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डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के महान राजनेता ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का हरियाणा के फ़रीदाबाद से गहरा रिश्ता है. दरअसल आज के नये औद्योगिक शहर फ़रीदाबाद के विकास की बुनियाद ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने ही रखी थी और इसे परवान चढ़ाने में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की भी अहम भूमिका थी. 

हुआ यूं कि देश के बंटवारे के वक़्त उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के बन्नू, डेरा इस्माइल ख़ान, कोहाट, हज़ारा, मरदान और पेशावर आदि ज़िलों के तक़रीबन 50 हज़ार लोग उजड़कर आशियाने की तलाश में हिन्दुस्तान आ गए. इनमें से ज़्यादातर लोगों ने हरियाणा के ऐतिहासिक नगर कुरुक्षेत्र में पनाह ली. यहां वे शरणार्थी शिविरों में रहने लगे. चूंकि ये लोग ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के समर्थक थे, इसलिए पंडित जवाहरलाल नेहरू ख़ुद उनका ख़्याल रखा करते थे. कहा जाता है कि हिन्दुस्तान की हुकूमत उन्हें राजस्थान के अलवर और भरतपुर ज़िलों में बसाना चाहती थी, लेकिन वे लोग दिल्ली के आसपास ही रहना चाहते थे. शायद वे राजस्थान की प्राकृतिक परिस्थितियों में ख़ुद को ढाल पाने में असमर्थ महसूस कर रहे थे. ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के ख़ुदाई ख़िदमतगार संगठन के सदस्यों ने एकजुट होकर अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस प्रदर्शन के ज़रिये वे हुकूमत तक अपनी मांगें पहुंचाना चाहते थे. इन लोगों में कन्हैया, निहाल चंद, सुखराम, पंडित गोबिन्द दास, पंडित अनंत राम, ख़ुशीराम, चौधरी दयालागंद, दुली चौधरी, जेठा नंद और छत्तू राम गेरा आदि शामिल थे. जब उन्होंने देखा कि उनके प्रदर्शन का हुकूमत पर कोई असर नहीं हो रहा है, तो वे जुलाई 1948 में कुरुक्षेत्र छोड़कर दिल्ली चले गए और पुन: स्थापना मंत्रालय के सामने अपना आन्दोलन शुरू कर दिया. इस आन्दोलन के दौरान वे अपनी गिरफ़्तारियां देने लगे. जब आन्दोलन तेज़ होने लगा, तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए अपने ख़ास सलाहकार मृदुला साराभाई को उनके पास भेजा. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे किसी भी हाल में राजस्थान में बसने के लिए तैयार नहीं हुए. आख़िरकार सरकार को उनके लिए नया शहर बसाने का फ़ैसला लेना पड़ा. पहले कई शहरों के विकास के बारे में सलाह-मशविरा किया गया. फिर बात फ़रीदाबाद पर आकर ख़त्म हुई. इस तरह 17 अक्टूबर 1949 को दिल्ली के क़रीबी राज्य हरियाणा में नये औद्योगिक शहर फ़रीदाबाद की बुनियाद रखी गई.      

डॉ. मुनीश परवेज़ बताते हैं कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फ़रीदाबाद के विकास में ख़ास दिलचस्पी ली. फ़रीदाबाद के विकास के लिए उन्होंने कैबिनेट मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और फ़रीदाबाद विकास बोर्ड के गठन को मंज़ूरी दी. उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया और महात्मा गांधी के क़रीबी सुधीर घोष को बोर्ड के मुख्य प्रशासक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. बोर्ड की ख़ास बात यह भी थी कि प्रधानमंत्री ख़ुद इसके आमंत्रित सदस्य थे और उन्होंने बोर्ड की कुल 24 बैठकों में से 21 में शिरकत की, ताकि इसके काम पर निगरानी रख सकें. इसका असर ये हुआ कि काम तयशुदा वक़्त यानी अढाई साल में पूरा हो गया और लागत भी इसके लिए जारी की गई रक़म पांच करोड़ से कम यानी 4.64 करोड़ रुपये आई. बोर्ड ने बाक़ी रक़म सरकार को वापस लौटा दी. उस वक़्त बोर्ड ने 5196 मकान बनाने का फ़ैसला किया था. ये सभी मकान 233 वर्ग गज़ के थे. मकान की क़ीमत बहुत ही वाजिब रखी गई और लोगों को मामूली मासिक क़िस्तों पर मकान दिए गए. शहर को पांच हिस्सों में तक़सीम किया गया. इसके अलावा शहर में सड़कें, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, सिनेमाघर, पावर हाउस, वाटर वर्क्स और एक औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया. यहां इन लोगों को रहने के लिए मकान मिले और रोज़गार मिला. इस तरह सरकार ने शरणार्थियों को रोटी, कपड़ा और मकान दिया. शहर दिनोदिन तरक़्क़ी करने लगा. आज फ़रीदाबाद औद्योगिक शहर किसी परिचय का मोहताज नहीं है. क़ाबिले-ग़ौर है कि बादशाह जहांगीर के ख़ज़ांची शेख़ फ़रीद ने इस शहर को बसाया था. उन्होंने यहां एक क़िला, एक तालाब और एक मस्जिद बनवाई थी. उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम फ़रीदाबाद पड़ा. 

स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे एलसी जैन ने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के फ़रीदाबाद से रिश्ते को लेकर 330 पृष्ठों की एक पुस्तक लिखी है- द सिटी ऑफ़ होप : द फ़रीदाबाद स्टोरी. साल 1998 में प्रकाशित इस पुस्तक में जैन दावा करते हैं कि फ़रीदाबाद में विस्थापितों को बसाने के लिए देश का यह पहला प्रयोग था. लेखक ने शहर बसाने से लेकर इसके औद्योगीकरण को बहुत क़रीब से देखा है. उन्हें उम्मीद है कि उम्मीदों का यह शहर किसी न किसी दिन बहुत ऊंचाइयों को छुएगा. हालांकि हाल के दिनों में शहर की स्थिति बदतर ही हुई है.

ग़ौरतलब है कि ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म 6 फ़रवरी 1890 को पेशावर में हुआ था। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिताया. उन्होंने हिन्दुस्तान की सरज़मीन को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने की मुहिम में बढ़-चढ़कर शिरकत की थी. जंगे-आज़ादी में वे महात्मा गांधी के साथ थे. वे भी महात्मा गांधी की तरह अहिंसा के हिमायती थे. महात्मा गांधी उनके विचारों और उनकी निष्ठा के क़ायल थे. महात्मा गांधी उनके बारे में लिखते हैं- “वह तो असंदिग्ध रूप से ईश्वर-भीरू पुरुष हैं. उनकी प्रतिरक्षण की अखंड उपस्थिति में उनकी परम श्रद्धा है और वह बख़ूबी जानते हैं कि उनका आन्दोलन तभी प्रगति करेगा जब ईश्वर की वैसी इच्छा होगी. ईश्वर के इस कार्य में अपनी सारी आत्मा को उड़ेलकर परिणाम की वह बहुत ज़्यादा फ़िक्र नहीं करते.”     

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने साल 1929 में ख़ुदाई ख़िदमतगार नाम के संगठन की स्थापना की थी. इस संगठन को सुर्ख़ पोश यानी लाल कुर्ती दल के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इसके सदस्य लाल कुर्ती पहनते थे, जो क़ुर्बानी का प्रतीक थी. उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में जातीय समूहों ख़ासकर पठानों को एकजुट करके ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ एक अहिंसक आंदोलन चलाया था. इसीलिए उन्हें सरहदी गांधी या सीमान्त गांधी भी कहा जाता है. उन्हें बच्चा ख़ान और बादशाह ख़ान भी कहा जाता है.   

उन्होंने हमेशा देश के बंटवारे का विरोध किया. वे मुस्लिम लीग द्वारा की जाने वाली देश के बंटवारे की मांग के सख़्त ख़िलाफ़ थे. लेकिन जब कांग्रेस ने देश का बंटवारा क़ुबूल कर लिया, तो उन्हें बहुत दुख हुआ. बंटवारे के बाद उन्होंने अपनी जन्मभूमि पेशावर में ही रहने का फ़ैसला किया. उन्होंने पख़्तूनों के हक़ की लड़ाई जारी रखी. उन्होंने पाकिस्तान हुकूमत से पख़्तूनों के लिए अलग पख़्तूनिस्तान की मांग की, जिससे वहां की हुकूमत उनके ख़िलाफ़ हो गई और उन पर नज़र रखी जाने लगी. साल 1988 में पाकिस्तान हुकूमत ने उन्हें उनके घर में ही नज़रबंद कर दिया. उसी दौरान 20 जनवरी 1988 को उनकी मौत हो गई. ताउम्र उन्हें बंटवारे का दुख रहा. वे एकता और अखंडता के हिमायती थे. साल 1987 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा था. वे पहले ग़ैर भारतीय थे, जिन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया गया. 

क़ाबिले-ग़ौर है कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 5 जून 1951 को फ़रीदाबाद में शरणार्थियों के लिए एक अस्पताल बनवाया था. उन्होंने इस अस्पताल का नाम ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के नाम पर बादशाह ख़ान अस्पताल रखा था. साल 2020 में हरियाणा सरकार ने इसका नाम बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी सामान्य अस्पताल कर दिया. भले ही सरकार ने अस्पताल का नाम बदल दिया है, लेकिन बादशाह ख़ान अपने उत्कृष्ट कार्यों की बदौलत लोगों के दिलों में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे.

महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान पर एक किताब लिखी है, जिसका नाम है ‘ग़फ़्फ़ार ख़ान: नॉनवाइलेंट बादशाह ऑफ़ द पख़्तूंस’. किताब के लेखक राजमोहन गांधी का कहना है कि महात्मा गांधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को अपना भाई मानते थे, लेकिन भारत ने उन्हें भुला दिया है. अपनी किताब का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं कि हर किताब की एक यात्रा और इतिहास होता है। मेरी इस किताब की शुरुआत तबसे होती है जब मैं 10 साल का था. मेरे पिताजी गांधीजी के चौथे बेटे देवदास गांधी दिल्ली में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे. उस समय बादशाह ख़ान हमारे घर दो बार रुके. तब से मेरा उनसे संबंध रहा. 1969 में उनका एक ज़बरदस्त भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने ग़रीबी, भ्रष्टाचार और नागरिक अधिकारों के हनन पर बहुत प्रभावी बातें कही थीं. फिर 1987 में देहांत से एक साल पहले इलाज के सिलसिले में वह मुंबई आए थे, तब भी कुछ बातें हुई थीं. 2001 में मैं पाकिस्तान गया और असफंदयार ख़ान, जो बादशाह ख़ान के पोते हैं, उनसे मिला. उन्होंने मुझसे कहा कि बहुत अफ़सोस है कि कोई अच्छी बायोग्राफ़ी बादशाह ख़ान की नहीं है. तब मुझे लगा कि मुझे उन पर काम करना चाहिए. उन पर बहुत दस्तावेज़ मौजूद नहीं थे, लेकिन अमेरिका के इलिनॉय विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में मुझे उनकी लिखी आत्मकथा मिल गई. उससे भी मुझे इस किताब को लिखने में मदद मिली. एक और चीज़ मैं बताना चाहूंगा, मेरे पिताजी जब 30-31 साल के थे, तब वे दोनों जेल में साथ ही रहे थे. उन दोनों का जो संबंध था, उसकी भी मेरे किताब लिखने के पीछे एक भूमिका है. जिस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपना जीवन जिया, उनमें निर्भीकता, त्याग, तकलीफ़ के लिए तैयार रहना और अहिंसा प्रमुख है. दुनिया में जेल में लंबे समय तक रहने का उनका रिकॉर्ड है. 1987 में उनके देहांत से एक साल पहले उनसे मैं मिला, तो उन्होंने कहा कि क़ुरान में जो एक शब्द सबसे ज़्यादा है- सब्र, सब्र करो. बादशाह ख़ान की राय में अहिंसा और धैर्य का एक-दूसरे से ज़बरदस्त संबंध है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल     


रोहतक के टीपू सुल्तान रिसालदार बशारत अली राव, राव बाबर खाँ और राव साबर खाँ, जिन्होंने रोहतक जेल पर अपना झंडा फहरा दिया था! 
रोहतक ज़िले के रांघड़ मुस्लिम बड़ी संख्या में ईस्ट इंडिया कंपनी की रेगुलर रेजिमेंट में बतौर सैनिक काम कर रहे थे। वो छुटियों में अपने अपने गाँव आ कर लोगों को अंग्रेज़ों के खिलाफ बग़ावत के लिए तैयार करने लगे, जिसकी भनक लगते ही रोहतक के कलेक्टर 'जॉन एडम लोच' ने छुट्टी पर गये सभी सैनिकों को हेडक्वार्टर में वापस आने के आदेश जारी कर दिए। 
लेकिन तब तक लोगों में बग़ावत ज़ोर पकड़ने लगी और इस आग में घी का काम बहादुर शाह ज़फर के दूत तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ने किया जो एक छोटी फ़ौज की टुकड़ी लेकर रांघड़ो से मिल गया। रोहतक के कलेक्टर जॉन एडम लोच ने बागियों का सामना न कर पाने की हालत में अपने अधिकारियों सहित वहाँ से भाग जाना ज़्यादा मुनासिब समझा। 
अँगरेज़ अफसरों के भागने के बाद अपने सामने खुला मैदान देख रोहतक के राँघड़ो ने सरकारी ऑफिस और बंगलो में आग लगा दी और रोहतक जेल से कैदियों को आज़ाद करा लिया। राँघड़ो के हाथों कोई अंग्रेज़ तो मारा नहीं गया लेकिन उन्होंने अंग्रेजी सरकार के संस्थानों को काफी नुक़सान पहुँचा कर अपना झंडा फहरा दिया। 
बागियों को क़ाबू करने के लिए थॉमस सीटोन के नेतृत्व में जॉन एडम लोच 60th regiment native infantry के साथ रोहतक पहुंचा, उन्होंने रेजिमेंट के साथ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट रोहतक में कैंप बनाया। बाग़ी हालातों को देख कर अँगरेज़ अधिकारियो को सैनिकों पर भरोसा नहीं था और हुआ भी वही रेजिमेंट में बग़ावत हो गयी 
रांघड़ो ने इस मौक़े का फायदा उठाया व राव बाबर खाँ की क़यादत में बग़ावत को और सख़्त कर दिया। रंघड़ो का विद्रोह सबसे खतरनाक दो वजहों से रहा एक तो बड़ी तादाद में रांघड़ सैनिकों की रेजिमेंट का विद्रोहियों के साथ शामिल हो जाना और दूसरा उन्हें बशारत अली और बाबर खाँ जैसे अच्छे लीडर मिल जाना।
बशारत अली की क़यादत में रंघड़ो ने रोहतक का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ों से आज़ाद करा लिया, दिल्ली पंजाब जीटी रोड पर बढ़ने से रोकने लिए मेजर जनरल विल्सन ने लेफ्टिनेंट हडसन को 6 अँगरेज़ अधिकारियों और  हथियारबंद 361 सिपाहियों के साथ रोहतक भेजा।
इस खबर के मिलते ही रिसालदार बशारत अली राव ने राँघड़ो के साथ खरखौदा के लंबरदार की हवेली में पोजीशन बना ली। और यहीं हडसन की फ़ौज से रांघड़ो का सामना हुआ।
ख़ुद हडसन का कहना है कि रांघड़ रिसालदार की क़यादत में बेमिसाल बहादुरी से लड़े (They fought like devil) लेकिन रिसालदार बशारत अली, अंग्रेजों के अच्छे हथियार और ज़्यादा तादाद में होने की वजह से अपने 25 साथियों के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए। 
मुश्किल से हडसन ने ये लड़ाई ख़त्म ही की थी,  उसे ख़बर मिली कि राव साबर खाँ की क़यादत में रांघड़ कभी भी हमला कर सकते हैं। हडसन इस ख़बर के मिलते ही राव साबर खाँ का सामना करने के लिए निकल पड़ा। तड़के ही लेफ्टिनेंट हडसन की सेना पर 300 रांघड़ घुड़सवार और 1,000 रांघड़ बाग़ी बिजली की तरह टूट पड़े। इस भीषण हमले के बाद हडसन और उसके बचे खुचे साथियों को जींद के राजा और जाटों की मदद से दिल्ली भगाना पड़ा।
प्रस्तुति : आमिर ख़ान मेव 
Source: Haryana state Gazetteer
 
 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है. क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है.

भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है. यहां 'द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी' नाम से इसे मनाया जाता है. माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे.

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था. 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था.

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा. वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्म  हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे. उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं.

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.

पुरानी कैथोलिक परम्परा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ. हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई. उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री. अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं.गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है. यह हमारे देश की सदियों पुरानी परम्परा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह. 


हरियाणा के नूंह ज़िले के तावडू क़स्बे में आज मेवात विकास सभा के तत्वावधान में मेवात दिवस समारोह भव्य रूप से मनाया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने मेवात के गौरवशाली इतिहास, देशभक्ति और सामाजिक एकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का आयोजन तावडू के हरद्वारी लाल गोयल राजकीय महाविद्यालय के पुष्पा ऑडिटोरियम में किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अशोक गर्ग ने की। मुख्य अतिथि ज़िला प्रमुख जान मोहम्मद रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में भाजपा ज़िलाध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह और पंचायत विभाग के जॉइन्ट डायरेक्टर ऋषि डांगी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में मेवात विकास सभा के अध्यक्ष फ़क़रुद्दीन ने सभी अतिथियों व आगंतुकों का स्वागत किया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अशोक गर्ग ने कहा कि मेवात का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। उन्होंने कहा कि विभाजन के कठिन दौर में मेवात के लोगों ने देश को सर्वोपरि रखा और भारत को नहीं छोड़ा। यही कारण है कि मेवात की धरती देशभक्ति, साहस और त्याग की मिसाल है। उन्होंने कहा कि मेवात से उनका विशेष भावनात्मक लगाव है और यहां आकर उन्हें गर्व की अनुभूति होती है। उन्होंने कहा मेवात का इतिहास सामाजिक सौहार्द का रहा है। जब बाबरी मस्जिद का प्रकरण हुआ तो यहां अन्य क्षेत्रों के मुक़ाबले शान्ति बनी रही। यहां का भाईचारा देश के लिए मिसाल है। उन्होंने बेटियों की शिक्षा और सशक्तिकरण पर ज़ोर देते हुए कहा कि महिलाओं की भागीदारी सभी क्षेत्रों में सुनिश्चित होनी चाहिए। उन्होंने कहा उन्हें एक बात मेवात की बहुत अच्छी लगती है कि यहां छुआछूत नहीं है, जबकि अन्य इलाक़ों में यह स्थिति अभी भी है। 

क्यों मनाया जाता है मेवात दिवस
वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 1947 के विभाजन के समय जब हरियाणा और राजस्थान के मुस्लिम बड़ी संख्या में पाकिस्तान की ओर पलायन कर रहे थे, उस दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 19 दिसम्बर 1947 को घासेड़ा (गांधी ग्राम) पहुंचे। गांधी जी ने मेवातियों से भारत में ही रहने की मार्मिक अपील की और उन्हें देश की रीढ़ की हड्डी बताते हुए बहादुर क़ौम का ख़िताब दिया। गांधी जी के आह्वान पर लाखों मेवाती पाकिस्तान जाने से रुक गए। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष मेवात विकास सभा द्वारा मेवात दिवस मनाया जाता है।

मेवात विकास सभा के अध्यक्ष फ़क़रुद्दीन ने कहा कि मेवात दिवस मेवात के लोगों की एकता, देशभक्ति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह दिवस न केवल हमें अपने गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश और समाज के लिए कार्य करने की प्रेरणा भी देता है। उन्होंने कहा कि मेवात की संस्कृति और परम्परायें हमारी पहचान हैं, जिन्हें सहेजकर आगे बढ़ाना हम सभी की ज़िम्मेदारी है। इस मौक़े पर पूर्व अध्यक्ष उमर पाड़ला ने कहा मेवात का देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन बावजूद इसके यह क्षेत्र आज भी पिछड़ा हुआ है। उन्होंने मंच से ज़िले में केंद्रीय विद्यालय और फ़ोरलेन सड़क बनवाने तथा बूचड़खानों को बंद करवाने की मांग रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि मेवात को विकास के नाम पर बूचड़खाने मिल रहे हैं। उन्होंने सामाजिक बुराइयों को लेकर एकजुटता दिखाने और इनकी रोकथाम को लेकर प्रभावी क़दम उठाने की बात कही। 

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ज़िला प्रमुख जान मोहम्मद, विशिष्ट अतिथि सुरेन्द्र सिंह, स्पेशल गेस्ट ऋषि डांगी सहित अन्य वक्ताओं ने भी मेवात के इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विकास पर अपने विचार रखे।

पुस्तक विमोचन व सम्मान समारोह 
मेवात दिवस समारोह के दौरान 'बेटी हूं बोझ नहीं' पुस्तक का विमोचन किया गया। पुस्तक में बेटियों के अधिकार, शिक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण पर विस्तृत जानकारी दी गई है।
इसके अलावा समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए हरद्वारी लाल कॉलेज के संस्थापक स्वर्गीय हरद्वारी लाल के पोते बिन्नी गोयल को मेवात रत्न सम्मान से नवाज़ा गया। मेवात विकास सभा के पदाधिकारियों ने उन्हें प्रशंसा पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त न्यायिक परीक्षा पास कर जज बनी सुनारी गांव की रुख़साना को मेवात गौरव अवार्ड से सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर मेवात विकास सभा के संरक्षक सद्दीक़ अहमद मेव, पूर्व अध्यक्ष उमर पाड़ला, अख़्तर हुसैन चंदैनी, वरिष्ठ अधिवक्ता रमज़ान चौधरी, दीन मोहम्मद मामलिका, महासचिव सब्बीर अहमद, नगर पालिका तावडू की चेयरपर्सन सुनीता सोनी, मंडी एसोसिएशन के प्रधान संजय गोयल, दानियाल ख़ान, मौलाना शेर मोहम्मद अमीनी, एडवोकेट ताहिर हुसैन देवला, एडवोकेट सलामूदीन, एडवोकेट समय सिंह सलंबा, नवीन लाठर, शमीम धुलावट, अब्दुल सत्तार सुनारी सहित विभिन्न ब्लॉकों के अध्यक्ष और कार्यकारिणी सदस्य बड़ी संख्या में मौजूद रहे।

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
’लौह महिला’ के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी न सिर्फ़ भारतीय राजनीति पर छाई रहीं, बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी सूरज की तरह चमकीं. उनकी ज़िन्दगी संघर्ष, चुनौतियों और कामयाबी का एक ऐसा सफ़रनामा है, जो अदम्य साहस का इतिहास बयां करता है. अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना किया और हर मोर्चे पर कामयाबी का परचम लहराया. मामला चाहे कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह का हो, अलगाववाद का हो, पाकिस्तान के साथ जंग का हो, बांग्लादेश की आज़ादी का हो, या फिर इसी तरह का कोई और बड़ा मुद्दा हो. हर मामले में उन्होंने अपनी सूझबूझ और साहस का परिचय दिया. बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रीवी पर्स का ख़ात्मा, प्रथम पोखरण परमाणु विस्फोट, प्रथम हरित क्रांति जैसे कार्यों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई और बांग्लादेश की आज़ादी भी उनके साहसिक कार्यों में शामिल है.

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था. उनका पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी था. उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और माता कमला नेहरू थीं. उन्होंने शुरुआती तालीम इलाहाबाद के स्कूल में ही ली. इसके बाद उन्होंने गुरु रबींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया. कहते हैं, रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें ’प्रियदर्शिनी’ नाम दिया था. इसके बाद वे इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं,लेकिन नाकाम हुईं. इसके बाद उन्होंने ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताए. फिर साल 1937 में इम्तिहान में कामयाब होने के बाद उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के सोमरविल कॉलेज में दाख़िला ले लिया. उस दौरान उनकी मुलाक़ात फ़िरोज़ गांधी से हुई, जिन्हें वे इलाहाबाद से जानती थीं. फ़िरोज़ गांधी उन दिनों लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में पढ़ रहे थे. उनकी जान-पहचान मुहब्बत में बदल गई और फिर 16 मार्च 1942 को उन्होंने इलाहाबाद के आनंद भवन में  फिरोज़ से विवाह कर लिया. उनके दो बेटे संजय और राजीव हुए. राजीव गांधी बाद में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने.

बचपन से ही इंदिरा गांधी को सियासी माहौल मिला था, जिसका उनके किरदार और उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर पड़ा. साल 1941 में ऑक्सफ़ोर्ड से स्वदेश वापसी के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं. उन्होंने युवाओं के लिए वानर सेना बनाई. वानर सेना विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस निकालने के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं की भी ख़ूब मदद करती थी, मसलन संवेदनशील प्रकाशनों और प्रतिबंधित सामग्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती थी. आज़ादी की लड़ाई में इसके काम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  1930 की दहाई के शुरू का वाक़िया है, जब इंदिरा गांधी ने पुलिस की निगरानी में रह रहे अपने पिता के घर से एक अहम दस्तावेज़ को अपनी किताबों के बस्ते में छुपाकर गंतव्य तक पहुंचाया था. इस दहाई के आख़िर में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लंदन में आज़ादी के समर्थक दल भारतीय लीग की सदस्य बनीं और विदेश में रहकर भी स्वदेश के लिए काम करती रहीं. सितम्बर 1942 में उन्हें  ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया. आख़िर तक़रीबन 243 दिन जेल में गुज़ारने के बाद उन्हें 13 मई 1943 को रिहा किया गया. साल 1947 के देश के बंटवारे के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित किया और पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए भोजन और चिकित्सा का इंतज़ाम किया. उनके इस कार्य को ख़ूब सराहा गया और इससे उन्हें एक नई पहचान मिली.

1950 की दहाई में इंदिरा गांधी अपने पिता यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी सहायक के तौर पर काम कर रही थीं. साल 1959 वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं. पार्टी के लिए उन्होंने सराहनीय काम किया. 27 मई, 1964 को उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं. साल 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान वे सेना की हौसला अफ़ज़ाई के लिए श्रीनगर सीमा के इलाक़े में गईं. सेना की चेतावनी के बावजूद उन्होंने दिल्ली आना मंज़ूर नहीं किया और सेना का मनोबल बढ़ाती रहीं. उस दौरान लालबहादुर शास्त्री ताशक़ंद गए हुए थे, जहां सोवियत मध्यस्थता में पाकिस्तान के अयूब ख़ान के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करने के कुछ घंटों बाद ही उनका निधन हो गया.

इसके बाद 19 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. उस वक़्त कांग्रेस दो गुटों में बंट चुकी थी. समाजवादी ख़ेमा इंदिरा गांधी के साथ खड़ा था, जबकि दूसरा रूढ़िवादी गुट मोरारजी देसाई का समर्थक था. मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी को ’गूंगी गुड़िया’ कहा करते थे, क्योंकि वे बहुत कम बोलती थीं. साल 1967 के चुनाव में 545 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को 297 सीटें मिलीं. उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया और वे  24 मार्च, 1977 अपने पद पर बनी रहीं. क़ाबिले-ग़ौर है कि वे 1967 में प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के बाद आख़िर तक प्रधानमंत्री बनी रहीं, लेकिन 1977 से 1980 के बीच उन्हें हुकूमत से बेदख़ल रहना पड़ा. उन्होंने मोरारजी देसाई को देश का उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनाया. साल 1969 में मोरारजी देसाई के साथ अनेक मुद्दों पर मतभेद हुए और आख़िरकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बंट गई. उन्होंने समाजवादी और साम्यवादी दलों के समर्थन से हुकूमत की. इसके कुछ वक़्त बाद फिर से देश को जंग का सामना करना पड़ा. साल 1971 में जंग के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को नई दिशा दी. नतीजतन, जंग में भारत ने शानदार जीत हासिल की. इस दौरान बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ादी मिली. दरअसल, बांग्लादेश को आज़ाद कराने में इंदिरा गांधी ने बेहद अहम किरदार निभाया था. कहते हैं कि इस जीत के बाद जब संसद सत्र शुरू हुआ, तो विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण मे इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था.

इंदिरा गांधी ने  26 जून, 1975 को देश में आपातकाल लागू किया. इसकी वजह से उनकी पार्टी 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार गई. उन्हें अक्टूबर 1977 और दिसम्बर 1978 में जेल तक जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जद्दोजहद करती रहीं. फिर 1980 में उन्होंने हुकूमत में वापसी की. कांग्रेस को शानदार कामयाबी मिली और 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. 14 जनवरी, 1980 को वे फिर से देश की प्रधानमंत्री बनीं और अपनी ज़िन्दगी के आख़िर तक हुकूमत की. उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चरम पर था. उन्होंने पंजाब में अलगाववादियों के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी. इसकी वजह से अलगाववादी उनकी जान के दुश्मन बन गए और 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में उनके अंगरक्षकों ने ही उनका क़त्ल कर दिया. उनकी आकस्मिक मौत से देश शोक में डूब गया.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पंडित जवाहरलाल  नेहरू से श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना करते हुए कहा था कि अपने पिता के विपरीत श्रीमती इंदिरा गांधी संसद से दूर-दूर रहती थीं. आरंभ में तो वह इतनी चुप रहती थीं कि उन्हें ’गूंगी गुड़िया’ तक कह दिया गया था, किंतु यह उनके साथ अन्याय था. वह कम बोलने में विश्वास करती थीं. सबकी बातें सुनने के बाद अपना मत स्थिर करती थीं और सबसे अंत में प्रकट करती थीं. वह सदन में आकर समय गंवाने की बजाय अपने कमरे में बैठकर सत्ता की चाबियां घुमाती थीं. उन्होंने चौदह वर्ष तक शासन कर विश्व को चमत्कृत कर दिया और विरोधियों को कई बार पछाड़ा. इंदिरा जी के साथ संसद में कई बार काफी नोक-झोंक होती रहती थी, किंतु राजनीति के मतभेदों को उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों में बाधक नहीं बनने दिया. उनकी निर्मम त्रासद और क्रूर हत्या ने एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे बीच से उठा लिया, जिन्हें योग्य पिता की योग्य पुत्री के नाते ही नहीं, अपनी निजी योग्यता, कुशलता, निर्णय क्षमता तथा कठोरता के कारण याद किया जाएगा.

दरअसल, सियासत की इस महान और कामयाब शख़्सियत को अपनी निजी ज़िन्दगी में कई ग़म मिले थे. साल 1936 में उनकी मां कमला नेहरू तपेदिक से एक लम्बे अरसे तक जूझने के बाद उन्हें अकेला छोड़ गईं. उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 18 साल थी. फिर शादीशुदा ज़िन्दगी में भी उन्हें दुख मिले.शादी के बाद उनकी शुरुआती ज़िन्दगी ठीक रही, लेकिन बाद में वे अपने पिता के घर आ नई दिल्ली आ गईं. देश के पहले आम चुनाव 1951 में वे अपने पिता और पति दोनों के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं. चुनाव जीतने के बाद फ़िरोज़ गांधी ने अपने लिए अलग घर चुना. फिर साल 1958 में उप-निर्वाचन के कुछ वक़्त बाद फिरोज़ गांधी को दिल का दौरा पड़ा. इस दौरान इंदिरा गांधी ने उनकी ख़ूब ख़िदमत की. उनके रिश्ते बेहतर होने लगे, लेकिन 8 सितम्बर1960 को जब इंदिरा गांधे अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई थीं, तब फिरोज़ की मौत हो गई. उन्होंने ख़ुद को पार्टी और देश के काम में मसरूफ़ कर लिया. उन्होंने संजय गांधी को अपना सियासी वारिस चुना, लेकिन 23 जून, 1980 को एक उड़ान हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद वे अपने छोटे बेटे राजीव गांधी को सियासत में लेकर आईं. राजीव गांधी पायलट की नौकरी में ख़ुश थे और सियासत में आना नहीं चाहते थे, लेकिन मां को वे इंकार न कर सके और न चाहते हुए भी उन्हें सियासत में क़दम रखना पड़ा.

इंदिरा गांधी ख़ाली वक़्त में अपने परिजनों के लिए स्वेटर बुना करती थीं. उन्हें संगीत और किताबों से भी ख़ास लगाव था. पाकिस्तानी गायक मेहंदी हसन की ग़ज़लें भी अकसर सुनती थीं. सोने से पहले वे आध्यात्मिक किताबें पढ़ती थीं. भारत रत्न से सम्मानित इंदिरा गांधी ने कहा था- जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो. यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो. शहादत कुछ ख़त्म नहीं करती, वो महज़ शुरुआत है. अगर मैं एक हिंसक मौत मरती हूं, जैसा कि कुछ लोग डर रहे हैं और कुछ षड़यंत्र कर रहे हैं, तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारों के विचार और कर्म में होगी, मेरे मरने में नहीं. लोग अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, लेकिन अधिकारों को याद रखते हैं. अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि आप अपने आप को दूसरों की सेवा में खो दें. संतोष प्राप्ति में नहीं, बल्कि प्रयास में होता है पूरा प्रयास पूर्ण विजय है. प्रश्न करने का अधिकार मानव प्रगति का आधार है. देशों के बीच के शांति, व्यक्तियों के बीच प्यार की ठोस बुनियाद पर टिकी होती है
उन्होंने यह भी कहा था, जब मैं सूर्यास्त  पर आश्चर्य या चांद की ख़ूबसूरती की प्रशंसा कर रही होती हूं, उस समय मेरी आत्मा इन्हें बनाने वाले की पूजा कर रही होती है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं) 


फ़िरदौस ख़ान
त्यौहार के दिनों मे बाज़ार में नक़ली मावे और पनीर से बनी मिठाइयों का कारोबार ज़ोर पकड़ लेता है. आए-दिन छापामारी की ख़बरें सुनने को मिलती हैं कि फ़लां जगह इतना नक़ली या मिलावटी मावा पकड़ा गया, फ़लां जगह इतना. इन मामलों में केस भी दर्ज होते हैं, गिरफ़्तारियां भी होती हैं और दोषियों को सज़ा भी होती है. इस सबके बावजूद मिलावटख़ोर कोई सबक़ हासिल नहीं करते और मिलावटख़ोरी का धंधा बदस्तूर जारी रहता है. त्यौहारी सीज़न में कई मिठाई विक्रेता, होटल और रेस्टोरेंट संचालक मिलावटी और नक़ली मावे से बनी मिठाइयां बेचकर मोटा मुनाफ़ा कमाएंगे.

ज़्यादातर मिठाइयां मावे और पनीर से बनाई जाती हैं. दूध दिनोदिन महंगा होता जा रहा है. ऐसे में असली दूध से बना मावा और पनीर बहुत महंगा बैठता है. फिर इनसे मिठाइयां बनाने पर ख़र्च और ज़्यादा बढ़ जाता है, यानी मिठाई की क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है. इतनी महंगाई में लोग ज़्यादा महंगी मिठाइयां ख़रीदना नहीं चाहते. ऐसे में दुकानदारों की बिक्री पर असर पड़ता है. इसलिए बहुत से हलवाई मिठाइयां बनाने के लिए नक़ली या मिलावटी मावे और पनीर का इस्तेमाल करते हैं. नक़ली और मिलावटी में फ़र्क़ ये है कि नक़ली मावा शकरकंद, सिंघाड़े, मैदे, आटे, वनस्पति घी, आलू, अरारोट को मिलाकर बनाया जाता है. इसी तरह पनीर बनाने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल किया जाता है. मिलावटी मावे उसे कहा जाता है, जिसमें असली मावे में नक़ली मावे की मिलावट की जाती है. मिलावट इस तरह की जाती है कि असली और नक़ली का फ़र्क़ नज़र नहीं आता. इसी तरह सिंथेटिक दूध यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट आदि का इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य दूध जैसी वसा उत्पन्न करने के लिए सिंथेटिक दूध में तेल मिलाया जाता है, जो घटिया क़िस्म का होता है. झाग के लिए यूरिया और कास्टिक सोडा और गाढ़ेपन के लिए डिटर्जेंट मिलाया जाता है.


फूड विशेषज्ञों के मुताबिक़ थोड़ी-सी मिठाई या मावे पर टिंचर आयोडीन की पांच-छह बूंदें डालें. ऊपर से इतने ही दाने चीनी के डाल दें. फिर इसे गर्म करें. अगर मिठाई या मावे का रंग नीला हो जाए, तो समझें उसमें मिलावट है. इसके अलावा, मिठाई या मावे पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड यानी नमक के तेज़ाब की पां-छह बूंदें डालें. अगर इसमें मिलावट होगी, तो मिठाई या मावे का रंग लाल या हल्का गुलाबी हो जाएगा. मावा चखने पर थोड़ा कड़वा और रवेदार महसूस हो, तो समझ लें कि इसमें वनस्पति घी की मिलावट है. मावे को उंगलियों पर मसल कर भी देख सकते हैं अगर वह दानेदार है, तो यह मिलावटी मावा हो सकता है.

इतना ही नहीं, रंग-बिरंगी मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाले सस्ते घटिया रंगों से भी सेहत पर बुरा असर पड़ता है. अमूमन मिठाइयों में कृत्रिम रंग मिलाए जाते हैं. जलेबी में कृत्रिम पीला रंग मिलाया जाता है, जो नुक़सानदेह है. मिठाइयों को आकर्षक दिखाने वाले चांदी के वरक़ की जगह एल्यूमीनियम फॉइल से बने वर्क़ इस्तेमाल लिए जाते हैं. इसी तरह केसर की जगह भुट्टे के रंगे रेशों से मिठाइयों को सजाया जाता है.

दिवाली पर सूखे मेवे और चॉकलेट देने का चलन भी तेज़ी से बढ़ा है. चॉकलेट का कारोबार बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. चॉकलेट की लगातार बढ़ती मांग की वजह से बाज़ार में घटिया क़िस्म के चॉकलेट की भी भरमार है. मिलावटी और बड़े ब्रांड के नाम पर नक़ली चॉकलेट भी बाज़ार में ख़ूब बिक रही हैं. इसी तरह जमाख़ोर रखे हुए सूखे मेवों को एसिड में डुबोकर बेच रहे हैं. इसे भी घर पर जांचा जा सकता है. सूखे मेवे काजू या बादाम पर पानी की तीन-चार बूंदें डालें, फिर इसके ऊपर ब्लू लिटमस पेपर रख दें. अगर लिटमस पेपर का रंग लाल हो जाता है, तो इस पर एसिड है.

चिकित्सकों का कहना है कि मिलावटी मिठाइयां सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. इनसे पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. फ़ूड प्वाइज़निंग का ख़तरा भी बना रहता है. लंबे अरसे तक खाये जाने पर किडनी और लीवर पर बुरा असर पड़ सकता है. आंखों की रौशनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है. बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास अवरुद्ध हो सकता है. घटिया सिल्वर फॉएल में एल्यूमीनियम की मात्रा ज़्यादा होती है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के ऊत्तकों और कोशिकाओं को नुक़सान हो सकता है. दिमाग़ पर भी असर पड़ता है. ये हड्डियों तक की कोशिकाओं को डैमेज कर सकता है. मिठाइयों को पकाने के लिए घटिया क़िस्म के तेल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है. सिंथेटिक दूध में शामिल यूरिया, कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट आहार नलिका में अल्सर पैदा करते हैं और किडनी को नुक़सान पहुंचाते हैं. मिलावटी मिठाइयों में फॉर्मेलिन, कृत्रिम रंगों और घटिया सिल्वर फ़ॉएल से लीवर, किडनी, कैंसर, अस्थमैटिक अटैक, हृदय रोग जैसी कई बीमारियां हो सकती हैं. इनका सबसे ज़्यादा असर बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है. सूखे मेवों पर लगा एसिड भी सेहत के लिए बहुत ही ख़तरनाक है. इससे कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है और लीवर, किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है.

हालांकि देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कई क़ानून बनाए गए, लेकिन मिलावटख़ोरी में कमी नहीं आई. खाद्य पदार्थो में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए खाद्य संरक्षा और मानक क़ानून-2006 लागू किया गया है. लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद 23 अगस्त 2006 को राष्ट्रपति ने इस क़ानून पर अपनी मंज़ूरी दी. फिर 5 अगस्त 2011 को इसे अमल में लाया गया, यानी इसे लागू होने में पांच साल लग गए. इसका मक़सद खाद्य पदार्थों से जुड़े नियमों को एक जगह लाना और इनका उल्लंघन करने वालों को सख़्त सज़ा देकर मिलावटख़ोरी को ख़त्म करना है. भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक विधेयक 2006 के तहत खाद्य पदार्थों के विज्ञान आधारित मानक निर्धारित करने एवं निर्माताओं को नियंत्रित करने के लिए 5 सितंबर 2008 को की गई. यह प्राधिकरण अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मानकों और घरेलू खाद्य मानकों के बीच मध्य सामंजस्य को बढ़ावा देने के साथ घरेलू सुरक्षा स्तर में कोई कमी न होना सुनिश्चित करता है. इसके प्रावधानों के तहत पहले काम कर रहे कई नियम-क़ानूनों (1-फ्रूट प्रोडक्ट्स आर्डर, 1955 2-मीट फूड प्रोडक्ट्स आर्डर, 1973 3- मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स ऑर्डर, 1992 4-सालवेंट एक्सट्रैक्टेड आयल, डी- ऑयल्ड मील एंड एडिबल फ्लोर (कंट्रोल) ऑर्डर, 1967 5-विजिटेबल्स ऑयल प्रोडक्ट्स (रेगुलेशन) ऑर्डर, 1998 6-एडिबल ऑयल्स पैकेजिंग (रेगुलेशन) ऑर्डर, 1998 7- खाद्य अपमिश्रण निवारण क़ानून, 1954) का प्रशासनिक नियंत्रण को इसमें शामिल किया है.

इस क़ानून में खाद्य पदार्थों से जुड़े अपराधों को श्रेणियों में बांटा गया है और इन्हीं श्रेणियों के हिसाब से सज़ा भी तय की गई है. पहली श्रेणी में जुर्माने का प्रावधान है. निम्न स्तर, मिलावटी, नक़ली माल की बिक्री, भ्रामक विज्ञापन के मामले में संबंधित प्राधिकारी 10 लाख रुपये तक जुर्माना लगा सकते हैं. इसके लिए अदालत में मामला ले जाने की ज़रूरत नहीं है. दूसरी श्रेणी में जुर्माने और क़ैद का प्रावधान है. इन मामलों का फ़ैसला अदालत में होगा. मिलावटी खाद्य पदार्थो के सेवन से अगर किसी की मौत हो जाती है, तो उम्रक़ैद और 10 लाख रुपये तक जुर्माना भी हो सकता है. पंजीकरण या लाइसेंस नहीं लेने पर भी जुर्माने का प्रावधान है. छोटे निर्माता, रिटेलर, हॉकर, वेंडर, खाद्य पदार्थो के छोटे व्यापारी जिनका सालाना टर्नओवर 12 लाख रुपये से कम है, उन्हें पंजीकरण कराना ज़रूरी है. इसके उल्लंघन पर उन पर 25 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है. 12 लाख रुपये सालाना से ज़्यादा टर्नओवर वाले व्यापारी को लाइसेंस लेना ज़रूरी है. ऐसा न करने पर पांच लाख रुपये तक जुर्माना और छह महीने तक की सज़ा ह सकती है. अप्राकृतिक और ख़राब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर दो लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. इसी तरह घटिया खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पांच लाख रुपये, ग़लत ब्रांड खाद्य पदार्थों की बिक्री पर तीन लाख, भ्रामक विज्ञापन करने पर 10 लाख रुपये और खाद्य पदार्थ में अन्य चीज़ों की मिलावट करने पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

दिवाली पर मिठाई की मांग ज़्यादा होती है और इसके मुक़ाबले आपूर्ति कम होती है. मिलावटख़ोर मांग और आपूर्ति के इस फ़र्क़ का फ़ायदा उठाते हुए बाज़ार में मिलावटी सामग्री से बनी मिठाइयां बेचने लगते हैं. इससे उन्हें तो ख़ासी आमदनी होती है, लेकिन ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है. हालांकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा छापेमारी कर और नमूने लेकर ख़ानापूर्ति कर ली जाती है. फिर कुछ दिन बाद मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाता है. दरअसल मिलावटख़ोरी पर रोक लगाने के लिए इतनी सख़्ती नहीं बरती जाती जितनी बरती जानी चाहिए. इसलिए यही बेहतर है कि मिठाई, चॉकलेट और सूखे मेवे ख़रीदते वक़्त एहतियात बरतनी चाहिए. साथ ही इनके ख़राब होने पर इसकी शिकायत ज़रूर करनी चाहिए, ताकि मिलावटख़ोरों पर दबाव बने. जागरूक बने, सुखी रहें.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)
ईमेल : editor.starnewsagency@gmail.com


अरविंद कुमार सिंह    
28 मई, 2023 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन का उद्घाटन किया था, तभी से परिसीमन और सीटों की संख्या में वृद्धि के कयास तेज हो गए थे। क्योंकि नए भवन में लोक सभा चैबर में सीटों की संख्या 888 और राज्य सभा में 384 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की गयी। पुराने संसद भवन में लोक सभा चैंबर में 545 और राज्य सभा में 245 सीटें थीं। सीटें तो अभी भी इतनी ही हैं। पुराने भवन में काम चल सकता था लेकिन सरकार ने नए संसद भवन को बनाने में जो जल्दबाजी दिखाई उससे राजनीतिक हलकों में यह संदेश गया कि नया परिसीमन, एक देश एक चुनाव जैसे एजेंडे पर सरकार आगे बढ़ेगी। इसी के बाद नए संसद भवन में महिला आरक्षण विधेयक भी पारित हुआ तो इन बातों को और हवा मिली। लेकिन सरकार ने इस बीच में इनके लिए सबसे अहम 2021 की जगगणना के बारे में कोई गंभीर पहल नहीं की, यह टलती रही।

अब जैसे जैसे 2025 को चक्र घूम रहा है, फिर से यह मामला गरमाने लगा है। दक्षिण से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टैलिन ने परिसीमन की जो मुहिम चंद माह पहले आरंभ की थी, उसकी आंच अब देश के दूसरे हिस्से तक पहुंच गयी है। दक्षिण के सत्तारूढ राजनीतिक दलों में ही नहीं पंजाब से लेकर कई राज्यों में इस मुद्दे पर सुगबुगाहट तेज होती दिख रही है। बीजेडी, आप, शिरोमणि अकाली दल और बीजेडी भी इस मुहिम का हिस्सा बन चुकी है। नवीन पटनायक के इस मुहिम में शामिल होने से भाजपा हैरान है। इन्होंने साफ किया है कि वे परिसीमन के खिलाफ नहीं पर यह निष्पक्ष होना चाहिए। इन दलों ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि न्यायसंगत परिसीमन के लिए इसे 2026 से आगे 25 वर्षों के लिए बढ़ाया जाये। इसका मतलब यह हुआ कि 1971 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के तहत ही मौजूदा सीटें बनी रहें। 

राजनीति औऱ अर्थव्यवस्था में दक्षिण की अहमियत
दक्षिणी राज्य भारत की अर्थव्यवस्था में बेहद अहम भूमिका में हैं। दक्षिणी राज्यों में भारत की 19 फीसदी आबादी निवास करती है जिनका देश की जीडीपी में वे 36 फीसदी का योगदान है। विकास के विभिन्न संकेतकों में ही नहीं जनसंख्या नियंत्रण नीति को अमलीजामा पहनाने में भी उनका बेहतरीन योगदान रहा है। दक्षिणी राज्यों ने परिसीमन से जुड़ी चिताओं को अपनी पहचान से जोड़ा है और कहा है कि संसद में हमारा प्रतिनिधित्व किसी हालत में कम नहीं हो। इसका राजनीतिक संकेत यह भी जा रहा है कि भाजपा दक्षिण की सीटों में कटौती करके उत्तर में होने वाली बढ़ोतरी से अपने लिए राजनीतिक लाभ के गणित को देख रही है। जिन राज्यों में वह राजनीतिक शक्ति नहीं है, वहां सीटें कम हो सकती हैं। वहीं नवीन पटनायक ने यह लाइन ली है कि संसदीय सीटों की संख्या निर्धारण में महज आबादी ही मानदंड नहीं हो। इसीलिए चेन्नई में 22 मार्च को हुई बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि महज जनगणना के आंकड़ों पर आधारित परिसीमन स्वीकार्य नहीं होगा। 

विवादों का पिटारा
दरअसल 1971 से ही परिसीमन पर विवाद रहा है। श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1976 में 30 साल के परिसीमन को रोकने के साथ इस बात की परिकल्पना की थी कि इस बीच में आबादी नियंत्रण  के साथ कई असंतुलन दूर हो जाएंगे। पर 2001 में जब यही मुद्दा अटलजी के सामने आया तो उस समय एनडीए के नेताओं ने व्यापक विचार मंथन के बाद लोकसभा सीटों की तादाद यथावत रखने का फैसला किया। पर उस दौरान राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करने का फैसला किया जिससे प्रति प्रति सांसद आबादी अनुपात में संतुलन आ सके। 2001 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के उम्मीदवारों के लिए सीटें आरक्षित करने का फैसला भी हुआ।

परिसीमन की जटिलताएं अपनी जगह है। इसके लिए आबादी से इतर आधार बनना भी कोई सहज काम नही है। इसीलिए 1975-76 और 2001 में जो रास्ता तत्कालीन सरकारों ने अपनाया था वही समाधान इस बार भी दोहराया जाएगा या सरकार कोई ऐसी नयी और सर्वमान्य पहल खोजेगी इस पर सबकी निगाह लगी हुई है। यह एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। अगर इसे ठीक से हल नहीं किया गया तो कई राज्यों में काफी समस्याएं और जटिल होगी।

संवैधानिक प्रावधान
भारत में परिसीमन की व्यवस्था के लिए संविधान के अनुच्छेद 82,170, 330 और 332 के तहत प्रावधान हैं। इसके तहत लोक सभा, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन होता है। हर 10 वर्ष पर जनगणना और उनसे मिले आंकड़ों के आधार परिसीमन की व्यवस्था सीमित कालखंड तक चली। 2001 में निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का फिर से निर्धारण हुआ पर लोक सभा या विधानसभाओं की सीटें यथावत बनी रहीं। इस समय लोक सभा में जो सीटों की संख्या है वह मौजूदा सीटें 1971 की आबादी के हिसाब से तय है जब हमारी कुल आबादी 54 करोड़ थी जबकि अब हम 140 करोड़ पार कर गए हैं। अब जो भी आंकड़े सामने आ रहे हैं उसमें सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति उत्तर प्रदेश बनने जा रहा है। 2026 की आबादी के हिसाब से अगर परिसीमन हुआ तो उत्तर प्रदेश की मौजूदा सीटें 80 से बढ कर 143 हो जाएंगी, लेकिन तमिलनाडु में 49 होगी औऱ केरल में तो एक भी सीट नहीं बढेगी। यह स्थिति बनी तो टकराव होना तय है।

परिसीमन का आधार केवल आबादी हो जरूरी नहीं है। जैसे पडोसी नेपाल में 2015 में नए संविधान  के तहत आधी आबादी वाले तराई क्षेत्र को पहाड़ी क्षेत्रों की तुलना में कम सीटें आवंटित हुई क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र का सीमांकन आबादी की जगह भौगोलिक आधार पर हुआ। निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के क्रम में जनसंख्या, विकास सूचकांक, आर्थिक योगदान जैसे पक्षों को अगर ध्यान में रखा जाता है तो एक रास्ता निकल सकता है, पर इसके लिए आम सहमति सबसे पहले राजनीतिक दलों को बनानी होगी।

संविधान के तहत तहत 17 अप्रैल,1952 को जब पहली लोक सभा का विधिवत गठन हुआ तब सांसदों की संख्या 499 थी। उसके बाद नए राज्य बने और कई व्यवस्थाओं के बाद 31वें संविधान संशोधन 1973 में लोक सभा की सीटें 525 होते हुए फिलहाल 543 पर कायम है। लोक सभा में देश के हर हिस्से का प्रतिनिधित्व है और हर राज्य औऱ संघ शासित प्रदेश को निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। 
परिसीमन उच्चाधिकार प्राप्त आयोग करता है, जिसके फैसले को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। देश में चार बार ऐसे आयोग बने हैं। आखिरी आयोग 2002 में परिसीमन अधिनियम के तहत बना था, अब जो आयोग बनेगा वो पांचवां होगा, पर आयोग का गठन और अन्य बातों पर फिलहाल सरकार मौन है।
2023 में असम में परिसीमन प्रस्ताव पर निर्वाचन आयोग ने सार्वजनिक सुनवाई की थी तो आयोग के समक्ष भौगोलिक विशेषताओं के साथ जनसंख्या घनत्व, प्रशासनिक इकाइयों जैसे कई आधारों पर बातें उठी थीं। जनसांख्यिकीय प्रारूप में बदलाव पर ध्यान देने की बात भी आयी क्योंकि कुछ जिलों में जनसंख्या वृद्धि दर कम थी औऱ कुछ जिलों में असामान्य रूप से अधिक। लिहाजा इनमें किसी का नुकसान न हो, सीटों की संख्या में कमी न हो ऐसी बातें भी उठी थीं। कोई सामाजिक समूह अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के कारण अलग-थलग महसूस न करे, चिंता का यह प्रमुख बिंदु था।

बढती आबादी पर स्थिर सीटें कब तक
आबादी की बात करें तो 19 अप्रैल 2023 को जब संयुक्त राष्ट्र पापुलेशन फंड ने भारत की आबादी करीब 142.86 करोड़ आंकते हुए इसे विश्व में अव्वल बताया। 2050 तक हमारी आभादी 166.8 करोड़ होगी जबकि इस दौरान चीन 131.7 करोड़ पर खड़ा होगा। 2000  में हमारी आबादी 106 करोड़ थी जो 2011 तक 123 करोड़ हो गयी। 2019 में वाजपेयी स्मारक संभाषण में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुकर्जी ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए संसद के दोनों सदनों की सीटों को एक हजार करने पर जोर दिया था। पर इसे विचार से अधिक महत्व न तो सरकार ने दिया न विपक्ष ने।

सबसे शक्तिमान बनेगा उत्तर प्रदेश 
परिसीमन अगर आबादी पर होगा तो बेशक उत्तर प्रदेश भाग्यविधाता प्रांत बनेगा ही। करीब 23 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश से लोक सभा के 80 और राज्य सभा के 31 सदस्य चुने जाते हैं। विधान परिषद में 100 और विधान सभा के 404 सदस्य हैं। लेकिन राजनीतिक शक्ति अपार होने के बाद भी उत्तर प्रदेश कई मानको पर पिछड़ा है। 

उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों में 22 पश्चिमी उत्तर प्रदेश, 32 पूर्वी उत्तर प्रदेश, 14 मध्य उत्तर प्रदेश और 7 बुंदेलखंड के जिलों से संबंधित हैं। 2014 और 2019 मे भाजपा ने यहां सबसे अच्छी सफलता हासिल की। 2014 में तो वह 71 सीटें जीत गयी थी। पर इसी राज्य ने 2024 में भाजपा को बहुमत में आने से रोक दिया और एनडीए के घटक दलों पर निर्भरता बढा दी। भाजपा 80 में 33 सीटो पर आ गयी जबकि सपा 5 से 37 सीटों पर। पर उत्तर प्रदेश से अब तक 9 प्रधानमंत्री हुए हैं। उत्तर प्रदेश की शक्ति को देख कर ही नरेंद्र मोदी ने यहां की वाराणसी सीट को चुना। 2000 में उत्तराखंड के अलग होने के बाद भी राज्य के शक्ति संतुलन में कोई असर नहीं पड़ा है। राजनीतिक हैसियत कायम है, 

इसलिए परिसीमन का मुद्दा गरमा गया  है तो विपक्षी दुविधा के साथ यह साफ दिख रहा है कि वास्तव में क्या रास्ता लें इस पर सत्ता पक्ष भी कुछ स्पष्ट नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और संसदीय मामलों के जानकार हैं) 

प्रसून लतांत
महात्मा गांधी महिलाओं को रूढ़ियों और कुप्रथाओं से मुक्त करने और स्वतंत्र रूप से व्यक्तित्व विकास के हिमायती रहे। गांधी जी ने महिलाओं के हक में जोरदार ढंग से जब आवाज उठाई, जब भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति होने के बावजूद उनके हक में कोई आवाज नहीं उठाता था। कोई कल्पना भी नहीं करता कि स्त्रियां भी स्वतंत्र हो सकती हैं। लेकिन गांधी जी ने बिना किसी की परवाह किए स्त्रियों के उद्धार के लिए कई कदम उठाए। गांधी जी ने बाल विवाह, परदा प्रथा और दहेज जैसी कुरूतियों के खिलाफ आवाज उठाई और घर के बाहर सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की। पहले दक्षिण अफ्रीका फिर भारत में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं को शामिल किया।
महिलाओं में अहिंसा की विशेष शक्ति है — इसे गांधीजी ने जोरदार तरीके से खासकर महिलाओं को अहसास कराया। गांधीजी ब्रिटेन में मताधिकार के लिए वहां की महिलाओं के आंदोलन से प्रभावित हुए थे। इसके बाद ही उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और फिर बाद में भारत में आजादी के लिए उनके नेतृत्व में किए जा रहे विभिन्न सत्याग्रहों और आंदोलनों में महिलाओं को बढ़—चढ़कर हिस्सा लेने और जरूरत पड़े तो जेल तक जाने के लिए प्रोत्साहित किया। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों के अधिकार के सिलसिले में 1906 और 1909 में दो बार लंदन का दौरा किया था। तब उन्होंने वहां देखा कि महिलाएं मताधिकार के लिए कैसे अपने अहिंसक आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे। गांधी जी ने ब्रिटेन की महिलाओं को बहादुर बताते हुए उनके समर्थन में कई बार अपने अखबार ट्टइंडियन ओपिनियन’ में लिखा। बाद में 1918 में ब्रिटेन की महिलाओं को मताधिकार हासिल होने में कामयाबी भी मिली। इस कामयाबी के सौ साल पूरे हो गए हैं।
जाने—माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना है कि ब्रिटेन की इन महिलओं का गांधी जी पर गहरा असर पड़ा। जेल जाने के लिए अपना जीवन और परिवार के त्याग करने की उनकी इच्छा ने उन्हें और साथी भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में इसी तरह का आंदोलन करने की प्रेरणा दी। ब्रिटेन की महिलाओं के संघर्ष ने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के प्रदर्शन के तरीके को प्रभावित किया और उनके अपने देश लौटने पर उनके फैसलों को प्रभावित किया जिससे उन्होंने कांग्रेस की स्वतंत्रता के साथ ही पूर्ण मताधिकार की मांग का समर्थन किया।
यह सच है कि भारत में महिलाओं को मताधिकार के लिए अलग से कोई आंदोलन करने की नौबत नहीं आई। आजादी हासिल होते ही भारतीय महिलाओं को पुरुषों की तरह ही मताधिकार सहज ही हासिल हो गया। ऐसा कुछ संभव गांधी की वजह से ही संभव हुआ क्योंकि महिलाओं के उद्धार के मुद्दे पर गांधी किसी भी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं थे। गांधी कहते थे कि स्त्रियों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में महिलाओं पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्याओं में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए उनके साथ पूरी समानता का व्यवहार होना चाहिए।
वैश्विक स्तर पर अहिंसा के आधुनिक सिद्धांत के प्रणेता के रूप में विख्यात महात्मा गांधी ने अपनी पत्नी कस्तूरबा को ही ट्टअहिंसा’ का पहला पाठ पढ़ाने वाली शिक्षिका घोषित किया। उन्होंने पहले किसी और महिला को जेल जाने का आग्रह नहीं किया। उन्होंने इसकी शुरूआत घर से और कस्तूरबा से की। दक्षिण अफ्रीका में जब हिंदुस्तानी विवाह को वहां की सरकार ने गैर कानूनी घोषित किया तो गांधी जी ने इसे हिंदुस्तानी स्त्रियों के स्त्रीत्व पर आक्रमण माना और यह निर्णय लिया कि इस लड़ाई में स्त्रियों को भी सम्मिलित होना चाहिए। गांधी को यह विश्वास तो था ही कि अनेक हिंदुस्तानी बहनें जेल जाने को तैयार हो जाएंगी। लेकिन स्वयं मरे बिना स्वर्ग कौन जा सकता है? गांधी को लगा कि कस्तूरबा अगर इस लड़ाई में सम्मिलित होने को तैयार हो जाए और जेल में जाए तो सारी बाजी सुधर जाए। लेकिन कस्तूरबा को तैयार कैसे किया जाए? उन्हें आदेश देकर जबरन तैयार करने में कोई सार नहीं है। गांधी ने कस्तूरबा से कहा कि हम पुरुष जैसे सरकार से लड़ते हैं वैसे तुम भी लड़ो। अगर तुम्हें सच्ची विवाहिता पत्नी बनना हो और उपपत्नी (रखैल) न बनना हो और अपनी इज्जत तुम लोगों को प्यारी हो तो तुम ही हमारी तरह सरकार से लड़ो। मैं नहीं कहता कि तुम जेल जाओ। तुम्हें अपनी इज्जत के खातिर जेल जाने की उमंग हो तो जाओ। इस तरह गांधी ने कस्तूरबा को समझाया और वह तैयार हो गई। गांधी ने अपनी पुस्तक ट्टदक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में स्वीकार किया है कि आज तक किसी स्त्री की इच्छा हो तो भी उसे लड़ाई में शरीक होने से रोक दिया जाता था लेकिन दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई में महिलाएं प्रचंड शक्ति साबित हुई।
गांधी के साथ कस्तूरबा सहित अनेक महिलाएं उनके आश्रम में रहती थी और सभी अपनी स्वतंत्रता के साथ ऐसा सामूहिक जीवन जी रही थीं जिसमें वे समानता पर पहुंची। गांधी के भारत आने के पूर्व आजादी की जो लड़ाई चल रही थी, वह पूरी तरह पुरुष केंद्रित थी। तब स्त्रियां विभिन्न सामाजिक बुराइयों से तबाह थीं। एक तो अस्पृश्यता (छूआछूत) के कारण दलित महिलाओं की दशा अत्यंत दयनीय थी बाकी महिलाएं भी दहेज, बाल विवाह, वैधव्य और परदा प्रथा जैसी बुराइयों से त्रस्त थीं। ऐसे में उन्हें स्वतंत्र करने और सभी स्तरों पर समानता का मौका देना तो दूर, बात तक भी नहीं की जाती थी। लेकिन जब गांधी जी भारत में कांग्रेस में सक्रिय हुए तो उन्होंने स्त्रियों को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ा। देश के विभिन्न शहरों में राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तरों पर अनेक सम्मेलन आयोजित किए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि महिला शराबबंदी के साथ विदेशी कपड़ों की होली जलाने में बढ़—चढ़कर हिस्सा लिया। नमक आंदोलन के दौरान जब गांधी गिरफ्तार कर लिए गए तो उनके बाद ट्टसत्याग्रह’ की कमान सरोजिनी नायडू ने संभाली। गांधी के साथ अनेक महिलाएं थीं जो उनके प्रयोग के साक्षी और सहभागी रहीं। जिनमें एक रवींद्र नाथ ठाकुर की भांजी सरला देवी थीं, जिन्होंने खादी के प्रचार—प्रसार के साथ गांधी की देखभाल की। गांधी उन्हें अपनी आध्यात्मिक पत्नी कहते थे। इनके अलावा राजकुमारी अमृत कौर थीं, जिनसे गांधी की खूब खतों किताबों की बात होती थी। पहली मुलाकात 1934 में हुई। नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गई। आजाद भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं। गांधी की निजी डाक्टर सुशीला नायर थीं। उनके भाई प्यारेलाल गांधी के निजी सचिव थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कस्तूरबा के साथ जेल गईं। गांधी जिन दो महिलाओं के कंधे पर हाथ रखकर चलते थे। उनमें से एक आभा जन्म से बंगाली थीं। उनकी शादी गांधी के परपोते कनु गांधी से हुई थी। आभा गांधी के साथ नोआखाली यात्रा में थीं। आभा के साथ मनु भी थी। मनु महात्मा गांधी की दूर की रिश्तेदार थी। गांधी मनु को पोती कहते थे। ये आभा और मनु उस समय मौजूद थीं जब 30 जनवरी, 1948 को गांधी को नाथूराम ने गोली मारी थी। विदेशी महिलाओं में एक बड़े ब्रिटिश अफसर की बेटी मेडलीन स्लेड थीं, जिन्हें गांधी मीराबेन कहते थे। वह प्रसिद्ध प्रQांसीसी लेखक रोम्या रौलां की पुस्तक पढ़कर गांधी जी के साथ उनके आश्रम में रहने आ गई थी। इनके अलावा मिली ग्राहम, पोलक सेज, श्लेजिन एस्थ फेरिंग, नीला क्रैम कुकु और माग्रेट स्पीगेल भी थीं। एल्यानोर भौटॉन ने 1954 में एक किताब ट्टवीमेन बिहाइंड महात्मा गांधी’ लिखी।
गांधी की महिला सहयोगियों को लेकर कई किताबें लिखी गई हैं लेकिन इन किताबों में उनकी दिनचर्या का जिक्र ज्यादा है लेकिन पूरी मानवता के लिए गांधी के प्रयासों में इन महिलाओं के योगदानों का आकलन बहुत कम मिलता है। ट्टपहला गिरमिटिया’ नाम से गांधी जी पर प्रमुख उपन्यास के लेखक गिरिराज किशोर कहते हैं कि महिलाओं को जितनी स्वतंत्रता गांधी ने दी उतनी आधुनिक देश और समाज नहीं देते। गांधी विचार की सर्वोच्च संगठन सर्व सेवा संघ की अध्यक्ष रहीं। राधा भट्ट कहती हैं कि गांधी महिलाओं में अहिंसा की विशेष शक्ति देखते थे और वे उसे जगाकर एक समतामूलक समाज बनाना चाहते थे। तभी वे कहते थे कि अहिंसा की नींव पर रचे गए जीवनकी रचना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्त्री को भी अपने भविष्य तय करने का है। गांधी जी कहते थे कि मैं स्त्रियों को समुचित शिक्षा का हिमायती हूं लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि स्त्री दुनिया में अपना योग पुरुष की नकल करके या उसकी प्रतिस्पर्धा करके नहीं दे सकती। गांधी जी का साफ मत था कि स्त्री को पुरुष की पूरक बनना चाहिए।


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
क्रिसमस... हमारे प्रिय जीसस यानी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की सालगिरह... साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते हैं इस बड़े दिन का... बहुत ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं क्रिसमस से... बचपन से ही यह त्योहार बहुत अच्छा लगता है... गुज़रते वक़्त के साथ इस त्योहार से एक गहरा रिश्ता जुड़ गया... वो कहीं भी हों, इस दिन चर्च ज़रूर जाते हैं...
बचपन से सुनते आए हैं कि क्रिसमस के दिन सांता क्लाज आते हैं... अपने साथ बहुत सारे तोहफ़े और खुशियां लाते हैं... बचपन में बस संता क्लाज़ को देखने की ख़्वाहिश थी. उनसे कुछ पाने का ख़्याल कभी ज़हन में आया तक नहीं, क्योंकि हर चीज़ मुहैया थी. जिस चीज़ की तरफ़ इशारा कर दिया कुछ ही पलों में मिल जाती थी... किसी चीज़ की कमी क्या होती है. कभी जाना ही नहीं...
मगर अब सांता क्लाज़ से पाना चाहते हैं- मुहब्बत, पूरी कायनात के लिए, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए... हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो, आमीन.. संता क्लाज वही हैं, मगर उम्र बढ़ने के साथ ख़्वाहिशें भी बढ़ जाती हैं...

दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है. क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है. 

भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है. यहां 'द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी' नाम से इसे मनाया जाता है. माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे. 

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था. 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था. 

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा. वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्म  हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे. उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं.  

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.

पुरानी कैथोलिक परम्परा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ. हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई. उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री. अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट  चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है. यह हमारे देश की सदियों पुरानी परम्परा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह. 


फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली में नगर निगम चुनाव से पहले हमने बहुत से लोगों ख़ासकर मुस्लिम कांग्रेसियों से बात की थी. कांग्रेसी इसलिए कि कभी ये सब कांग्रेस के कट्टर समर्थक हुआ करते थे. कांग्रेस का जुलूस निकलता, तो ये लोग जुलूस पर गुलाब के फूल बरसाते थे.   
अमूमन इनमें से सबने यही कहा था कि वे झाड़ू को वोट देंगे. वजह पूछने पर यही जवाब मिला कि केजरीवाल ने बहुत काम किया है.
क्या काम क्या है? इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था.  
आज आम आदमी पार्टी के जीते हुए पार्षदों का जुलूस पूरे हर्षोल्लास से निकला, तो इन लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. हालत यह थी कि लोग एक-दूसरे को फ़ोन पर मुबारकबाद दे रहे थे. गलियों में बच्चे भी ख़ुशी से चीख़-चीख़कर कह रहे थे- "केजरीवाल जीत गया." 
अब केजरीवाल को लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, क्योंकि 
अवाम को भाजपा का विकल्प मिल गया है.
 कट्टर कांग्रेसी कैसे 'आप' समर्थक हो गए? क्या इस पर कांग्रेस ग़ौर करेगी?  

राव बिजेन्द्र सिंह 
आर्यावली पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा अहीरवाल वैदिक काल से भारतीय सभ्यता, संस्कृति व इतिहास की महत्वपूर्ण धरा रही है। यहां तक कि विभिन्न अवसरों पर कवियों और विद्वानों ने इस क्षेत्र को ‘वीर जननी धरा अहीरवाल’ कहकर संबोधित किया है। इस धरा ने ऐसे वीरों और राष्ट्रभक्तों को जन्म दिया है जिनकी तलवारों की चमक ने दुश्मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनमें भारत माँ के चिराग राव गोपालदेव जी का जन्म सम्मत 1886 आसोज मास, शुदी पक्ष तिथि अष्ठमी (6 अक्टूबर 1829 ई०) में रेवाड़ी के राजा राव नन्दराम जी के राजघराने में हुआ। इतिहास का बारिकी से अध्ययन करने पर असल चीज सामने आ जाती है। पुराने जमाने में रेवाड़ी रियासत को उत्तरी भारत में एकमात्र सशक्त रियासत होने का गौरव प्राप्त था। इस शक्तिशाली रियासत के कारण ही इस क्षेत्र के यादवों का पूरे देश में एक विशेष मान-सम्मान रहा है।

30 दिसंबर 1803 ई० का दिन रेवाड़ी रियासत का दिन रेवाड़ी के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण दिवस रहा है। इस दिन बादशाह द्वारा अपना प्रबंधक नियुक्त किए गए दौलत राव सिंधिया ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि कर उत्तरी भारत के हिंदुस्तान नाम से पुकारे जाने वाला सब क्षेत्र अंग्रेजों के कब्जे मेें चला गया। जिन लोगों ने अंग्रेजों की मदद की उन्हें खूब दिल खोलकर जागीर आदि देकर मालामाल कर दिया। संधि के बाद से ही अंग्रेजों ने देश के शीर्ष सिंहासन पर बैठने की लालसा प्रबल होने लगी। लेकिन, अनेकों देसी रियासतें अंग्रेजों के विरुद्ध होने के कारण अंग्रेजों की यह योजना कामयाब नहीं होने पा रही थी। अंग्रेजों ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तरह-तरह के षडय़ंत्र रचने शुरू कर दिए। इसमें उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति का सहारा लिया तथा उन्होंने जिन रियासतों के राजाओं के नि:संतान होने पर उन रियासतों को अपने प्रसंशकों के हाथों सौंपने की योजना तैयार की तथा उसे कानून बनाकर पूरे देश में लागू कर दिया। इन रियासतों की शिकार देश की अन्य रियासतों के साथ रेवाड़ी रियासत को भी होना पड़ा। उस समय रेवाड़ी रियासत के राजा राव हीरासिंह की नि:संतान मृत्यु होने के पश्चात रेवाडी रियासत को सारा कार्य राव हीरा सिंह की माता रानी मायाकौर के हाथों में आ गया। राजमाता रानी मायाकौर द्वारा रेवाडी रियासत का उत्तराधिकारी चुनने तक राजमाता ने राव हीरा सिंह के गोंसता (नौकर) व सगोत्री भाई राव तेज सिंह को रियासत का कार्य देखने के लिए अपना मुख्तयार नियुक्त किया। अंग्रेजों ने रेवाडी रियासत को जब्त कर इसकी बंदरबाट कर अपने चहेतों में बाँट दिया। जिनमें अलवर, पटौदी, झज्जर, फरूखनगर, लुहारु आदि प्रमुख है। राजमाता रानी मायाकौर ने रेवाडी रियासत के जब्त करने के षड्यंत्र के खिलाफ दिल्ली में दावा दायर किया। जिसमें कहा गया कि यह खानदान सदियों से इस रेवाडी रियासत पर राज्य करता आया है तथा इस खानदान का वंश अभी आबाद है। इसलिए, रेवाडी रियासत के जब्ती के आदेश को निरस्त किया जाए। इस दावे की पैरवी का कार्य राजमाता ने राव तेज सिंह को सौंपा। लेकिन, अंग्रेजों ने रेवाडी रियासत की कुछ जागीर को छोडकर इसकी बहुत बडी जागीर को बंदरबाट कर अपने चहेतों में बाँट दिया। वहीं अँग्रेजों ने राव तेज सिंह से मित्रता कर उन्हें 87 गाँवों की इस्तमरारी जागीर देकर एक बडा जागीरदार बना दिया।

राव तेज सिंह ने राजमाता रानी मायाकौर से रेवाडी रियासत की गद्दी पर अपने बडे लडके राव नाथूराम को गोद देने की इच्छा जाहिर की। जिसे राजमाता रानी मायाकौर ने पेट व गोद की जायदाद का स्वामी होने की स्वीकृति के साथ राव नाथूराम को गोद लेकर रेवाड़ी राज्य की गद्दी पर बैठा दिया। जिससे अंग्रेजों की फुट डालो नीति पर पानी फिर गया। 1823 में राव तेज सिंह की मृत्यु के बाद उनकी इस्तमरारी जागीर का आधा हिस्सा राव नाथूराम ने अपने छोटे भाई राव जवाहर सिंह को दे दिया। अंग्रेजों ने दिल्ली के धनाढ्य सेठ व बेंकर सेठ रामदास गुड़ वाले से पूर्ण सिंह को कर्ज़ा दिलवाकर राव तेज सिंह का तीसरा पुत्र होने का दावा दीवानी करवाकर राव तेज सिंह को मिली इस्तमरारी जागीर में अपना हक माँगा। उन दिनों जुडिशरी में सत्ता का दखल नहीं था। अदालत दीवानी में पूर्ण सिंह खुद को तेजसिंह का पुत्र साबित नहीं कर पाने से मुकदमा हार गया। फिर अंग्रेजों ने उससे कमीश्नरी में एक अपील दायर करवाई। कमीश्नरी अंग्रेजों के अधीन थी। जिसमें अंग्रेजों ने दखल देकर उसे कमीश्नरी में जिताकर राव तेज सिंह की इस्तमरारी का तीसरा हिस्सा पूर्णसिंह को दिलवा दिया। इस मुकदमेबाजी में पूर्णसिंह पर काफी कर्जा होने के कारण उसको मिली इस्तमरारी जागीर के चार-पाँच गाँव छोडकर सब कुर्क हो गए।

पूर्ण सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राव तुलाराम को उनके शेष बचे गांव की जायदाद प्राप्त हुई। अंग्रेजों के षडयंत्र में घिरी इस रेवाडी रियासत के राजा राव नाथूराम की रानी महाकौर की कोख से जन्मे राव गोपालदेव की तीन शादियां हुई थी एक शादी नसीबपुर (नारनौल) व दो शादियां उदयरामसर (बीकानेर-राजस्थान) में हुई थी। 1849ई़० में राव गोपाल देव के चाचा राव जवाहर सिंह की निःसन्तान मृत्यु के पश्चात उनकी जायदाद का हिस्सा लेने के लिए राव तुलाराम ने राव जवाहर सिंह की विधवा रानी रूपकौर व राव नाथूराम पर अदालत में दावा दायर किया। मुकदमा लम्बा चला। इसी दौरान रानी रूपकौर की मृत्यु हो गई तथा इसके कुछ समय पश्चात सन्  1855ई० में राव नाथूराम का देहांत होने पर उनके एकमात्र पुत्र राव गोपाल देव ने रेवाडी रियासत की बागडोर संभाली। परंतु इस समय तक अंग्रेज इस रजवाडे को काफी नुकसान पहुँचे थे।

इसकी परवाह किए बगैर भारत मां के चिराग राव गोपालदेव के दिल में राष्ट्र भक्ति की भावना हिलौरें मार रही थी। 
इसी राष्ट्रीयता से ओतप्रोत राव गोपाल देव ने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेडने का बीडा उठाया। देश को आजाद कराने के लिए इन क्रांतिकारियों की ललक से गौरी सरकार काफी परेशान थी। राव गोपाल देव ने अपनी एक गुप्त कूटनीति के तहत देश की छावनियों में तैनात भारतीय सैनिकों को जागृत करने के लिए विभिन्न छावनियों में सक्रिय हो गए तथा इन छावनियों में तैनात सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार किया। अंग्रेज इतिहासकार जे.डब्लू.के.ये. ने भी इसका उल्लेख किया है। दि मेरठ नैरेटिव पुस्तक से भी इस तथ्य की पुष्टी होती है। निश्चित योजना अनुसार 10 मई 1857 को मेरठ में इस योजना का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हुआ। राव गोपाल देव के आदेशानुसार मेरठ छावनी में तैनात नांगल पठानी के सगोत्री भाई राव किशन सिंह व चरखी दादरी के शोबक्श सिंह ने सभी सैनिकों को साथ लेकर विद्रोह कर दिया तथा वहाँ के स्थानीय लोगों ने भी क्रांतिकारियों का साथ दिया। मेरठ को आजाद कराने के बाद 11 मई को राव गोपाल देव क्रांतिकारियों के साथ दिल्ली पहुँच गए। वहाँ बादशाह बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर आगे की रणनीति पर मंत्रणा की। यहा से राव गोपालदेव अपनी राजधानी रेवाडी की ओर रवाना हुए। क्रांति की भडकती लपटों को देखकर 13 मई को तत्कालीन डिप्टी कमीश्नर विलियम फोर्ड घबराकर अपने अफसरों के साथ गुडगाँव छोडकर भाग खडा हुआ। वह भोंडसी, पलवल के रास्ते मथुरा पहुँच गया। राव गोपाल देव ने रेवाडी पहुँचकर अपनी सेना संगठित की तथा अपने मामा चौ० सेढू सिंह बहरोड निवासी को अपना कूटनीतिक सलाहकार नियुक्त किया।

17 मई को तहसीलदार व थानेदार को बंदी बनाकर अंग्रेजों को राजस्व वसूली से रोका तथा बोहडा-बादशाहपुर पर पुनः अपना कब्जा जमा लिया। इस क्रांति की लपटे देश में चारों और फैल गई। देश में क्रांतिकारियों के बढते साहस से अंग्रेज सरकार हताश हो गई। जो लोग निजी स्वार्थ से वशीभूत होकर अंग्रेजों से मिले हुए थें अपने-अपने राजाओं से समझोता करने लगे। इधर राव तुलाराम ने राव गोपाल देव से सुलह कर ली। जून के महीने में मेजर विलियम ऐडन, जो कि जयपुर में पोलिटिकल एजेंट था। वह जयपुर की सेना के बल पर दिल्ली जाकर क्रांतिकारियों को दबाना चाहता था। तथा उन लोगों से मदद मांगने निकला था जो लोग अंग्रेजों की मदद से फायदा उठा रहें थें, उसने राव तुलाराम से मुलाकात कर मदद माँगी। बदली हुई परिस्थितियों के कारण मदद मिलना मुश्किल था। राव तुलाराम ने यह कहकर साफ इंकार कर दिया कि सब कमान राव गोपाल देव के पास है। मैं मदद देने में असमर्थ हूँ।क्रांतिकारियों को मिल रहे जनसमर्थन के कारण मेजर ऐडन निराश होकर जयपुर वापस लौट गया। सितम्बर के अंत में दिल्ली पर अंग्रेजों का दोबारा अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने पुनः इन देशभक्तों को कुचलने तथा अहीरवाल में भडक रही क्रांति की लपटों को रोकने के लिए ब्रिगेडियर सावर्स ने 7 अक्टूबर  1857 को 1500 सैनिकों के साथ रेवाडी पर अचानक हमला बोल दिया। राव गोपाल देव अपने महल (रानीजी की ड्योढी) के सुरंग के रास्ते अपने किले गोकलगढ पहुँचने में कामयाब रहे। किले से अपनी सेना व अस़ला लेकर ब्रि० सावर्स की शक्तिशाली सेना से कडे संघर्ष के बाद अंग्रेजी सेना झज्जर की तरफ भाग खडी हुई। अंग्रेज हकूमत गोपाल देव की इन क्रांतिकारी गतिविधियों से बडी विचलित हो उठी तथा इनको कुचलने के लिए एक विशाल सेना तोपखाने के साथ कर्नल जे.जे. जेरार्ड के नेतृत्व में भेजी। इसकी सूचना मिलते ही जोधपुर शेखावाटी के विद्रोही सैनिक दस्ते व अन्य क्रांतिकारी देशभक्तों की सैन्य शक्ति भी राव गोपाल देव से आ मिली। राव गोपाल देव ने सुरक्षा की दृष्टि से कानोड (महेंद्रगढ) के किले को मोर्चे के लिए उपयुक्त समझा। इस किले का निर्माण राव गोपाल देव के पूर्वजों ने क्षेत्र की भौगोलिक व सामरिक विषेशताओं को ध्यान में रखकर कराया था। परंतु इस किले का किलेदार देशद्रोही निकला उसने किला सौंपने से इन्कार कर दिया। राव गोपाल देव ने इस परिस्थिति पर अन्य क्रान्तिकारियों सेे मंत्रणा कर निर्णय लिया तथा महेंद्रगढ से कुछ मील दूर नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजी सेना से भिडने के लिए अपना मोर्चा लगाया। नसीबपुर में राव गोपाल देव ब्याहे थे व मशहूर व संपन्न ठिकाना होने के कारण राव गोपाल देव को बाहुबल के साथ-साथ सेना के लिए अन्न व धन का पूरा सहयोग मिला। वही उनके ननिहाल बहरोड जो युद्ध के मैदान से कुछ मील दूर होने के कारण बहरोड के चौधरियों ने भी तन,मन,धन से पूरा साथ दिया। 16 नवम्बर 1857 को दोनों सेनाएँ एक दूसरे के सामने खडी थी। मातृभूमि की स्वतंत्रता के मतवालों ने अपने शीश हथेली पर रखकर अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। राव गोपाल देव की तलवार शत्रु सैनिकों के सिर को धड से अलग कर उनके रक्त से अपनी प्यास भुजा रही थी। राव गोपाल देव के शौर्य और वीरता की कहानी इस युद्ध में भाग लेने वाले अंग्रेज कैप्टन  स्टेवर्ड ने जिन शब्दों में की है वह यहाँ के बहादुरों के खून से लिखी एक अमर दास्ताँ को प्रस्तुत करती है। भारतीय सेना भूखे शेर की तरह गौरी सेना पर टूट पडी। इस भीषण प्रहार से गौरी सेना तिलमिला उठी। इस युद्ध में अँग्रेजों के बहुत से सैनिक मारे गए, इन मुट्ठी भर क्रांतिकारियों ने अँग्रेजों की भारी सेना के छक्के छुडा दिए तभी अचानक दुश्मन की गोली से राव किशन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए। लेकिन, राव गोपालदेव के अदम्य साहस ने अपनी तलवार से अंग्रेजी सेना के कमांडिंग अफसर कर्नल जेरार्ड का सर कलम कर गौरी सेना के पाँव उखाड दिए। युद्ध की देवी स्वतंत्रता के दिवानों का चयन ही करने वाली थी कि अंग्रेजी सेना को पटियाला, नाभा व कपूरथला के राजाओं की सेना अंग्रेजों से आ मिली। घर की फूट ने चमत्कार दिखाया। आजादी के दीवानों को पराजय का मुँह देखना पडा। तथा मैदान अंग्रेजों के हाथ लगा। इस युद्ध में पांच हजार अनाम क्रांतिकारी शहीद हो गए।

राव गोपाल देव और राव तुलाराम नसीबपुर की समरभूमि से जोधपुर से आए दस्ते के साथ जोधपुर चले गए। भारत माँ की आजादी के दीवाने राव गोपाल देव फिर से क्रांतिकारियों को इकट्ठा करने व अंग्रेजों को देश से खदेडने में जुट गए। उन्होंने देश के अन्य राजाओं से मदद माँगी। वहां की छोटी बड़ी करीब 25 रियासतों ने अपनी सेना की कमांड को राव गोपालदेव के हाथों सौंप दिया। तात्या टोपे, नाना साहब तथा देश के अन्य क्रांतिकारियों से इस विषय पर मंत्रणा जारी रखी। 

इसी दौरान 1858 ई० में इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया का सरकारी ऐलान हुआ कि विद्रोहियों से माफीनामा लेकर राज क्षमा प्रदान किया जाता है। इसे पढकर कुछ विद्रोहियों ने तत्कालीन गवर्नर जनरल केनिंग के पास अपने माफीनामे भेजे। इस आशय का एक माफीनामा जयपुर के पोलिटिकल एजेंट एडन को डाक द्वारा प्राप्त हुआ। जिस पर मोहर जोधपुर की देखकर अंग्रेजों ने जोधपुर पर दबिश देने का निर्णय लिया।

जब बीकानेर के राजा ने यह पता लगा कि अंग्रेज जोधपुर पर दबिश देने वाले है तो उन्होने राव गोपाल देव से जोधपुर से बीकानेर रियासत आने की सलाह दी। बीकानेर रियासत तटस्थ थी ना तो अंग्रेजों के खिलाफ ना हक में, इसलिए अंग्रेज बिना राजा की इजाजत के बीकानेर की सीमा में नही घुस सकते थे। ये सब बीकानेर के राजा ने इसलिए कहा क्योंकि बीकानेर के राजा के साथ रेवाडी राजघराने के पारिवारिक संबंध थे। राव गोपाल देव अब जान गए थे कि बिना किसी बाहरी सहारे के अंग्रेज जैसे दुश्मन को परास्त करना संभव नहीं है, परन्तु अंग्रेजों के भय के कारण यहाँ के रजवाडों से भी मदद मिलना असम्भव था। बीकानेर के राजा के अफगान व ईरान के शाहों से अच्छे संबंध थे। उन्होंने अनेकों लोगों को अपना दूत बनकर इन देशों के शाहो से मदद लाने के लिए प्रोत्साहित किया जिनका अंग्रेजों से मिल जाने का अंदेशा था।

अंग्रेजों की तरफ़ से राव गोपालदेव से माफीनामा देने की पेशकश की गई। परंतु राव गोपालदेव ने माफीनामे की पेशकश को ठुकरा देने के बाद अंग्रेज सरकार ने राव गोपाल देव व बहादुरशाह जफ़र पर बगावत का मुकदमा चलाया। इस विषय में उस समय के राजस्व रिकार्ड के अनुसार तत्कालीन गवर्नर जनरल के विभिन्न आदेशों के तहत राव गोपाल देव की रेवाड़ी रियासत के तमाम गाँवों जिनमें गोपालपुरा वर्तमान में रामपुरा व रेवाडी भी शामिल था, नीलाम कर अपने चहेतों में बाँट दिए तथा ये आदेश जारी किए कि इस खानदान के साथ वो सलूक अम्ल में लाया जाए जिससे इस खानदान की माली हालत में शान शौकत भविष्य में ना पनप सके तथा उन्हें जिंदा या मुर्दा गिरफ्तार करने का इनाम घोषित कर देश के विभिन्न शहरों में इश्तहार भी चस्पा करवाए गए। लेकिन, भारत मां के सपूत राव गोपाल देव आँखों में आजादी का सपना संजोए अंग्रेजों की पकड से बाहर रहे। अंत में अंग्रेजों ने सन् 1862 ई़० में उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनकी याद में रेवाडी राजवंश के वंशज एवम् (सामाजिक संगठन) अहीरवाल आंदोलन के संयोजक राव बिजेन्द्र सिंह के प्रयासों से हरियाणा की तत्कालीन हुड्डा सरकार द्वारा रेवाडी-महेन्द्रगढ रोड पर राव गोपाल देव की विशाल प्रतिमा स्थापित कराई गई थी। यह प्रतिमा आने वीली पीढियों को राव गोपाल देव के शौर्य व उनके बलिदान की याद ताजा करती रहेगी और इलाके की जननियों को शूरवीर व देशभक्त बनने की प्रेरणा देता रहेगी।
वीर एवं शहीद दिवस पर प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अमर शहीद राव गोपालदेव व सभी अनाम वीर एवं शहीदों को शत्-शत् नमन।


फ़िरदौस ख़ान
बढ़ते बाज़ारवाद के दौर में उपभोक्ता संस्कृति तो देखने को मिल रही है, लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी है. आज हर व्यक्ति उपभोक्ता है, चाहे वह कोई वस्तु ख़रीद रहा हो या फिर किसी सेवा को प्राप्त कर रहा हो. दरअसल, मुना़फ़ाखोरी ने उपभोक्ताओं के लिए कई तरह की परेशानियां पैदा कर दी हैं. वस्तुओं में मिलावट और निम्न गुणवत्ता की वजह से जहां उन्हें परेशानी होती है, वहीं सेवाओं में व्यवधान या पर्याप्त सेवा न मिलने से भी उन्हें दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है. हालांकि सरकार कहती है, जब आप पूरी क़ीमत देते हैं, तो कोई भी वस्तु वज़न में कम न लें. बाट सही है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए क़ानून है. यह स्लोगन सरकारी दफ्तरों में देखने को मिल जाएगा. सरकार ने उपभोक्ताओं को संरक्षण देने के लिए कई क़ानून बनाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ताओं से पूरी क़ीमत वसूलने के बाद उन्हें सही वस्तुएं और वाजिब सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं. भारत में 24 दिसंबर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए 24 दिसंबर, 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 लागू किया गया. इसके अलावा 15 मार्च को देश में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के तौर पर मनाया जाता है. भारत में इसकी शुरुआत 2000 से हुई.

ग़ौरतलब है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 में उत्पाद और सेवाएं शामिल हैं. उत्पाद वे होते हैं, जिनका निर्माण या उत्पादन किया जाता है और जिन्हें थोक विक्रेताओं या खुदरा व्यापारियों द्वारा उपभोक्ताओं को बेचा जाता है. सेवाओं में परिवहन, टेलीफ़ोन, बिजली, निर्माण, बैंकिंग, बीमा, चिकित्सा-उपचार आदि शामिल हैं. आम तौर पर ये सेवाएं पेशेवर लोगों द्वारा प्रदान की जाती हैं, जैसे चिकित्सक, इंजीनियर, वास्तुकार, वकील आदि. इस अधिनियम के कई उद्देश्य हैं, जिनमें उपभोक्ताओं के हितों और अधिकारों की सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण परिषदों एवं उपभोक्ता विवाद निपटान अभिकरणों की स्थापना शामिल है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया कि उपभोक्ता कौन है और किन-किन सेवाओं को इस क़ानून के दायरे में लाया जा सकता है. इस अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक़, किसी भी वस्तु को क़ीमत देकर प्राप्त करने वाला या निर्धारित राशि का भुगतान कर किसी प्रकार की सेवा प्राप्त करने वाला व्यक्ति उपभोक्ता है. अगर उसे ख़रीदी गई वस्तु या सेवा में कोई कमी नज़र आती है तो वह ज़िला उपभोक्ता फ़ोरम की मदद ले सकता है. इस अधिनियम की धारा-2 (1) (डी) के अनुबंध (2) के मुताबिक़, उपभोक्ता का आशय उस व्यक्ति से है, जो किन्हीं सेवाओं को शुल्क की एवज में प्राप्त करता है. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 1997 के अपने एक फ़ैसले में कहा कि इस परिभाषा में वे व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं, जो इन सेवाओं से लाभान्वित हो रहे हों.

यह क़ानून उपभोक्ताओं के लिए एक राहत बनकर आया है. 1986 से पहले उपभोक्ताओं को दीवानी अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते थे. इसमें समय के साथ-साथ धन भी ज़्यादा ख़र्च होता था. इसके अलावा उपभोक्ताओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था. इस समस्या से निपटने और उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए संसद ने ज़िला स्तर, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर विवाद पारितोष अभिकरणों की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया. यह जम्मू-कश्मीर के अलावा पूरे देश में लागू है. जम्मू-कश्मीर ने इस संबंध में अपना अलग क़ानून बना रखा है. इस अधिनियम के तहत तीन स्तरों पर अभिकरणों की स्थापना की गई है, ज़िला स्तर पर ज़िला मंच, राज्य स्तर पर राज्य आयोग और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग. अब उपभोक्ताओं को वकील नियुक्त करने की ज़रूरत नहीं है. उन्हें अदालत की फ़ीस  भी नहीं देनी पड़ती. इन अभिकरणों द्वारा उपभोक्ता का परिवाद निपटाने की सेवा पूरी तरह निशुल्क है. इन तीनों अभिकरणों को दो प्रकार के अधिकार हासिल हैं. पहला धन संबंधी अधिकार और दूसरा क्षेत्रीय अधिकार. ज़िला मंच में 20 लाख रुपये तक के वाद लाए जा सकते हैं. राज्य आयोग में 20 लाख से एक करोड़ रुपये तक के मामलों का निपटारा किया जा सकता है, जबकि राष्ट्रीय आयोग में एक करोड़ रुपये से ज़्यादा के मामलों की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. यह धन संबंधी अधिकार है. जिस ज़िले में विरोधी पक्ष अपना कारोबार चलाता है या उसका ब्रांच ऑफिस है या वहां कार्य कर रहा है तो वहां के मंच में शिकायती पत्र दिया जा सकता है. इसे क्षेत्रीय अधिकार कहते हैं.

उपभोक्ता को वस्तु और सेवा के बारे में एक शिकायत देनी होती है, जो लिखित रूप में किसी भी अभिकरण में दी जा सकती है. मान लीजिए, ज़िला मंच को शिकायत दी गई. शिकायत पत्र देने के 21 दिनों के भीतर ज़िला मंच विरोधी पक्ष को नोटिस जारी करेगा कि वह 30 दिनों में अपना पक्ष रखे. उसे 15 दिन अतिरिक्त दिए जा सकते हैं. ज़िला मंच वस्तु का नमूना प्रयोगशाला में भेजता है. इसकी फ़ीस उपभोक्ता से ली जाती है. प्रयोगशाला 45 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट भेजेगी. अगर रिपोर्ट में वस्तु की गुणवत्ता में कमी साबित हो गई, तो ज़िला मंच विरोधी पक्ष को आदेश देगा कि वह माल की त्रुटि दूर करे, वस्तु को बदले या क़ीमत वापस करे या नुक़सान की भरपाई करे, अनुचित व्यापार बंद करे और शिकायतकर्ता को पर्याप्त ख़र्च दे आदि. अगर शिकायतकर्ता ज़िला मंच के फ़ैसले से ख़ुश नहीं है तो वह अपील के लिए निर्धारित शर्तें पूरी करके राज्य आयोग और राज्य आयोग के फ़ैसले के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय आयोग में अपील कर सकता है. इन तीनों ही अभिकरणों में दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है. मंच या आयोग का आदेश न मानने पर दोषी को एक माह से लेकर तीन साल की क़ैद या 10 हज़ार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों सज़ाएं हो सकती हैं.

कुछ ही बरसों में इस क़ानून ने उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण किरदार निभाया. इसके ज़रिये लोगों को शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का साधन मिल गया. इसमें 1989, 1993 और 2002 में संशोधन किए गए, जिन्हें 15 मार्च, 2003 को लागू किया गया. संशोधनों में राष्ट्रीय आयोग और राज्यों के आयोगों की पीठ का सृजन, सर्किट पीठ का आयोजन, शिकायतों की प्रविष्टि, सूचनाएं जारी करना, शिकायतों के निपटान के लिए समय सीमा का निर्धारण, भूमि राजस्व के लिए बक़ाया राशियों के समान प्रमाणपत्र मामलों के माध्यम से निपटान अभिकरण द्वारा मुआवज़े की वसूली का आदेश दिया जाना, निपटान अभिकरण द्वारा अंतरिम आदेश जारी करने का प्रावधान, ज़िला स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना, ज़िला स्तर पर निपटान अभिकरण के संदर्भ में दंडात्मक न्याय क्षेत्र में संशोधन और नक़ली सामान/निम्न स्तर की सेवाओं के समावेश को अनुचित व्यापार प्रथाओं के रूप में लेना आदि शामिल हैं. उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम-2002 के बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग ने उपभोक्ता संरक्षण विनियम-2005 तैयार किया.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ने उपभोक्ताओं को अधिकार दिया है कि वे अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाएं. इसी क़ानून का नतीजा है कि अब उपभोक्ता जागरूक हो रहे हैं. इस क़ानून से पहले उपभोक्ता बड़ी कंपनियों के ख़िलाफ़ बोलने से गुरेज़ करता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. मिसाल के तौर पर एक उपभोक्ता ने चंडीगढ़ से कुरुक्षेत्र फ़ोन शिफ्ट न होने पर रिलायंस इंडिया मोबाइल लिमिटेड के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई और उसे इसमें कामयाबी मिली. इस लापरवाही के लिए उपभोक्ता अदालत ने रिलायंस पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया. इसी तरह एक उपभोक्ता ने रेलवे के एक कर्मचारी द्वारा उत्पीड़ित किए जाने पर भारतीय रेल के ख़िलाफ़ उपभोक्ता अदालत में मामला दर्ज करा दिया. नतीजतन, उपभोक्ता अदालत ने रेलवे पर 25 हज़ार रुपये का जुर्माना लगा दिया. बीते जून माह में दिल्ली स्थित राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत ने ओडिसा के बेलपहा़ड के पशु आहार विके्रता राजेश अग्रवाल पर एक लाख 20 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया. मामले के मुताबिक़, ओडिसा के बेलपहा़ड के पशुपालक राम नरेश यादव ने अगस्त 2004 में राजेश की दुकान से पशु आहार ख़रीदा था. इसे खाने के कुछ घंटे बाद उसकी एक भैंस, एक गाय और दो बछड़ियों ने दम तो़ड़ दिया. इसके अलावा बेल पहाड़ के ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की एक गाय की भी यह पशु आहार खाने से मौत हो गई. पीड़ितों द्वारा मामले की सूचना थाने में देने के बाद ब्रजराज नगर के पशु चिकित्सक लोचन जेना एवं बेलपहाड़ के पशु चिकित्सक प्रफुल्ल नायक ने भी पोस्टमार्टम के उपरांत इस बात की पुष्टि की कि पशुओं की मौत विषैला दाना खाने से हुई है. राम नरेश द्वारा क्षतिपूर्ति मांगने पर व्यवसायी ने कुछ भी देने से इंकार कर दिया. इस पर राम नरेश ने ज़िला उपभोक्ता अदालत की शरण ली और अदालत ने पशु आहार विक्रेता को दोषी क़रार दिया. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ व्यापारी राजेश ने राज्य उपभोक्ता अदालत और बाद में 2007 में राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत में अपील दायर की. राष्ट्रीय अदालत के जज जे एम मल्लिक और सुरेश चंद्रा की खंडपीठ ने राज्य उपभोक्ता अदालत के फ़ैसले को सही मानते हुए व्यापारी को एक लाख बीस हज़ार रुपये का जुर्माना अदा करने का आदेश दिया.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ने उपभोक्ता समूहों को प्रोत्साहित करने का काम किया है. इस क़ानून से पहले जहां देश में सिर्फ़ 60 उपभोक्ता समूह थे, वहीं अब उनकी तादाद हज़ारों में है. उन उपभोक्ता समूहों ने स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई है. सरकार ने उपभोक्ता समूहों को आर्थिक सहयोग मुहैया कराने के साथ-साथ अन्य कई तरह की सुविधाएं भी दी हैं. टोल फ्री राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन उपभोक्ताओं के लिए वरदान बनी है. देश भर के उपभोक्ता टोल फ्री नंबर 1800-11-14000 डायल कर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए परामर्श ले सकते हैं. उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई जागो, ग्राहक जागो जैसी मुहिम से भी आम लोगों को उनके अधिकारों के बारे में पता चला है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने माना है कि राज्य सरकारें उपभोक्ता मंच और आयोग को सुविधा संपन्न बनाने के लिए केंद्र द्वारा जारी बजट का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं. इस बजट का समुचित उपयोग होना चाहिए. उनका यह भी कहना है कि उपभोक्ताओं को मालूम होना चाहिए कि वे जो खा रहे हैं, उसमें क्या है, उसकी गुणवत्ता क्या है, उसकी मात्रा और शुद्धता कितनी है? उत्पादकों को भी चाहिए कि वे अपने उत्पाद के इस्तेमाल से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की भी विस्तृत जानकारी दें. बहरहाल, उपभोक्ताओं को ख़रीदारी करते वक़्त सावधानी बरतनी चाहिए. उपभोक्ताओं को विभिन्न आधारभूत पहलुओं जैसे अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी), सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग, उत्पादों पर भारतीय मानक संस्थान (आईएसआई) का निशान और समाप्ति की तारीख़ के बारे में जानकारी होनी चाहिए. इसके बावजूद अगर उनके साथ धोखा होता है तो उसके ख़िलाफ़ शिकायत करने का अधिकार क़ानून ने उन्हें दिया है, जिसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
उपभोक्ताओं की परेशानियां
  • सेहत के लिए नुक़सानदेह पदार्थ मिलाकर व्यापारियों द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट करना या कुछ ऐसे पदार्थ निकाल लेना, जिनके कम होने से पदार्थ की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है, जैसे दूध से क्रीम निकाल कर बेचना.
  • टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं में गुमराह करने वाले विज्ञापनों के ज़रिये वस्तुओं तथा सेवाओं का ग्राहकों की मांग को प्रभावित करना.
  • वस्तुओं की पैकिंग पर दी गई जानकारी से अलग सामग्री पैकेट के भीतर रखना.
  • बिक्री के बाद सेवाओं को अनुचित रूप से देना.
  • दोषयुक्त वस्तुओं की आपूर्ति करना.
  • क़ीमत में छुपे हुए तथ्य शामिल होना.
  • उत्पाद पर ग़लत या छुपी हुई दरें लिखना.
  • वस्तुओं के वज़न और मापन में झूठे या निम्न स्तर के साधन इस्तेमाल करना.
  • थोक मात्रा में आपूर्ति करने पर वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना.
  • अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का ग़लत तौर पर निर्धारण करना.
  • एमआरपी से ज़्यादा क़ीमत पर बेचना.
  • दवाओं आदि जैसे अनिवार्य उत्पादों की अनाधिकृत बिक्री उनकी समापन तिथि के बाद करना.
  • कमज़ोर उपभोक्ताएं सेवाएं, जिसके कारण उपभोक्ता को परेशानी हो.
  • बिक्री और सेवाओं की शर्तों और निबंधनों का पालन न करना.
  • उत्पाद के बारे में झूठी या अधूरी जानकारी देना.
  • गारंटी या वारंटी आदि को पूरा न करना.
उपभोक्ताओं के अधिकार
  • जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं के विपणन के ख़िलाफ़ सुरक्षा का अधिकार.
  • सामान अथवा सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और मूल्य, जैसा भी मामला हो, के बारे में जानकारी का अधिकार, ताकि उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार पद्धतियों से बचाया जा सके.
  • जहां तक संभव हो उचित मूल्यों पर विभिन्न प्रकार के सामान तथा सेवाओं तक पहुंच का आश्वासन.
  • उपभोक्ताओं के हितों पर विचार करने के लिए बनाए गए विभिन्न मंचों पर प्रतिनिधित्व का अधिकार.
  • अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के शोषण के विरुद्ध निपटान का अधिकार.
  • सूचना संपन्न उपभोक्ता बनने के लिए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अधिकार.
  • अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार.
माप-तोल के नियम
  • हर बाट पर निरीक्षक की मुहर होनी चाहिए.
  • एक साल की अवधि में मुहर का सत्यापन ज़रूरी है.
  • पत्थर, धातुओं आदि के टुकड़ों का बाट के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकता.
  • फेरी वालों के अलावा किसी अन्य को तराज़ू हाथ में पकड़ कर तोलने की अनुमति नहीं है.
  • तराज़ू एक हुक या छड़ की सहायता से लटका होना चाहिए.
  • लड़की और गोल डंडी की तराज़ू का इस्तेमाल दंडनीय है.
  • कपड़े मापने के मीटर के दोनों सिरों पर मुहर होनी चाहिए.
  • तेल एवं दूध आदि के मापों के नीचे तल्ला लटका हुआ नहीं होना चाहिए.
  • मिठाई, गिरीदार वस्तुओं एवं मसालों आदि की तुलाई में डिब्बे का वज़न शामिल नहीं किया जा सकता.
  • पैकिंग वस्तुओं पर निर्माता का नाम, पता, वस्तु की शुद्ध तोल एवं क़ीमत कर सहित अंकित हो. साथ ही पैकिंग का साल और महीना लिखा होना चाहिए.
  • पैकिंग वस्तुओं पर मूल्य का स्टीकर नहीं होना चाहिए.


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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