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डॉ. फ़िरदौस ख़ान

तीज-त्यौहार हमारी तहज़ीब और रिवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. ये ख़ुशियों के ख़ज़ाने हैं. ये हमें ख़ुशी के मौक़े फ़राहम करते हैं. हमें ख़ुश होने के बहाने देते हैं. ये हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा हैं. इन तीज-त्यौहारों से किसी भी देश और समाज की संस्कृति व सभ्यता का पता चलता है. मगर बदलते वक़्त के साथ-साथ तीज-त्यौहार भी पीछे छूट रहे हैं या यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि ख़त्म होते जा रहे हैं. लेकिन आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनी रिवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. अगर मुस्लिम त्यौहारों की बात करें, तो सिर्फ़ दो ही त्यौहारों के नाम लिए जाते हैं. एक है ईद उल फ़ित्र, जो माहे रमज़ान के ख़त्म होने के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को मनाई आती है. इसे मीठी ईद भी कहा जाता है. और दूसरा त्यौहार है ईद उल अज़हा, जिसे बक़रीद के नाम से भी जाना जाता है. ये ईद हज की ख़ुशी में मनाई जाती है और तीन दिन तक लोग क़ुर्बानी करते हैं. अहले-हदीस चार दिन क़ुर्बानी करते हैं. इन त्यौहारों के अलावा भी कई त्यौहार हैं, जिन्हें कुछ लोग पूरी अक़ीदत के साथ मनाते हैं. ऐसा ही एक त्यौहार है आख़िरी चहशंबा या आख़िरी चहार शंबा.

आख़िरी चहशंबा क्या है 
हिजरी कैलेंडर के दूसरे महीने के आख़िरी बुध को आख़िरी चहशंबा मनाया जाता है. माना जाता है कि सफ़र के महीने में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तबीयत नासाज़ हो गई थी. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुख़ार हो गया था और सिर में भी दर्द था. इस माह के आख़िरी बुध को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सेहतयाब हुए और ग़ुस्ल किया. फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने परवरदिगार की इबादत की, खाना खाया और सैर के लिए चले गए. इस दिन ख़ास नफ़िल नमाज़ें भी पढ़ी जाती हैं. माहे सफ़र के आख़िरी बुध को ‘सैर बुध’ के नाम से भी जाना जाता है.

इस रोज़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाहने वाले लोगों ने अपने काम बंद रखे. उन्होंने भी ग़ुस्ल किया और अच्छे-अच्छे कपड़े पहने. उनके घरों में लज़ीज़ खाने पकाये गए. मीठे पकवान भी पकाये गए. उन्होंने शीरनी तक़सीम की. वे लोग भी अपने घरवालों के साथ तफ़रीह के लिए गए. कहने का मतलब यह है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सेहतयाब होने की ख़ुशी में आपके चाहने वालों ने ख़ुशियां मनाई थीं और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. 

क़ाबिले ग़ौर बात ये भी है कि इस त्यौहार की शुरुआत अरब की सरज़मीन में हुई थी, लेकिन अब वहां इस त्यौहार को मनाने के बारे में कोई जानकारी मुहैया नहीं है. लेकिन हिन्दुस्तान के बहुत से इलाक़ों में ये त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. ये इस देश की मिट्टी का असर है, यहां की आबोहवा का असर है कि यहां वह त्यौहार भी मनाए जाते हैं, जो अरब से लुप्त हो चुके हैं, ख़त्म हो चुके हैं. 

दरअसल भारत तीज-त्यौहारों का देश है. यहां अमूमन हर महीने कोई न कोई त्यौहार आता रहता है. बहुत से त्यौहारों का ताल्लुक़ मज़हब से है, तो बहुत से त्यौहारों का नाता लोक जीवन से है. आख़िरी चहशंबा का ताल्लुक़ भले ही मज़हब से न हो, लेकिन इसका नाता अक़ीदत से ज़रूर है. ये मुहब्बत का त्यौहार है. ये प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत से वाबस्ता त्यौहार है. और महबूब से वाबस्ता हर चीज़ से मुहब्बत हुआ करती है. 

हिन्दुस्तान के अलावा ये त्यौहार पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी मनाया जाता है, क्योंकि ये दोनों देश भी कभी हिन्दुस्तान का ही हिस्सा हुआ करते थे. बांग्लादेश में इस दिन एक वैकल्पिक मुस्लिम अवकाश है. मुसलमान इस दिन छुट्टी लेते हैं और इस त्यौहार को ख़ुशी-ख़ुशी मनाते हैं. 

कुछ जगहों पर इस दिन शीशे की सफ़ेद प्लेटों पर ज़ाफ़रान से क़ुरआन करीम की आयतें लिखने की रिवायत है. इसे सात सलाम के नाम से जाना जाता है. फिर इस प्लेट में पानी डालते हैं. जब प्लेट पर लिखी सब आयतें पानी में घुल जाती हैं, तो इस पानी को तावीज़ की सूरत में पी लिया जाता है. बुज़ुर्ग बताते हैं कि मुग़ल बादशाहों के दौर में ये त्यौहार ख़ूब हर्षोल्लास से मनाया जाता था. 

इसके बरअक्स बहुत से लोग मानते हैं कि सफ़र के आख़िरी चहार शंबा को अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मर्ज़ का आग़ाज़ हुआ था और इस दिन आसमान से बहुत सी बलायें ज़मीन पर उतरती हैं.  
  
मशहूर मौरिख़ इब्ने साद फ़रमाते हैं कि चहार शंबा 28 सफ़र को रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मर्ज़ का आग़ाज़ हुआ था. 
(तबक़ात इब्ने साद 206) 

मुहम्मद इदरीस कंधालवी तहरीर फ़रमाते हैं कि माहे सफ़र के आख़िरी अशरा में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार रात में उठे और फ़रमाया कि मुझे हुक्म हुआ है कि अहले बक़ी यानी मदीना मुनव्वरा के क़ब्रिस्तान के लिए अस्तग़फ़ार करूं. आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वहां से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाज नासाज़ हो गए. सिर में दर्द और बुख़ार की शिद्दत पैदा हो गई. ये उम्म-उल-मोमिनीन हज़रत मैमूना रज़ियल्लाहु अन्हु की बारी का दिन था और बुध का रोज़ था. 
(सीरत अल मुस्तफ़ा 3/157 )

मुहम्मद शफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि 28 सफ़र हिजरी चहार शंबा की रात में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ब्रिस्तान बक़ी में तशरीफ़ ले गए और अहले क़बूर के लिए मग़फ़िरत की दुआ की. वहां से तशरीफ़ लाए, तो सिर में दर्द, फिर बुख़ार हो गया. ये बुख़ार सहीह रिवायत के मुताबिक़ 13 रोज़ तक मुसलसल रहा और इसी हालत में वफ़ात हो गई.
(सीरत-ए- ख़ातिमुल अम्बिया 141)      

बरेली मकतबा फ़िक्र के अहमद रज़ा ख़ान का फ़तवा है कि आख़िरी चहार शंबा की कोई असल नहीं है और न ही सेहतयाबी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कोई सबूत है, बल्कि मर्ज़ अक़दस जिसमें वफ़ात हुई, उसकी इब्तिदा इसी दिन से बताई जाती है.   
(अहकाम-ए-शरीअत 3/183)   

बरेली मकतबा फ़िक्र के आलमे-दीन मौलाना अमजद फ़रमाते हैं कि माहे सफ़र के आख़िरी चहार शंबा हिन्दुस्तान में बहुत मनाया जाता है. लोग अपने कारोबार बंद कर देते हैं और सैर व तफ़रीह को जाते हैं. पूरियां पकती हैं और नहाते- धोते हैं, ख़ुशियां मनाते हैं और कहते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस रोज़ ग़ुस्ले सेहत फ़रमाया था और बैरूने मदीने सैर के लिए तशरीफ़ ले गए थे. ये सब बातें बेअसल हैं, बल्कि उन दिनों में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मर्ज़ शिद्दत के साथ था. लोग जो बातें बताते हैं, वे सब ख़िलाफ़े-वाक़ा हैं.    

बहरहाल, मुसलमानों के मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों की मुख़्तलिफ़ बातें हैं और सब अपनी-अपनी अक़ीदत के हिसाब से ज़िन्दगी बसर करते हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यहां बसने वाले बहुत से मुसलमानों के रीति-रिवाजों में हिन्दुस्तानी तहजीब की झलक मिलती है. उनके त्यौहारों पर भी इसका साफ़ असर देखा जा सकता है. शायद इसी को गंगा-जमुनी तहज़ीब कहा जाता है. 
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल 

अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम
रहमतों की बारिश...
मेरे मौला !
रहमतों की बारिश कर
हमारे आक़ा
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर
जब तक
कायनात रौशन रहे
सूरज उगता रहे
दिन चढ़ता रहे
शाम ढलती रहे
और रात आती-जाती रहे
मेरे मौला !
सलाम नाज़िल फ़रमा
हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और आले-नबी की रूहों पर
अज़ल से अबद तक...
-फ़िरदौस ख़ान

अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...
अक़ीदत के फूल...
मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम
प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान


डॉ. बहार चिश्ती नियामतपुरी  
रसूले-करीमص अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेरे पास कटा फटा दरूद मत भेजो।
इस हदीसे-मुबारक का मतलब कि तुम कटा फटा यानी कटा उसे कहते हैं, जिसमें रसूले करीम की आल यानी अहले बैत शामिल न हों, तो वह कटा फटा दरूद है। 
फटा दरूद का मतलब है कि जिसमें आल की आल यानी अहले बैत की औलादे-इमामीन न शामिल हों तो यह फटा दरूद है। 
अब दरूद पढ़ने में यह तरीक़ा अपनायें, बाद में  आप दरूद शरीफ़ में "व आलिही" लफ़्ज़ ज़रूर शामिल करें। ज़हनी तौर से आले रसूल की औलाद भी हज़रते मेहदी अलैहिस्सलाम तक शामिल रहें। तब आपका मुकम्मल दरूद शरीफ़ का पढ़ना ही पढ़ना होगा।

प्रैक्टिकल और थ्योरिकल दरूद का पढ़ना
प्रैक्टिकल और थ्योरिकल दरूद पढ़ने का मतलब है कि दरूद पाक का पढ़ना और अमल करना दोनों ही शामिल हैं, जैसे क़ुरआन पाक की तिलावत करना और उस पर अमल करना। दोनों ही काम अलग हैं, क़ुरआन पाक और दरूद शरीफ़ की रोज़ाना तिलावत तो करते हो और अमल नहीं करते हो, तो क़ुरआन पाक की उस तिलावत का क्या फ़ायदा है। 
जैसे आप पढ़ रहे हैं "इन्नल्लाह मा अस्साबिरीन।" हम जब इस आयत को पढ़ रहे हैं और सब्र बिलकुल नहीं  कर रहे हैं, तो पढ़ने से कुछ हासिल नहीं है। जिस तरह पानी-पानी कहने से प्यास नहीं बुझती है, जब तक पानी पिएंगे नहीं।
ठीक इसी तरह से हम दरूद शरीफ़ तो पढ़ते हैं, मगर अहले बैत को नहीं मानते हैं या अहले के मक़ाबिल दीगर शख़्सियात को पेश करते हो। और हाँ दरूद शरीफ़ भले ही न पढ़ो, मगर अहले बैते अतहार से मुहब्बत करो जैसा कि हक़ और हुक्मे-ख़ुदा है, तो आपने प्रैक्टिकल ही कर के थ्योरी भी कर ली, मगर थ्योरी पढ़ने से प्रैक्टिकल नहीं कर पाओगे।

अहले बैत से पीराने तरीक़त तक
अहले बैत से पीराने तरीक़त तक का मतलब यह है कि हर सिलसिला रूहानी चिश्ती, क़ादरी. सुहरवर्दी और नक़्शबंदी अल्लाह के हबीब और आपकी औलाद के इमामीन से जुड़ा हुआ है, यानी आपके अहले बैत से जुड़ा हुआ है। अब आप अगर किसी भी मुरशिद (इमाम) से रूहानी फ़ायदा पाते हैं, यानी मुरीद होते हैं तो औलादे रसूल की ग़ुलामी में आ जाते हैं। तो अब आप मुरशिदाने-हक़ (इमामीन) से मुहब्बत और हुस्ने-सुलूक करते हो, तो यह अमल अहले बैत तक पहुंचाता है, मगर इस शर्त के साथ के पंजतन पाक की मुहब्बत हमारे लिये मुवद्दत की सूरत में ही होनी चाहिए। लिहाज़ा आप अगर रसूले करीम से मुहब्बत तो करते हो मगर फूल, फल, पत्ती और शाख़ से मुहब्बत नहीं करते हैं, तो तुम्हें यह लाज़मी है कि उस दरख़्त से बे पनाह मुहब्बत के साथ अहले बैत से भी वैसी ही मुहब्बत होनी चाहिए, जैसी रसूले करीम से करते हो, तो आपका दरूद पाक पढ़ना कामियाब है, वरना नहीं। अहले बैत को मानना और मुहब्बत करना वसीले (निस्बत) के ज़रिये पंजतन पाक और अल्लाह तक पहुंचता है। इसके अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं है, जो अहले बैत की मुहब्बत और "अलीयुन वलीउल्लाह" की गवाही का गवाह बन सके।


नबियों में मर्तबा है निराला रसूल ﷺ का 
सानी रसूल का है न साया रसूल ﷺ का 
बिक जाती कायनात ये हाथों यज़ीद के 
कर्बला में गर न होता नवासा रसूल ﷺ ला 

 

अल्लाह के महबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आख़िरी ख़ुतबा.
आपने इरशाद फ़रमाया-
प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूं, ध्यान से सुनो.
ऐ इंसानो! तुम्हारा रब एक है. अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहना.
लोगों की जान-माल और इज़्ज़त का ख़्याल रखना, न तुम लोगों पर ज़ुल्म करो, न क़यामत में तुम्हारे साथ ज़ुल्म किया जाएगा.
कोई अमानत रखे, तो उसमें ख़यानत न करना.
ब्याज़ के क़रीब न भटकना.

किसी अरबी को किसी अजमी (ग़ैर अरबी) पर कोई बड़ाई नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, प्रमुखता अगर किसी को है, तो सिर्फ़ तक़वा और परहेज़गारी से है यानी रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं है. बड़ाई का आधार अगर कोई है, तो ईमान और किरदार है.

तुम्हारे ग़ुलाम, जो कुछ ख़ुद खाओ, वही उनको खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ.
अज्ञानता के तमाम विधान और नियम मेरे पांव के नीचे हैं.

इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून ख़त्म कर दिए गए. (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून (रबीआ इब्न हारिस का ख़ून)  ख़त्म करता हूं (यानी उनके कातिलों को क्षमा करता हूं).
अज्ञानकाल के सभी ब्याज़ ख़त्म किए जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज़ ख़त्म करता हूं.

औरतों के मामले में अल्लाह से डरो. तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर हक़ है.
औरतों के मामले में मैं तुम्हें वसीयत करता हूं कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ.

लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत नहीं. अत: अपने रब की इबादत करना, हर रोज़ पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ना. रमज़ान के रोज़े रखना, ख़ुशी-ख़ुशी अपने माल की ज़कात देना, अपने परवरदिगार के घर का हज करना और अपने हाकिमों के क़ानून को मानना. ऐसा करोगे, तो अपने परवरदिगार की जन्नत में दाख़िल हो सकोगे.
ऐ लोगो! क्या मैंने अल्लाह का पैग़ाम तुम तक पहुंचा दिया.
लोगों की भारी भीड़ एक साथ बोल उठी-
हां, ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !
तब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन बार कहा-
ऐ अल्लाह, तू गवाह रहना
उसके बाद क़ुरआन की यह आख़िरी आयत नाज़िल हुई-
आज हमने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीन के तौर पर इस्लाम को पसंद किया है. क़ुरआन: 5-3).


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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