Biography of the Prophet & His Ten Companions. Darussalam. 2004. p. 80.)
• शिम्र इब्ने ज़िलजौशन अबु सबीग़ा अज़ ज़बयानी- कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का सालार। आख़िरी वक़्त में इमाम हुसैन का सिर क़लम किया। ख़ेमों में आग लगाने और लूटपाट करने वालों में प्रमुख। बनु क़ल्ब क़बीले का था। इब्ने ज़ियाद के लश्कर में शामिल होने से पहले ख़ारजी रहा है। हज़रत हुज्र बिन अदी की गिरफ्तारी के बाद उनके ख़िलाफ गवाही देने वालों में था। इसके बाप शूराहबिल बिन आवर बिन अम्र उन लोगों में थे जिन्होंने फतह-मक्का के वक़्त नबी ए करीम ﷺ के सामने इस्लाम क़बूल किया।
• हुसैन इब्ने नुमैर या हसीन इब्ने नमीर अल सकुनी- किंदा क़बीले का इब्ने नुमैर सिफ्फीन की जंग में माविया की फौज में लड़ा। कूफे में रहता था और कर्बला में इब्ने ज़ियादा ने 4 हज़ार सिपाहियों की कमान देकर भेजा।(Lammens & Cremonesi, "Al-Ḥuṣayn ibn Numayr", (1971), pp. 620–621) जनाबे हुर इब्ने नमीर के लश्कर में थे और आशूरा के दिन इमाम हुसैन के साथ आ गए। कर्बला के बाद इब्ने ज़ुबैर की बग़ावत कुचलने के लिए मक्का और मदीना भेजे गए लश्कर में था। (Tarikh-e-Tabari, circa 63 A.H.) ) कमांडर की मौत के बाद लश्कर का सिपाहसालार हुआ। यहां ख़ाना ए काबा में आग लगाने और मस्जिदे नबवी में घोड़ा बंधवाने के अलावा लूटपाट और अस्मतज़नी का भी गुनहगार है((Murooj-uz-Zahab of Masoodi,Vol 2, Pg 70))। सहाबी ए रसूल ﷺ है और इससे मंसूब कई हदीस सही बुखारी, तिरमिज़ी, सनान अबु दाउद और इब्ने नसाई में शामिल की गई हैं।
• मुहम्मद बिन अशत बिन क़ैस- अशत बिन क़ैस अल किंदी का बेटा और हज़रत अबु बक्र रअ का सगा भांजा। इमाम हसन अस को ज़हर देने वाली उनकी पत्नी जुदा इब्ने अशत का भाई। कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का प्रमुख। कूफा का निवासी। कई हदीसों का रावी। हज़रत उमर रअ, हज़रत उस्मान रअ, इब्ने मसूद और उम्मुल मौमिनीन आयशा रअ की हदीस इससे मंसूब हैं (Hayatul Haiwan, Vol. 2, Pg. 48)। इसका भाई मुहम्मद बिन अशत इमाम हुसैन अस को ख़त भेजने वालों और हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील को गिरफ्तार करने वालों में शामिल।
• शबत इब्ने रबी बिन हुसैन अल तिमीमी अल यरबु- हज़रत उस्मान रअ के क़त्ल में शरीक। बाद में ख़ारिजियों के लश्कर में शामिल फिर माविया की फौज में सिपहसालार। कूफे का निवासी और इमाम हुसैन अस को ख़त लिखने वालों में शामिल। हज़रत हुज्र बिन अदी के ख़िलाफ गवाही देने वालों में नाम। सहाबिए रसूल अस। अबु दाउद और इमान नसाई ने इससे मंसूब कई हदीस अपने सनान में शामिल की हैं।
• समरा इब्ने जुंदाब- सहाबिए रसूल सअ, और समरा का गवर्नर रहा और इब्ने ज़ियाद की सिविल पुलिस का प्रभारी ( Abu'l-ʿAbbas Ahmad b. Jabir al-Baladhuri, KITAB FUTUH AL-BULDAN transl. Francis Clark Murgotten (1924)। इब्ने ज़ियाद ने कूफा से लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए लोगों को भेजने की ज़िम्मेदारी समरा इब्ने जुंदाब को दी।(Waṣâyâ al-ʿUlamâ’ (Beirut: Dâr Ibn Kathîr, 1985)) कई सही हदीसों का रावी है (Al-Isti`ab fi ma`rifat al-ashab (Cairo: Maktabah Nahdah, 1960), v.1, 197; )
• काब इब्ने जाबिर इब्ने मलिक। कूफा निवासी। इसके पिता जाबिर इब्ने मलिक नबी ﷺ के प्रमुख सहाबियों में शुमार। काब माविया इब्ने अबु सूफियान के क़रीबियों में शामिल रहा और कर्बला में उमर इब्ने साद के लश्कर में था। जंग में हज़रत बुरैर इब्ने ख़ुज़ैर का क़ातिल (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 247-248)।
• मुज़ाहिम इब्ने हारिस। कूफा का निवासी। जंग में नाफे इब्ने हिलाल जमाली का क़ातिल 9 (Tarikh-e-Tabari vol 6, p 229)। हज़रत उस्मान रअ का पूर्व सैनिक।
• अम्र बिन हज्जाज अल ज़ुबैदी- कूफा से इमाम हुसैन को ख़त लिखने वालों में शामिल। उमर इब्ने साद के लश्कर में दाईं कमान का प्रभारी। 7 मुहर्रम को 500 सिपाहियों के साथ फरात पर पहरेदारी के लिए नियुक्त। 10 मुहर्रम को लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए बार-बार ललकार रहा था। (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 249)। सहाबिए रसूल सअ। कर्बला से इमाम हुसैन के सहाबियों का सिर नेज़ों पर ले जाने वालों में शामिल।
अल्लाहुम्मा ला अन क़तलतल हुसैन अलैहिस्सलाम व औलादिल हुसैन अलैहिस्सलाम व असहाबिल हुसैन अलैहिस्सलाम






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