ज़िन्दगी
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कहते हैं कि ज़िन्दगी कभी किसी के लिए नहीं रुकती... लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं
है, ज़ाहिरी तौर पर भले ही ज़िन्दगी मुतासिर दिखाई न दे, लेकिन हक़ीक़ी तौर पर
ज़िन्दग...
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राहुल मिश्रा
मम्मी-पापा बेंगलुरु लौटने को निकल रहे थे। उसी वक्त बेटी रो पड़ी।
मां ने पूछा, कोई लड़का है? काम पर किसी से कुछ हुआ? कुछ हुआ है क्या?
तीनों का जवाब नहीं था।
फिर भी मां समझ गई। और उस दिन मां ने जो सवाल पूछा, दो साल बाद वही सवाल एक राष्ट्रीय अभियान बना, जो पूरे भारत में लोगों से कह रहा था कि किसी से हाल पूछो, तो एक बार दोबारा पूछो।
बेटी उस वक्त अपने काम के सबसे ऊंचे दौर में थी। फिल्में चल रही थीं, नाम चल रहा था। दादा बैडमिंटन संघ के सचिव रहे थे, पिता वो आदमी हैं जिन्होंने All England जीतने वाले पहले भारतीय बनकर देश का नाम ऊंचा किया था। और बेटी को आज करोड़ों लोग परदे पर पहचानते हैं।
नाम, दीपिका पादुकोण।
दीपिका, यानी छोटा सा दीया। ये कहानी उसी दीये की है, जिसकी लौ एक वक्त बहुत कांपने लगी थी। और उस मां की, जिसने जाते-जाते वो कांपती लौ देख ली।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
कोपेनहेगन। डेनमार्क। 5 जनवरी 1986।
प्रकाश पादुकोण उन दिनों अपने खेल का बड़ा हिस्सा डेनमार्क में रहकर खेलते और सीखते थे। वहीं बड़ी बेटी दीपिका पैदा हुई। एक साल की थी, जब परिवार बेंगलुरु लौट आया। घर में मां उज्जला थीं, पिता थे, और बाद में छोटी बहन अनीशा आई।
इस घर में बैडमिंटन तीसरी पीढ़ी का खेल था। दादा रमेश पादुकोण मैसूर बैडमिंटन एसोसिएशन के सचिव थे, और उन्होंने ही बेटे प्रकाश के हाथ में रैकेट थमाया था। वही प्रकाश 1980 में All England का सिंगल्स खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने।
तो बेटी का कोर्ट पर उतरना तय था। दीपिका ने खुद बताया है कि वो सुबह पांच बजे उठती थी। पहले फिजिकल ट्रेनिंग, फिर स्कूल, फिर दोबारा बैडमिंटन। नेशनल चैंपियनशिप के लेवल तक खेली। इसी साल जून में एक पॉडकास्ट पर पिता ने भी यही याद किया, कि बेटी की जिंदगी बेहद अनुशासन वाली थी, और खेल ने उसे फोकस करना और बड़ा सोचना सिखाया।
फिर दसवीं में एक मोड़ आया।
एक इंटरव्यू में दीपिका ने कहा था कि उसे समझ आ गया था, वो ये खेल सिर्फ इसलिए खेल रही थी क्योंकि ये परिवार में था। और उसने रैकेट रख दिया। All England चैंपियन की बेटी, और वो कह रही है कि ये मेरा रास्ता नहीं। उसने मॉडलिंग चुनी। बेंगलुरु में फैशन कोरियोग्राफर प्रसाद बिदप्पा के साथ काम शुरू किया, एक साबुन के विज्ञापन से पहचान मिली, और फिर मुंबई आ गई, जहां शुरू में मौसी के घर रही।
फिर फिल्में आईं। और एक के बाद एक आती रहीं।
अब चलते हैं उस साल पर। 2014।
बाहर से देखें तो ये उसके करियर का सबसे चमकदार वक्त था। 2020 में दावोस के मंच पर उसने खुद कहा कि बीमारी तब आई जब उसे इसकी सबसे कम उम्मीद थी। वो प्रोफेशनल हाई पर थी, फिल्में अच्छा कर रही थीं, और जिंदगी में एक बहुत अच्छा रिश्ता था।
और फिर एक सुबह। उसी भाषण में दीपिका ने बताया कि एक सुबह वो उठी, लगा सब ठीक है, और वो बेहोश होकर गिर गई।
उसके बाद जो हुआ, वो उसने 2015 में एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया था। पेट में एक अजीब सा खालीपन रहता था। सांस उथली रहती थी। किसी चीज पर ध्यान नहीं टिकता था। और वो बार-बार टूट जाती थी।
उसी साल एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी, "हैप्पी न्यू ईयर"। बाद में दीपिका ने माना कि वो शूटिंग उसके लिए बहुत मुश्किल थी, क्योंकि वो डिप्रेशन और एंग्जायटी से गुजर रही थी। और फिल्म की डायरेक्टर फराह खान ने कहा कि उन्हें सेट पर इसका अंदाजा तक नहीं हुआ।
यानी कैमरे के सामने काम चलता रहा। और कैमरे के पीछे?
परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के सामने उसने अपनी भाषा में कहा था, "मैं मुंबई में अकेली रहती थी, लेकिन इस एहसास को किसी से शेयर नहीं करती थी।"
किसी से नहीं। मां से भी नहीं।
और फिर आया वो दिन।
मम्मी-पापा कुछ दिनों के लिए बेंगलुरु से मुंबई आए थे। बेटी के पास रहे। फिर लौटने का दिन आया। और जाने के वक्त दीपिका टूट गई।
उसके अपने शब्द, "जब मेरी मम्मी मुंबई आईं और कुछ दिन बाद वापस गईं, तो मैं अचानक रोने लगी। मुझे पूरी तरह निराशा महसूस हो रही थी, जीने की इच्छा खत्म हो गई थी।"
बेटी अचानक रो रही है, बिना किसी बात के। कोई भी मां वही पूछेगी, जो उज्जला पादुकोण ने पूछा। दीपिका ने NDTV से बातचीत में वो सवाल खुद दोहराए हैं। कोई लड़का है? काम पर कोई है? कुछ हुआ है क्या?
उसके शब्दों का मतलब था, वो इनमें से कुछ भी नहीं था। वो बस एक बहुत खाली, खोखली सी जगह से आ रहा था।
और फिर वो बात, जिसके लिए ये पोस्ट लिखी गई। दीपिका ने कहा, मां तुरंत समझ गईं। और ये भी कि उसके लिए वो पल भगवान का भेजा हुआ था।
मां ने वजह पूछी। वजह थी ही नहीं। और मां ने उसी खालीपन को पहचान लिया।
ये कहानी डिप्रेशन की नहीं है।
ये उस सवाल की कहानी है, जो एक मां ने जाते-जाते पूछा, और उस चुप्पी की, जिसे मां ने जवाब मान लिया।
मां ने बेटी से कहा कि किसी जानकार से बात करो। दीपिका ने बाद में कई बार कहा है कि अगर मां ने उसके बदले हुए बर्ताव को नहीं पहचाना होता और मदद लेने को नहीं कहा होता, तो वो नहीं जानती कि आज किस हालत में होती।
उसने एक साइकोलॉजिस्ट को फोन किया। बच्चों को उसने बताया, "जब इस बारे में खुलकर बात की, तो खुद को हल्का महसूस किया।" जिस काउंसलर ने उस दौर में उसकी मदद की, वो थीं ऐना चांडी, जो आगे चलकर उसकी संस्था की चेयरपर्सन बनीं।
पर एक बात दीपिका ने कभी नहीं छिपाई, और यही इस कहानी का सबसे ईमानदार हिस्सा है। उसने कहा कि काउंसलिंग से मदद मिली, पर एक हद तक। 2015 वाले उस इंटरव्यू के मुताबिक, फिर बेंगलुरु के एक मनोचिकित्सक से दूसरी राय ली गई, और पहले हिचकने के बाद उसने दवा लेना भी माना। हमारे यहां तो अक्सर दवा का नाम सुनते ही लोग "पागलों वाली दवा" कह देते हैं, वहां सबसे बड़ी स्टार में से एक ने ये बात बिना झिझक कही।
पर ठीक होने के बाद दुनिया को बताने की क्या जरूरत थी? इसका जवाब इसी साल जून में उसके पिता ने दिया है। प्रकाश पादुकोण ने बताया कि दीपिका की एक दोस्त की मौत हुई थी, और तभी बेटी ने तय किया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूक हों।
और परिवार? पिता के शब्दों में, "अगर इससे दूसरों की मदद हो रही थी, तो हमें इस बात को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि दीपिका ऐसी स्थिति में थी कि लोगों की मदद कर सकती थी।"
जनवरी 2015 में दीपिका ने एक अखबार को इंटरव्यू देकर सबके सामने कहा कि उसे डिप्रेशन था। बात इतनी बड़ी थी कि अमेरिका के वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इस पर खबर छापी। उसी इंटरव्यू में उसने कहा था कि इसे मानने और इसके बारे में बोलने से उसे आजादी मिली है।
उसी साल उसने एक संस्था बनाई, "द लिव लव लाफ फाउंडेशन"।
और अब वो बात, जिसका वादा ऊपर किया था।
10 अक्टूबर 2016। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस। दीपिका की संस्था ने एक अभियान शुरू किया, नाम था "दोबारा पूछो"। संस्था के हिसाब से ये मानसिक स्वास्थ्य पर देश का पहला राष्ट्रीय जागरूकता अभियान था। पूरा संदेश बस इतना, कि किसी से पूछो "कैसे हो?", और वो कहे "ठीक हूं", तो रुको, और एक बार दोबारा पूछो। सच में, कैसे हो?
यानी मुंबई के उस घर में जाते-जाते जो सवाल एक मां ने पूछा था, बेटी ने उसे पूरे देश का सवाल बना दिया।
संस्था वहीं नहीं रुकी। उसी साल कर्नाटक के दावणगेरे के गांवों में मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों तक इलाज पहुंचाने का काम शुरू हुआ। स्कूलों में बच्चों के लिए कार्यक्रम शुरू हुए, डॉक्टरों के लिए ट्रेनिंग शुरू हुई। 2023 में ये काम हिंदी पट्टी तक पहुंचा, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा तक। संस्था के मुताबिक दावणगेरे वाला काम अब अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है।
जनवरी 2020 में दावोस में World Economic Forum ने इसी काम के लिए उसे क्रिस्टल अवॉर्ड दिया। 2022 में TIME मैगजीन ने भी इसी काम के लिए सम्मानित किया।
फरवरी 2025 में वो परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के बीच थी। वहां उसने कोई भारी भाषण नहीं दिया। कहा कि परीक्षा से पहले वाली रात मम्मी-पापा से बात करो, जो डर है, उसे किसी भरोसे वाले से कह दो। नींद को उसने एक मुफ्त की सुपरपावर बताया। धूप और खुली हवा की बात की। और कहा कि तनाव होना तो स्वाभाविक है, असली बात ये है कि हम उसे संभालते कैसे हैं।
मम्मी-पापा से बात करो। जो लड़की खुद कभी मां से कुछ नहीं कह पाई थी, वही अब बच्चों से यही कह रही थी।
और एक बात, जो मुझे इस पूरी कहानी में सबसे सच्ची लगी। 2022 में एक इंटरव्यू में दीपिका ने माना कि आज भी उसे डर रहता है कि कहीं ये वापस न आ जाए। इसलिए हर सुबह उठकर वो अपनी सेहत को सबसे पहले रखती है।
ये कोई फिल्मी "हैप्पी एंडिंग" नहीं है। ये एक इंसान का रोज का ध्यान रखना है।
अब लौटिए उस पिता पर, जिसके घर में दिन सुबह पांच बजे शुरू होता था। इसी साल जून में प्रकाश पादुकोण ने कहा कि उन्होंने अपनी बेटी से सीखा है कि मेंटल हेल्थ हमेशा पहले आनी चाहिए। आराम, अच्छा खाना, कसरत, और तनाव को संभालना, ये सब आपस में जुड़े हैं।
देश का पहला All England चैंपियन, इकहत्तर साल की उम्र में, अपनी बेटी का छात्र बना बैठा है। वही बेटी, जिसने दसवीं में उनका खेल छोड़ दिया था।
और अब वो तारीख, जिसकी वजह से ये कहानी आज लिखी गई।
19 सितंबर 2026।
एक हफ्ता पहले दीपिका और रणवीर सिंह के घर दूसरी बेटी आई। बड़ी बेटी दुआ इसी महीने की 8 तारीख को दो साल की हुई है। दोनों ने एक सादी सी तस्वीर डाली। छोटे से पैरों की छाप, नीचे तीन नाम, रणवीर, दीपिका, दुआ, और वो तारीख। साथ में लिखा कि दुआ और उनके दिल, दोनों बड़े हो रहे हैं।
यानी जो लड़की कभी मां के जाते वक्त बिना वजह रो पड़ी थी, वो आज खुद दो बेटियों की मां है।
अठारह साल से अखबार की डेस्क पर हूं। "सब ठीक है" से ज्यादा झूठा वाक्य मैंने न किसी खबर में पढ़ा, न किसी फोन पर सुना।
मेरी भी एक बेटी है, ज्ञानवी। ये पोस्ट लिखते हुए समझ आया कि "खाना खाया?" के बाद एक सवाल और पूछना चाहिए।
उज्जला पादुकोण ने उस दिन जो सवाल पूछा था, वो उनकी बेटी ने देश को सौंप दिया। और अब वही सवाल उस घर में लौट आया है, जहां दो नन्हीं बच्चियां बड़ी होंगी। उनकी मां जानती है कि रोना कमजोरी नहीं होता, कि दवा लेना शर्म नहीं होती, और "ठीक हूं" सुनकर बात खत्म नहीं करनी चाहिए।
दादा ने बेटे को रैकेट थमाया था। बेटे ने बेटी को अनुशासन दिया। और मां ने बेटी को एक सवाल दिया।
और तीसरी पीढ़ी की बेटी ने उस सवाल से पूरे देश के लिए एक दरवाजा खोल दिया।
मां ने तीन सवाल पूछे। तीनों का जवाब नहीं था। फिर भी मां समझ गई।
इस कहानी से जो रखने लायक है:
भारत सरकार की मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन Tele-MANAS, नंबर 14416 या 1-800-891-4416, चौबीसों घंटे, मुफ्त।
दीपिका की बात बच्चों के लिए, नींद एक मुफ्त की सुपरपावर है, और परीक्षा से पहले की रात मम्मी-पापा से बात।
और उस संस्था का दो शब्दों वाला नियम, "दोबारा पूछो"।
ये कहानी उस मां तक पहुंचनी चाहिए, जिसका बच्चा किसी दूसरे शहर में, या दूसरे देश में अकेला रहता है, और हर फोन पर कहता है, सब ठीक है।
इस पोस्ट में जो बात भी दीपिका या उनके पिता के नाम से आई है, वो उन्होंने खुद कही है, इंटरव्यू में, मंच पर, कैमरे के सामने। कहने का ढंग मेरा है। तथ्य मेरे नहीं।
आपके घर में "दोबारा" कौन पूछता है?
राहुल मिश्रा
उस आदमी की नौकरी यह थी कि वो अंधेरे में बैठा रहे, और सामने रोशनी फेंकता रहे।
हर शाम शहर के सबसे बड़े सिनेमाघर में हजारों लोग उसी रोशनी में चेहरे देखते थे। हंसते थे। रोते थे।
उन चेहरों में एक भी उसका अपना नहीं था।
शो खत्म होने के बाद वो घर लौटता, और तब तक उसके बच्चे सो चुके होते थे।
और फिर एक दिन उसी परदे पर एक चेहरा उभरा, जिसे उसने पालने में देखा था।
वो चेहरा आज सौ साल का हो रहा है।
अब शुरू से शुरू करते हैं
अहिरीटोला। उत्तरी कलकत्ता। 1926 का सितंबर।
एक बच्चा अपने ननिहाल में पैदा हुआ। नाना ने उसका नाम रखा, उत्तम।
उत्तम, यानी सबसे अच्छा।
मां को वो नाम पसंद नहीं आया।
नाम बदलकर अरुण कर दिया गया।
पर उस घर में उस नाम को लेकर एक और बात दर्ज है।
ननिहाल के कुलगुरु उस बच्चे को देखने आए। उन्होंने उसकी हंसी देखी।
और कहा कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में इसी नाम से पहचाना जाएगा उत्तम।
उस दिन उस कमरे में जो लोग बैठे थे, उनमें से किसी ने इस बात को गंभीरता से लिया होगा, यह मानना मुश्किल है।
क्योंकि आगे जो हुआ, वो इसका ठीक उल्टा था।
उसकी जिंदगी में सबसे ज्यादा बार जो चीज बदली, वो कोई फिल्म नहीं थी।
उसका नाम था।
वो नाम अभी चार बार और बदलेगा, चार बार पिटेगा, और एक भोर में पूरा बंगाल उसे ठुकरा भी देगा।
पिता का नाम सतकड़ि चट्टोपाध्याय। जड़ें हुगली में। पेशा एक ही, और पूरी उम्र वही रहा।
वो चौरंगी के मेट्रो सिनेमा में प्रोजेक्शनिस्ट थे। वही मेट्रो, जहां तब तक एक भी बंगाली फिल्म नहीं दिखाई गई थी।
मां चपला देवी। दो छोटे भाई, बरुण और तरुण। घर भवानीपुर में, गिरीश मुखर्जी रोड पर। बड़ा परिवार, छोटी कमाई।
पर उस घर में एक चीज थी, जो पैसे से नहीं आती।
पिता और चाचा ने मिलकर मोहल्ले का एक नाटक दल बनाया था। नाम, सुहृद समाज। रिहर्सल क्लबघर में होती, और मंचन गली में।
मां-बाप सख्त थे। शाम को किताब खुलनी चाहिए थी।
तो बच्चा चुपके से निकलकर क्लबघर की खिड़की पर खड़ा हो जाता।
कभी दरवाजे पर कान लगा देता, संवाद सुनता, और घर आकर अकेले दोहराता। डर लगा रहता था कि पकड़ा जाएगा हालांकि उसने खुद बताया है कि जिंदगी में उसके मां-बाप ने उसे कभी नहीं मारा।
बचपन के ये दृश्य कहीं बाहर से नहीं आए हैं।
आखिरी बरसों में उसने अपनी आत्मकथा लिखवाई थी। नाम, आमार आमि। यह सब उसी में दर्ज है, उसी की जबान से।
उस किताब का क्या हुआ, यह इस कहानी के आखिर में आएगा।
एक दिन वो पकड़ा गया।
पकड़ने वाली उसकी बड़ी बहन थी। पुतुल।
उसने घर में शिकायत नहीं की।
उल्टे उससे कहा कि जो देखकर आए हो, वो करके दिखाओ।
बच्चे ने उसके सामने एक दृश्य निभाया।
बहन हंस पड़ी। और फिर उसने वो बात कही, जो उस बच्चे की जिंदगी की पहली अभिनय-सलाह थी।
उसने कहा कि एक ही जगह खड़े मत रहो। थोड़ा घूमो-फिरो।
कुछ ही अरसे बाद वो स्कूल से लौटा और बहन को आवाज लगाई।
बहन नहीं आई। मां आई, चेहरा उतरा हुआ।
टाइफाइड।
एक दिन के बुखार में वो पीली पड़ चुकी थी।
उसने भाई को कमरे में बुलाया, और कहा कि तुम जात्रा सीखो, उसमें बहुत मजा आएगा।
वो ठीक नहीं हुई।
आगे चलकर, जिंदगी के अकेले पलों में, खुले आसमान की तरफ देखते हुए उसे बहन की वही आखिरी बात सुनाई देती रही।
जिस आदमी को देखने के लिए एक दिन पूरा बंगाल सड़कों पर टूट पड़ेगा, उसका पहला दर्शक जा चुका था।
और यह याद रखिएगा कि उसे अभिनय की पहली सलाह किसी निर्देशक ने नहीं दी थी। एक बहन ने दी थी, जो उसे बचाने के लिए झूठ बोल चुकी थी।
स्कूल चकरबेड़िया में था, घर से पैदल की दूरी पर।
बहुत छोटी उम्र में हेडमास्टर क्लास में आए और पूछा कि नाटक में कौन काम करेगा।
पूरी क्लास चुप।
एक लड़का खड़ा हुआ, और छाती धड़कते हुए बोला कि वो कर लेगा।
उसे गयासुर के बचपन वाला हिस्सा मिला।
नाटक के बीच में बांस का बना मंच टूटकर गिर गया, क्योंकि बड़े गयासुर वाला लड़का ऊपर बहुत उछल रहा था। मंच दोबारा जोड़ा गया, और नाटक पूरा हुआ।
उस दिन उसे मेडल मिला। वो उसे लेकर घर तक दौड़ता आया।
फिर मोहल्ले के लड़कों ने अपना दल बनाया, लूनार क्लब।
मंच के परदे के लिए घर-घर से साड़ियां और चादरें मांगी गईं, और उन्हें सेफ्टी पिन से जोड़ा गया। मुकुट चांदी के कागज से बने, और मेकअप पाउडर से हुआ।
उसी इंतजाम में उन्होंने अपना पहला नाटक खेला रवींद्रनाथ का मुकुट।
नाटक इतना चला कि पड़ोस के एक घर ने रिहर्सल के लिए अपना कमरा दे दिया।
और अब उस क्लब की एक ऐसी बात, जो हिंदी में लगभग कहीं नहीं लिखी गई।
1943 में उन लड़कों ने बंकिमचंद्र के आनंदमठ का एक विशेष मंचन किया।
उससे सत्रह सौ रुपये जुटे। पूरे के पूरे आजाद हिंद फौज के कोष में भेज दिए गए।
सत्रह बरस का एक लड़का, जिसका अपना घर मुश्किल से चल रहा था, नेताजी की फौज के लिए चंदा जुटा रहा था।
पढ़ाई साउथ सबर्बन स्कूल से होते हुए कॉमर्स कॉलेज तक पहुंची।
पर वहां रुक गई।
बरसों बाद उसने खुद कहा कि हालात ऐसे थे कि पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और नौकरी पकड़नी पड़ी।
नौकरी वो थी, जो उस दौर के कलकत्ता में सबसे सुरक्षित मानी जाती थी।
खिदिरपुर। पोर्ट कमिश्नर्स का दफ्तर। कैश विभाग। एक क्लर्क की कुर्सी।
महीने के दो सौ पचहत्तर रुपये। उसी बातचीत में उसने यह भी कहा कि उस वक्त अभिनय उसके लिए करियर नहीं था, सिर्फ शौक था। दफ्तर में भी एक क्लब था जो नाटक करता था, और वो उसमें भी खेलता था।
दिन में हिसाब। शाम को मंच।
और इसी बीच उसने अपने ऊपर वो मेहनत शुरू की, जो आज के किसी भी नौजवान को पढ़नी चाहिए।
आवाज साधने के लिए उसने निधानबंधु बनर्जी से शास्त्रीय संगीत सीखा।
तैराकी में वो जॉनी वाइजमुलर का दीवाना था वही तैराक, जो परदे पर टार्जन बना था। और भवानीपुर स्विमिंग एसोसिएशन में सौ गज की फ्रीस्टाइल का चैंपियन वो लगातार तीन साल रहा।
लाठी खेला सीखा। कुश्ती लड़ी। योग किया।
फुटबॉल में वो राइट-बैक खेलता था, और आखिरी सांस तक मोहन बागान का समर्थक रहा
पर एक चीज थी, जो इस पूरी मेहनत के बावजूद उसके साथ अटकी रही।
उसका उच्चारण।
उसके साथ काम करने वाली दो बड़ी अभिनेत्रियों ने बाद में साफ कहा है कि शुरुआती दिनों में उसका उच्चारण साफ नहीं था।
और उसने उस कमी पर जो काम किया, वो अजीब था।
उसने गीता और चंडीपाठ का अभ्यास शुरू किया।
यह वाक्य अभी बिल्कुल मामूली लग रहा है।
तीस बरस बाद यही अभ्यास उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा घाव बनने वाला था।
अब उस लड़की की बात, जिसके बिना यह कहानी वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन उसने अपने ही घर से एक लड़की को निकलते देखा, चचेरी बहन अन्नपूर्णा के साथ।
पूछने पर नाम मिला। गौरी रानी गांगुली।
उसके बाद वो शाम को क्लब की रिहर्सल छोड़ने लगा, और घर के आसपास मंडराने लगा, इस उम्मीद में कि वो लड़की फिर आएगी।
वो नहीं आई।
कई हफ्ते बाद वो आई।
लड़के ने हारमोनियम उठाया और गाना शुरू कर दिया।
उसे पक्का यकीन था कि उसकी आवाज सुनकर वो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ जाएगी, और वो हारमोनियम से नजर उठाएगा तो वो दरवाजे पर खड़ी होगी।
वो गाता रहा। कोई नहीं आया।
आखिर में अन्नपूर्णा ऊपर आई, और अपने साथ उसका संदेश लेकर आई।
संदेश यह था कि तुम बहुत अच्छा गाते हो, और वो तुम्हें ठीक से जानना चाहती है।
फिर वो फिर गायब हो गई।
एक दिन बेचैनी में वो घूमते-घूमते गंगा किनारे जा बैठा। और वहीं से सीधे उसके स्कूल पहुंच गया।
साथ में उनके घर का चौकीदार खड़ा था। लड़की ने सिर्फ आंख से इशारा किया, कि छुट्टी के वक्त आना।
वो आया।
और उसने वो सवाल पूछा, जो उस उम्र में कोई नहीं पूछता।
उसने कहा कि वो फिल्मों में जाना चाहता है। क्या तुम्हें मंजूर है?
उसने कहा कि अगर तुम हीरो बन गए, तो उससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी।
उसने यह सवाल इसलिए पूछा था, क्योंकि उसे अपनी पहली भूमिका मिल चुकी थी।
1947। एक हिंदी फिल्म। भरतलक्ष्मी स्टूडियो में पांच दिन का काम, वो भी एक्स्ट्रा के तौर पर।
किरदार यह था कि वो दूल्हा बनेगा, जिसे मंडप पर पीटा जाता है। और वो फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हुई।
अगले साल एक बंगाली फिल्म आई। निर्देशक नितिन बोस। कहानी रवींद्रनाथ की।
उसमें उसने असित बरन के बचपन वाला हिस्सा निभाया।
फिल्म का विज्ञापन अखबार में छपा।
वो उसमें अपना नाम ढूंढ रहा था।
नाम नहीं था।
भूमिका छोटी थी और वो अनजान था, इसलिए परदे पर चलने वाली नामावली में भी उसका नाम नहीं गया।
पहली रिलीज हुई फिल्म। और उसमें उसका कोई नाम ही नहीं था।
पर एक इंसान ने उसे उस भीड़ में पहचान लिया।
गौरी अपनी दादी के साथ वो फिल्म देखने गई थी। दादी ने मजाक में पूछा कि परदे पर कौन सा अभिनेता अच्छा लगा।
गौरी ने उसकी तरफ इशारा कर दिया।
और दादी को समझ आ गया कि यह मजाक का जवाब नहीं था।
उसी दिन से गौरी का घर से निकलना बंद, और रिश्ता कहीं और तय।
वो चुपके से निकलकर उसके पास पहुंची।
लड़के के पास न कमाई थी, न कोई नाम। फिर भी वो सीधे उसके पिता के पास गया, और हाथ मांग लिया।
पिता संपन्न आदमी थे। पर उन्हें उस लड़के की नीयत पर भरोसा हो गया, और उन्होंने हां कह दी।
1 जून 1948 को शादी हुई।
अब उन नामों की बात, जो एक के बाद एक फेल हुए।
1949 में वो पहली बार हीरो बना। परदे पर नाम गया, उत्तम चटर्जी। फिल्म नहीं चली।
अगली फिल्म में नाम बदलकर अरूप कुमार कर दिया गया। वो भी नहीं चली।
फिर वो लौटकर अरुण हो गया।
और 1951 में दो चीजें एक साथ हुईं, जिन्होंने उसकी जिंदगी बदल दी।
पहली। एक बड़े अभिनेता की नजर उस पर पड़ी।
पहाड़ी सान्याल। उस दौर के जाने-माने कलाकार।
उन्हीं की वजह से उसे न्यू थियेटर्स में मौका मिला।
और उन्हीं ने उसे सलाह दी कि परदे पर वो एक नाम तय कर ले, और वो नाम यही रखे।
दूसरी। उसी साल एक फिल्म बन रही थी, सहयात्री। हीरो असित बरन तय थे, पर वो दूसरी तारीखों में फंस गए और अनुबंध पर दस्तखत नहीं कर सके।
वो भूमिका उस संघर्ष कर रहे लड़के के पास आ गई।
और उसी फिल्म में, जिंदगी में पहली बार, उसका नाम परदे की नामावली में छपा। फिल्म की पुस्तिका के कवर पर उसका चेहरा गया।
इस बार उसने वही नाम चुना, जो जन्म के पहले ही दिन उसकी अपनी मां ने लौटा दिया था।
नाम उत्तम कुमार।
उसी फिल्म में हेमंत मुखर्जी ने पहली बार उसके लिए तीन गाने गाए।
न फिल्म चली, न गाने।
और यहां इस कहानी की सबसे चुप बात आती है।
1947 से 1951 के बीच उसकी जितनी भी फिल्में बनीं, सब पिटीं।
सिनेमा पढ़ाने वाले जो लोग आज उस दौर पर काम करते हैं, वो एक बात दर्ज करते हैं।
उन बरसों की उसकी फिल्में अब मौजूद नहीं हैं। प्रिंट खो चुके हैं।
उसकी नाकामी का कोई सबूत आज दुनिया में नहीं बचा। जो बचा, वो सिर्फ वो है जो उसने उस नाकामी के बाद बनाया।
पर उस वक्त उसे यह कोई नहीं बता सकता था।
उस वक्त स्टूडियो में उसका एक खिताब बन चुका था, जो पीठ पीछे नहीं, मुंह पर बोला जाता था।
फ्लॉप मास्टर जनरल।
और एक दूसरा ताना भी था। लोग उसे देखकर कहते लो, नया दुर्गादास आ गया।
दुर्गादास बनर्जी उस जमाने के बड़े सितारे थे, जो मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक कामयाबी से पहुंचे थे। बड़े घर के, रईस, तराशे हुए आदमी।
यानी वो ताना सिर्फ नाकामी का नहीं था। वो यह याद दिलाने के लिए था कि तुम कहां से आए हो।
वो टूट गया।
उसने तय कर लिया कि सिनेमा छोड़ देगा और पोर्ट की पक्की नौकरी में लौट जाएगा।
उस मोड़ पर उसे गौरी ने रोका।
उन्होंने कहा कि जिस काम में मन नहीं लगता, उसमें लौटने से कुछ नहीं मिलेगा।
जिस आदमी को पूरी इंडस्ट्री नाकाम मान चुकी थी, उसके लिए उस साल की सबसे बड़ी पूंजी यही एक वाक्य था।
1952। निर्देशक निर्मल दे ने उसे बुलाया।
बाकी लोगों को उसमें कुछ नहीं दिखा था। निर्मल दे को दिखा।
फिल्म का नाम था बासु परिबार।
और वो चल गई।
पच्चीस साल की उम्र में, आठ बरस की लगातार पिटाई के बाद, उसे पहली कामयाबी मिली।
उसने उसी साल पोर्ट की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
बरसों बाद उसने कहा कि किरदार को तोड़कर समझना उसने सबसे पहले निर्मल दे से ही सीखा।
और ठीक इसी दौर में उसने वो काम किया, जो उसकी असली मरम्मत थी।
1953 में वो मंच पर लौटा। नाटक का नाम था श्यामली।
वो नाटक लगातार करीब पांच सौ रातें चला।
पांच सौ रातें, हर रात एक ही किरदार, एक ही संवाद, एक जीवित भीड़ के सामने।
जो उच्चारण उसकी सबसे बड़ी कमजोरी था, वो पचास के दशक के मध्य तक पूरी तरह ठीक हो चुका था।
और आगे चलकर उसकी बांग्ला बोलने का ढंग खुद एक मानक बन गया वो नमूना, जिसे सुनकर लोग बोलना सीखते हैं।
1953 में ही शाड़े चुयात्तोर आई। और उसमें एक नई अभिनेत्री उसके सामने खड़ी थी।
सुचित्रा सेन।
वो फिल्म महीनों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी। और उसने एक और काम किया, जिस पर कम ध्यान गया है।
कलकत्ता के पैराडाइस सिनेमा में साल भर ज्यादातर हिंदी फिल्में चलती थीं। वहां दिखाई जाने वाली वो पहली बंगाली फिल्म थी।
अगले साल अग्निपरीक्षा आई, जिसने उसे रोमांटिक हीरो बना दिया।
और वो फिल्म संयोग से उसी दिन रिलीज हुई, जिस दिन उसका जन्मदिन था।
आगे चलकर वो दोनों तीस फिल्मों में साथ आए।
उस जोड़ी के बारे में उसने खुद जो कहा, उसमें एक भी शब्द बनावटी नहीं है।
उसने कहा कि अगर सुचित्रा उसके साथ न होतीं, तो वो उत्तम बन ही नहीं पाता।
पर सिर्फ सुचित्रा के साथ की कहानी अधूरी है।
उसने लगभग उतनी ही फिल्में एक और अभिनेत्री के साथ कीं। सावित्री चटर्जी।
और उनके बारे में एक किस्सा है, जो बताता है कि यह आदमी असल में क्या था।
एक शाम वो अपनी रोज की महफिल में बैठा था। गाना चल रहा था, हंसी-मजाक चल रहा था।
अचानक वो उठ खड़ा हुआ।
लोग हैरान रह गए, क्योंकि उसके जाने का वक्त नहीं हुआ था।
उसने वजह बताई। कल सुबह सावित्री के साथ एक दृश्य है। घर जाकर तैयारी करनी है।
वरना वो पूरा दृश्य उसके हाथ से ले जाएंगी।
बंगाल का सबसे बड़ा सितारा, महफिल छोड़कर घर जा रहा था, क्योंकि उसे अपनी सह-कलाकार से डर लगता था।
उसकी तस्वीरें आज हर जगह हैं। पर एक बात उन तस्वीरों से नहीं दिखती।
वो पारंपरिक अर्थों में सुंदर नहीं था।
लंबा जरूर था, पर नाक चपटी थी, होंठ मोटे थे, और कद-काठी कोई खास नहीं थी।
उसके अपने दौर के कई नौजवान अभिनेता उससे कहीं ज्यादा सुडौल थे।
जो चीज उसके पास थी, उसे परदे की मौजूदगी कहते हैं। और आम तौर पर माना जाता है कि यह चीज या तो होती है, या नहीं होती।
पर उसकी शुरुआती नाकामियां यही साबित करती हैं कि उसके पास वो चीज पैदाइशी नहीं थी।
उसने वो बनाई।
बालों की वो लापरवाह सी लट, होंठों के कोने पर टिकी सिगरेट, वो हल्का सा तनाव, सिर का वो आधा मुड़ना, और आखिर में वो अचानक खुलने वाली मुस्कान यह सब किसी वरदान से नहीं आया था।
यह बरसों की मेहनत का नतीजा था।
उस दौर में एक और नाम था, जिसे बंगाल हमेशा उसी के साथ जोड़कर लेता था।
सौमित्र चटर्जी।
बंगाल ने उन दोनों को हमेशा आमने-सामने खड़ा किया। सौमित्र ने खुद कहा है कि उनका और उत्तम का नाम राज्य की दो संस्थाओं जैसा हो गया था मोहन बागान और ईस्ट बंगाल।
पर वही सौमित्र यह भी कहते रहे कि लोकप्रियता में उत्तम कुमार से आगे कोई नहीं निकल सका। वो खुद पास तक पहुंचे, पर आगे हमेशा वही रहा।
और असल जिंदगी में वो दोनों दुश्मन नहीं थे।
वो अक्सर साथ बैठते थे। शहर के एक पुराने होटल में, देर तक, गिलास सामने रखकर।
जिन दो नामों को पूरा बंगाल आपस में लड़ाता रहा, वो दोनों शाम को एक ही मेज पर होते थे।
अब उस अंधेरे कमरे पर लौटिए, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी।
1957। मेट्रो सिनेमा ने तय किया कि वो पहली बार एक बंगाली फिल्म दिखाएगा।
फिल्म का नाम था चंद्रनाथ। शरतचंद्र के उपन्यास पर बनी। हीरो वही लड़का, हीरोइन सुचित्रा सेन।
और उस शाम प्रोजेक्शन रूम में वही लंबा, दुबला, गंभीर आदमी बैठा था, जो बरसों से उस परदे पर रोशनी फेंकता आया था।
रोशनी उसने फेंकी। और उस रोशनी में जो चेहरा खड़ा हुआ, वो उसका अपना बेटा था।
बाप ने कभी परदे पर अपना नाम नहीं देखा। पर वो परदा रोज उसी ने जिंदा किया था।
अगले ही साल एक और चीज हुई, जो हिंदी के पाठकों के लिए खास है।
उसकी एक बंगाली फिल्म में एक हिंदी गाना रखा गया।
गाने वाले थे मोहम्मद रफी। और उन्होंने उसके लिए एक पैसा नहीं लिया।
किसी बंगाली फिल्म में वो पहला हिंदी गाना था।
और फिर 1959 में उसे वो नाम मिला, जिससे आज पूरा हिंदुस्तान उसे जानता है।
वो नाम किसी सरकार ने नहीं दिया था। किसी पुरस्कार समिति ने नहीं दिया था।
एक बांग्ला पत्रिका ने उसे पहली बार महानायक लिखा।
और वो शब्द चिपक गया।
तीस साल पहले जिस बच्चे की मां ने उसका नाम लौटा दिया था, उसे अब लोग एक नया नाम दे रहे थे।
अब सत्यजित रे इस कहानी में दाखिल होते हैं।
साठ के दशक की शुरुआत में रे ने उसे रवींद्रनाथ के एक उपन्यास पर बनने वाली फिल्म के लिए बुलाया, और खलनायक की भूमिका दी।
उसने मना कर दिया। उसका कहना था कि इस किरदार के साथ कोई और ज्यादा इंसाफ करेगा।
और फिर उसने रे से यह गुजारिश की कि वो फिल्म उसे बनाने दें, अपने बैनर तले।
जो आदमी किरदार के लिए खुद को नाकाफी बता रहा था, वो उसी फिल्म पर अपना पैसा लगाने को तैयार था।
वो फिल्म तब बनी नहीं। पर रे ने वो नाम याद रखा।
1966। नायक।
एक सुपरस्टार, जो पुरस्कार लेने ट्रेन से दिल्ली जा रहा है, और रास्ते में एक नौजवान पत्रकार के सामने अपने डर, अपनी गलतियां और अपना अकेलापन खोलता जाता है।
रे ने खुद लिखा है कि उन्होंने वो भूमिका इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें लगा कि यह अभिनेता उससे आसानी से जुड़ पाएगा।
क्योंकि वो कहानी एक साधारण मध्यवर्गीय नौजवान की थी, जिसे फिल्मों में मौका मिलता है और जो तेजी से ऊपर चढ़ जाता है।
रे ने साफ लिखा कि यह फर्श से अर्श तक की कहानी है, और इसमें उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
इस बात को याद रखिएगा। कहानी के आखिर में खुद उत्तम कुमार इसका ठीक उल्टा कहने वाले हैं।
उस फिल्म में एक दृश्य है जो आज तक दोहराया जाता है। एक पुराना कलाकार नए लड़के को डांटता है कि यह क्या तरीका है, यह हॉलीवुड है क्या, तुम बुदबुदा क्यों रहे हो।
मजा यह है कि असल जिंदगी में उत्तम कुमार की पहचान ही यही थी संवाद को ऊंचा उछालने की जगह उसे दबाकर, ठहराकर बोलना।
रे ने वो असली ताना उठाकर फिल्म में रख दिया था।
और उस फिल्म के लिए उसने जो किया, वो शायद उस दौर का कोई सितारा नहीं करता।
शूटिंग से कुछ समय पहले उसे चेचक हुई थी। चेहरे पर उसके निशान साफ दिख रहे थे।
उसने मेकअप न करने पर हामी भर दी।
बंगाल का सबसे बड़ा हीरो, कैमरे के सामने अपने दाग लेकर खड़ा हो गया।
नायक के प्रीमियर के दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले नहीं देखा था।
भीड़ ने उसकी कमीज नोच ली।
वो फिल्म बर्लिन तक गई और वहां सम्मानित हुई। और उसे देखकर हॉलीवुड की एलिजाबेथ टेलर ने कहा कि वो इस अभिनेता से मिलना चाहती हैं, उसके साथ काम करना चाहती हैं।
1967 इस कहानी का सबसे अजीब साल है। उसमें दो चीजें एक साथ हुईं।
पहली। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तब तक कई बरसों से दिए जा रहे थे, पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी उस साल पहली बार बनी।
वो पुरस्कार पाने वाला देश का पहला अभिनेता यही आदमी था। और एक नहीं, दो फिल्मों के लिए एक साथ।
उसने बंबई में अपनी सबसे बड़ी छलांग लगाने की कोशिश की।
उसने एक हिंदी फिल्म खुद बनाई। रंगीन, महंगी, बड़ी लोकेशन। सामने वैजयंतीमाला।
और वो फिल्म असल में उसी अग्निपरीक्षा का हिंदी रूपांतर थी, जिसने तेरह साल पहले उसे बंगाल का हीरो बनाया था।
जो जादू बंगाल में चला था, वो बंबई में नहीं चला।
फिल्म बुरी तरह पिटी।
जो पैसा उसने बरसों में जोड़ा था, वो उसी में चला गया। और ऊपर से कर्ज।
उसी दौर में, एक शूटिंग के बीच, उसे पहला दिल का दौरा पड़ा।
और यह भी जान लीजिए कि उससे पहले वो बंबई के कई बड़े मौके ठुकरा चुका था जिनमें राज कपूर की संगम भी थी।
अब समझिए कि कर्ज में डूबा हुआ आदमी आगे क्या करता है।
वो सिर्फ अपना कर्ज नहीं उतारता। वो दूसरों के लिए एक संस्था खड़ी करता है।
साठ के दशक के आखिर में उसने कलाकारों की पुरानी संस्था छोड़ी, और अपनी खुद की बनाई। शिल्पी संसद। फिल्म इंडस्ट्री के गरीब कर्मचारियों और छोटे कलाकारों के लिए।
वो उसका आजीवन अध्यक्ष रहा।
शो करके पैसा जुटाया जाता था, पर उतना जमा नहीं होता था।
तो उसने तय किया कि संस्था के लिए एक पूरी फिल्म बनाएगा, और उसकी सारी कमाई वहीं जाएगी।
1973। बोन पलाशिर पदाबली।
निर्देशन उसने किया, पटकथा उसने लिखी, और पार्श्व संगीत भी उसी ने दिया।
बड़े से बड़ा कलाकार बिना पैसे लिए काम करने आया। खुद उसने भी एक पैसा नहीं लिया।
और वो फिल्म खूब चली।
यह कोई एक बार का काम नहीं था।
साठ के दशक में जब तकनीशियनों का वितरकों से झगड़ा हुआ, तो वो तकनीशियनों के साथ खड़ा हो गया।
और अपनी ही फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ धरने पर बैठ गया।
उसकी मौत के बाद इंडस्ट्री के एक निर्देशक ने जो कहा, उससे पूरी बात एक लाइन में खुल जाती है।
उन्होंने कहा कि संस्थाओं ने, फिल्मी विद्वानों ने और बौद्धिक तबके के एक हिस्से ने उसे लगातार नजरअंदाज किया।
पर स्टूडियो के मजदूरों, तकनीशियनों और दिहाड़ी वालों ने उसे बेशर्त प्यार दिया।
और यह भी जान लीजिए कि वो दौर उसके लिए आसान नहीं था।
सत्तर का दशक बंगाल में नौजवानों के गुस्से का दशक था। पढ़े-लिखे लड़के सड़कों पर थे, और पुरानी हर चीज सवालों के घेरे में आ गई थी।
उस गुस्से से वो भी नहीं बचा। स्टूडियो की दीवारों पर उसके खिलाफ लिखा गया, और कई बार सामने भी सुनना पड़ा।
उसी दौर में उसने ऐसी फिल्में करनी शुरू कीं, जिनमें वो हीरो नहीं, दादा था।
एक फिल्म में वो ऐसा बड़ा भाई है, जिसे कभी मोहल्ले के लड़के पूजते थे, और अब वही लड़के उसे नीचा दिखाते हैं। उसका कारोबार डूब चुका है, और उसकी बात का कोई वजन नहीं बचा।
परदे पर वो अपने ही दौर का दृश्य निभा रहा था।
सत्तर के दशक के मध्य में शक्ति सामंत उसे एक ऐसी फिल्म में ले आए, जो एक साथ बंगाली और हिंदी दोनों में बनी। नाम, अमानुष। सामने शर्मिला टैगोर।
उस फिल्म में उसका किरदार एक टूटा हुआ, शराब में डूबा हुआ, पर भीतर से खरा आदमी था।
और उस फिल्म का एक गाना आज भी हिंदुस्तान के हर कोने में बजता है।
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा।
उसी गाने पर किशोर कुमार को फिल्मफेयर मिला।
पचास के करीब पहुंच चुके, कर्ज में डूबे एक आदमी ने बंबई से आखिरकार वो चीज ले ली, जो कुछ बरस पहले उसके हाथ से फिसल गई थी।
और 1975 उसके करियर का सबसे अजीब साल है।
उस साल उसकी छह फिल्में आईं।
छहों चलीं।
एक हास्य फिल्म, एक ऐसे डॉक्टर की कहानी जो जिंदगी भर झुका नहीं, एक राजा जो साधु बनकर लौटता है, और एक ऐसा किरदार जिसमें वो सिरे से खलनायक था।
उस आखिरी फिल्म के लिए उसे मना किया गया था, कि दर्शक तुम्हें इस रूप में कभी नहीं देखना चाहेंगे।
उसने वो फिल्म फिर भी की।
1979 में, उसने एक और काम किया जिसका जिक्र कम होता है।
पिछले साल बंगाल में भीषण बाढ़ आई थी।
राहत के पैसे जुटाने के लिए उसने एक चैरिटी क्रिकेट मैच कराया। एक तरफ बंगाली फिल्म इंडस्ट्री, दूसरी तरफ बंबई की फिल्म इंडस्ट्री।
बंगाल की टीम की कप्तानी उसने खुद की।
और बंबई की टीम की कप्तानी की दिलीप कुमार ने।
और अब वो हिस्सा, जिसे इस कहानी से निकाल देना बेईमानी होगी।
1948 में जिस लड़की के लिए वो बिना कमाई और बिना नाम के उसके पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया था, उसी गौरी के साथ उसका घर आगे चलकर वैसा नहीं रहा।
1963 में पर्दे के बाहर उसकी जिंदगी में सुप्रिया देवी आईं। वही अभिनेत्री, जो 1952 की उसी पहली कामयाब फिल्म में उसके साथ परदे पर थीं, जिसने उसे फ्लॉप मास्टर जनरल से उत्तम कुमार बनाया था।
उसके बाद उसकी जिंदगी दो घरों में बंट गई।
उसने गौरी से कानूनी अलगाव कभी नहीं लिया।
इस पर बंगाल में बरसों बहस हुई, और आज भी होती है। मैं उस बहस में नहीं पड़ूंगा। यह पन्ना किसी के निजी फैसलों पर अदालत लगाने के लिए नहीं है, और तीनों में से कोई आज सफाई देने के लिए मौजूद नहीं है।
पर एक बात दर्ज करना जरूरी है, क्योंकि वो उसी ने दर्ज की है।
आमार आमि का पहला मसौदा जब सुप्रिया देवी ने पढ़ा, तो उन्हें लगा कि उसमें उनकी जगह बहुत कम है।
उसने किताब में एक हिस्सा और जोड़ा।
यानी जो आदमी जिंदगी भर लोगों की उम्मीदों के हिसाब से जिया, वो अपनी आत्मकथा भी पूरी तरह अकेले नहीं लिख पाया।
1967 में उसने एक बच्ची को कानूनी तौर पर गोद भी लिया था।
और उसके जाने के बाद उसके दोनों घर कभी एक जगह नहीं आ पाए।
अब उस आदमी की अपनी जबान से सुनिए, क्योंकि वो मौका बहुत कम मिला है।
20 जुलाई 1980 को उसने एक लंबी बातचीत दी। वो इंटरव्यू लगभग नहीं देता था, और उस पत्रकार को डेढ़ साल से टाल रहा था।
वो उसकी आखिरी प्रकाशित बातचीत निकली।
उससे पूछा गया कि इतनी बड़ी लोकप्रियता कैसी लगती है।
उसने कहा कि अच्छी लगती है। पर जब वो हद पार कर जाती है तो मुसीबत बन जाती है। लोग छूते नहीं, चिकोटी काटते हैं, कपड़े फाड़ देते हैं, कभी गाड़ी का शीशा तोड़ देते हैं।
उसने उसे एक ही शब्द दिया। घुटन।
फिर उससे पूछा गया कि क्या यह छवि उसके अभिनय को भी बांधती है।
उसने कहा, हां।
उसने कहा कि वो किसी किरदार को अपने ढंग से नहीं कर पाता, अगर वो उत्तम कुमार की बनी-बनाई छवि से टकराता हो।
उसने यह भी कहा कि वो कभी एक शातिर, सचमुच का खलनायक करना चाहता है। पर उसे मालूम है कि लोग मंजूर नहीं करेंगे।
फिर उससे पूछा गया कि अब तक का कौन सा किरदार करने में उसे सबसे ज्यादा मजा आया।
उसका जवाब एक शब्द का था।
कोई नहीं।
पूछा गया, एक भी नहीं?
उसने कहा कि कुछ फिल्मों के कुछ हिस्से अच्छे लगे, बस इतना ही।
और नायक?
अब वो बात याद कीजिए जो रे ने लिखी थी कि यह कहानी उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
उत्तम कुमार ने कहा कि उसे उस किरदार में अपनी कोई झलक नहीं दिखती।
उसने कहा कि उसकी समझ में यह आया ही नहीं कि वो आदमी आखिर किस बात से इतना परेशान है।
अब आखिरी हफ्ते पर आइए।
दो साल पहले उसे एक और दौरा पड़ चुका था। उसके बाद डॉक्टरों ने दिल से जुड़ी एक और तकलीफ पकड़ी थी, और जेब में हमेशा एक दवा रहने लगी थी, जो सीने में अचानक ऐंठन उठने पर काम आती।
डॉक्टरों ने उसे दो चीजों से रोका था।
इतना काम मत करो। और शराब छोड़ दो।
उसने दोनों में से एक भी बात नहीं मानी।
काम इसलिए नहीं छोड़ सका कि कर्ज था, संस्था थी, और उस अकेले नाम पर टिकी एक पूरी इंडस्ट्री थी।
और बाकी जो था, वो शायद उसी घुटन का दूसरा नाम था, जिसका जिक्र उसने चार दिन पहले खुद किया था।
22 जुलाई। सेट पर मेकअप करने वाले ने देखा कि वो उखड़ा हुआ है।
उसने पूछा कि आप थोड़ा आराम क्यों नहीं करते, इतना काम करके खुद को क्यों तोड़ते हैं।
जवाब में उसने कहा कि बहुत लंबा वक्त हो गया, अब शायद उसकी जरूरत खत्म हो गई है।
23 जुलाई की सुबह घर के पास खड़ी उसकी गाड़ी से उसका टेप रिकॉर्डर चोरी हो गया।
वो टेप रिकॉर्डर वो हर जगह साथ रखता था। उस पर गाने सुनता था, और अपनी आवाज भी रिकॉर्ड करता था।
उस चोरी ने उसे तोड़ दिया।
स्टूडियो पहुंचा तो उसका मेकअप रूम किसी और के पास था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
फिर उस दिन का दृश्य आया। एक सीढ़ी। चढ़ना और उतरना।
उसके हिसाब से यह मामूली दृश्य था।
पर हर बार उसे लगा कि ठीक नहीं हुआ।
सात बार।
आखिर में निर्देशक ने बाकी लोगों से चुपके से कहा कि जोर से ताली बजा दो, ताकि वो और रीटेक न मांगे।
जिस फिल्म का वो दृश्य था, वो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के पिग्मेलियन पर बनी थी।
कहानी उस आदमी की, जो एक लड़की का उच्चारण सुधारता है।
यानी वो आदमी, जिसने अपनी जबान खुद घिसकर तैयार की थी, जिसे शुरू में साफ न बोल पाने का ताना मिला था, आखिरी बार परदे पर किसी और की जबान सुधार रहा था।
और तिरपन साल की उम्र में, दिल के कई दौरे झेल चुका वो आदमी, सातवीं बार भी सीढ़ी चढ़-उतरकर यही सोच रहा था कि अभी ठीक नहीं हुआ।
उस शाम वो एक दोस्त की महफिल में गया, और देर रात तक वहीं रहा।
आधी रात के आसपास तबीयत बिगड़ी।
वो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल गया घर से पांच मिनट का रास्ता।
रात तीन बजे उसे भर्ती किया गया। शहर के बड़े हृदय-रोग विशेषज्ञों का एक बोर्ड बैठा।
और उस बोर्ड में जो एक डॉक्टर उसे संभाल रहा था, उसका नाम था लालमोहन मुखर्जी।
यह वही लड़का था, जिससे उसकी दोस्ती सातवीं क्लास में साउथ सबर्बन स्कूल में हुई थी।
स्कूल से लेकर आखिरी रात तक, वो साथ था।
पूरी रात और अगला पूरा दिन कोशिश चलती रही।
24 जुलाई 1980। रात साढ़े नौ बजे के करीब वो चला गया।
अगले दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले कभी नहीं देखा था।
एक खुली ट्रक। सफेद फूलों के ढेर। और दक्षिण कलकत्ता की सारी सड़कें रुक गईं।
अगली सुबह आनंदबाजार पत्रिका के पहले पन्ने पर जो शीर्षक छपा, उसका मतलब सिर्फ इतना था सिनेमा का इंद्र गिर गया।
और उसी दिन एक और चीज गायब हो गई।
वो अपनी आत्मकथा लिख रहा था। नाम, आमार आमि।
जिस दिन वो गया, उस पांडुलिपि का कोई पता नहीं चला। वो चोरी हो गई।
फिर बरसों बाद, एक अखबारनवीस को वो मिली। और तीस साल बाद, कोलकाता पुस्तक मेले में वो छपकर सामने आई।
उन पन्नों में वो अपने डर के बारे में लिखता है। कि यह रोशनी, यह चमक, कुछ भी टिकने वाला नहीं। कि यह किसी भी पल बुझ सकती है, और उसे और गहरे अंधेरे में फेंक सकती है।
जिसे पूरा बंगाल महानायक कहता था, वो अकेले में अंधेरे की गिनती कर रहा था।
और एक तारीख, जो इस कहानी में अक्सर छूट जाती है।
जिस औरत ने उसे पोर्ट की नौकरी में लौटने से रोका था, जिसकी वजह से यह पूरा नाम बना गौरी वो उसके जाने के नौ महीने बाद ही चली गईं।
अब आज पर आइए।
3 सितंबर 2026, उस बच्चे के जन्म को आज सौ साल पूरे हो रहे हैं।
अहिरीटोला और टॉलीगंज में उसकी मूर्तियों पर माला चढ़ेगी, और बिजली सिनेमा के सामने बीस फुट ऊंचा कटआउट खड़ा होगा।
न्यू टाउन में उसके नाम के फिल्म केंद्र की नींव रखी जा रही है, और डाक विभाग भी उसके नाम पर स्मृति-सामग्री जारी कर रहा है।
डाक टिकट तो सत्रह साल पहले ही आ चुका था।
चार दिन का उत्सव जिस फिल्म से शुरू होगा, वो वही है नायक। जिसकी नई, साफ की हुई कॉपी हाल में परदे पर लौटी है, और एक नई पीढ़ी उसे पहली बार बड़े परदे पर देख रही है।
***
जन्म : 3 सितम्बर 1926
स्थान : अहिरितोला, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
मृत्यु : 24 जुलाई 1980
स्थान : बेल व्यू क्लिनिक, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
वीर विनोद छाबड़ा
आज की पीढ़ी ने यक़ीनन गुज़रे दौर की ख़ूबसूरत श्यामा को नहीं देखा होगा. वो संगीतकारों की पहली पसंद होती थीं. क्योंकि उनकी धुनों पर बने नग्मों पर वो जिस अंदाज़ से थिरकतीं थीं, झूमती और ठुमकती थीं, वो हिट ही नहीं सार्थक भी हो जाते थे. मज़े की बात ये कि श्यामा किसी भी सूरत से डांसर नहीं थीं. ज़्यादा नहीं, यू-ट्यूब पर सिर्फ़ ये गाना ही देख लें - ऐ दिल मुझे बता दे, तू किस पे आ गया है...(भाई भाई, 1956). अगर अच्छा लगे तो ये भी देख लें - 'ऐ लो मैं हारी पीया...(आर-पार, 1955). ऐसे एक नहीं दर्जनों गाने हैं, जिन्हें श्यामा ने अपने चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों, आखों, पलकों और होटों की हरकतों ने यादगार बना दिया. कली अनार की इत ना सताओ प्यार करने की कोई रीत बताओ...(छोटी बहन, 1959), मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का...न तो कारवां की तलाश है...(बरसात की रात, 1960), सुन सुन ओ ज़ालिमा....(आर-पार), देखो वो चाँद छुप के करता है क्या ईशारे...(शर्त, 1954), छुपा के मेरी आँखों को...(भाभी, 1957). गीत-संगीत के लिए गज़ब का दौर था पचास से साठ के सालों का वक़्त, न सिर्फ गायकों, गीतकारों और संगीतकारों के लिए भी बल्कि कलानेत्रियों के लिए भी. उनकी आँखों, पलकों, होटों और उन पर तैरती मुस्कान को दिल-ओ-दिमाग में बैठा कर शायर गाने गढ़ते थे और गाने वाले भी खो जाते थे.
1935 में लाहोर में जन्मी श्यामा तब खुर्शीद अख़्तर होती थी. चालीस के सालों में वो बम्बई आयी. सहेलियों के साथ 'ज़ीनत' (1945) की शूटिंग देख रही थी. एक डांस सीन में कुछ लड़कियों की ज़रूरत थी. नायिका नूरजहां के पति और डायरेक्टर शौकत हुसैन रिज़वी ने लड़कियों से पूछा फिल्म में काम करोगी?श्यामा तुरंत बोल उठी, मैं करुँगी. और इस तरह बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट खुर्शीद की फिल्मों में एंट्री हुई. प्रोड्यूसर-डायरेक्टर विजय भट्ट ने कहा, खुर्शीद नाम की तो बहुत लड़कियां हैं फ़िल्मइंडस्ट्री में, मगर तुम श्यामा नाम की अकेली होगी. और सचमुच आज तक उनके नाम जैसी और साथ-साथ उनकी जैसी दूजी न हुई. जब वो देवानंद-निम्मी के साथ 'सज़ा' (1951) कर रही थीं तो फोटोग्राफर फली मिस्त्री उनकी खूबसूरती को कैमरे में क़ैद करते-करते खुद ही क़ैद हो गए. श्यामा को भी अच्छे लगे. दोनों ने छुप कर शादी की. इसलिए कि श्यामा मुस्लिम और फली मिस्त्री पारसी. दोनों के परिवार राज़ी नहीं. दूसरा कारण था, फिल्मों से दूर हो जाना. उन दिनों नायिका की शादी हुई नहीं कि उसकी रोमांटिक इमेज ख़त्म हो गयी. उनकी शादी का राज़ कई साल बाद खुला जब श्यामा मां बनने को हुई.
श्यामा 1945 से 1980 तक इंडस्ट्री में एक्टिव रहीं और इस दौरान वो 147 फिल्मों में नज़र आयीं. वो बेहद खूबसूरत थी, चेहरा फोटोजेनिक था, टैलेंट था. 'तराना' में वो दिलीप कुमार की होने वाली पत्नी थी, लेकिन दिलीप कुमार के दिल में मधुबाला थी. गुरुदत्त की हिट 'आरपार' की वो नखरे वाली चुलबुली नायिका थी. 'बड़ी बहन'(1959) में श्यामा का राजेंद्र कुमार के सामने डबल रोल था, एक शैतान लड़की का और दूसरा सीधी-सादी-डरपोक लड़की. बहुत पसंद की गयी ये फिल्म. बरसों बाद राखी ने इसी पर आधारित 'शर्मीली' की थी. मगर इसके बावजूद श्यामा को हर बार नायिका का रोल नहीं मिला. उन्हें कमतर आंका गया. लेकिन श्यामा को कोई फ़र्क नहीं पड़ा. जो भी रोल मिला कर लिया और पावरफुल परफॉरमेंस से अपनी मौजूदगी का भरपूर अहसास कराती रहीं. कई बार तो नायिका से ज़्यादा उन्हें सराहा गया. 'बरसात की रात' में उन्होंने मधुबाला को पीछे ढकेल दिया. 'शारदा' (1959) में वो राजकपूर की पत्नी थीं, जिसे एक दिन पता चलता है कि उसके पति का अपनी सौतेली मां (मीनाकुमारी) से कभी अफेयर रहा है. इसके लिए श्यामा को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला. स्टंट की दुनिया में उनकी 'ज़बक' (1961) हिट फिल्म थी जिसके हीरो महिपाल थे. जॉनी वॉकर के साथ भी श्यामा कई फिल्मों में नायिका रहीं, छूमंतर, चार पैसे, जॉनी वॉकर, दुनिया रंग रंगीली, मिस्टर कार्टून एमए और खोटा पैसा.
छोटी बहन, भाभी, मिलन, दुनिया झुकती है, घर बसा के देखो, जानवर, दिल दिली दर्द लिया आदि तमाम फिल्मों में कभी वो बुरी औरत तो कभी सहृदय नज़र आईं. 1979 में फली मिस्त्री की मौत से वो टूट गयीं. हालांकि उनके तीन बच्चे थे, दो बेटे और बेटी. लेकिन उन्होंने अपनी यादों की दुनिया के साथ अकेली रहना पसंद किया. वो अक्सर कहती थीं, लोग आये और चले गए, यादें छोड़ गए. मेरा बैरी कोई नहीं, सब दोस्त हैं. 14 नवंबर 2017 को 82 साल की उम्र में श्यामा ने अंतिम सांस ली, उन्हें लंग इंफेक्शन की समस्या थी.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
मुहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष
तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ. संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है. मुहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं. भले ही मुहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी. साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मुहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मुहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है. लेखक का कहना है कि मुहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मुहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफ़ल समझूंगा. इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है.
मुहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मुहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था. उनके पिता ख़ानसामा थे. रफ़ी के बड़े भाई मुहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा. वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा. यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी. कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा. एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना. वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए. ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. साल 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए. यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया. बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा.
मुहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे. वे छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे. क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई. हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे. रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए. संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए. उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए. मजबूरन व्यवस्थापक मान गए. रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए. इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए. उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी. बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला. उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे. उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई. उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई. उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बम्बई आने का न्यौता दिया. रफ़ी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए. रफ़ी अपने भाई के साथ बम्बई पहुंचे. अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया. यह 1944 की बात है. इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा. रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की. नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया. रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं- मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही. इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया. फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया. बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है. यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िन्दगी के मेले गवाया. इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया. यह गीत हिन्दी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है. इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए. इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया. इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा. इसके बाद फ़िल्म चाँदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया. बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है. इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया. इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे. फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मुहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे. रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई. रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं. देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिन्दुस्तान में ही रहे. इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये. रफ़ी ने जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे. भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये. यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था. शायद इसलिए दुनियाभर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए. ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे. संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे. मुहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया. उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी. मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे. उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा. उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये.
वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे. यह वह वक़्त था, जिसे हिन्दी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है. उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है. उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा.
रफ़ी साहब ने 31 जुलाई 1980 को आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी. उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. लग रहा था मानो ऱफी साहब कह रहे हों-
हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…
***
जन्म : 24 दिसम्बर 1924
स्थान : गांव मजीठा, ज़िला अमृतसर (पंजाब)
मृत्यु : 31 जुलाई 1980
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)
वीर विनोद छाबड़ा
फ़िल्मी दुनिया की परमानेंट सिस्टर का ख़िताब उढ़ा दिए जाने वाली साठ और सत्तर के सालों की मशहूर एक्ट्रेस नाज़िमा का 11 अगस्त 2025 को इस फानी दुनिया से रुख़सत फ़रमा गयी. वो 77 बरस की थीं. कुछ साल पहले उन पर लिखा ये आर्टिकल साझा कर रहा हूँ.
विचित्र है ये फ़िल्मी दुनिया भी. आज ज़र्रा आसमान पर बैठा दिखा तो दूसरे दिन धड़ाम ज़मीन पर. ज़मीं खा गयी आसमां कैसे कैसे? 25 मार्च 1948 को नासिक में जन्मी नाज़िमा का केस भी कुछ ऐसा ही है. उनका संबंध फ़िल्मी घराने से रहा. दादी शरीफा बाई और फूफी हुस्नबानो अपने दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्रियां थीं. बचपन से ही फिल्मों का शौक रहा. देवदास, बिराज बहु, अब दिल्ली दूर नहीं, हम पंछी एक डाल के आदि में बेबी चाँद के नाम से दिखी. वैसे उनका असली नाम था, मेहरूनिसा. पंद्रह साल की उम्र में अपने फूफा अस्पी ईरानी की 'उमर क़ैद' (1961) की नायिका बन गयी. उनके नायक थे सुधीर, जो बाद में हरदिल पसंद कॅरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में स्थापित हुए. मुकेश की आवाज़ में सुधीर-नाज़िमा पर फिल्माया ये गाना आज भी यादगार है...मुझे रात दिन ये ख्याल है वो नज़र से मुझको गिरा न दे...
किसी को यक़ीन नहीं होगा कि संजीव कुमार की बतौर नायक पहली फिल्म 'निशान' (1965) की नायिका नाज़िमा ही थी. याद करें इस गाने को...हाए तबस्सुम तेरा, धूप खिल गई रात में या बिजली गिरी बरसात में....संजीव के साथ नाज़िमा की एक अन्य फिल्म भी याद आती है, प्रसाद प्रोडक्शन की गोल्डन जुबली हिट 'राजा और रंक'...ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना, नहीं फिर जाना तू अपनी जुबान से ओ तेरे नैना हैं बईमान से...'अधिकार' में देब मुखर्जी उनके दीवाने थे... कोई माने या न माने जो कल तक तक थे अनजाने वो आज हम जान से प्यारे हो गए...जैमिनी की 'औरत' (1967) में राजेश खन्ना के ऑपोज़िट थीं नाज़िमा...शोला उल्फत का भड़का दे दिल में आग लगा दे...बाद के दिनों में संजीव कुमार और राजेश खन्ना तो सफलता की सीढ़ियां चढ़ते ही गए मगर नाज़िमा को कुछ नहीं मिला. दो साल बाद 'डोली' में वो राजेश की बहन का किरदार करती दिखीं. फिर तो वो स्थाई बहन हो गयीं, वो भी दुखियारी बहना, 'ग़ज़ल' में सुनील दत्त की तो 'बेईमान' में मनोज कुमार की...ये राखी बंधन है ऐसा....'अनजाना' में राजेंद्र कुमार के पीछे राखी लेकर घूमना पड़ा...हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है एक दिन साल में...पब्लिक को भी उनमें परफेक्ट दुखियारी बहन दिखने लगी, उनकी खिलखिलाहट नहीं सुनाई दी.
'अप्रेल फूल' में नाज़िमा को सायरा बानो की बहन बनना पड़ा तो 'ज़िद्दी' में आशा पारेख की. 'आरज़ू' में वो राजेंद्र कुमार की बहन थीं तो साधना की सहेली भी...जब इश्क़ कहीं हो जाता है तो ऐसी हालात होती है...'आये दिन बहार के' में वो आशा पारेख को आड़े वक़्त में सहारा देने वाली पक्की सहेली थीं, बहन की समानांतर भूमिका में...ए काश किसी दीवाने को हमसे भी मोहब्बत हो जाए...राजश्री फिल्म्स की कॉमेडी 'हनीमून' में सहेली लीना चंद्रावरकर के साथ भी नाज़िमा का रोल बराबरी का था, जिसमें दोनों अपने बॉय फ्रेंड्स से नाता तोड़ कर अरेंज मैरिज करती हैं मगर संयोग से लीना का पति अनिल धवन नाज़िमा का एक्स बॉय फ्रेंड होता है और नाज़िमा का पति सुरेश चटवाल लीना का एक्स बॉयफ्रेंड. दुर्भाग्य ये रहा कि लीना-अनिल पर तो दो-दो गाने फिल्माए गए लेकिन नाज़िमा-सुरेश पर एक भी नही. ऐसा ही करते हैं डायरेक्टर, किसी को उठाओ तो किसी को गिराओ. सबके अपने इंटरेस्ट होते हैं.
सत्तर के सालों की फ़िल्मी दुनिया नाज़िमा को 'रेसीडेंट सिस्टर' कहती थी. नाज़िमा ने इस बदहाली के लिए खुद को ही कसूरवार माना. नायिका के रोल के लिए लंबा इंतज़ार उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ इसलिए जो भी ऑफर आया, झट से स्वीकार कर लिया ये सोच कर कि प्रोडक्शन बड़ा है, फिर जिसकी बहन या सहेली बनना है वो नामी स्टार हैं. उनकी सुंदरता, प्रतिभा सब धरी की धरी ही रह गयी. उनके आसूओं में किसी को दर्द नहीं दिखा, गलेसरीनी समझे गए. हमने 'दयारे मदीना' (1975) में नाज़िमा को अंतिम बार देखा था. उसके बाद वो अचानक ही ग़ायब हो गयी. तरह-तरह की अफवाहें उड़ीं. किसी ने लिखा उन्हें कैंसर है तो किसी ने स्वर्ग ही भेज दिया, ये शीर्षक लगाते हुए कि सबसे ज़्यादा 'रेप' का शिकार हुई ये बहना. अंदाज़ा लगा सकते हैं, लिखने वाले का स्तर का. दरअसल नाज़िमा जब उन्होंने समझ लिया था कि बहन या सहेली के आगे उनका कोई स्कोप नहीं है तो अपने एक जहाजी दोस्त अरशद रहमान से उन्होंने शादी कर ली थी. उनके बच्चे हैं. कुछ साल पहले शौहर का इंतकाल हो चुका है और वो पक्की धार्मिक हो गयीं. मुंबई में ही गुमनामी की ज़िंदगी जीती रहीं. हिज़ाब से ढके रहने के कारण उन्हें कोई पहचानता नहीं पाता था. और वो ऐसा चाहती भी थीं.
कोलकाता के पत्रकार राहुल मिश्रा ने सुप्रसिद्ध कॉमेडियन महमूद के बेटे मक़सूद अली उर्फ़ अली अली के हवाले से एक तहरीर लिखी है. ये सिर्फ एक तहरीर ही नहीं है, बल्कि इसमें ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा छुपा है. इसमें ज़िन्दगी को लेकर तीन नज़रिये बयां किए गये है, एक नज़रिया महमूद साहब का है, एक उनके बेटे लकी अली का है और तीसरा नज़रिया राहुल मिश्रा जी का है. इस तहरीर को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए.
पत्रकार राहुल मिश्रा लिखते हैं- पिता के पास सत्ताईस गाड़ियां थीं। बेटे को छूने की इजाजत नहीं।..वो बेटा अगले महीने अड़सठ का हो जाएगा। और जब सफर पर निकलता है, तो बैग में एक चीज कभी नहीं भूलता। अपना कफन।
उसे पिता से रोज सुबह पांच रुपये मिलते थे।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं,
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है।
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए-
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं,
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया।
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं,
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है।
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए-
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं,
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया।
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।
हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में बहुत से ऐसे गुमनाम कलाकार हुए, जिन्होंने उस दौर में बेहद शानदार काम किया। और वक़्त के साथ कहीं ग़ुम हो गए। मशहूर कलाकारों को तो हम फिर भी याद कर लेते हैं। पर जिनका योगदान बहुत ज्यादा नहीं रहा। उनके बारे में हम अनजान ही रह जाते हैं। ऐसे ही एक गायक थे, "मोहम्मद हुसैन फ़ारूक़ी"। 1947 से 1950 के दौरान फ़ारूक़ी साहब ने कई फिल्मों में गीत गाये, व दो फिल्मों में अभिनय भी किया। आज उनकी यौमे-पैदाइश पर ख़िराज-ऐ-अक़ीदत.
फ़ारूक़ी साहब की पैदाइश 17 अगस्त 1915 को राजस्थान के झुंझुनू शहर के मोहल्ला पीरज़ादगांव में एक मज़हबी परिवार में हुई थी। इनकी बुनियादी शिक्षा इनके वालिद हाज़ी मुनीरुद्दीन के द्वारा घर पर ही हुई। इन्हें बचपन से ही गाने का बेहद शौक था। संगीत की दुनिया उन्हें बेहद लुभाती थी। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने राजस्थान के तमाम स्टेज समारोहों में गाना शुरू किया। पर उनके वालिद साहब उनके गाने के सख़्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई पूरी करके एक शिक्षक बनें। पर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। और एक दिन 1945 में वे अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के नाम एक सिफारिशी ख़त लेकर गायक के रूप में किस्मत आजमाने बम्बई आ गए। बम्बई में उनके जानने वाले एकमात्र शख़्स थे, आज़ाद फ़ारूक़ी, जो पुराने खार इलाके में रहते थे। तो वे कुछ समय के लिए उन्हीं के साथ रहने लगे।
आख़िरकार एक साल संघर्ष के उपरांत खेमचंद प्रकाश जी ने उन्हें अपने घर मिलने के लिए बुलाया। जब वे वहां पहुंचे, तो वहां पर मशहूर गायक व अभिनेता के एल सहगल जी भी मौजूद थे। सहगल साहब ने उन्हें कुछ गाने के लिए कहा, तो फ़ारूक़ी साहब ने उन्हीं की गाई, मशहूर लोरी, 'सो जा राजकुमारी सो जा ...' गा के सुनाई। सहगल साहब बेहद प्रभावित हुए, और बोले, बहुत बढ़िया, तुम्हारी आवाज़ में कुछ नयापन है। बस फिर क्या था, सहगल साहब की इतनी सी तारीफ बहुत थी, और उनका 'रंजीत मूवीटोन' के साथ मासिक वेतन पर अनुबंध हो गया।
कुछ समय बाद सह-गायक के रूप में उन्हें पहली फिल्म मिली। पर उन्हें असली सफलता 1947 में मिली। ये उनके संगीत सफर का सुनहरा दौर रहा। इस साल उनकी 'छीन ले आज़ादी', 'दुनिया एक सराय', 'लाखों में एक' और 'पहली पहचान' फिल्में रिलीज हुईं। इनमें इनके गाये सभी गानों को ख़ूब सराहा गया। ख़ासकर फिल्म 'छीन ले आज़ादी' का गाना, 'कमजोरों की नहीं है दुनिया ...', स्वतंत्रता सेनानियों के बीच बेहद मशहूर हुआ था। और हमने जल्द ही स्वतंत्र राष्ट्र का लक्ष्य भी हासिल कर लिया था। इसके बाद एक और गीत, जिसने, फ़ारूक़ी साहब को बुद्धिजीवियों व मज़दूर वर्ग का चहेता बना दिया। वो था, फिल्म 'दुनिया एक सराय' का गीत, 'एक मुसाफ़िर आये बाबा एक मुसाफ़िर जाए ...'। फ़िर 1948 की फिल्म 'जय हनुमान' के भजन और 'मिट्टी के खिलौने' के भजन 'इस ख़ाक के पुतले को ...' भी लोगों ने ख़ूब सराहा। इनकी अगली दो फिल्में 'भूल भुलैया' 1949 और 'अलख निरंजन' भी बेहद सफल रहीं।
फ़ारूक़ी साहब उन गायकों में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के सफलता पाई थी। अभी वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि 1950 के आख़री महीने में उन्हें अपने वालिद के काफी बीमार होने का पैगाम मिला। लगातार मिल रही सफलता के बावजूद उन्हें वापस जाना पड़ा। और फिर वो दुबारा वापस बम्बई नहीं लौटे। उपरोक्त फिल्मों के अलावा 'बिछड़े बलम', 'परदेसी मेहमान' 1948 और 1947 की दो फिल्मों 'नील कमल' और पिया घर आजा' में उन्होंने अभिनय भी किया था। अपनी बाकी की ज़िंदगी उन्होंने समाज सेवा में व्यतीत की। और 8 फरवरी 1990 को 75 वर्ष की आयु में इस फ़ानी दुनिया से हमेशा के लिए रुख़सत हो गए।
उनके निधन के उपरांत उनके किसी मित्र ने उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा था ...
ख़बर क्या थी मोहम्मद आप हमें तन्हा छोड़ जाएंगे,
दिल-ए-रहबर को ग़मगीन और पुरनम बनाएंगे...
अब न सुबहा आएगी इस शाम के बाद,
बस हम तो सिर्फ़ आप के गीत गुनगुनायेंगे...
जब भी हिंदी सिनेमा के गुमनाम प्रतिभाओं को याद किया जाएगा, तो उस फ़ेहरिस्त में 'मोहम्मद हुसैन फ़ारूक़ी साहब' का नाम अवश्य दर्ज होगा.
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री व ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रबीन्द्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
साल 1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गये.
कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. साल 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं :-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…
मीना कुमारी की ग़ज़लों में मुहब्बत है, शोख़ी है. वह कहती हैं-
रूह का चेहरा किताबी होगा
जिस्म का रंग अनाबी होगा
शरबती रंग से लिखूं आंखें
और अहसास शराबी होगा
चश्मे-पैमाने से टपका आंसू
कोई बेचारा सवाबी होगा...
धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं :-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…
ज़िन्दगी में मुहब्बत हो, तो ज़िन्दगी सवाब होती है. और जब न हो, तो उसकी तलाश होती है... और इसी तलाश में इंसान उम्रभर भटकता रहता है. अपनी एक ग़ज़ल में मीना कुमारी उम्र भर मुहब्बत को तरसती हुई औरत की तड़प बयां करते हुए कहती हैं-
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुंवारे सजदे
एक-एक बुत को ख़ुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए कांटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा...
कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…
बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…
मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है-
चाँद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा…
मीना कुमारी की ज़िन्दगी दर्द से सराबोर थी. उनकी ये ग़ज़ल इस बात का सबूत है-
पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है...
प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी की आज बरसी है. आज ही के दिन 1972 में इस महान अभिनेत्री ने आखिरी सांस ली थी. मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन के नाम से जाना जाता है. दुखांत फिल्मों में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिए उन्हें यह नाम दिया गया था.
मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था. उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मंजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था. उनकी मां प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो) भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थीं. उनका संबंध टैगोर परिवार से था. माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिए छह साल की उम्र में काम किया था. उनका नाम मीना कुमारी विजय भट्ट की लोकप्रिय फिल्म 'बैजू बावरा' पड़ा. मीना कुमारी की शुरुआती फिल्में ज़्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं. मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नई अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरू हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं.
1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ. परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूंकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गई थी. लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत किरदार करने वाले की होकर सीमित हो गई.
मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गईं. शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं, लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की. उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में प्रकाशित हुईं.
पेश है मीना कुमारी की चंद नज़्में
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जितना-जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम-रिमझिम बूंदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आंखें हंस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आंखों में, सादा सी जो बात मिली
चांद तन्हा है, आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा।
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं।
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।
हमसफ़र कोई मिल गया जो कहीं
दोनों चलते रहे यहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा
दिन गुज़रता नज़र नहीं आता
रात काटे सेभी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक खौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिस राह से उठाया है
शाम का यह उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख बढ़ता जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो कुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों के तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आगोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
मुसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है,
न जाने कौन-सी उम्मीदों पे दिल ठहरा है
तेरी आंखों में झलकते हुए इस गम की क़सम
ए दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है
वक़्त ने छीन लिया हौसला-ए-जब्ते सितम
अब तो हादिसा-ए- ग़म पे तड़प उठता है दिल
हर नए ज़ख्म पे अब रूह बिलख उठती है
होंठ अगर हंस भी पड़े आंख छलक उठती है
ज़िन्दगी एक बिखरता हुआ दर्दाना है
ऐसा लगता है कि अब ख़त्म पर अफ़साना है
चांद तन्हा है, आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा।
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं।
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।
हमसफ़र कोई मिल गया जो कहीं
दोनों चलते रहे यहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा
दिन गुज़रता नज़र नहीं आता
रात काटे सेभी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक खौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह छन पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिस राह से उठाया है
शाम का यह उदास सन्नाटा
धुंधलका, देख बढ़ता जाता है
नहीं मालूम यह धुंआ क्यों है
दिल तो कुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों के तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आगोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है
मुसर्रत पे रिवाजों का सख्त पहरा है,
न जाने कौन-सी उम्मीदों पे दिल ठहरा है
तेरी आंखों में झलकते हुए इस गम की क़सम
ए दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है
वक़्त ने छीन लिया हौसला-ए-जब्ते सितम
अब तो हादिसा-ए- ग़म पे तड़प उठता है दिल
हर नए ज़ख्म पे अब रूह बिलख उठती है
होंठ अगर हंस भी पड़े आंख छलक उठती है
ज़िन्दगी एक बिखरता हुआ दर्दाना है
ऐसा लगता है कि अब ख़त्म पर अफ़साना है
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हिन्दी सिनेमा के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने सशक्त अभिनय के ज़रिये उन्होंने कामयाबी की जो बुलंदियां हासिल कीं, वह हर किसी को नसीब नहीं हो पाती हैं. 29 दिसम्बर 1942 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था. उन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक़ था. फ़िल्मों में उनके आने का क़िस्सा बेहद रोचक है. युनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फ़िल्मफ़ेयर के बैनर तले 1965 में नए अभिनेता की खोज के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की गई. इसमें दस हज़ार लड़कों में से आठ लड़के फ़ाइनल मुक़ाबले तक पहुंचे, जिनमें एक राजेश खन्ना भी थे. आख़िर में कामयाबी का सेहरा राजेश खन्ना के सिर बंधा. अगले साल ही उन्हें फ़िल्म आख़िरी ख़त में काम करने का मौक़ा मिल गया. इसके बाद उन्होंने राज़, बहारों के सपने, औरत के रूप आदि कई फिल्में कीं, लेकिन कामयाबी उन्हें 1969 में आई फ़िल्म आराधना से मिली. इसके बाद एक के बाद एक 14 सुपरहिट फ़िल्में देकर उन्होंने हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार के तौर पर अपनी पहचान क़ायम कर ली. राजेश खन्ना ने फ़िल्म आनंद में एक कैंसर मरीज़ के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया था. इसमें मरते वक़्त आनंद कहता है-बाबू मोशाय, आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं. इस फ़ि में राजेश खन्ना द्वारा पहने गए गुरु कुर्ते ख़ूब मशहूर हुए. लड़के उन जैसे बाल रखने लगे.
उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उस ज़माने में अभिभावकों ने अपने बेटों के नाम राजेश रखे. फ़िल्म जगत में उन्हें प्यार से काका कहा जाता था. जब वह सुपरस्टार थे, तब एक कहावत बड़ी मशहूर थी-ऊपर आक़ा और नीचे काका. कहा जाता है कि अपने संघर्ष के दौर में भी वह महंगी गाड़ियों में निर्माताओं से मिलने जाया करते थे. वह रूमानी अभिनेता के तौर पर मशहूर हुए. उनकी आंखें झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने थे, ख़ासकर ल़डकियां तो उन पर जान छिड़कती थीं. राजेश खन्ना लड़कियों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए. लड़कियों ने उन्हें ख़ून से ख़त लिखे, उनकी तस्वीरों के साथ ब्याह रचाए, अपने हाथ पर उनका नाम गुदवा लिया. कहा जाता है कि कई लड़कियां तो अपने तकिये के नीचे उनकी तस्वीर रखा करती थीं. कहीं राजेश खन्ना की सफ़ेद रंग की कार रुकती थी, तो लड़कियां कार को चूमकर गुलाबी कर देती थीं. निर्माता-निर्देशक उनके घर के बाहर कतार लगाए खड़े रहते थे और मुंहमांगी क़ीमत पर उन्हें अपनी फ़िल्मों में लेना चाहते थे.
राजेश खन्ना ने तक़रीबन 163 फ़िल्मों में काम किया. इनमें से 128 फ़िल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, जबकि अन्य फ़िल्मों में भी उनका किरदार बेहद अहम रहा. उन्होंने 22 फ़िल्मों में दोहरी भूमिकाएं कीं. उन्हें तीन बार फ़िल्म फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से नवाज़ा गया. ये पुरस्कार उन्हें फ़िल्म सच्चा झूठा (1971), आनंद (1972) और अविष्कार (1975) में शानदार अभिनय करने के लिए दिए गए. उन्हें 2005 में फ़िल्मफ़ेयर के लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. उनकी फ़िल्मों में बहारों के सपने, आराधना, दो रास्ते, बंधन, सफ़र, कटी पतंग, आन मिलो सजना, आनंद, सच्चा झूठा, दुश्मन, अंदाज़, हाथी मेरे साथी, अमर प्रेम, दिल दौलत दुनिया, जोरू का ग़ुलाम, मालिक, शहज़ादा, बावर्ची, अपना देश, मेरे जीवन साथी, अनुराग, दाग़, नमक हराम, अविष्कार, अजनबी, प्रेम नगर, हमशक्ल, रोटी, आप की क़सम, प्रेम कहानी, महा चोर, महबूबा, त्याग, पलकों की छांव में, आशिक़ हूं बहारों का, छलिया बाबू, कर्म, अनुरोध, नौकरी, भोला भाला, जनता हवलदार, मुक़ाबला, अमर दीप, प्रेम बंधन, थोड़ी सी बेवफ़ाई, आंचल, फिर वही रात, बंदिश, क़ुदरत, दर्द, धनवान, अशांति, जानवर, धर्म कांटा, सुराग़, राजपूत, नादान, सौतन अगर तुम न होते, अवतार, नया क़दम, आज का एमएलए राम अवतार, मक़सद, धर्म और क़ानून, आवाज़, आशा ज्योति, ऊंचे लोग, नया बकरा, मास्टर जी, दुर्गा, बेवफ़ाई, बाबू, हम दोनों, अलग-अलग, ज़माना, आख़िर क्यों, निशान, शत्रु, नसीहत, अंगारे, अनोखा रिश्ता, अमृत गोरा, आवारा, बाप, अवाम, नज़राना, विजय, पाप का अंत, मैं तेरा दुश्मन, स्वर्ग, रुपये दस करोड़, आ अब लौट चलें, प्यार ज़िंदगी है और क्या दिल ने कहा आदि शामिल हैं.
राजेश खन्ना नब्बे के दशक में राजीव गांधी के कहने पर सियासत में आ गए. उन्होंने 1991 में नई दिल्ली से कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा. उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को कड़ी चुनौती दी थी, लेकिन मामूली अंतर से हार गए. आडवाणी ने यह सीट छोड़ दी और अपनी दूसरी सीट गांधीनगर से अपना प्रतिनिधित्व बनाए रखा. सीट ख़ाली होने पर उपचुनाव में वह एक बार फिर खड़े हुए और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को भारी मतों से शिकस्त दी. उन्होंने 1996 में तीसरी बार इसी सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा नेता जगमोहन से हार गए. इसके बाद हर बार चुनाव के मौक़े पर वह कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए दिल्ली आते रहे. उन्होंने 1994 में एक बार फिर ख़ुदाई फ़िल्म से परदे पर वापसी की, लेकिन उन्हें ख़ास कामयाबी नहीं मिल पाई. इसके अलावा अपने बैनर तले उन्होंने जय शिव शंकर नामक फ़िल्म शुरू की थी, जिसमें उन्होंने पत्नी डिम्पल को साइन किया. फ़िल्म आधी बनने के बाद रुक गई और आज तक रिली नहीं हुई. कभी अक्षय कुमार भी इस फ़िल्म में काम मांगने के लिए राजेश खन्ना के पास गए थे, लेकिन राजेश खन्ना से उनकी मुलाक़ात नहीं हो पाई. बाद में वह राजेश खन्ना के दामाद बने.
राजेश खन्ना की कामयाबी में संगीतकार आरडी बर्मन और गायक किशोर का अहम योगदान रहा. उनके बनाए और राजेश पर फ़िल्माये ज़्यादातर गीत हिट हुए. किशोर कुमार ने 91 फ़िल्मों में राजेश खन्ना को आवाज़ दी, तो आरडी बर्मन ने उनकी 40 फ़िल्मों को संगीत से सजाया. राजेश खन्ना अपनी फ़िल्मों के संगीत को लेकर हमेशा सजग रहते थे. वह गाने की रिकॉर्डिंग के वक़्त स्टुडियो में रहना पसंद करते थे. मुमताज़ और शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जो़ड़ी को बहुत पसंद किया गया. आशा पारेख और वहीदा रहमान के साथ भी उन्होंने काम किया. एक दौर ऐसा भी आया जब ज़ंजीर और शोले जैसी फ़िल्में हिट होने लगीं. दर्शक रूमानियत की बजाय एक्शन फ़िल्मों को ज़्यादा पसंद करने लगे तो राजेश खन्ना की फ़िल्में पहले जैसी कामयाबी से महरूम हो गईं. कुछ लोगों का यह भी मानना रहा कि राजेश खन्ना अपनी सुपर स्टार वाली इमेज से कभी बाहर नहीं आ पाए. वह हर वक़्त ऐसे लोगों से घिरे रहने लगे, जो उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे. अपने अहंकार की वजह से उन्होंने कई अच्छी फ़िल्में ठुकरा दीं, जो बाद में अमिताभ बच्चन की झोली में चली गईं. उनकी आदत की वजह से मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, ऋषिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा ने उन्हें छोड़कर अमिताभ बच्चन को अपनी फ़िल्मों में लेना शुरू कर दिया.
राजेश खन्ना की निजी ज़िन्दगी में भी काफ़ी उतार-च़ढाव आए. उन्होंने पहले अभिनेत्री अंजू महेन्द्रू से प्रेम किया, लेकिन उनका यह रिश्ता ज़्यादा वक़्त तक नहीं टिक पाया. बाद में अंजू ने क्रिकेट खिलाड़ी गैरी सोबर्स से सगाई कर ली. इसके बाद 1973 में उन्होंने डिम्पल कपा़ड़िया से प्रेम विवाह किया. डिम्पल और राजेश में ज़्यादा अच्छा रिश्ता नहीं रहा. बाद में दोनों अलग-अलग रहने लगे. उनकी दो बेटियां हैं टि्वंकल और रिंकी. मगर अलग होने के बावजूद डिम्पल से हमेशा राजेश खन्ना का साथ दिया. आख़िरी वक़्त में भी डिम्पल उनके साथ रहीं. टीना मुनीम भी राजेश खन्ना की ज़िंदगी में आईं. एक ज़माने में राजेश खन्ना ने कहा था कि वह और टीना एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करते हैं. वह अपनी हर फ़िल्म में टीना मुनीम को लेना चाहते थे. उन्होंने टीना मुनीम के साथ कई फ़िल्में कीं.
राजशे खन्ना ने अमृतसर के कूचा पीपल वाला की तिवाड़ियां गली में स्थित अपने पैतृक घर को मंदिर के नाम कर दिया था. उनके माता-पिता की मौत के बाद कई साल तक इस मकान में उनके चाचा भगत किशोर चंद खन्ना भी रहे, उनकी मौत के बाद से यह मकान ख़ाली पड़ा था. यहां के लोग आज भी राजेश खन्ना को बहुत याद करते हैं. राजेश खन्ना पिछले काफ़ी दिनों से बीमार चल रहे थे. 18 जुलाई 2012 को उन्होंने आख़िरी सांस ली. राजेश खन्ना का कहना था कि वह अपनी ज़िंदगी से बेहद ख़ुश हैं. दोबारा मौक़ा मिला तो वह फिर राजेश खन्ना बनना चाहेंगे और वही ग़लतियां दोहराएंगे, जो उन्होंने की हैं. उनकी मौत से उनके प्रशंसकों को बेहद तकलीफ़ पहुंची. हिन्दुस्तान ही नहीं पाकिस्तान और अन्य देशों के बाशिंदों ने भी अपने-अपने तरीक़े से उन्हें श्रद्घांजलि अर्पित की.
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जन्म : 29 दिसम्बर 1942
स्थान : अमृतसर (पंजाब)
मृत्यु :18 जुलाई 2012
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)
फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरत और मिलनसार प्रिया राजवंश की ज़िंदगी की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है. पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच पली-बढ़ी एक लड़की कैसे लंदन पहुंचती है और फिर वापस हिंदुस्तान आकर फ़िल्मों में नायिका बन जाती है. एक ऐसी नायिका जिसने फ़िल्में तो बहुत कम कीं, इतनी कम कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ और दिलकश आवाज़ से उसने सबका दिल जीत लिया.
प्रिया राजवंश का जन्म 30 दिसम्बर 1936 में नैसर्गिक सौंदर्य के शहर शिमला में हुआ था. उनका बचपन का नाम वीरा था. उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे. प्रिया राजवंश ने शिमला में ही पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने कई अंग्रेज़ी नाटकों में हिस्सा लिया. जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से ब्रिटेन गए, तो प्रिया राजवंश ने लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाख़िला ले लिया. सौभाग्य से उन्हें फ़िल्मों में भी काम करने का मौक़ा मिल गया. हुआ यूं कि लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची. चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की ख़ूबसूरती के क़ायल हो गए. उन दिनों चेतन आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी. 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था. हिंदुस्तानी फ़ौज को भारी नुक़सान हुआ था और फ़ौज को पीछे हटना पड़ा. इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया. 1964 में बनी इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रिया राजवंश ने चेतन आनंद की हर स्तर पर मदद की. संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और संपादन तक में उनका दख़ल रहा. चेतन आनंद उन दिनों अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे. इसी दौरान प्रिया राजवंश और चेतन आनंद एक दूसरे के क़रीब आ गए और फिर ज़िंदगी भर साथ रहे. प्रिया राजवंश उम्र में चेतन आनंद से तक़रीबन 22 साल छोटी थीं, लेकिन उम्र का फ़ासला उनके बीच कभी नहीं आया.
प्रिया राजवंश ने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया. फ़िल्म हक़ीक़त के बाद 1970 में उनकी फ़िल्म हीर रांझा आई. 1973 में हिंदुस्तान की क़सम और हंसते ज़ख्म, 1977 में साहेब बहादुर, 1981 में क़ुदरत और 1985 में हाथों की लकीरें आई. प्रिया राजवंश ने सिर्फ़ चेतन आनंद की फ़िल्मों में ही काम किया और चेतन ने भी हक़ीक़त के बाद प्रिया राजवंश को ही अपनी हर फ़िल्म में नायिका बनाया. उन्हें फ़िल्मों के बहुत से प्रस्ताव मिलते थे, लेकिन वह इंकार कर देती थीं. उनकी खुशी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतन आनंद के साथ थी. हालांकि दोनों ने विवाह नहीं किया था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाता था. चेतन आनंद के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में वह बहुत सुखी थीं. कहा जाता है कि हीर रांझा प्रिया राजवंश को केंद्र में रखकर ही बनाई गई थी. इस फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि इसके सारे संवाद पद्य यानी काव्य रूप में हैं, जिन्हें कैफ़ी आज़मी ने लिखा था. इसे काव्य फ़िल्म कहना ग़लत न होगा. इसके गीत भी कैफ़ी आज़मी ने ही लिखे थे. प्रिया राजवंश पर फ़िल्माया गया गीत-मिलो न तुम तो, हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है…बहुत मशहूर हुआ. इसी तरह फ़िल्म हंसते जख्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा और मदन मोहन के संगीत से सजा गीत-बेताब दिल की तमन्ना यही है…आज भी लोग गुनगुना उठते हैं.
अंग्रेज़ी के लेखक आरके नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फ़िल्म गाइड बनाने के वक़्त पहला विवाद नायिका को लेकर ही हुआ था. देव आनंद माला सिन्हा को नायिका रोज़ी की भूमिका के लिए लेना चाहते थे, लेकिन चेतन की पसंद प्रिया राजवंश थीं. विजय आनंद का मानना था कि रोज़ी की भूमिका वहीदा रहमान से बेहतर कोई और अभिनेत्री नहीं निभा सकती, लेकिन वहीदा रहमान राज खोसला के साथ काम नहीं करती थीं. दरअसल, हुआ यह था कि देव आनंद गाइड के निर्देशन के लिए पहले ही राज खोसला से बात कर चुके थे. अब उन्हें राज खोसला और वहीदा रहमान में से किसी एक को चुनना था. चेतन आनंद और विजय आनंद ने वहीदा का समर्थन किया और फिर चेतन आनंद की सलाह पर निर्देशन की ज़िम्मेदारी विजय आनंद को सौंप दी गई. वहीदा रहमान ने कमाल का अभिनय किया और फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई.
प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक़्त आईं, जब 6 फ़रवरी, 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया. प्रिया राजवंश अकेली रह गईं. वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया. मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.
कुछ अरसा पहले चेतन आनंद की ज़िंदगी पर आधारित उनकी पत्नी उमा और बेटे केतन आनंद की एक किताब आई थी. इस किताब में ज़िंदगीभर चेतन आनंद के साथ रहने वाली प्रिया राजवंश का ज़िक्र नहीं के बराबर है. दरअसल, चेतन आनंद ने अपने लिए अलग एक बंगला बनवाया था, जिसमें वह प्रिया राजवंश के साथ रहा करते थे. यही बंगला बाद में प्रिया राजवंश की मौत की वजह बना यानी एक बंगले के लालच ने प्रिया राजवंश से उनकी ज़िंदगी छीन ली. वह अपने घर में मृत पाई गई थीं. उनके हत्यारों को तो अदालत ने सज़ा दे दी, लेकिन उनके प्रशंसक शायद ही उनके क़ातिलों को कभी मा़फ़ कर पाएं. अपनी फ़िल्मों की बदौलत वह हमेशा हमारे बीच रहेंगी, मुस्कराती और चहकती हुई.
जन्म : '30 दिसम्बर 1936
स्थान : शिमला (हिमाचल प्रदेश)
मृत्यु : 27 मार्च 2000
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र)










