-सरफ़राज़ ख़ान
हाल ही में अंग्रेज़ी के प्रथम उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ का हिन्दी में भावानुवाद पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह भावानुवाद सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार व साहित्यकार डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’ जी ने किया है। वह किसी परिचय के मोहताज नहीं है। अपनी अन्य साहित्यिक कृतियों की भाँति यह भी उनकी अद्भुत कृति है।
विशेष बात यह भी है कि इसकी भूमिका में यायावर जी ने उपन्यास के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई है, जिससे इसे पढ़ने में और अधिक आनन्द आता है। उनके अनुसार ‘रॉबिन्सन क्रूसो' लन्दन के सुप्रसिद्ध लेखक डैनियल डेफॉ की रचना है। यह उपन्यास सर्वप्रथम 25 अप्रैल 1719 को प्रकाशित हुआ था। यह अंग्रेज़ी का प्रथम उपन्यास माना जाता है। यह उपन्यास रॉबिन्सन क्रूसो नामक एक अंग्रेज़ पात्र का यात्रा वृतांत है, जो एक उष्णकटिबंधीय द्वीप पर 28 वर्ष से अधिक समय तक रहा। वास्तव में यह एक काल्पनिक आत्मकथा है, साथ ही इसमें डायरी और यात्रावृत्त के तत्व भी मिले हुए हैं। काल्पनिक होते हुए पाठक को यही लगता है कि वह एक वास्तविक आत्मकथा पढ़ रहा है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सबकुछ उसकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है।
डैनियल डेफॉ का जन्म 13 दिसम्बर 1660 को क्रिपलगेट (लन्दन) में हुआ था। वे अंग्रेज़ी पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार थे। उन्होंने धर्म, परालौकिक शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, अपराध और आर्थिक आदि विषयों पर पाँच सौ से अधिक पुस्तकें और लेख लिखे। उन्हें आर्थिक मामलों की पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जाता है।
उनके पिता जेम डेफॉ चर्बी से बत्ती बनाने का काम करते थे। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनके काम में सहायता करे। किन्तु डैनियल डेफॉ को इसमें तनिक भी रुचि नहीं थी। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उन्होंने हौजरी और इससे बने वस्त्रों का व्यवसाय किया। उन्होंने मदिरा का व्यवसाय किया। किन्तु इन कार्यों से शीघ्र ही उनका मोहभंग हो जाता था। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। लेखन में उनकी रुचि थी। सर्वप्रथम उन्हें 1697 में उस समय सफ़लता प्राप्त हुई, जब सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों पर उनके लेखों की श्रृंखला प्रकाशित हुई। इसके पश्चात 1719 से 1724 में उनके अनेक उपन्यास प्रकाशित हुए, जिससे विश्वभर में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 1719 में प्रकाशित उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उन्हें महान उपन्यासकारों की श्रेणी में सम्मिलित कर दिया। अपनी विशिष्ट आत्मकथात्मक विधा के कारण यह उपन्यास आज भी लोकप्रिय है।
इस उपन्यास में समुद्र यात्राओं के साथ-साथ एक निर्जन द्वीप में रहने के संघर्ष एवं पराक्रम का सजीव चित्रण किया गया है। कहा जाता है कि स्कॉटिश जहाज़ के डूबने पर शेष बचे अलेक्जेंडर सेलकर्क को आधार बनाकर यह उपन्यास लिखा गया था। अलेकजेंडर सेलकार्क एक अंग्रेज़ जहाजी था। यात्रा के समय तूफ़ान में उसका जहाज़ डूब गया था। जहाज़ के शेष सब यात्री डूबकर मर गए, परन्तु वह बच गया। उसने एक निर्जन द्वीप पर शरण ली। इस द्वीप पर उसके अतिरिक्त कोई और नहीं था। इस निर्जन स्थान पर वह अनेक वर्षों तक रहा। अंत में इस स्थान से उसका उद्धार हुआ और वह सकुशल अपने देश पहुँचा।
डैनियल डेफॉ का निजी जीवन भी दुखों से भरा हुआ था। उनके माता-पिता के आपसी संबंध अच्छे नहीं थे, जिसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका विवाह मैरी टफ़ले के साथ हुआ था। उनकी पत्नी को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। व्यवसाय में लाभ न होने के कारण वे ऋण के बोझ तले दब गए थे। ऐसे समय में उनके उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उनका बहुत साथ दिया। इस उपन्यास से उन्हें सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया। इसे विश्वभर में पढ़ा गया। इसके विक्रय से उन्हें अच्छी आय हुई और उन्होंने अपना संपूर्ण ऋण चुका दिया। जीवन के अंतिम समय में उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था। 24 अप्रैल 1931 को लन्दन में उनका निधन हुआ।
डैनियल डेफॉ ने अपने जीवन में धर्म और नैतिकता को विशेष स्थान दिया। इस उपन्यास का समापन भी वे नीतिपरक उपदेश और शिक्षा के साथ ही करते हैं। उनके लेखन पर आदर्श और नीति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। उनकी सभी कथाओं का अंत सुखदायी है। उनकी कथाओं में धर्म के उपदेश हैं, जो पाठकों को परमार्थ के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी कथाओं में अन्याय एवं असत्य की पराजय होती है तथा सत्य एवं न्याय की विजय होती है। इस दृष्टि से वे भारतीय दर्शन के आदिक निकट प्रतीत होते हैं।
मूल उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के प्रकाशन के लगभग 141 वर्ष पश्चात भारत में श्री देवदत्त तिवारी ने इसका भावानुवाद किया। ‘रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’ नाम से उनकी यह पुस्तक वर्ष 1860 में बनारस मेडिकल कॉलेज के श्री जेजे माइकल प्रिंटर से प्रकाशित हुई थी। इसमें ‘क्रूसो’ के स्थान पर ‘बासो’ लिखा जाना, संभवत टंकण आदि की त्रुटि रही होगी, परन्तु इससे पुस्तक की महत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अव मूल पुस्तक के लगभग 306 वर्ष पश्चात और भावानुवाद के प्रकाशन के लगभग 165 वर्ष पश्चात पुनः इसका भावानुवाद किया गया है। श्री तिवारी जी के भावानुवाद और इस नवीन भावानुवाद में बहुत अंतर है। प्रथम अंतर इसकी भाषा शैली के विषय में है अर्थात श्री देवदत्त तिवारी ने तत्कालीन भाषा शैली में इसका भावानुवाद किया, जो पूर्वांचली प्रभाव और कथावाचकों की शैली से प्रभावित है। उस समय की भाषा और वर्तमान समय की भाषा में बहुत अंतर आ चुका है। इसलिए यह नवीन पुस्तक आज की भाषा में है। नवीन पुस्तक के भावानुवाद में पूर्वोक्त पुस्तक के भावानुवाद की ‘आत्मा’ को यथावत रखा गया है। दूसरा और सबसे बड़ा अंतर यह है कि पूर्वोक्त पुस्तक में बहुत कुछ छूट गया था अथवा छोड़ दिया गया था। इस नवीन पुस्तक में मूल उपन्यास के उन सभी महत्वपूर्ण अंशों, विशेषकर अंतिम भाग को भी सम्मिलित किया गया है, जो पूर्व भावानुवाद में नहीं है। इसमें पुस्तक का संपूर्ण भावानुवाद किया गया है। इसमें अनावश्यक विस्तार के अतिरिक्त और कोई भी अंश छोड़ा नहीं गया। संपूर्ण घटनाओं का वर्णन इसमें सम्मिलित है। नायक रॉबिन्सन क्रूसो की तत्कालीन मनोस्थिति को अधिक मार्मिक बनाने के लिए मैंने अध्याय दो, चार, सात और आठ में कुछ स्वरचित दोहे लिखे हैं, परन्तु वे कथा के प्रवाह और नायक के भावों को बाधित नहीं करते अपितु इनसे रसमयता बढ़ती ही है।
उपन्यास के नायक की अपराजेय जिजीविषा उच्च स्तर की है, परन्तु आपत्ति आने पर वह सदा अपने माता-पिता के उपदेशों का स्मरण करता है। विपत्तियों से घिर जाने पर वह किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता, अपितु कुछ समय के असमंजस के बाद तुरंत आपत्ति-निवारण का समाधान खोज लेता है। उपन्यास में तत्कालीन परिवेश यूरोपीय यात्रियों की साहसिक व्यापारिक यात्राएँ, समुद्री लुटेरे, कृषि, मानवभक्षी जातियाँ, यूरोपीय सभ्यता का प्रथम चरण आदि बहुत कुछ यहाँ रूपायित हुआ है। ध्यातव्य है कि भारत उस समय तक सभ्यता के कई स्वर्णिम युग पार कर चुका था ऐसे में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' की पंक्तियाँ अधिक प्रासंगिक लगतीं हैं-
"जब थे दिगम्बर रूप में वे जंगलों में घूमते
प्रासाद-केतन पट हमारे व्योम को थे चूमते”
फिर भी यह उपन्यास एक युग का समग्र परिवेश प्रस्तुत करने में सहायक हुआ है।
ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य यूरोपीय व्यापारियों का सम्पर्क पहले बंगाल से हुआ था। मीर जाफ़र की ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की धूर्तता के कारण उनका पहला राज्य भी बंगाल में ही बना। अतः पारस्परिक विनिमय में साहित्य और संस्कृति का प्रभाव भी एक दूसरे पर पड़ा। इसलिए 'रॉबिन्सन क्रूसो' का प्रथम अनुवाद बांग्ला भाषा में ही हुआ था, परन्तु उसके अनुवादकों के विषय में कोई जानकारी हमारे पास नहीं है। मेरी धर्मपुत्री फ़िरदौस ख़ान ने इस उपन्यास का भावानुवाद करने में मेरी बड़ी सहायता की है। उसे हार्दिक शुभाशीष। सदा प्रसन्न और सक्रिय जीवन जिये।“
नि:संदेह यह एक ऐसा उपन्यास है, जिसे सबको विशेषकर किशोरों को अवश्य पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से वे अपने भावी जीवन के विषय में ग़लत निर्णय लेने से बच सकते हैं। अभिभावकों से अनुरोध है कि वे अपने बच्चों को उपहार स्वरूप यह उपन्यास अवश्य दें।
उपन्यास का आवरण आकर्षक है। कुल 215 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य 499 है। संभव है कि कुछ पाठकों को यह अधिक लगे, लेकिन इसकी महत्ता एवं उपयोगिता के दृष्टिगत यह मूल्य कुछ भी नहीं है।
पुस्तक का नाम : रॉबिन्सन क्रूसो
अनुवादक : डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’
प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नै दिल्ली
पृष्ठ : 215
मूल्य : 499 रुपये
आज फ़ादर्स डे है... हमारे लिए हर पल ही फ़ादर्स डे है, क्योंकि हम अपने पापा के वजूद का ही एक हिस्सा हैं और पापा आज भी हम में ज़िन्दा हैं...
हमारे पापा ख़ुद से ज़्यादा अपने बच्चों को चाहते थे. पापा को घर आते देख हम उनके पास दौड़ जाते और पापा घर में दाख़िल होने से पहले ही हमें गोद में उठा लेते और चीज़ दिलाने ले जाते. सोते में एक लफ़्ज़ मुंह से निकलता-पानी, तो पापा हमें पानी पिलाते. हमें याद नहीं कि बचपन में कभी हमने ख़ुद उठकर पानी पिया हो. पापा हमें स्कूल लेकर जाते. फिर स्कूल से लेकर भी आते. जब तक पापा ज़िन्दा रहे, हम घर जाते तो उन्हें घर से बाहर ही बेचैन टहलते देखते. पापा कहते- फ़िरदौस आने वाली है. और वो हमारे इंतज़ार में घर के बाहर ही टहलते रहते. ये जानते हुए कि हमारे घर आने में अभी कई घंटे बाक़ी हैं. हमसे पहले कभी पापा ने खाना नहीं खाया. कभी हमारी आंखें नम नहीं होने दीं. ये है हमारे पापा की हमारे लिए मुहब्बत. पापा के जाने के बाद ही दुख-तकलीफ़ का अहसास हुआ. ज़िन्दगी में पापा की कमी सबसे ज़्यादा खलती है.
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
आज के दिन ही, 5 जून 1858 को 1857 के फौलादी शेर मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैजाबादी को शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के विश्वासघाती राजा जगन्नाथ सिह के भाई बलदेव सिंह ने धोखे से गोली मार कर शहीद कर दिया था। 1857 के इंकलाब के दौरान मौलवी अहमदुल्लाह शाह शुमाली हिन्दुस्तान की एक अहम् शख्सियत थे। अग्रेंज उन्हें लाख कोशिशों के बाद भी कभी जिंदा नहीं पकड़ सके थे। अपने हर मंसूबों में नाकामयाब होने के बाद अंग्रेजों ने उनके सर की कीमत 50.000 रूपये रख दी। जिसके लालच में मुल्क के गद्दारों ने उन्हें शहीद कर दिया।
मौलवी अहमदउल्ला शाह की पहचान 1857 के इंक़लाब के दौरान एक फौलादी शेर के रूप में होती थी। 1857 का इंकलाब कामयाब तो नहीं हो सका लेकिन इस इंकलाब ने हर एक हिंदुस्तानी के दिल में आज़ादी का जो बीज बोया उसी वजह से 1947 में आज़ादी मिल सकी। लेकिन आज 1857 का वह शेर जिसने आज़ादी की दीवानगी में अपनी जान की क़ुरबानी दे दी तारीख़ के पन्नों से शायद कहीं गुम हो गया है। अहमदुल्ला का परिवार हरदोई ज़िले के गोपामऊ गावं में रहा करता था। उनके वालिद गुलाम हुसैन खान मैसूर के सुल्तान हैदर अली की फौज में एक सीनियर ऑफिसर थे।
मौलवी अहमदउल्ला शाह का मानना था कि सशस्त्र विद्रोह की कामयाबी के लिए, अवाम का सहयोग बहुत ज़रूरी है। उन्होंने दिल्ली, मेरठ, पटना, कलकत्ता और बहुत सारी जगहों का सफर तय किया और आजादी के बीज बोए। मौलवी और फजल-ए-हक खैराबादी ने भी अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर दिया। उन्होंने 1857 में बगावत के आगाज़ से पहले भी अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद की ज़रूरत के लिए फतेह इस्लाम नामी एक किताब लिखी थी।
जी बी मॉलसन के मुताबिक, "इस में कोई शक नहीं है कि 1857 की बगावत के साजिश के पीछे मौलवी का ज़ेहन और कोशिश अहम् थी। मुहीम के दौरान रोटी की तकसीम, चपाती तहरीक दरअसल इन्ही की ज़ेहनी सोच थी।
जी बी मॉलसन के मुताबिक जब मौलवी पटना में थे तभी ब्रिटिश अफसरों ने ख़ुफ़िया मालूमात के ज़रिये उन्हें पुलिस की मदद से उनके घर से ही गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत और साजिश के इलज़ाम में मौत की सजा सुना दी गयी। बाद में इस सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया। लेकिन बगावत फैलने के बाद बागी सिपाहियों ने जेल को तोड़ कर उन्हें आज़ाद करा लिया।
इसके बाद अंग्रेज कभी उन्हें ज़िंदा नहीं पकड़ सके थे। अंग्रेजों ने उन्हे पकड़ने की कई साजिशें रची लेकिन सभी में नाकामयाब होने के बाद उनके सर की कीमत रख दी गयी 50,000 रूपये। इसी कीमत के लालच में शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के विश्वासघाती राजा जगन्नाथ सिंह के भाई बलदेव सिंह ने 5 जून, 1858 को तब धोखे से गोली चलाकर मौलवी की जान ले ली, जब वो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में मदद मांगने उसके किले पर गए थे।
उसने मौलवी का सिर कटवाकर रूमाल में लिपटवाया और शाहजहांपुर के कलेक्टर के हवाले कर के उससे कीमत वसूल ली। कलेक्टर ने उस सिर को शाहजहांपुर कोतवाली के गेट पर लटकाकर प्रदर्शित किया ताकि जो लोग उसे देखें, वो आगे से सिर उठाने की जुर्रत न करें।
लेकिन कुछ वतनपरस्तों ने अपनी जान पर खेलकर मौलवी का सर वंहा से उतार लिया। और पास के लोधीपुर गांव के एक छोर पर पूरे अक़ीदत और एहतराम के साथ दफ़न कर दिया। वहीं दूर खेतों के बीच आज भी मौलवी की मजार मौजूद है। जहां एक अजब सी ख़ामोशी है। एक ऐसा सिपाही जिसने मुल्क की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी शायद आज वो तारीख के पन्नों में कहीं गुम हो गया है।
साभार History Hour
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
शहज़ादी को गूलर से बहुत प्यार था. उनके बंगले के पीछे तीन बड़े-बड़े गूलर के पेड़ थे. वे इतने घने थे कि उसकी शाखें दूर-दूर तक फैली थी. स्कूल से आकर वह अपने छोटे भाइयों और अपनी सहेलियों के साथ गूलर के पेड़ के नीचे घंटों खेलती. उसकी दादी उसे डांटते हुए कहतीं, भरी दोपहरी में पेड़ के नीचे नहीं खेलते. पेड़ पर असरात (जिन्नात) होते हैं और वह बच्चों को गूलर के पेड़ पर असरात होने की तरह-तरह की कहानियां सुनाया करतीं. लेकिन बच्चे थे कि लाख ख़ौफ़नाक कहानियां सुनने के बाद भी डरने का नाम नहीं लेते थे. दोपहरी में जैसे ही दादी जान ज़ुहर (दोपहर) की नमाज़ पढ़ कर सो जातीं, बच्चे गूलर के पेड़ के नीचे इकट्ठे हो जाते और फिर घंटों खेलते रहते. उनकी देखा-देखी आस-पड़ौस के बच्चे भी आ जाते.
जब गूलर का मौसम आता और गूलर के पेड़ लाल फलों से लद जाते तो, शहज़ादी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. स्कूल में वह सबको बताती कि उनके गूलर के पेड़ फलों से भर गए हैं और वह सबको घर आकर गूलर खाने की दावत देती. उसकी सहेलियां घर आतीं और बच्चे गूलर के पेड़ पर चढ़कर गूलर तोड़ते. दादी जान देख लेतीं, तो खू़ब डांटती और कहतीं, गूलर की लकड़ी कमज़ोर होती है. ज़रा से बोझ से टूट जाती है. ख़ैर, बच्चों ने पेड़ पर चढ़ना छोड़ दिया. चढ़ते भी तो नीचे तने के पास मोटी शाख़ों पर ही रहते. कोई भी ज़्यादा ऊपर नहीं चढ़ता. एक बार शहज़ादी का भाई गूलर पर चलने की कोशिश कर रहा था, और दादी आ गईं. डर की वजह से वह घबरा गया और नीचे गिर गया. उसके हाथ की एक हड्डी पर चोट आई. महीनों प्लास्तर चढ़ा रहा. इस हादसे के बाद बच्चों ने गूलर पर चढ़ना छोड़ दिया. बच्चे एक पतले बांस की मदद से गूलर तोड़ने लगे. वक़्त बदलता रहा और एक दिन उसके घर वालों ने वह बंगला बेच दिया. शहज़ादी जब कभी उस तरफ़ से गुज़रती, तो गूलर के पेड़ को नज़र भर के देख लेती. कुछ दिन बाद बंगले के नये मालिक ने गूलर के तीनों पेड़ कटवा दिए. शहज़ादी को पता चला, तो उसे बहुत दुख हुआ. उसे लगा मानो बचपन के साथी बिछड़ गए. बरसों तक या यूं कहें कि गूलर के पेड़ उसकी यादों में बस गए थे. शहज़ादी बड़ी हुई और दिल्ली में नौकरी करने लगी. एक दिन वह हज़रत शाह फ़रहाद के मज़ार पर गई. वहां उसने गूलर का पेड़ देखा. यह गूलर का पेड़ उतना घना नहीं था, जितने घने उसके बंगले में लगे पेड़ थे. पेड़ की शाख़ें काट दी गई थीं, शायद इसलिए क्योंकि आसपास बहुत से घर थे. पेड़ पर पके गूलर लगे थे और ज़मीन पर कुएं के पास भी कुछ गूलर पड़े थे. शहज़ादी ने गूलर उठाया, उसे धोया और खा लिया. मानो ये गूलर न होकर जन्नत की कोई नेमत हों. वह अकसर जुमेरात को दरगाह पर जाती और गूलर को देख कर ख़ुश होती. इस बार काफ़ी दिनों बाद उसका मज़ार पर जाना हुआ, लेकिन इस बार उसे गूलर का पेड़ नहीं मिला, क्योंकि उसे काट दिया गया था. शहज़ादी को बहुत दुख हुआ. अब वह उस मज़ार पर नहीं जाती, क्योंकि उसे गूलर याद आ जाता. किसी पेड़ का कटना उसे बहुत तकलीफ़ देता है. वह सोचती है कि काश कभी उसके पास एक ऐसा घर हो, जिसमें बड़ा सा आंगन हो और वह उसमें गूलर का पेड़ लगाए. उसका अपना गूलर का पेड़. उसे उम्मीद है कि कभी तो वह वक़्त आएगा, जब उसकी यादों में बसे गूलर के पेड़ उसके आंगन में मुस्कराएंगे.
पौधे लगाएं
अपनी धरा को
सुंदर बनाएं
वातावरण को स्वच्छ बनाएं
आओ
मिलकर पौधे लगाएं
घर-आंगन में
जूही, बेला, गुलाब, चम्पा
और चमेली लगाएं
अपने आस-पड़ौस में
पौधे लगाएं
नीम, बरगद और पीपल लगाएं
पलाश, अमलतास और गुलमोहर से
गांव-शहर को ख़ूब सजाएं
आओ
हम सब मिलकर
पौधे लगाएं
अपनी धरा को सुंदर बनाएं...
-सरफ़राज़ ख़ान
सरफ़राज़ ख़ान
साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी कलम से निकले शब्द सीधे रूह में उतर जाते हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक ऐसा ही चमकता हुआ नाम हैं। उन्हें चाहने वाले 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहते हैं। यह ख़िताब उनकी शख़्सियत और उनके लेखन पर पूरी तरह खरा उतरता है। वे सिर्फ़ एक लेखिका या शायरा नहीं हैं। वे एक इस्लामी विदुषी, कवयित्री, कहानीकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक भी हैं। उनके लेखन में जहां एक तरफ़ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों का अक्स दिखता है, वहीं दूसरी तरफ़ मुहब्बत का बेहद कोमल अहसास भी महसूस होता है। उनकी शायरी दिमाग़ से ज़्यादा दिल पर असर करती है। उनके अअल्फ़ाज़ रूह पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।
रूहानियत और पारिवारिक संस्कार
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का जीवन रूहानियत और सूफ़ी दर्शन के क़रीब रहा है। वे अपनी कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं। उनकी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान उनके सबसे बड़े आदर्श रहे हैं। वे कहती हैं कि उनकी अम्मी बहुत ही नेक और इबादतगुज़ार महिला थीं।
बचपन में उन्हें इबादत करते देखकर ही फ़िरदौस के मन में रूहानी इल्म हासिल करने की चाहत पैदा हुई। उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘फ़हम अल क़ुरआन’ है। वे इसे अपनी ज़िन्दगी का शाहकार (मास्टरपीस) मानती हैं। उनका मानना है कि इंसान की ज़िन्दगी का असली मकसद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। उनका लेखन इसी मंज़िल तक पहुंचने का एक रास्ता है।
बचपन से ही लेखन का जुनून
लिखने का शौक़ डॉ. फ़िरदौस को बचपन से ही लग गया था। जब वे महज़ छठी कक्षा में थीं, तभी उन्होंने अपनी पहली नज़्म लिखी थी। उनके पिता ने उस नज़्म की क़ाबिलियत को पहचाना और उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में छपने के लिए भेज दिया।
पहली ही नज़्म छपने के बाद उन्हें काफ़ी सराहना मिली। इसके बाद लिखने और छपने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। शुरुआती दौर में छोटे अख़बारों से शुरू हुआ उनका सफ़र आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तक पहुंच चुका है। उनकी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' काफ़ी चर्चा में रही है। यह किताब सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित है। पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को बहुत उपयोगी मानते हैं।
मीडिया जगत में अमिट छाप
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का मीडिया करियर भी बेहद शानदार रहा है। उन्होंने दूरदर्शन, आकाशवाणी और कई प्रतिष्ठित अख़बारों और पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम किया है। आकाशवाणी के साथ उनका एक भावनात्मक रिश्ता है। वे कहती हैं कि उन्होंने रेडियो सुनते हुए ही बचपन बिताया।
साल 1996 में जब रेडियो पर उनका पहला प्रोग्राम आया, तो उनके पिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसके बाद साल 2002 में वे दूरदर्शन से जुड़ीं। वहां उन्होंने सहायक समाचार सम्पादक और प्रोड्यूसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने न सिर्फ़ ख़बरें और लेख लिखे, बल्कि टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटकों का भी सफ़ल लेखन किया। देश का शायद ही कोई बड़ा अख़बार ऐसा हो, जिसमें उनके लेख प्रकाशित न हुए हों।
मुशायरों और कला की दुनिया
लेखन के साथ-साथ डॉ. फ़िरदौस ने संगीत की दुनिया में भी हाथ आज़माया है। उन्होंने कई सालों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली है। उनकी आवाज़ और शब्दों का जादू मुशायरों और कवि सम्मेलनों में ख़ूब चलता है।
जब उनकी रचनाएं गोपालदास नीरज जैसे महान कवि की पत्रिका ‘गीतकार’ में छपीं, तो उन्हें देशभर से न्योते आने लगे। उन्होंने सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में भी शिरकत की है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।
सम्मान और पुरस्कारों का सिलसिला
बेहतरीन पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। साल 2014 में एबीपी न्यूज़ चैनल ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के पुरस्कार से नवाज़ा था। साल 2005 में अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टीट्यूट ने उन्हें कामयाब महिलाओं की सूची में नामांकित किया था। उन्हें दो मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के अवॉर्ड से सम्मानित किया। लेकिन डॉ. फ़िरदौस का मानना है कि सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का प्यार है। वे कहती हैं कि उनके लफ़्ज़ ही उनकी असली पहचान हैं।
भाषाओं पर पकड़ और अनुवाद
वे एक बहुभाषी लेखिका हैं। वे हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखती हैं। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं को विदेशों में भी ख़ूब पसंद किया जाता है। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदेमातरम्' का पंजाबी में अनुवाद किया है।
उनके इस अनुवाद की साहित्यिक हलक़ों में ख़ूब चर्चा हुई। वे पंजाबी पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं।
डिजिटल युग और ब्लॉगिंग
आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो रहा है, डॉ. फ़िरदौस ने ब्लॉगिंग के ज़रिये भी अपनी बात पहुंचाई है। उनके कई मशहूर ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ ब्लॉग पर लोग क़ुरआन करीम की उनकी व्याख्या पढ़ सकते हैं। ‘फ़िरदौस डायरी’ में उनके लिखे गीत, गज़ल और कहानियां मौजूद हैं। ‘मेरी डायरी’ ब्लॉग पर वे समाज, पर्यावरण, राजनीति और समसामयिक विषयों पर अपने विचार साझा करती हैं। इसके अलावा उर्दू के लिए ‘जहांनुमा’ और पंजाबी के लिए ‘हीर’ जैसे ब्लॉग के ज़रिये वे अपनी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ उनका इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है।
देश सेवा और सामाजिक सरोकार
डॉ. फ़िरदौस का व्यक्तित्व सिर्फ़ क़लम तक सीमित नहीं है। वे समाज सेवा में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने हिसार में नागरिक सुरक्षा विभाग में पोस्ट वार्डन के तौर पर काम किया है। वे 'अनुराग साहित्य केन्द्र' की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं। हाल ही में यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक प्रेरक लेखिका के रूप में शामिल किया गया है।
अपनी इच्छाओं के बारे में वे बहुत ही सादगी से कहती हैं कि उन्होंने ज़िन्दगी में जितना मांगा, ख़ुदा ने उससे कहीं ज़्यादा दिया। वे नफ़रत और जलन जैसी भावनाओं से कोसों दूर रहती हैं। उनका मानना है कि इंसान का अख़लाक (आचरण) ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है। उनके जीवन का सफ़र उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपनी परम्पराओं से जुड़े रहकर दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान की क़लम आज भी समाज को नई दिशा दे रही है और मुहब्बत के पैग़ाम को आम कर रही है।
साभार आवाज़
Sarfaraz Khan
Dr Firdaus Khan is an Islamic scholar, poet, short-story writer, journalist, and translator. Known as “The Princess of the Isle of Words”, her writings are about life’s hardships. Through her poetry, she conveys the soft sensations of love. Her poetry touches the minds and hearts of listeners.
Dr Firdaus Khan is associated with the Sufi tradition. She considers her late parents, Khushnudi Khan alias Chandni Khan, and Sattar Ahmad Khan, as her ideals.
The author of Fahm al-Qur’an, a highly acclaimed book, says, “My mother was a very pious and devout woman. From childhood, I saw her immersed in worship. Watching her awakened our interest in worship, and at a very young age, a desire to acquire spiritual knowledge also took root. While writing Fahm al-Qur’an, I realised that I had not wasted my life on transient things. In truth, the purpose of our life is to seek Allah’s pleasure. My work is the path that leads me to that destination; it is part of that very discipline.”
She also wrote Pioneers of Ganga–Jamuni Culture, a book based on the lives and philosophies of Sufi saints, published in 2009 by Prabhat Prakashan Group’s Gyan Ganga. The book is widely discussed and is referred to by PhD scholars working on devotional and Sufi traditions.
She recalls: “I wrote my first poem in the sixth grade. I recited it to my parents, and they loved it. Father got it published in an evening newspaper. The poem was widely praised. Thus began my journey of writing and publication.”
Dr Firdaus Khan worked with Doordarshan, All India Radio, and prestigious newspapers and magazines of the country for many years.
“I share a heartfelt bond with All India Radio. I grew up listening to the radio, and later became associated with it. Our first radio program was broadcast on December 21, 1996. Everyone at home was so happy that day—Papa’s joy knew no bounds. I have countless beautiful memories connected with radio, and my affection for it remains just as strong today. Similarly, I have many cherished memories with Doordarshan.
“As children watching television, we never imagined we would one day become part of it ourselves. In November 2002, we joined Doordarshan as a producer and assistant news editor. That period, too, was a very beautiful and memorable time in my life.”
In addition, she has written scripts for many documentaries, television plays, and radio dramas. She also writes for newspapers, magazines, books, and news and feature agencies in India and abroad.
She has served as editor of the monthly Paigham-e-Madre-Watan and as an editorial advisor to the monthly Vanchit Janata. Currently, she is an editor with Star News Agency.
Dr Firdaus Khan has also participated in mushairas and poetry conferences. She trained in Hindustani classical vocal music for several years. She says:
“After my poem was published in the literary magazine Geetkar, I started receiving invitations for mushairas that began arriving from far and wide. We also had the opportunity to participate in a national poetry conference organised by India’s Ministry of Culture, along with many other literary gatherings.”
For excellence in journalism, skilled editing, and outstanding writing, she has received numerous awards. On Hindi Day, September 14, 2014, ABP News honoured her in Delhi with the Best Blogger award for her writing on literary subjects.
In 2005, the American Biographical Institute’s Professional Women’s Advisory Board nominated her for its list of successful women. Government College, Hisar, honoured her with the Best Writer award, and the Haryana Small Newspapers Association conferred upon her the Best Journalist award. She has received many other honours as well, including two honorary doctorates. She says:
“Our words translate our emotions and thoughts, because our words are our identity. Readers liking what we write is the greatest honour for us.”
Dr. Firdaus Khan writes in Urdu, Hindi, Punjabi, and English. Her English poems are especially appreciated abroad. She translated the national song Vande Mataram into Punjabi, which received wide acclaim.
She has also served as editor of Bhor Da Tara, a Punjabi journal of Government College, Hisar. She wrote a poem on Rahul Gandhi as well, which was widely praised.
She also writes blogs and maintains several of them. Fahm al-Qur’an is her blog on the Holy Qur’an, featuring her writings of the same name. Firdous Diary hosts songs, ghazals, poems, stories, and other literary pieces.
Meri Diary focuses on society, environment, health, literature, art and culture, politics, and contemporary issues. The Princess of Words features English poems and writings. Jahannuma is dedicated to Urdu writings, Heer to Punjabi writings, and Rahe-Haq to spiritual writings.
Dr Firdaus Khan has also been associated with public service. She worked for several years as a post warden with the Civil Defence Department in Hisar. She is also the founder and president of Anurag Sahitya Kendra.
-लाल बिहारी लाल
तंबाकू के इतिहास की बात करे तो सन 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने पहली बार सैन साल्वाडोर द्वीप पर तंबाकू की खोज की थी। और अपनी दूसरी यात्रा के दैरान स्पेन में तंबाकू के पते लेकर आए। सन1558 में तंबाकू के बीज पूरे यूरोप महाद्वीप में फैल गए और उपनिवेशवादियों के आक्रमण के साथ धीरे –धीरे यह सारी दुनिया में फैल गई।
सन 1988 से 31 मई को दुनिया भर में हर साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य तंबाकू सेवन के व्यापक प्रसार से नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों की ओर आम जन का ध्यान आकर्षित करना और इसके दुष्प्रभावो से जीवों को बचाना है, जो वर्तमान में दुनिया भर में हर साल 70 लाख से अधिक मौतों का कारण बनता है, जिनमें से 8,90,000 गैर-धूम्रपान करने वालों का परिणाम दूसरे नंबर पर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देशों ने सबसे पहले 1987 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाने को सोंचा औऱ सनं 1988 से लगातार मनाते आ रहे है। पिछले तीन दसक से दुनिया भर में इसके पक्ष औऱ विपक्ष दोनों तरफ के लोग खड़े मिले है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 7 अप्रैल 1988 को एक संकल्प पारित किया जिसके तहत 24 घंटे दुनिया को तंबाकू पर रोक लगाने का आह्वाहन किया गया जिससे इसे छोड़ने वाले को प्रेरित किया जा सके इसी सोंच का परिणाम निकला कि 31 मई 1988 से हर साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाते आ रहे है।
वर्ष 2003 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के पहल पर तंबाकू निषेध के लिए एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य पर संधि हुआ। वर्ष 2008 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस की पूर्व संध्या पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की और से एक आह्वाहन सारी दुनिया को की गई की तंबाकू के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाई जाये।
आज जरुरी है कि ध्रूम्रपान को न कहा जाये क्योकि इसके परिणाम से कितना जीव और घऱ बर्वाद हो चुके है। स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों जरुरी है इसलिए भारत को आज तंबाकू मुक्त बनाने की जरुरत है।अशके लिए सरकार के साथ साथ हम सब को भी स्वतः पहल करना होगा।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ईद उल अज़हा का ताल्लुक़ हज से है. हज इस्लाम के पांच सुतूनों में से एक है. इस्लाम के पांच सुतूनों में कलमा, रोज़ा, नमाज़, ज़कात और हज शामिल है. हज के दूसरे दिन क़ुर्बानी होती है. क़ुर्बानी हज का एक अहम हिस्सा है. क़ुर्बानी के बग़ैर हज मुकम्मल नहीं होता. दुनियाभर के मुसलमानों के लिए हर साल हज करना मुमकिन नहीं है. इसलिए वे ईद उल अज़हा के दिन क़ुर्बानी करके अपनी अक़ीदत का इज़हार करते हैं. ये अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. क़ुर्बानी करने वाले मुसलमान हाजियों की तरह ही ज़ुल हिज्जा का चांद दिखने के बाद अपने बाल और नाख़ून नहीं काटते और ख़ुद को बुराइयों से बचाते हैं.
क़ुरआन करीम में हज और क़ुर्बानी का ज़िक्र
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के साथ मिलकर मक्का में पत्थर की एक घनाकार इमारत की तामीर की थी. इसे अल्लाह का घर कहा जाता है. क़ुरआन करीम में इसका ज़िक्र है. अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए ख़ाना ए काबा की तामीर की जगह मुहैया कर दी और उनसे कहा कि हमारे साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराना और हमारे घर को तवाफ़ करने वालों और क़याम करने वालों और रुकू करने वालों और सजदे करने वालों के लिए पाक साफ़ रखना. और लोगों के दरम्यान हज का ऐलान कर दो कि वे तुम्हारे पास पैदल और दुबले ऊंटों पर सवार होकर दूर दराज़ के रास्तों से चले आएं, ताकि वे दुनिया व आख़िरत के फ़ायदे के लिए हाज़िर हों और चन्द मुक़र्रर दिनों के अंदर अल्लाह का नाम लेकर उन चौपायों को ज़िबह करें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. फिर तुम लोग क़ुर्बानी का गोश्त ख़ुद भी खाओ और बदहाल फ़क़ीरों को भी खिलाओ.
फिर लोगों को चाहिए कि वे अपनी कशाफ़्त दूर करें और अपनी नज़रें पूरी करें और अल्लाह के क़दीम घर ख़ाना ए काबा का तवाफ़ करें. यही हुक्म है. और जो अल्लाह की हुरमत वाली चीज़ों की ताज़ीम करता है, तो यह उसके परवरदिगार के यहां उसके लिए बेहतर है. और तुम्हारे लिए तमाम चौपाये हलाल कर दिए गए हैं, सिवाय उन जानवरों के जिनकी तफ़सील तुम्हें पढ़कर सुना दी गई है. लिहाज़ा तुम बुतों की निजासत से बचा करो और झूठी बातों से भी परहेज़ किया करो. तुम सिर्फ़ अल्लाह ही के होकर रहो. उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ. और जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करता है, तो वह ऐसा है जैसे आसमान से गिर पड़े. फिर उसे कोई परिन्दा उचक ले जाए या हवा उसे किसी दूर दराज़ की जगह पर ले जाकर फेंक दे. यही हुक्म है. और जो अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करता है, तो बेशक यह ताज़ीम भी दिलों के तक़वे से ही हासिल होती है. तुम्हारे लिए इन क़ुर्बानी के चौपायों में मुक़र्रर मुद्दत तक बहुत से फ़ायदें हैं. फिर उन्हें क़ुर्बानी के लिए क़दीमी घर ख़ाना ए काबा तक पहुंचना है. और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी मुक़र्रर कर दी है, ताकि वे उन चौपायों को ज़िबह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. लिहाज़ा तुम्हारा माबूद माबूदे यकता है. फिर तुम उसी के फ़रमाबरदार बन जाओ. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम आजिज़ी करने वालों को जन्नत की खु़शख़बरी सुना दो. ये वे लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उन पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो सब्र करते हैं. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है, उसमें से अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं. और हमने क़ुर्बानी के ऊंट को भी अल्लाह की निशानियों में से क़रार दिया है. इसमें तुम्हारे लिए ख़ैर है. फिर तुम उन्हें क़तार में खड़ा करके अल्लाह का नाम लो. फिर जब वे ज़िबह होकर पहलू के बल ज़मीन पर गिर जाएं, तो उनके गोश्त में से तुम खु़द भी खाओ और सवाल न करने वाले मोहताजों को भी खिलाओ और सवाल करने वाले मोहताजों को भी खिलाओ. इसी तरह हमने उन्हें तुम्हारे ताबे कर दिया है, ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो. अल्लाह को न क़ुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न उसका ख़ून. लेकिन अल्लाह की बारगाह में तुम्हारा तक़वा पहुंचता है. अल्लाह ने चौपायों को इसलिए तुम्हारे क़ाबू में किया है, ताकि तुम उन्हें ज़िबह करते वक़्त अल्लाह की तकबीर कहो, जैसे उसने तुम्हें हिदायत दी है. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम मोहसिनों को जन्नत की ख़ु़शख़बरी सुना दो.
(22: 26-37)
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद के वक़्त में लोगों ने बुतों की पूजा शुरू कर दी. उन लोगों के अपने-अपने बुत थे. काबे में बहुत से बुत रख दिए गए, जिनकी तादाद 360 थी. फिर वक़्त ने करवट ली और अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में काबे से सारे बुत हटा दिए गए और उसे उसकी पहली हालत में लाया गया. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा के साथ एक सफ़र किया और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को फिर से क़ायम किया. इसे हज कहा जाता है. हज पांच दिन में मुकम्मल होता है और इसका आख़िरी अरकान क़ुर्बानी है. क़ुर्बानी का यही दिन ईद उल अज़हा के नाम से जाना जाता है. इसी दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को क़ुर्बान किया था.
हज इंसान को तमाम तरह की बुराइयों से बचने की तरग़ीब देता है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “हज के चन्द महीने हैं यानी शव्वाल, ज़ुलक़ादा और ज़िलहिज्जा. फिर जो इन महीनों में नीयत करके ख़ुद पर हज लाज़िम कर ले, तो वह हज के दिनों में न बेहयाई करे, न कोई और गुनाह करे और न किसी से झगड़ा करे. और तुम जो भी नेकी करोगे, तो अल्लाह उसे ख़ूब जानता है. और तुम आख़िरत के सफ़र का सामान जुटा लो. और बेशक सबसे बेहतर ज़ाद राह परहेज़गारी है. और ऐ अक़्लमंदो ! हमसे डरते रहो. और तुम पर इस बात में कोई गुनाह नहीं है कि अगर तुम हज के दिनों में तिजारत के ज़रिये अपने परवरदिगार का फ़ज़ल भी तलाश करो. फिर जब तुम अराफ़ात से वापस आओ, मशअरुल हराम के पास अल्लाह का ज़िक्र किया करो और उसका ज़िक्र इस तरह करो जैसे तुम्हें हिदायत दी गई है. और बेशक इससे पहले तुम गुमराह थे. फिर तुम वहीं से जाकर वापस आया करो, जहां से और लोग वापस आते हैं. और अल्लाह से मग़फ़िरत चाहो और बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है. फिर जब तुम हज के अरकान मुकम्मल कर चुको, तो मिना में अल्लाह का ख़ूब ज़िक्र किया करो जैसे अपने बाप दादाओं का ज़िक्र करते हो या उससे भी ज़्यादा ज़िक्र किया करो. फिर लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो कहते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें दुनिया में ही अता कर दे और ऐसे शख़्स के लिए आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं है. और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो दुआ मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें दुनिया में भी अच्छाई अता कर और आख़िरत में भी अच्छाई दे और दोज़ख़ के अज़ाब से महफ़ूज़ रख. यही वे लोग हैं, जिनके लिए उनकी नेक कमाई में से हिस्सा है. और अल्लाह जल्द हिसाब करने वाला है. और गिनती के उन चन्द दिनों में अल्लाह का ख़ूब ज़िक्र किया करो. फिर जो मिना से वापसी में दो ही दिन में चल पड़ा, तो उस पर भी कोई गुनाह नहीं है. और जो तीसरे दिन तक ठहरा, तो उस पर भी कोई गुनाह नहीं है. लेकिन यह हुक्म उसके लिए है, जो परहेज़गार हो. और अल्लाह से डरते रहो और जान लो कि बेशक तुम सबको उसके हुज़ूर में जमा किया जाएगा.
(2: 197-203)
जब इंसान कुछ दिन बुरे कामों से बचा रहता है, तो वह नेकी के रास्ते पर चलने लगता है. इंसान का अपना कुछ भी नहीं है. सब कुछ अल्लाह ही का है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि बेशक मेरी नमाज़ और मेरा हज और क़ुर्बानी और मेरी ज़िन्दगी और मेरी मौत सब अल्लाह ही के लिए है, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है.
(6: 162)
बेशक हज और क़ुर्बानी अल्लाह की रज़ा हासिल करने का ज़रिया है. ये हमारे दीन का एक अहम हिस्सा है. अल्लाह को क़ुर्बानी बहुत अज़ीज़ है.
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़
तस्वीर : गूगल










