प्रसून लतांत
महात्मा गांधी महिलाओं को रूढ़ियों और कुप्रथाओं से मुक्त करने और स्वतंत्र रूप से व्यक्तित्व विकास के हिमायती रहे। गांधी जी ने महिलाओं के हक में जोरदार ढंग से जब आवाज उठाई, जब भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति होने के बावजूद उनके हक में कोई आवाज नहीं उठाता था। कोई कल्पना भी नहीं करता कि स्त्रियां भी स्वतंत्र हो सकती हैं। लेकिन गांधी जी ने बिना किसी की परवाह किए स्त्रियों के उद्धार के लिए कई कदम उठाए। गांधी जी ने बाल विवाह, परदा प्रथा और दहेज जैसी कुरूतियों के खिलाफ आवाज उठाई और घर के बाहर सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की। पहले दक्षिण अफ्रीका फिर भारत में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं को शामिल किया।
महिलाओं में अहिंसा की विशेष शक्ति है — इसे गांधीजी ने जोरदार तरीके से खासकर महिलाओं को अहसास कराया। गांधीजी ब्रिटेन में मताधिकार के लिए वहां की महिलाओं के आंदोलन से प्रभावित हुए थे। इसके बाद ही उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और फिर बाद में भारत में आजादी के लिए उनके नेतृत्व में किए जा रहे विभिन्न सत्याग्रहों और आंदोलनों में महिलाओं को बढ़—चढ़कर हिस्सा लेने और जरूरत पड़े तो जेल तक जाने के लिए प्रोत्साहित किया। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों के अधिकार के सिलसिले में 1906 और 1909 में दो बार लंदन का दौरा किया था। तब उन्होंने वहां देखा कि महिलाएं मताधिकार के लिए कैसे अपने अहिंसक आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे। गांधी जी ने ब्रिटेन की महिलाओं को बहादुर बताते हुए उनके समर्थन में कई बार अपने अखबार ट्टइंडियन ओपिनियन’ में लिखा। बाद में 1918 में ब्रिटेन की महिलाओं को मताधिकार हासिल होने में कामयाबी भी मिली। इस कामयाबी के सौ साल पूरे हो गए हैं।
जाने—माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना है कि ब्रिटेन की इन महिलओं का गांधी जी पर गहरा असर पड़ा। जेल जाने के लिए अपना जीवन और परिवार के त्याग करने की उनकी इच्छा ने उन्हें और साथी भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में इसी तरह का आंदोलन करने की प्रेरणा दी। ब्रिटेन की महिलाओं के संघर्ष ने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के प्रदर्शन के तरीके को प्रभावित किया और उनके अपने देश लौटने पर उनके फैसलों को प्रभावित किया जिससे उन्होंने कांग्रेस की स्वतंत्रता के साथ ही पूर्ण मताधिकार की मांग का समर्थन किया।
यह सच है कि भारत में महिलाओं को मताधिकार के लिए अलग से कोई आंदोलन करने की नौबत नहीं आई। आजादी हासिल होते ही भारतीय महिलाओं को पुरुषों की तरह ही मताधिकार सहज ही हासिल हो गया। ऐसा कुछ संभव गांधी की वजह से ही संभव हुआ क्योंकि महिलाओं के उद्धार के मुद्दे पर गांधी किसी भी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं थे। गांधी कहते थे कि स्त्रियों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में महिलाओं पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्याओं में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए उनके साथ पूरी समानता का व्यवहार होना चाहिए।
वैश्विक स्तर पर अहिंसा के आधुनिक सिद्धांत के प्रणेता के रूप में विख्यात महात्मा गांधी ने अपनी पत्नी कस्तूरबा को ही ट्टअहिंसा’ का पहला पाठ पढ़ाने वाली शिक्षिका घोषित किया। उन्होंने पहले किसी और महिला को जेल जाने का आग्रह नहीं किया। उन्होंने इसकी शुरूआत घर से और कस्तूरबा से की। दक्षिण अफ्रीका में जब हिंदुस्तानी विवाह को वहां की सरकार ने गैर कानूनी घोषित किया तो गांधी जी ने इसे हिंदुस्तानी स्त्रियों के स्त्रीत्व पर आक्रमण माना और यह निर्णय लिया कि इस लड़ाई में स्त्रियों को भी सम्मिलित होना चाहिए। गांधी को यह विश्वास तो था ही कि अनेक हिंदुस्तानी बहनें जेल जाने को तैयार हो जाएंगी। लेकिन स्वयं मरे बिना स्वर्ग कौन जा सकता है? गांधी को लगा कि कस्तूरबा अगर इस लड़ाई में सम्मिलित होने को तैयार हो जाए और जेल में जाए तो सारी बाजी सुधर जाए। लेकिन कस्तूरबा को तैयार कैसे किया जाए? उन्हें आदेश देकर जबरन तैयार करने में कोई सार नहीं है। गांधी ने कस्तूरबा से कहा कि हम पुरुष जैसे सरकार से लड़ते हैं वैसे तुम भी लड़ो। अगर तुम्हें सच्ची विवाहिता पत्नी बनना हो और उपपत्नी (रखैल) न बनना हो और अपनी इज्जत तुम लोगों को प्यारी हो तो तुम ही हमारी तरह सरकार से लड़ो। मैं नहीं कहता कि तुम जेल जाओ। तुम्हें अपनी इज्जत के खातिर जेल जाने की उमंग हो तो जाओ। इस तरह गांधी ने कस्तूरबा को समझाया और वह तैयार हो गई। गांधी ने अपनी पुस्तक ट्टदक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में स्वीकार किया है कि आज तक किसी स्त्री की इच्छा हो तो भी उसे लड़ाई में शरीक होने से रोक दिया जाता था लेकिन दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई में महिलाएं प्रचंड शक्ति साबित हुई।
गांधी के साथ कस्तूरबा सहित अनेक महिलाएं उनके आश्रम में रहती थी और सभी अपनी स्वतंत्रता के साथ ऐसा सामूहिक जीवन जी रही थीं जिसमें वे समानता पर पहुंची। गांधी के भारत आने के पूर्व आजादी की जो लड़ाई चल रही थी, वह पूरी तरह पुरुष केंद्रित थी। तब स्त्रियां विभिन्न सामाजिक बुराइयों से तबाह थीं। एक तो अस्पृश्यता (छूआछूत) के कारण दलित महिलाओं की दशा अत्यंत दयनीय थी बाकी महिलाएं भी दहेज, बाल विवाह, वैधव्य और परदा प्रथा जैसी बुराइयों से त्रस्त थीं। ऐसे में उन्हें स्वतंत्र करने और सभी स्तरों पर समानता का मौका देना तो दूर, बात तक भी नहीं की जाती थी। लेकिन जब गांधी जी भारत में कांग्रेस में सक्रिय हुए तो उन्होंने स्त्रियों को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ा। देश के विभिन्न शहरों में राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तरों पर अनेक सम्मेलन आयोजित किए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि महिला शराबबंदी के साथ विदेशी कपड़ों की होली जलाने में बढ़—चढ़कर हिस्सा लिया। नमक आंदोलन के दौरान जब गांधी गिरफ्तार कर लिए गए तो उनके बाद ट्टसत्याग्रह’ की कमान सरोजिनी नायडू ने संभाली। गांधी के साथ अनेक महिलाएं थीं जो उनके प्रयोग के साक्षी और सहभागी रहीं। जिनमें एक रवींद्र नाथ ठाकुर की भांजी सरला देवी थीं, जिन्होंने खादी के प्रचार—प्रसार के साथ गांधी की देखभाल की। गांधी उन्हें अपनी आध्यात्मिक पत्नी कहते थे। इनके अलावा राजकुमारी अमृत कौर थीं, जिनसे गांधी की खूब खतों किताबों की बात होती थी। पहली मुलाकात 1934 में हुई। नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गई। आजाद भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं। गांधी की निजी डाक्टर सुशीला नायर थीं। उनके भाई प्यारेलाल गांधी के निजी सचिव थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कस्तूरबा के साथ जेल गईं। गांधी जिन दो महिलाओं के कंधे पर हाथ रखकर चलते थे। उनमें से एक आभा जन्म से बंगाली थीं। उनकी शादी गांधी के परपोते कनु गांधी से हुई थी। आभा गांधी के साथ नोआखाली यात्रा में थीं। आभा के साथ मनु भी थी। मनु महात्मा गांधी की दूर की रिश्तेदार थी। गांधी मनु को पोती कहते थे। ये आभा और मनु उस समय मौजूद थीं जब 30 जनवरी, 1948 को गांधी को नाथूराम ने गोली मारी थी। विदेशी महिलाओं में एक बड़े ब्रिटिश अफसर की बेटी मेडलीन स्लेड थीं, जिन्हें गांधी मीराबेन कहते थे। वह प्रसिद्ध प्रQांसीसी लेखक रोम्या रौलां की पुस्तक पढ़कर गांधी जी के साथ उनके आश्रम में रहने आ गई थी। इनके अलावा मिली ग्राहम, पोलक सेज, श्लेजिन एस्थ फेरिंग, नीला क्रैम कुकु और माग्रेट स्पीगेल भी थीं। एल्यानोर भौटॉन ने 1954 में एक किताब ट्टवीमेन बिहाइंड महात्मा गांधी’ लिखी।
गांधी की महिला सहयोगियों को लेकर कई किताबें लिखी गई हैं लेकिन इन किताबों में उनकी दिनचर्या का जिक्र ज्यादा है लेकिन पूरी मानवता के लिए गांधी के प्रयासों में इन महिलाओं के योगदानों का आकलन बहुत कम मिलता है। ट्टपहला गिरमिटिया’ नाम से गांधी जी पर प्रमुख उपन्यास के लेखक गिरिराज किशोर कहते हैं कि महिलाओं को जितनी स्वतंत्रता गांधी ने दी उतनी आधुनिक देश और समाज नहीं देते। गांधी विचार की सर्वोच्च संगठन सर्व सेवा संघ की अध्यक्ष रहीं। राधा भट्ट कहती हैं कि गांधी महिलाओं में अहिंसा की विशेष शक्ति देखते थे और वे उसे जगाकर एक समतामूलक समाज बनाना चाहते थे। तभी वे कहते थे कि अहिंसा की नींव पर रचे गए जीवनकी रचना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्त्री को भी अपने भविष्य तय करने का है। गांधी जी कहते थे कि मैं स्त्रियों को समुचित शिक्षा का हिमायती हूं लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि स्त्री दुनिया में अपना योग पुरुष की नकल करके या उसकी प्रतिस्पर्धा करके नहीं दे सकती। गांधी जी का साफ मत था कि स्त्री को पुरुष की पूरक बनना चाहिए।


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