कोलकाता के पत्रकार राहुल मिश्रा ने सुप्रसिद्ध कॉमेडियन महमूद के बेटे मक़सूद अली उर्फ़ अली अली के हवाले से एक तहरीर लिखी है. ये सिर्फ एक तहरीर ही नहीं है, बल्कि इसमें ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा छुपा है. इसमें ज़िन्दगी को लेकर तीन नज़रिये बयां किए गये है, एक नज़रिया महमूद साहब का है, एक उनके बेटे लकी अली का है और तीसरा नज़रिया राहुल मिश्रा जी का है. इस तहरीर को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए.
पत्रकार राहुल मिश्रा लिखते हैं- पिता के पास सत्ताईस गाड़ियां थीं। बेटे को छूने की इजाजत नहीं।..वो बेटा अगले महीने अड़सठ का हो जाएगा। और जब सफर पर निकलता है, तो बैग में एक चीज कभी नहीं भूलता। अपना कफन।
उसे पिता से रोज सुबह पांच रुपये मिलते थे।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं,
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है।
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए-
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं,
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया।
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।
शाम को हिसाब देना पड़ता था।
27 गाड़ियां थीं, पर वह बस से चलता था।
इन्हीं दिनों एक कॉन्सर्ट में वो गाते-गाते रुक गए।
भीड़ की तरफ देखा।
कहा कि वो सबसे बहुत मुहब्बत करते हैं। पर एक दिन तो जाना ही होगा।
फिर बोले, मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा। मैं खुद तैयार हूं।
और फिर उन्होंने बताया कि जब भी वो सफर करते हैं,
अपना इहराम साथ लेकर चलते हैं। वही उनका कफन है।
जहां भी मौत आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए।
वीडियो उन्होंने खुद अपने इंस्टाग्राम पर डाला।
नीचे लोग लिख रहे थे-ऐसी बातें मत कीजिए। आप कहीं नहीं जा रहे।
एक ने लिखा-तीस साल हो गए, मैंने लकी को कभी नहीं छोड़ा।
नाम-लकी अली।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
23 जुलाई को उनके पिता की बरसी थी। बाईस साल हो गये महमूद साहब को गये।
उनकी बरसी के तीन हफ्ते भी नहीं हुए थे, जब यह वीडियो सामने आया।
पहले यह समझ लीजिए कि इहराम है क्या।
हज या उमरा पर जाने वाला मुसलमान बिना सिले दो सफेद कपड़े पहनता है।
कोई जेब नहीं। कोई सिलाई नहीं। कोई नाम नहीं।
बादशाह और मजदूर, दोनों उसी में खड़े होते हैं।
और यह कपड़ा जानबूझकर कफन जैसा रखा गया है-ताकि याद रहे कि लौटना इसी हालत में है।
हदीस की एक रिवायत भी है, जिसमें हज के दौरान गुजर गए एक हाजी को उन्हीं दो चादरों में दफ़नाने को कहा गया।
तो लकी अली ने कोई सनक नहीं दिखाई।
पर असली बात यह नहीं है।
असली बात यह है कि वो इहराम उन्होंने पहली बार अकेले नहीं पहना था।
उन्होंने खुद बताया है कि पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादें तब बनीं जब वो संगीत में अपनी जगह बना चुके थे।
तब वो साथ-साथ बाहर गए।
और साथ उमरा किया।
उन्होंने कहा-वो मेरे लिए बहुत खास था।
अब समझिए।
जो कपड़ा आज उनके बैग में मौत की तैयारी की तरह पड़ा है, वो वही कपड़ा है जो उन्होंने जिंदगी में पहली बार अपने पिता के साथ खड़े होकर पहना था।
बरसी के तीन हफ्ते के भीतर, वो उसी कपड़े की बात कर रहे थे।
वो कफन नहीं ढो रहे।
वो अपने बाप को साथ लेकर चल रहे हैं।
अब शुरू से चलते हैं। तीन पीढ़ी पीछे।
पहली पीढ़ी।
दादा का नाम- मुमताज अली।
चालीस-पचास के दशक के बड़े नर्तक और अदाकार। अपनी मंडली थी- 'मुमताज अली नाइट्स'। पूरे मुल्क में शो होते थे।
फिर शराब आई।
करियर ढह गया।
घर में आठ बच्चे थे और चूल्हा ठंडा।
बेटी को स्टेज पर नाचना पड़ा।
और एक दस-ग्यारह साल के बेटे को काम पर लगना पड़ा।
दूसरी पीढ़ी।
उस बेटे ने अंडे और मुर्गियां बेचीं।
टैक्सी चलाई।
फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी चलाई।
और एक लड़की को टेबल टेनिस सिखाई, जिसका नाम था मीना कुमारी।
उसी मैदान से उसकी मुलाकात मीना कुमारी की छोटी बहन मधु से हुई।
1953 में शादी।
और फिर वो ड्राइवर हिंदुस्तान का सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।
नाम-महमूद।
तीन सौ से ज्यादा फिल्में।
पचीस अवॉर्ड नामांकन।
बड़े-बड़े हीरो उनके साथ फ्रेम में आने से घबराते थे, कि उनका अपना किरदार छोटा न पड़ जाए।
उन्होंने आर.डी. बर्मन को पहला मौका दिया।
राजेश रोशन को पहला मौका दिया।
और एक लंबे, दुबले, बार-बार ठुकराए गए नौजवान को अपने घर में दो साल रखा, और बॉम्बे टू गोवा में पहला बड़ा रोल दिया।
उस नौजवान का नाम अमिताभ बच्चन था।
जो आगे चलकर महमूद को अपना गॉडफादर कहते रहे।
तीसरी पीढ़ी।
1958। महमूद के दूसरे बेटे का जन्म।
मकसूद महमूद अली।
घर पर-लकी।
पर उस घर में लकी होना कैसा था?
बहुत छोटी उम्र में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। मसूरी और देहरादून की पहाड़ियों में।
उन्होंने खुद बताया-पिता ने मुझे इंडस्ट्री और लोगों, दोनों से दूर रखा।
साल भर की पढ़ाई के बाद डेढ़ महीने की छुट्टी।
बस उतना ही वक़्त मिलता था।
उसी में पिता के सेट पर जाना, और मां से मिलना।
क्योंकि मां-बाप अलग हो चुके थे।
और एक दृश्य है, जो इस पूरी कहानी की सबसे चुप, सबसे भारी बात है।
बच्चा पहली बार बोर्डिंग से लौटा।
एयरपोर्ट पर परिवार लेने आया था। पिता भी खड़े थे।
बच्चे ने देखा।
और पहचाना नहीं।
उसने कहा-अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!
करोड़ों लोग जिस चेहरे को घर का समझते थे, उसे उसका अपना बच्चा एक अजनबी सितारे की तरह पहचान रहा था।
स्कूल में क्या होता था?
लकी अली ने बताया कि जब दूसरे बच्चों के मां-बाप मिलने आते, तो वो उनकी क्लास में आ जाते।
महमूद के बेटे को देखने।
उन्होंने कहा-मैं हमेशा लोगों की नज़रों में रहता था।
पूछा गया कि क्या यह तकलीफ थी?
उन्होंने कहा, नहीं। असल में उन्होंने बगावत किसी और बात पर की।
मां अलग रहती थीं।
और उन्हें अजीब लगता था कि बाकी सबकी मां साथ हैं, उनकी नहीं।
उन्होंने कहा-इसी ने मुझे बागी बनाया। और बोर्डिंग स्कूल ने मुझमें एक आजाद रूह डाल दी। मैं बेहद खुदमुख्तार हो गया।
एक बच्चा, जो देश के सबसे मशहूर घर में पैदा हुआ, अकेले रहना सीख रहा था।
पिता सख्त थे।
इक्कीस साल की उम्र तक कहीं घूमने की इजाजत नहीं। शाम छह बजे के बाद कोई बाहर नहीं।
सत्ताईस गाड़ियां घर में खड़ी थीं।
एक कॉर्वेट भी थी, जिसे लकी चलाना चाहते थे।
पिता ने कहा-अपनी कमाई से खरीदना, फिर चलाना।
सुबह पांच रुपये मिलते।
शाम को हिसाब देना पड़ता।
और बस से आना-जाना करना पड़ता।
आज सुनने में यह कठोरता लगती है।
पर उसी आदमी के बारे में लकी अली यह भी कहते हैं कि वो घर पर बहुत मजाकिया थे।
और जब भी मन में कोई उलझन होती, कोई गहरी बात जो अंदर चुभती, तो वो पिता के पास ही जाते।
उन्होंने कहा-वो मेरे 'गो-टू पर्सन' थे। हर बार कोई अच्छी सलाह होती, या हौसला।
अब लकी अली की अपनी लड़ाई।
लोग सोचते हैं महमूद का बेटा है, रास्ता तो बना-बनाया होगा।
सच्चाई उन्होंने खुद बताई।
उन्होंने कहा कि संगीत में आने से पहले वो पूरी तरह 'वेला' थे। किसी काम के नहीं।
नौकरी टिकती नहीं थी, क्योंकि वो नौकरी के लिए बने ही नहीं थे।
उन्होंने जो सीखा था, वो था- जानवरों की देखभाल और घोड़ों की नस्ल सुधारना।
और उस ज़माने के भारत में वो कोई करियर नहीं था।
पिता ने कहा-फिल्में कर लो।
उन्होंने पिता के कहने पर कांटे और सुर कीं।
पर वो असहज थे।
और एक दिन उन्होंने तय कर लिया-नहीं, मेरा रास्ता सिर्फ संगीत है।
फिर एक एल्बम बना।
और कोई लेने को तैयार नहीं था।
लेबल कहते थे, यह संगीत भारत में चलेगा नहीं।
एक बड़ी कंपनी के पास गाने करीब छह महीने पड़े रहे। कुछ नहीं हुआ। लकी वापस मांग लाए।
आखिर एक कंपनी राजी हुई-इस शर्त पर कि वीडियो तुम खुद बनाओ।
पैसे थे नहीं।
तो वो अपने बचपन के दोस्त के पास गए।
महेश माथाई। विज्ञापन फिल्मों के निर्देशक।
माथाई ने काहिरा चुना। मिस्र के पिरामिड।
उन्होंने उस वीडियो पर पंद्रह लाख रुपये लगाए-उन दिनों यह बेहूदा रकम थी।
और कास्ट में कमी पड़ गई।
तो नीली चादर में लिपटी जो औरत उस वीडियो में दिखती है, वो कोई मॉडल नहीं थी।
वो लकी अली की पहली पत्नी थीं।
6 मई 1996।
एल्बम -सुनो।
पहला गाना-ओ सनम।
वो भारत का पहला पॉप म्यूजिक वीडियो था, जो देश के बाहर शूट हुआ।
और वो गाना MTV एशिया के चार्ट पर साठ हफ्ते टिका रहा।
एक 'वेला' आदमी, सैंतीस साल की उम्र में, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गया।
इसी मई में उस एल्बम को तीस साल पूरे हुए हैं।
फिर कहो ना... प्यार है।
ना तुम जानो ना हम के लिए फिल्मफेयर।
एक पल का जीना। आ भी जा। आहिस्ता आहिस्ता। हैरत। सफरनामा।
आवाज में कोई चमक नहीं थी।
कोई नाटक नहीं।
बस एक थका हुआ, सच्चा आदमी।
और फिर मौतें आने लगीं।
1993-मां चली गईं।
2002-भाई मैकी। सिर्फ पैंतीस के आसपास।
वही मैकी, जो असल जिंदगी में पोलियो से लाचार था-और जिसे 1974 में पिता ने अपनी फिल्म कुंवारा बाप में उसी लाचार बच्चे का किरदार दिया था।
महमूद ने अपने घर का सबसे गहरा जख्म परदे पर रख दिया था, ताकि देश उसे देखे।
23 जुलाई 2004।
अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में, नींद में ही, महमूद चले गए।
वो वहां दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे। बरसों से तबीयत खराब थी।
इकहत्तर साल की उम्र।
मुंबई के मेहबूब स्टूडियो में लोगों ने आखिरी बार उन्हें देखा।
फिर शरीर बेंगलुरु के बाहर, यलहंका के 'अली एस्टेट्स' लाया गया।
वही फार्महाउस, जहां उनकी कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी।
29 जुलाई 2004 को वहीं जनाजा उठा।
उस दिन की एक तस्वीर मौजूद है।
लकी अली अपने पिता के शरीर के पास खड़े हैं।
बस देख रहे हैं।
और अब वो बात, जो मुझे सबसे ज़्यादा देर तक चुभी।
उस एस्टेट में परिवार का निजी क़ब्रिस्तान है।
वहां एक सफेद मकबरा है-दादा मुमताज़ अली का।
और उसी सफ़ेद मक़बरे के पैरों में, एक साधारण कब्र है।
जिस पर कोई नाम नहीं है।
वो महमूद की है।
बग़ल में एक और बिना नाम की कब्र-मैकी की।
तीन सौ फिल्मों वाला आदमी।
सत्ताईस गाड़ियां।
एक ऐसी कब्र में, जिस पर उसका नाम तक नहीं लिखा।
अपनी ही मर्जी से।
जिसने पूरी उम्र पहचाने जाने में लगा दी, उसने आखिर में पहचान से इनकार कर दिया।
मरने से पहले महमूद ने अपने बेटे से एक बात कही थी।
उन्होंने कहा-देखो, मैं अपने सारे भाइयों का बाप बनकर रहा। मेरे जाने के बाद तुम अपने भाइयों के ज़िम्मेदार होगे।
पिछले बरस, पिता के जाने के इक्कीस साल बाद, जब लकी अली से पूछा गया कि क्या वो यह निभा पाए-
उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।
उन्होंने बस कहा-मुझे लगता है मैं इसमें नाकाम रहा। सबकी अपनी-अपनी दिशा थी। और जब पापा गए, तो सबको जोड़कर रखने वाला कोई नहीं बचा।
एक बूढ़ा होता आदमी, पूरे देश के सामने, अपनी नाकामी क़ुबूल कर रहा था।
पिता के जाने के बाद उन्होंने मुंबई छोड़ दी।
उन्होंने कहा था कि वो एक जगह टिकने वाले आदमी नहीं, उन्हें घूमते रहना पड़ता है वरना जड़ होने लगते हैं।
पर पिता के जाने के बाद जो हुआ, वो अलग था।
उस शहर में लोग जान-पहचान के थे, फिर भी वो ख़ुद को अजनबी महसूस करने लगे।
2015 में मुख्यधारा से पूरी तरह किनारा।
बेंगलुरु के बाहर वही फार्म।
वही जमीन।
जिसके एक कोने में तीन कब्रें हैं।
मई 2020 में एक अजीब बात हुई।
इंटरनेट पर खबर फैली कि लकी अली नहीं रहे।
उनकी दोस्त, अभिनेत्री नफीसा अली को सामने आकर बताना पड़ा कि वो बिल्कुल ठीक हैं, फार्म पर परिवार के साथ हैं।
छह साल पहले दुनिया ने उन्हें जबरदस्ती मार दिया था।
उन्हें जिंदा साबित करना पड़ा था।
उसी बरस गोवा के एक समंदर किनारे उनका एक वीडियो वायरल हुआ
कोई स्टेज नहीं, बस एक गिटार और कुछ अजनबी। और नई पीढ़ी उन्हें दोबारा खोज लाई।
22 नवंबर 2025। कोलकाता। एक्वाटिका का मैदान।
मैं वहां था।
ठंड बस शुरू ही हुई थी। मैंने पीले रंग की टीशर्ट पहनी थी, जींस, और पूरा बदन ढककर निकला था।
मैं पीछे खड़ा था।
पत्रकार की पुरानी आदत है-आगे वाले तमाशा देखते हैं, पीछे वाले भीड़ देखते हैं।
और उस रात भीड़ देखने लायक़ थी।
ज्यादातर युवा थे।
ऐसे बच्चे भी, जो 1996 में पैदा भी नहीं हुए थे।
पर वो एक-एक लफ्ज जानते थे।
पूरा मैदान गुनगुना रहा था।
कोई दिखावे के लिए नहीं आया था। सब उसी एक आवाज के लिए आए थे।
फिर वो गाना आया, जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है।
'आ भी जा आ भी जा, ऐ सुबह आ भी जा'
वही गाना, जो सुबह को पुकारता है।
पूरा मैदान मदमस्त था।
और मुझे बहुत बाद में पता चला कि वो गाना सुर का है।
वही फिल्म, जो लकी अली ने सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि पिता ने कहा था। जिसमें वो असहज थे।
मेरा सबसे पसंदीदा गाना उसी काम से निकला, जो उन्होंने अपनी मर्ज़ी से किया ही नहीं था।
बाप का दबाव भी कभी-कभी किसी और के लिए तोहफा बन जाता है।
पर जो चीज मेरे साथ घर तक आई, वो गाना नहीं था।
वो चेहरा था।
लौटते वक्त, पूरे रास्ते, वही चेहरा मेरे साथ चलता रहा।
वो दाढ़ी। वो आंखें।
एक आदमी जो अपने ही भीतर समाया हुआ था।
गाते हुए भी जैसे कहीं और।
मुझे उस रात लगा था कि यह आदमी किसी दर्द में सिमटा हुआ है।
और मुझे एक बात और लगी थी, जो मैंने तब किसी से नहीं कही, क्योंकि हंसी की बात थी।
मुझे लगा था-यह आदमी जाने के लिए तैयार बैठा है।
मैंने खुद को डांटा। सोचा, पत्रकार हूं, कहानियां ज्यादा पढ़ लेता हूं।
साढ़े आठ महीने बाद, इसी अगस्त में, उसी आदमी ने मंच से कह दिया कि वो अपना कफन साथ लेकर चलता है।
उस रात मैं जो चेहरे पर पढ़ रहा था, वो अनुमान नहीं था।
वो सच था।
बस उसने अभी कहा नहीं था।
बीच में, ठीक छह महीने पहले, इसी साल फरवरी में, उनके संगीत के तीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू आया।
और उन्होंने जो कहा, उसे ध्यान से पढ़िए।
उन्होंने कहा कि यह सारी मुहब्बत उन्हें तोहफे में मिली है, और उन्हें नहीं लगता कि वो इसके हकदार थे।
फिर कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं है। एक दिन यह सब रुक जाएगा।
और वो इस बात से खुश हैं।
उनका कहना था-मैं इसे पकड़कर नहीं बैठा हूं।
और आखिर में यह-इतनी शोहरत के बाद भी उनके भीतर कुछ है जो अब भी कुछ ढूंढ रहा है। कोई टुकड़ा, जो इस सारे शोर से दूर है।
फरवरी में उन्होंने यह शब्दों में कहा।
अगस्त में एक कपड़े से दिखा दिया।
अपने रिश्तों के बारे में लकी ने बहुत सादगी से कहा कि उनकी शादियां भले न चलीं,
पर सारे रिश्ते आज भी कायम हैं। वो साथ नहीं रहते, पर एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
उन्होंने तय किया कि उसके बच्चे किसी को न खोएं।
पिछले बरस उनसे पूछा गया कि क्या वो खुश हैं, क्योंकि तस्वीरों में वो मुस्कुराते नहीं दिखते।
उन्होंने कहा कि इन दिनों मुस्कुराने लायक कुछ खास है नहीं। वो अपने आसपास के लोगों का दर्द महसूस करते हैं, और कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ये चीजें उनके हाथ में नहीं हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं -
-एक। जिसे पूरी दुनिया पहचानती हो, जरूरी नहीं घर में भी कोई पहचानता हो। रोज थोड़ा वक्त उन्हीं के लिए बचाइए जो आपको बिना पोस्टर के जानते हैं।
-दो। मौत को भूल जाना बहादुरी नहीं है। उसे याद रखकर भी गा पाना बहादुरी है।
-तीन। जो सामान आप जमा कर रहे हैं, उसमें से कुछ भी आखिरी कपड़े के साथ नहीं जाएगा। यह उदासी की बात नहीं-यह आजादी की बात है।
किसी दिन जब दौड़ बहुत तेज लगने लगे, ये तीन लाइनें दोबारा पढ़ लीजिएगा। रफ्तार अपने आप ठीक हो जाएगी।
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं है। यह हर उस बच्चे की है जिसने अपने पिता को दूर से देखा, और हर उस पिता की है जो कमाने की दौड़ में बच्चे की उम्र चूक गया।
अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक बाप ने घर लौटकर अपने बेटे से दस मिनट बात कर ली, तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में छिपी होती हैं। ऐसी सच्ची कहानियां साथ-साथ पढ़ना चाहें तो जुड़े रहिए।
और मुझे एक बात बताइए
अपने पिता के बारे में कोई एक बात, जो आप उनसे कभी नहीं कह पाए।
आज यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।
