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राहुल मिश्रा 
 मम्मी-पापा बेंगलुरु लौटने को निकल रहे थे। उसी वक्त बेटी रो पड़ी।
मां ने पूछा, कोई लड़का है? काम पर किसी से कुछ हुआ? कुछ हुआ है क्या?
तीनों का जवाब नहीं था।
फिर भी मां समझ गई। और उस दिन मां ने जो सवाल पूछा, दो साल बाद वही सवाल एक राष्ट्रीय अभियान बना, जो पूरे भारत में लोगों से कह रहा था कि किसी से हाल पूछो, तो एक बार दोबारा पूछो।
बेटी उस वक्त अपने काम के सबसे ऊंचे दौर में थी। फिल्में चल रही थीं, नाम चल रहा था। दादा बैडमिंटन संघ के सचिव रहे थे, पिता वो आदमी हैं जिन्होंने All England जीतने वाले पहले भारतीय बनकर देश का नाम ऊंचा किया था। और बेटी को आज करोड़ों लोग परदे पर पहचानते हैं।
नाम, दीपिका पादुकोण।
दीपिका, यानी छोटा सा दीया। ये कहानी उसी दीये की है, जिसकी लौ एक वक्त बहुत कांपने लगी थी। और उस मां की, जिसने जाते-जाते वो कांपती लौ देख ली।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
कोपेनहेगन। डेनमार्क। 5 जनवरी 1986।
प्रकाश पादुकोण उन दिनों अपने खेल का बड़ा हिस्सा डेनमार्क में रहकर खेलते और सीखते थे। वहीं बड़ी बेटी दीपिका पैदा हुई। एक साल की थी, जब परिवार बेंगलुरु लौट आया। घर में मां उज्जला थीं, पिता थे, और बाद में छोटी बहन अनीशा आई।
इस घर में बैडमिंटन तीसरी पीढ़ी का खेल था। दादा रमेश पादुकोण मैसूर बैडमिंटन एसोसिएशन के सचिव थे, और उन्होंने ही बेटे प्रकाश के हाथ में रैकेट थमाया था। वही प्रकाश 1980 में All England का सिंगल्स खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने।
तो बेटी का कोर्ट पर उतरना तय था। दीपिका ने खुद बताया है कि वो सुबह पांच बजे उठती थी। पहले फिजिकल ट्रेनिंग, फिर स्कूल, फिर दोबारा बैडमिंटन। नेशनल चैंपियनशिप के लेवल तक खेली। इसी साल जून में एक पॉडकास्ट पर पिता ने भी यही याद किया, कि बेटी की जिंदगी बेहद अनुशासन वाली थी, और खेल ने उसे फोकस करना और बड़ा सोचना सिखाया।
फिर दसवीं में एक मोड़ आया।
एक इंटरव्यू में दीपिका ने कहा था कि उसे समझ आ गया था, वो ये खेल सिर्फ इसलिए खेल रही थी क्योंकि ये परिवार में था। और उसने रैकेट रख दिया। All England चैंपियन की बेटी, और वो कह रही है कि ये मेरा रास्ता नहीं। उसने मॉडलिंग चुनी। बेंगलुरु में फैशन कोरियोग्राफर प्रसाद बिदप्पा के साथ काम शुरू किया, एक साबुन के विज्ञापन से पहचान मिली, और फिर मुंबई आ गई, जहां शुरू में मौसी के घर रही।
फिर फिल्में आईं। और एक के बाद एक आती रहीं।
अब चलते हैं उस साल पर। 2014।
बाहर से देखें तो ये उसके करियर का सबसे चमकदार वक्त था। 2020 में दावोस के मंच पर उसने खुद कहा कि बीमारी तब आई जब उसे इसकी सबसे कम उम्मीद थी। वो प्रोफेशनल हाई पर थी, फिल्में अच्छा कर रही थीं, और जिंदगी में एक बहुत अच्छा रिश्ता था।
और फिर एक सुबह। उसी भाषण में दीपिका ने बताया कि एक सुबह वो उठी, लगा सब ठीक है, और वो बेहोश होकर गिर गई।
उसके बाद जो हुआ, वो उसने 2015 में एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया था। पेट में एक अजीब सा खालीपन रहता था। सांस उथली रहती थी। किसी चीज पर ध्यान नहीं टिकता था। और वो बार-बार टूट जाती थी।
उसी साल एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी, "हैप्पी न्यू ईयर"। बाद में दीपिका ने माना कि वो शूटिंग उसके लिए बहुत मुश्किल थी, क्योंकि वो डिप्रेशन और एंग्जायटी से गुजर रही थी। और फिल्म की डायरेक्टर फराह खान ने कहा कि उन्हें सेट पर इसका अंदाजा तक नहीं हुआ।
यानी कैमरे के सामने काम चलता रहा। और कैमरे के पीछे?
परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के सामने उसने अपनी भाषा में कहा था, "मैं मुंबई में अकेली रहती थी, लेकिन इस एहसास को किसी से शेयर नहीं करती थी।"
किसी से नहीं। मां से भी नहीं।
और फिर आया वो दिन।
मम्मी-पापा कुछ दिनों के लिए बेंगलुरु से मुंबई आए थे। बेटी के पास रहे। फिर लौटने का दिन आया। और जाने के वक्त दीपिका टूट गई।
उसके अपने शब्द, "जब मेरी मम्मी मुंबई आईं और कुछ दिन बाद वापस गईं, तो मैं अचानक रोने लगी। मुझे पूरी तरह निराशा महसूस हो रही थी, जीने की इच्छा खत्म हो गई थी।"
बेटी अचानक रो रही है, बिना किसी बात के। कोई भी मां वही पूछेगी, जो उज्जला पादुकोण ने पूछा। दीपिका ने NDTV से बातचीत में वो सवाल खुद दोहराए हैं। कोई लड़का है? काम पर कोई है? कुछ हुआ है क्या?
उसके शब्दों का मतलब था, वो इनमें से कुछ भी नहीं था। वो बस एक बहुत खाली, खोखली सी जगह से आ रहा था।
और फिर वो बात, जिसके लिए ये पोस्ट लिखी गई। दीपिका ने कहा, मां तुरंत समझ गईं। और ये भी कि उसके लिए वो पल भगवान का भेजा हुआ था।
मां ने वजह पूछी। वजह थी ही नहीं। और मां ने उसी खालीपन को पहचान लिया।
ये कहानी डिप्रेशन की नहीं है।
ये उस सवाल की कहानी है, जो एक मां ने जाते-जाते पूछा, और उस चुप्पी की, जिसे मां ने जवाब मान लिया।
मां ने बेटी से कहा कि किसी जानकार से बात करो। दीपिका ने बाद में कई बार कहा है कि अगर मां ने उसके बदले हुए बर्ताव को नहीं पहचाना होता और मदद लेने को नहीं कहा होता, तो वो नहीं जानती कि आज किस हालत में होती।
उसने एक साइकोलॉजिस्ट को फोन किया। बच्चों को उसने बताया, "जब इस बारे में खुलकर बात की, तो खुद को हल्का महसूस किया।" जिस काउंसलर ने उस दौर में उसकी मदद की, वो थीं ऐना चांडी, जो आगे चलकर उसकी संस्था की चेयरपर्सन बनीं।
पर एक बात दीपिका ने कभी नहीं छिपाई, और यही इस कहानी का सबसे ईमानदार हिस्सा है। उसने कहा कि काउंसलिंग से मदद मिली, पर एक हद तक। 2015 वाले उस इंटरव्यू के मुताबिक, फिर बेंगलुरु के एक मनोचिकित्सक से दूसरी राय ली गई, और पहले हिचकने के बाद उसने दवा लेना भी माना। हमारे यहां तो अक्सर दवा का नाम सुनते ही लोग "पागलों वाली दवा" कह देते हैं, वहां सबसे बड़ी स्टार में से एक ने ये बात बिना झिझक कही।
पर ठीक होने के बाद दुनिया को बताने की क्या जरूरत थी? इसका जवाब इसी साल जून में उसके पिता ने दिया है। प्रकाश पादुकोण ने बताया कि दीपिका की एक दोस्त की मौत हुई थी, और तभी बेटी ने तय किया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूक हों।
और परिवार? पिता के शब्दों में, "अगर इससे दूसरों की मदद हो रही थी, तो हमें इस बात को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि दीपिका ऐसी स्थिति में थी कि लोगों की मदद कर सकती थी।"
जनवरी 2015 में दीपिका ने एक अखबार को इंटरव्यू देकर सबके सामने कहा कि उसे डिप्रेशन था। बात इतनी बड़ी थी कि अमेरिका के वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इस पर खबर छापी। उसी इंटरव्यू में उसने कहा था कि इसे मानने और इसके बारे में बोलने से उसे आजादी मिली है।
उसी साल उसने एक संस्था बनाई, "द लिव लव लाफ फाउंडेशन"।
और अब वो बात, जिसका वादा ऊपर किया था।
10 अक्टूबर 2016। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस। दीपिका की संस्था ने एक अभियान शुरू किया, नाम था "दोबारा पूछो"। संस्था के हिसाब से ये मानसिक स्वास्थ्य पर देश का पहला राष्ट्रीय जागरूकता अभियान था। पूरा संदेश बस इतना, कि किसी से पूछो "कैसे हो?", और वो कहे "ठीक हूं", तो रुको, और एक बार दोबारा पूछो। सच में, कैसे हो?
यानी मुंबई के उस घर में जाते-जाते जो सवाल एक मां ने पूछा था, बेटी ने उसे पूरे देश का सवाल बना दिया।
संस्था वहीं नहीं रुकी। उसी साल कर्नाटक के दावणगेरे के गांवों में मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों तक इलाज पहुंचाने का काम शुरू हुआ। स्कूलों में बच्चों के लिए कार्यक्रम शुरू हुए, डॉक्टरों के लिए ट्रेनिंग शुरू हुई। 2023 में ये काम हिंदी पट्टी तक पहुंचा, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा तक। संस्था के मुताबिक दावणगेरे वाला काम अब अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है।
जनवरी 2020 में दावोस में World Economic Forum ने इसी काम के लिए उसे क्रिस्टल अवॉर्ड दिया। 2022 में TIME मैगजीन ने भी इसी काम के लिए सम्मानित किया।
फरवरी 2025 में वो परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के बीच थी। वहां उसने कोई भारी भाषण नहीं दिया। कहा कि परीक्षा से पहले वाली रात मम्मी-पापा से बात करो, जो डर है, उसे किसी भरोसे वाले से कह दो। नींद को उसने एक मुफ्त की सुपरपावर बताया। धूप और खुली हवा की बात की। और कहा कि तनाव होना तो स्वाभाविक है, असली बात ये है कि हम उसे संभालते कैसे हैं।
मम्मी-पापा से बात करो। जो लड़की खुद कभी मां से कुछ नहीं कह पाई थी, वही अब बच्चों से यही कह रही थी।
और एक बात, जो मुझे इस पूरी कहानी में सबसे सच्ची लगी। 2022 में एक इंटरव्यू में दीपिका ने माना कि आज भी उसे डर रहता है कि कहीं ये वापस न आ जाए। इसलिए हर सुबह उठकर वो अपनी सेहत को सबसे पहले रखती है।
ये कोई फिल्मी "हैप्पी एंडिंग" नहीं है। ये एक इंसान का रोज का ध्यान रखना है।
अब लौटिए उस पिता पर, जिसके घर में दिन सुबह पांच बजे शुरू होता था। इसी साल जून में प्रकाश पादुकोण ने कहा कि उन्होंने अपनी बेटी से सीखा है कि मेंटल हेल्थ हमेशा पहले आनी चाहिए। आराम, अच्छा खाना, कसरत, और तनाव को संभालना, ये सब आपस में जुड़े हैं।
देश का पहला All England चैंपियन, इकहत्तर साल की उम्र में, अपनी बेटी का छात्र बना बैठा है। वही बेटी, जिसने दसवीं में उनका खेल छोड़ दिया था।
और अब वो तारीख, जिसकी वजह से ये कहानी आज लिखी गई।
19 सितंबर 2026।
एक हफ्ता पहले दीपिका और रणवीर सिंह के घर दूसरी बेटी आई। बड़ी बेटी दुआ इसी महीने की 8 तारीख को दो साल की हुई है। दोनों ने एक सादी सी तस्वीर डाली। छोटे से पैरों की छाप, नीचे तीन नाम, रणवीर, दीपिका, दुआ, और वो तारीख। साथ में लिखा कि दुआ और उनके दिल, दोनों बड़े हो रहे हैं।
यानी जो लड़की कभी मां के जाते वक्त बिना वजह रो पड़ी थी, वो आज खुद दो बेटियों की मां है।
अठारह साल से अखबार की डेस्क पर हूं। "सब ठीक है" से ज्यादा झूठा वाक्य मैंने न किसी खबर में पढ़ा, न किसी फोन पर सुना।
मेरी भी एक बेटी है, ज्ञानवी। ये पोस्ट लिखते हुए समझ आया कि "खाना खाया?" के बाद एक सवाल और पूछना चाहिए।
उज्जला पादुकोण ने उस दिन जो सवाल पूछा था, वो उनकी बेटी ने देश को सौंप दिया। और अब वही सवाल उस घर में लौट आया है, जहां दो नन्हीं बच्चियां बड़ी होंगी। उनकी मां जानती है कि रोना कमजोरी नहीं होता, कि दवा लेना शर्म नहीं होती, और "ठीक हूं" सुनकर बात खत्म नहीं करनी चाहिए।
दादा ने बेटे को रैकेट थमाया था। बेटे ने बेटी को अनुशासन दिया। और मां ने बेटी को एक सवाल दिया।
और तीसरी पीढ़ी की बेटी ने उस सवाल से पूरे देश के लिए एक दरवाजा खोल दिया।
मां ने तीन सवाल पूछे। तीनों का जवाब नहीं था। फिर भी मां समझ गई।
इस कहानी से जो रखने लायक है:
भारत सरकार की मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन Tele-MANAS, नंबर 14416 या 1-800-891-4416, चौबीसों घंटे, मुफ्त।
दीपिका की बात बच्चों के लिए, नींद एक मुफ्त की सुपरपावर है, और परीक्षा से पहले की रात मम्मी-पापा से बात।
और उस संस्था का दो शब्दों वाला नियम, "दोबारा पूछो"।
ये कहानी उस मां तक पहुंचनी चाहिए, जिसका बच्चा किसी दूसरे शहर में, या दूसरे देश में अकेला रहता है, और हर फोन पर कहता है, सब ठीक है।
इस पोस्ट में जो बात भी दीपिका या उनके पिता के नाम से आई है, वो उन्होंने खुद कही है, इंटरव्यू में, मंच पर, कैमरे के सामने। कहने का ढंग मेरा है। तथ्य मेरे नहीं।
आपके घर में "दोबारा" कौन पूछता है?


डॉ फ़िरदौस ख़ान
जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का ख़त्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे बड़ा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी. लेखन के आविष्कार का श्रेय 4000 ईस्वी पूर्व में मेसापोटामिया के सूमेरियनों को जाता है. आज हम जिस समय की गणना करते हैं, उसकी शुरुआत सुमेरियनों-बेबलीलोनियनों के काल में हुई थी. एक घंटे को 60 मिनट और एक मिनट को 60 सेकेंड में इन्हीं लोगों ने बांटा था. लेकिन अ़फसोस की बात है कि आधुनिकता की अंधी दौ़ड में इंसान अपनी मातृभाषा को ही भूलता चला गया. नतीजतन, आज दुनिया भर में हज़ारों भाषाएं अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच गईं.

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फ़रवरी की पूर्व संध्या पर जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की रिपोर्ट एटलस ऑफ वल्ड्‌र्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर-2009 में कहा गया है कि मौजूदा सभी भाषाओं में से तक़रीबन 90 फ़ीसद भाषाएं अगले 100 बरसों में अपना वजूद खो सकती हैं. दुनिया की तक़रीबन 97 फ़ीसद आबादी इनमें से सिर्फ़ चार फ़ीसद भाषाएं बोलती है. एक अंदाज़ के मुताबिक़, दुनिया भर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से 2500 भाषाओं की हालत बेहद चिंताजनक है. ये वह भाषाएं हैं, जो पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी. दुनिया भर में 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 150 से कम है. जिन देशों में भाषाएं ख़तरे में हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है. यहां तक़रीबन 196 भाषाएं दम तो़ड़ रही हैं. भारत के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है, जहां भाषाओं की हालत चिंताजनक है. अमेरिका में 192 भाषाएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है, जहां 147 भाषाएं अपना वजूद खो रही हैं. दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक दर्जन से भी कम लोग बोलते हैं. इनमें कैरेम भी एक ऐसी ही भाषा है, जिसे उक्रेन के सिर्फ़ छह लोग ही बोलते हैं. ओकलाहामा में विचिता भाषा को महज़ दस लोग ही बोलते हैं. इसी तरह लेंगिलू बोलने वाले भी सिर्फ़ चार लोग ही बचे हैं. पिछले एक दशक में भाषाओं की हालत बेहद गंभीर होती चली गई है. एक दशक पहले ख़त्म होने वाली भाषाओं की संख्या 900 थी, जो अब बढ़कर 2500 हो गई है. ग़ौरतलब है कि अकेले इंडोनेशिया में 365 भाषाएं हैं. अफ्रीका में एक हज़ार से भी ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. दुनिया में अंग्रेजी के बाद मेंडारिन भाषा बोलने वाली आबादी सबसे ज़्यादा है. क्षेत्रीय भाषाओं में स्पेनिश दूसरे स्थान पर है. नई भाषाओं में अफ्रीकन ज़्यादा बोली जाती है. सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के दक्षिण हिस्से में डच कॉलोनी की स्थापना के लिए रोमन कैथोलिक और जर्मन भाषाओं को शामिल किया गया. बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकन को डच और जर्मन से मिलाकर नई भाषा विकसित की गई. लंदन में 700 भाषाएं बोली जाती हैं.

भारत में ख़त्म होने वाली भाषाओं में से ज़्यादातर क्षेत्रीय और क़बीलाई बोलियां हैं. फ़रवरी 2010 में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तक़रीबन 70 हज़ार साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा का अस्तित्व ख़त्म हो गया. संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक़, अंडमान में रहने वाले बो क़बीले की आख़िरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर की मौत के साथ ही इस आदिवासी समुदाय की भाषा बो ने भी दम तो़ड़ दिया. इसी के साथ इस समाज की संस्कृति और सभ्यता भी ख़त्म हो गई. ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस आखिरी सदस्य ने 2004 की सुनामी में अपना घरबार खो दिया था. वह स्ट्रैट द्वीप पर सरकार द्वारा बनाए गए शिविर में ज़िंदगी के आख़िरी दिन गुज़ार रही थीं. भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि बो भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक के वक़्त से इस समुदाय द्वारा बोली जा रही थी. अंडमान पर रहने वाले आदिवासियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस. तक़रीबन 10 भाषाई समूहों में विभाजित ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की आबादी साल 1858 में यहां ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से ज़्यादा थी. फ़िलहाल ग्रेटर अंडमान में 52 मूल निवासी बचे हैं. लेकिन इनका वजूद भी ख़तरे में है. यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है. भारत के हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड आदि में तक़रीबन 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जनजीवन से ग़ायब हो रही हैं, जबकि ओडिसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी तक़रीबन 42 भाषाएं ख़त्म हो रही हैं. 1961 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 1652 भाषाएं थीं, जो 2001 में घटकर महज़ 234 ही रह गईं. पिछले चार दशक में भारत में 1418 भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं. हो सकता है कि यह संख्या कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं को बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलने वाले लोगों की तादाद दस हज़ार से कम है. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डी पुरंदेश्वरी के मुताबिक़, भारत की 196 भाषाओं में से 84 भाषाएं असुरक्षित श्रेणी में हैं, जबकि 62 भाषाएं निश्चित तौर पर लुप्त होने के कगार पर हैं. इसी तरह छह भाषाओं को गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में रखा गया है, जबकि 35 भाषाएं अत्यंत गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में शामिल हैं.

1991 की जनगना में भारत में 1956 भाषाओं के वजूद को स्वीकार किया गया, जबकि 1796 भाषाओं को मातृभाषा के तौर पर स्वीकारा गया. 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में तक़रीबन 450 ऐसी भाषाएं हैं, जिनके बोलने वालों की तादाद दस हज़ार से भी कम है. बदलते वक़्त के साथ ये भाषाएं अपना अस्तित्व खो रही हैं. दुनिया भर में सिर्फ़ 65 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें एक करोड़ से ज़्यादा लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. इनमें 11 भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं. इनमें से एक भाषा हिंदी भी है. मगर भारत में हिंदी का स्थान अंग्रेज़ी भाषा लेती जा रही है. संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है. भारत के संविधान के मुताबिक़, देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद-344 (1) और 351 के मुताबिक़, भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है. संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे. विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिंदी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए. भारतीय संविधान के मुताबिक़, कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है. मगर हिंदी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है. उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-343 में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. संविधान के लिए अनुच्छेद-351 के तहत हिंदी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है.
ग़ौरतलब है कि भारत में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था. देश में हिंदी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं. दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है. दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसकी वजह से वे हिंदी का विरोध करने से भी नहीं चूकते. 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे. उनकी मांग थी कि हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए.

संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था. तब से केंद्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में हर साल 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद-343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपी देवनागरी होगी. साथ ही अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा. संसद का काम हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद-120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है. यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है.

दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है कि देश इस तरफ़ उतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं, जितना देना चाहिए. दनिया में ऐसे भी देश हैं, जहां के बाशिंदों को अपनी भाषा अपनी जान से भी प्यारी है. बंगालियों में अपनी भाषा से बेहद लगाव है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 1952 में बांग्ला भाषा को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग को लेकर एक मुहिम चलाई गई थी. बांग्ला भाषा की एक हज़ार साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है, जो बेहद समृद्ध है. बंगालियों में अपनी मातृभाषा के प्रति बेहद श्रद्धा और प्रेम है. इसलिए बांग्ला साहित्य बेहद समृद्ध है. लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया. इसके ख़िलाफ़ में 21 फ़रवरी, 1952 को भाषायी जुलूस निकाला गया. यह प्रदर्शन हिंसक हो उठा और अबुल बरकत, रफ़ीकुद्दीन और शफ़ी उर्रहमान पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए. बांग्ला देश ने इन्हें भाषायी शहीद का दर्जा देते हुए देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का ख़िताब दिया. इनकी याद में 21 फ़रवरी, 1953 से बांग्लादेश में मातृभाषा दिवस मनाया जाने लगा. बांग्लादेश की सरकार के आग्रह पर 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को की 30वीं आम सभा ने सर्वसम्मति से 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने का फ़ैसला किया, तभी यह हर साल 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा. संयुक्त राष्ट्र ने भाषाई जागरूकता बढ़ाने के मक़सद से 2008 को अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया था.

बीते साल 21 जून को गूगल ने दुनिया से ख़त्म होती भाषाओं को बचाने की मुहिम शुरू की है. इसके लिए गूगल ने भाषाविदों और रिसर्च स्कोलर्स के साथ समझौता किया है. गूगल एंडेजर्ड लैंग्वेज प्रोजेक्ट के तहत काम कर रही है. इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है-एंडेजर्डलैंग्वेजेज डॉट कॉम (www.endangeredlanguages.com). इस पर उन सभी 3054 भाषाओं की जानकारी दी गई है, जिन्हें बचाने की क़वायद जारी है. इस पर लोग भाषाओं के बारे में अपनी जानकारी दे सकते हैं और जानकारी हासिल भी कर सकते हैं. वेबसाइट पर सुविधा दी गई है कि लोग खत्म हो रही भाषाओं-बोलियों के बारे में जानकारी पाने के अलावा उनसे संबंधित पांडुलिपियां, ऑडियो, वीडियो फाइल आदि शेयर या पोस्ट कर सकते हैं. प्रोजेक्ट मैनेजर क्लारा रिवेरा रोड्रिग्वेज और जैसन रिजमैन का कहना है कि गूगल की इस पहल के ज़रिये दुनिया की तमाम भाषाओं को एक मंच मिलेगा. साथ ही उस भाषाई संस्कृति को समझने का मौक़ा मिलेगा. कोरो एक ऐसी भाषा है, जिसे विज्ञान में नहीं जाना जाता था. यह हमारे ही उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाक़ों में बोली जाती थी, लेकिन अब दुनियाभर में 1000 लोग भी इसे बोलने वाले नहीं हैं. ऐसी ही एक और भाषा है नवाजो. आज दुनियाभर में इसे बोलने वाले लोग 1,20,000 से ज़्यादा लोग नहीं हैं. ऐसी ही भाषाओं की दिलचस्प जानकारी इस वेबसाइट पर मिलती है.

किसी भी भाषा को बचाने के लिए ज़रूरी है कि लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति आदर और सम्मान की भावना हो, मगर यह अफ़सोस की बात है कि भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से भारतीय भाषाएं हाशिये पर जा रही हैं.

17 अक्टूबर 2018



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
देश को आज़ाद हुए आठ दशक होने वाले हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।
ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर के 132 देशों में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं, जिनमें तक़रीबन तीन करोड़ अप्रवासी शामिल हैं। दुनिया के 157 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है। 

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। 




डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हर भाषा की अपनी अहमियत होती है। फिर भी मातृभाषा हमें सबसे प्यारी होती है, क्योंकि उसी ज़ुबान में हम बोलना सीखते हैं। बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है। इसलिए भी मां बोली हमें सबसे अज़ीज़ होती है। लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िन्दगी बसर करते हैं, यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को 'तुच्छ' समझते हैं। बार-बार अपनी मातृभाषा का अपमान करते हुए अंग्रेजी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हैं। हिन्दी के साथ ऐसा सबसे ज़्यादा हो रहा है। वे लोग जिनके पुरखे अंग्रेजी का 'ए' नहीं जानते थे, वे भी हिन्दी को गरियाते हुए मिल जाएंगे। हक़ीक़त में ऐसे लोगों को न तो ठीक से हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी। दरअसल, वह तो हिन्दी को गरिया कर अपनी 'कुंठा' का 'सार्वजनिक प्रदर्शन' करते रहते हैं।

अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है। इंसान को अंग्रेजी ही नहीं, दूसरी देसी-विदेशी भाषाएं भी सीखनी चाहिए। इल्म हासिल करना तो अच्छी बात है, लेकिन अपनी मातृभाषा की क़ुर्बानी देकर किसी दूसरी भाषा को अपनाए जाने को किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। यह अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की लगातार अनदेखी की जा रही है। हालत यह है कि अब तो गांव-देहात में भी अंग्रेज़ी का चलन बढ़ने लगा है। पढ़े-लिखे लोग अपनी मातृभाषा में बात करना पसंद नहीं करते, उन्हें लगता है कि अगर वे ऐसा करेंगे तो गंवार कहलाएंगे। क्या अपनी संस्कृति की उपेक्षा करने को सभ्यता की निशानी माना जा सकता है, क़तई नहीं। हमें ये बात अच्छे से समझनी होगी कि जब तक हिन्दी भाषी लोग ख़ुद हिन्दी को सम्मान नहीं देंगे, तब तक हिन्दी को वो सम्मान नहीं मिल सकता, जो उसे मिलना चाहिए।

देश को आज़ाद हुए साढ़े सात दशक बीत चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।

ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। स्टैटिस्टा के मुताबिक़ दुनियाभर में हिन्दी भाषा तेज़ी से बढ़ रही है। साल 1900 से 2021 के दौरान इसकी रफ़्तार 175.52 फ़ीसदी रही, जो अंग्रेज़ी की रफ़्तार 380.71 फ़ीसदी के बाद सबसे ज़्यादा है। अंग्रेज़ी और मंदारिन भाषा के बाद हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। साल 1961 में ही हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई। उस वक़्त दुनियाभर में 42.7 करोड़ लोग हिन्दी बोलते थे। साल 2021 में यह तादाद बढ़कर 117 करोड़ हो गई। इनमें से 53 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। हालत यह है कि हिन्दी अब शीर्ष 10 कारोबारी भाषाओं में शामिल है। इतना ही नहीं दुनियाभर के 10 सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बारों में शीर्ष-6 हिन्दी के अख़बार हैं। भारत के अलावा 260 से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। विदेशों में 28 हज़ार से ज़्यादा शिक्षण संस्थान हिन्दी भाषा सिखा रहे हैं। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है। गूगल पर  हिन्दी के 10 लाख करोड़ से ज़्यादा पन्ने मौजूद हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।


भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। 

रूस में अपनी मातृभाषा भूलना बहुत बड़ा शाप माना जाता है। एक महिला दूसरी महिला को कोसते हुए कहती है- अल्लाह, तुम्हारे बच्चों को उनकी मां की भाषा से वंचित कर दे। अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उनसे महरूम कर दे, जो उन्हें उनकी ज़ुबान सिखा सकता हों। नहीं, अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उससे महरूम करे, जिसे वे अपनी ज़ुबान सिखा सकते हों। मगर पहा़डों में तो किसी तरह के शाप के बिना भी उस आदमी की कोई इज्ज़त नहीं रहती, जो अपनी ज़ुबान की इज्ज़त नहीं करता। पहाड़ी मां विकृत भाषा में लिखी अपने बेटे की कविताएं नहीं पढ़ेगी। रूस के प्रसिद्ध लेखक रसूल हमज़ातोव ने अपनी किताब मेरा दाग़िस्तान में ऐसे कई क़िस्सों का ज़िक्र किया है, जो मातृभाषा से जुड़े हैं। कैस्पियन सागर के पास काकेशियाई पर्वतों की ऊंचाइयों पर बसे दाग़िस्तान के एक छोटे से गांव त्सादा में जन्मे रसूल हमज़ातोव को अपने गांव, अपने प्रदेश, अपने देश और उसकी संस्कृति से बेहद लगाव रहा है। मातृभाषा की अहमियत का ज़िक्र करते हुए ‘मेरा दाग़िस्तान’ में वह लिखते हैं, मेरे लिए विभिन्न जातियों की भाषाएं आकाश के सितारों के समान हैं। मैं नहीं चाहता कि सभी सितारे आधे आकाश को घेर लेने वाले अतिकाय सितारे में मिल जाएं। इसके लिए सूरज है, मगर सितारों को भी तो चमकते रहना चाहिए। हर व्यक्ति को अपना सितारा होना चाहिए। मैं अपने सितारे अपनी अवार मातृभाषा को प्यार करता हूं। मैं उन भूतत्वेत्ताओं पर विश्वास करता हूं, जो यह कहते हैं कि छोटे-से पहाड़ में भी बहुत-सा सोना हो सकता है।

एक बेहद दिलचस्प वाक़िये के बारे में वह लिखते हैं, किसी बड़े शहर मास्को या लेनिनग्राद में एक लाक घूम रहा था। अचानक उसे दाग़िस्तानी पोशाक पहने एक आदमी दिखाई दिया। उसे तो जैसे अपने वतन की हवा का झोंका-सा महसूस हुआ, बातचीत करने को मन ललक उठा। बस भागकर हमवतन के पास गया और लाक भाषा में उससे बात करने लगा। इस हमवतन ने उसकी बात नहीं समझी और सिर हिलाया। लाक ने कुमीक, फिर तात और लेज़गीन भाषा में बात करने की कोशिश की। लाक ने चाहे किसी भी ज़बान में बात करने की कोशिश क्यों न की, दाग़िस्तानी पोशाक में उसका हमवतन बातचीत को आगे न बढ़ा सका। चुनांचे रूसी भाषा का सहारा लेना पड़ा। तब पता चला कि लाक की अवार से मुलाक़ात हो गई थी। अवार अचानक ही सामने आ जाने वाले इस लाक को भला-बुरा कहने और शर्मिंदा करने लगा। तुम भी कैसे दाग़िस्तानी, कैसे हमवतन हो, अगर अवार भाषा ही नहीं जानते, तुम दाग़िस्तानी नहीं, मूर्ख ऊंट हो। इस मामले में मैं अपने अवार भाई के पक्ष में नहीं हूं। बेचारे लाक को भला-बुरा कहने का उसे कोई हक़ नहीं था। अवार भाषा की जानकारी हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है। अहम बात यह है कि उसे अपनी मातृभाषा, लाक भाषा आनी चाहिए। वह तो दूसरी कई भाषाएं जानता था, जबकि अवार को वे भाषाएं नहीं आती थीं।

अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहां है? संयोग से कोई अंग़्रेज़ ही उनके सामने आ गया। इसमें हैरानी की तो कोई बात नहीं। मास्को की सड़कों पर तो विदेशियों की कोई कमी नहीं है।

अंग्रेज़ अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेज़ी, फिर फ्रांसीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में भी पूछताछ करने लगा। अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेज़गीन, दार्ग़िन और कुमीक भाषाओं में अपनी बात को समझाने की कोशिश की। आख़िर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत दाग़िस्तानी ने जो अंग्रेज़ी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए यह कहा-देखो संस्कृति का क्या महत्व है। अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज़ से बात कर पाते। समझे न? समझ रहा हूं। अबूतालिब ने जवाब दिया। मगर अंग्रेज़ को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी ज़ुबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की?

रसूल हमज़ातोव लिखते हैं, एक बार पेरिस में एक दाग़िस्तानी चित्रकार से मेरी भेंट हुई। क्रांति के कुछ ही समय बाद वह पढ़ने के लिए इटली गया था, वहीं एक इतावली लड़की से उसने शादी कर ली और अपने घर नहीं लौटा। पहाड़ों के नियमों के अभ्यस्त इस दाग़िस्तानी के लिए अपने को नई मातृभूमि के अनुरूप ढालना मुश्किल था। वह देश-देश में घूमता रहा, उसने दूर-दराज़ के अजनबी मुल्कों की राजधानियां देखीं, मगर जहां भी गया, सभी जगह घर की याद उसे सताती रही। मैंने यह देखना चाहा कि रंगों के रूप में यह याद कैसे व्यक्त हुई है। इसलिए मैंने चित्रकार से अपने चित्र दिखाने का अनुरोध किया। एक चित्र का नाम ही था मातृभूमि की याद। चित्र में इतावली औरत (उसकी पत्नी) पुरानी अवार पोशाक में दिखाई गई थी। वह होत्सातल के मशहूर कारीगरों की नक़्क़ाशी वाली चांदी की गागर लिए एक पहाड़ी चश्मे के पास खड़ी थी। पहाड़ी ढाल पर पत्थरों के घरों वाला उदास-सा अवार गांव दिखाया गया था और गांव के ऊपर पहाड़ी चोटियां कुहासे में लिपटी हुई थीं। पहाड़ों के आंसू ही कुहासा है-चित्रकार ने कहा, वह जब ढालों को ढंक देता है, तो चट्टानों की झुर्रियों पर उजली बूंदें बहने लगती हैं। मैं कुहासा ही हूं। दूसरे चित्र में मैंने कंटीली जंगली झाड़ी में बैठा हुआ एक पक्षी देखा। झाड़ी नंगे पत्थरों के बीच उगी हुई थी। पक्षियों को गाता हुआ दिखाया गया था और पहाड़ी घर की खिड़की से एक उदास पहाडिन उसकी तरफ़ देख रही थी। चित्र में मेरी दिलचस्पी देखकर चित्रकार ने स्पष्ट किया-यह चित्र पुरानी अवार की किंवदंती के आधार पर बनाया गया है।
किस किंवदंती के आधार पर?
एक पक्षी को पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया गया। बंदी पक्षी दिन-रात एक ही रट लगाए रहता था-मातृभूमि, मेरी मातृभूमि, मातृभूमि… बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि इन तमाम सालों के दौरान मैं भी यह रटता रहा हूं। पक्षी के मालिक ने सोचा, जाने कैसी है उसकी मातृभूमि, कहां है? अवश्य ही वह कोई फलता-फूलता हुआ बहुत ही सुन्दर देश होगा, जिसमें स्वार्गिक वृक्ष और स्वार्गिक पक्षी होंगे। तो मैं इस परिन्दे को आज़ाद कर देता हूं, और फिर देखूंगा कि वह किधर उड़कर जाता है। इस तरह वह मुझे उस अद्भुत देश का रास्ता दिखा देगा। उसने पिंजरा खोल दिया और पक्षी बाहर उड़ गया। दस एक क़दम की दूरी पर वह नंगे पत्थरों के बीच उगी जंगली झाड़ी में जा बैठा। इस झाड़ी की शाख़ाओं पर उसका घोंसला था। अपनी मातृभूमि को मैं भी अपने पिंजरे की खिड़की से ही देखता हूं। चित्रकार ने अपनी बात ख़त्म की।

तो आप लौटना क्यों नहीं चाहते?
देर हो चुकी है। कभी मैं अपनी मातृभूमि से जवान और जोशीला दिल लेकर आया था। अब मैं उसे सिर्फ़ बूढ़ी हड्डियां कैसे लौटा सकता हूं?
रसूल हमज़ातोव ने अपनी कविताओं में भी अपनी मातृभाषा का गुणगान किया है। अपनी एक कविता में वह कहते हैं-
मैंने तो अपनी भाषा को सदा हृदय से प्यार किया है
हमें भी अपनी मातृ भाषा के प्रति अपने दिल में यही जज़्बा पैदा करना होगा।
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं)





 "मुहम्मद रफ़ी साहब इतने अच्छे इंसान थे कि क्या कहना.. वो कहते हैं न भगवान के आदमी... वो वही थे..!" पद्मविभूषण से सम्मानित अतुलनीय गायिका आशा भोंसले ने कभी अपने एक साक्षात्कार में यह बात बड़ी सच्चाई से कही थी... भारत रत्न लता मंगेशकर भी रफ़ी साहब को अतुलनीय रूप से सरल इंसान मानती थीं!...महान संगीतकार नौशाद उन्हें मौसिकी का पैगंबर कहते थे तो महेंद्र कपूर से सोनू निगम या अरिजीत तक तो वो भगवान जैसे ही हैं। परन्तु असल जीवन में वह बेहद सरल और शुक्रगुज़ार इंसान थे जिसे बस गाने से मतलब था और वो भी बहुत अच्छा गाने से... क्यों कि उनका ईश्वर तो सुरों में ही उनसे रिश्ता बनाता था।

अब से पूरी एक सदी पहले 24 दिसंबर 1924 को "कोटला सुल्तान सिंह"(तब भारत अब पाकिस्तान) में मुहम्मद रफ़ी का जन्म हुआ... बचपन में एक दरवेश के गाने से मोहित हुए रफ़ी को संगीत ने ख़ुद एक सुरीला दरवेश बना दिया था।

मुहम्मद रफ़ी... जिनको इस दुनिया से गए आज पूरे पैंतालीस साल हो चुके हैं.. मग़र उनकी आवाज़ और अंदाज़ का जादू आज भी संगीतप्रेमियों के सर चढ़ कर बोलता है और उनके गाए गीतों से रेडियो,टीवी,यूट्यूब सब भरे रहते हैं... उनके गीत जिनमें ग़ज़ब का रोमांस है,कामुकता है,प्रेम है,वात्सल्य है,करुणा है,उदासी है,पीड़ा है,हास्य है, मस्ती है और अतुलनीय भक्ति है। यही कारण है कि मुहम्मद रफ़ी के सिनेमा गायकी के लगभग तीस साल के  सफ़र में उन्हें पद्मश्री, एक राष्ट्रीय पुरस्कार, छ फिल्म फेयर अवॉर्ड और पंद्रह बार फिल्म फेयर नॉमिनेशन प्राप्त हुए... किन्तु सबसे बड़ी उपलब्धि तो किसी कलाकार की यही होती है कि उसे ख़ास और आम दोनों तरह की जनता से प्रेम और सम्मान मिले...जिस मामले में मुहम्मद रफ़ी दुनिया के कुछ ही गिने चुने कलाकारों में आते हैं... वो नाती से नाना तक सबके दुलारे रहे हैं।
मै जब छोटा था तब मेरे माता पिता को रिकॉर्ड प्लेयर पर खूब गीत सुनने की आदत थी...उन गीतों में एक रिकॉर्ड लगभग रोज़ ही बजता था और वो था फिल्म "बैजू बावरा" का जिसके दो गाने मुझे सुनते सुनते रट गए - "तू गंगा की मौज मै जमुना का धारा"... और "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"... दोनों के गायक थे "महान रफ़ी"... लेकिन उस फिल्म का एक गीत जो मुझे केवल पसंद नहीं था बल्की मेरी आत्मा में घुला हुआ था वह था "राग मालकौंस" के उच्च स्वरों से सिहरता हुआ एक अद्भुत भजन जिसे नौशाद अली ने डूब कर संगीतबद्ध किया, शकील बदायूंनी ने हृदय के रक्त से  लिखा और मुहम्मद रफ़ी ने अपनी आत्मा से ऐसा गाया कि बस पूरा भारत रोम रोम हर्षित हो उठा..उस गीत के अंतिम अंग में जब कीर्तन होता है उस टुकड़े में रफ़ी साहब ने जिस भावुकता से "मोहे दर्शन भिक्षा दे दो" कहा है वह बेजोड़ है।
रफ़ी साहब का कमाल यह था कि वो पांच वक़्त के नमाज़ी होने के साथ ही किसी भी धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठे रहे... यही कारण है कि जब फिल्मकार अपनी किसी फिल्मी सिचुएशन में किसी मार्मिक हिन्दू भजन को गाने के लिए किसी गायक की कल्पना करता तो उसमें हेमंत कुमार के बाद सबसे पहला नाम मुहम्मद रफ़ी का ही होता था और मुहम्मद रफ़ी इस उत्तरदायित्व को इतनी सच्चाई से निभाते थे कि अभिनेताओं को केवल रफ़ी के भावों का अनुकरण मात्र करना रह जाता था... जिसका जीवंत प्रमाण है फिल्म फिल्म वसंत बहार का वह अद्वितीय देवी भजन जिस पर भारत भूषण को अभिनय करने का अवसर मिला किन्तु यदि आप उस गीत को देख रहे हैं तो अनायास आपकी आँखें बंद हो कर केवल गायन में डूब जाना चाहेंगी... और वह मार्मिक भजन है - "दुनिया न भाए मोहे, अब तो बुला ले, चरणों में चरणों में"...माता काली की प्रतिमा के समक्ष चित्रांकित यह गीत आंखों में आंसुओं की धार लाने को पर्याप्त है। 
मुहम्मद रफ़ी में अपनी भारत भूमि के प्रति एक गहरा लगाव था... बंटवारे के बाद भारत में रह जाने का उनका फ़ैसला कोई परिस्थिति जन्य घटना नहीं थी अपितु उनके अंतर्मन का निर्णय था... यह बात उनके अनेक देशभक्ति के गीतों के साथ साथ उस एक भजन में भी उदघोषित होती है जो भारत के सबसे लोकप्रिय कृष्ण भजनों में एक है और जिसके बिना अब तक कि कोई जन्माष्टमी नहीं मनी है - "बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके बृजबाला"... इस गीत को राजेंद्र कृष्ण जैसे अनूठे गीतकार ने जिस तन्मयता से लिखा था उसी तन्मयता से विद्वान संगीतकार रवि साहब ने उसकी धुन भी बनाई थी... पर सोने पर सुहागा तो थी मुहम्मद रफ़ी की दिलफरेब आवाज़ जिसमें गाते हुए उनकी तान में मानो कृष्ण की मुरली गूंज गूंज जाती हो...तभी तो इस एक पंक्ति पर पहुंच कर रफ़ी पूरे भारत का स्वर बन जाते हैं - "अरे! पूरा कर दे(तान) आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया/ कोई नहीं है तुझ भी मोहन भारत का रखवाला रे/ बड़ी देर भई नंदलाला"...!

कहते हैं कि किसी के हृदय में कितना प्रेम छुपा है किसी के प्रति यह तब पता लगता है जब कोई अपने प्रिय को नाम से पुकारता हो... आश्चर्य है कि जिस प्रेम भाव से मुहम्मद रफ़ी ने फिल्मी गीतों में भगवान राम का नाम पुकारा है वह कदाचित ही कोई दूसरा कर सका हो.. शायद यही कारण है कि उनसे अधिक "राम भजन" हिंदी फिल्मों में किसी भी गायक ने नहीं गाए हैं... यदि आपको रफ़ी के श्री राम प्रेम का अनुभव करना हो तो आप उनके गाए किसी भी राम भजन को सुनते हुए उनके "राम" बोलने का अंदाज़ सुनिए..विश्वास करिए आप रोम रोम सिहर उठेंगे... उनके भक्ति गीत - "जय रघुनंदन जय सिया राम" या "मुझे अपनी शरण में लेलो राम" और "बड़ी देर भई बड़ी देर भई, कब लोगे खबर मोरे राम"... इस बात का जीवंत प्रमाण हैं।
भारत में जितने भी बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं लगभग सबके लिए रफ़ी साहब ने ही सफलतम गीत या भजन गाए हैं ... उधारण में होली के त्यौहार पर "तन रंग लो जी आज मन रंग लो" या "होली खेलत नंदलाल बिरज में"... अथवा नवरात्रि में "तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए, मै आया मै आया शेरा वालिए"...जिसे वैष्णव माता के रस्ते जाने वाले हर यात्री के मुंह से आज भी सुना जा सकता है... अथवा "हे नाम रे,सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरो वाली, ऊंचे डेरो वाली, बिगड़ी बना दे मेरे नाम"... या शिवरात्रि पर अनन्य शिव भक्ति में डूबा भजन "मोर भंगिया के मनाई दा"..."हे महादेव मेरी लाज रहे/ मेरी लाज रहे तेरा राज रहे/" और "मुझे तो शिव शंकर मिल गए/ किया न जप तप, तीर्थ न घूमा, अपने ही घर मिल गए/"... जन्माष्टमी के मनमोहन पर्व पर "मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे" या "राधिके तूने बंसरी चुराई" या "वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सबकी आंखों का तारा" और "गोविन्दा आला रे आला, ज़रा मटकी संभाल बृजबाला"... देश भर में गणपति पूजा पर घर घर  बजने वाला गीत "देवा हो देवा, गणपति देवा तुमसे बढ़ कर कौन, और तुम्हारे भक्त जनों में हमसे बढ़ कर कौन" यह सब मुहम्मद रफ़ी के सुर और लय के साथ ही साथ उनकी पवित्र भावना के भी परिचायक हैं।

हिन्दी उर्दू के अलावा मुहम्मद रफ़ी ने अनेक भारतीय और कुछ विदेशी भाषाओं में गीत गाए हैं... इनमें कई भजन भी हैं जिनमें मराठी ,बंगाली,तेलुगु,पंजाबी जैसी भाषाओं में कई भजन शामिल हैं...और उसमें ही शामिल अनेक सुमधुर गीत "हिंदी की बड़ी बहनों में सबसे करीबी भोजपुरी" भाषा के हैं... यह इतिहास ही है कि भोजपुरी की पहली पहली फिल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" जिसके संगीतकार सुविख्यात "चित्रगुप्त" और गीतकार हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े कवि "शैलेन्द्र" थे और जिसके गीतों को लता मंगेशकर,ऊषा मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली... जिनमें रफ़ी साहब का गाया दर्दभरा गीत -"सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूट गईल डालिया,छितर गईल खोतवा,
छूट गईल नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा मां" ....सुन कर मन भर आता है... निर्गुण सरीखे इस विदाई गीत में जिस प्रकार से एक पंजाबी उर्दू ज़बान के मुहम्मद रफ़ी ने भोजपुरी की चासनी चटाई है वह सुनते ही बनता है... भोजपुरी में तीस से अधिक गाने गाने वाले मुहम्मद रफ़ी ने जब भोजपुरी भजन गाया तो वह संयोग से भगवान राम की लीला को ही समर्पित था... "हमार संसार" नामक भोजपुरी फिल्म जिसका संगीत "श्याम शर्मा" ने दिया था और गीतनुमा भजन लिखा था देश के प्रमुख प्रगतिशील शायर "मज़रूह सुल्तानपुरी" ने... और इस राम भजन को जब राम के दुलारे रफ़ी साहब ने गाया तो माधुर्य ही माधुर्य बरस गया - "हँसत खेलत प्रभु पुनि लौटे ,
हसत खेलत प्रभु पुनि घर लौटे, संग लखन सिया माई,
अइसन दिन सबके घर आवे, मिले भाई से भाई,
आहो मिले राम भरत दूनू भाई, आहो मिले राम भरत दूनू भाई 
फुकलो से ई दिया न बुताई, नेह के जोत जरत चली जाई"।
ये भारत की उदार संस्कृति का ही प्रतीक है कि हिन्दी सिनेमा का सबसे सफल नातिया क़लाम (मुहम्मद साहब की तारीफ़) भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज़ में घर घर गूंजा - "बेक़स पे करम कीजिए सरकार ए मदीना"... वहीं दूसरी तरफ़ भारत के सबसे लोकप्रिय सिनेमाई भजनों में सर्वोत्तम मुहम्मद रफ़ी के नाम दर्ज़ मिलते हैं...फिर वह चाहे "शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली हो" जैसी कालजई भक्ति कव्वाली हो या "मधुर राम का नाम जग में/ भज राम राम राम जग में/" जैसा कीर्तन मुहम्मद रफ़ी सबको हृदय से गाते गए और हृदय में उतारते गए... और उतरते गए इस हिंदुस्तान के हृदय में...कदाचित उस परमात्मा के भी जो भारत का रखवाला है... क्यों कि यह एक अनुपम संयोग ही है कि सबसे अधिक सिने भजन गाने वाले इस मुस्लिम गायक के जीवन का अंतिम सफल गीत भी एक भजन ही था... हां! 31 जुलाई 1980 के दिन जब इस हरदिल अज़ीज़ गायक ने अपनी मुस्कुराती आंखें हमेशा के लिए बंद की... रमज़ान का पवित्र महीना भी अलविदा की ओर था... और गुरुपूर्णिमा का पर्व बीता कर महादेव शिव के श्रवण मास अभी अभी प्रारंभ हुआ था...आकाश से शिवकृपा घनघोर वर्षा के रूप में उतर रही थी...लाखों की भीड़ मुंबई की सड़कों पर उस इंसान की अर्थी के पीछे छतरी लिए भीगती चल रही थी जिसे भगवान ने सिर्फ़ गाने के लिए भेजा था और जाते जाते भी भगवान का ये आदमी अपना अंतिम गीत भगवान राम के चरणों में समर्पित कर गया था जो आज उसकी मृत्यु के बाद सारे देश में गूंज रहा था - "राम जी की निकली सवारी/ राम जी की लीला है न्यारी न्यारी..!"
-ओमा अक्
(मुहम्मद रफ़ी की जन्म शताब्दी और पैंतालीसवीं पुण्यतिथि २१ जुलाई २०२५ पर श्रद्धांजलि रूप में यह स्मृतिपत्र)


कोलकाता के पत्रकार राहुल मिश्रा ने सुप्रसिद्ध कॉमेडियन महमूद के बेटे मक़सूद अली उर्फ़ अली अली के हवाले से एक तहरीर लिखी है. ये सिर्फ एक तहरीर ही नहीं है, बल्कि इसमें ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा छुपा है. इसमें ज़िन्दगी को लेकर तीन नज़रिये बयां किए गये है, एक नज़रिया महमूद साहब का है, एक उनके बेटे लकी अली का है और तीसरा नज़रिया राहुल मिश्रा जी का है. इस तहरीर को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए. 

पत्रकार राहुल मिश्रा लिखते हैं- पिता के पास सत्ताईस गाड़ियां थीं। बेटे को छूने की इजाजत नहीं।..वो बेटा अगले महीने अड़सठ का हो जाएगा। और जब सफर पर निकलता है, तो बैग में एक चीज कभी नहीं भूलता। अपना कफन।
उसे पिता से रोज सुबह पांच रुपये मिलते थे।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं, 
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है। 
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए- 
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ 
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं, 
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया। 
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए 
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।


बचपन में पढाई के दौरान कक्षा नौ तक गणित के विषय से हमें बहुत डर लगता था। यूँ समझिए जैसे बिल्ली को देखकर चूहा भागता है वही हाल हमारा होता था, कभी गणित में पास नहीं हुए हमेशा बैक आती थी और मार पडती थी सो अलग।

एक दिन की बात है हमारे टीचर एक सवाल बोर्ड पर समझा रहे थे और उन्हें हमारी काबिलियत का पता था लिहाजा जान पूछकर हमसे उसी सवाल के बारे में पूछते और हम ढुंट की तरह उल्टे सीधे जवाब देते या फिर खामोश हो जाते और पूरी क्लास में हमारा मजाक बनाया जाता था।

टीचर हमसे बोले तुम्हें गणित समझ क्यूँ नहीं आता है.? हम बोले..जी बहुत डर लगता है, वो बोले डर किस बात का लगता है। हमने बडी मासूमियत से बोला- "मार का डर लगता है।" वो बोले "मार का डर।" हम बोले स्कूल में सवाल हल नहीं होता तो आपसे पिटते हैं और घर पर पापा से, लेकिन क्या करूँ समझ ही नहीं आता।

थोडी देर सोचकर वो बोले ठीक है बेटा आज के बाद हम आपको न डाँटेंगे और ना ही मारेंगे। बस एक बात हमारी मानोगे। हमने कहा- जी। वो बोले- अपने मन से डर को निकाल दो। देखो डर के आगे जीत है, आप कोई भी सवाल को अपने आप हल करो, एक बार नहीं आयेगा, दो बार नहीं आयेगा। आखिर कब तक समझ नहीं आयेगा। वो हमारे मनोविज्ञान को समझ चुके थे। हमने कोशिश की।कुछ दिन तो समझ नहीं आया और फिर बडे प्यार से हमको उन्हीं सवालों को समझाते रहे और धीरे धीरे हमारी झिझक और डर दिल से निकल गया और कुछ ही महीनों में वही गणित जो हमको हव्वा लगता था हमारा मनपसंद सब्जैक्ट बन गया, आलम ये हो गया कि कठिन से कठिन सवाल भी चुटकियों में हल करने लगे और इस नाचीज ने दसवीं और इंटर बोर्ड की परीक्षा में स्कूल में सबसे ज्यादा अंकों से पास की थी। 

आज भी वो मेरे टीचर वो मेरे गुरू जब भी याद आते हैं उनके प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है जिन्होंने मुझे एक सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया। मौजूदा दौर में जब न पढने वाले रहे न पढाने वाले रहे बस सबका ध्येय केवल और केवल धन कमाना ही रह गया है तो बडा कोफ्त होता है और उस दौर की यादों को समेटे हुए खुद को आज खुशकिस्मत समझता हूँ।


वैभव का सबसे बड़ा छल यह है कि वह अपने को सफलता की तरह प्रस्तुत करता है। जबकि कई बार वह केवल संग्रह होता है, उपलब्धि नहीं।

एक पेड़ कभी अपने फलों की गिनती नहीं करता। यदि वह गिनने लगे, तो शायद छाया देना भूल जाए। तरूवर फल नहीं खात है....!

नदी अपने किनारों का स्वामित्व नहीं लिखवाती। इसलिए समुद्र तक पहुँच जाती है। तालाब जितना अपने पानी को बचाना चाहता है, उतना ही जल्दी हरा पड़ने लगता है।

मैंने कई बड़े घर देखे हैं, जिनमें लौटने की इच्छा नहीं हुई। और कई मिट्टी के आँगन, जहाँ से उठते हुए लगा कि कुछ अपना वहीं छूट गया है। वैभव घर को बड़ा कर सकता है, गृह नहीं।

एक पुरानी लालटेन, जो वर्षों तक किसी किसान के साथ खेत जाती रही, अपने शीशे की चमक पर कभी गर्व नहीं करती। उसे मालूम है कि उसकी रोशनी का मूल्य अँधेरे ने तय किया है।

भूल से भी वैभव को मत बाँचना। वह अक्सर आदमी की ऊँचाई नहीं, उसके चारों ओर खड़ी चीज़ों की ऊँचाई बताता है।
◉
वैभव का कोई विरुद्धार्थी नहीं होता। शायद इसलिए कि उसका उलटा अभाव नहीं, विनम्रता है। 

रूसी उपन्यासों का एक बूढ़ा पात्र याद आता है। उसके पास बची हुई चीज़ों की सूची बहुत छोटी थी—एक पुराना कोट, लकड़ी की कुर्सी, खिड़की पर रखा एक गमला और देर तक जलने वाला एक दीपक। लेकिन जब कोई अतिथि उसके घर आता, वह अपनी कुर्सी अतिथि को दे देता और स्वयं चौखट पर बैठ जाता। उस दिन समझ में आया कि कुर्सी का वैभव उस पर बैठने में नहीं, उसे छोड़ देने में था। चीज़ें जितनी अपनी रहती हैं, उतनी बड़ी नहीं होतीं; जितनी किसी और की हो जाती हैं, उतनी बड़ी हो जाती हैं।
◉
मनुष्य का असली वैभव वह है, जिसे खो देने के बाद भी वह थोड़ा-सा मनुष्य बना रहे। जैसे पेड़ पतझर के बाद भी पेड़ रहता है। जैसे खाली घोंसला भी पक्षियों की स्मृति सँभाले रहता है। जैसे एक बूढ़ी माँ के हाथ, जिनमें अब आटा गूँधने की ताक़त नहीं बची, फिर भी घर की सबसे बड़ी रोटी वही हैं।

अंततः, वैभव वह नहीं जो आँखों को चकाचौंध कर दे; वैभव वह है जिसके सामने अहंकार अपनी आवाज़ धीमी कर ले।

इसलिए भूल से भी वैभव को मत बाँचना। कई बार जो सबसे अधिक चमकता है, उसके भीतर सबसे अधिक अँधेरा जमा होता है।
◉
किताबों में बड़े-बड़े महल मिलते हैं, लेकिन पाठकों को याद अक्सर वह छोटी-सी मेज़ रह जाती है, जिस पर कोई पात्र अपनी आख़िरी रोटी दो हिस्सों में बाँट देता है। 

साहित्य ने हमें सिखाया है कि वैभव का माप कमरों की संख्या से नहीं, उस एक अतिरिक्त थाली से होता है जो हमेशा किसी अजनबी के लिए बची रहती है।

इसलिए भूल से भी वैभव को मत बाँचिए। 

वह सोने की चमक में कम, किसी के लिए बचाकर रखे गए एक कौर, एक कुर्सी, एक कंबल और एक वाक्य में अधिक दिखाई देता है। 

जो वैभव बाँटते ही छोटा हो जाए, वह वैभव नहीं, संग्रह है। जो बाँटने पर और बढ़ जाए, वही मनुष्य का असली ऐश्वर्य है।
-जयप्रकाश मानस 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
’लौह महिला’ के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी न सिर्फ़ भारतीय राजनीति पर छाई रहीं, बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी सूरज की तरह चमकीं. उनकी ज़िन्दगी संघर्ष, चुनौतियों और कामयाबी का एक ऐसा सफ़रनामा है, जो अदम्य साहस का इतिहास बयां करता है. अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना किया और हर मोर्चे पर कामयाबी का परचम लहराया. मामला चाहे कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह का हो, अलगाववाद का हो, पाकिस्तान के साथ जंग का हो, बांग्लादेश की आज़ादी का हो, या फिर इसी तरह का कोई और बड़ा मुद्दा हो. हर मामले में उन्होंने अपनी सूझबूझ और साहस का परिचय दिया. बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रीवी पर्स का ख़ात्मा, प्रथम पोखरण परमाणु विस्फोट, प्रथम हरित क्रांति जैसे कार्यों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई और बांग्लादेश की आज़ादी भी उनके साहसिक कार्यों में शामिल है.

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था. उनका पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी था. उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और माता कमला नेहरू थीं. उन्होंने शुरुआती तालीम इलाहाबाद के स्कूल में ही ली. इसके बाद उन्होंने गुरु रबींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया. कहते हैं, रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें ’प्रियदर्शिनी’ नाम दिया था. इसके बाद वे इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं,लेकिन नाकाम हुईं. इसके बाद उन्होंने ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताए. फिर साल 1937 में इम्तिहान में कामयाब होने के बाद उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड के सोमरविल कॉलेज में दाख़िला ले लिया. उस दौरान उनकी मुलाक़ात फ़िरोज़ गांधी से हुई, जिन्हें वे इलाहाबाद से जानती थीं. फ़िरोज़ गांधी उन दिनों लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में पढ़ रहे थे. उनकी जान-पहचान मुहब्बत में बदल गई और फिर 16 मार्च 1942 को उन्होंने इलाहाबाद के आनंद भवन में  फिरोज़ से विवाह कर लिया. उनके दो बेटे संजय और राजीव हुए. राजीव गांधी बाद में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने.

बचपन से ही इंदिरा गांधी को सियासी माहौल मिला था, जिसका उनके किरदार और उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर पड़ा. साल 1941 में ऑक्सफ़ोर्ड से स्वदेश वापसी के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं. उन्होंने युवाओं के लिए वानर सेना बनाई. वानर सेना विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस निकालने के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं की भी ख़ूब मदद करती थी, मसलन संवेदनशील प्रकाशनों और प्रतिबंधित सामग्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती थी. आज़ादी की लड़ाई में इसके काम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  1930 की दहाई के शुरू का वाक़िया है, जब इंदिरा गांधी ने पुलिस की निगरानी में रह रहे अपने पिता के घर से एक अहम दस्तावेज़ को अपनी किताबों के बस्ते में छुपाकर गंतव्य तक पहुंचाया था. इस दहाई के आख़िर में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान वे लंदन में आज़ादी के समर्थक दल भारतीय लीग की सदस्य बनीं और विदेश में रहकर भी स्वदेश के लिए काम करती रहीं. सितम्बर 1942 में उन्हें  ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया. आख़िर तक़रीबन 243 दिन जेल में गुज़ारने के बाद उन्हें 13 मई 1943 को रिहा किया गया. साल 1947 के देश के बंटवारे के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित किया और पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए भोजन और चिकित्सा का इंतज़ाम किया. उनके इस कार्य को ख़ूब सराहा गया और इससे उन्हें एक नई पहचान मिली.

1950 की दहाई में इंदिरा गांधी अपने पिता यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी सहायक के तौर पर काम कर रही थीं. साल 1959 वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं. पार्टी के लिए उन्होंने सराहनीय काम किया. 27 मई, 1964 को उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं. साल 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान वे सेना की हौसला अफ़ज़ाई के लिए श्रीनगर सीमा के इलाक़े में गईं. सेना की चेतावनी के बावजूद उन्होंने दिल्ली आना मंज़ूर नहीं किया और सेना का मनोबल बढ़ाती रहीं. उस दौरान लालबहादुर शास्त्री ताशक़ंद गए हुए थे, जहां सोवियत मध्यस्थता में पाकिस्तान के अयूब ख़ान के साथ शांति समझौते पर दस्तख़त करने के कुछ घंटों बाद ही उनका निधन हो गया.

इसके बाद 19 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं. उस वक़्त कांग्रेस दो गुटों में बंट चुकी थी. समाजवादी ख़ेमा इंदिरा गांधी के साथ खड़ा था, जबकि दूसरा रूढ़िवादी गुट मोरारजी देसाई का समर्थक था. मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी को ’गूंगी गुड़िया’ कहा करते थे, क्योंकि वे बहुत कम बोलती थीं. साल 1967 के चुनाव में 545 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को 297 सीटें मिलीं. उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया और वे  24 मार्च, 1977 अपने पद पर बनी रहीं. क़ाबिले-ग़ौर है कि वे 1967 में प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के बाद आख़िर तक प्रधानमंत्री बनी रहीं, लेकिन 1977 से 1980 के बीच उन्हें हुकूमत से बेदख़ल रहना पड़ा. उन्होंने मोरारजी देसाई को देश का उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनाया. साल 1969 में मोरारजी देसाई के साथ अनेक मुद्दों पर मतभेद हुए और आख़िरकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बंट गई. उन्होंने समाजवादी और साम्यवादी दलों के समर्थन से हुकूमत की. इसके कुछ वक़्त बाद फिर से देश को जंग का सामना करना पड़ा. साल 1971 में जंग के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को नई दिशा दी. नतीजतन, जंग में भारत ने शानदार जीत हासिल की. इस दौरान बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ादी मिली. दरअसल, बांग्लादेश को आज़ाद कराने में इंदिरा गांधी ने बेहद अहम किरदार निभाया था. कहते हैं कि इस जीत के बाद जब संसद सत्र शुरू हुआ, तो विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण मे इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था.

इंदिरा गांधी ने  26 जून, 1975 को देश में आपातकाल लागू किया. इसकी वजह से उनकी पार्टी 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार गई. उन्हें अक्टूबर 1977 और दिसम्बर 1978 में जेल तक जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जद्दोजहद करती रहीं. फिर 1980 में उन्होंने हुकूमत में वापसी की. कांग्रेस को शानदार कामयाबी मिली और 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. 14 जनवरी, 1980 को वे फिर से देश की प्रधानमंत्री बनीं और अपनी ज़िन्दगी के आख़िर तक हुकूमत की. उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चरम पर था. उन्होंने पंजाब में अलगाववादियों के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी. इसकी वजह से अलगाववादी उनकी जान के दुश्मन बन गए और 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में उनके अंगरक्षकों ने ही उनका क़त्ल कर दिया. उनकी आकस्मिक मौत से देश शोक में डूब गया.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पंडित जवाहरलाल  नेहरू से श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना करते हुए कहा था कि अपने पिता के विपरीत श्रीमती इंदिरा गांधी संसद से दूर-दूर रहती थीं. आरंभ में तो वह इतनी चुप रहती थीं कि उन्हें ’गूंगी गुड़िया’ तक कह दिया गया था, किंतु यह उनके साथ अन्याय था. वह कम बोलने में विश्वास करती थीं. सबकी बातें सुनने के बाद अपना मत स्थिर करती थीं और सबसे अंत में प्रकट करती थीं. वह सदन में आकर समय गंवाने की बजाय अपने कमरे में बैठकर सत्ता की चाबियां घुमाती थीं. उन्होंने चौदह वर्ष तक शासन कर विश्व को चमत्कृत कर दिया और विरोधियों को कई बार पछाड़ा. इंदिरा जी के साथ संसद में कई बार काफी नोक-झोंक होती रहती थी, किंतु राजनीति के मतभेदों को उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों में बाधक नहीं बनने दिया. उनकी निर्मम त्रासद और क्रूर हत्या ने एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे बीच से उठा लिया, जिन्हें योग्य पिता की योग्य पुत्री के नाते ही नहीं, अपनी निजी योग्यता, कुशलता, निर्णय क्षमता तथा कठोरता के कारण याद किया जाएगा.

दरअसल, सियासत की इस महान और कामयाब शख़्सियत को अपनी निजी ज़िन्दगी में कई ग़म मिले थे. साल 1936 में उनकी मां कमला नेहरू तपेदिक से एक लम्बे अरसे तक जूझने के बाद उन्हें अकेला छोड़ गईं. उस वक़्त उनकी उम्र महज़ 18 साल थी. फिर शादीशुदा ज़िन्दगी में भी उन्हें दुख मिले.शादी के बाद उनकी शुरुआती ज़िन्दगी ठीक रही, लेकिन बाद में वे अपने पिता के घर आ नई दिल्ली आ गईं. देश के पहले आम चुनाव 1951 में वे अपने पिता और पति दोनों के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं. चुनाव जीतने के बाद फ़िरोज़ गांधी ने अपने लिए अलग घर चुना. फिर साल 1958 में उप-निर्वाचन के कुछ वक़्त बाद फिरोज़ गांधी को दिल का दौरा पड़ा. इस दौरान इंदिरा गांधी ने उनकी ख़ूब ख़िदमत की. उनके रिश्ते बेहतर होने लगे, लेकिन 8 सितम्बर1960 को जब इंदिरा गांधे अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई थीं, तब फिरोज़ की मौत हो गई. उन्होंने ख़ुद को पार्टी और देश के काम में मसरूफ़ कर लिया. उन्होंने संजय गांधी को अपना सियासी वारिस चुना, लेकिन 23 जून, 1980 को एक उड़ान हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद वे अपने छोटे बेटे राजीव गांधी को सियासत में लेकर आईं. राजीव गांधी पायलट की नौकरी में ख़ुश थे और सियासत में आना नहीं चाहते थे, लेकिन मां को वे इंकार न कर सके और न चाहते हुए भी उन्हें सियासत में क़दम रखना पड़ा.

इंदिरा गांधी ख़ाली वक़्त में अपने परिजनों के लिए स्वेटर बुना करती थीं. उन्हें संगीत और किताबों से भी ख़ास लगाव था. पाकिस्तानी गायक मेहंदी हसन की ग़ज़लें भी अकसर सुनती थीं. सोने से पहले वे आध्यात्मिक किताबें पढ़ती थीं. भारत रत्न से सम्मानित इंदिरा गांधी ने कहा था- जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो. यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो. शहादत कुछ ख़त्म नहीं करती, वो महज़ शुरुआत है. अगर मैं एक हिंसक मौत मरती हूं, जैसा कि कुछ लोग डर रहे हैं और कुछ षड़यंत्र कर रहे हैं, तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारों के विचार और कर्म में होगी, मेरे मरने में नहीं. लोग अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, लेकिन अधिकारों को याद रखते हैं. अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि आप अपने आप को दूसरों की सेवा में खो दें. संतोष प्राप्ति में नहीं, बल्कि प्रयास में होता है पूरा प्रयास पूर्ण विजय है. प्रश्न करने का अधिकार मानव प्रगति का आधार है. देशों के बीच के शांति, व्यक्तियों के बीच प्यार की ठोस बुनियाद पर टिकी होती है
उन्होंने यह भी कहा था, जब मैं सूर्यास्त  पर आश्चर्य या चांद की ख़ूबसूरती की प्रशंसा कर रही होती हूं, उस समय मेरी आत्मा इन्हें बनाने वाले की पूजा कर रही होती है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं) 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
देशभर में जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिन 14 नवम्बर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही वजह थी कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था. एक बार चाचा नेहरू से मिलने एक सज्जन आए. बातचीत के दौरान उन्होंने नेहरू जी से पूछा- पंडित जी, आप सत्तर साल के हो गए हैं,  लेकिन फिर भी हमेशा बच्चों की तरह तरोताज़ा दिखते हैं, जबकि आपसे छोटा होते हुए भी मैं बूढ़ा दिखता हूं. नेहरू जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- इसके तीन कारण हैं.  पहला, मैं बच्चों को बहुत प्यार करता हूं. उनके साथ खेलने की कोशिश करता हूं. इससे मैं अपने आपको उनको जैसा ही महसूस करता हूं. दूसरा, मैं प्रकृति प्रेमी हूं और पेड़-पौधों, पक्षी, पहाड़, नदी, झरनों, चांद, सितारों से बहुत प्यार करता हूं. मैं इनके साथ में जीता हूं, जिससे यह मुझे तरोताज़ा रखते हैं. तीसरी वजह यह है कि ज़्यादातर लोग हमेशा छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं और उसके बारे में सोच-सोचकर दिमाग़ ख़राब करते हैं. मेरा नज़रिया अलग है और मुझ पर छोटी-छोटी बातों का कोई असर नहीं होता. यह कहकर नेहरू जी बच्चों की तरह खिलखिलाकर हंस पड़े.

पंडित जवाहरलाल नेहरू  का जन्म 14 नवम्बर 1889 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था. वह पंडित मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी के इकलौते बेटे थे. उनसे छोटी उनकी दो बहनें थीं. उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. उनकी शुरुआती तालीम घर पर ही हुई. उन्होंने 14 साल की उम्र तक घर पर ही कई अंग्रेज़ शिक्षकों से तालीम हासिल की. आगे की शिक्षा के लिए 1905 में जवाहरलाल नेहरू को इंग्लैंड के हैरो स्कूल में दाख़िल करवा दिया गया. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहां से उन्होंने प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की. साल 1912 में उन्होंने लंदन के इनर टेंपल से वकालत की डिग्री हासिल की और उसी साल भारत लौट आए. उन्होंने इलाहाबाद में वकालत शुरू कर दी, लेकिन वकालत में उनकी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. भारतीय राजनीति में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी और सियासी कार्यक्रमों में शिरकत करने लगे. उन्होंने 1912 में बांकीपुर (बिहार) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया लिया. 8 फ़रवरी 1916 को कमला कौल से उनका विवाह हो गया. 19 नवंबर 1917 को उनके यहां बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी रखा गया, जो बाद में भारत की प्रधानमंत्री बनीं. इसके बाद उनके यहां एक बेटे का जन्म हुआ, लेकिन जल्द ही उसकी मौत हो गई.

पंडित जवाहरलाल नेहरू  1916 के लखनऊ अधिवेशन में महात्मा गांधी के संपर्क में आए. मगर 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे. इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य का ऐलान किया गया. इससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की मांग थी. वह जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की जांच में देशबंधु चितरंजनदास और महात्मा गांधी के सहयोगी रहे और 1921 के असहयोग आंदोलन में तो महात्मा गांधी के बेहद क़रीब में आ गए और गांधी जी की मौत तक यह नज़दीकी क़ायम रही. कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के फ़ौरन बाद शुरू हुआ. उस वक़्त राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया. स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गए और तक़रीबन बारह सौ लोग ज़ख़्मी हुए.

साल 1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रदेशों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया,  तब पहली बार नेहरू जेल गए. अगले 24 साल में उन्हें आठ बार गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. नेहरू ने कुल मिलाकर नौ साल से ज़्यादा वक़्त जेलों में गुज़ारा. अपने मिज़ाज के मुताबिक़ ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है.  कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला. साल 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो साल के लिए पार्टी के महासचिव बने. उनकी रुचियों और ज़िम्मेदारियों ने उन्हें भारत के व्यापक क्षेत्रों की यात्रा का मौक़ा दिया, ख़ासकर उनके गृह प्रदेश संयुक्त प्रांत का,  जहां उन्हें घोर ग़रीबी और किसानों की बदहाली की पहली झलक मिली और जिसने इन महत्वपूर्ण समस्याओं को दूर करने की उनकी मूल योजनाओं को प्रभावित किया. हालांकि उनका कुछ-कुछ झुकाव समाजवाद की ओर था, लेकिन उनका सुधारवाद किसी निश्चित ढांचे में ढला हुआ नहीं था. 1926-27 में उनकी यूरोप और सोवियत संघ की यात्रा ने उनके आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया.

वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़े, चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो. उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत की. नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे और इसलिए आज़ादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे. साल 1920 में उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया. वह 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए. गांधी जी ने यह सोचकर उन्हें यह पद सौंपा कि अतिवादी वामपंथी धारा की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं को नेहरू कांग्रेस आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल कर सकेंगे.

1931 में पिता की मौत के बाद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस की केंद्रीय परिषद में शामिल हो गए और महात्मा के अंतरंग बन गए. हालांकि 1942 तक गांधी जी ने आधिकारिक रूप से उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, लेकिन 1930 के दशक के मध्य में ही देश को गांधी जी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू दिखाई देने लगे थे. मार्च 1931 में महात्मा और ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड इरविन (बाद में लॉर्ड हैलिफ़ैक्स) के बीच हुए गांधी-इरविन समझौते से भारत के दो प्रमुख नेताओं के बीच समझौते का आभास मिलने लगा. इसने एक साल पहले शुरू किए गए गांधी जी के प्रभावशाली सविनय अवज्ञा आंदोलन को तेज़ी प्रदान की, जिसके दौरान नेहरू को गिरफ़्तार किया गया. दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद लंदन से स्वदेश लौटने के कुछ ही वक़्त बाद जनवरी 1932 में गांधी को जेल भेज दिया. उन पर फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की कोशिश का आरोप लगाया गया. नेहरू को भी गितफ़्तार करके दो साल की क़ैद की सज़ा दी गई.

भारत में स्वशासन की स्थापना की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों की परिणति आख़िरकार 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के रूप में हुई, जिसके तहत भारतीय प्रांतों के लोकप्रिय स्वशासी सरकार की प्रणाली प्रदान की गई. इससे एक संघीय प्रणाली का जन्म हुआ, जिसमें स्वायत्तशासी प्रांत और रजवाड़े शामिल थे. संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन प्रांतीय स्वशासन लागू हो गया.

1930 के दशक के मध्य में नेहरू यूरोप के घटनाक्रम के प्रति ज़्यादा चिंतित थे, जो एक अन्य विश्व युद्ध की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा था. 1936 के शुरू में वह अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए यूरोप में थे. इसके कुछ ही वक़्त  बाद स्विट्ज़रलैंड के एक सेनीटोरियम में उनकी पत्नी की मौत हो गई. उस वक़्त भी उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि युद्ध की स्थिति में भारत का स्थान लोकतांत्रिक देशों के साथ होगा. हालांकि वह इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि भारत एक स्वतंत्र देशों के रूप में ही ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन में युद्ध कर सकता है.
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से मशविरा किए बगैर भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके ख़िलाफ़ कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए. कांग्रेस की इस कार्रवाई से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया.

अक्टूबर 1940 में महात्मा गांधी जी ने अपने मूल विचार से हटकर एक सीमित नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत की आज़ादी के अग्रणी पक्षधरों को क्रमानुसार हिस्सा लेने के लिए चुना गया था. नेहरू को गिरफ़्तार करके चार साल की क़ैद की सज़ा दी गई. एक साल से कुछ ज़्यादा वक़्त तक ज़ेल में रहने के बाद उन्हें अन्य कांग्रेसी क़ैदियों के साथ रिहा कर दिया गया. इसके तीन दिन बाद हवाई में पर्ल हारबर पर बमबारी हुई. 1942 में जब जापान ने बर्मा के रास्ते भारत की सीमाओं पर हमला किया  तो इस नए सैनिक ख़तरे के मद्देनज़र ब्रिटिश सरकार ने भारत की तरफ़ हाथ बढ़ाने का फ़ैसला किया. प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स को संवैधानिक समस्याओं को सुलझाने के प्रस्तावों के साथ भेजा. सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स  युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य और राजनीतिक रूप से नेहरू के नज़दीकी और मोहम्मद अली जिन्ना के परिचित थे. क्रिप्स की यह मुहिम नाकाम रही, क्योंकि गांधी जी आज़ादी से कम कुछ भी मंज़ूर करने के पक्ष में नहीं थे.

कांग्रेस में अब नेतृव्य गांधी जी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया. 8 अगस्त 1942 को मुंबई में कांग्रेस द्वारा भारत छोड़ो  प्रस्ताव पारित करने के बाद गांधी जी और नेहरू समेत पूरी कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया. नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए. लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था. उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को तैनात कर दिया. अब सवाल भारत की आज़ादी का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही आज़ाद राज्य होगा या एक से ज़्यादा होंगे. गांधी जी ने बटवारे को क़ुबूल करने से इंकार कर दिया, जबकि नेहरू ने मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए मौन सहमति दे दी. 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग आज़ाद देश बने. नेहरू आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बन गए.

फिर 1952 में आज़ाद भारत में चुनाव हुए. ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था, जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल किया. इस चुनाव के वक़्त मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी, जिनमें से 15 फ़ीसद साक्षर थे. इस चुनाव में कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने. इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री थे. संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं के लिए भी चुनाव हुए.  देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है. कहा जाता है कि कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केंद्रित था. चुनाव प्रचार के लिए नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज़ सभी का सहारा लिया. उन्होंने 25,000 मील का सफ़र किया यह सफ़र 18,000 मील हवाई जहाज़ से,  5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से किया गया. ख़ास बात यह भी रही कि देशभर में 60  फ़ीसद मतदान हुआ और पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज़्यादा 364 सीटें मिली थीं.

नेहरू के वक़्त एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था. इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून-1956 पास किया गया. आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ, यह सबसे बड़ा बदलाव था. इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई. इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला. संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया, जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा हासिल करने का अधिकार मिला.

1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था,  तब से 35 बरसों तक 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मौत तक नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था, लेकिन 1956 में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये की वजह से उनकी गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई. संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर हमले के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया. इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई. आज़ादी के बाद के शुरूआती बरसों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश-नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रति उपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था. साल 1962 में लंबे वक़्त से चले आ रहे सीमा-विवाद की वजह से चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी. नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को दरकिनार कर पश्चिमी देशों से मदद की मांग की. नतीजतन चीन को पीछे हटना पड़ा. कश्मीर नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व काल में लगातार एक समस्या बना रहा, क्योंकि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान भी इस पर अपना दावा कर रहा था. संघर्ष विराम रेखा को समायोजित करके इस विवाद को निपटाने की उनकी शुरुआती कोशिशें नाकाम रहीं और 1948 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर क़ब्ज़े की कोशिश की. भारत में बचे आख़िरी उपनिवेश पुर्तग़ाली गोवा की समस्या को सुलझाने में नेहरू अधिक भाग्यशाली रहे. हालांकि दिसम्बर 1961 में भारतीय सेनाओं द्वारा इस पर क़ब्ज़ा किए जाने से कई पश्चिमी देशों में नराज़गी पैदा हुई, लेकिन नेहरू की कार्रवाई सही थी. हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा उस वक़्त बेमानी साबित हो गया, जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्टूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले हुए. चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम का ऐलान कर दिया, तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक शहीद हो चुके थे. पंडित नेहरू के लिए यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ. उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया. चीन के साथ हुई जंग के कुछ वक़्त बाद नेहरू की सेहत ख़राब रहने लगी. उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, फिर जनवरी 1964 में उन्हें दौरा पड़ा. कुछ ही महीनों बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मौत हो गई.

जवाहरलाल नेहरू ने देश के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए. उन्होंने औद्योगीकरण को महत्व देते हुए भारी उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया. उन्होंने विज्ञान के विकास के लिए 1947  में भारतीय विज्ञान कांग्रेस की स्थापना की. देश  के विभिन्न भागों में स्थापित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनेक केंद्र इस क्षेत्र में उनकी दूरदर्शिता के प्रतीक हैं. खेलों में भी नेहरू की रुचि थी. उन्होंने खेलों को शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ज़रूरी बताया. उन्होंने 1951 दिल्ली में प्रथम एशियाई खेलों का आयोजन करवाया.

पंडित जवाहरलाल नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि विख्यात लेखक भी थे. उनकी आत्मकथा 1936  में प्रकाशित हुई और दुनियाभर में सराही गई. उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद आदि शामिल हैं. वह भारतीय भाषाओं को काफ़ी महत्व देते थे. वह चाहते थे कि हिन्दुस्तानी जब कहीं भी एक-दूसरे से मिले तो अपनी ही भाषा में बातचीत करें. उन्होंने कहा था-मेरे विचार में हम भारतवासियों के लिए एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा. मैं आपको कह सकता हूं कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेज़ी में बातचीत करनी पड़ती है  तो मुझे कितना बुरा लगता है. लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?

पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने विचारों और अपने उल्लेखनीय कार्यों की वजह से ही महान बने. विभिन्न मुद्दों पर नेहरू के विचार उन्हीं के शब्दों में- भारत की सेवा का अर्थ करोड़ों पीड़ितों की सेवा है. इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान और अवसर की विषमता का अंत करना है. हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है कि हर आंख के हर आंसू को पोंछ दिया जाए. ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आंसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा.

नेहरू जी ने कहा था- अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से आज का बड़ा सवाल विश्व शांति का है. आज हमारे लिए यही विकल्प है कि हम दुनिया को उसके अपने रूप में ही स्वीकार करें. हम देश को इस बात की स्वतंत्रता देते रहें कि वह अपने ढंग से अपना विकास करे और दूसरों से सीखे, लेकिन दूसरे उस पर अपनी कोई चीज़ नहीं थोपें. निश्चय ही इसके लिए एक नई मानसिक विधा चाहिए. पंचशील या पांच सिद्धांत यही विधा बताते हैं.

नेहरू जी ने कहा था- आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी. कोई भी देश, जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, और न आत्मा-अनुशासन-बहुत वक़्त तक नहीं टिक सकता.
बेशक, नेहरू के विचार आज भी बेहद प्रासंगिक हैं. बस ज़रूरत है उनको अपनाने की. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


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