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डॉ फ़िरदौस ख़ान
जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का ख़त्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे बड़ा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी. लेखन के आविष्कार का श्रेय 4000 ईस्वी पूर्व में मेसापोटामिया के सूमेरियनों को जाता है. आज हम जिस समय की गणना करते हैं, उसकी शुरुआत सुमेरियनों-बेबलीलोनियनों के काल में हुई थी. एक घंटे को 60 मिनट और एक मिनट को 60 सेकेंड में इन्हीं लोगों ने बांटा था. लेकिन अ़फसोस की बात है कि आधुनिकता की अंधी दौ़ड में इंसान अपनी मातृभाषा को ही भूलता चला गया. नतीजतन, आज दुनिया भर में हज़ारों भाषाएं अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच गईं.

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फ़रवरी की पूर्व संध्या पर जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की रिपोर्ट एटलस ऑफ वल्ड्‌र्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर-2009 में कहा गया है कि मौजूदा सभी भाषाओं में से तक़रीबन 90 फ़ीसद भाषाएं अगले 100 बरसों में अपना वजूद खो सकती हैं. दुनिया की तक़रीबन 97 फ़ीसद आबादी इनमें से सिर्फ़ चार फ़ीसद भाषाएं बोलती है. एक अंदाज़ के मुताबिक़, दुनिया भर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से 2500 भाषाओं की हालत बेहद चिंताजनक है. ये वह भाषाएं हैं, जो पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी. दुनिया भर में 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 150 से कम है. जिन देशों में भाषाएं ख़तरे में हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है. यहां तक़रीबन 196 भाषाएं दम तो़ड़ रही हैं. भारत के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है, जहां भाषाओं की हालत चिंताजनक है. अमेरिका में 192 भाषाएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है, जहां 147 भाषाएं अपना वजूद खो रही हैं. दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक दर्जन से भी कम लोग बोलते हैं. इनमें कैरेम भी एक ऐसी ही भाषा है, जिसे उक्रेन के सिर्फ़ छह लोग ही बोलते हैं. ओकलाहामा में विचिता भाषा को महज़ दस लोग ही बोलते हैं. इसी तरह लेंगिलू बोलने वाले भी सिर्फ़ चार लोग ही बचे हैं. पिछले एक दशक में भाषाओं की हालत बेहद गंभीर होती चली गई है. एक दशक पहले ख़त्म होने वाली भाषाओं की संख्या 900 थी, जो अब बढ़कर 2500 हो गई है. ग़ौरतलब है कि अकेले इंडोनेशिया में 365 भाषाएं हैं. अफ्रीका में एक हज़ार से भी ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. दुनिया में अंग्रेजी के बाद मेंडारिन भाषा बोलने वाली आबादी सबसे ज़्यादा है. क्षेत्रीय भाषाओं में स्पेनिश दूसरे स्थान पर है. नई भाषाओं में अफ्रीकन ज़्यादा बोली जाती है. सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के दक्षिण हिस्से में डच कॉलोनी की स्थापना के लिए रोमन कैथोलिक और जर्मन भाषाओं को शामिल किया गया. बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकन को डच और जर्मन से मिलाकर नई भाषा विकसित की गई. लंदन में 700 भाषाएं बोली जाती हैं.

भारत में ख़त्म होने वाली भाषाओं में से ज़्यादातर क्षेत्रीय और क़बीलाई बोलियां हैं. फ़रवरी 2010 में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तक़रीबन 70 हज़ार साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा का अस्तित्व ख़त्म हो गया. संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक़, अंडमान में रहने वाले बो क़बीले की आख़िरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर की मौत के साथ ही इस आदिवासी समुदाय की भाषा बो ने भी दम तो़ड़ दिया. इसी के साथ इस समाज की संस्कृति और सभ्यता भी ख़त्म हो गई. ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस आखिरी सदस्य ने 2004 की सुनामी में अपना घरबार खो दिया था. वह स्ट्रैट द्वीप पर सरकार द्वारा बनाए गए शिविर में ज़िंदगी के आख़िरी दिन गुज़ार रही थीं. भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि बो भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक के वक़्त से इस समुदाय द्वारा बोली जा रही थी. अंडमान पर रहने वाले आदिवासियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस. तक़रीबन 10 भाषाई समूहों में विभाजित ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की आबादी साल 1858 में यहां ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से ज़्यादा थी. फ़िलहाल ग्रेटर अंडमान में 52 मूल निवासी बचे हैं. लेकिन इनका वजूद भी ख़तरे में है. यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है. भारत के हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड आदि में तक़रीबन 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जनजीवन से ग़ायब हो रही हैं, जबकि ओडिसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी तक़रीबन 42 भाषाएं ख़त्म हो रही हैं. 1961 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 1652 भाषाएं थीं, जो 2001 में घटकर महज़ 234 ही रह गईं. पिछले चार दशक में भारत में 1418 भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं. हो सकता है कि यह संख्या कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं को बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलने वाले लोगों की तादाद दस हज़ार से कम है. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डी पुरंदेश्वरी के मुताबिक़, भारत की 196 भाषाओं में से 84 भाषाएं असुरक्षित श्रेणी में हैं, जबकि 62 भाषाएं निश्चित तौर पर लुप्त होने के कगार पर हैं. इसी तरह छह भाषाओं को गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में रखा गया है, जबकि 35 भाषाएं अत्यंत गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में शामिल हैं.

1991 की जनगना में भारत में 1956 भाषाओं के वजूद को स्वीकार किया गया, जबकि 1796 भाषाओं को मातृभाषा के तौर पर स्वीकारा गया. 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में तक़रीबन 450 ऐसी भाषाएं हैं, जिनके बोलने वालों की तादाद दस हज़ार से भी कम है. बदलते वक़्त के साथ ये भाषाएं अपना अस्तित्व खो रही हैं. दुनिया भर में सिर्फ़ 65 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें एक करोड़ से ज़्यादा लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. इनमें 11 भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं. इनमें से एक भाषा हिंदी भी है. मगर भारत में हिंदी का स्थान अंग्रेज़ी भाषा लेती जा रही है. संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है. भारत के संविधान के मुताबिक़, देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद-344 (1) और 351 के मुताबिक़, भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है. संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे. विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिंदी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए. भारतीय संविधान के मुताबिक़, कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है. मगर हिंदी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है. उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-343 में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. संविधान के लिए अनुच्छेद-351 के तहत हिंदी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है.
ग़ौरतलब है कि भारत में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था. देश में हिंदी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं. दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है. दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसकी वजह से वे हिंदी का विरोध करने से भी नहीं चूकते. 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे. उनकी मांग थी कि हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए.

संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था. तब से केंद्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में हर साल 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद-343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपी देवनागरी होगी. साथ ही अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा. संसद का काम हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद-120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है. यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है.

दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है कि देश इस तरफ़ उतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं, जितना देना चाहिए. दनिया में ऐसे भी देश हैं, जहां के बाशिंदों को अपनी भाषा अपनी जान से भी प्यारी है. बंगालियों में अपनी भाषा से बेहद लगाव है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 1952 में बांग्ला भाषा को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग को लेकर एक मुहिम चलाई गई थी. बांग्ला भाषा की एक हज़ार साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है, जो बेहद समृद्ध है. बंगालियों में अपनी मातृभाषा के प्रति बेहद श्रद्धा और प्रेम है. इसलिए बांग्ला साहित्य बेहद समृद्ध है. लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया. इसके ख़िलाफ़ में 21 फ़रवरी, 1952 को भाषायी जुलूस निकाला गया. यह प्रदर्शन हिंसक हो उठा और अबुल बरकत, रफ़ीकुद्दीन और शफ़ी उर्रहमान पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए. बांग्ला देश ने इन्हें भाषायी शहीद का दर्जा देते हुए देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का ख़िताब दिया. इनकी याद में 21 फ़रवरी, 1953 से बांग्लादेश में मातृभाषा दिवस मनाया जाने लगा. बांग्लादेश की सरकार के आग्रह पर 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को की 30वीं आम सभा ने सर्वसम्मति से 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने का फ़ैसला किया, तभी यह हर साल 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा. संयुक्त राष्ट्र ने भाषाई जागरूकता बढ़ाने के मक़सद से 2008 को अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया था.

बीते साल 21 जून को गूगल ने दुनिया से ख़त्म होती भाषाओं को बचाने की मुहिम शुरू की है. इसके लिए गूगल ने भाषाविदों और रिसर्च स्कोलर्स के साथ समझौता किया है. गूगल एंडेजर्ड लैंग्वेज प्रोजेक्ट के तहत काम कर रही है. इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है-एंडेजर्डलैंग्वेजेज डॉट कॉम (www.endangeredlanguages.com). इस पर उन सभी 3054 भाषाओं की जानकारी दी गई है, जिन्हें बचाने की क़वायद जारी है. इस पर लोग भाषाओं के बारे में अपनी जानकारी दे सकते हैं और जानकारी हासिल भी कर सकते हैं. वेबसाइट पर सुविधा दी गई है कि लोग खत्म हो रही भाषाओं-बोलियों के बारे में जानकारी पाने के अलावा उनसे संबंधित पांडुलिपियां, ऑडियो, वीडियो फाइल आदि शेयर या पोस्ट कर सकते हैं. प्रोजेक्ट मैनेजर क्लारा रिवेरा रोड्रिग्वेज और जैसन रिजमैन का कहना है कि गूगल की इस पहल के ज़रिये दुनिया की तमाम भाषाओं को एक मंच मिलेगा. साथ ही उस भाषाई संस्कृति को समझने का मौक़ा मिलेगा. कोरो एक ऐसी भाषा है, जिसे विज्ञान में नहीं जाना जाता था. यह हमारे ही उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाक़ों में बोली जाती थी, लेकिन अब दुनियाभर में 1000 लोग भी इसे बोलने वाले नहीं हैं. ऐसी ही एक और भाषा है नवाजो. आज दुनियाभर में इसे बोलने वाले लोग 1,20,000 से ज़्यादा लोग नहीं हैं. ऐसी ही भाषाओं की दिलचस्प जानकारी इस वेबसाइट पर मिलती है.

किसी भी भाषा को बचाने के लिए ज़रूरी है कि लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति आदर और सम्मान की भावना हो, मगर यह अफ़सोस की बात है कि भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से भारतीय भाषाएं हाशिये पर जा रही हैं.

17 अक्टूबर 2018



डॉ. फ़िरदौस ख़ान
देश को आज़ाद हुए आठ दशक होने वाले हैं। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हमारे देश भारत में बहुत सी भाषायें और बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हालांकि केन्द्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केन्द्र सरकार या राज्य सरकार अपने राज्य के मुताबिक़ किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है। केन्द्र सरकार ने अपने काम के लिए हिन्दी और रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है। इसके अलावा राज्यों ने स्थानीय भाषा के मुताबिक़ आधिकारिक भाषाओं को चुना है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली और गुजराती शामिल हैं।
ग़ौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर के 132 देशों में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं, जिनमें तक़रीबन तीन करोड़ अप्रवासी शामिल हैं। दुनिया के 157 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है। हिन्दी का श्ब्द भंडार भी बहुत विस्तृत है। अंग्रेज़ी में जहां 10 हज़ार शब्द हैं, वहीं हिन्दी में इसकी तादाद अढ़ाई लाख बताई जाती है। हिन्दी मुख्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन अब इसे रोमन में भी लिखा जाने लगा है। मोबाइल संदेश और इंटरनेट से हिन्दी को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का ख़ूब चलन है। 

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क़ है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय या राष्ट्रभाषा भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। साल 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर 1949 को सर्वसम्मति से हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किनके लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है, तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया था, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर मना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है. पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह ज़िन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है. और ये दूसरा पहलू ही इंसान को बुराई की तरफ़ ले जाता है, जुर्म की तरफ़ ले जाता है. अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साज़िश के तहत अंजाम दिया गया अपराध. अनजाने में हुए अपराध में हादसे वग़ैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाले अपराध में क़त्ल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाज़ी वग़ैरह आते हैं. इनकी फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.

दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया. दुनिया के किसी भी देश के, किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीज़ों के साथ अपराध भी ज़रूर नज़र आएगा. ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का ख़ात्मा हुआ. ख़ैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है. ’अपराध पत्रकारिता’ कहने में ये शब्द ज़रूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है. इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं.

अख़बारों के पन्ने जुर्म की काली दुनिया से आने वाली ख़ौफ़नाक ख़बरों से रंगे रहते हैं. कई ऐसी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित अपराध कथाएं शाया की जाती हैं. कई अख़बार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ़ पढ़ पाते हैं, लेकिन ख़बरिया चैलनों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है. ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है. ये कार्यक्रम  आपराधिक घटनाओं की विवेचना करते हैं. हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है. इनमें तथ्यों की गहन जांच-पड़ताल की जाती है. साथ ही इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सकें. सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है. इन कार्यक्रमों की ख़ास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सुरक्षित रहने की सीख भी देते हैं. इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस ग़लती की वजह से, किस लापरवाही की वजह से कोई जुर्म होता है. वे कौन-से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो जाते हैं, या ख़ुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं.
किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई ख़ुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आग़ोश में सो जाता है. किस तरह ज़िन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं.
अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह क़ब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ज़मीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है. किस तरह मासूम बच्चियों पर क़हर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं,
किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को ज़िन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों ख़ासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें ख़रीदा-बेचा जाता है. किस तरह रिश्तों की मान-मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है. इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति ज़रा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े ख़ौफ़नाक जुर्म को अंजाम देता है. ये एक तल्क़ हक़ीक़त है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज़्यादातर लोग क़रीबी रिश्तेदार और जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं. इन कार्यक्रमों में सिर्फ़ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि मुसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हैं. वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि अपराध की जो ख़बरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फ़ैसले आते हैं. उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है. इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की पूरी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिल सके. इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.

पत्र-पत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं. पिछले काफ़ी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का ख़ूब प्रसारण हो रहा है. इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोदिन बढ़ रही है. इनके लोकप्रिय होने की एक वजह ये भी है कि किसी मुंबईया फ़िल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जानने की जिज्ञासा भी शामिल रहती है.
इन कार्यक्रमों के ज़रिये जनमानस को सतर्क रहने की सीख दी जाती हैं. इसका असर भी देखने को मिल रहा है. अब लोग पहले से जागरूक हो रहे हैं. वे अपने आसपास भी नज़र रखने लगे हैं. पहले जहां लोग ज़रा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहीं अब इस मामले में ख़ासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं. ये एक अच्छा पहलू है.
हक़ीक़त तो यही है कि ज़िन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हमें कोई न कोई सबक़ ज़रूर देता है. इसी तरह जुर्म की ये कथाएं भी हमेशा सजग और सतर्क रहने की सीख देती हैं. 


अच्छी बातें जहां भी मिलें वहां से लेनी चाहिए। यह प्रवृत्ति हमें लानी पड़ेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम इस देश में कितनी भी अच्छी बातें कर लें सौहार्द, प्रेम और गंगा-जमुनी तहजीब की- पर वो आएगी नहीं। आज आप सब यहां इकट्ठा हैं और मुझे लगता है आप में 95% मुस्लिम लोग हैं। तारीफ तो आप लोग सुन सुन के अब तक अघा गए होंगे और बहुत बुरी वाली नफरत भी देख देख के अघा गए होंगे। थोड़ी देर हम लोगों को बैठकर समीक्षात्मक दृष्टि से एक बार अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है दुनिया की हर कौम को, समाज को हर कम्युनिटी को बीच-बीच में अपनी समीक्षा करनी चाहिए कि अगर उसका पतन हो रहा है, उसके खिलाफ लोगों की आवाज बुलंद हो रही है तो सारी कमी हमारे विपक्षी की नहीं होती। बहुत सी कमियां हमारे भीतर व्याप्त होती हैं।

मुझे लगता है कि आज वह समय है कि देश और दुनिया के मुसलमान बैठें और सोचें कि उनसे कहां पर कौन सी गलती होती चली जा रही है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा तबका उसके खिलाफ हो चुका है, उसके मुखालिफ है। ये बातें सुनने में अजीब लग सकती हैं। मैं यहां से बहुत मीठी बातें कर सकता हूं। आप लोगों को बहुत अच्छा बता सकता हूं। इस्लाम धर्म की महानता गिना सकता हूं। पर, इसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि, यदि मेरे लिए इस्लाम दुनिया का सबसे महान धर्म होता तो मैं सुबह कलमा पढ़ के मुसलमान बन चुका होता। यकीनन मेरे और आपके, दोनों के दृष्टिकोण में कोई तो फर्क है और इस फर्क के साथ हमें इस देश में और इस दुनिया में रहना होगा। समस्या कहीं और छुपी हुई है।

हम मुसलमान हैं, या हम हिंदू हैं, या हम ईसाई हैं, या हम सिख हैं- इन बातों से दुनिया में किसी को कोई बैर नहीं होता। इन बातों से किसी को कोई समस्या नहीं होती कि हम कौन हैं। सारी समस्या यहां से शुरू होती है जब हम कहते हैं कि- हमसे बेहतर कोई नहीं है। आपके मुसलमान होने से इस दुनिया को कोई तकलीफ नहीं होती। याद रखिए, आज मुसलमानों के बीच में एक सामान्य बात फैला दी गई है। मेरे पास अक्सर बहुत सारे मुस्लिम ऐसे मीम, ऐसे मैसेज। ऐसे वीडियोज फॉरवर्ड करते हैं जिसमें हिंदू लोग मुसलमानों को मार रहे हैं- या कोई गुरु उकसा रहा है- या कोई गुरु इस्लाम को गालियां दे रहा है- या कोई नेता मुसलमानों के विरुद्ध बोल रहा है। मैं कई बार सोचता हूं कि जवाब में फिर मैं वो सारे वीडियोज निकाल दूं जिसमें कि मुसलमान नेता पूरी दुनिया को गाली दे रहे हैं- मुस्लिम नेता-मौलाना पूरी दुनिया से नाराज घूम रहे हैं- उनको दुनिया में कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसी बातें भरी पड़ी हैं।

मुझे नहीं लगता है कि आप में से जितने लोग अभी यहां मेरी प्रशंसा कर रहे थे इस देश में ऐसे दस-बारह मौलाना निकालिए जो ठीक यही कर रहे हों। मैंने तो अपने यहां ये दावत इफ्तार आज नहीं, 20 साल से रखा है। लेकिन और कितने मौलाना हैं, कितने मुस्लिम स्कॉलर हैं, जिनके घर में आप होली मिलने गए थे और कितने हिंदू लोगों को बुलाकर होली मिलन कराया गया था। आप में से कितने लोगों ने रंग गुलाल लगा के ये करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं लगता कि आप में से अधिकांश लोगों ने ऐसा किया होगा। बहुत शरीफ मुसलमानों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए होंगे ताकि रंग का छींटा ना पड़े, होली की आवाज ना सुनाई दे। कुछ एक होंगे, जो बाहर निकल के गए होंगे, होली खेली होगी। पर, उनको बाद में कितनी गालियां सुननी पड़ी होंगी अपनी कम्युनिटी में… जरा उनसे जाकर यह भी पूछिएगा।

मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि पिछले काफी समय से ना केवल मुसलमान, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वामपंथी धड़ा भी बहुसंख्यक यानी हिन्दुओं के खिलाफ है। पूरी दुनिया में ऐसा है। दुनिया में जहां भी वामपंथी होते हैं… वामपंथी समझते हो ना लेफ्टिस्ट!… जैसे आजकल जो पत्रकार आपको अच्छे लग रहे हैं वो लेफ्टिस्ट हैं। दरअसल भारत के मुसलमानों को अजीत अंजुम अच्छा लगता है, रवीश कुमार अच्छा लगता है, बरखा दत्त अच्छी लगती है। ये सब लोग अच्छे लगते हैं क्योंकि वो इस वक्त मोदी को, बीजेपी सरकार को, हिंदुओं को, हिंदुओं की संकीर्णता को गाली देते हुए आपकी प्रशंसा या आपकी सुरक्षा करते हैं। पर, आप में से किसी को (वो जो गुजर गए) पाकिस्तान के तारिक़ फ़तह शायद ही अच्छे लगते होंगे। लेफ्ट की एक विशिष्टता समझिएगा। लेफ्ट हमेशा अल्पसंख्यकों को, माइनॉरिटी को पकड़ता है, क्योंकि उसके पास अपनी कमजोरी होती है। वह बहुसंख्यक के साथ नहीं है, तभी वह लेफ्ट है। इसलिए वो उस देश के अल्पसंख्यक को पकड़ता है और अल्पसंख्यक को हमेशा सत्ता के खिलाफ बरगलाता रहता है।

बहुत बदकिस्मती की बात है कि भारत में ज्यादातर मुसलमान पढ़ते नहीं है। मैं बीस बाईस सालों से मुसलमानों के संपर्क में हूं। मैंने निरंतर यह कहा कि पढ़ो। तुम्हारी किताब का ही नाम पढ़ो। कुरान के मानी होता है पढ़ना, स्टडी करना। पर तुम नहीं पढ़ते हो। जब तुम नहीं पढ़ते हो तो तुम इतिहास भी नहीं पढ़ते हो। और जब तुम इतिहास नहीं पढ़ते हो, तो तुम अपनी रूट्स नहीं खोज पाते हो, अपनी जड़ नहीं खोज पाते हो। फिर तुम्हें जो बता दिया जाता है तुम उसमें खुश हो जाते हो। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी केवल हिंदुओं के घर नहीं चल रही है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मुसलमानों के घर भी चल रही है, सिखों के घर भी चल रही है, ईसाइयों के घर भी चल रही है, दलितों के घर भी चल रही है। सबके घर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चल रही है।

अच्छी बातें करने का जमाना जा चुका है। अब समझने का जमाना है। यकीनन वो लोग मूर्ख हैं जो किसी बादशाह की कब्र खोद कर उसे सपाट करके उस पे तुलसी का बिरवा लगा देना चाहते हैं। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है। ये तो लगभग वही काम हो गया जो उस बादशाह ने खुद किया था। लेकिन उससे बड़े मूर्ख वो हैं जो उस कब्र को बचाने में लगे हुए हैं- जिन्हें ऐसा लगता है कि उस कब्र को बचा लेने से उनका इतिहास सुरक्षित हो जाएगा। इतिहास कब्रों में नहीं रहता। इतिहास इंसानों में रहता है। कब्रों के अंदर इतिहास नहीं रहते। इस्लाम की मूलभूत परंपरा में कब्रों, समाधियों इन सब चीजों का विरोध किया गया था। इसका मतलब क्या था? मोहम्मद कहना क्या चाहते थे? क्या वो अपने लिए एक बड़ा सा मंदिर, एक बड़ा सा मस्तबा नहीं बनवा सकते थे? पिरामिड से ऊंचा उनका एक समाधि स्थल बन सकता था। इतनी ताकत मोहम्मद की अपनी जिंदगी में आ चुकी थी। नहीं बनवाया तो क्यों? इसलिए क्योंकि मोहम्मद जानते थे कि इस्लाम समाधियों में, बुतों में, कब्रों में, महलों में, दरवाजों में, शिलालेखों में नहीं होगा। इस्लाम अगर जिंदा रहेगा तो वो किसी मुसलमान के किरदार के अंदर जिंदा रहेगा।

मगर ऐसा होता नहीं है। निजामुद्दीन औलिया ने मोहब्बत, प्रेम-सहिष्णुता, सद्भाव की भावना का प्रचार किया। उसे आपने स्वीकार नहीं किया। पर उनकी मजार पर चादर ले ले के आप हर बृहस्पतिवार, हर जुमरात, हर जुम्मा, हर शनिवार, हर खड़े हैं। सवाल किसी बुतपरस्ती, किसी मजारपरस्ती का नहीं है। मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो खुद बुतपरस्त हूं। मेरा इन सब से कोई मुखालिफत नहीं। मेरी मुखालिफत इस बात से है कि ठीक है, आपका अकीदा है, आपको अच्छा लगता है। आप ले जाइए गुलाब और चढ़ा के आ जाइए… निजामुद्दीन के दरवाजे पर… अमीर खुसरो के दरवाजे पर… किसी भी बाबा के, पीर के दरवाजे पर… कोई फर्क नहीं पड़ता। जाइए बोसा ले आइए जाकर के खाना-ए काबे में लगे हुए वो संग असद का। पर इससे क्या होना है? दरअसल जब तक आपके किरदार के भीतर वो मूल बातें नहीं आती हैं जिससे कि इस्लाम दुनिया में इतना फैला… या, एक हिंदू के भीतर जब तक वो बातें उसके चरित्र में नहीं उतरती हैं जिससे राम दुनिया में पूजनीय बने या कृष्ण दुनिया में पूजनीय बने… या एक ईसाई के अंदर नहीं आतीं जिससे ईसा पूरी दुनिया में इतने प्यारे, पूजनीय बने… तब तक किसी समुदाय के होने का अर्थ वास्तव में केवल और केवल दुष्टों की एक बड़ी फौज खड़ा करना होता है। याद रखिएगा आप में से तमाम लोग केवल यह रोज़े रख के, इफ्तार मना करके और दावत इफ्तार करने के बाद बहुत सारी गालियां उन लोगों को देते हो जो आपके खिलाफ बोलते हैं… या चुगलियां करते हुए निकल जाएंगे… या उन लोगों से प्रभावित हो जाएंगे जो बिना मतलब आपको सांत्वना दे रहे हैं… ऐसा है तो आप अपना नुकसान करते जा रहे हैं।

इस वक्त मेरे सामने मुसलमान हैं, इसलिए मैं सिर्फ मुसलमानों से बातें कर रहा हूं। भारत में वो तथाकथित संघीय विचारधारा या संकीर्ण विचारधारा आपकी दुश्मन हो सकती है। पाकिस्तान में कौन सा आरएसएस काम करता है? अफगानिस्तान में कौन सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा है? सूडान में कौन सा मोदी है? इराक में कौन कर रहा है? ईरान में कौन है? दुनिया में शायद 50 से कुछ ज्यादा देश इस्लामिक हो चुके हैं। उन देशों में कौन नरेंद्र मोदी जाकर के बैठा है, कौन योगी आदित्यनाथ बैठा है, कौन सा आरएसएस काम कर रहा है? अरब के कुछ बहुत अमीर, ओबाश और अय्याश देशों को छोड़ दीजिए। उसके बाहर कौन सा ऐसा देश है जहां आपस में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल नहीं कर रहा है- उसकी हत्या नहीं कर रहा है- उसे मार नहीं रहा है। इसकी समस्या कहां छुपी हुई है यह आप खोजेंगे। इसे मैं खोजूंगा तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा। आपको ऐसा लगेगा कि यह तो काफिर है- यह तो हमें बरगला रहा है- तो बेहतर है इसे आप ही खोजिए कि किस समस्या के चलते आपको पूरी दुनिया में जिल्लत, बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा है।

आपको पता है आपको यूरोप और अमेरिका का वीजा लेना पड़े को तो कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। आपकी टोपी और दाढ़ी कितनी बड़ी समस्या बन जाएगी। ऐसा हमेशा से तो नहीं था अचानक से कैसे हो गया? सन 2000 में बीबीसी अपने सर्वे में दुनिया का सबसे सफल और सबसे ताकतवर इतिहास का व्यक्ति चुनता है प्रॉफेट मोहम्मद को। सन 2000 से 2015-16 और फिर 2023-24 आते-आते यूरोप, अमेरिका आपको वीजा नहीं देता है। क्या हो गया इतने दिनों के अंदर? इस समस्या को समझिएगा। यह समस्या हिंदू में भी है, मुसलमान में भी है, सिख में भी है और ईसाई में भी है। मैं सब में एक बराबर समझता हूं।

हमारे बुत परस्त होने से, हमारे आतिश परस्त होने से, हमारे मजार परस्त होने से या हमारे तथाकथित खुदा परस्त होने से किसी को कोई तकलीफ नहीं होती है। तकलीफ शुरू तब होती है जब बहार भाई ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया उस निराकार खुदा को मानने लगे, या जब ओमा द अक्क सोचते हैं कि पूरी दुनिया मेरे भगवान राम को मानने लगे… सारी समस्या वहां से शुरू होती है। दूसरे को अपने जैसा बनाने की धुन इस दुनिया में हमें एक दूसरे का शत्रु बनाती है। तुम्हारा बच्चा तुम्हारी तरह नहीं होता, वो तुम्हारी बात नहीं मानता है और तुम चाहते हो पूरा मुल्क तुम्हारी बात मान ले। ना केवल मुल्क बल्कि पूरी दुनिया तुम्हारी बात मान ले। ये घमंड शायद अच्छा भी लगेगा। यकीनन अच्छा लगेगा। हो सकता है तुम में से कोई उठ के कह दे कि हमारे तो रसूल की सुन्नत है उन्होंने तो खुद इतनी बड़ी जंग लड़ी थी। तो मेरा सवाल होगा कि क्या तुम्हारा किरदार तुम्हारे रसूल की तरह है? क्या तुम दौलत से दूर हो? क्या तुम खुशामद से दूर हो? क्या तुम तारीफों से फूलते नहीं हो? क्या तुम बड़े-बड़े लोगों की चापलूसी नहीं करते हो? क्या तुम्हारा चरित्र तुम्हारे सर के ऊपर बोलता रहता है- कि तुम्हारी लालच तुम्हारी नाक पर चढ़ी रहती है- कि तुम्हारी वासनाएं तुम्हारे सर पर बैठी रहती हैं। किस चीज पर तुम तुलना कर रहे हो क्योंकि तुम्हारा चेहरा देख के तो बार-बार ऐसा ही लगेगा कि इस्लाम यकीनन औरंगजेब की तरह के लोगों ने फैलाया होगा जिनके हाथ में तलवारें थीं, जिन्होंने अपने बाप का कत्ल किया, अपनी बहनों का कत्ल किया, अपने भाइयों का कत्ल किया… और फिर भी टोपी बुन करके अपने को औलिया बताता रहा। इतिहास यही है तुम इसको बदल नहीं सकते हो। लेकिन खुश होने की जगह नहीं है यहां किसी हिंदू को- क्योंकि यही काम बिंबसार भी कर रहा था- यही काम समुद्रगुप्त भी कर रहा था- अजात शत्रु भी कर रहा था… यह काम तो चलता ही रहा है। सत्ताओं में यही होता है। हमेशा एक सत्ता दूसरी सत्ता को निगलने के लिए यही करती है। सत्ताओं में कोई बाप, बेटा, भाई, बहन नहीं होता। मैंने पिछले दिनों कहा भी था कि अकृतज्ञता, एहसान फरामोशी सियासतदान की पहली निशानी होती है। तुम सियासत नहीं कर सकते हो जब तक तुम में एहसान फरामोशी ना आ जाए।

तुम्हारा आदर्श कोई महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी या औरंगजेब या अकबर नहीं है। यकीन करना तुम्हारे हिसाब से, इस्लाम के हिसाब से तुम्हारा आदर्श केवल और केवल एक ही हो सकता है- वो है मोहम्मद पैगंबर… और कोई नहीं। उसके बाद के लोग तुम्हारे लिए मोहब्बत करने के लिए हैं। तुम रूमी से मोहब्बत कर सकते हो। तुम मंसूर से मोहब्बत कर सकते हो। तुम निजामुद्दीन से मोहब्बत कर सकते हो। तुम गालिब से मोहब्बत कर सकते हो। तुम जिससे मन करे उससे मोहब्बत कर सकते हो। गांधी से मोहब्बत कर सकते हो- किसी से भी कर सकते हो। और जब तुम अपने प्रॉफिट, अपने पैगंबर के किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करोगे- मान लो आज से शुरू करोगे- एक साल बाद तुम देखोगे कि तुम्हारे दुश्मन कम हो गए हैं। इसलिए नहीं कि अब लोग तुमसे अदावत नहीं रखते, बल्कि इसलिए कि अब तुम्हें दूसरों की दुश्मनी से खौफ नहीं लगता है। अब तुम्हें अपने खुदा की जात पर इतना यकीन है कि वो तुम्हें हर मुसीबत से बचा लेगा। तुम्हारा डर तुम्हारे दुश्मन बढ़ाता चला जाता है और तुम्हारी हिम्मत तुम्हारे दुश्मनों को घटाती चली जाती है। याद रखना जिसके अंदर हिम्मत होगी उसके दुश्मन घटते चले जाएंगे। जिसके अंदर खौफ होगा उसके दुश्मन बढ़ते चले जाएंगे।

भारत, पाकिस्तान और इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या है कि एक लंबे समय से मुसलमानों को कुछ चंद मुसलमानों ने खौफजदा करके रखा है। डरा करके रखा है। जैसे उनके ऊपर बड़ी कयामत लगी हुई है। सारी दुनिया उनके खिलाफ नेजे (भाले) लेकर खड़ी है। तुम किसी कर्बला में नहीं खड़े हो- इसको अपने दिमाग में रख लेना। तुम एक अच्छी दुनिया में रहते हो। यकीनन ये दुनिया बहुत खराब है लेकिन वो फिर सिर्फ तुम्हारे लिए खराब नहीं है, वो फिर मेरे लिए भी खराब है। वो हर किसी के लिए खराब है। वायु प्रदूषण तुम्हारे लिए ही नहीं है मेरे लिए भी है। वातावरण में गर्मी बढ़ रही है तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी। महंगाई तुम्हारे लिए भी है और मेरे लिए भी। बीमारी तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी। दुनिया में जो कुछ खराब है वो सब हम में बंटा हुआ है। लेकिन साथ ही साथ इसके दुनिया में जो कुछ अच्छा है वो भी अभी हम में, तुम में बटा हुआ है। ये खत्म नहीं हुआ है भारत के अंदर।

यदि यहां का बहुसंख्यक औरंगजेब से नफरत करता है तो ये नहीं सोचो कि आज नफरत करता है। हम लोग उस समय स्कूल में पढ़ते थे। यहां मौजूद मुमताज भी स्कूल में पढ़ा हुआ है, बहार भाई भी स्कूल में पढ़े हुए हैं। हम लोग के स्कूल में भी औरंगजेब खराब ही बादशाह था। इतिहास में कभी अच्छा बादशाह नहीं बताया गया था। लेकिन उस जमाने में भी हम मोहम्मद रफी की तस्वीर अपने घर में लगाते थे। दिलीप कुमार की लगाते थे। मिर्जा गालिब के ऊपर ऐसे ही हिंदुस्तान फिदा था। मीर तकी मीर को खुदा-ए सुखन यही हिंदुस्तान कह रहा था। अमीर खुसरो के गाने गा करके यही हिंदुस्तान बड़ा हो रहा था। यह मत समझो कि इस देश का हिंदू मुसलमानों से नफरत करता है। लेकिन हां, यकीन करो कि हम में से जितने भी लोग हैं उन सबको जब एक समुदाय बनाकर, एक कम्युनिटी बनाकर रख दिया जाता है, तब हम अपने इतिहास की तरफ देखने लगते हैं। और, इतिहास में दंश होते हैं- चोट होती है- तकलीफें होती है। फिर हम औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर निकालने लगते हैं, ये एक समस्या होती है।

औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर ना निकले इसके लिए एक काम मुमताज को भी करना पड़ता है कि उसे अपना किरदार औरंगजेब के किरदार से जोड़कर नहीं दिखाना होता है। फिर उसे अपना किरदार किसी गालिब से, किसी मीर से, किसी खुसरो से… या फिर और ऊंचा उठ सके तो अपने पैगंबर से जोड़ के दिखाना पड़ता है। जिनके पास सबके लिए मोहब्बत थी। जिन्होंने यह कहा कि मेरा खुदा रहमतुल आलमीन है, मेरा खुदा पूरी दुनिया के लिए रहमत है। यह जबानी जमा खर्च नहीं है कि तुमने मुंह से बोल दिया? क्या तुम इस पर यकीन करते हो कि तुम्हारा खुदा पूरी दुनिया पर रहमत करता है… और यदि ऐसा करता है तो उसकी रहमत से ही तो सब होंगे- वो भी जो उसमें यकीन नहीं करते हैं।

एक पुरानी सूफियों की कहानी है। मूसा ने अल्लाह की तरफ देखा और कहा कोई हुक्म दो, जो मैं पूरा करता रहूं, बार-बार पूरा करता रहूं। अल्लाह ने कहा कुछ नहीं लोगों को खाना खिला देना। इतना किया करो वो सब जो मेरे बंदे हैं उनको तू खाना खिलाया कर। मूसा ने कहा ठीक है। मैं सबको बुलाऊंगा और खाना खिलाऊंगा। वह सबको बुलाते खाने के लिए। मूसा यहूदी थे। वो लोगों को बुलाते, प्रार्थना करने को कहते और फिर सबको भोजन देते। एक दिन एक बूढ़ा आया। उसने आकर के कहा- खाना दो। मूसा ने कहा कि ठीक है। आओ प्रार्थना करो और खाना खाओ। उसने कहा- नहीं, मैं तुम्हारे ईश्वर में यकीन नहीं करता हूं। मेरा यकीन तेरे खुदा में नहीं है। इस पर मूसा ने कहा कि तब तो तुम काफिर हो। तुम्हें कैसे मैं खाना दे दूं। मूसा ने उसे लौटा दिया। जब मूसा फिर गए तूर पर अल्लाह से बात करने के लिए। मूसा कलीमुल्लाह थे, कलाम करते थे। अल्लाह से बात करने के लिए गए। मूसा ने सवाल पूछा- अल्लाह ने कोई जवाब नहीं दिया। सिलसिला चलता रहा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। जब एक हफ्ते तक कोई जवाब ना आया तो मूसा को लगा कि लगता है मुझसे कोई गुनाह हो गया है। अब उन्होंने रोना शुरू किया। पुकारना शुरू किया। मेरी गलती माफ करो, मुझे बताओ क्या हुआ? तो फिर आवाज आई कि मैंने तुझे कहा था सबको खाना खिलाने के लिए, तूने नहीं खिलाया। तो उसने कहा कि मैंने तो सबको खिलाया। बस एक को नहीं खिलाया था जो तुझ में यकीन नहीं करता है। अल्लाह ने मूसा से कहा कि क्या मुझे नहीं पता कि वो मुझ में यकीन नहीं करता, लेकिन मैं तो उसे बरसों से खिला रहा हूँ। तूने ये ठेकेदारी कैसे ले ली। सवाल ये है।

दुनिया के सारे धर्म दरअसल इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने सबको अपनी तरफ बुलाया- सबको छांव देने की कोशिश की- सबको आश्रय देने की कोशिश की। और यही किरदार अगर किसी हिंदू में, किसी मुसलमान में, किसी सिख में या किसी ईसाई में पैदा हो जाता है तो लोग उसकी तरफ घूमते हैं। लोग उसकी इज्जत करते हैं। और फिर उसके सदके वो उसके दीन की, उसके मज़हब की भी इज़्ज़त करने लगते हैं। फिर यह रुकने वाला सिलसिला नहीं रह जाता है!!
-ओमा अक्


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में तम्बाकू सेवन का बढ़ता चलन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुक़सानदेह  साबित हो रहा है.  विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी इस पर चिंता ज़ाहिर की है.  तम्बाकू से संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल क़रीब  5 मिलियन लोगों की मौत हो रही है, जिनमें लगभग 1.5 मिलियन महिलाएं शामिल हैं.  रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में 80 फ़ीसदी  पुरुष तम्बाकू का सेवन करते हैं, लेकिन कुछ देशों की महिलाओं में तम्बाकू सेवन की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है. दुनियाभर के धूम्रपान करने वालों का क़रीब 10 फ़ीसदी  भारत में हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में क़रीब 25 करोड़ लोग गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का आदि के ज़रिये तम्बाकू का सेवन करते हैं.

डब्ल्यूएचओ मुताबिक़ दुनिया के 125 देशों में तम्बाकू  का उत्पादन होता है. दुनियाभर में हर साल 5.5 खरब सिगरेट का उत्पादन होता है और एक अरब से ज़्यादा लोग इसका सेवन करते हैं. भारत में 10 अरब सिगरेट का उत्पादन होता है.  भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तम्बाकू की पैदावार होती है. भारत तम्बाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील,चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है. आंकड़ों के मुताबिक़ तम्बाकू से 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय हुई थी. विकासशील देशों में हर साल 8 हज़ार बच्चों की मौत अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है. दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले  में भारत में तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है.  तम्बाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के मुताबिक़  भारत में तम्बाकू सेवन करने वालों की तादाद क़रीब साढ़े 29 करोड़ तक हो सकती है.

देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि शहरी क्षेत्र में केवल 0.5 फ़ीसदी महिलाएं धूम्रपान करती हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या दो फ़ीसदी है. आंकड़ों की मानें तो पूरे भारत में 10 फ़ीसदी  महिलाएं विभिन्न रूपों में तंबाकू का सेवन कर रही हैं. शहरी क्षेत्रों की 6 फ़ीसदी महिलाएं और ग्रामीण इलाकों की 12 फ़ीसदी महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं. अगर पुरुषों की बात की जाए तो भारत में हर तीसरा पुरुष तम्बाकू का सेवन करता है.

डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ कई देशों में तम्बाकू सेवन के मामले में लड़कियों तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा  हुआ है.  हालांकि तम्बाकू सेवन के मामले में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ़ 20 फ़ीसद  ही है. महिलाओं और लड़कियों में तम्बाकू के प्रति बढ़ रहे रुझान से गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. डब्लूएचओ में गैर-संचारी रोग की सहायक महानिदेशक डॉक्टर आला अलवन का कहना है कि तम्बाकू विज्ञापन महिलाओं और लड़कियों को ही ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं. इन नए विज्ञापनों में खूबसूरती और तंबाकू को मिला कर दिखाया जाता है, ताकि महिलाओं को गुमराह कर उन्हें उत्पाद इस्तेमाल करने के लिए उकसाया जा सके. बुल्गारिया, चिली, कोलंबिया, चेक गणराज्य, मेक्सिको और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के क़रीब 151 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़  लड़कियों में तंबाकू सेवन की प्रवृत्ति लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा  बढ़ रही है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़ तम्बाकू या सिगरेट का सेवन करने वालों को मुंह का कैंसर की होने की आशंका 50 गुना ज़्यादा  होती है. तम्बाकू में 25 ऐसे तत्व होते हैं जो कैंसर का कारण बन सकते हैं.  तम्बाकू के एक कैन में 60 सिगरेट के बराबर निकोटिन होता है. एक अध्ययन के अनुसार 91 प्रतिशत मुंह के कैंसर तम्बाकू से ही होते हैं. हार्ट केयर फाउंडेशन   ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल  और  डॉ. बी सी राय का कहना है कि  एक दिन में 20 सिगरेट पीने से महिलाओं में हार्ट अटैक का खतरा 6 गुना बढ़ जाता है.  एक दिन में 20 सिगरेट पीने से पुरुषों में हार्ट अटैक का खतरा 3 गुना बढ़ जाता है.  पहली बार हार्ट अटैक के लिए धूम्रपान 36 फ़ीसदी  मरीज़ों  में ज़िम्मेदार होता है. ऐसे हृदय रोगी जो लगातार धूम्रपान करते रहते हैं उनमें दूसरे हार्ट अटैक का ख़तरा ज़्यादा रहता है साथ अकस्मात मौत का ख़तरा भी बढ़ जाता है. बाई पास सर्जरी के बाद लगातार धूम्रपान करते रहने से मृत्यु, हृदय संबंधी बीमारी से मौत या फिर से बाईपास का ख़तरा ज़्यादा होता है.  एंजियोप्लास्टी के बाद लगातार धूम्रपान करने से मौत और हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है. जिन मरीज़ों  में हार्ट फंक्शनिंग 35 फ़ीसदी से कम हो, उनमें धूम्रपान से मौत का ख़तरा ज़्यादा होता है.  जो लोग लगातार धूम्रपान करते रहते हैं, उनमें हो सकता है कि ब्लड प्रेशर की दवाएं असर न करें.

तम्बाकू से होने वाले नुक़सान को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक प्रस्ताव द्वारा 7 अप्रैल 1988 से विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया था. इसके बाद   साल 1988 में हर साल की 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया और तभी से 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाने लगा. इस दिन विभिन्न कार्यक्रम कर लोगों को तम्बाकू से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नुक़सान के बारे में बताया जाता है. हालांकि भारत में भी सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी है, लेकिन लचर क़ानून व्यवस्था के चलते इस पर कोई अमल नहीं हो पा रहा है. लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान  करते हुए देखा जा सकता है. भारत में आर्थिक मामलों की संसदीय समिति पहले ही राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम को मंज़ूरी  दे चुकी है. इसका मक़सद तम्बाकू नियंत्रण क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन और तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों तक जागरूकता फैलाना है. इसके लिए 11वीं योजना में कुल वित्तीय परिव्यय 182 करोड़ रुपये रखा गया है. इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण देश शामिल है, जबकि शुरुआती   चरण में 21 राज्यों के 42 ज़िलों  पर ध्यान केन्द्रित किए गए हैं. 

ख़ास बात यह भी है कि एक तरफ़ जहां जनता महंगाई से जूझ रही है, वहीं  दूसरी तरफ़  गुटखे आदि की क़ीमतों पर कोई असर नहीं पड़ा है. इतना ही नहीं देश में तम्बाकू से संबंधित उत्पादों के विज्ञापन पर पाबंदी के बावजूद टीवी और अखबारों आदि के ज़रिये इनका प्रचार-प्रसार बदस्तूर जारी  है. ऐसे में सरकार  की तम्बाकू रोधी मुहिम का क्या हश्र होगा, सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.  

बहरहाल,  तम्बाकू से होने वाली मौतों को रोकने के लिए प्रशासनिक  तौर पर सुधार करने की ज़रूरत है. सरकार को जागरूकता अभियानों को बढ़ावा देना होगा और नियमों की अवहेलना करने वालों के साथ सख्ती बरतनी होगी.      

31 मई 2012


डॉ. रामजीलाल
 कम्बोज
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व में बहुत बड़ा अंतर है. वर्ष 
1951 की जनगणना के अनुसार  भारत में हिंदू आबादी 306 मिलियन (84.1प्रतिशत) थी, जबकि मुस्लिम आबादी 35.4 मिलियन (9.49 प्रतिशत) थी. वर्तमान में, भारत की अनुमानित आबादी 1.40 बिलियन है, जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग 183 मिलियन यानी 14.2 प्रतिशत है. वर्ष 1952 और 2024 के बीच लोकसभा में कुल 9584 सदस्य चुने गए, जिनमें 545 मुस्लिम सांसद शामिल हैं. यह कुल सदस्यों का लगभग 6.6 प्रतिशत है, जो भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के लगभग 14.2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व से काफ़ी कम है.

ये आंकड़े बताते हैं कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, वहीं लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व घट रहा है, जो एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाता है. वर्ष 1952 में पहले लोकसभा चुनावों में 25 मुस्लिम सदस्य थे, जो कुल का 5.11 प्रतिशत थे. वर्ष 1980 के चुनावों तक यह संख्या बढ़कर 49 हो गई थी, जो 1952 के बाद सबसे ज़्यादा थी. हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में चुने गए मुस्लिम सांसदों की संख्या घटकर सिर्फ़ 24 रह गई है, जो कुल का 4.42 प्रतिशत है, जो कुल आबादी में उनके अनुमानित 14.2 प्रतिशत हिस्से से बहुत कम है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होने के बावजूद लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है.

अल्पसंख्यक-मुक्त एनडीए एक विरोधाभास
11 दिसम्बर 2025 को प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में 4131 विधायक हैं, और भारतीय संसद की लोकसभा में 543 सांसद और राज्यसभा में 245 सांसद हैं यानी कुल 788 सांसद हैं. बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता में है. एनडीए गठबंधन में वर्तमान में लोकसभा में 293 सदस्य हैं और इस गठबंधन में कोई भी अल्पसंख्यक समूह शामिल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों ने बार-बार और ज़ोर देकर 'कांग्रेस-मुक्त भारत' की वकालत की है, और एनडीए गठबंधन लोकसभा में 'अल्पसंख्यक-मुक्त' हो गया है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है. ऐसे राज्य में अल्पसंख्यकों के बिना सत्ताधारी गठबंधन न केवल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक विरोधाभास है, बल्कि संविधान की भावना के भी ख़िलाफ़ है.

भारत की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 1.40 अरब है. इस जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 183 मिलियन (14.2 प्रतिशत) है. भारत में अल्पसंख्यक आबादी में 14.2 प्रतिशत, मुस्लिम 2.31 प्रतिशत, ईसाई और सिख 1.72 प्रतिशत हैं. इसका मतलब है कि इन तीन अल्पसंख्यक धर्मों के अनुयायी भारत की कुल आबादी का 28 प्रतिशत हैं, जिनका (एक ईसाई, किरेन रिजिजू को छोड़कर) एनडीए गठबंधन में प्रतिनिधित्व नहीं है. इंडिया (INDIA) गठबंधन, जिसके लोकसभा में 235 सांसद हैं, में कुल 543 लोकसभा सांसदों में से 7.9 मुस्लिम सांसद, 5 सिख सांसद और 3.5 प्रतिशत ईसाई सांसद शामिल हैं. इसमें केवल एक मुस्लिम महिला इकरा चौधरी शामिल हैं, जबकि मुस्लिम महिलाओं की अनुमानित आबादी लगभग 9 से 10 करोड़ है. लोकसभा में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में असदुद्दीन ओवैसी, यूसुफ़ पठान, शेख़ अब्दुल राशिद और इकरा चौधरी शामिल हैं.

कांग्रेस पार्टी: क्या मुस्लिम लीग है?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तुलना मुस्लिम लीग से की जा सकती है? भारतीय जनता पार्टी भी बार-बार यह प्रचार करती है कि कांग्रेस 'हिंदू-विरोधी' और 'मुस्लिम-समर्थक' या 'मुस्लिम लीग' है, और मुसलमानों के प्रति 'तुष्टीकरण' की नीति अपना रही है। हालांकि, जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 99 सांसदों में से केवल 7 सांसद मुस्लिम हैं (कुल सांसदों का केवल 7 प्रतिशत). कांग्रेस को 'मुस्लिम लीग' कहना और उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाना सच्चाई, तथ्यों और आंकड़ों से बहुत दूर है.

राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व: एक बड़ा अंतर
 2021 में चार राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु - और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 824 विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ़ 112 मुस्लिम थे. यह प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, जिसके हिसाब से आदर्श रूप से लगभग 192 से 200 मुस्लिम विधायक होने चाहिए थे. असल में, हाल के चुनावों में असम, में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है, खासकर इसलिए क्योंकि पहले चुनावों के बाद यह पहली बार हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के जुड़ाव की वजह से शायद उन्हें वोटर्स ने नकार दिया.

प्रतिनिधित्व में यह असंतुलन दूसरे राज्यों में भी साफ दिखता है. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत है, फिर भी वहाँ सिर्फ़ 44 मुस्लिम विधायक हैं. केरल में मुसलमानों की आबादी 32 प्रतिशत है, जबकि 140 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ़ 32 मुस्लिम विधायक हैं. तमिलनाडु में 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद, सिर्फ़ सात मुस्लिम विधायक हैं. केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में, सिर्फ़ एक मुस्लिम चुना गया. फ़रवरी 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में, 70 सदस्यों में से सिर्फ़ चार मुस्लिम विधायक (आम आदमी पार्टी) चुने गए. इसी तरह नवम्बर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में कुल आबादी का 16.3 प्रतिशत मुस्लिम होने के बावजूद कुल 243 सदस्यों में से सिर्फ़ 11 मुस्लिम विधायक चुने गए. ख़ास बात यह है कि इन दोनों विधानसभाओं—दिल्ली और बिहार—में बीजेपी का एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है. हैरानी की बात यह है कि 2025 के आख़िर तक बीजेपी का भारत में किसी भी राज्य विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना.

भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के मुख्य कारण
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के कई कारण हैं। हिंदू सांप्रदायिकता से प्रेरित सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण एक बड़ी भूमिका निभाता है. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनावी प्रणाली बहुमत का पक्ष लेती है, जिससे अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो जाता है. चुनौतियों में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों की कमी, निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन के कारण मुस्लिम मतदाताओं का कम प्रभाव, और राजनीतिक दलों की मुस्लिम उम्मीदवारों को नामांकित करने में अनिच्छा शामिल है. इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय का भौगोलिक फैलाव प्रभावी समुदाय-आधारित पार्टियों के गठन में बाधा डालता है. विभाजन जैसी ऐतिहासिक विरासत ने भी कुछ मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान की समस्या और भी जटिल हो गई है.

मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने हेतु सुझाव
भारतीय विधायिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए, कई सुझावों पर विचार किया जा सकता है। भारतीय मुसलमान या तो अपनी खुद की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं जो उनके हितों पर ध्यान केंद्रित करे, या नीति निर्माण में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए मौजूदा धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में शामिल हो सकते हैं. मुसलमानों के बीच सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा देना ज़रूरी है, जबकि धर्मनिरपेक्ष नेताओं और मीडिया को विभाजनकारी सांप्रदायिक विचारधाराओं को चुनौती देने के लिए काम करना चाहिए.

हिंदुओं और मुसलमानों को भारतीय संविधान में बताए गए धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को समझने और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए सतर्क रहने की ज़रूरत है. मुसलमानों को फ़ैसले प्रभावित करने के लिए सभी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना चाहिए, न कि सिर्फ निष्क्रिय भूमिका निभाना चाहिए. मुसलमानों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल करने और उनकी खास चिंताओं को दूर करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए.

इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं को राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना भी महत्वपूर्ण है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि समुदाय के भीतर अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व हो, कट्टरपंथियों के प्रभाव से बचना बहुत ज़रूरी है. अधिकारियों को नफ़रत फैलाने वाले भाषण, सांप्रदायिक हिंसा और भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर करने के किसी भी प्रयास के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए.आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू करने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि विधायिका मुस्लिम आबादी को सही ढंग से दर्शाए.

संक्षेप में भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए सभी समुदायों, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं, को शामिल करना ज़रूरी है. अंत: सिद्धांत सरल है: "जितनी जिसकी  संख्या भारी, उतनी उसकी  हिस्सेदारी।
(लेखक हरियाणा के करनाल शहर स्थित दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल हैं) 


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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