मुहब्बत से महकते ख़त
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ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर
रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास
ह...
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते.
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.
अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.
दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं.
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.
एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.
ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से प्रसिद्ध डॉ फ़िरदौस ख़ान ने फ़हम अल क़ुरआन लिखा हैं. क़ुरआन आसमानी किताब है, जिसे अल्लाह ने हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम के ज़रिये अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल किया था.
फ़िरदौस ख़ान बताती हैं कि जब किसी महफ़िल में क़ुरआन का ज़िक्र होता था और बात तर्जुमे की होती थी, तो यही बात सामने आती थी कि तर्जुमा समझ में नहीं आता. बहुत से लोगों से ख़ासकर महिलाओं से बात हुई तो अमूमन सबका यह कहना था कि क़ुरआन को तो आलिम ही समझ सकते हैं. ये आम लोगों के समझने की किताब नहीं है. हम तो इतना ही जानते हैं, जितना मौलाना बता देते हैं. तब हमने सोचा कि क्यों न हम फ़हम अल क़ुरआन लिखें. फ़हम अल क़ुरआन का मतलब है ऐसा क़ुरआन, जो आसानी से एक आम इंसान की समझ में आ जाए. हमने क़ुरआन के कई तर्जुमे देखे. हमने क़ुरआन का उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी का तर्जुमा देखा. सबने अपने-अपने हिसाब से तर्जुमा किया हुआ है. ये क़ुरआन का मौजज़ा है कि आप इसे जितनी बार पढ़ो, एक नई बात समझ में आती है.
दरअसल क़ुरआन शरीफ़ में कई बातें कम शब्दों में कहीं गई हैं, उन्हें मुकम्मल तौर पर समझने के लिए हदीसों को पढ़ना ज़रूरी है. हम क़ुरआन का ऐसा तर्जुमा करना चाहते थे, जिसे पढ़कर लोग आसानी से आयत का मफ़हूम यानी आशय समझ सकें. इसके लिए क़ुरआन को समझना ज़रूरी था. हमने अरबी भाषा सीखी और क़ुरआन के एक-एक लफ़्ज़ को समझा और उनसे मुताल्लिक़ हदीसों का अध्ययन किया. ये कोई आसान काम नहीं था. एक-एक लफ़्ज़ पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करनी थी. सारी तवज्जो इसी बात पर होती थी कि कहीं ज़रा सी भी चूक न हो जाए. कई बार हिम्मत ने जवाब दिया. फिर सोचा कि जिस मौला ने इस अज़ीम और मुक़द्दस काम को करने की हिदायत दी है, वही इसे मुकम्मल भी कराएगा. ये हमारा यक़ीन था अपने पाक परवरदिगार पर. फिर अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की मेहर थी कि ये मुक़द्दस काम मुकम्मल हो गया.
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. हमें उम्मीद है ये फ़हम अल क़ुरआन रहती दुनिया तक लोगों को अल्लाह के पैग़ाम से रूबरू कराएगा.
फ़िरदौस ख़ान कहती हैं कि हमारी ज़िन्दगी का मक़सद ख़ुदा की रज़ा हासिल करना है. हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है. कायनात की फ़ानी चीज़ों में हमें न पहले कभी दिलचस्पी थी और न आज है और कभी होगी. फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की. बचपन से ही हमारी दिलचस्पी इबादत और रूहानी इल्म हासिल करने में ही रही. वे कहती हैं कि इस अज़ीम काम को करते वक़्त पापा सत्तार अहमद ख़ान बहुत याद आते थे. बचपन में पापा क़ुरआन करीम के बारे में हमें बताया करते थे. वे कहा करते थे कि क़ुरआन एक मुकम्मल पाक किताब है. ये हिदायत भी है और शिफ़ा भी. इस क़ुरआन के ज़रिये अल्लाह ने हमारी अम्मी ख़ुशनूदी उर्फ़ चांदनी ख़ान की भी एक तमन्ना पूरी करवा दी. वे अकसर हमसे कहा करती थीं कि कोई ऐसी किताब लिखो, जिसे पढ़ते हुए उम्र बीत जाए और दिल न भरे.
फ़िरदौस ख़ान शायरा, लेखिका और पत्रकार हैं। वे रूहानियत में यक़ीन रखती हैं. वे सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं. उन्होंने सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर आधारित एक किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है. वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान को अपना पहला मुर्शिद और अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना दूसरा मुर्शिद मानती हैं. वे उर्दू, हिन्दी, इंग्लिश और पंजाबी में लिखती हैं. उन्होंने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दी हैं. उन्होंने अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का संपादन भी किया. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनलों के लिए भी काम किया है. वे देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फ़ीचर्स एजेंसी के लिए लिखती हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. वे मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली. वे मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी संपादक रही हैं और मासिक वंचित जनता में संपादकीय सलाहकार भी रही हैं. फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं.
अपने बारे में वे कहती है-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…
ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.
कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.
एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
मानव सभ्यता में रंगों का काफ़ी महत्व रहा है. हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया. दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है. कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया. विक्टोरियन काल में ज़्यादातर लोग काला या स्लेटी रंग इस्तेमाल करते थे. एक तरह से ये रंग इनकी पहचान थे. फ़िरऔन हमेशा काले कपड़े पहनता था. वैसे भी हर रंग के अपने सकारात्मक और नकारात्मक असर होते हैं. इसलिए यह नहीं कर सकते कि काला रंग हमेशा बुरा ही होता है. हालांकि कई सभ्यताओं में इसे शोक का रंग माना जाता है. शिया मोहर्रम के दिनों में ज़्यादातर काले कपड़े ही पहनते हैं. विरोध जताने के लिए भी काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे काले झंडे दिखाना, सर पर काला कपड़ा या काली पट्टी बांध लेना. ऐसा इस्लामी देशों में ज़्यादा होता है, लेकिन अब भारत में भी इस तरह विरोध जताया जाने लगा है, विशेषकर बाबरी मस्जिद की शहादत की बरसी यानी छह दिसंबर को मुस्लिम समुदाय के लोग काली पट्टी बांधकर ही अपना विरोध ज़ाहिर करते हैं.
महान दार्शनिक अरस्तु ने 4 ईसा पूर्व में नीले और पीले रंगों की गिनती शुरुआती रंगों में की. उन्होंने इसकी तुलना प्राकृतिक वस्तुओं से की, जैसे सूरज-चांद और दिन-रात आदि. उस वक़्त ज़्यादातर कलाकारों ने उनके सिद्धांत को माना और तक़रीबन दो हज़ार साल तक इसका असर देखने को मिला. इसी बीच मेडिकल प्रेक्टि्स के पितामाह कहे जाने वाले 11वीं शताब्दी के ईरान के चिकित्सा विशेषज्ञ हिप्पोकेट्स ने अरस्तु के सिद्धांत से अलग एक नया सिद्धांत पेश किया. उन्होंने रंगों का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया और इसे इलाज के लिए बेहतर ज़रिया क़रार दिया. उनका मानना था कि सफ़ेद फूल और वॉयलेट फूल के अलग-अलग असर होते हैं. उन्होंने एक और सिद्धांत दिया, जिसके मुताबिक़ हर व्यक्ति की त्वचा के रंग से भी उसकी बीमारी का पता लगाया जा सकता है और रंगों के ज़रिये ही इसका इलाज भी मुमकिन है. उन्होंने इसका ख़ूब इस्तेमाल भी किया.
15वीं शताब्दी में स्विट्जरलैंड के चिकित्सक वॉन होहेनहैम ने ह्यूमन स्टडी पर काफ़ी शोध किया, लेकिन उनके तरीक़े हमेशा विवादों में रहे. उन्होंने ज़ख्म भरने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया. 17-18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धांत ने अरस्तु के विशेष रंगों को सामान्य रंगों में बदल दिया. 1672 में न्यूटन ने रंगों पर अपना पहला परचा पेश किया. यह काफ़ी विवादों में रहा, क्योंकि अरस्तु के सिद्धांत के बाद इसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं था. रंगों के विज्ञान पर काम करने वाले लोगों में जॉन्स वॉल्फगैंग वॉन गौथे भी शामिल थे. उन्होंने न्यूटन के सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हुए थ्योरी ऑफ कलर पेश की. उनके सिद्धांत अरस्तु की थ्योरी से मिलते जुलते थे. उन्होंने कहा कि अंधेरे में से सबसे पहले नीला रंग निकलता है, वहीं सुबह के उगते हुए सूरज की किरणों से पीला रंग सामने आता है. नीला रंग गहरे रंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पीला रंग हल्के रंगों का. 19वीं शताब्दी में कलर थैरेपी का असर कम हुआ, लेकिन इसके बाद 20वीं शताब्दी में यह नए रूप में सामने आया. आज भी कई चिकित्सक कलर थैरेपी को इलाज का अच्छा ज़रिया मानते हैं और इससे अनेक बीमारियों का उपचार भी करते हैं. आयुर्वेद चिकित्सा में भी रंगों का विशेष महत्व है. रंग चिकित्सा के मुताबिक़ शरीर में रंगों के असंतुलन के कारण ही बीमारियां पैदा होती हैं. रंगों का समायोजन ठीक करके बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है. ऑस्टवाल्ड ने आठ आदर्श रंगों को विशेष क्रम में संयोजित किया. इस चक्र को ऑस्टवाल्ड वर्ण कहा जाता है. इसमें पीला, नारंगी, लाल, बैंगनी, नीला, आसमानी, समुद्री हरा और हरा रंग शामिल है. 60 के दशक में एंथ्रोपॉलिजिस्ट्स केन ने रंगों पर अध्ययन किया. उनके मुताबिक़ सभी सभ्यताओं ने रंगों को दो वर्गों में बांटा-पहला हल्के रंग और दूसरा गहरे रंग.
कौन-सा रंग क्या कहता है?
मूल रूप से इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है. ये सात रंग हैं लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैंगनी. लाल रंग को रक्त रंग भी कहते हैं, क्योंकि ख़ून का रंग लाल होता है. यह शक्ति का प्रतीक है, जो जीने की इच्छाशक्ति और अभिलाषा को बढ़ाता है. यह प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो क्यान रंग का संपूरक है. यह रंग क्रोध और हिंसा को भी दर्शाता है. हरा रंग प्रकृति से जुड़ा है. यह ख़ुशहाली का प्रतीक है. हमारे जीवन में इसका बहुत महत्व है. यह प्राथमिक रंग है. हरे रंग में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, सोडियम, कैल्शियम, निकिल आदि होते हैं. इस्लाम में इसे पवित्र रंग माना जाता है. नीला रंग आसमान का रंग है. यह विशालता का प्रतीक है. भारत का क्रीड़ा रंग भी नीला ही है. यह धर्मनिरपेक्षता का भी प्रतीक है. यह एक संयोजी प्राथमिक रंग है. इसका संपूरक रंग पीला है. गहरा नीला रंग अवसाद और निराशा को भी प्रकट करता है. पीला रंग ख़ुशी और रंगीन मिज़ाजी को दर्शाता है. यह आत्मविश्वास बढ़ाता है. यह वैराग्य से भी संबंधित है. हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है. विष्णु और कृष्ण को यह रंग प्रिय है. बसंत पंचमी तो इसी रंग से जुड़ा पर्व है. डल पीला रंग ईर्ष्या को दर्शाता है. स़फेद रंग पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है. यह शांति और सुरक्षा का भाव पैदा करता है. यह अकेलेपन को भी प्रकट करता है. काला रंग रहस्य का प्रतीक है. यह बदलाव से रोकता है. यह नकारात्मकता को भी दर्शाता है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.
जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.
सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है. इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए. इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.
गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.
सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है. बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारम्परिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं. उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 100 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अनेक राज्य इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा. स्थानीय जलवायु के अनुकूल इसकी नई क़िस्में तैयार की जा रही हैं.
आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारम्परिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती. सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.
डॉ फ़िरदौस ख़ान
रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं. भाई भी अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं.
रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.
विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.
रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.
आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है. रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है. आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है. वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है. दरअसल, व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं.
यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं. अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही. रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा. देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है. इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है. डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है. शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं. गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं. देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं. हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की. रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा. इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं. कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं. सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों के रूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं. यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है. बाज़ार में रंग-बिरंगे काग़ज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है.
कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा. पहले संयुक्त परिवार होते थे. सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाक़ों में बसना पड़ता है. इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं. ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं. महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है. ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी. बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है, तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं. आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.
रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.
विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.
रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.
आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है. रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है. आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है. वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है. दरअसल, व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं.
यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं. अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही. रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा. देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है. इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है. डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है. शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं. गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं. इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं. देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं. हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की. रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा. इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं. कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं. सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों के रूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं. यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है. बाज़ार में रंग-बिरंगे काग़ज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है.
कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा. पहले संयुक्त परिवार होते थे. सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाक़ों में बसना पड़ता है. इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं. ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं. महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है. ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी. बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है, तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं. आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.
"मुहम्मद रफ़ी साहब इतने अच्छे इंसान थे कि क्या कहना.. वो कहते हैं न भगवान के आदमी... वो वही थे..!" पद्मविभूषण से सम्मानित अतुलनीय गायिका आशा भोंसले ने कभी अपने एक साक्षात्कार में यह बात बड़ी सच्चाई से कही थी... भारत रत्न लता मंगेशकर भी रफ़ी साहब को अतुलनीय रूप से सरल इंसान मानती थीं!...महान संगीतकार नौशाद उन्हें मौसिकी का पैगंबर कहते थे तो महेंद्र कपूर से सोनू निगम या अरिजीत तक तो वो भगवान जैसे ही हैं। परन्तु असल जीवन में वह बेहद सरल और शुक्रगुज़ार इंसान थे जिसे बस गाने से मतलब था और वो भी बहुत अच्छा गाने से... क्यों कि उनका ईश्वर तो सुरों में ही उनसे रिश्ता बनाता था।
अब से पूरी एक सदी पहले 24 दिसंबर 1924 को "कोटला सुल्तान सिंह"(तब भारत अब पाकिस्तान) में मुहम्मद रफ़ी का जन्म हुआ... बचपन में एक दरवेश के गाने से मोहित हुए रफ़ी को संगीत ने ख़ुद एक सुरीला दरवेश बना दिया था।
मुहम्मद रफ़ी... जिनको इस दुनिया से गए आज पूरे पैंतालीस साल हो चुके हैं.. मग़र उनकी आवाज़ और अंदाज़ का जादू आज भी संगीतप्रेमियों के सर चढ़ कर बोलता है और उनके गाए गीतों से रेडियो,टीवी,यूट्यूब सब भरे रहते हैं... उनके गीत जिनमें ग़ज़ब का रोमांस है,कामुकता है,प्रेम है,वात्सल्य है,करुणा है,उदासी है,पीड़ा है,हास्य है, मस्ती है और अतुलनीय भक्ति है। यही कारण है कि मुहम्मद रफ़ी के सिनेमा गायकी के लगभग तीस साल के सफ़र में उन्हें पद्मश्री, एक राष्ट्रीय पुरस्कार, छ फिल्म फेयर अवॉर्ड और पंद्रह बार फिल्म फेयर नॉमिनेशन प्राप्त हुए... किन्तु सबसे बड़ी उपलब्धि तो किसी कलाकार की यही होती है कि उसे ख़ास और आम दोनों तरह की जनता से प्रेम और सम्मान मिले...जिस मामले में मुहम्मद रफ़ी दुनिया के कुछ ही गिने चुने कलाकारों में आते हैं... वो नाती से नाना तक सबके दुलारे रहे हैं।
मै जब छोटा था तब मेरे माता पिता को रिकॉर्ड प्लेयर पर खूब गीत सुनने की आदत थी...उन गीतों में एक रिकॉर्ड लगभग रोज़ ही बजता था और वो था फिल्म "बैजू बावरा" का जिसके दो गाने मुझे सुनते सुनते रट गए - "तू गंगा की मौज मै जमुना का धारा"... और "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"... दोनों के गायक थे "महान रफ़ी"... लेकिन उस फिल्म का एक गीत जो मुझे केवल पसंद नहीं था बल्की मेरी आत्मा में घुला हुआ था वह था "राग मालकौंस" के उच्च स्वरों से सिहरता हुआ एक अद्भुत भजन जिसे नौशाद अली ने डूब कर संगीतबद्ध किया, शकील बदायूंनी ने हृदय के रक्त से लिखा और मुहम्मद रफ़ी ने अपनी आत्मा से ऐसा गाया कि बस पूरा भारत रोम रोम हर्षित हो उठा..उस गीत के अंतिम अंग में जब कीर्तन होता है उस टुकड़े में रफ़ी साहब ने जिस भावुकता से "मोहे दर्शन भिक्षा दे दो" कहा है वह बेजोड़ है।
रफ़ी साहब का कमाल यह था कि वो पांच वक़्त के नमाज़ी होने के साथ ही किसी भी धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठे रहे... यही कारण है कि जब फिल्मकार अपनी किसी फिल्मी सिचुएशन में किसी मार्मिक हिन्दू भजन को गाने के लिए किसी गायक की कल्पना करता तो उसमें हेमंत कुमार के बाद सबसे पहला नाम मुहम्मद रफ़ी का ही होता था और मुहम्मद रफ़ी इस उत्तरदायित्व को इतनी सच्चाई से निभाते थे कि अभिनेताओं को केवल रफ़ी के भावों का अनुकरण मात्र करना रह जाता था... जिसका जीवंत प्रमाण है फिल्म फिल्म वसंत बहार का वह अद्वितीय देवी भजन जिस पर भारत भूषण को अभिनय करने का अवसर मिला किन्तु यदि आप उस गीत को देख रहे हैं तो अनायास आपकी आँखें बंद हो कर केवल गायन में डूब जाना चाहेंगी... और वह मार्मिक भजन है - "दुनिया न भाए मोहे, अब तो बुला ले, चरणों में चरणों में"...माता काली की प्रतिमा के समक्ष चित्रांकित यह गीत आंखों में आंसुओं की धार लाने को पर्याप्त है।
मुहम्मद रफ़ी में अपनी भारत भूमि के प्रति एक गहरा लगाव था... बंटवारे के बाद भारत में रह जाने का उनका फ़ैसला कोई परिस्थिति जन्य घटना नहीं थी अपितु उनके अंतर्मन का निर्णय था... यह बात उनके अनेक देशभक्ति के गीतों के साथ साथ उस एक भजन में भी उदघोषित होती है जो भारत के सबसे लोकप्रिय कृष्ण भजनों में एक है और जिसके बिना अब तक कि कोई जन्माष्टमी नहीं मनी है - "बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके बृजबाला"... इस गीत को राजेंद्र कृष्ण जैसे अनूठे गीतकार ने जिस तन्मयता से लिखा था उसी तन्मयता से विद्वान संगीतकार रवि साहब ने उसकी धुन भी बनाई थी... पर सोने पर सुहागा तो थी मुहम्मद रफ़ी की दिलफरेब आवाज़ जिसमें गाते हुए उनकी तान में मानो कृष्ण की मुरली गूंज गूंज जाती हो...तभी तो इस एक पंक्ति पर पहुंच कर रफ़ी पूरे भारत का स्वर बन जाते हैं - "अरे! पूरा कर दे(तान) आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया/ कोई नहीं है तुझ भी मोहन भारत का रखवाला रे/ बड़ी देर भई नंदलाला"...!
कहते हैं कि किसी के हृदय में कितना प्रेम छुपा है किसी के प्रति यह तब पता लगता है जब कोई अपने प्रिय को नाम से पुकारता हो... आश्चर्य है कि जिस प्रेम भाव से मुहम्मद रफ़ी ने फिल्मी गीतों में भगवान राम का नाम पुकारा है वह कदाचित ही कोई दूसरा कर सका हो.. शायद यही कारण है कि उनसे अधिक "राम भजन" हिंदी फिल्मों में किसी भी गायक ने नहीं गाए हैं... यदि आपको रफ़ी के श्री राम प्रेम का अनुभव करना हो तो आप उनके गाए किसी भी राम भजन को सुनते हुए उनके "राम" बोलने का अंदाज़ सुनिए..विश्वास करिए आप रोम रोम सिहर उठेंगे... उनके भक्ति गीत - "जय रघुनंदन जय सिया राम" या "मुझे अपनी शरण में लेलो राम" और "बड़ी देर भई बड़ी देर भई, कब लोगे खबर मोरे राम"... इस बात का जीवंत प्रमाण हैं।
भारत में जितने भी बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं लगभग सबके लिए रफ़ी साहब ने ही सफलतम गीत या भजन गाए हैं ... उधारण में होली के त्यौहार पर "तन रंग लो जी आज मन रंग लो" या "होली खेलत नंदलाल बिरज में"... अथवा नवरात्रि में "तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए, मै आया मै आया शेरा वालिए"...जिसे वैष्णव माता के रस्ते जाने वाले हर यात्री के मुंह से आज भी सुना जा सकता है... अथवा "हे नाम रे,सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरो वाली, ऊंचे डेरो वाली, बिगड़ी बना दे मेरे नाम"... या शिवरात्रि पर अनन्य शिव भक्ति में डूबा भजन "मोर भंगिया के मनाई दा"..."हे महादेव मेरी लाज रहे/ मेरी लाज रहे तेरा राज रहे/" और "मुझे तो शिव शंकर मिल गए/ किया न जप तप, तीर्थ न घूमा, अपने ही घर मिल गए/"... जन्माष्टमी के मनमोहन पर्व पर "मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे" या "राधिके तूने बंसरी चुराई" या "वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सबकी आंखों का तारा" और "गोविन्दा आला रे आला, ज़रा मटकी संभाल बृजबाला"... देश भर में गणपति पूजा पर घर घर बजने वाला गीत "देवा हो देवा, गणपति देवा तुमसे बढ़ कर कौन, और तुम्हारे भक्त जनों में हमसे बढ़ कर कौन" यह सब मुहम्मद रफ़ी के सुर और लय के साथ ही साथ उनकी पवित्र भावना के भी परिचायक हैं।
हिन्दी उर्दू के अलावा मुहम्मद रफ़ी ने अनेक भारतीय और कुछ विदेशी भाषाओं में गीत गाए हैं... इनमें कई भजन भी हैं जिनमें मराठी ,बंगाली,तेलुगु,पंजाबी जैसी भाषाओं में कई भजन शामिल हैं...और उसमें ही शामिल अनेक सुमधुर गीत "हिंदी की बड़ी बहनों में सबसे करीबी भोजपुरी" भाषा के हैं... यह इतिहास ही है कि भोजपुरी की पहली पहली फिल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" जिसके संगीतकार सुविख्यात "चित्रगुप्त" और गीतकार हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े कवि "शैलेन्द्र" थे और जिसके गीतों को लता मंगेशकर,ऊषा मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली... जिनमें रफ़ी साहब का गाया दर्दभरा गीत -"सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूट गईल डालिया,छितर गईल खोतवा,
छूट गईल नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा मां" ....सुन कर मन भर आता है... निर्गुण सरीखे इस विदाई गीत में जिस प्रकार से एक पंजाबी उर्दू ज़बान के मुहम्मद रफ़ी ने भोजपुरी की चासनी चटाई है वह सुनते ही बनता है... भोजपुरी में तीस से अधिक गाने गाने वाले मुहम्मद रफ़ी ने जब भोजपुरी भजन गाया तो वह संयोग से भगवान राम की लीला को ही समर्पित था... "हमार संसार" नामक भोजपुरी फिल्म जिसका संगीत "श्याम शर्मा" ने दिया था और गीतनुमा भजन लिखा था देश के प्रमुख प्रगतिशील शायर "मज़रूह सुल्तानपुरी" ने... और इस राम भजन को जब राम के दुलारे रफ़ी साहब ने गाया तो माधुर्य ही माधुर्य बरस गया - "हँसत खेलत प्रभु पुनि लौटे ,
हसत खेलत प्रभु पुनि घर लौटे, संग लखन सिया माई,
अइसन दिन सबके घर आवे, मिले भाई से भाई,
आहो मिले राम भरत दूनू भाई, आहो मिले राम भरत दूनू भाई
फुकलो से ई दिया न बुताई, नेह के जोत जरत चली जाई"।
ये भारत की उदार संस्कृति का ही प्रतीक है कि हिन्दी सिनेमा का सबसे सफल नातिया क़लाम (मुहम्मद साहब की तारीफ़) भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज़ में घर घर गूंजा - "बेक़स पे करम कीजिए सरकार ए मदीना"... वहीं दूसरी तरफ़ भारत के सबसे लोकप्रिय सिनेमाई भजनों में सर्वोत्तम मुहम्मद रफ़ी के नाम दर्ज़ मिलते हैं...फिर वह चाहे "शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली हो" जैसी कालजई भक्ति कव्वाली हो या "मधुर राम का नाम जग में/ भज राम राम राम जग में/" जैसा कीर्तन मुहम्मद रफ़ी सबको हृदय से गाते गए और हृदय में उतारते गए... और उतरते गए इस हिंदुस्तान के हृदय में...कदाचित उस परमात्मा के भी जो भारत का रखवाला है... क्यों कि यह एक अनुपम संयोग ही है कि सबसे अधिक सिने भजन गाने वाले इस मुस्लिम गायक के जीवन का अंतिम सफल गीत भी एक भजन ही था... हां! 31 जुलाई 1980 के दिन जब इस हरदिल अज़ीज़ गायक ने अपनी मुस्कुराती आंखें हमेशा के लिए बंद की... रमज़ान का पवित्र महीना भी अलविदा की ओर था... और गुरुपूर्णिमा का पर्व बीता कर महादेव शिव के श्रवण मास अभी अभी प्रारंभ हुआ था...आकाश से शिवकृपा घनघोर वर्षा के रूप में उतर रही थी...लाखों की भीड़ मुंबई की सड़कों पर उस इंसान की अर्थी के पीछे छतरी लिए भीगती चल रही थी जिसे भगवान ने सिर्फ़ गाने के लिए भेजा था और जाते जाते भी भगवान का ये आदमी अपना अंतिम गीत भगवान राम के चरणों में समर्पित कर गया था जो आज उसकी मृत्यु के बाद सारे देश में गूंज रहा था - "राम जी की निकली सवारी/ राम जी की लीला है न्यारी न्यारी..!"
-ओमा अक्
(मुहम्मद रफ़ी की जन्म शताब्दी और पैंतालीसवीं पुण्यतिथि २१ जुलाई २०२५ पर श्रद्धांजलि रूप में यह स्मृतिपत्र)
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
मुहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष
तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ. संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है. मुहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं. भले ही मुहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी. साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मुहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मुहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है. लेखक का कहना है कि मुहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मुहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफ़ल समझूंगा. इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है.
मुहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मुहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था. उनके पिता ख़ानसामा थे. रफ़ी के बड़े भाई मुहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा. वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा. यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी. कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा. एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना. वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए. ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. साल 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए. यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया. बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा.
मुहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे. वे छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे. क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई. हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे. रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए. संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए. उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए. मजबूरन व्यवस्थापक मान गए. रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए. इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए. उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी. बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला. उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे. उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई. उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई. उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बम्बई आने का न्यौता दिया. रफ़ी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए. रफ़ी अपने भाई के साथ बम्बई पहुंचे. अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया. यह 1944 की बात है. इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा. रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की. नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया. रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं- मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही. इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया. फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया. बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है. यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िन्दगी के मेले गवाया. इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया. यह गीत हिन्दी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है. इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए. इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया. इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा. इसके बाद फ़िल्म चाँदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया. बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है. इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया. इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे. फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मुहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे. रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई. रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं. देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिन्दुस्तान में ही रहे. इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये. रफ़ी ने जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे. भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये. यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था. शायद इसलिए दुनियाभर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए. ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे. संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे. मुहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया. उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी. मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे. उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा. उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये.
वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे. यह वह वक़्त था, जिसे हिन्दी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है. उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है. उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा.
रफ़ी साहब ने 31 जुलाई 1980 को आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी. उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. लग रहा था मानो ऱफी साहब कह रहे हों-
हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…
***
जन्म : 24 दिसम्बर 1924
स्थान : गांव मजीठा, ज़िला अमृतसर (पंजाब)
मृत्यु : 31 जुलाई 1980
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)
लाल बिहारी लाल
भारत में सत्ता दिल्ली सलतनत से मुगल साम्राज्य फिर मुगल से जब सत्ता अंग्रैजो के हाथ में गई तो पहले अंग्रैजों का व्यापारिक उदेश्य था पर धीरे-धीरे उनका राजनैतिक रुप भी समने नजर आने लगा। और वे अपने इस कुटिल चाल में कामयाब भी हो गये । धीरे –धीरे उनके क्रिया-कलापों के प्रति जनमानस में असंतोष की भावना पनपने लगी इसी का परिणाम सन 1857 के सिपाही विद्रोह के रुप में देखने को मिला।
सन 1857के विद्रोह के बाद जनमानस संगठित होने लगा औऱ अग्रैजों के विरुद्ध लामबंद होने लगा। प्रबुद्ध लोगों औऱ आजादी के दीवानों द्वारा सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस की स्थापना की गई। प्रारंभिक 20 वर्षों में 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओ का दबदबा रहा। इसके बाद धीरे-धीरे चरमपंथी (गरमदल) नेताओ के हाथों में बागडोर जाने लगी। इसी बीच महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को स्वदेश (मुम्बई) में कदम रखा तभी से हर साल 9 प्रवासी दिवस मनाते आ रहे हैं। जब गांधी जी स्वदेश आये तो उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने सुभाव दिया कि आप देश में जगह-जगह भ्रमण कर देश की स्थिति का अवलोकन करें। अपने राजनैतिक गुरु गोखले के सुझाव पर गांधी जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से भ्रमण करते हुए बंगला के मशहुर लेखक रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन पहुँचे। वही पर टैगोर ने सबसे पहले गांधी जी को महात्मा कहा था औऱ गांधी जी ने टैगोर को गुरु कहा था। गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में यात्रा करते थे ताकि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सके। मई 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद के पास कोचरब में अपना आश्रम स्थापित किया लेकिन वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण साबरमती क्षेत्र में आश्रम की स्थापना की। दिसम्बर 1915 में कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में गांधी जी ने भाग लिया गांधी जी ने यहाँ विभाजित भारत को महसूस किया देश अमीर-गरीब, स्वर्ण-दलित,, हिन्दू- मुस्लिम, नरम-गरम विचारधारा , रुढ़िवादी आधुनिक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक , ब्रिटिश विरोधी जिनको इस बात का बहुत कष्ट था कि देश गुलाम है। गांधी जी किसके पक्ष में खड़े हों या सबको साथ लेकर चले। गांधी जी उस समय के करिश्माई नेता थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सबको साथ लेकर सबके अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी।
गांधी जी ने पहली बार देश में सन 1917 में बिहार के चम्पारन में सत्याग्रह किया| उनका आन्दोलन जन आन्दोलन होता था। चंपारण में नील किसानों के तीन कठियाविधि से मुक्ति दिलाई औऱ अंग्रैजों से अपनी बात मनवाने में कामयाब हुए। गरीबों को सुत काटने एवं उससे कपड़े बनाने की प्रेरणा दी जिससे इनके जीवन-यापन में गुणात्मक सुधार आया।
गुजरात क्षेत्र का खेडा क्षेत्र -बाढ़ एवं अकाल से पीड़ित था जैसे सरदार पटेल एंव अनेक स्वयं सेवक आगे आये उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कर राहत की माँग की । गांधी जी के आगे अंग्रैजो को झुकना पड़ा किसानों को कर देने से मुक्ति मिली सभी कैदी मुक्त कर दिए गये गांधी जी की ख्याति देश भर में फैल गई। यही नहीं खेड़ा क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया। वहाँ के शराबियों को शराब की लत को भी छुडवाया। सन् 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने रालेटएक्ट के तहत प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया, बिना जाँच के किसी को भी कारागार में डाला जा सकता था । गांधी जी ने देशभर में रालेट एक्ट के विरुद्ध अभियान चलाया।पंजाब में इस एक्ट का विशेष रूप से विरोध हुआ पंजाब जाते समय में गांधी जी को कैद कर लिया गया साथ ही स्थानीय कांग्रेसियों को भी कैद कर लिया गया । 13 अप्रैल को 1919 बैसाखी के पर्व पर जिसे हिन्दू मुस्लिम सिख सभी मनाते थे अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग इकठ्ठे हुए थे। जलियांवालाबाग़ चारों तरफ से मकानों से घिरा था बाहर जाने के लिए एक ही गेट था वहाँ एक जनसभा में नेता भाषण दे रहे थे तभी जरनल डायर ने निकलने के एकमात्र रास्ते को रोक कर निर्दोष बच्चों स्त्रियों व पुरुषों को गोलियों से भून डाला एक के ऊपर एक गिर कर लाशों के ढेर लग गये जिससे पूरा देश आहत हुआ गांधी जी ने खुल कर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया अब एक ऐसे देशव्यापी आन्दोलन की जरूरत थी जिससे ब्रिटिश सरकार की जड़े हिल जाएँ।
खिलाफत आंदोलन के जरीये हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात हो या फिर असहयोग आंदोलन की गांधी जी ने अपना परचम अग्रैजों के विरुद्ध पूरे देश में लहरा दिया। दिसंबर 1921 में गांधी जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य अब स्वराज्य हासिल करना हो गया। गांधी जी ने अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस को राष्ट्रीय फलक पर पहुँचाने की बात की। इन्होंने एक अनुशासनात्मक समिति का गठन किया। 1925-1928 तक गांधी जी ने समाज सुधार के लिए भी काफी काम किया। धीरे –धीरे कांग्रेस का दबदबा पूरे देश में बढ़ता गया। औऱ राष्ट्र की भावना को प्रेरित कर देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने का काम गांधी जी ने बाखूबी किया। चौराचौरी के घटना से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया पर इन्होने अपनी बात को पूरजोर तरीके से रखना जारी रखा। इन्होने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पहले जपान पर परमाणु बम से हमले की निंदा की,आहत भी हुए पर अपना सत्य औऱ अहिंसा कामार्ग नहीं छोड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या सन 1942 में गांधी जी द्वारा अग्रैजों भारत छोड़ों आंन्दोलन में करो या मरो का नारा । आजादी की मांग में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अग्रैज विवश हो गये औऱ ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई। ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथु राम गोड्से द्वारा कर कर दी गई ।फिर भी भारतीय राजनीति में गांधी जी आज भी प्रासांगिक एवं अद्वितीय है। गांधी जी भारत के हर जनमानस में विद्यमान है।
(लेखक साहित्य टीवी के संपादक हैं)
लाल बिहारी लाल
सदियों की गुलामी के बाद आजादी की पहली मांग सन् 1857 ईस्वी में पुरजोर तरीके से उठी उसी समय राष्ट्र के ध्वज बनाने की योजना बनी परंतु पहले स्वतंत्रता संघर्ष के परिणाम को देखकर झंडे की मांग बीच में ही अटक गई। वर्तमान स्वरूप में विद्यमान झंडा कई चरणों से होकर गुजरा है। प्रथम चित्रित ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा 1904 में बनाया गया था औऱ इसे 7 अगस्त 1906 के कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था ।इस ध्वज को क्षैतिज तीन रंगो लाल, पीला एवं हरे रंग की क्षौतिज पट्टियां बनाया गया था ।ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे जिनका रंग सफेद था , नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बनाए गए सफेद रंग से बनाये गए थे बीच की पीली पट्टी पर नीले रंग से वंदे मातरम लिखा गया था।
द्वितीय ध्वज की बात करें तो सन 1907 ईस्वी में मैडम भीका जी कामा और कुछ अन्य निर्वाचित क्रांतिकारियों ने मिल कर पेरिस में पहली बार फहराया था। तृतीय चित्र ध्वज की बात करें तो 1917 ईस्वी में राजनीतिक संघर्ष के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान फहराया था। इस ध्वज में पांच लाल और चार हरे क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे ।ऊपरी किनारे पर बायी और यूनियन जैक था । उपर दायी तरफ एक कोने में सफेद अर्द्धचंद्र और सितारा भी था । कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक चौथा झंडा बनाया था जिसमें दो रंगों का लाल और हरा रंग का था जो दो प्रमुख समुदाय अर्थात हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता था गांधी जी ने 1921 ईस्वी में सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसे एक सफेद पट्टी मध्य में और सफेद पट्टी के बीच में प्रगति के लिए चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष 1931 में झंडा के इतिहास में एक नया मोड़ आया तिरंगे ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का एक प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें तीन रंग उपर केसरिया बलिदान का प्रतीक बीच में सफेद शांति का प्रतिक और अशोक स्तंभ से लिया चक्र इसे विधि चक्र भी कहते हैं जिसमें 24 तिल्लिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है और सबसे नीचे हरा रंग हरियाली एवं खुशहाली का प्रतीक । तीनों पट्टियां समानुपात में आयताकार जिसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। इसे राष्ट्रध्वज के रूप में मान्यता मिली 22 जुलाई 1947 ई. को संविधान सभा ने वर्तमान भारत के तिरंगा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया तथा आजादी के बाद भी इसका रंग और महत्व आज भी बना हुआ है। इस ध्वज को आज 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुआ। ये था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का रोचक इतिहास।
(लेखक-साहित्य टीवी के सम्पादक हैं)
वीर विनोद छाबड़ा
फ़िल्मी दुनिया की परमानेंट सिस्टर का ख़िताब उढ़ा दिए जाने वाली साठ और सत्तर के सालों की मशहूर एक्ट्रेस नाज़िमा का 11 अगस्त 2025 को इस फानी दुनिया से रुख़सत फ़रमा गयी. वो 77 बरस की थीं. कुछ साल पहले उन पर लिखा ये आर्टिकल साझा कर रहा हूँ.
विचित्र है ये फ़िल्मी दुनिया भी. आज ज़र्रा आसमान पर बैठा दिखा तो दूसरे दिन धड़ाम ज़मीन पर. ज़मीं खा गयी आसमां कैसे कैसे? 25 मार्च 1948 को नासिक में जन्मी नाज़िमा का केस भी कुछ ऐसा ही है. उनका संबंध फ़िल्मी घराने से रहा. दादी शरीफा बाई और फूफी हुस्नबानो अपने दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्रियां थीं. बचपन से ही फिल्मों का शौक रहा. देवदास, बिराज बहु, अब दिल्ली दूर नहीं, हम पंछी एक डाल के आदि में बेबी चाँद के नाम से दिखी. वैसे उनका असली नाम था, मेहरूनिसा. पंद्रह साल की उम्र में अपने फूफा अस्पी ईरानी की 'उमर क़ैद' (1961) की नायिका बन गयी. उनके नायक थे सुधीर, जो बाद में हरदिल पसंद कॅरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में स्थापित हुए. मुकेश की आवाज़ में सुधीर-नाज़िमा पर फिल्माया ये गाना आज भी यादगार है...मुझे रात दिन ये ख्याल है वो नज़र से मुझको गिरा न दे...
किसी को यक़ीन नहीं होगा कि संजीव कुमार की बतौर नायक पहली फिल्म 'निशान' (1965) की नायिका नाज़िमा ही थी. याद करें इस गाने को...हाए तबस्सुम तेरा, धूप खिल गई रात में या बिजली गिरी बरसात में....संजीव के साथ नाज़िमा की एक अन्य फिल्म भी याद आती है, प्रसाद प्रोडक्शन की गोल्डन जुबली हिट 'राजा और रंक'...ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना, नहीं फिर जाना तू अपनी जुबान से ओ तेरे नैना हैं बईमान से...'अधिकार' में देब मुखर्जी उनके दीवाने थे... कोई माने या न माने जो कल तक तक थे अनजाने वो आज हम जान से प्यारे हो गए...जैमिनी की 'औरत' (1967) में राजेश खन्ना के ऑपोज़िट थीं नाज़िमा...शोला उल्फत का भड़का दे दिल में आग लगा दे...बाद के दिनों में संजीव कुमार और राजेश खन्ना तो सफलता की सीढ़ियां चढ़ते ही गए मगर नाज़िमा को कुछ नहीं मिला. दो साल बाद 'डोली' में वो राजेश की बहन का किरदार करती दिखीं. फिर तो वो स्थाई बहन हो गयीं, वो भी दुखियारी बहना, 'ग़ज़ल' में सुनील दत्त की तो 'बेईमान' में मनोज कुमार की...ये राखी बंधन है ऐसा....'अनजाना' में राजेंद्र कुमार के पीछे राखी लेकर घूमना पड़ा...हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है एक दिन साल में...पब्लिक को भी उनमें परफेक्ट दुखियारी बहन दिखने लगी, उनकी खिलखिलाहट नहीं सुनाई दी.
'अप्रेल फूल' में नाज़िमा को सायरा बानो की बहन बनना पड़ा तो 'ज़िद्दी' में आशा पारेख की. 'आरज़ू' में वो राजेंद्र कुमार की बहन थीं तो साधना की सहेली भी...जब इश्क़ कहीं हो जाता है तो ऐसी हालात होती है...'आये दिन बहार के' में वो आशा पारेख को आड़े वक़्त में सहारा देने वाली पक्की सहेली थीं, बहन की समानांतर भूमिका में...ए काश किसी दीवाने को हमसे भी मोहब्बत हो जाए...राजश्री फिल्म्स की कॉमेडी 'हनीमून' में सहेली लीना चंद्रावरकर के साथ भी नाज़िमा का रोल बराबरी का था, जिसमें दोनों अपने बॉय फ्रेंड्स से नाता तोड़ कर अरेंज मैरिज करती हैं मगर संयोग से लीना का पति अनिल धवन नाज़िमा का एक्स बॉय फ्रेंड होता है और नाज़िमा का पति सुरेश चटवाल लीना का एक्स बॉयफ्रेंड. दुर्भाग्य ये रहा कि लीना-अनिल पर तो दो-दो गाने फिल्माए गए लेकिन नाज़िमा-सुरेश पर एक भी नही. ऐसा ही करते हैं डायरेक्टर, किसी को उठाओ तो किसी को गिराओ. सबके अपने इंटरेस्ट होते हैं.
सत्तर के सालों की फ़िल्मी दुनिया नाज़िमा को 'रेसीडेंट सिस्टर' कहती थी. नाज़िमा ने इस बदहाली के लिए खुद को ही कसूरवार माना. नायिका के रोल के लिए लंबा इंतज़ार उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ इसलिए जो भी ऑफर आया, झट से स्वीकार कर लिया ये सोच कर कि प्रोडक्शन बड़ा है, फिर जिसकी बहन या सहेली बनना है वो नामी स्टार हैं. उनकी सुंदरता, प्रतिभा सब धरी की धरी ही रह गयी. उनके आसूओं में किसी को दर्द नहीं दिखा, गलेसरीनी समझे गए. हमने 'दयारे मदीना' (1975) में नाज़िमा को अंतिम बार देखा था. उसके बाद वो अचानक ही ग़ायब हो गयी. तरह-तरह की अफवाहें उड़ीं. किसी ने लिखा उन्हें कैंसर है तो किसी ने स्वर्ग ही भेज दिया, ये शीर्षक लगाते हुए कि सबसे ज़्यादा 'रेप' का शिकार हुई ये बहना. अंदाज़ा लगा सकते हैं, लिखने वाले का स्तर का. दरअसल नाज़िमा जब उन्होंने समझ लिया था कि बहन या सहेली के आगे उनका कोई स्कोप नहीं है तो अपने एक जहाजी दोस्त अरशद रहमान से उन्होंने शादी कर ली थी. उनके बच्चे हैं. कुछ साल पहले शौहर का इंतकाल हो चुका है और वो पक्की धार्मिक हो गयीं. मुंबई में ही गुमनामी की ज़िंदगी जीती रहीं. हिज़ाब से ढके रहने के कारण उन्हें कोई पहचानता नहीं पाता था. और वो ऐसा चाहती भी थीं.
कामातुर काग कूक कोयल
चातक चकोर चंचल चंचल
सुरभित समीर सरसर शीतल
आंदोलित होते अतल वितल..!
जल पावस ऋतु के पावक जल!
हर हर हरियाले बंस विकल
फर फर फहराते पत पीपल
नीलम नभ पर नीरद बेकल
भर भर लाते बरसाते जल..!
जल पावस ऋतु के पावक जल!
झरते झर झर विष मेघ प्रबल
श्रावण बरसता चले गरल
पग पग पगते नीरस दलदल
सम्प्रति महेश बनता संबल..!
जल पावस ऋतु के पावक जल!
-ओमा अक्
डॉ फ़िरदौस ख़ान
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...
देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...
जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...
हिन्दी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिन्दुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी’ गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया था. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. साल 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है’ ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फ़िल्म जागृति (1954) के गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तानकी’ और ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ़ इंडिया का गीत ‘नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं’ बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत ‘कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फ़िल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं’ बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी का गीत ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी’ आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फ़िल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...
राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फ़िल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...
इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फ़िल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबाड़ी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...
इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तूफ़ान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फ़रिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फ़िल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.
बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा…
Dr Firdaus Khan
Festivals keep our culture and traditions alive. These are the treasures of happiness. They give us opportunities for happiness. They are an integral part of our lives. These festivals reveal the culture and civilization of any country and society. But with changing times, festivals are also being left behind. In fact, it would be better to say that they are coming to an end. Despite this, there are still many people who are keeping their traditions alive. If we talk about Muslim festivals, only two festivals are named. One is Eid ul Fitr, which is celebrated on the first date of Shawwal after the end of the month of Ramadan. It is also called Meethi Eid. And the second festival is Eid ul Azha, which is also known as Bakrid. This Eid is celebrated in the joy of Hajj and people offer sacrifices for three days. Ahle-Hadees offer sacrifice for four days. Apart from these festivals, there are many other festivals which some people celebrate with full devotion. One such festival is Aakhiri Chahshamba or Aakhiri Chahar Shamba.
What is the Aakhiri Chahshamba
The last Chahshamba is celebrated on the last Wednesday of the second month of the Hijri calendar. It is believed that Allah's Messenger Hazrat Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam fell ill in the month of Safar. He (peace be upon him) had a fever and a headache. On the last Wednesday of this month, He (peace be upon him) recovered and took a bath.
Then they prayed, ate food and went for a walk. Special Nafil Salat are also offered on this day. The last Wednesday of the month of Safar is also known as 'Walk Wednesday'.
His (peace be upon him) followers keep a holiday on this day. They also took bath and wore good clothes. Delicious food was cooked in their homes. Sweet dishes were also cooked. they distributed sweets. They also went for a walk with their family members. What I mean to say is that His (peace be upon him) followers celebrated his recovery and this tradition continues even today.
It is significant that this festival started in Arabia, but now there is no information available about celebrating this festival there. But this festival is celebrated with great joy in many regions of India. This is the effect of the soil of this country, and the impact of the culture here is that even those festivals which have disappeared and ended from Arabia are celebrated here.
Actually India is a country of festivals. Festivals are celebrated throughout the year in our country. Many festivals are related to religion, while many festivals are related to folk life. The Akhiri Chahshamba may not be related to religion, but it is definitely related to faith. This is a festival of love. This is a festival related to the love of our beloved Prophet Hazrat Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam. There is love for every thing related to the lover. Apart from India, this festival is also celebrated in Pakistan and Bangladesh, because both these countries were also once a part of India.






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