ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
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* -डॉ फ़िरदौस ख़ान*अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़
वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भ...
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डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.
दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.
अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.
पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं.
अच्छी बातें जहां भी मिलें वहां से लेनी चाहिए। यह प्रवृत्ति हमें लानी पड़ेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम इस देश में कितनी भी अच्छी बातें कर लें सौहार्द, प्रेम और गंगा-जमुनी तहजीब की- पर वो आएगी नहीं। आज आप सब यहां इकट्ठा हैं और मुझे लगता है आप में 95% मुस्लिम लोग हैं। तारीफ तो आप लोग सुन सुन के अब तक अघा गए होंगे और बहुत बुरी वाली नफरत भी देख देख के अघा गए होंगे। थोड़ी देर हम लोगों को बैठकर समीक्षात्मक दृष्टि से एक बार अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है दुनिया की हर कौम को, समाज को हर कम्युनिटी को बीच-बीच में अपनी समीक्षा करनी चाहिए कि अगर उसका पतन हो रहा है, उसके खिलाफ लोगों की आवाज बुलंद हो रही है तो सारी कमी हमारे विपक्षी की नहीं होती। बहुत सी कमियां हमारे भीतर व्याप्त होती हैं।
मुझे लगता है कि आज वह समय है कि देश और दुनिया के मुसलमान बैठें और सोचें कि उनसे कहां पर कौन सी गलती होती चली जा रही है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा तबका उसके खिलाफ हो चुका है, उसके मुखालिफ है। ये बातें सुनने में अजीब लग सकती हैं। मैं यहां से बहुत मीठी बातें कर सकता हूं। आप लोगों को बहुत अच्छा बता सकता हूं। इस्लाम धर्म की महानता गिना सकता हूं। पर, इसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि, यदि मेरे लिए इस्लाम दुनिया का सबसे महान धर्म होता तो मैं सुबह कलमा पढ़ के मुसलमान बन चुका होता। यकीनन मेरे और आपके, दोनों के दृष्टिकोण में कोई तो फर्क है और इस फर्क के साथ हमें इस देश में और इस दुनिया में रहना होगा। समस्या कहीं और छुपी हुई है।
हम मुसलमान हैं, या हम हिंदू हैं, या हम ईसाई हैं, या हम सिख हैं- इन बातों से दुनिया में किसी को कोई बैर नहीं होता। इन बातों से किसी को कोई समस्या नहीं होती कि हम कौन हैं। सारी समस्या यहां से शुरू होती है जब हम कहते हैं कि- हमसे बेहतर कोई नहीं है। आपके मुसलमान होने से इस दुनिया को कोई तकलीफ नहीं होती। याद रखिए, आज मुसलमानों के बीच में एक सामान्य बात फैला दी गई है। मेरे पास अक्सर बहुत सारे मुस्लिम ऐसे मीम, ऐसे मैसेज। ऐसे वीडियोज फॉरवर्ड करते हैं जिसमें हिंदू लोग मुसलमानों को मार रहे हैं- या कोई गुरु उकसा रहा है- या कोई गुरु इस्लाम को गालियां दे रहा है- या कोई नेता मुसलमानों के विरुद्ध बोल रहा है। मैं कई बार सोचता हूं कि जवाब में फिर मैं वो सारे वीडियोज निकाल दूं जिसमें कि मुसलमान नेता पूरी दुनिया को गाली दे रहे हैं- मुस्लिम नेता-मौलाना पूरी दुनिया से नाराज घूम रहे हैं- उनको दुनिया में कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसी बातें भरी पड़ी हैं।
मुझे नहीं लगता है कि आप में से जितने लोग अभी यहां मेरी प्रशंसा कर रहे थे इस देश में ऐसे दस-बारह मौलाना निकालिए जो ठीक यही कर रहे हों। मैंने तो अपने यहां ये दावत इफ्तार आज नहीं, 20 साल से रखा है। लेकिन और कितने मौलाना हैं, कितने मुस्लिम स्कॉलर हैं, जिनके घर में आप होली मिलने गए थे और कितने हिंदू लोगों को बुलाकर होली मिलन कराया गया था। आप में से कितने लोगों ने रंग गुलाल लगा के ये करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं लगता कि आप में से अधिकांश लोगों ने ऐसा किया होगा। बहुत शरीफ मुसलमानों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए होंगे ताकि रंग का छींटा ना पड़े, होली की आवाज ना सुनाई दे। कुछ एक होंगे, जो बाहर निकल के गए होंगे, होली खेली होगी। पर, उनको बाद में कितनी गालियां सुननी पड़ी होंगी अपनी कम्युनिटी में… जरा उनसे जाकर यह भी पूछिएगा।
मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि पिछले काफी समय से ना केवल मुसलमान, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वामपंथी धड़ा भी बहुसंख्यक यानी हिन्दुओं के खिलाफ है। पूरी दुनिया में ऐसा है। दुनिया में जहां भी वामपंथी होते हैं… वामपंथी समझते हो ना लेफ्टिस्ट!… जैसे आजकल जो पत्रकार आपको अच्छे लग रहे हैं वो लेफ्टिस्ट हैं। दरअसल भारत के मुसलमानों को अजीत अंजुम अच्छा लगता है, रवीश कुमार अच्छा लगता है, बरखा दत्त अच्छी लगती है। ये सब लोग अच्छे लगते हैं क्योंकि वो इस वक्त मोदी को, बीजेपी सरकार को, हिंदुओं को, हिंदुओं की संकीर्णता को गाली देते हुए आपकी प्रशंसा या आपकी सुरक्षा करते हैं। पर, आप में से किसी को (वो जो गुजर गए) पाकिस्तान के तारिक़ फ़तह शायद ही अच्छे लगते होंगे। लेफ्ट की एक विशिष्टता समझिएगा। लेफ्ट हमेशा अल्पसंख्यकों को, माइनॉरिटी को पकड़ता है, क्योंकि उसके पास अपनी कमजोरी होती है। वह बहुसंख्यक के साथ नहीं है, तभी वह लेफ्ट है। इसलिए वो उस देश के अल्पसंख्यक को पकड़ता है और अल्पसंख्यक को हमेशा सत्ता के खिलाफ बरगलाता रहता है।
बहुत बदकिस्मती की बात है कि भारत में ज्यादातर मुसलमान पढ़ते नहीं है। मैं बीस बाईस सालों से मुसलमानों के संपर्क में हूं। मैंने निरंतर यह कहा कि पढ़ो। तुम्हारी किताब का ही नाम पढ़ो। कुरान के मानी होता है पढ़ना, स्टडी करना। पर तुम नहीं पढ़ते हो। जब तुम नहीं पढ़ते हो तो तुम इतिहास भी नहीं पढ़ते हो। और जब तुम इतिहास नहीं पढ़ते हो, तो तुम अपनी रूट्स नहीं खोज पाते हो, अपनी जड़ नहीं खोज पाते हो। फिर तुम्हें जो बता दिया जाता है तुम उसमें खुश हो जाते हो। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी केवल हिंदुओं के घर नहीं चल रही है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मुसलमानों के घर भी चल रही है, सिखों के घर भी चल रही है, ईसाइयों के घर भी चल रही है, दलितों के घर भी चल रही है। सबके घर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चल रही है।
अच्छी बातें करने का जमाना जा चुका है। अब समझने का जमाना है। यकीनन वो लोग मूर्ख हैं जो किसी बादशाह की कब्र खोद कर उसे सपाट करके उस पे तुलसी का बिरवा लगा देना चाहते हैं। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है। ये तो लगभग वही काम हो गया जो उस बादशाह ने खुद किया था। लेकिन उससे बड़े मूर्ख वो हैं जो उस कब्र को बचाने में लगे हुए हैं- जिन्हें ऐसा लगता है कि उस कब्र को बचा लेने से उनका इतिहास सुरक्षित हो जाएगा। इतिहास कब्रों में नहीं रहता। इतिहास इंसानों में रहता है। कब्रों के अंदर इतिहास नहीं रहते। इस्लाम की मूलभूत परंपरा में कब्रों, समाधियों इन सब चीजों का विरोध किया गया था। इसका मतलब क्या था? मोहम्मद कहना क्या चाहते थे? क्या वो अपने लिए एक बड़ा सा मंदिर, एक बड़ा सा मस्तबा नहीं बनवा सकते थे? पिरामिड से ऊंचा उनका एक समाधि स्थल बन सकता था। इतनी ताकत मोहम्मद की अपनी जिंदगी में आ चुकी थी। नहीं बनवाया तो क्यों? इसलिए क्योंकि मोहम्मद जानते थे कि इस्लाम समाधियों में, बुतों में, कब्रों में, महलों में, दरवाजों में, शिलालेखों में नहीं होगा। इस्लाम अगर जिंदा रहेगा तो वो किसी मुसलमान के किरदार के अंदर जिंदा रहेगा।
मगर ऐसा होता नहीं है। निजामुद्दीन औलिया ने मोहब्बत, प्रेम-सहिष्णुता, सद्भाव की भावना का प्रचार किया। उसे आपने स्वीकार नहीं किया। पर उनकी मजार पर चादर ले ले के आप हर बृहस्पतिवार, हर जुमरात, हर जुम्मा, हर शनिवार, हर खड़े हैं। सवाल किसी बुतपरस्ती, किसी मजारपरस्ती का नहीं है। मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो खुद बुतपरस्त हूं। मेरा इन सब से कोई मुखालिफत नहीं। मेरी मुखालिफत इस बात से है कि ठीक है, आपका अकीदा है, आपको अच्छा लगता है। आप ले जाइए गुलाब और चढ़ा के आ जाइए… निजामुद्दीन के दरवाजे पर… अमीर खुसरो के दरवाजे पर… किसी भी बाबा के, पीर के दरवाजे पर… कोई फर्क नहीं पड़ता। जाइए बोसा ले आइए जाकर के खाना-ए काबे में लगे हुए वो संग असद का। पर इससे क्या होना है? दरअसल जब तक आपके किरदार के भीतर वो मूल बातें नहीं आती हैं जिससे कि इस्लाम दुनिया में इतना फैला… या, एक हिंदू के भीतर जब तक वो बातें उसके चरित्र में नहीं उतरती हैं जिससे राम दुनिया में पूजनीय बने या कृष्ण दुनिया में पूजनीय बने… या एक ईसाई के अंदर नहीं आतीं जिससे ईसा पूरी दुनिया में इतने प्यारे, पूजनीय बने… तब तक किसी समुदाय के होने का अर्थ वास्तव में केवल और केवल दुष्टों की एक बड़ी फौज खड़ा करना होता है। याद रखिएगा आप में से तमाम लोग केवल यह रोज़े रख के, इफ्तार मना करके और दावत इफ्तार करने के बाद बहुत सारी गालियां उन लोगों को देते हो जो आपके खिलाफ बोलते हैं… या चुगलियां करते हुए निकल जाएंगे… या उन लोगों से प्रभावित हो जाएंगे जो बिना मतलब आपको सांत्वना दे रहे हैं… ऐसा है तो आप अपना नुकसान करते जा रहे हैं।
इस वक्त मेरे सामने मुसलमान हैं, इसलिए मैं सिर्फ मुसलमानों से बातें कर रहा हूं। भारत में वो तथाकथित संघीय विचारधारा या संकीर्ण विचारधारा आपकी दुश्मन हो सकती है। पाकिस्तान में कौन सा आरएसएस काम करता है? अफगानिस्तान में कौन सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा है? सूडान में कौन सा मोदी है? इराक में कौन कर रहा है? ईरान में कौन है? दुनिया में शायद 50 से कुछ ज्यादा देश इस्लामिक हो चुके हैं। उन देशों में कौन नरेंद्र मोदी जाकर के बैठा है, कौन योगी आदित्यनाथ बैठा है, कौन सा आरएसएस काम कर रहा है? अरब के कुछ बहुत अमीर, ओबाश और अय्याश देशों को छोड़ दीजिए। उसके बाहर कौन सा ऐसा देश है जहां आपस में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल नहीं कर रहा है- उसकी हत्या नहीं कर रहा है- उसे मार नहीं रहा है। इसकी समस्या कहां छुपी हुई है यह आप खोजेंगे। इसे मैं खोजूंगा तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा। आपको ऐसा लगेगा कि यह तो काफिर है- यह तो हमें बरगला रहा है- तो बेहतर है इसे आप ही खोजिए कि किस समस्या के चलते आपको पूरी दुनिया में जिल्लत, बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा है।
आपको पता है आपको यूरोप और अमेरिका का वीजा लेना पड़े को तो कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। आपकी टोपी और दाढ़ी कितनी बड़ी समस्या बन जाएगी। ऐसा हमेशा से तो नहीं था अचानक से कैसे हो गया? सन 2000 में बीबीसी अपने सर्वे में दुनिया का सबसे सफल और सबसे ताकतवर इतिहास का व्यक्ति चुनता है प्रॉफेट मोहम्मद को। सन 2000 से 2015-16 और फिर 2023-24 आते-आते यूरोप, अमेरिका आपको वीजा नहीं देता है। क्या हो गया इतने दिनों के अंदर? इस समस्या को समझिएगा। यह समस्या हिंदू में भी है, मुसलमान में भी है, सिख में भी है और ईसाई में भी है। मैं सब में एक बराबर समझता हूं।
हमारे बुत परस्त होने से, हमारे आतिश परस्त होने से, हमारे मजार परस्त होने से या हमारे तथाकथित खुदा परस्त होने से किसी को कोई तकलीफ नहीं होती है। तकलीफ शुरू तब होती है जब बहार भाई ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया उस निराकार खुदा को मानने लगे, या जब ओमा द अक्क सोचते हैं कि पूरी दुनिया मेरे भगवान राम को मानने लगे… सारी समस्या वहां से शुरू होती है। दूसरे को अपने जैसा बनाने की धुन इस दुनिया में हमें एक दूसरे का शत्रु बनाती है। तुम्हारा बच्चा तुम्हारी तरह नहीं होता, वो तुम्हारी बात नहीं मानता है और तुम चाहते हो पूरा मुल्क तुम्हारी बात मान ले। ना केवल मुल्क बल्कि पूरी दुनिया तुम्हारी बात मान ले। ये घमंड शायद अच्छा भी लगेगा। यकीनन अच्छा लगेगा। हो सकता है तुम में से कोई उठ के कह दे कि हमारे तो रसूल की सुन्नत है उन्होंने तो खुद इतनी बड़ी जंग लड़ी थी। तो मेरा सवाल होगा कि क्या तुम्हारा किरदार तुम्हारे रसूल की तरह है? क्या तुम दौलत से दूर हो? क्या तुम खुशामद से दूर हो? क्या तुम तारीफों से फूलते नहीं हो? क्या तुम बड़े-बड़े लोगों की चापलूसी नहीं करते हो? क्या तुम्हारा चरित्र तुम्हारे सर के ऊपर बोलता रहता है- कि तुम्हारी लालच तुम्हारी नाक पर चढ़ी रहती है- कि तुम्हारी वासनाएं तुम्हारे सर पर बैठी रहती हैं। किस चीज पर तुम तुलना कर रहे हो क्योंकि तुम्हारा चेहरा देख के तो बार-बार ऐसा ही लगेगा कि इस्लाम यकीनन औरंगजेब की तरह के लोगों ने फैलाया होगा जिनके हाथ में तलवारें थीं, जिन्होंने अपने बाप का कत्ल किया, अपनी बहनों का कत्ल किया, अपने भाइयों का कत्ल किया… और फिर भी टोपी बुन करके अपने को औलिया बताता रहा। इतिहास यही है तुम इसको बदल नहीं सकते हो। लेकिन खुश होने की जगह नहीं है यहां किसी हिंदू को- क्योंकि यही काम बिंबसार भी कर रहा था- यही काम समुद्रगुप्त भी कर रहा था- अजात शत्रु भी कर रहा था… यह काम तो चलता ही रहा है। सत्ताओं में यही होता है। हमेशा एक सत्ता दूसरी सत्ता को निगलने के लिए यही करती है। सत्ताओं में कोई बाप, बेटा, भाई, बहन नहीं होता। मैंने पिछले दिनों कहा भी था कि अकृतज्ञता, एहसान फरामोशी सियासतदान की पहली निशानी होती है। तुम सियासत नहीं कर सकते हो जब तक तुम में एहसान फरामोशी ना आ जाए।
तुम्हारा आदर्श कोई महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी या औरंगजेब या अकबर नहीं है। यकीन करना तुम्हारे हिसाब से, इस्लाम के हिसाब से तुम्हारा आदर्श केवल और केवल एक ही हो सकता है- वो है मोहम्मद पैगंबर… और कोई नहीं। उसके बाद के लोग तुम्हारे लिए मोहब्बत करने के लिए हैं। तुम रूमी से मोहब्बत कर सकते हो। तुम मंसूर से मोहब्बत कर सकते हो। तुम निजामुद्दीन से मोहब्बत कर सकते हो। तुम गालिब से मोहब्बत कर सकते हो। तुम जिससे मन करे उससे मोहब्बत कर सकते हो। गांधी से मोहब्बत कर सकते हो- किसी से भी कर सकते हो। और जब तुम अपने प्रॉफिट, अपने पैगंबर के किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करोगे- मान लो आज से शुरू करोगे- एक साल बाद तुम देखोगे कि तुम्हारे दुश्मन कम हो गए हैं। इसलिए नहीं कि अब लोग तुमसे अदावत नहीं रखते, बल्कि इसलिए कि अब तुम्हें दूसरों की दुश्मनी से खौफ नहीं लगता है। अब तुम्हें अपने खुदा की जात पर इतना यकीन है कि वो तुम्हें हर मुसीबत से बचा लेगा। तुम्हारा डर तुम्हारे दुश्मन बढ़ाता चला जाता है और तुम्हारी हिम्मत तुम्हारे दुश्मनों को घटाती चली जाती है। याद रखना जिसके अंदर हिम्मत होगी उसके दुश्मन घटते चले जाएंगे। जिसके अंदर खौफ होगा उसके दुश्मन बढ़ते चले जाएंगे।
भारत, पाकिस्तान और इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या है कि एक लंबे समय से मुसलमानों को कुछ चंद मुसलमानों ने खौफजदा करके रखा है। डरा करके रखा है। जैसे उनके ऊपर बड़ी कयामत लगी हुई है। सारी दुनिया उनके खिलाफ नेजे (भाले) लेकर खड़ी है। तुम किसी कर्बला में नहीं खड़े हो- इसको अपने दिमाग में रख लेना। तुम एक अच्छी दुनिया में रहते हो। यकीनन ये दुनिया बहुत खराब है लेकिन वो फिर सिर्फ तुम्हारे लिए खराब नहीं है, वो फिर मेरे लिए भी खराब है। वो हर किसी के लिए खराब है। वायु प्रदूषण तुम्हारे लिए ही नहीं है मेरे लिए भी है। वातावरण में गर्मी बढ़ रही है तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी। महंगाई तुम्हारे लिए भी है और मेरे लिए भी। बीमारी तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी। दुनिया में जो कुछ खराब है वो सब हम में बंटा हुआ है। लेकिन साथ ही साथ इसके दुनिया में जो कुछ अच्छा है वो भी अभी हम में, तुम में बटा हुआ है। ये खत्म नहीं हुआ है भारत के अंदर।
यदि यहां का बहुसंख्यक औरंगजेब से नफरत करता है तो ये नहीं सोचो कि आज नफरत करता है। हम लोग उस समय स्कूल में पढ़ते थे। यहां मौजूद मुमताज भी स्कूल में पढ़ा हुआ है, बहार भाई भी स्कूल में पढ़े हुए हैं। हम लोग के स्कूल में भी औरंगजेब खराब ही बादशाह था। इतिहास में कभी अच्छा बादशाह नहीं बताया गया था। लेकिन उस जमाने में भी हम मोहम्मद रफी की तस्वीर अपने घर में लगाते थे। दिलीप कुमार की लगाते थे। मिर्जा गालिब के ऊपर ऐसे ही हिंदुस्तान फिदा था। मीर तकी मीर को खुदा-ए सुखन यही हिंदुस्तान कह रहा था। अमीर खुसरो के गाने गा करके यही हिंदुस्तान बड़ा हो रहा था। यह मत समझो कि इस देश का हिंदू मुसलमानों से नफरत करता है। लेकिन हां, यकीन करो कि हम में से जितने भी लोग हैं उन सबको जब एक समुदाय बनाकर, एक कम्युनिटी बनाकर रख दिया जाता है, तब हम अपने इतिहास की तरफ देखने लगते हैं। और, इतिहास में दंश होते हैं- चोट होती है- तकलीफें होती है। फिर हम औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर निकालने लगते हैं, ये एक समस्या होती है।
औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर ना निकले इसके लिए एक काम मुमताज को भी करना पड़ता है कि उसे अपना किरदार औरंगजेब के किरदार से जोड़कर नहीं दिखाना होता है। फिर उसे अपना किरदार किसी गालिब से, किसी मीर से, किसी खुसरो से… या फिर और ऊंचा उठ सके तो अपने पैगंबर से जोड़ के दिखाना पड़ता है। जिनके पास सबके लिए मोहब्बत थी। जिन्होंने यह कहा कि मेरा खुदा रहमतुल आलमीन है, मेरा खुदा पूरी दुनिया के लिए रहमत है। यह जबानी जमा खर्च नहीं है कि तुमने मुंह से बोल दिया? क्या तुम इस पर यकीन करते हो कि तुम्हारा खुदा पूरी दुनिया पर रहमत करता है… और यदि ऐसा करता है तो उसकी रहमत से ही तो सब होंगे- वो भी जो उसमें यकीन नहीं करते हैं।
एक पुरानी सूफियों की कहानी है। मूसा ने अल्लाह की तरफ देखा और कहा कोई हुक्म दो, जो मैं पूरा करता रहूं, बार-बार पूरा करता रहूं। अल्लाह ने कहा कुछ नहीं लोगों को खाना खिला देना। इतना किया करो वो सब जो मेरे बंदे हैं उनको तू खाना खिलाया कर। मूसा ने कहा ठीक है। मैं सबको बुलाऊंगा और खाना खिलाऊंगा। वह सबको बुलाते खाने के लिए। मूसा यहूदी थे। वो लोगों को बुलाते, प्रार्थना करने को कहते और फिर सबको भोजन देते। एक दिन एक बूढ़ा आया। उसने आकर के कहा- खाना दो। मूसा ने कहा कि ठीक है। आओ प्रार्थना करो और खाना खाओ। उसने कहा- नहीं, मैं तुम्हारे ईश्वर में यकीन नहीं करता हूं। मेरा यकीन तेरे खुदा में नहीं है। इस पर मूसा ने कहा कि तब तो तुम काफिर हो। तुम्हें कैसे मैं खाना दे दूं। मूसा ने उसे लौटा दिया। जब मूसा फिर गए तूर पर अल्लाह से बात करने के लिए। मूसा कलीमुल्लाह थे, कलाम करते थे। अल्लाह से बात करने के लिए गए। मूसा ने सवाल पूछा- अल्लाह ने कोई जवाब नहीं दिया। सिलसिला चलता रहा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। जब एक हफ्ते तक कोई जवाब ना आया तो मूसा को लगा कि लगता है मुझसे कोई गुनाह हो गया है। अब उन्होंने रोना शुरू किया। पुकारना शुरू किया। मेरी गलती माफ करो, मुझे बताओ क्या हुआ? तो फिर आवाज आई कि मैंने तुझे कहा था सबको खाना खिलाने के लिए, तूने नहीं खिलाया। तो उसने कहा कि मैंने तो सबको खिलाया। बस एक को नहीं खिलाया था जो तुझ में यकीन नहीं करता है। अल्लाह ने मूसा से कहा कि क्या मुझे नहीं पता कि वो मुझ में यकीन नहीं करता, लेकिन मैं तो उसे बरसों से खिला रहा हूँ। तूने ये ठेकेदारी कैसे ले ली। सवाल ये है।
दुनिया के सारे धर्म दरअसल इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने सबको अपनी तरफ बुलाया- सबको छांव देने की कोशिश की- सबको आश्रय देने की कोशिश की। और यही किरदार अगर किसी हिंदू में, किसी मुसलमान में, किसी सिख में या किसी ईसाई में पैदा हो जाता है तो लोग उसकी तरफ घूमते हैं। लोग उसकी इज्जत करते हैं। और फिर उसके सदके वो उसके दीन की, उसके मज़हब की भी इज़्ज़त करने लगते हैं। फिर यह रुकने वाला सिलसिला नहीं रह जाता है!!
-ओमा अक्
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में तम्बाकू सेवन का बढ़ता चलन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुक़सानदेह साबित हो रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी इस पर चिंता ज़ाहिर की है. तम्बाकू से संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल क़रीब 5 मिलियन लोगों की मौत हो रही है, जिनमें लगभग 1.5 मिलियन महिलाएं शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में 80 फ़ीसदी पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, लेकिन कुछ देशों की महिलाओं में तम्बाकू सेवन की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है. दुनियाभर के धूम्रपान करने वालों का क़रीब 10 फ़ीसदी भारत में हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में क़रीब 25 करोड़ लोग गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का आदि के ज़रिये तम्बाकू का सेवन करते हैं.
डब्ल्यूएचओ मुताबिक़ दुनिया के 125 देशों में तम्बाकू का उत्पादन होता है. दुनियाभर में हर साल 5.5 खरब सिगरेट का उत्पादन होता है और एक अरब से ज़्यादा लोग इसका सेवन करते हैं. भारत में 10 अरब सिगरेट का उत्पादन होता है. भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तम्बाकू की पैदावार होती है. भारत तम्बाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील,चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है. आंकड़ों के मुताबिक़ तम्बाकू से 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय हुई थी. विकासशील देशों में हर साल 8 हज़ार बच्चों की मौत अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है. दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले में भारत में तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. तम्बाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के मुताबिक़ भारत में तम्बाकू सेवन करने वालों की तादाद क़रीब साढ़े 29 करोड़ तक हो सकती है.
देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि शहरी क्षेत्र में केवल 0.5 फ़ीसदी महिलाएं धूम्रपान करती हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या दो फ़ीसदी है. आंकड़ों की मानें तो पूरे भारत में 10 फ़ीसदी महिलाएं विभिन्न रूपों में तंबाकू का सेवन कर रही हैं. शहरी क्षेत्रों की 6 फ़ीसदी महिलाएं और ग्रामीण इलाकों की 12 फ़ीसदी महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं. अगर पुरुषों की बात की जाए तो भारत में हर तीसरा पुरुष तम्बाकू का सेवन करता है.
डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ कई देशों में तम्बाकू सेवन के मामले में लड़कियों तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. हालांकि तम्बाकू सेवन के मामले में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ़ 20 फ़ीसद ही है. महिलाओं और लड़कियों में तम्बाकू के प्रति बढ़ रहे रुझान से गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. डब्लूएचओ में गैर-संचारी रोग की सहायक महानिदेशक डॉक्टर आला अलवन का कहना है कि तम्बाकू विज्ञापन महिलाओं और लड़कियों को ही ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं. इन नए विज्ञापनों में खूबसूरती और तंबाकू को मिला कर दिखाया जाता है, ताकि महिलाओं को गुमराह कर उन्हें उत्पाद इस्तेमाल करने के लिए उकसाया जा सके. बुल्गारिया, चिली, कोलंबिया, चेक गणराज्य, मेक्सिको और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के क़रीब 151 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़ लड़कियों में तंबाकू सेवन की प्रवृत्ति लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा बढ़ रही है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ तम्बाकू या सिगरेट का सेवन करने वालों को मुंह का कैंसर की होने की आशंका 50 गुना ज़्यादा होती है. तम्बाकू में 25 ऐसे तत्व होते हैं जो कैंसर का कारण बन सकते हैं. तम्बाकू के एक कैन में 60 सिगरेट के बराबर निकोटिन होता है. एक अध्ययन के अनुसार 91 प्रतिशत मुंह के कैंसर तम्बाकू से ही होते हैं. हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल और डॉ. बी सी राय का कहना है कि एक दिन में 20 सिगरेट पीने से महिलाओं में हार्ट अटैक का खतरा 6 गुना बढ़ जाता है. एक दिन में 20 सिगरेट पीने से पुरुषों में हार्ट अटैक का खतरा 3 गुना बढ़ जाता है. पहली बार हार्ट अटैक के लिए धूम्रपान 36 फ़ीसदी मरीज़ों में ज़िम्मेदार होता है. ऐसे हृदय रोगी जो लगातार धूम्रपान करते रहते हैं उनमें दूसरे हार्ट अटैक का ख़तरा ज़्यादा रहता है साथ अकस्मात मौत का ख़तरा भी बढ़ जाता है. बाई पास सर्जरी के बाद लगातार धूम्रपान करते रहने से मृत्यु, हृदय संबंधी बीमारी से मौत या फिर से बाईपास का ख़तरा ज़्यादा होता है. एंजियोप्लास्टी के बाद लगातार धूम्रपान करने से मौत और हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है. जिन मरीज़ों में हार्ट फंक्शनिंग 35 फ़ीसदी से कम हो, उनमें धूम्रपान से मौत का ख़तरा ज़्यादा होता है. जो लोग लगातार धूम्रपान करते रहते हैं, उनमें हो सकता है कि ब्लड प्रेशर की दवाएं असर न करें.
तम्बाकू से होने वाले नुक़सान को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक प्रस्ताव द्वारा 7 अप्रैल 1988 से विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया था. इसके बाद साल 1988 में हर साल की 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया और तभी से 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाने लगा. इस दिन विभिन्न कार्यक्रम कर लोगों को तम्बाकू से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नुक़सान के बारे में बताया जाता है. हालांकि भारत में भी सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी है, लेकिन लचर क़ानून व्यवस्था के चलते इस पर कोई अमल नहीं हो पा रहा है. लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते हुए देखा जा सकता है. भारत में आर्थिक मामलों की संसदीय समिति पहले ही राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम को मंज़ूरी दे चुकी है. इसका मक़सद तम्बाकू नियंत्रण क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन और तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों तक जागरूकता फैलाना है. इसके लिए 11वीं योजना में कुल वित्तीय परिव्यय 182 करोड़ रुपये रखा गया है. इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण देश शामिल है, जबकि शुरुआती चरण में 21 राज्यों के 42 ज़िलों पर ध्यान केन्द्रित किए गए हैं.
ख़ास बात यह भी है कि एक तरफ़ जहां जनता महंगाई से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ़ गुटखे आदि की क़ीमतों पर कोई असर नहीं पड़ा है. इतना ही नहीं देश में तम्बाकू से संबंधित उत्पादों के विज्ञापन पर पाबंदी के बावजूद टीवी और अखबारों आदि के ज़रिये इनका प्रचार-प्रसार बदस्तूर जारी है. ऐसे में सरकार की तम्बाकू रोधी मुहिम का क्या हश्र होगा, सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
बहरहाल, तम्बाकू से होने वाली मौतों को रोकने के लिए प्रशासनिक तौर पर सुधार करने की ज़रूरत है. सरकार को जागरूकता अभियानों को बढ़ावा देना होगा और नियमों की अवहेलना करने वालों के साथ सख्ती बरतनी होगी.
31 मई 2012
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व में बहुत बड़ा अंतर है. वर्ष
1951 की जनगणना के अनुसार भारत में हिंदू आबादी 306 मिलियन (84.1प्रतिशत) थी, जबकि मुस्लिम आबादी 35.4 मिलियन (9.49 प्रतिशत) थी. वर्तमान में, भारत की अनुमानित आबादी 1.40 बिलियन है, जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग 183 मिलियन यानी 14.2 प्रतिशत है. वर्ष 1952 और 2024 के बीच लोकसभा में कुल 9584 सदस्य चुने गए, जिनमें 545 मुस्लिम सांसद शामिल हैं. यह कुल सदस्यों का लगभग 6.6 प्रतिशत है, जो भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के लगभग 14.2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व से काफ़ी कम है.
ये आंकड़े बताते हैं कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, वहीं लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व घट रहा है, जो एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाता है. वर्ष 1952 में पहले लोकसभा चुनावों में 25 मुस्लिम सदस्य थे, जो कुल का 5.11 प्रतिशत थे. वर्ष 1980 के चुनावों तक यह संख्या बढ़कर 49 हो गई थी, जो 1952 के बाद सबसे ज़्यादा थी. हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में चुने गए मुस्लिम सांसदों की संख्या घटकर सिर्फ़ 24 रह गई है, जो कुल का 4.42 प्रतिशत है, जो कुल आबादी में उनके अनुमानित 14.2 प्रतिशत हिस्से से बहुत कम है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होने के बावजूद लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है.
अल्पसंख्यक-मुक्त एनडीए एक विरोधाभास
11 दिसम्बर 2025 को प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में 4131 विधायक हैं, और भारतीय संसद की लोकसभा में 543 सांसद और राज्यसभा में 245 सांसद हैं यानी कुल 788 सांसद हैं. बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता में है. एनडीए गठबंधन में वर्तमान में लोकसभा में 293 सदस्य हैं और इस गठबंधन में कोई भी अल्पसंख्यक समूह शामिल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों ने बार-बार और ज़ोर देकर 'कांग्रेस-मुक्त भारत' की वकालत की है, और एनडीए गठबंधन लोकसभा में 'अल्पसंख्यक-मुक्त' हो गया है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है. ऐसे राज्य में अल्पसंख्यकों के बिना सत्ताधारी गठबंधन न केवल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक विरोधाभास है, बल्कि संविधान की भावना के भी ख़िलाफ़ है.
भारत की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 1.40 अरब है. इस जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 183 मिलियन (14.2 प्रतिशत) है. भारत में अल्पसंख्यक आबादी में 14.2 प्रतिशत, मुस्लिम 2.31 प्रतिशत, ईसाई और सिख 1.72 प्रतिशत हैं. इसका मतलब है कि इन तीन अल्पसंख्यक धर्मों के अनुयायी भारत की कुल आबादी का 28 प्रतिशत हैं, जिनका (एक ईसाई, किरेन रिजिजू को छोड़कर) एनडीए गठबंधन में प्रतिनिधित्व नहीं है. इंडिया (INDIA) गठबंधन, जिसके लोकसभा में 235 सांसद हैं, में कुल 543 लोकसभा सांसदों में से 7.9 मुस्लिम सांसद, 5 सिख सांसद और 3.5 प्रतिशत ईसाई सांसद शामिल हैं. इसमें केवल एक मुस्लिम महिला इकरा चौधरी शामिल हैं, जबकि मुस्लिम महिलाओं की अनुमानित आबादी लगभग 9 से 10 करोड़ है. लोकसभा में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में असदुद्दीन ओवैसी, यूसुफ़ पठान, शेख़ अब्दुल राशिद और इकरा चौधरी शामिल हैं.
कांग्रेस पार्टी: क्या मुस्लिम लीग है?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तुलना मुस्लिम लीग से की जा सकती है? भारतीय जनता पार्टी भी बार-बार यह प्रचार करती है कि कांग्रेस 'हिंदू-विरोधी' और 'मुस्लिम-समर्थक' या 'मुस्लिम लीग' है, और मुसलमानों के प्रति 'तुष्टीकरण' की नीति अपना रही है। हालांकि, जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 99 सांसदों में से केवल 7 सांसद मुस्लिम हैं (कुल सांसदों का केवल 7 प्रतिशत). कांग्रेस को 'मुस्लिम लीग' कहना और उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाना सच्चाई, तथ्यों और आंकड़ों से बहुत दूर है.
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तुलना मुस्लिम लीग से की जा सकती है? भारतीय जनता पार्टी भी बार-बार यह प्रचार करती है कि कांग्रेस 'हिंदू-विरोधी' और 'मुस्लिम-समर्थक' या 'मुस्लिम लीग' है, और मुसलमानों के प्रति 'तुष्टीकरण' की नीति अपना रही है। हालांकि, जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 99 सांसदों में से केवल 7 सांसद मुस्लिम हैं (कुल सांसदों का केवल 7 प्रतिशत). कांग्रेस को 'मुस्लिम लीग' कहना और उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाना सच्चाई, तथ्यों और आंकड़ों से बहुत दूर है.
राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व: एक बड़ा अंतर
2021 में चार राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु - और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 824 विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ़ 112 मुस्लिम थे. यह प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, जिसके हिसाब से आदर्श रूप से लगभग 192 से 200 मुस्लिम विधायक होने चाहिए थे. असल में, हाल के चुनावों में असम, में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है, खासकर इसलिए क्योंकि पहले चुनावों के बाद यह पहली बार हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के जुड़ाव की वजह से शायद उन्हें वोटर्स ने नकार दिया.
2021 में चार राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु - और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 824 विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ़ 112 मुस्लिम थे. यह प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, जिसके हिसाब से आदर्श रूप से लगभग 192 से 200 मुस्लिम विधायक होने चाहिए थे. असल में, हाल के चुनावों में असम, में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है, खासकर इसलिए क्योंकि पहले चुनावों के बाद यह पहली बार हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के जुड़ाव की वजह से शायद उन्हें वोटर्स ने नकार दिया.
प्रतिनिधित्व में यह असंतुलन दूसरे राज्यों में भी साफ दिखता है. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत है, फिर भी वहाँ सिर्फ़ 44 मुस्लिम विधायक हैं. केरल में मुसलमानों की आबादी 32 प्रतिशत है, जबकि 140 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ़ 32 मुस्लिम विधायक हैं. तमिलनाडु में 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद, सिर्फ़ सात मुस्लिम विधायक हैं. केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में, सिर्फ़ एक मुस्लिम चुना गया. फ़रवरी 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में, 70 सदस्यों में से सिर्फ़ चार मुस्लिम विधायक (आम आदमी पार्टी) चुने गए. इसी तरह नवम्बर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में कुल आबादी का 16.3 प्रतिशत मुस्लिम होने के बावजूद कुल 243 सदस्यों में से सिर्फ़ 11 मुस्लिम विधायक चुने गए. ख़ास बात यह है कि इन दोनों विधानसभाओं—दिल्ली और बिहार—में बीजेपी का एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है. हैरानी की बात यह है कि 2025 के आख़िर तक बीजेपी का भारत में किसी भी राज्य विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना.
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के मुख्य कारण
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के कई कारण हैं। हिंदू सांप्रदायिकता से प्रेरित सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण एक बड़ी भूमिका निभाता है. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनावी प्रणाली बहुमत का पक्ष लेती है, जिससे अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो जाता है. चुनौतियों में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों की कमी, निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन के कारण मुस्लिम मतदाताओं का कम प्रभाव, और राजनीतिक दलों की मुस्लिम उम्मीदवारों को नामांकित करने में अनिच्छा शामिल है. इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय का भौगोलिक फैलाव प्रभावी समुदाय-आधारित पार्टियों के गठन में बाधा डालता है. विभाजन जैसी ऐतिहासिक विरासत ने भी कुछ मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान की समस्या और भी जटिल हो गई है.
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के कई कारण हैं। हिंदू सांप्रदायिकता से प्रेरित सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण एक बड़ी भूमिका निभाता है. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनावी प्रणाली बहुमत का पक्ष लेती है, जिससे अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो जाता है. चुनौतियों में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों की कमी, निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन के कारण मुस्लिम मतदाताओं का कम प्रभाव, और राजनीतिक दलों की मुस्लिम उम्मीदवारों को नामांकित करने में अनिच्छा शामिल है. इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय का भौगोलिक फैलाव प्रभावी समुदाय-आधारित पार्टियों के गठन में बाधा डालता है. विभाजन जैसी ऐतिहासिक विरासत ने भी कुछ मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान की समस्या और भी जटिल हो गई है.
मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने हेतु सुझाव
भारतीय विधायिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए, कई सुझावों पर विचार किया जा सकता है। भारतीय मुसलमान या तो अपनी खुद की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं जो उनके हितों पर ध्यान केंद्रित करे, या नीति निर्माण में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए मौजूदा धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में शामिल हो सकते हैं. मुसलमानों के बीच सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा देना ज़रूरी है, जबकि धर्मनिरपेक्ष नेताओं और मीडिया को विभाजनकारी सांप्रदायिक विचारधाराओं को चुनौती देने के लिए काम करना चाहिए.
हिंदुओं और मुसलमानों को भारतीय संविधान में बताए गए धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को समझने और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए सतर्क रहने की ज़रूरत है. मुसलमानों को फ़ैसले प्रभावित करने के लिए सभी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना चाहिए, न कि सिर्फ निष्क्रिय भूमिका निभाना चाहिए. मुसलमानों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल करने और उनकी खास चिंताओं को दूर करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए.
इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं को राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना भी महत्वपूर्ण है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि समुदाय के भीतर अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व हो, कट्टरपंथियों के प्रभाव से बचना बहुत ज़रूरी है. अधिकारियों को नफ़रत फैलाने वाले भाषण, सांप्रदायिक हिंसा और भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर करने के किसी भी प्रयास के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए.आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू करने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि विधायिका मुस्लिम आबादी को सही ढंग से दर्शाए.
संक्षेप में भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए सभी समुदायों, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं, को शामिल करना ज़रूरी है. अंत: सिद्धांत सरल है: "जितनी जिसकी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी।
(लेखक हरियाणा के करनाल शहर स्थित दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल हैं)
राजेन्द्र सिंह
हम सभी को यह समझना होगा कि खनन से नष्ट हुए पहाड़ कभी पुनर्जीवित नहीं हो सकते। 20 नवंबर 2025 का उच्चतम न्यायालय का निर्णय अरावली पहाड़ों को खनन की छूट देकर उन्हें स्थायी रूप से नष्ट कर देगा, और उन्हें पहले जैसी स्थिति में लौटाना असंभव होगा। हम नदियों और तालाबों को तो पुनर्जीवित कर सकते हैं, उन्हें पहले जैसा बना सकते हैं, लेकिन पहाड़ों को किसी भी तरह से वैसा ही पुनर्निर्माण करना प्रकृति की शक्ति से परे है। मानव की मशीनों से प्रकृति को इस तरह नष्ट करना अंततः स्वयं मानव जाति का विनाश ही है। अपनी आंखों के सामने इस महाविस्फोट को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
अरावली के संरक्षण के लिए अभी तक कोई ठोस कानून नहीं बना है। अरावली पर उगने वाले जंगलों की रक्षा के लिए कानून तो बन गए, लेकिन मूल पहाड़ों को वैसा का वैसा बनाए रखने वाला कानून आज सबसे बड़ी जरूरत है। 7 मई 1992 में अरावली संरक्षण के लिए कानून बना था, लेकिन वह केवल अलवर-गुड़गांव क्षेत्र तक सीमित रह गया। बाद में पूरी अरावली के लिए उच्च और उच्चतम न्यायालय ने मजबूत निर्णय दिए थे। खनन माफिया इनके खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहे और आखिरकार 20 नवंबर 2025 को अपनी मनमानी करा ली।
यदि ऐसा होता रहा तो यह ठीक वैसे ही होगा जैसे किसी अच्छे व्यक्ति की सुरक्षा की अनदेखी कर दी जाए। जंगलों को बचाना है तो सबसे पहले पहाड़ों को बचाना जरूरी है। पहाड़ों की रक्षा के लिए कानून अब उच्चतम न्यायालय ही बनवाएगा। अब तक न्यायपालिका ने वन्यजीव संरक्षण कानूनों का सहारा लेकर खनन रोका था, लेकिन अब पहाड़ों के लिए अलग कानून की आवश्यकता है। आज न्यायपालिका औद्योगिक दबाव में आकर संवेदनशील क्षेत्रों में भी खनन की अनुमति दे रही है, अरावली में यही हुआ है। सम्माननीय न्यायपालिका ने विभागों की शक्तियों के अनुरूप निर्णय लेकर अरावली पहाड़ों के लिए पहाड़-विरोधी परिभाषा दे दी है। यह काम राजनेताओं, अधिकारियों और उद्योगपतियों के गठजोड़ ने करवाया है।
हम इस परिभाषा को उचित नहीं मानते और हर जगह पहाड़ की आवाज बन रहे हैं, लेकिन सुनने वाले मौन हैं। न्यायपालिका ने जिन्हें जिम्मेदारी सौंपी है, वे पर्यावरण, जलवायु और वनों के रक्षक हैं, पहाड़ों के नहीं। इसलिए वे सभी प्रसन्न हैं। यहां तो ‘बाढ़ ही खेत को खा रही है’ वाली स्थिति है। पहले जंगल काटे जाएंगे, तो 20 नवंबर के निर्णय के आधार पर अधिकारी, नेता और व्यापारी का गठजोड़ पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। ऐसे में वन और वन्यजीव संरक्षण कानून कुछ नहीं बचा पाएंगे। वन्यजीवों और पर्वतों को नष्ट करने वाले पोषित होते रहेंगे। अरावली के विनाश में ‘चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का’ वाली कहावत पूरी तरह लागू हो जाएगी। अब सब कुछ जलवायु परिवर्तन और वन विभाग के हाथों में आ गया हैकृबचाने वाले को ही नष्ट करने का अधिकार दे दिया गया है।
इसलिए सम्माननीय उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णय पर शीघ्र पुनर्विचार करके अपना सम्मान बढ़ाना चाहिए। हमें अपनी न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। उस विश्वास को बनाए रखने का अब उपयुक्त समय है, और हमें विश्वास है कि उच्चतम न्यायालय ऐसा जरूर करेगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो विश्व स्तर पर हमारी न्यायपालिका को आघात पहुंच सकता है। हम जानते हैं कि हमारी न्यायपालिका ने हमेशा विश्व में न्याय का गौरव बढ़ाया है। पुरातन विरासत अरावली को बचाने में भी वह ऐसा ही करेगी। हमारी संस्कृति और प्रकृति दोनों में अरावली निहित है। न्यायालय और सरकार मिलकर इसे जरूर बचाएंगी। सरकार ने विश्व स्तर पर अरावली रक्षा की घोषणाएं की हैं। अरावली बचाना सरकार की जिम्मेदारी और जनता का कर्तव्य है। लोकतंत्र में जन दबाव से ही सरकारी प्रयास शुरू होते हैं।
हम सभी अरावली बचाने के लिए अपना कर्तव्य मानकर एकजुट हो जाएं। पहाड़ों की रक्षा के लिए कानून बनवाएं। सबसे पहले उच्चतम न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर करें। अरावली साक्षरता अभियान चलाएं, विद्यार्थियों, शिक्षकों और किसानों को चेतना यात्राओं से जोड़ें। भूगर्भ विशेषज्ञ आगे आएं और न्यायालय तथा सरकार को अरावली की सच्ची परिभाषा समझाएं। खनन स्थलों पर रामायण पाठ, पर्यावरण यज्ञ, सत्याग्रह, मार्च, धरना, उपवास जैसे अहिंसक तरीके अपनाएं। ‘अरावली विरासत जन अभियान’ को तेज करें। यह अभियान दलगत राजनीति से ऊपर है। कोई राजनीतिक दल इसे प्रभावित न करे, केवल सहयोग करें। सहयोग करने वाले सभी दलों का अभियान स्वागत और सम्मान करेगा।
यह अभियान सामूहिक नेतृत्व में सभी को बराबर अवसर देता है। इसे मजबूत बनाने के लिए सभी बराबर प्रयास करेंकृलेखन, सामाजिक कार्य, शिक्षण, परिसंवाद और श्रृंखला आयोजन से। प्रकृति प्रदत्त विरासत बचाते समय लाभ-हानि न देखें, केवल शुभ देखें। शुभ सभी के लिए समान हितकारी है। इसका अर्थ है सदैव नित्य प्राकृतिक नूतन निर्माण की प्रक्रिया, जहां कुछ भी नष्ट नहीं होता। प्रकृति और पहाड़ ही निरंतर निर्माण करते रहते हैं।
अरावली में खनन न होने से यह पर्वत श्रृंखला अन्न, जल, चारा, ईंधन और जलवायु सुरक्षा प्रदान करती रहेगी। खनन केवल कुछ लोगों के लाभ के लिए है, जो सभी के शुभ निर्माण को रोक देगा। यह पंचमहाभूतों की निर्माण शक्ति को नष्ट कर सकता है। इसलिए हम सभी भारतीय आस्था और पर्यावरण रक्षा के लिए एकजुट हो जाएं। यह भगवान का काम है। इसकी अनदेखी सृष्टि और जीवन को चुनौतियां देगी। अगली पीढ़ी हमें क्षमा नहीं करेगीकृवे कहेंगी कि पुरखों से मिले पहाड़ और पानी आपने हमारे लिए नहीं बचाए, अपनी आंखों के सामने सब नष्ट करा दिया।
हमारी कहावत है कि जैसा मिला, वैसा ही अगली पीढ़ी को सौंपकर मोक्ष की ओर जाना चाहिए। पुरखों की विरासत नष्ट होते देख चुप रहना पाप है। अरावली विरासत जन अभियान शुभ के लिए है, खनन लाभ के लिए। शुभ सनातन है, लाभ क्षणिक। इस चिंता को छोड़ शुभ कार्य में सभी को जोड़ें। अपनी रुचि, क्षमता और दक्षता के अनुसार इसमें योगदान दें। यदि अब नहीं किया तो अगली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।
80-90 के दशक में भी अरावली की बेटे-बेटियों ने इसे बचाया था। अब फिर एकजुट होकर बचाएं। सभी अपनी योग्यता से आज से ही लग जाएं। अरावली हमारी विरासत है, इसे बचाना कर्तव्य। खनन के बाद अरावली पहले जैसी नहीं बन सकती। यह भारत की विरासत है, इसे वैसा ही बनाए रखें। अरावली के बेटे-बेटियां संगठित होकर इसे नष्ट न होने दें। विरासत बचाना हमारा और राज्य का संवैधानिक कर्तव्य व अधिकार है। संविधान प्रदत्त शक्तियों से उच्चतम न्यायालय से प्रार्थना है कि निर्णय पर पुनर्विचार कर भारत की पुरातन विरासत अरावली को बचाएं।
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस है। हर साल 11 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2003 में यह दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य पर्वतों के महत्व, संरक्षण और पर्वतीय समुदायों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। पर्वत पेयजल, जैव विविधता, औषधियों, भोजन और लकड़ी आदि के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन की वजह से इनका वजूद ख़तरे में पड़ गया है। इसलिए आज इन्हें संरक्षण की बेहद ज़रूरत है।
अरावली पर्वत श्रृंखलाओं का अस्तित्व ख़तरे में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में खनन कार्य पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन न्यायालय द्वारा अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दिए जाने से प्रयावरणविदों की चिन्ता बढ़ है। उनका कहना है कि अगर वक़्त रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अरावली पहाड़ों की जगह सिर्फ़ मरूस्थल ही नज़र आएगा। ग़ौरतलब है कि यह गुजरात के हिम्मत नगर से राजधानी दिल्ली तक 560 किलोमीटर लम्बी विश्व की सर्वाधिक पुरानी पर्वत श्रृंखला है, जिसकी चौड़ाई दस से 100 किलोमीटर तक है। सर्वाधिक ऊंचाई 1723 मीटर राजस्थान के माउंट आबू में है। पहाड़ियों में अकूत खनिज भंडार और क़ीमती पत्थरों का ख़ज़ाना है। खनन से हरियाणा और राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को बहुत नुक़सान पहुंचा है।
क़ाबिले-ग़ौर है कि विगत 20 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दी है। इसके तहत अरावली के अंदर किसी भी भू-आकृति में स्थानीय राहत से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई होनी चाहिए, जिसमें इसकी ढलान और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत उन सिफ़ारिशों को मंज़ूर कर लिया, जिनमें उत्तर-पश्चिम भारत में 692 किलोमीटर की सीमा को परिभाषित करने की नई परिभाषा को मानकीकृत करने की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि भारतीय वन सर्वेक्षण के एक आकलन के मुताबिक़ 12,081 मानचित्र की गई पहाड़ियों में से सिर्फ़ 1048 ही 8.7 मापदंड को पूरा करती हैं, यानी 100 मीटर के मापदंड को पूरा करती हैं। इन नये मानदंडों के तहत अरावली पर्वत श्रृंखला का तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अपने क़ानूनी संरक्षण से बेदख़ल हो जाएगा।
ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
न्यायालय ने नब्बे के दशक से अरावली पर्वत क्षेत्र में अवैध खनन पर बार-बार रोक लगाई है। क़ाबिले-ग़ौर है कि 21 दिसम्बर 1992 को केंद्र सरकार के नोटिफ़िकेशन और 12 दिसम्बर 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद पूरे अरावली पहाड़ी क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 18 मार्च 2004 को आदेश दिए थे कि अरावली श्रृंखला में किसी प्रकार से हरियाली को नष्ट नहीं किया जा सकता। इस आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ी में लगे पौधों को भी वन संरक्षित क्षेत्र मानते हुए वन क्षेत्र की परिभाषा तय की थी। इसके लिए गठित की गई सेंट्रल इंपॉवर्ड कमेटी को अनेक अधिकार सौंपते हुए पेड़ों की अवैध कटाई और खनन को रोकने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस कमेटी ने भी 7 जून 2007, 12 सितम्बर 2007 और 7 दिसम्बर 2007 को जारी आदेश में पेड़ों की कटाई नहीं होने देने के सख़्त निर्देश दिए थे। कमेटी ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ ख़ास जगहों को छोड़कर इस समूची पर्वत श्रृंखला के आसपास खुदाई पर पूरी तरह रोक लगाने और संरक्षित क्षेत्रों में बनाई गई इमारतों को गिराने की सिफ़ारिश की थी। यह क्षेत्र हरियाणा भूमि एक्ट की धारा 4-5 के तहत भी आता था। इसलिए इस ज़मीन को किसी भी प्रकार का नुक़सान पहुंचाना पर्यावरण नियमों की अवहेलना करना है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2002 को हरियाणा सरकार को निर्देश जारी कर कहा था कि गुड़गांव और फ़रीदाबाद में खनन कार्य से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ असंतुलित भी हो रहा है, इसलिए दोनों ज़िलों में तुरंत प्रभाव से खनन कार्य बंद कराया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रदेश सरकार ने कार्रवाई करते हुए एक टीम का गठन किया और खनन कार्य बंद करवा दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद खनन माफ़िया अरावली श्रृंखलाओं में सक्रिय हो गया और फिर से ब्लास्टिंग के माध्यम से खनन कार्य किया जाने लगा। अवैध खनन का मामला जब मीडिया ने उठाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए फिर से खनन कार्य बंद कराने के निर्देश दिए। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रदेश सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए बाक़ायदा एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी में पुलिस विभाग, पंचायत विभाग, राजस्व विभाग व खनन विभाग के अधिकारियों को शामिल किया गया था। यह भी सुनिश्चित किया गया था कि अवैध खनन रोकने के लिए कमेटी नियमित रूप से अपने-अपने क्षेत्रों की पर्वत श्रृंखलाओं में जाकर अवैध खनन को पूरी तरह बंद कराए। अवैध खनन की शिकायतें मिलने पर वन मंडल अधिकारी सतबीर सिंह दहिया ने फ़रीदाबाद ज़िले के खेड़ी कलां गांव में छापा मारा था और स्थानीय अधिकारियों को सख़्ती से अवैध खनन पर रोक लगाने की हिदायत दी गई थी। उस वक़्त वन क्षेत्र से दूर खनन की इजाज़त लेकर वन्य इलाके की भी खुदाई की जा रही थी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में व्यावसायिक व निर्माण गतिविधियों का तेज़ी से प्रसार का सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा अरावली पहाड़ियों का भुगतना पड़ रहा है। गुड़गांव, मानेसर और फ़रीदाबाद इलाके़ में पत्थरों के लिए अंधाधुंध खनन किया गया था।
पर्यावरणविद् और वाटर मैन नाम से विख्यात हाजी इब्राहिम ख़ान का कहना है कि अरावली पर्वत के विषय में मंज़ूर किए गये नये मानदंडों की वजह से इसका वजूद ख़तरे में पड़ जाएगा। अरावली की पहाड़ियां बारिश, सूखा और बाढ़ को नियंत्रित करती हैं, लेकिन ज़्यादा ऊंची न होने की वजह से इनका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे इसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया है। अरावली के जंगल तबाह होने से यहां रहने वाले वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। आबादी की तरफ़ आने पर ये जानवर अकसर दुर्घटना का भी शिकार होते रहते हैं। कई बार तो बस्ती के लोग वन विभाग के अधिकारियों की मदद से जानवरों को जंगल में छोड़ आते हैं। पहले यहां शेर, चीते, हिरण, भेड़िये, नील गाय, गीदड़, जंगली बिल्ले, ख़रगोश, सांप, नेवले, मोर, तीतर आदि बड़ी तादाद में थे, लेकिन अब ये लुप्त होते जा रहे हैं।
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है- “गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक फैली अरावली पर्वतमाला ने लम्बे समय से भारतीय भूगोल और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार ने अवैध खनन से पहले ही बर्बाद हो चुकी इन पहाड़ियों के लिए अब लगभग 'डेथ वारंट' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सरकार ने घोषणा की है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली कोई भी पहाड़ी खनन के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। यह फ़ैसला अवैध खननकर्ताओं और माफ़ियाओं के लिए खुला निमंत्रण है कि वे इस श्रृंखला के उस 90 प्रतिशत हिस्से का भी सफ़ाया कर दें, जो सरकार द्वारा निर्धारित ऊंचाई सीमा से नीचे आता है।“
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है- "यह अजीब है और इसके पर्यावरण और पब्लिक हेल्थ पर बहुत गंभीर नतीजे होंगे। इसकी तुरंत समीक्षा की ज़रूरत है।"
बहरहाल, अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को बचाने की ज़रूरत है। साथ ही सरकारों को भी गंभीरता बरतनी होगी, ताकि इनका वजूद क़ायम रहे।
मोहम्मद रफीक चौहान
भारत में मुस्लिम समुदाय के पिछड़ने के कारण जटिल और बहुआयामी हैं। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और ऐतिहासिक कारकों के संयोजन से इस स्थिति को समझा जा सकता है। नीचे कुछ प्रमुख कारणों का उल्लेख किया गया है, जो संक्षिप्त और तथ्यपरक हैं:
1. शैक्षिक अवसरों की कमी: मुस्लिम समुदाय में शिक्षा का प्रसार अन्य समुदायों की तुलना में कम रहा है। सच्चर समिति की रिपोर्ट (2006) के अनुसार, मुस्लिमों में साक्षरता दर और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की दर राष्ट्रीय औसत से कम है। सरकारी स्कूलों तक पहुंच, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, और आर्थिक तंगी इसके प्रमुख कारण हैं।
2. आर्थिक असमानता: मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा निम्न-आय वाले व्यवसायों, जैसे छोटे व्यापार, कारीगरी, या असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है। उच्च-स्तरीय नौकरियों और उद्यमिता में उनकी भागीदारी सीमित रही है, जिसके कारण आर्थिक प्रगति बाधित होती है।
3. सामाजिक भेदभाव और अलगाव: कुछ क्षेत्रों में सामाजिक और भौगोलिक अलगाव (गेटोकरण) के कारण मुस्लिम समुदाय मुख्यधारा के अवसरों से वंचित रह जाता है। भेदभावपूर्ण रवैये, विशेषकर नौकरियों और आवास में, उनकी प्रगति को प्रभावित करते हैं।
4. राजनीतिक और नीतिगत उपेक्षा: मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष रूप से लक्षित कल्याणकारी योजनाओं का अभाव रहा है। सकारात्मक नीतियों, जैसे आरक्षण या समावेशी विकास कार्यक्रम, में उनकी भागीदारी सीमित रही है।
5. सांस्कृतिक और धार्मिक कारक: कुछ मामलों में, रूढ़िवादी सामाजिक प्रथाएं, जैसे बाल विवाह या लड़कियों की शिक्षा पर कम ध्यान, प्रगति में बाधा बनती हैं। हालांकि, यह सभी मुस्लिम समुदायों पर लागू नहीं होता।
6. ऐतिहासिक संदर्भ: विभाजन और उसके बाद के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य ने मुस्लिम समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला। कई शिक्षित और समृद्ध मुस्लिम परिवारों का पलायन हुआ, जिससे भारत में बचे समुदाय को नेतृत्व और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ा।
वर्तमान स्थिति: हाल के वर्षों में, कुछ क्षेत्रों में प्रगति दिख रही है, जैसे उच्च शिक्षा में बढ़ती भागीदारी और उद्यमिता में वृद्धि। सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रम, जैसे स्कॉलरशिप योजनाएं और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम, भी मदद कर रहे हैं। फिर भी, संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।
नोट: यह विश्लेषण सामान्यीकृत है और सभी मुस्लिम समुदायों पर एकसमान लागू नहीं होता, क्योंकि भारत में मुस्लिम आबादी विविध और क्षेत्रीय रूप से भिन्न है।
सच्चर समिति रिपोर्ट पर विस्तार
सच्चर समिति की रिपोर्ट, जिसका पूरा नाम "प्रधानमंत्री की उच्च स्तरीय समिति की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर रिपोर्ट" है, भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति का आकलन करने के लिए 2005 में गठित एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस समिति का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में हुआ था, और इसका नेतृत्व जस्टिस (सेवानिवृत्त) रजिंदर सच्चर ने किया। इसका उद्देश्य भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करना और उनकी प्रगति में आने वाली बाधाओं को समझना था। 2006 में प्रस्तुत इस रिपोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया और नीतिगत सुधारों के लिए सिफारिशें कीं। नीचे इसके प्रमुख बिंदुओं और निष्कर्षों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
सच्चर समिति के गठन का उद्देश्य
- भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का व्यापक विश्लेषण करना।
- अन्य सामाजिक-आर्थिक समूहों, जैसे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), के साथ उनकी स्थिति की तुलना करना।
- सरकारी योजनाओं और नीतियों में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी का मूल्यांकन करना।
- समुदाय के विकास के लिए नीतिगत सुझाव देना।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
1. शैक्षिक स्थिति:
- मुस्लिम समुदाय में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत (लगभग 65% उस समय) से कम थी, जो 59.1% थी।
- उच्च शिक्षा (स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर) में मुस्लिमों की भागीदारी बहुत कम थी। केवल 3.6% मुस्लिम 20 वर्ष से अधिक आयु के लोग स्नातक थे, जबकि राष्ट्रीय औसत 7% था।
- मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा में विशेष रूप से कमी थी, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
- तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में उनकी भागीदारी भी नगण्य थी।
2. आर्थिक स्थिति:
- मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत था, जैसे छोटे व्यापार, कारीगरी, और मजदूरी।
- उनकी औसत आय राष्ट्रीय औसत से कम थी, और गरीबी का स्तर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के समान या उससे भी अधिक था।
- सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की हिस्सेदारी उनकी आबादी (लगभग 13.4% उस समय) के अनुपात में बहुत कम थी।
उदाहरण के लिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में उनकी हिस्सेदारी केवल 3% थी।
3. सामाजिक स्थिति:
- मुस्लिम समुदाय कई क्षेत्रों में सामाजिक और भौगोलिक अलगाव का सामना करता था। वे अक्सर विशिष्ट क्षेत्रों या "गेटो" में रहते थे, जहां बुनियादी सुविधाएं (जैसे स्कूल, अस्पताल, और सड़कें) सीमित थीं।
- भेदभावपूर्ण व्यवहार, जैसे नौकरियों और आवास में अस्वीकृति, की शिकायतें आम थीं।
- सामाजिक गतिशीलता (सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार) अन्य समुदायों की तुलना में कम थी।
4. सरकारी योजनाओं में भागीदारी:
- गरीबी उन्मूलन और कल्याणकारी योजनाओं में मुस्लिमों की पहुंच और भागीदारी सीमित थी।
- वित्तीय समावेशन, जैसे बैंक ऋण और क्रेडिट सुविधाओं तक उनकी पहुंच कम थी, जिससे उद्यमिता और व्यवसाय शुरू करने में बाधा आती थी।
5. स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं:
- मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता, और पीने का पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं अपर्याप्त थीं।
- शिशु मृत्यु दर और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच राष्ट्रीय औसत से खराब थी।
सिफारिशें
सच्चर समिति ने मुस्लिम समुदाय के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें शामिल हैं:
1. शैक्षिक सुधार:
- मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना।
- लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन।
- तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्यक्रम।
2. आर्थिक सशक्तिकरण:
- सुक्ष्म-वित्त और ऋण सुविधाओं तक बेहतर पहुंच।
- कौशल विकास और उद्यमिता प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समावेश।
3. सामाजिक समावेशन:
- भेदभाव को कम करने के लिए जागरूकता अभियान और कानूनी उपाय।
- मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का विकास।
4. संस्थागत सुधार:
- समान अवसर आयोग (Equal Opportunity Commission) की स्थापना।
- सरकारी नौकरियों और नीति निर्माण में मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ाने के लिए डेटा संग्रह और निगरानी तंत्र।
5. विशेष योजनाएं:
- मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए लक्षित विकास योजनाएं।
- अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की योजनाओं को और प्रभावी बनाने के लिए संसाधन आवंटन।
प्रभाव और कार्यान्वयन
- सकारात्मक प्रभाव:
- सच्चर समिति की रिपोर्ट ने मुस्लिम समुदाय की स्थिति पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया और नीतिगत ध्यान आकर्षित किया।
- इसके बाद कई योजनाएं शुरू की गईं, जैसे अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति, मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन के तहत सहायता, और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के लिए मल्टी-सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (MsDP)।
- कुछ राज्यों में शिक्षा और रोजगार में प्रगति दिखी।
- सीमाएं और चुनौतियां
- कई सिफारिशों का पूर्ण कार्यान्वयन नहीं हुआ, विशेषकर समान अवसर आयोग जैसे संस्थागत सुधार।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नौकरशाही बाधाओं ने कुछ योजनाओं को प्रभावित किया।
- सामाजिक और आर्थिक असमानता को पूरी तरह दूर करने के लिए दीर्घकालिक और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता थी, जो अपर्याप्त रहे।
वर्तमान प्रासंगिकता
- सच्चर समिति की रिपोर्ट आज भी भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु है।
- हाल के वर्षों में, कुछ क्षेत्रों में प्रगति हुई है, जैसे उच्च शिक्षा में बढ़ती भागीदारी और डिजिटल समावेशन। हालांकि, गरीबी, बेरोजगारी, और सामाजिक भेदभाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
- नीतिगत स्तर पर, अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं और स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने कुछ हद तक मदद की है, लेकिन संरचनात्मक असमानताओं को पूरी तरह खत्म करने के लिए और अधिक समन्वित प्रयासों की जरूरत है।
सिफारिशों का कार्यान्वयन
सच्चर समिति की रिपोर्ट (2006) ने भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। इन सिफारिशों के कार्यान्वयन की प्रगति और चुनौतियों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
प्रमुख सिफारिशें और उनका कार्यान्वयन
1. शैक्षिक सुधार
- सिफारिश: मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना, लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष छात्रवृत्तियाँ, और तकनीकी/व्यावसायिक शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्यक्रम।
- कार्यान्वयन
- छात्रवृत्ति योजनाएं: केंद्र और राज्य सरकारों ने अल्पसंख्यक समुदायों (विशेषकर मुस्लिमों) के लिए प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक, और मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप योजनाएं शुरू कीं। इन योजनाओं ने लाखों मुस्लिम छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने में मदद की।
उदाहरण के लिए, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की 2020-21 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 60 लाख से अधिक छात्रों को इन योजनाओं का लाभ मिला।
- मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन: इसने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए, जैसे बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति।
- मदरसा आधुनिकीकरण: सरकार ने SPQEM (Scheme for Providing Quality Education in Madrasas) शुरू किया, जिसके तहत मदरसों में आधुनिक विषयों जैसे गणित, विज्ञान, और अंग्रेजी को शामिल किया गया। हालांकि, इसकी पहुंच सीमित रही।
- प्रगति: साक्षरता दर और उच्च शिक्षा में मुस्लिमों की भागीदारी में सुधार हुआ।
उदाहरण के लिए, 2011 की जनगणना के अनुसार, मुस्लिम साक्षरता दर 59.1% से बढ़कर 68.5% हो गई। फिर भी, यह राष्ट्रीय औसत (74%) से कम थी।
- चुनौतियां: मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्कूलों की कमी, शिक्षकों की अपर्याप्तता, और जागरूकता की कमी ने पूर्ण कार्यान्वयन में बाधा डाली।
2. आर्थिक सशक्तिकरण:
- सिफारिश: सूक्ष्म-वित्त और ऋण सुविधाओं तक पहुंच, कौशल विकास, और उद्यमिता प्रशिक्षण में समावेश।
- कार्यान्वयन:
- मल्टी-सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (MsDP): मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास के लिए शुरू किया गया। इसमें स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, और कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए। 2014 तक, 90 अल्पसंख्यक-केंद्रित जिलों में इस कार्यक्रम को लागू किया गया।
- नेशनल माइनॉरिटी डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन (NMDFC): मुस्लिमों सहित अल्पसंख्यकों को सस्ते ऋण प्रदान किए गए। 2020 तक, NMDFC ने हजारों लाभार्थियों को सूक्ष्म-वित्त प्रदान किया।
- कौशल विकास: स्किल इंडिया और सीखो और कमाओ जैसे कार्यक्रमों में मुस्लिम युवाओं को शामिल किया गया। उदाहरण के लिए, सीखो और कमाओ योजना ने 2013-14 से 2020 तक लगभग 1.5 लाख अल्पसंख्यक युवाओं को प्रशिक्षण दिया।
- प्रगति: असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत मुस्लिमों की संख्या में कमी और छोटे व्यवसायों में वृद्धि देखी गई। कुछ शहरी क्षेत्रों में उद्यमिता बढ़ी।
- चुनौतियां: वित्तीय समावेशन अभी भी सीमित है। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच कम है, और NMDFC जैसे संस्थानों का प्रभाव छोटे शहरों और गांवों तक पूरी तरह नहीं पहुंचा।
3. सामाजिक समावेशन:
- सिफारिश: भेदभाव को कम करने के लिए जागरूकता अभियान, कानूनी उपाय, और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास।
- कार्यान्वयन:
- MsDP के तहत बुनियादी ढांचा: मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में सड़कें, स्कूल, और स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए। 2014-2020 के बीच, इस योजना के तहत सैकड़ों परियोजनाएं पूरी की गईं।
- जागरूकता अभियान: कुछ राज्यों में सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए गए, लेकिन ये बड़े पैमाने पर प्रभावी नहीं रहे।
- प्रगति: कुछ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ, जैसे पीने का पानी और बिजली की उपलब्धता। शहरी क्षेत्रों में सामाजिक गतिशीलता में मामूली वृद्धि हुई।
- चुनौतियां: सामाजिक भेदभाव और गेटोकरण की समस्या बनी रही। आवास और नौकरियों में भेदभाव की शिकायतें अब भी प्रचलित हैं।
4. संस्थागत सुधार:
- सिफारिश: समान अवसर आयोग (Equal Opportunity Commission) की स्थापना और सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ाने के लिए डेटा संग्रह तंत्र।
- कार्यान्वयन:
- समान अवसर आयोग: इसकी स्थापना नहीं हुई, जो एक प्रमुख कमी रही। सरकार ने इस सिफारिश को लागू करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।
- डेटा संग्रह: कुछ हद तक डेटा संग्रह शुरू हुआ, जैसे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा योजनाओं की निगरानी, लेकिन यह व्यवस्थित और व्यापक नहीं रहा।
- सरकारी नौकरियां: मुस्लिमों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कोई विशेष आरक्षण नीति लागू नहीं की गई। हालांकि, कुछ राज्यों में OBC श्रेणी के तहत मुस्लिम उप-समूहों को लाभ मिला।
- प्रगति: सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की हिस्सेदारी में मामूली सुधार हुआ, लेकिन यह अभी भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में कम है।
- चुनौतियां: समान अवसर आयोग का अभाव और नीतिगत उपेक्षा ने इस क्षेत्र में प्रगति को सीमित किया।
5. विशेष योजनाएं:
- सिफारिश: मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए लक्षित विकास योजनाएं और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की योजनाओं को प्रभावी बनाना।
- कार्यान्वयन:
- अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय: इसने कई योजनाएं चलाईं, जैसे हज सुब्सिडी (2018 में समाप्त), उस्ताद योजना (पारंपरिक कारीगरों के लिए), और नई रोशनी (महिला सशक्तिकरण के लिए)।
- 15-पॉइंट प्रोग्राम: 2006 में शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा, रोजगार, और बुनियादी ढांचे में सुधार था। इसने कुछ हद तक प्रभाव दिखाया, विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य में।
- प्रगति: कुछ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा में सुधार हुआ। उदाहरण के लिए, मुस्लिम-बहुल जिलों में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ी।
- चुनौतियां: योजनाओं का कार्यान्वयन असमान रहा। कई राज्यों में धन का उपयोग अपर्याप्त रहा, और निगरानी की कमी के कारण परिणाम सीमित रहे।
कुल मिलाकर प्रगति और कमियां
- प्रगति:
- शिक्षा में सुधार, विशेषकर साक्षरता दर और स्कूल नामांकन में वृद्धि।
- कुछ आर्थिक योजनाओं, जैसे NMDFC और सीखो और कमाओ, ने मुस्लिम युवाओं और कारीगरों को लाभ पहुंचाया।
- बुनियादी ढांचे के विकास ने कुछ हद तक मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की स्थिति सुधारी।
- कमियां:
- कई महत्वपूर्ण सिफारिशें, जैसे समान अवसर आयोग और व्यवस्थित डेटा संग्रह, लागू नहीं हुईं।
- सामाजिक भेदभाव और गेटोकरण जैसी संरचनात्मक समस्याएं बनी रहीं।
- नीतिगत कार्यान्वयन में राजनीतिक इच्छाशक्ति और नौकरशाही दक्षता की कमी।
- ग्रामीण और छोटे शहरों में योजनाओं की पहुंच सीमित रही।
वर्तमान संदर्भ (2025 तक)
- हाल के वर्षों में, सरकार ने डिजिटल समावेशन और स्किल डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में जोर दिया है, जो मुस्लिम समुदाय के लिए भी लाभकारी रहा है।
उदाहरण के लिए, डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया ने कुछ मुस्लिम उद्यमियों को अवसर प्रदान किए।
- हालांकि, सच्चर समिति की सिफारिशों का पूर्ण कार्यान्वयन अभी भी अधूरा है। सामाजिक और आर्थिक असमानताएं कम करने के लिए और अधिक लक्षित और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
- कुछ गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और सामुदायिक पहल ने भी शिक्षा और कौशल विकास में योगदान दिया है, लेकिन ये प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर सीमित प्रभाव डाल पाए हैं।
निष्कर्ष
सच्चर समिति की रिपोर्ट ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को व्यवस्थित रूप से उजागर किया और यह दिखाया कि उनकी प्रगति में कई संरचनात्मक और ऐतिहासिक बाधाएं हैं। यह नीतिगत सुधारों और सामाजिक समावेशन के लिए एक रोडमैप प्रदान करती है।
सच्चर समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन में मिश्रित परिणाम देखे गए हैं। शिक्षा और बुनियादी ढांचे में कुछ प्रगति हुई, लेकिन संरचनात्मक सुधार, जैसे समान अवसर आयोग और भेदभाव-विरोधी उपाय, लागू नहीं हो पाए। ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच और नीतिगत निरंतरता की कमी प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं।
(लेखक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट करनाल में एडवोकेट, लॉ बुक लेखक और क़ानूनी सलाहकार हैं)






