ज़िन्दगी
-
कहते हैं कि ज़िन्दगी कभी किसी के लिए नहीं रुकती... लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं
है, ज़ाहिरी तौर पर भले ही ज़िन्दगी मुतासिर दिखाई न दे, लेकिन हक़ीक़ी तौर पर
ज़िन्दग...
Showing posts with label राजनीति. Show all posts
Showing posts with label राजनीति. Show all posts
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर... मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की... वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं...
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था. स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.
चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.
श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.
अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.
राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.
आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था. स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.
चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.
श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.
अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.
राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.
श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.
आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, वे एक दयालु, सौम्य और स्नेही व्यक्ति थे, जिनकी असामयिक मृत्यु ने मेरे जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ा है. मुझे उनके साथ बिताया गया वक़्त याद है और भाग्यशाली था कि कई जन्मदिन उनके साथ मनाएं, जब वह ज़िन्दा थे. मैं उन्हें बहुत याद करता हूं, लेकिन वे मेरी यादों में हैं. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया. यह सबसे बेशक़ीमती तोहफ़ा है, जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है."
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं. श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था. स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.
चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.
श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे 1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन 23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई. इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.
अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.
राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही वह ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया. ग़ौरतलब है कि श्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए कई बार विदेश भेजा था.
श्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के वक़्त सारा देश शोक में डूब गया था. श्री राजीव गांधी की मौत से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत दुख हुआ था. उन्होंने स्वर्गीय राजीव गांधी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, मृत्यु शरीर का धर्म है. जन्म के साथ मरण जुड़ा हुआ है. लेकिन जब मृत्यु सहज नहीं होती, स्वाभाविक नहीं होती, प्राकृतिक नहीं होती, ’जीर्णानि वस्त्रादि यथा विहाय’- गीता की इस कोटि में नहीं आती, जब मृत्यु बिना बादलों से बिजली की तरह गिरती है, भरी जवानी में किसी जीवन-पुष्प को चिता की राख में बदल देती है, जब मृत्यु एक साजिश का नतीजा होती है, एक षडतंत्र का परिणाम होती है तो समझ में नहीं आता कि मनुष्य किस तरह से धैर्य धारण करे, परिवार वाले किस तरह से उस वज्रपात को सहें. श्री राजीव गांधी की जघन्य हत्या हमारे राष्ट्रीय मर्म पर एक आघात है, भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक है. एक बार फिर हमारी महान सभ्यता और प्राचीन संस्कृति विश्व में उपहास का विषय बन गई है. शायद दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अहिंसा की इतनी बातें करता हो. लेकिन शायद कोई और देश दुनिया में नहीं होगा, जहां राजनेताओं की इस तरह से हिंसा में मृत्यु होती हो. यह हिंसा और हत्याओं का सिलसिला बंद होना चाहिए.
आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती 'सद्भावना दिवस' और 'अक्षय ऊर्जा दिवस' के तौर पर मनाई जाती है, जबकि पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं, वे एक दयालु, सौम्य और स्नेही व्यक्ति थे, जिनकी असामयिक मृत्यु ने मेरे जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ा है. मुझे उनके साथ बिताया गया वक़्त याद है और भाग्यशाली था कि कई जन्मदिन उनके साथ मनाएं, जब वह ज़िन्दा थे. मैं उन्हें बहुत याद करता हूं, लेकिन वे मेरी यादों में हैं. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया. यह सबसे बेशक़ीमती तोहफ़ा है, जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है."
लाल बिहारी लाल
भारत में सत्ता दिल्ली सलतनत से मुगल साम्राज्य फिर मुगल से जब सत्ता अंग्रैजो के हाथ में गई तो पहले अंग्रैजों का व्यापारिक उदेश्य था पर धीरे-धीरे उनका राजनैतिक रुप भी समने नजर आने लगा। और वे अपने इस कुटिल चाल में कामयाब भी हो गये । धीरे –धीरे उनके क्रिया-कलापों के प्रति जनमानस में असंतोष की भावना पनपने लगी इसी का परिणाम सन 1857 के सिपाही विद्रोह के रुप में देखने को मिला।
सन 1857के विद्रोह के बाद जनमानस संगठित होने लगा औऱ अग्रैजों के विरुद्ध लामबंद होने लगा। प्रबुद्ध लोगों औऱ आजादी के दीवानों द्वारा सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीयकांग्रेस की स्थापना की गई। प्रारंभिक 20 वर्षों में 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर उदारवादी नेताओ का दबदबा रहा। इसके बाद धीरे-धीरे चरमपंथी (गरमदल) नेताओ के हाथों में बागडोर जाने लगी। इसी बीच महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को स्वदेश (मुम्बई) में कदम रखा तभी से हर साल 9 प्रवासी दिवस मनाते आ रहे हैं। जब गांधी जी स्वदेश आये तो उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने सुभाव दिया कि आप देश में जगह-जगह भ्रमण कर देश की स्थिति का अवलोकन करें। अपने राजनैतिक गुरु गोखले के सुझाव पर गांधी जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से भ्रमण करते हुए बंगला के मशहुर लेखक रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने शांति निकेतन पहुँचे। वही पर टैगोर ने सबसे पहले गांधी जी को महात्मा कहा था औऱ गांधी जी ने टैगोर को गुरु कहा था। गाँधी जी हमेशा थर्ड क्लास में यात्रा करते थे ताकि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हो सके। मई 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद के पास कोचरब में अपना आश्रम स्थापित किया लेकिन वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण साबरमती क्षेत्र में आश्रम की स्थापना की। दिसम्बर 1915 में कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में गांधी जी ने भाग लिया गांधी जी ने यहाँ विभाजित भारत को महसूस किया देश अमीर-गरीब, स्वर्ण-दलित,, हिन्दू- मुस्लिम, नरम-गरम विचारधारा , रुढ़िवादी आधुनिक भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक , ब्रिटिश विरोधी जिनको इस बात का बहुत कष्ट था कि देश गुलाम है। गांधी जी किसके पक्ष में खड़े हों या सबको साथ लेकर चले। गांधी जी उस समय के करिश्माई नेता थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सबको साथ लेकर सबके अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी।
गांधी जी ने पहली बार देश में सन 1917 में बिहार के चम्पारन में सत्याग्रह किया| उनका आन्दोलन जन आन्दोलन होता था। चंपारण में नील किसानों के तीन कठियाविधि से मुक्ति दिलाई औऱ अंग्रैजों से अपनी बात मनवाने में कामयाब हुए। गरीबों को सुत काटने एवं उससे कपड़े बनाने की प्रेरणा दी जिससे इनके जीवन-यापन में गुणात्मक सुधार आया।
गुजरात क्षेत्र का खेडा क्षेत्र -बाढ़ एवं अकाल से पीड़ित था जैसे सरदार पटेल एंव अनेक स्वयं सेवक आगे आये उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कर राहत की माँग की । गांधी जी के आगे अंग्रैजो को झुकना पड़ा किसानों को कर देने से मुक्ति मिली सभी कैदी मुक्त कर दिए गये गांधी जी की ख्याति देश भर में फैल गई। यही नहीं खेड़ा क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया। वहाँ के शराबियों को शराब की लत को भी छुडवाया। सन् 1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने रालेटएक्ट के तहत प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया, बिना जाँच के किसी को भी कारागार में डाला जा सकता था । गांधी जी ने देशभर में रालेट एक्ट के विरुद्ध अभियान चलाया।पंजाब में इस एक्ट का विशेष रूप से विरोध हुआ पंजाब जाते समय में गांधी जी को कैद कर लिया गया साथ ही स्थानीय कांग्रेसियों को भी कैद कर लिया गया । 13 अप्रैल को 1919 बैसाखी के पर्व पर जिसे हिन्दू मुस्लिम सिख सभी मनाते थे अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग इकठ्ठे हुए थे। जलियांवालाबाग़ चारों तरफ से मकानों से घिरा था बाहर जाने के लिए एक ही गेट था वहाँ एक जनसभा में नेता भाषण दे रहे थे तभी जरनल डायर ने निकलने के एकमात्र रास्ते को रोक कर निर्दोष बच्चों स्त्रियों व पुरुषों को गोलियों से भून डाला एक के ऊपर एक गिर कर लाशों के ढेर लग गये जिससे पूरा देश आहत हुआ गांधी जी ने खुल कर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया अब एक ऐसे देशव्यापी आन्दोलन की जरूरत थी जिससे ब्रिटिश सरकार की जड़े हिल जाएँ।
खिलाफत आंदोलन के जरीये हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात हो या फिर असहयोग आंदोलन की गांधी जी ने अपना परचम अग्रैजों के विरुद्ध पूरे देश में लहरा दिया। दिसंबर 1921 में गांधी जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य अब स्वराज्य हासिल करना हो गया। गांधी जी ने अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस को राष्ट्रीय फलक पर पहुँचाने की बात की। इन्होंने एक अनुशासनात्मक समिति का गठन किया। 1925-1928 तक गांधी जी ने समाज सुधार के लिए भी काफी काम किया। धीरे –धीरे कांग्रेस का दबदबा पूरे देश में बढ़ता गया। औऱ राष्ट्र की भावना को प्रेरित कर देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने का काम गांधी जी ने बाखूबी किया। चौराचौरी के घटना से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया पर इन्होने अपनी बात को पूरजोर तरीके से रखना जारी रखा। इन्होने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पहले जपान पर परमाणु बम से हमले की निंदा की,आहत भी हुए पर अपना सत्य औऱ अहिंसा कामार्ग नहीं छोड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या सन 1942 में गांधी जी द्वारा अग्रैजों भारत छोड़ों आंन्दोलन में करो या मरो का नारा । आजादी की मांग में गांधी जी का योदगान धीरे धीरे शिखर को चुमने लगा। अंत में अग्रैज विवश हो गये औऱ ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली के पहल पर कैबिनेट मिशन की घोषणा कर दी गई। ब्रिटीश कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत आया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के पटल पर उदय हुआ। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथु राम गोड्से द्वारा कर कर दी गई ।फिर भी भारतीय राजनीति में गांधी जी आज भी प्रासांगिक एवं अद्वितीय है। गांधी जी भारत के हर जनमानस में विद्यमान है।
(लेखक साहित्य टीवी के संपादक हैं)
मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों और कांग्रेस की बदलती रणनीतियों (विशेषकर तमिलनाडु में DMK से दूरी) के बाद इंडिया गठबंधन गंभीर संकट में है और इसके भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। बंगाल, केरल और पंजाब में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस का तालमेल न होना गठबंधन की एकता को कमजोर कर रहा है।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की काफी समय तक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की चर्चाएं चल रही थीं। कुछ सीटों पर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। ऊपर से तो दोनों ही दल चुप्पी साधे रहे, लेकिन अंदर ही अंदर खटपट होती रही। अचानक एक दिन ममता ने कह दिया- 'एकला चलो', यानी बंगाल में INDIA गठबंधन को खारिज करते हुए अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान। ममता को लग रहा था कि कांग्रेस बंगाल में लेफ्ट के साथ भी 'गलबहियां' कर रही है, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। वाम दल के विरोध की लहर पर सवार होकर ही ममता सत्ता के शिखर तक पहुंची थीं। ऐसे में ये नजदीकी ममता को खटकी और उन्होंने फौरन किसी भी तरह के गठबंधन से दूरी बना ली।
ममता की INDIA गठबंधन से दूरी का मुख्य कारण बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन बचाना और कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार न करना था। ममता के लिए राज्य की सत्ता और क्षेत्रीय वर्चस्व, राष्ट्रीय गठबंधन की तुलना में हमेशा प्राथमिकता पर रहे हैं। अब न सत्ता रही, ना ही वर्चस्व। इसी वजह से ममता को अचानक से INDIA गठबंधन की याद आई।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की हार के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ी है कि इंडिया गठबंधन का क्या होगा। अभी तक संसद में इंडिया गठबंधन के घटक दलों के रूप में समाजवादी पार्टी और डीएमके हमेशा से कांग्रेस के पीछे खड़ी रही। जबकि तृणमूल कांग्रेस का स्टैंड मुद्दों के आधार पर बदलता रहता था। वहीं अभी हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस ने दो राज्यों में अपने ही इंडिया गठबंधन के साथियों के खिलाफ चुनाव लड़ा। केरल में वह वाममोर्चा को हरा कर सत्ता में आई, जबकि बंगाल में वह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी और 292 सीटों पर उम्मीदवार उतारे।
राहुल गांधी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी की सरकार पर तीखे प्रहार किए। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है, क्योंकि राज्यों में राजनीतिक दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, मगर केंद्र में बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो जाते हैं। मगर अब इंडिया गठबंधन में दिक्कत ये है कि कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके का साथ छोड़ कर एक्टर विजय के साथ सरकार में शामिल होने जा रही है। जबकि डीएमके के साथ मिलकर उन्होंने अभी चुनाव लड़ा है। वैसे लोग इसे कांग्रेस की मौक़ापरस्त राजनीति भी कह सकते हैं, मगर यह राजनीति है। यदि मौका चूक गए तो चूकते ही रहेंगे और इतिहास गवाह है कांग्रेस ने ऐसे कई मौके चूके हैं।
अगर कांग्रेस एक्टर विजय के साथ सरकार में जाती है तो संसद में उसे लोकसभा में डीएमके के 22 और राज्यसभा के 8 सांसदों का समर्थन नहीं मिल पाएगा। दरअसल डीएमके के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस में चुनाव से पहले भी दो राय थी। कांग्रेस का एक धड़ा डीएमके के साथ चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं था, खासकर तमिलनाडु के कांग्रेसी। मगर अंत में राहुल गांधी को मानना पड़ा और कांग्रेस डीएमके का गठबंधन हुआ। अब देखना है कि तमिलनाडु की राजनीति क्या करवट लेती है। कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि कांग्रेस को एक्टर विजय के साथ जाना चाहिए हम अगली लोकसभा में तमिलनाडु की सभी 39 सीटें जीत सकते हैं।
दूसरी ओर राहुल गांधी अब तृणमूल कांग्रेस की तरफ से नरम हैं और भारतीय जनता पार्टी पर बंगाल में वोट चोरी के साथ साथ सरकार चोरी का आरोप लगा दिया है। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तो कोलकाता ही पहुंच गए। कुल मिलाकर यहां पर इंडिया गठबंधन पर एकसाथ दिखाई दे रहा है। मगर अगले चुनाव तक क्या होगा यह अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा टेस्ट उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव में होना है। यहां देखना होगा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एकसाथ लड़तीं है या अलग-अलग।
राहुल और अखिलेश पहले भी एक साथ लड़ चुके हैं। कांग्रेस अकेले भी लड़ चुकी है।अभी लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के 6 सांसद हैं।समाजवादी पार्टी के 37 सांसद मिलाकर कुल 43 सांसद होते हैं, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दिलचस्प हो सकता है। लेकिन इस सब के लिए इंडिया गठबंधन को 2027 और उसके आगे तक जिंदा रहना पड़ेगा।
बात करें तमिलनाडु तो वहां कांग्रेस के एक वर्ग ने चुनाव से पहले टीवीके के साथ गठबंधन करने की इच्छा खुलकर व्यक्त की थी, लेकिन अब जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, तो उसने टीवीके का समर्थन किया है।जहां कुछ विशेषज्ञ इसे "तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का निर्णय" मानते हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि "यह एक अवसरवादी निर्णय है, नीतिगत निर्णय नहीं।"विजय की नवगठित पार्टी, जिसने हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाग लिया था, उसने 108 सीटें जीती हैं।कांग्रेस ने टीवीके को सरकार बनाने में समर्थन दिया है। डीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 5 सीटें जीती हैं।
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरीश चोडंकर के नाम से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि पार्टी टीवीके का समर्थन इस शर्त पर करेगी कि "भारतीय संविधान में विश्वास न रखने वाली सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखा जाए।"वे आगे कहते कि वे तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। वे इसे ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करना चाहते हैं।"अपने बयान में गिरीश चोडंकर ने कहा, "यह गठबंधन आपसी सम्मान, उचित हिस्सेदारी और दोनों पक्षों की ज़िम्मेदारी की भावना पर आधारित है। यह न केवल वर्तमान सरकार के गठन के लिए बल्कि भविष्य के स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के लिए भी जारी रहेगा।"
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के समर्थन को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में पत्रकार मालन ने कहा, "कांग्रेस द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक टीवीके को समर्थन देने का कारण शायद आगामी चुनावों में अधिक सीटें जीतना हो सकता है। उन्हें लगता है कि विजय के साथ गठबंधन करने से उन्हें आसानी होगी। उन्होंने डीएमके को अपने भविष्य के रुख़ से अवगत कराने के लिए भी ऐसा कहा होगा।"तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की सबसे बड़ी सहयोगी रही है।इंदिरा गांधी के समय से लेकर राहुल गांधी के वर्तमान युग तक, कुछ मतभेदों के बावजूद डीएमके-कांग्रेस संबंध लंबे समय तक कायम रहे हैं।डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बीच का रिश्ता भी तमिलनाडु में कई बार चर्चा का विषय रहा है। दोनों ने सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एक-दूसरे को "भाई" कहा है।
एलंगोवन राजशेखरन ने राज्य की बड़ी पार्टियों का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा, "कांग्रेस ने 'इंडिया' गठबंधन में शामिल पार्टियों के खिलाफ काम किया। राज्य की पार्टियां कांग्रेस से नाराज़ हो गई हैं। इस तरह के रवैये के साथ, कांग्रेस पार्टी कभी भी भाजपा गठबंधन के विकल्प के रूप में उभर नहीं पाएगी। कांग्रेस ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है।"
जा मीडिया ने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस के इस फैसले से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।हालांकि, उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता युवा पीढ़ी के नेताओं से सहमत नहीं हैं। वे इस अवसर का लाभ उठाकर पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं। 1967 में तमिलनाडु में डीएमके के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस ने सरकार में कोई भूमिका नहीं निभाई है। अब यह स्थिति बदल सकती है।"
हालांकि, कांग्रेस के मोहन कुमारमंगलम का कहना है कि मंत्रिमंडल में भूमिका उनके लिए कोई शर्त नहीं है।एलंगोवन राजशेखरन का कहना है कि कांग्रेस की यह शर्त कि "सांप्रदायिक ताकतें जो भारतीय संविधान में विश्वास नहीं करतीं" इस गठबंधन में शामिल न हों, अस्वीकार्य है।वे कहते हैं, "अगर विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने का फैसला करते हैं तो कांग्रेस क्या करेगी?"
चेन्नई इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च की वरिष्ठ प्रोफेसर आनंदी कहती हैं, "टीवीके-कांग्रेस गुट ने नीतियों पर क्या चर्चा की? दोनों पक्षों ने निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण, भाषा नीति, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद आदि पर क्या बात की? यह सवाल उठता है कि क्या वे ऐसी आपातकालीन स्थिति में इन विषयों पर चर्चा कर सकते थे। यह तो सिर्फ संख्या का खेल है।"मोहन कुमारमंगलम कहते हैं, "विजय ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनका राजनीतिक शत्रु भाजपा है। हमने अपने समर्थन की शर्त यह रखी है कि सांप्रदायिक ताकतें गठबंधन में शामिल न हों। इसका मतलब है कि भाजपा को गठबंधन में नहीं आना चाहिए।"
इंडिया गठबंधन में अब विजय आएंगे या डीएमके निकलेगी ये भी एक बड़ा सवाल है राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए गठित 'इंडिया' गठबंधन का क्या होगा?के सवाल पर मालन कहते हैं, "विजय इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। हालांकि उस गठबंधन में शामिल पार्टियां अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के मुद्दे पर एकजुट हैं। हालांकि, अब अगर टीवीके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल हो जाता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि डीएमके गठबंधन में रहेगी या नहीं। इसका समाधान अगले लोकसभा चुनावों तक हो सकता है।"
मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "डीएमके की नीति भाजपा के खिलाफ नहीं है। ऐसे में वे 'इंडिया' गठबंधन में क्यों नहीं शामिल होते? दोनों दलों (टीवीके और डीएमके) को एक साथ आकर भाजपा का विरोध करना चाहिए। 'इंडिया' गठबंधन में हर तरह की नीतियों वाले दल शामिल हैं। क्या डीएमके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बजाय भाजपा के साथ गठबंधन करेगी? भविष्य में कुछ भी हो सकता है।"
मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "डीएमके की नीति भाजपा के खिलाफ नहीं है। ऐसे में वे 'इंडिया' गठबंधन में क्यों नहीं शामिल होते? दोनों दलों (टीवीके और डीएमके) को एक साथ आकर भाजपा का विरोध करना चाहिए। 'इंडिया' गठबंधन में हर तरह की नीतियों वाले दल शामिल हैं। क्या डीएमके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बजाय भाजपा के साथ गठबंधन करेगी? भविष्य में कुछ भी हो सकता है।"
अशोक भाटिया
लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
वसई पूर्व, मुम्बई (महाराष्ट्र)
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व में बहुत बड़ा अंतर है. वर्ष
1951 की जनगणना के अनुसार भारत में हिंदू आबादी 306 मिलियन (84.1प्रतिशत) थी, जबकि मुस्लिम आबादी 35.4 मिलियन (9.49 प्रतिशत) थी. वर्तमान में, भारत की अनुमानित आबादी 1.40 बिलियन है, जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग 183 मिलियन यानी 14.2 प्रतिशत है. वर्ष 1952 और 2024 के बीच लोकसभा में कुल 9584 सदस्य चुने गए, जिनमें 545 मुस्लिम सांसद शामिल हैं. यह कुल सदस्यों का लगभग 6.6 प्रतिशत है, जो भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के लगभग 14.2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व से काफ़ी कम है.
ये आंकड़े बताते हैं कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, वहीं लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व घट रहा है, जो एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाता है. वर्ष 1952 में पहले लोकसभा चुनावों में 25 मुस्लिम सदस्य थे, जो कुल का 5.11 प्रतिशत थे. वर्ष 1980 के चुनावों तक यह संख्या बढ़कर 49 हो गई थी, जो 1952 के बाद सबसे ज़्यादा थी. हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में चुने गए मुस्लिम सांसदों की संख्या घटकर सिर्फ़ 24 रह गई है, जो कुल का 4.42 प्रतिशत है, जो कुल आबादी में उनके अनुमानित 14.2 प्रतिशत हिस्से से बहुत कम है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होने के बावजूद लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है.
अल्पसंख्यक-मुक्त एनडीए एक विरोधाभास
11 दिसम्बर 2025 को प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में 4131 विधायक हैं, और भारतीय संसद की लोकसभा में 543 सांसद और राज्यसभा में 245 सांसद हैं यानी कुल 788 सांसद हैं. बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता में है. एनडीए गठबंधन में वर्तमान में लोकसभा में 293 सदस्य हैं और इस गठबंधन में कोई भी अल्पसंख्यक समूह शामिल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों ने बार-बार और ज़ोर देकर 'कांग्रेस-मुक्त भारत' की वकालत की है, और एनडीए गठबंधन लोकसभा में 'अल्पसंख्यक-मुक्त' हो गया है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है. ऐसे राज्य में अल्पसंख्यकों के बिना सत्ताधारी गठबंधन न केवल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक विरोधाभास है, बल्कि संविधान की भावना के भी ख़िलाफ़ है.
भारत की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 1.40 अरब है. इस जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 183 मिलियन (14.2 प्रतिशत) है. भारत में अल्पसंख्यक आबादी में 14.2 प्रतिशत, मुस्लिम 2.31 प्रतिशत, ईसाई और सिख 1.72 प्रतिशत हैं. इसका मतलब है कि इन तीन अल्पसंख्यक धर्मों के अनुयायी भारत की कुल आबादी का 28 प्रतिशत हैं, जिनका (एक ईसाई, किरेन रिजिजू को छोड़कर) एनडीए गठबंधन में प्रतिनिधित्व नहीं है. इंडिया (INDIA) गठबंधन, जिसके लोकसभा में 235 सांसद हैं, में कुल 543 लोकसभा सांसदों में से 7.9 मुस्लिम सांसद, 5 सिख सांसद और 3.5 प्रतिशत ईसाई सांसद शामिल हैं. इसमें केवल एक मुस्लिम महिला इकरा चौधरी शामिल हैं, जबकि मुस्लिम महिलाओं की अनुमानित आबादी लगभग 9 से 10 करोड़ है. लोकसभा में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में असदुद्दीन ओवैसी, यूसुफ़ पठान, शेख़ अब्दुल राशिद और इकरा चौधरी शामिल हैं.
कांग्रेस पार्टी: क्या मुस्लिम लीग है?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तुलना मुस्लिम लीग से की जा सकती है? भारतीय जनता पार्टी भी बार-बार यह प्रचार करती है कि कांग्रेस 'हिंदू-विरोधी' और 'मुस्लिम-समर्थक' या 'मुस्लिम लीग' है, और मुसलमानों के प्रति 'तुष्टीकरण' की नीति अपना रही है। हालांकि, जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 99 सांसदों में से केवल 7 सांसद मुस्लिम हैं (कुल सांसदों का केवल 7 प्रतिशत). कांग्रेस को 'मुस्लिम लीग' कहना और उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाना सच्चाई, तथ्यों और आंकड़ों से बहुत दूर है.
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की तुलना मुस्लिम लीग से की जा सकती है? भारतीय जनता पार्टी भी बार-बार यह प्रचार करती है कि कांग्रेस 'हिंदू-विरोधी' और 'मुस्लिम-समर्थक' या 'मुस्लिम लीग' है, और मुसलमानों के प्रति 'तुष्टीकरण' की नीति अपना रही है। हालांकि, जहां तक प्रतिनिधित्व की बात है, लोकसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 99 सांसदों में से केवल 7 सांसद मुस्लिम हैं (कुल सांसदों का केवल 7 प्रतिशत). कांग्रेस को 'मुस्लिम लीग' कहना और उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाना सच्चाई, तथ्यों और आंकड़ों से बहुत दूर है.
राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी और प्रतिनिधित्व: एक बड़ा अंतर
2021 में चार राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु - और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 824 विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ़ 112 मुस्लिम थे. यह प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, जिसके हिसाब से आदर्श रूप से लगभग 192 से 200 मुस्लिम विधायक होने चाहिए थे. असल में, हाल के चुनावों में असम, में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है, खासकर इसलिए क्योंकि पहले चुनावों के बाद यह पहली बार हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के जुड़ाव की वजह से शायद उन्हें वोटर्स ने नकार दिया.
2021 में चार राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु - और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजों से पता चलता है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 824 विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ़ 112 मुस्लिम थे. यह प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है, जिसके हिसाब से आदर्श रूप से लगभग 192 से 200 मुस्लिम विधायक होने चाहिए थे. असल में, हाल के चुनावों में असम, में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना गया, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है, खासकर इसलिए क्योंकि पहले चुनावों के बाद यह पहली बार हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी के जुड़ाव की वजह से शायद उन्हें वोटर्स ने नकार दिया.
प्रतिनिधित्व में यह असंतुलन दूसरे राज्यों में भी साफ दिखता है. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत है, फिर भी वहाँ सिर्फ़ 44 मुस्लिम विधायक हैं. केरल में मुसलमानों की आबादी 32 प्रतिशत है, जबकि 140 सदस्यों वाली विधानसभा में सिर्फ़ 32 मुस्लिम विधायक हैं. तमिलनाडु में 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद, सिर्फ़ सात मुस्लिम विधायक हैं. केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में, सिर्फ़ एक मुस्लिम चुना गया. फ़रवरी 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में, 70 सदस्यों में से सिर्फ़ चार मुस्लिम विधायक (आम आदमी पार्टी) चुने गए. इसी तरह नवम्बर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में कुल आबादी का 16.3 प्रतिशत मुस्लिम होने के बावजूद कुल 243 सदस्यों में से सिर्फ़ 11 मुस्लिम विधायक चुने गए. ख़ास बात यह है कि इन दोनों विधानसभाओं—दिल्ली और बिहार—में बीजेपी का एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है. हैरानी की बात यह है कि 2025 के आख़िर तक बीजेपी का भारत में किसी भी राज्य विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चुना.
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के मुख्य कारण
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के कई कारण हैं। हिंदू सांप्रदायिकता से प्रेरित सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण एक बड़ी भूमिका निभाता है. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनावी प्रणाली बहुमत का पक्ष लेती है, जिससे अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो जाता है. चुनौतियों में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों की कमी, निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन के कारण मुस्लिम मतदाताओं का कम प्रभाव, और राजनीतिक दलों की मुस्लिम उम्मीदवारों को नामांकित करने में अनिच्छा शामिल है. इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय का भौगोलिक फैलाव प्रभावी समुदाय-आधारित पार्टियों के गठन में बाधा डालता है. विभाजन जैसी ऐतिहासिक विरासत ने भी कुछ मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान की समस्या और भी जटिल हो गई है.
भारत में मुस्लिम विधायी प्रतिनिधित्व में गिरावट के कई कारण हैं। हिंदू सांप्रदायिकता से प्रेरित सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण एक बड़ी भूमिका निभाता है. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनावी प्रणाली बहुमत का पक्ष लेती है, जिससे अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो जाता है. चुनौतियों में मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों की कमी, निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन के कारण मुस्लिम मतदाताओं का कम प्रभाव, और राजनीतिक दलों की मुस्लिम उम्मीदवारों को नामांकित करने में अनिच्छा शामिल है. इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय का भौगोलिक फैलाव प्रभावी समुदाय-आधारित पार्टियों के गठन में बाधा डालता है. विभाजन जैसी ऐतिहासिक विरासत ने भी कुछ मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान की समस्या और भी जटिल हो गई है.
मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने हेतु सुझाव
भारतीय विधायिका में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए, कई सुझावों पर विचार किया जा सकता है। भारतीय मुसलमान या तो अपनी खुद की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं जो उनके हितों पर ध्यान केंद्रित करे, या नीति निर्माण में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए मौजूदा धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में शामिल हो सकते हैं. मुसलमानों के बीच सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा देना ज़रूरी है, जबकि धर्मनिरपेक्ष नेताओं और मीडिया को विभाजनकारी सांप्रदायिक विचारधाराओं को चुनौती देने के लिए काम करना चाहिए.
हिंदुओं और मुसलमानों को भारतीय संविधान में बताए गए धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को समझने और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए सतर्क रहने की ज़रूरत है. मुसलमानों को फ़ैसले प्रभावित करने के लिए सभी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना चाहिए, न कि सिर्फ निष्क्रिय भूमिका निभाना चाहिए. मुसलमानों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल करने और उनकी खास चिंताओं को दूर करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए.
इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं को राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना भी महत्वपूर्ण है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि समुदाय के भीतर अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व हो, कट्टरपंथियों के प्रभाव से बचना बहुत ज़रूरी है. अधिकारियों को नफ़रत फैलाने वाले भाषण, सांप्रदायिक हिंसा और भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर करने के किसी भी प्रयास के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए.आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू करने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि विधायिका मुस्लिम आबादी को सही ढंग से दर्शाए.
संक्षेप में भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए सभी समुदायों, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं, को शामिल करना ज़रूरी है. अंत: सिद्धांत सरल है: "जितनी जिसकी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी।
(लेखक हरियाणा के करनाल शहर स्थित दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल हैं)
सोनिया गांधी के माता-पिता इटली के वैनिटो प्रांत से थे आल्प्स की तलहटी पर एशियागो की पहाड़ियों में स्थित लुसियाना गांव __
इसी पशुपालक क्षेत्र से इटली को अपना प्रिय खाद्य पदार्थ "चीज" मिला है और यह स्थान संगमरमर की खदानों के लिए भी जाना जाता था ।
सोनिया जी के पिता स्टीफेनो और पाओला की शादी लुसियाना के चर्च में ही हुई थी ।
और सोनिया जी का जन्म 9 दिसंबर 1946 को रात 9:30 बजे हुआ था।
वे मारोसटिका के नगर निगम के अस्पताल में जन्मी थीं जो एशियागो पहाड़ियों की तलहटी में स्थित एक पुराना छोटा और चारदीवारी वाला शहर था।
यह खबर जल्दी ही लुसियाना गांव में पहुंच गई और यह गूंज पथरीले घरों, घोड़े के अस्तबलों पथरीली ढलानों और आसपास की पहाड़ियों से टकराते हुए सुदूर स्थित झरनों में जाकर खो गई।
नवजात कन्या के आगमन की खुशी में और परंपरा के अनुसार पड़ोसियों ने अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियों पर गुलाबी रिबन बांधे।
कुछ दिन बाद पादरी ने बच्ची का नाम रखा "एडविग एंटोनियो अल्बीना माइनो"
यह नाम सोनिया की नानी के नाम पर था लेकिन स्टेफेनो अपनी बेटी के लिए अलग सा नाम चाहते थे क्योंकि बड़ी बेटी का नाम एना रखा गया था पर वे उसे अनुष्का बुलाते थे और एंटोनिया को वे सोनिया बुलाने लगे ।
इस तरह उन्होंने रूसी मोर्चे से स्वयं के जीवित वापस आने के बाद अपने आप से किया गया वादा निभाया।
क्यों कि गरीबी झेल रहे अनेक इतालवी लोगों की तरह स्टीफेनो भी मुसोलिनी के प्रचार और फासिस्टवाद से मुग्ध हो गए थे और दूसरा विश्व युद्ध आरंभ होने पर उन्होंने 166 वीकोंजा सैन्य टुकड़ी में अपना नाम लिखवा लिया यह रेजीमेंट वरसैगलिरी से संबंध रखती थी।
जिसे इतालवी सेवा में प्रतिष्ठित माना जाता था।
ड्यूक द्वितीय भी इसमें काम कर चुके थे यह टुकड़ी परेड के दौरान अपनी तेज चाल के लिए जानी जाती थी ( प्रति मिनट 130 से अधिक कदमों की चाल )
वे अपने आसपास अदम्य साहस और कभी पराजित ना होने के भाव से घिरे हुए थे। परंतु रूसियों ने पहले ही हमले में उनको नष्ट कर दिया था और हजारों सिपाही बंदी बना लिए गए थे उनके बीच स्टिफेनो भी थे जो किसी तरह अपनी प्राण रक्षा करने में सफल हो गए थे और रुसी स्टेपिज के एक फार्म हाउस में आश्रय पाने में सफल रहे थे जहां उन्हें एक ग्रामीण परिवार के संरक्षण में कई सप्ताह बिताने पड़े थे उस परिवार की औरतों ने उनके घाव पर मरहम-पट्टी की थी और पुरुषों ने रसद जुटाई।
अपनी जान बचाने के सिवा वहां हुए दूसरे अनुभवों ने उन लोगों को पूरी तरह से बदल दिया था वह हजारों इतालवी लोगों की तरह वापस आए और जो फासिस्टवाद में जा उलझे थे और जिन्हें रूसी लोगों द्वारा सहायता प्रदान की गई थी तब से स्टीफेनो राजनीति की बात ही नहीं करते थे उनके लिए यह झूठ की पोटली के सिवा कुछ नहीं था ।
अपनी जान बचाने वाले परिवार को श्रद्धांजलि देने के लिए ही उन्होंने अपनी बेटियों को रुसी नाम देने का निर्णय लिया था।
वे पादरी और अपने ससुराल वालों से जिरह नहीं करना चाहते थे जिनके अनुसार सोनिया का नाम संतों के कैलेंडर का हिस्सा नहीं था।
स्टीफेनो ने हामी भरी कि वह बच्ची का नाम का पंजीकरण कैथोलिक नाम से ही करवाएंगे ।
नामकरण के बाद उस प्रांत के स्वादिष्ट व्यंजन बकाला आला वीसेंटिया के साथ पड़ोसियों को दावत दी गई उस समय कॉड परोसना भी किसी विलासिता से कम ना था।
क्योंकि उस समय हर चीज का अभाव था यहां तक कि प्रांतीय राजधानी विकेंजा में भी कुछ नहीं मिल रहा था।
उस समय गरीबी के चंगुल से निकलना आसान नहीं था उनके पास पहनने को कपड़े खाने के लिए भोजन और बस उससे थोड़ा सा अधिक था।
माइनो के पास अपनी जमीन नहीं थी केवल पत्थरों से बना हुआ घर और कुछ गायें थी घर को स्टिफेनो ने स्वयं बनाया था।
यह उसी गली के आखिरी छोर पर था जहां जर्मनी से आए अन्य संबंधियों की पीढ़ियां घर बना कर रहती थी।
वह सादगी से भरा जीवन व्यतीत करते थे किंतु घाटी से उन्हें अद्भुत दृश्य देखने को मिलते पत्थरों की नीची दीवारें , चारागाहों की चार दिवारी बनती जहां उनके पशु चरते और इस इलाके में पशुपालन प्रमुख था।
क्योंकि ये जगह कृषि के लिए उपयुक्त नहीं थी।
सोनिया और उनकी बहनें लुसियाना घाटी में ही बड़ी हुई जो बदलते मौसम के साथ रंग बदला करती थीं।
उनकी आंखों के सामने हरे और भूरे रंग के सभी शेड्स तैर जाया करते थे ।
उनकी आंखें पेड़ों को बसंत गर्मी शरद और शीत ऋतु में हरे पीले तांबई और सफेद रंगों में बदलते देखतीं।
बच्चों के लिए साल की पहली बर्फ किसी समारोह से कम ना होती वह उसका पूरा आनंद लेते सड़कों पर खेलते एक दूसरे को बर्फ के गोलो से मारते।
स्नोमैन बनाते परंतु यह कड़ी मेहनत और सर्दी सोनिया को जल्दी थका देती , और उन्हें मजबूरन घर लौटना पड़ता उन्हें किचन में आयरन स्टोव के पास बैठकर हाथ सेंकना अच्छा लगता था।
रविवार की सुबह गायों के गले में बंधी हुई घंटियों के सुर में चर्च की बज रही घंटियों के सुर विलीन हो जाते।
पूरा परिवार अच्छे कपड़े पहनकर चर्च जाता ।
उन्होंने कभी इसी क्रम में नागा नहीं किया । वे प्रार्थना करते कि स्टिफेनो को काम मिल जाए। और सोनिया का दमा रोग न उभरे।
घर के हालात में सुधार हो और लड़कियों को स्वस्थ रूप से बड़े होने के लिए सारी सुख सुविधाएं मिलें।
50 के दशक के आरंभ में स्टिफेनो नो को नौकरी मिली पर वह उनके गांव में नहीं थी यह पर्वत की दूसरी ओर स्विट्जरलैंड में थी उन्हें अनुभवी राजगीर के रूप में बनी पहचान के कारण समय-समय पर काम मिलता था।
वह कम से कम 2 महीने के लिए घर से बाहर जाते और जब लौटते तो जेबों में भरे पैसे उनकी अपेक्षा से कम समय में समाप्त हो जाते।
1956 में उन्होंने अपने तीनों भाइयों और बहुत से देशवासियों की तरह उन्होंने प्रवास का निर्णय लिया ।
तूरिन बड़ी तेजी से एक औद्योगिक नगर बन रहा था और देहात में रहने वाले बहुत से लोग रोजगार के लिए उस और खींचे चले आ रहे थे माइनो परिवार ने रेल से उतरकर इटली को पार किया और ऑरबेस्सानो में आ बसे।
जो तूरिन की बाहरी सीमा पर स्थित था।
ऑरबेस्सानो स्थित सोनिया जी के घर की तस्वीरें ____
राजीव गांधी की मृत्यु के बाद यहां के मेयर कार्लो मारोनी ने इस घर के सामने की सड़क का नाम उनके नाम पर रखा था।
(ये लेख जेवियर मोरो की किताब "द रेड साड़ी" से है)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन (17 सितम्बर) पर विशेष
- प्रो. संजय द्विवेदी
राजनीति में संवाद की बड़ी भूमिका है। कुशल नेतृत्व के लिए नेतृत्वकर्ता का कुशल संवादक होना अत्यंत आवश्यक है। संवाद की इसी प्रक्रिया को भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक क्रांतिकारी दिशा दी है। आम आदमी से जुड़कर सीधे संवाद करने की कला को मोदी ने पुन: जीवित कर जनता को 'प्रधान' का दर्जा दिया है और स्वयं 'सेवक' की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। वे भारत और भारतीय जन को संबोधित करने वाले नेता हैं। उनकी देहभाषा और उनकी जीवन यात्रा भारत के उत्थान और उसके जनमानस को स्पंदित करती है। यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि नरेंद्र मोदी उम्मीदों को जगाने वाले नेता हैं।
नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए अक्सर लोग ये प्रश्न पूछते हैं कि आखिर उनकी सफलता का राज क्या है? आखिर वो कौन सी चीज है, जो उन्हें भारत की मौजूदा राजनीति में नेताओं की भीड़ में सबसे अलग और सबसे खास बनाती है? असल में नरेंद्र मोदी की यात्रा एक साधारण इंसान के असाधारण बनने की कहानी है। वो आज जिस मुकाम पर हैं, इसमें उनकी संवाद शैली की सबसे अहम भूमिका है। उनके भाषणों की गूंज सिर्फ देश में ही सुनाई नहीं देती, बल्कि उन्होंने अपनी अनूठी संचार कला से दुनिया भर को प्रभावित किया है। वो बोलते हैं तो हर किसी के लिए उनके पास कुछ ना कुछ रहता है, वो अपनी बात जिस तरीके से समझाते हैं और लोगों को प्रभावित करते हैं, उससे लोग प्रेरित होते हैं।
अपनी संवाद कला से प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नेताओं को लेकर सोचने के बने-बनाए ढर्रे को तोड़ने का काम किया है। आम लोग जब नेताओं के भाषणों से उकता गए थे, जब चारों ओर निराशा घर कर चुकी थी, तब उनके भाषणों ने हताश-निराश माहौल के अंधेरे को छांटने का काम किया। वो आए और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गए। अपने जीवन में मन-वचन-कर्म को एक कर उन्होंने करोड़ों लोगों में अपनी अद्भुत भाषण शैली से नई जान डाल दी। याद कीजिए 13 सितंबर, 2013 का वो दिन, जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव की कमान सौंपी और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। महज 6 महीने के भीतर शुरू हो रहे आम चुनावों में उन्हें पार्टी ने सवा अरब भारतवासियों के साथ संवाद करने की जिम्मेदारी सौंपी। और तब जिस जोरदार तरीके से उन्होंने रैलियों में अपने अनूठे अंदाज वाले भाषणों से समां बांधा, उस चुनाव अभियान ने एक बारगी पूरे विश्व को अचंभित कर दिया। बगैर थके-बगैर रुके और बगैर एक भी सभा स्थगित किए, नरेंद्र मोदी ने 440 रैलियों के साथ पूरे देश की 3 लाख किलोमीटर की बेहद थकाऊ यात्रा महज 6 महीने में पूरी कर रिकॉर्ड कायम किया। इस चुनावी कैंपेन में उनके ओजस्वी भाषणों में कुछ ना कुछ नया और अनूठा था। काशी में जब मोदी की चुनावी सभा पर प्रशासन द्वारा रोक लगाई गई, तब उन्होंने कहा था, “मेरी मौन भी मेरा संवाद है।” इस एक वाक्य ने पूरे देश को उनके करिश्माई नेतृत्व में ऐसा गूंथ दिया कि भारतीय जनमानस में आत्माभिमान और आत्मगौरव वाले राजनीतिक नेतृत्व को लेकर एक नई बहस पैदा हो गई।
नरेंद्र मोदी ने श्रोताओं के हिसाब से अपने भाषणों में बदलाव किया, जो उनकी शैली की सबसे बड़ी खासियत भी बनी। अपने चुनावी अभियान में मोदी ने युवाओं और वृद्ध दोनों आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित किया। मोदी ने रटे-रटाए भाषणों के बजाय लय में बात रखी, जिसने अपेक्षाकृत अधिक लोगों के दिलों को छुआ। अपनी बॉडी लैंग्वेज में मोदी हाथों और उंगलियों का शानदार इस्तेमाल करते हैं। अपने शब्दों के हिसाब से वह चेहरे पर भाव लाते हैं । तर्कों को जब आंकड़ों और शानदार बॉडी लैंग्वेज का साथ मिलता है, तो भाषण अधिकतम प्रभाव छोड़ता है। मोदी अपने विजन को लोगों तक पहुंचाने के लिए आंकड़ों का खूब इस्तेमाल करते हैं। जरुरतों और उपलब्धता के आंकड़े अपने भाषणों में इस्तेमाल कर मोदी ने मुश्किल समस्याओं को आसानी से लोगों के सामने रखा। महान वक्ता इतिहास के किस्सों से अपने भाषणों को जीवंत बनाते हैं। अपनी बात को प्रभावी तरीके से रखने के लिए वे मुस्कुराहट, नारों और लयात्मक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। कई बार अच्छे वक्ता एक कहानी के माध्यम से ही अपनी बात और इरादे साफ कर देते हैं। नरेंद्र मोदी इस कला में निपुण हैं। उनके ‘वन लाइनर्स’ भाषण को यादगार बना जाते हैं।
विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को जब वे संबोधित करते हैं, तब भी ऐसा ही होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ‘सॉफ्ट पॉवर’ को पेश करने के लिए खास तौर पर प्रवासी भारतीयों पर ध्यान दिया है। चूंकि विदेशों में गए प्रवासी भारतीय काफी प्रभावशाली भूमिकाओं में हैं, इसलिए प्रधानमंत्री ने विभिन्न देशों के प्रमुख शहरों (जैसे कि ब्रसेल्स या दुबई) में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए, जिससे मजबूत संदेश दिया जा सके। ये प्रवासी भारतीय विदेश नीति संबंधी प्रयासों में एक अहम तत्व हैं और साथ ही भारत की ‘सॉफ्ट पॉवर’ को आगे भी बढ़ा रहे हैं। मोदी सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया का जम कर उपयोग करते हैं। मीडिया प्रबंधन की उनके पास कारगर रणनीति है। वे सोशल मीडिया की अहमियत को हमेशा स्वीकार करते रहे हैं और इसलिए लोगों को सीधे इसी के जरिए संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी उन शुरुआती नेताओं में से हैं, जिन्होंने हाल के समय में शुरू हुए ‘सेल्फी ट्रेंड’ के महत्व को समझा और इसका उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया। मोदी के बेहद लोकप्रिय ट्विटर अकाउंट पर सेल्फी को काफी महत्वपूर्ण जगह मिलती है और इस कारण युवाओं में उनकी काफी लोकप्रियता है। संचार को ले कर वे जैसी रणनीति बनाते हैं, वो सबसे अलग है। साल 2014 के प्रचार के दौरान उन्होंने होलोग्राम तकनीक का इस्तेमाल किया, ताकि एक साथ उन्हें कई जगह पर देखा जा सके। संचार की यह रणनीति उनकी ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि बनाने में मददगार साबित हुई। नरेंद्र मोदी लोगों से सीधा संवाद कायम करने में सक्षम भी हैं और इच्छुक भी हैं। मोदी जब विदेश जाते हैं, उस दौरान वहां के लिए संदेश देने के लिहाज से भी सोशल मीडिया ही उनकी पहली पसंद है। वे दूसरे देशों के लोगों के सामने उनकी अपनी भाषा में बात रखते हैं। यह भारतीय कूटनीति के तरकश में एक तीर है। सोशल मीडिया के जरिए पब्लिक डिप्लोमेसी आधुनिक कूटनीति का एक अहम साधन है, जिसका उद्देश्य खास तौर पर अपनी ‘सॉफ्ट पॉवर’ को पेश करना है। नरेंद्र मोदी इस कूटनीति के माहिर खिलाड़ी हैं।
लेकिन क्या मोदी का व्यक्तित्व सिर्फ भाषणों ने गढ़ा है? असल में नरेंद्र मोदी ‘मैन ऑफ एक्शन’ हैं। उन्हें मालूम है कि किस चीज को कैसे किया जाता है और भाषण की चीजों को एक्शन में कैसे लाया जाता है। लक्ष्य केंद्रित मोदी को मालूम है कि उनकी जिंदगी का उद्देश्य क्या है? 2014 में ब्यूरोक्रेसी के साथ सारे सहयोगियों को समय पर आने के आग्रह की शुरुआत प्रधानमंत्री खुद दफ्तर में ठीक 9 बजे हाजिर होकर शुरु करते हैं। उनका ये एक कार्य ही मातहतों के लिए साफ संकेत था कि प्रधानमंत्री किस तरह की कार्यशैली के कायल हैं। एक तंत्र, जो अरसे से चलता आ रहा है, प्रवृत्ति का शिकार है, उस तंत्र को भीतर से दुरुस्त कर उसे इस तरह सक्रिय करना कि देखते ही देखते सारा काम पटरी पर आ जाए। ये कमाल उस नेतृत्व का है, जिसके आते ही प्रशासन में लोग खुद को बदलने के लिए मजबूर हो गए।
जापान दौरे में ताइको ड्रम बजाकर उन्होंने जिस तरह से संसार भर को खुद के भीतर लय-सुर-ताल की समझ रखने वाले शख्स का अहसास कराया, उसने क्षण भर में ही उनके भीतर मौजूद हर मौके पर आम लोगों की दिलचस्पी के मुताबिक काम करने वाले बहुआयामी शख्सियत को सामने ला दिया। जो बताता है कि मोदी को मालूम है कि आखिर उनके सामने दर्शक वर्ग उक्त समय में क्या सुनना पसंद करेगा और किस तरह के बर्ताव और संवाद की अपेक्षा लोग उनसे करेंगे। लोकप्रिय भाषण देने में वो समकालीन नेताओं में सबसे आगे दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके भाषणों के पीछे कठोर तपस्या और कर्म-साधना का बल खड़ा रहता है। हर जगह के हिसाब से उनके भाषणों का मिजाज अलग होता है। स्थानीय बोलियों के साथ देश की अनेक मातृभाषाओं में जनता के साथ वो सीधा संवाद करते हैं। स्थानीय लोकोक्तियों और स्थानीय लोगों की जिंदगी से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का वो सहारा लेते हैं। मोदी अपने भाषणों में अक्सर जरुरत के अनुसार कहीं सख्त प्रशासक, तो कहीं नरमदिल और उदार नेता के तौर पर खुद की भावनाओं को आगे रखते हैं।
जिंदगी के रास्ते में उनके ऊपर फेंके गए पत्थरों से कैसे उन्होंने सफलता की सीढ़ियों का निर्माण किया, उनका जीवन और उनके भाषण इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वो एक ओर देश के युवाओं में आस भरते हैं, तो खिलखिलाकर हंसते भी हैं। मुट्ठी बांधकर आसमान में देश की ताकत का परचम फहराते हैं, तो दोनों हाथ उठाकर करोड़ों भारतीयों के आत्मविश्वास को आवाज देते हैं। आंखों में आंसू भरकर अपने बचपन की दुखों भरी जिंदगी का हवाला देकर वो आम भारतीय को हार न मानकर हिम्मत के साथ लड़ने और कर्मक्षेत्र में डटने की सीख भी देते हैं। ताकि गांव-गरीब-किसान, झुग्गी-झोपड़ी के इंसान, बेरोजगार नौजवान की जिंदगी में उम्मीदों का नया सवेरा आए। प्रधानमंत्री इन्हीं वजहों से बार बार ‘मुद्रा बैंक योजना’ के जरिए युवकों को स्वरोजगार के लिए कर्ज देने, नए बैंक खातों की योजना को सफल बनाने और ‘स्किल इंडिया’ के जरिए हर नौजवान को देश की जरुरत के हिसाब से हुनरमंद बनाने की बात करते हैं। ‘स्टार्टअप योजना’ के जरिए लाखों नए उद्यमी खड़े करने, स्वच्छता अभियान के जरिए भारत की बदरंग तस्वीर बदलने और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के जरिए महिलाओं और बच्चियों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। वह देश के कॉरपोरेट, विज्ञान, शिक्षा और खेल जगत समेत हर वर्ग और हर क्षेत्र में ‘सबका साथ-सबका विकास’ का महान मंत्र देते हैं, ताकि सबके साथ मिलकर भविष्य के भारत की तस्वीर को बदला जा सके।
प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति सब के बस की बात नहीं है। यह कला सीखी नहीं जा सकती। यह केवल और केवल अनुभव से आती है। जनता के बीच से निकला जमीनी नेता ही इस स्तर तक पहुंच सकता है। जैसे कि नरेंद्र मोदी। उन्हें सुनने वालों की फेहरिस्त में देश के लोग भी हैं और दुनिया के भी। विरोधियों को घेरना हो या मन की बात करनी हो, उनके शब्दों का चयन अनूठा होता है। पुलवामा हमले के बाद जब उन्होंने कहा, “घर में घुसकर मारेंगे”, तब उनके चेहरे पर जो भाव थे, वे बता रहे थे कि यह महज भाषणबाजी नहीं है। विरोधी भले ही इसे जुमलेबाजी कहें, लेकिन शायद जनता इसे जुमलेबाजी नहीं मानती। अगर मानती तो मोदी का नाम ‘ब्रांड मोदी’ नहीं बन पाता। राष्ट्रीय राजनीति में अपने सेवा भाव, साधारण जीवन शैली, शानदार प्रबंधन और शब्दों के प्रभावी चयन के बूते नरेंद्र मोदी अगली कतार में आ खड़े हुए हैं। जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने देश की विविध जनता को ध्यान में रखते हुए अपनी संवाद क्षमता का इस्तेमाल किया है, वह उनकी सफलता का बड़ा आधार भी है। ऐसे परिदृश्य में जब भारत के प्रधानमंत्री को वैश्विक नेता के रूप में मान्यता मिली है, उनका प्रत्येक शब्द मूल्यवान हो जाता है। विशाल देश की विशाल जनसंख्या से संवाद करने का इससे ज्यादा प्रभावी तरीका दूसरा नहीं हो सकता।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं।)
वीर विनोद छाबड़ा
आज राजीव गांधी का जन्मदिन है. उन्होंने संजय गांधी के प्लेन हादसे से हुई मृत्यु के कारण बहुत हिचक के साथ राजनीति में कदम रखा. अमेठी सीट से उपचुनाव जीत कर सांसद बने. इंदिरा जी की हत्या के बाद 1984 में प्रधानमंत्री बने, महज 40 साल की उम्र में, भारत के आजतक के सबसे युवा प्रधानमंत्री. ताजपोशी के बाद सबसे पहले सिख विरोधी दंगे नियंत्रित किये. इस संदर्भ में उनके इस बयान की विपक्ष ने बहुत आलोचना की कि जब एक बड़ा वृक्ष गिरता है तो उसके आस-पास की धरती भी उखड़ती है.
उसी साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने चार सौ से ऊपर सीटें जीतीं. लेकिन इसमें राजीव का योगदान ज्यादा नहीं था बल्कि इंदिरा जी की हत्या के कारण उपजी सहानुभूति थी. आने वाले साल राजीव के लिए बहुत कठिन रहे. शाहबानो को लेकर अल्पवर्ग के प्रति सहानुभूति के कारण बहुसंख्यक के साथ साथ अल्पसंख्यक भी नाराज़ हो गए. श्रीलंका में तमिल मिलिटेंसी को कुचलने के लिए भेजी गयी 'पीस कीपिंग' फौज, पंजाब समस्या सुलझाने के लिये राजीव गाँधी-लोंगोवाल एकॉर्ड, मिजोरम समझौता आदि अच्छे काम किये. मालद्वीप में सेना भेज कर विद्रोह को कुचला. उस दौर के जानकार बताते थे, यदि ऐसा न होता तो पाकिस्तान का मालद्वीप पर कब्ज़ा निश्चित था. उन्होंने लोकप्रियता के नए आयाम छुए. लेकिन जलने वालों की फ़ौज बढ़ती गयी. अंततः अपनों ने ही बोफोर्स कांड में घेर लिया. वीपी सिंह, अरुण नेहरू आदि अनेक विश्वसनीय साथियों ने उनके साथ दगा की. उन्हें राजीव ने बाहर का रास्ता दिखाया. विपक्षी तो हमलावर थे ही. उन्हें तो बस मौके का इंतज़ार था.
इधर सच्ची बात कह कर ब्यूरोक्रेसी को नाराज़ कर डाला - गरीब के लिए भेजे गए हर एक रूपए में उसको सिर्फ 15 पैसे ही मिलते हैं. अभिमन्यु चक्रव्यूह में फँस गया. लेकिन राजीव गांधी ने इन आँधियों के बीच अपने अकेले दम पर कुछ बहुत अच्छे काम भी किये जिसके लिए राष्ट्र उन्हें आज भी सलाम करता है. सबसे पहले उन्होंने आया-राम गया राम पर अंकुश लगाने के लिए 'एंटी डिफेक्शन बिल' पास कराया. अठारह की आयु वालों को वोटिंग राइट दिलवाया. सबसे महत्वपूर्ण तो इक्कीसवीं शताब्दी में छलांग लगाने की बात की. सूचना तंत्र की क्रांति का बिगुल बजाया. सैम पित्रोदा ने उनका अच्छा साथ दिया. गांव गांव में पीसीओ लग गए. सरकारी दफ्तरों में कंप्यूटर की शुरुआत की. बहुत विरोध हुआ इसका कि बेरोजगारी बढ़ेगी. लेकिन नतीजा देखिये कि कंप्यूटर आज सबसे अच्छा मित्र है.
1989 के चुनाव में बोफोर्स में भ्रष्टाचार के घने गहरे छाये थे. मीडिया पूरी तरह से राजीव गांधी के विरुद्ध था. लगता था कि कांग्रेस का नामो-निशान मिट जाएगा. लेकिन इसके बावज़ूद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को लोकसभा में सर्वाधिक 196 सीटें मिलीं. उन्हें सरकार बनाने का ऑफर मिला. विरोधियों को मिर्ची लग गयी. गला फाड़ चिल्लाने लगे. लेकिन राजीव ने बड़ी शालीनता से विपक्ष में बैठना स्वीकार किया. वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने. लेकिन हर चुनावी सभा में बोफोर्स घोटाले में संलिप्त जनों के नाम जेब में रखी पर्ची में लिखे होने की बात करने वाले वीपी सिंह पलट गए. कोई पर्ची नहीं निकली. जुमला निकला.
पहले वीपी सिंह और फिर चंद्रशेखर के नेतृत्व में बनीं सरकारें चल नहीं सकीं. जनता को राजीव गांधी शिद्दत से याद आये. तब तक राजीव भी राजनीती में दोस्त के भेष में छिपे दुश्मन को पहचानने का गुर सीख चुके थे. और लगभग तय था कि राजीव गांधी 1991 के चुनाव में एक बार फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे. मगर इससे पूर्व ही श्रीलंका में लिट्टों के प्रति नीति का विरोध करने वालों उनकी हत्या कर दी.
जिन लोगों ने राजीव को बहुत निकट से देखा और जाना है, उनका कथन है कि राजीव गांधी जैसा शालीन बंदा दूसरा नहीं देखा.
उन्होंने ही कहा था - मेरा भारत महान. अगर राजीव होते तो आज राजनीति का सीन फ़र्क होता.
फ़िरदौस ख़ान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला सशक्तिकरण पर ज़ोर देते हुए राज्यसभा के सभी सांसदों से नारी शक्ति वंदन अधिनियम संविधान संशोधन मामले में सर्सम्मति से निर्णय लेने का आह्वान किया है. वे आज नये संसद भवन में राज्यसभा को संबोधित कर रहे थे. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि हम सबके लिए आज का ये दिवस यादगार भी है, ऐतिहासिक भी है. इससे पहले मुझे लोकसभा में भी अपनी भावना को व्यक्त करने का अवसर मिला था. अब राज्यसभा में भी आज आपने मुझे अवसर दिया है, मैं आपका आभारी हूं.
हमारे संविधान में राज्यसभा की परिकल्पना उच्च सदन के रूप में की गई है. संविधान निर्माताओं का ये आशय रहा है कि ये सदन राजनीति की आपाधापी से ऊपर उठकर के गंभीर, बौद्धिक विचार विमर्श का केंद्र बने और देश को दिशा देने का सामर्थ्य यहीं से निकले. ये स्वाभाविक देश की अपेक्षा भी है और लोकतंत्र की समृद्धि में ये योगदान भी उस समृद्धि को अधिक मूल्यवृद्धि कर सकता है.
इस सदन में अनेक महापुरुष रहे हैं. मैं सब का उल्लेख तो न कर पाऊं लेकिन लाल बहादुर शास्त्री जी को, गोविंद वल्लभ पंत साहब हों, लालकृष्ण आडवाणी जी हो, प्रणब मुखर्जी साहब हों, अरूण जेटली जी हों, ऐसे अनगिनत विद्वान, सृष्टिजन और सार्वजनिक जीवन में वर्षों तक तपस्या किए हुए लोगो ने इस सदन को सुशोभित किया है, देश का मार्गदर्शन किया है. ऐसे कितने ही सदस्य जिन्होंने एक प्रकार से व्यक्ति स्वयं में एक संस्था की तरह, एक independent think tank के रूप में अपना सामर्थ्य देश को उसका लाभ देने वाले लोग भी हमें रहे हैं. संसदीय इतिहास के शुरुआती दिनों में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण जी ने राज्यसभा के महत्व पर कहा था कि parliament is not only a legislative but a deliberative body. राज्यसभा से देश की जनता की अनेक ऊंची अपेक्षाएं हैं, सर्वोत्तम अपेक्षाएं हैं और इसलिए माननीय सदस्यों के बीच गंभीर विषयों की चर्चा और उसे सुनना ये भी एक बहुत बड़ा सुखद अवसर होता है. नया संसद भवन एक सिर्फ़ नई बिल्डिंग नहीं है, लेकिन ये एक नई शुरुआत का प्रतीक भी है. हम व्यक्तिगत जीवन में भी देखते हैं. जब किसी भी नई चीज़ के साथ हमारा जुड़ाव आता है तो मन पहला करता है कि अब एक नये वातावरण का मैं optimum utilisation करूंगा, उसका सर्वाधिक सकारात्मक वातावरण में मैं काम करूंगा ऐसा स्वभाव होता है. और अमृतकाल की शुरुआत में ही इस भवन का निर्माण होना और इस भवन में हम सबका प्रवेश होना ये अपने आप में, हमारे देश के 104 करोड़ नागरिकों की जो आशा–आकांक्षाएं हैं उसमें एक नई ऊर्जा भरने वाला बनेगा. नई आशा और नया विश्वास पैदा करने वाला बनेगा.
हमें तय समय सीमा में लक्ष्यों को हासिल करना है. क्योंकि देश, जैसा मैंने पहले भी कहा था, ज़्यादा प्रतीक्षा नहीं कर सकता है. एक कालखंड था जब सामान्य मन को लगता था कि ठीक है हमारे मां-बाप भी ऐसे गुज़ारा किया, हम भी कर लेंगे, हमारे नसीब में ये था हम जी लेंगे. आज समाज जीवन की और ख़ासकर के नई पीढ़ी की सोच वो नहीं है और इसलिए हमें भी नई सोच के साथ नई शैली के साथ सामान्य मानवीय की आशा–आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हमारे कार्य का व्याप्त भी बढ़ाना पड़ेगा, हमारी सोचने की जो सीमाएं हैं उससे भी हमें आगे बढ़ना पड़ेगा और हमारी क्षमता जितनी बढ़ेगी उतना ही देश की क्षमता बढ़ाने में हमारा योगदान भी बढ़ेगा.
मानता हूं कि इस नये भवन में, ये उच्च सदन में हम अपने आचरण से, अपने व्यवहार से संसदीय सूचिता के प्रतीक रूप में देश की विधानसभाओं को, देश की स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं को बाक़ी सारी व्यवस्था को प्रेरणा दे सकते हैं और मैं समझता हूं कि ये स्थान ऐसा है कि जिसमें ये सामर्थ्य सबसे अधिक है और इसका लाभ देश को मिलना चाहिए, देश के जनप्रतिनिधि को मिलना चाहिए, चाहे वो ग्राम प्रधान के रूप में चुना गया हो, चाहे वो संसद में आया हो और ये परम्परा यहां से हम कैसे आगे बढ़ाएं.
पिछले नौ वर्ष से आप सबके साथ से, सहयोग से देश की सेवा करने का हमें मौक़ा मिला. कई बड़े निर्णय करने के अवसर आए और बड़े महत्वपूर्ण निर्णयों पर फ़ैसले भी हुए और कई तो फ़ैसले ऐसे थे जो दशकों से लटके हुए थे. उन फ़ैसलों को भी और ऐसे निर्णय, ऐसी बातें थीं जिसको बहुत कठिन माना जाता था, मुश्किल माना जाता था और राजनीतिक दृष्टि से तो उसको स्पर्श करना भी बहुत ही ग़लत माना जाता था. लेकिन इन सबके बावजूद भी हमने उस दिशा में कुछ हिम्मत दिखाई. राज्यसभा में हमारे पास उतनी संख्या नहीं थी लेकिन हमें एक विश्वास था कि राज्यसभा दलगत सोच से ऊपर उठकर के देश हित में ज़रूर अपने फ़ैसले लेगी. और मैं आज मेरे संतोष के साथ कह सकता हूं कि उदार सोच के परिणाम हमारे पास संख्याबल कम होने के बावजूद भी आप सभी माननीय सांसदों की maturity के कारण, समझ के कारण, राष्ट्रहित के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी के कारण, आप सबके सहयोग से हम कई ऐसे कठिन निर्णय भी कर पाए और राज्यसभा की गरिमा को ऊपर उठाने का काम सदस्य संख्या के बल पर नहीं, समझदारी के सामर्थ्य पर आगे बढ़ा. इससे बड़ा संतोष क्या हो सकता है? और इसलिए मैं सदन के सभी माननीय सांसदों का जो आज हैं, जो इसके पहले थे उन सबका धन्यवाद करता हूं.
लोकतंत्र में कौन शासन में आएगा, कौन नहीं आएगा, कौन कब आएगा, ये क्रम चलता रहता है. वो बहुत स्वाभाविक भी है और वो लोकतंत्र की स्वाभाविक उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति भी है. लेकिन जब भी विषय देश के लिए सामने आए हम सबने मिलकर के राजनीति से ऊपर उठकर के देश के हितों को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करने का प्रयास किया है.
राज्यसभा एक प्रकार से राज्यों का भी प्रतिनिधित्व करती है. एक प्रकार से cooperative federalism और जब अब competitive cooperative federalism की ओर बल दे रहे हैं तब हम देख रहे हैं कि एक अत्यंत सहयोग के साथ अनेक ऐसे मसले रहे हैं, देश आगे बढ़ा है. Covid का संकट बहुत बड़ा था. दुनिया ने भी परेशानी झेली है हम लोगों ने भी झेली है. लेकिन हमारे federalism की ताक़त थी की केंद्र और राज्यों ने मिलकर के, जिससे जो बन पड़ता है, देश को बहुत बड़े संकट से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया और ये हमारे cooperative federalism की ताक़त को बल देता है. हमारे federal structure की ताक़तों से अनेक संकटों का सामना किया है. और हमने सिर्फ़ संकटों के समय नहीं, उत्सव के समय भी दुनिया के सामने भारत की उस ताक़त को पेश किया है जिससे दुनिया प्रभावित हुई है. भारत की विविधता, भारत के इतने राजनीतिक दल, भारत में इतने media houses, भारत के इतने रहन-सहन, बोलियां ये सारी चीज़ें G-20 समिट में, राज्यों में जो Summit हुई क्योंकि दिल्ली में तो बहुत देर से आई. लेकिन उसके पहले देश के 60 शहरों में 220 से ज़्यादा समिट होना और हर राज्य में बढ़-चढ़कर के, बड़े उत्साह के साथ विश्व को प्रभावित करे इस प्रकार से मेहमानवाजी भी की और जो deliberations हुए उसने तो दुनिया को दिशा देने का सामर्थ्य दिखाया है. और ये हमारे federalism की ताक़त है और उसी federalism के कारण और उसी Cooperative federalism के कारण आज हम यहां प्रगति कर रहे हैं.
इस नये सदन में भी, नई इस हमारी Parliament building में भी, उस federalism का एक अंश ज़रूर नज़र आता है. क्योंकि जब बनता था तो राज्यों से प्रार्थना की गई थी कि कई बातें ऐसी हैं जिसमें हमें राज्यों की कोई न कोई याद यहां चाहिए. लगना चाहिए कि ये भारत के सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व है और यहां कई प्रकार की ऐसी कलाकृतियां, कई चित्र पूरे हमारे दीवारों की शोभा बढ़ा रहे हैं. वो राज्यों ने पसंद करके अपने यहां राज्य की श्रेष्ठ चीज़ भेजी है यानी एक प्रकार से यहां के वातावरण में भी राज्य भी हैं, राज्यों की विवधता भी है और federalism की सुगंध भी है.
Technology ने जीवन को बहुत तेज़ी से प्रभावित किया है. पहले जो टेक्नोलॉजी में बदलाव आते-आते 50-50 साल लग जाते थे वो आजकल कुछ हफ़्तों में आ जाते हैं. आधुनिकता, अनिवार्यता बन गई है और आधुनिकता को मैच करने के लिए हमने अपने आप को भी निरंतर dynamic रूप से आगे बढ़ाना ही पड़ेगा जब जाकर के उस आधुनिकता के साथ हम क़दम से क़दम मिलाकर के आगे बढ़ सकते हैं.
पुराने भवन में हमने जिसको अभी आपने संविधान सदन के रूप में कहा हमने वहां कभी आज़ादी का अमृत महोत्सव बड़े आन-बान-शान के साथ मनाया, 75 साल की हमारी यात्रा की तरफ़ हमने देखा भी और नई दिशा, नया संकल्प करने का प्रयास भी शुरू किया है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि नये संसद भवन में आज़ादी की जब हम शताब्दी मनाएंगे वो स्वर्ण शताब्दी विकसित भारत की होगी, developed India की होगी मुझे पूरा विश्वास है. पुराने भवन में हम पांचवीं अर्थव्यवस्था तक पहुंचे थे, मुझे विश्वास है कि नई संसद भवन में हम दुनिया की top 3 economy बनेंगे, स्थान प्राप्त करेंगे. पुराने संसद भवन में ग़रीब कल्याण के अनेक initiative हुए, अनेक काम हुए नये संसद भवन में हम अब शत-प्रतिशत saturation जिसका हक़ उसको पुन: मिले.
इस नये सदन की दीवारों के साथ-साथ हमें भी अब टेक्नोलॉजी के साथ अपने आप को अब adjust करना पड़ेगा क्योंकि अब सारी चीज़ें हमारे सामने I-Pad पर है. मैं तो प्रार्थना करूंगा कि बहुत से माननीय सदस्यों को अगर कल कुछ समय निकालकर के उनको अगर परिचित करा दिया जाए टेक्नोलॉजी से तो उनकी सुविधा रहेगी, वहां बैठेगें, अपनी स्क्रीन भी देखेंगे, ये स्क्रीन भी देखेंगे तो हो सकता है कि उनको कठिनाई ना आए क्योंकि आज मैं अभी लोकसभा में था तो कई साथियों को इन चीज़ों को operate करने में दिक़्क़त हो रही थी. तो ये हम सबका दायित्व है कि हम उसमें सबकी मदद करें तो कल कुछ समय निकालकर के अगर ये हो सकता है तो अच्छा होगा.
ये डिजिटल का युग है. हमने इस सदन से भी उस चीज़ों से आदतन हमारा हिस्सा बनाना ही होगा. शुरू में थोड़ा दिन लगता है लेकिन अब तो बहुत सी चीज़ें user-friendly होती हैं बड़े आराम से इन चीज़ों को adopt किया जा सकता है. अब इसको करें. Make in India एक प्रकार से globally game changer के रूप में हमने इसका भरपूर फ़ायदा उठाया है और मैंने कहा वैसे नई सोच, नया उत्साह, नया उमंग, नई ऊर्जा के साथ हम आगे बढ़कर के कर सकते हैं.
आज नया संसद भवन देश के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक फ़ैसले का साक्षी बन रहा है. अभी Parliament लोकसभा में एक bill प्रस्तुत किया गया है. वहां पर चर्चा होने के बाद यहां भी आएगा. नारी शक्ति के सशक्तिकरण की दिशा में जो पिछले अनेक वर्षों से महत्वपूर्ण क़दम उठाए गए हैं उसमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण क़दम आज हम सब मिलकर के उठाने जा रहे हैं. सरकार का प्रयास रहा East of Living का Quality of Life का और Ease of Living और Quality of Life की बात करते है तो उसकी पहली हक़दार हमारी बहनें होती हैं, हमारी नारी होती हैं क्योंकि उसी को सब चीज़ें झेलनी है. और इसलिए हमारा प्रयास रहा है और राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका बहे ये भी हमारी उतनी ही ज़िम्मेदारी है. अनेक नये-नये sectors हैं, जिनमें महिलाओं की शक्ति, महिलाओं की भागीदारी निरंतर सुनिश्चित की जा रही हैं. Mining में बहनें काम कर सकें ये निर्णय है, हमारे ही सांसदों की मदद से हुआ. हमने सभी स्कूलों को बेटियों के लिए दरवाज़े खोल दिए क्योंकि बेटियों में जो सामर्थ्य है. उस सामर्थ्य को अब अवसर मिलना चाहिए उनके जीवन में Ifs and buts का युग ख़त्म हो चुका है. हम जितनी सुविधा देंगे उतना सामर्थ्य हमारी मातृ शक्ति हमारी बेटियां, हमारी बहनें दिखाएंगी. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का अभियान वो कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं है समाज के इसे अपना बनाया है और बेटियों की मान-सम्मान की दिशा में, समाज में एक भाव पैदा हुआ है. मुद्रा योजना हो, जनधन योजना हो महिलाओं ने बढ़ चढ़कर के इसका लाभ उठाया है. Financial inclusion के अंदर आज भारत में महिलाओं का सक्रिय योगदान नज़र आ रहा है, ये अपने आप में, मैं समझता हूं उनके परिवार के जीवन में भी उनके सामर्थ्य को प्रकट करता है. जो सामर्थ्य अब राष्ट्र जीवन में भी प्रकट होने का वक़्त आ चुका है. हमारी कोशिश रही है कि हमारी माताओं, बहनों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उज्जवला योजना, हमें मालूम है गैस सिलेंडर के लिए पहले एमपी के घर के चक्कर काटने पड़ते थे. ग़रीब परिवारों तक उसको पहुंचाना मैं जानता हूं बहुत बड़ा आर्थिक बोझ है लेकिन महिलाओं के जीवन को ध्यान में रखते हुए उस काम को किया. महिलाओं के सम्मान के लिए ट्रिपल तलाक़ लम्बे अरसे से राजनीतिक कोशिशें, राजनीतिक लाभालाभ का शिकार हो चुका था. इतना बड़ा मानवीय निर्णय लेकिन हम सभी माननीय सांसदों की मदद से उसको कर पाया. नारी सुरक्षा के लिए कड़े क़ानून बनाने का काम भी हम सब कर पाए हैं. Women-led development G-20 की सबसे बड़ी चर्चा का विषय रहा और दुनिया के कई देश हैं जिनके लिए Women-led development विषय थोड़ा सा नया सा अनुभव होता था और जब उनकी चर्चा में सुर आते थे, कुछ अलग से सुर सुनने को मिलते थे. लेकिन G-20 के declaration में सबने मिलकर के Women- led development के विषय को अब भारत से दुनिया की तरफ़ पहुंचा है ये हम सबके लिए गर्व की बात है.
इसी background में लंबे अरसे से विधानसभा और लोकसभा में सीधे चुनाव में बहनों की भागीदारी सुनिश्चित करने का विषय और ये बहुत समय से आरक्षण की चर्चा चली थी, हर किसी ने कुछ न कुछ प्रयास किया है लेकिन और ये 1996 से इसकी शुरुआत हुई है और अटल जी के समय तो कई बार बिल लाए गए. लेकिन नम्बर कम पड़ते थे उस उग्र विरोध का भी वातावरण रहता था, एक महत्वपूर्ण काम करने में काफ़ी असुविधा होती थी. लेकिन जब नये सदन में आए हैं. नया होने का एक उमंग भी होता है तो मुझे विश्वास है कि ये जो लम्बे अरसे से चर्चा में रहा विषय है अब इसको हमने क़ानून बनाकर के हमारे देश की विकास यात्रा में नारी शक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करने का समय आ चुका है. और इसलिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम संविधान संशोधन के रूप में लाने का सरकार का विचार है जिसको आज लोकसभा में रखा गया है, कल लोकसभा में इसकी चर्चा होगी और इसके बाद राज्यसभा में भी आएगा. मैं आज आप सबसे प्रार्थना करता हूं कि एक ऐसा विषय है जिसको अगर हम सर्वसम्मति से आगे बढ़ाएंगे तो साथ अर्थ में वो शक्ति अनेक गुना बढ़ जाएगी. और जब भी हम सबके सामने आए तब मैं राज्यसभा के सभी मेरे माननीय सांसद साथियों से आज आग्रह करने आया हूं कि हम सर्वसम्मति से जब भी उसके निर्णय करने का अवसर आए, आने वाले एक-दो दिन में आप सबके सहयोग के अपेक्षा साथ मैं मेरी वाणी को विराम देता हूं. बहुत-बहुत धन्यवाद.
फ़िरदौस ख़ान
भारतीय जनता पार्टी की आईटी सेल के लोग और नेता कांग्रेस नेताओं को कितना ही बुरा कहें, लेकिन उनके आक़ाओं को कांगेस नेताओं की तारीफ़ करनी ही पड़ती है. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नये संसद भवन में लोकसभा को संबोधित करते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को याद किया. नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये भवन नया है, यहां सबकुछ नया है, सारी व्यवस्थाएं नई हैं, यहां तक आपके सब साथियों को भी आपने एक नये रंग-रूप के साथ प्रस्तुत किया है. सब कुछ नया है लेकिन यहां पर कल और आज को जोड़ती हुई एक बहुत बड़ी विरासत का प्रतीक भी मौजूद है, वो नया नहीं है, वो पुराना है. और वो आज़ादी की पहली किरण का स्वयं साक्षी रहा है जो आज अभी हमारे बीच उपस्थित है. वो हमारे समृद्ध इतिहास को जोड़ता है और जब आज हम नये सदन में प्रवेश कर रहे हैं, संसदीय लोकतंत्र का जब ये नया गृह प्रवेश हो रहा है तो यहां पर आज़ादी की पहली किरण का साक्षी, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देने वाला है, वैसा पवित्र सैंगोल और ये वो सैंगोल है जिसको भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का स्पर्श हुआ था, ये पंडित नेहरू के हाथों में पूजाविधि कर-करके आज़ादी के पर्व का प्रारम्भ हुआ था. और इसलिए एक बहुत महत्वपूर्ण अतीत को उसके साथ ये सैंगोल हमें जोड़ता है. तमिलनाडु की महान परम्परा का वो प्रतीक तो है ही देश को जोड़ने का भी, देश की एकता का भी वो प्रतीक है. और हम सभी माननीय सांसदों को हमेशा जो पवित्र सैंगोल पंडित नेहरू के हाथ में शोभा देता था वो आज हम सबकी प्रेरणा का कारण बन रहा है, इससे बड़ा गर्व क्या हो सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा को संबोधित करते हुए कहा कि नये संसद भवन का ये प्रथम और ऐतिहासिक सत्र है. मैं सभी माननीय सांसदों को और सभी देशवासियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं.
आज़ादी के अमृतकाल में हम जब नये संकल्पों को लेकर चल रहे हैं तब, अब जब गणेश चतुर्थी का पर्व आज है तब लोकमान्य तिलक की याद आना बहुत स्वाभाविक है. आज़ादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक जी ने गणेश उत्सव को एक सार्वजनिक गणेश उत्सव के रूप में प्रस्थापित करके पूरे राष्ट्र में स्वराज्य की आहलेख जगाने का माध्यम बनाया था. लोकमान्य तिलक जी ने गणेश पर्व से स्वराज्य की संकल्पना को शक्ति दी उसी प्रकास से आज ये गणेश चतुर्थी का पर्व, लोकमान्य तिलक जी ने स्वतंत्र भारत स्वराज्य की बात कही थी. आज हम समृद्ध भारत गणेश चतुर्थी के पावन दिवस पर उसकी प्रेरणा के साथ आगे बढ़ रहे हैं. सभी देशवासियों को इस अवसर पर फिर एक बार मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं.
आज संवत्सरी का भी पर्व है ये अपने आप में एक अद्भुत परम्परा है इस दिन को एक प्रकार से क्षमावाणी का भी पर्व कहते है. आज मिच्छामी दुक्कड़म कहने का दिन है, ये पर्व मन से, कर्म से, वचन से अगर जाने अनजाने किसी को भी दुख पहुंचाया है तो उसकी क्षमायाचना का अवसर है. मेरी तरफ़ से भी पूरी विनम्रता के साथ, पूरे हृदय से आप सभी को, सभी सांसद सदस्यों को और सभी देशवासियों को मिच्छामी दुक्कड़म. आज जब हम एक नई शुरुआत कर रहे हैं तब हमें अतीत की हर कड़वाहट को भुलाकर आगे बढ़ना है. स्पिरिट के साथ जब हम यहां से, हमारे आचरण से, हमारी वाणी से, हमारे संकल्पों से जो भी करेंगे, देश के लिए, राष्ट्र के एक-एक नागरिक के लिए वो प्रेरणा का कारण बनना चाहिए और हम सबको इस दायित्व को निभाने के लिए भरसक प्रयास भी करना चाहिए.
ये भवन नया है, यहां सबकुछ नया है, सारी व्यवस्थाएं नई हैं, यहां तक आपके सब साथियों को भी आपने एक नये रंग-रूप के साथ प्रस्तुत किया है. सब कुछ नया है लेकिन यहां पर कल और आज को जोड़ती हुई एक बहुत बड़ी विरासत का प्रतीक भी मौजूद है, वो नया नहीं है, वो पुराना है. और वो आज़ादी की पहली किरण का स्वयं साक्षी रहा है जो आज अभी हमारे बीच उपस्थित है. वो हमारे समृद्ध इतिहास को जोड़ता है और जब आज हम नये सदन में प्रवेश कर रहे हैं, संसदीय लोकतंत्र का जब ये नया गृह प्रवेश हो रहा है तो यहां पर आज़ादी की पहली किरण का साक्षी, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देने वाला है, वैसा पवित्र सैंगोल और ये वो सैंगोल है जिसको भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का स्पर्श हुआ था, ये पंडित नेहरू के हाथों में पूजाविधि कर-करके आज़ादी के पर्व का प्रारम्भ हुआ था. और इसलिए एक बहुत महत्वपूर्ण अतीत को उसके साथ ये सैंगोल हमें जोड़ता है. तमिलनाडु की महान परम्परा का वो प्रतीक तो है ही देश को जोड़ने का भी, देश की एकता का भी वो प्रतीक है. और हम सभी माननीय सांसदों को हमेशा जो पवित्र सैंगोल पंडित नेहरू के हाथ में शोभा देता था वो आज हम सबकी प्रेरणा का कारण बन रहा है, इससे बड़ा गर्व क्या हो सकता है.
नये संसद भवन की भव्यता, आधुनिक भारत के महिमा को भी मंडित करती है. हमारे श्रमिक, हमारे इंजीनियर्स, हमारे कामगारों उनका पसीना इसमें लगा है और कोरोना काल में भी उन्होंने जिस लगन से इस काम को किया है क्योंकि मुझे कार्य जब चल रहा था तब उन श्रमिकों के बीच आने का बार-बार मौक़ा मिलता था और ख़ासकर के मैं उनके स्वास्थ्य को लेकर के उनसे मिलने आता था लेकिन ऐसे समय भी उन्होंने इस बहुत बड़े सपने को पूरा किया. आज मैं चाहूंगा कि हम सब हमारे उन श्रमिकों का, हमारे उन कामगारों का, हमारे इंजीनियर्स का हृदय से धन्यवाद करें. क्योंकि उनके द्वारा ये निर्मित भाविक पीढ़ियों को प्रेरणा देने वाला है. और 30 हज़ार से ज़्यादा श्रमिक बंधुओं ने परिश्रम किया है, पसीना बहाया है इस भव्य व्यवस्था को खड़ी करने के लिए और कई पीढ़ियों के लिए ये बहुत बड़ा योगदान होने वाला है.
मैं उन श्रमयोगियों का नमन तो करता ही हूं लेकिन एक नई परम्परा का प्रारम्भ हो रहा है, इसका मुझे अत्यंत आनंद है. इस सदन में एक डिजिटल बुक रखी गई है. जिस डिजिटल बुक में उन सभी श्रमिकों का पूरा परिचय इसमें रखा गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को पता चलेगा कि हिन्दुस्तान के किस कोने से कौन श्रमिक ने आकर के इस भव्य इमारत को, यानी उनके पसीने को भी अमृत्व देने का प्रयास इस सदन में हो रहा है, ये एक नई शुरुआत है, शुभ शुरुआत है और हम सबके लिए गर्व की शुरुआत है. मैं इस अवसर पर 140 करोड़ देशवासियों की तरफ़ से, मैं इस अवसर पर लोकतंत्र की महान परम्परा की तरफ़ से हमारी इन श्रमिकों का अभिनंदन करता हूं.
हमारे यहां कहा जाता है ‘यद भावं तद भवति’ और इसलिए हमारा भाव जैसा होता है वैसे ही कुछ घटित होता है ‘यद भावं तद भवति’ और इसलिए हम जैसी भावना करते हैं और हमने जैसी भावना करके प्रवेश किया है, मुझे विश्वास है, भावना भीतर जो होगी हम भी वैसे ही ख़ुद भी बनते जाएंगे और वो बहुत स्वाभाविक है. भवन बदला है मैं चाहूंगा भाव भी बदलना चाहिए, भावना भी बदलनी चाहिए.
संसद राष्ट्र सेवा का सर्वोच्च स्थान है. ये संसद दलहित के लिए नहीं है, हमारे संविधान निर्माताओं ने इतनी पवित्र संस्था का निर्माण दलहित के लिए नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ देशहित के लिए किया है. नये भवन में हम सभी अपने वाणी से, विचार से, आचार से संविधान के जो स्पिरिट है उन मानदंडों को लेकर के नये संकल्पों के अनुसार नवी भाव को लेकर के, नई भावना को लेकर के, मैं आशा करता हूं अध्यक्ष जी आप कल भी कह रहे थे, आज भी कह रहे थे, कभी स्पष्ट कह रहे थे, कभी थोड़ा लपेट कर भी कह रहे थे हम सांसदों के व्यवहार के संबंध में, मैं मेरी तरफ़ से आपको आश्वासन देता हूं कि हमारा पूरा प्रयास रहेगा और मैं चाहूंगा कि सदन के नेता के नाते हम सभी सांसद आपकी आशा-अपेक्षा में खरे उतरें. हम अनुशासन का पालन करें देश हमें देखता है, आप जैसा दिशानिर्देश करे.
अभी चुनाव तो दूर है और जितना समय हमारे पास बचा है इस Parliament के, मैं पक्का मानता हूं कि यहां जो व्यवहार होगा ये निर्धारित करेगा कि कौन यहां बैठने के लिए व्यवहार करता है और कौन वहां बैठने के लिए व्यवहार करता है. जो वहां ही बैठे रहना चाहता है उसका व्यवहार क्या होगा और जो जहां आकर के भविष्य में बैठना चाहता है उसका व्यवहार क्या होगा इसका फ़र्क़ बिल्कुल आने वाले महीनों में देश देखेगा और उनके बर्ताव से पता चलेगा ये मुझे पूरा विश्वास है.
हमारे यहां वेदों में कहा गया है, ‘संमिच, सब्रता, रुतबा बाचंम बदत’ अर्थात हम सब एकमत होकर, एक समान संकल्पय लेकर, कल्या णकारी सार्थक संवाद करें. यहां हमारे विचार अलग हो सकते हैं, विमर्श अलग हो सकते हैं लेकिन हमारे संकल्पे एकजुट ही होते हैं, एकजुट ही रहते हैं. और इसलिए हमें उसकी एकजुटता के लिए भी भरपूर प्रयास करते रहना चाहिए.
हमारी संसद ने राष्ट्रएहित के तमाम बड़े अवसरों पर ही इसी भावना से काम किया है. न कोई ईधर का है, न उधर का है, सब कोई राष्ट्रर के लिए करते रहे हैं. मुझे आशा है कि इस नई शुरुआत के साथ इस संवादीय के वातावरण में और इस संसद के पूरे डिबेट में हम उस भावना को जितना ज़्यादा मज़बूत करेंगे, हमारी आने वाली पीढ़ियों को अवश्य हम प्रेरणा देंगे. संसदीय परम्प राओं की जो लक्ष्मबण रेखा है, उन लक्ष्मढण रेखा का पालन हम सबको करना चाहिए और वो स्पी कर महोदय की अपेक्षा को हमें जरूर पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए.
लोकतंत्र में राजनीति, नीति और शक्ति का इस्तेामाल, ये समाज में प्रभावी बदलाव का एक बहुत बड़ा माध्याम होता है. और इसलिए स्पे स हो या सपोर्ट्स हों, स्टायर्टअप हो या सेल्फ़ हेल्प ग्रुप हो, हर क्षेत्र में दुनिया भारतीय महिलाओं की ताक़त देख रही है. G20 की अध्यहक्षता women-led development की चर्चा, आज दुनिया इसका स्वातगत कर रही है, स्वी कार कर रही है. दुनिया समझ रही है कि सिर्फ़ महिलाओं के विकास की बात enough नहीं है. हमें मानव जाति की विकास यात्रा में उस नये पड़ाव को अगर प्राप्तम करना है, राष्ट्र की विकास यात्रा में हमने नई मंज़िलों को पाना है, तो ये आवश्यपक है कि women-led development को हम बल दें और G-20 में भारत की बात को विश्वक ने स्वी कार किया है.
महिला सशक्तिकरण की हमारी हर योजना ने महिला नेतृत्व करने की दिशा में बहुत सार्थक क़दम उठाए हैं. आर्थिक समावेश को ध्याणन में रखते हुए जनधन योजना शुरू की, 50 करोड़ लाभार्थियों में से भी अधिकतम महिला बैंक एकाउंट की धारक बनी हैं. ये अपने आप में बहुत बड़ा परिवर्तन भी है, नया विश्वा स भी है. जब मुद्रा योजना रखी गई, ये देश गर्व कर सकता है कि उसमें बिना बैंक गारंटी 10 लाख रुपये की लोन देने की योजना और उसका लाभ पूरे देश में सबसे ज़्यादा महिलाओं ने उठाया, महिला entrepreneur का ये पूरा वातावरण देश में नज़र आया. पीएम आवास योजना- पक्केत घर ये भी उसकी रजिस्ट्रीि ज़्यादातर महिलाओं के नाम हुई, महिलाओं का मालिकाना हक़ बना.
हर देश की विकास यात्रा में ऐसे milestone आते हैं, जब वो गर्व से कहता है कि आज के दिन हम सब ने नया इतिहास रचा है. ऐसे कुछ पल जीवन में प्राप्त होते हैं.
नये सदन के प्रथम सत्र के प्रथम भाषण में, मैं बड़े विश्वावस और गर्व से कह रहा हूं कि आज के ये पल, आज का ये दिवस संवत्सहरी हो, गणेश चतुर्थी हो, उससे भी आशीर्वाद प्राप्तस करते हुए इतिहास में नाम दर्ज करने वाला समय है. हम सबके लिए ये पल गर्व का पल है. अनेक वर्षों से महिला आरक्षण के संबंध में बहुत चर्चाएं हुई हैं, बहुत वाद-विवाद हुए हैं. महिला आरक्षण को लेकर संसद में पहले भी कुछ प्रयास हुए हैं. 1996 में इससे जुड़ा बिल पहली बार पेश हुआ था. अटल जी के कार्यकाल में कई बार महिला आरक्षण का बिल पेश किया गया, कई बार. लेकिन उसे पार कराने के लिए आंकड़े नहीं जुटा पाए और उसके कारण वो सपना अधूरा रह गया. महिलाओं को अधिकार देने का, महिलाओं की शक्ति का उपयोग करने का वो काम, शायद ईश्व र ने ऐसे कई पवित्र काम के लिए मुझे चुना है.
एक बार फिर हमारी सरकार ने इस दिशा में क़दम बढ़ाया है. कल ही कैबिनेट में महिला आरक्षण वाला जो विधेयक है उसको मंज़ूरी दी गई है. आज 19 सितम्बयर की ये तारीख़ इसीलिए इतिहास में अमरत्वे को प्राप्त करने जा रही है. आज जब महिलाएं हर सेक्टगर में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं, नेतृत्वह कर रही हैं, तो बहुत आवश्यपक है कि नीति-निर्धारण में, पॉलिसी मेकिंग में हमारी माताएं, बहनें, हमारी नारी शक्ति अधिकतम योगदान दें, ज़्यादा से ज़्यादा योगदान दें. योगदान ही नहीं, वे महत्व,पूर्ण भूमिका निभाएं.
आज इस ऐतिहासिक मौक़े पर नये संसद भवन में सदी सदन की, सदन की पहली कार्यवाही के रूप में, उस कार्यवाही के अवसर पर देश के इस नये बदलाव का आह्वान किया है और देश की नारी शक्ति के लिए सभी सांसद मिल करके नये प्रवेश द्वार खोल दें, इसका आरम्भ हम इस महत्वकपूर्ण निर्णय से करने जा रहे हैं. Women-led development के अपने संकल्प के आगे बढ़ाते हुए हमारी सरकार आज एक प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुmत कर रही है. इस विधेयक का लक्ष्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी का विस्तारर करने का है. नारी शक्ति वंदन अधिनियम - इसके माध्यंम से हमारा लोकतंत्र और मज़बूत होगा.
मैं देश की माताओं, बहनों, बेटियों को नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं. मैं सभी माताओं, बहनों, बेटियों को आश्व स्ति करता हूं कि हम इस बिल को क़ानून बनाने के लिए संकल्प बद्ध हैं. मैं सदन में सभी साथियों से आग्रहपूर्वक निवेदन करता हूं, आग्रह भी करता हूं और जब एक पावन शुरुआत हो रही है, पावक विचार हमारे सामने आया है तो सर्वसम्मतति से, जब ये बिल क़ानून बनेगा तो उसकी ताक़त अनेक गुना बढ़ जाएगी. और इसलिए मैं सभी मान्यह सांसदों से, दोनों सदन के सभी मान्या सांसदों से इसे सर्वसम्म ति से पारित करने के लिए प्रार्थना करते हुए आपका आभार व्यंक्त, करता हूं. इस नये सदन के प्रथम सत्र में मुझे आपने मेरी भावनाओं को व्य्क्त करने का अवसर दिया. बहुत-बहुत धन्येवाद.
फ़िरदौस ख़ान
विपक्ष में अकेले राहुल गांधी ही एक ऐसे नेता हैं, जो केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद किए हुए हैं. वे एक ऐसे नेता हैं, जो दूसरों के दर्द को महसूस करते हैं, उनकी परेशानियों को समझते हैं. मामला नोटबंदी का हो या जीएसटी का हो, एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न बिल का हो या फिर काले कृषि क़ानूनों का हो, या कोरोना काल में जनता की बदहाली का हो. उन्होंने हमेशा ही ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की है. बेरोज़गारी, दिनोंदिन बढ़ती महंगाई, देश की बर्बाद होती अर्थव्यवस्था और चीन के अतिक्रमण को लेकर भी वे केंद्र पर लगातार हमले कर रहे हैं. अब राहुल गांधी ने हिन्दू और हिन्दुत्व की व्याख्या कर हिंदुत्ववादियों के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सत्ता हड़पने के लिए जो सियासी बिसात बिछाई थी, उस पर अब राहुल खुलकर खेल रहे हैं.
ग़ौरतलब है कि कांग्रेस ने बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ गुज़श्ता 12 दिसम्बर को जयपुर में महंगाई हटाओ महारैली का आयोजन किया. राहुल गांधी ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश की हालत आप सबको दिख रही है. रैली महंगाई के बारे में है, बेरोज़गारी के बारे में है. जो आम जनता को दर्द हो रहा है, दुख हो रहा है, उसके बारे में है. देश की आज जो हालत है, शायद पहले कभी नहीं हुई. पूरा का पूरा धन चार-पांच पूंजीपतियों के हाथ में है. हिन्दुस्तान के सब इंस्टीट्यूशन, एक संगठन के हाथ में हैं. मंत्रियों के दफ़्तरों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक के ओएसडी हैं. देश को जनता नहीं चला रही है, बल्कि देश को तीन-चार पूंजीपति चला रहे हैं.
उन्होंने कहा कि नोटबंदी हुई, जीएसटी लागू की गई, तीन काले क़ानून बनाए गए और कोरोना के वक़्त आपने देश की जनता और देश की हालत देखी. मगर इन चीज़ों के बारे में बोलने से पहले मैं आज आपसे एक दूसरी बात कहना चाहता हूं. देश के सामने कौन सी लड़ाई है और लड़ाई किसके बीच में है, कौन सी विचारधाराओं के बीच में है. मैं आपको बताना चाहता हूं. फिर उसके बाद महंगाई, काले क़ानूनों के बारे में, बेरोज़गारी के बारे में खुलकर आपसे कहूंगा. आप जानते हो कि दो जीवों की एक आत्मा नहीं हो सकती. क्या दो जीवों की एक आत्मा हो सकती है? इसके जवाब में लोगों ने कहा कि नहीं हो सकती. जवाब सुनकर राहुल गांधी ने कहा कि वैसे ही दो शब्दों का एक मतलब नहीं हो सकता. दो जीवों की एक आत्मा नहीं हो सकती, दो शब्दों का एक अर्थ नहीं हो सकता. हर शब्द का अलग मतलब होता है. देश की राजनीति में आज दो शब्दों की टक्कर है, दो अलग शब्दों की, इनका अर्थ अलग है. एक शब्द हिन्दू, दूसरा शब्द हिन्दुत्ववादी. ये एक चीज़ नहीं है. ये दो अलग-अलग शब्द हैं और इनका अर्थ बिल्कुल अलग है. मैं हिन्दू हूं, मगर हिन्दुत्ववादी नहीं हूं. उन्होंने जन सैलाब की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये सब हिन्दू हैं, मगर हिन्दुत्ववादी नहीं हैं. पर आज मैं आपको हिन्दू और हिन्दुत्ववादी शब्द के बीच में फ़र्क़ बताना चाहता हूं.
उन्होंने आगे कहा कि महात्मा गांधी हिन्दू थे, जबकि गोडसे हिन्दुत्ववादी था. फ़र्क़ क्या होता है. फ़र्क़ मैं आपको बताता हूं. चाहे कुछ भी हो जाए, हिन्दू सत्य को खोजता है. भले ही वह मर जाए, कट जाए, पिस जाए, हिन्दू सच को ढूंढता है. उसका रास्ता सत्याग्रह होता है. पूरी ज़िन्दगी वह सच को ढूंढने में निकाल देता है. महात्मा गांधी ने ऑटोबायोग्राफ़ी लिखी- माई एक्सपेरियंस विद ट्रुथ, मतलब पूरी ज़िन्दगी उन्होंने सत्य को समझने के लिए, सच को ढूंढने के लिए बिता दी और अंत में एक हिन्दुत्ववादी ने उनकी छाती में तीन गोलियां मारीं. दूसरी तरफ़ एक हिन्दुत्ववादी अपनी पूरी ज़िन्दगी सत्ता को खोजने में लगा देता है. उसे सत्य से कुछ लेना-देना नहीं होता, उसे सिर्फ़ सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए वह कुछ भी कर डालेगा. किसी को मार देगा, कुछ भी बोल देगा, जला देगा, काट देगा, पीट देगा, उसे सिर्फ़ सत्ता चाहिए. उसका रास्ता सत्याग्रह नहीं, उसका रास्ता सत्ताग्रह है.
उन्होंने कहा कि हिन्दू अपने डर का सामना करता है. हिन्दू खड़ा होकर अपने डर का सामना करता है, और एक इंच भी पीछे नहीं हटता है. वह शिवजी की तरह अपने डर को निगल जाता है, उसे पी लेता है. दूसरी तरफ़ एक हिन्दुत्ववादी अपने डर के सामने झुक जाता है. अपने डर के सामने वह मत्था टेकता है. हिन्दुत्ववादी को उसका डर डुबो देता है और इस डर से उसके दिल में नफ़रत पैदा होती है. यानी डर से नफ़रत पैदा होती है, ग़ुस्सा आता है, क्रोध आता है. हिन्दू डर का सामना करता है, उसके दिल में शान्ति होती है, उसके दिल में प्यार होता है, उसके दिल के अन्दर एक शक्ति होती है. ये हिन्दुत्ववादी और हिन्दू के बीच में मूल फ़र्क़ है.
मैंने ये सब आपको इसलिए बताया, क्योंकि आप सब हिन्दू हो, हिन्दुत्ववादी नहीं. और ये देश हिन्दुओं का देश है, हिन्दुत्ववादियों का नहीं. आज अगर इस देश में महंगाई है, दर्द है, दुख है, तो ये काम हिन्दुत्ववादियों ने किया है. हिन्दुत्ववादियों को किसी भी हालत में सत्ता चाहिए, वैसे ही ये कहते हैं कि मुझे सत्ता चाहिए, सच्चाई से मुझे कुछ लेना-देना नहीं. सच्चाई जाए भाड़ में. मुझे कुर्सी मिल जाए बस. और 2014 से इन लोगों का राज है, हिन्दुओं का राज नहीं. और हमें एक बार फिर इन हिन्दुत्ववादियों को सत्ता से बाहर निकालना है और एक बार फिर हिन्दुओं का राज लाना है.
हिन्दू शब्द की परिभाषा बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि हिन्दू कौन- जो सबसे गले मिलता है. हिन्दू कौन- जो किसी से नहीं डरता है. हिन्दू कौन- जो हर धर्म का आदर करता है, वह हिन्दू है. आप हमारा कोई भी शास्त्र पढ़ लीजिए. रामायण पढ़िए, महाभारत पढ़िए, गीता पढ़िए, उपनिषद पढ़िए, मुझे दिखा दीजिए, कहां लिखा है कि किसी ग़रीब को मारना है? कहां लिखा है कि किसी कमज़ोर व्यक्ति को कुचलना है? कहां लिखा है? मुझे दिखा दो. कहीं नहीं लिखा. उन्होंने कहा कि गीता में लिखा है कि सत्य की लड़ाई लड़ो, मर जाओ, कट जाओ, लेकिन सत्य की लड़ाई लड़ो. गीता में कृष्णजी ने अर्जुन से ये नहीं कहा कि अपने भाइयों को सत्ता के लिए मारो. कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अपने भाइयों को सच्चाई के लिए मारो. ये लड़ाई आज हिन्दुस्तान में चल रही है. ये झूठे हिन्दू एक तरफ़ हिन्दुत्ववादी हैं और दूसरी तरफ़ सच्चे हिन्दू यानी प्यार करने वाले हिन्दू, भाईचारे वाले हिन्दू, सभी धर्मों का आदर और सम्मान करने वाले हिन्दू.
उन्होंने कहा कि अब मैं बताना चाहता हूं कि हुआ क्या, क्योंकि हमारी जनता को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या. छोटा सा उदाहरण है- आज हिन्दुस्तान की एक प्रतिशत आबादी के हाथ में हिन्दुस्तान का 33 प्रतिशत धन है. एक प्रतिशत आबादी के हाथ में 33 प्रतिशत धन. दस प्रतिशत आबादी के हाथ में 65 प्रतिशत धन और सबसे ग़रीब 50 प्रतिशत लोगों के हाथ में इस देश का सिर्फ़ छह प्रतिशत धन छोड़ा है. ये जादू कैसे किया? इस जादू को किसने किया, मैं आज आपको बताना चाहता हूं. औज़ार था- नोटबंदी, जीएसटी, किसान के ख़िलाफ़ तीन काले क़ानून.
उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जी के आने से पहले हिन्दुस्तान का जो असंगठित सेक्टर था, छोटे दुकानदार, ग़रीब लोग, छोटी कम्पनी वाले, कुटीर उद्योग वाले, जो घर में अगरबत्ती बनाते थे, चप्पल बनाते थे, जूता बनाते थे, कपड़े सीते थे, किसान जो संगठित नहीं थे, मोदी जी के आने से पहले भारत की अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र का हिस्सा 52 प्रतिशत हुआ करता था. नोटबंदी, जीएसटी, काले क़ानून और कोरोना के बाद असंगठित क्षेत्र का भाग 20 प्रतिशत तक रह गया है. उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान का 90 प्रतिशत तक फ़ायदा, 90 प्रतिशत प्रॉफ़िट, कॉरपोरेट प्रॉफ़िट 20 कम्पनियों को जाता है. उन्होंने वहां लगे एलसीडी टीवी की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये जो आप टीवी देख रहे हैं न, ये जो इस रैली में पांच मिनट के लिए दिखाएंगे, ये उनके ग़ुलाम हैं. ये हिन्दुत्ववादी नहीं हैं, ये हिन्दू हैं. मगर इन्हें दबाया गया गया है. हिंदुत्ववादियों ने इन बेचारों को दबा दिया है. मगर हिन्दू को नहीं दबाया जा सकता, कभी नहीं दबाया जा सकता. तीन हज़ार सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ, आज भी नहीं हो सकता. क्योंकि हम डरते नहीं हैं. हम किसी से नहीं डरते. हम मरने से नहीं डरते. तो नरेंद्र मोदी जी और उनके तीन-चार उद्योगपतियों ने, हिन्दुत्ववादियों ने इस देश को सात सालों में बर्बाद कर दिया, ख़त्म कर दिया है, पिछले सात सालों में.
उन्होंने किसानों का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमने क़र्ज़माफ़ी की. हम बात को समझे कि किसान को मदद करने की ज़रूरत है, क़र्ज़माफ़ी की ज़रूरत है. हर स्टेट में क़र्ज़माफ़ी की, क्योंकि हम जानते हैं कि किसान इस देश की हड्डी है, उसके बिना कुछ नहीं हो सकता. नरेंद्र मोदी जी ने किसानों की जो आत्मा है, उनका जो दिल है, उनकी छाती में चाक़ू मारा है. आगे से नहीं, बल्कि पीछे से मारा है. क्योंकि वह हिन्दुत्ववादी हैं. हिन्दू को अगर मारना भी पड़े, तो सामने से वार करता है, पीछे से नहीं. अगर वह हिन्दुत्ववादी है, तो पीछे से मारेगा, याद रखना. पहले पीछे से छुरा मारा और फिर कहते हैं, जाग हिन्दू. किसान हिन्दुत्ववादी के सामने खड़ा हुआ, तो हिन्दुत्ववादी ने कहा कि मैं माफ़ी मांगता हूं, मैं माफ़ी मांगता हूं.
उन्होंने कहा कि 700 किसान शहीद हुए. यहां हमने दो मिनट मौन रखा, पार्लियामेंट में मौन रखने नहीं दिया. मैंने कहा कि अगर आप नहीं करना चाहते, तो मैं खड़ा हो जाता हूं. विपक्ष के लोग दो मिनट के लिए मौन में खड़े हुए, लेकिन सरकार ने मौन नहीं रखा. पंजाब सरकार ने 400 शहीद किसानों के परिवारों को पांच लाख रुपये दिए हैं और उनमें से 152 किसानों के परिजनों को नौकरी भी दिलवा दी है और बाक़ी को हम नौकरी देने वाले हैं. हिन्दुस्तान की सरकार पार्लियामेंट में कहती है- हमें मालूम नहीं कि कौन से किसान मरे, हमारे पास लिस्ट ही नहीं है. कोई किसान शहीद हुआ ही नहीं, पार्लियामेंट में कहा था. हम कंपंसेशन कैसे दें, हमें तो मालूम ही नहीं है. मैंने पंजाब की लिस्ट ली, हरियाणा से 70-80 और नाम लिए, 500 लोगों की लिस्ट मैंने पार्लियामेंट में रखी और कहा- देखिए, पंजाब की सरकार ने मुआविज़ा दिया है, कंपंसेशन दिया है, आप भी दीजिए. पीछे से छुरा मारा, फिर माफ़ी मांगी और जब कंपंसेशन की बात आई, पांच लाख, 10 लाख, 25 लाख रुपये देने की बात आई, तो नरेंद्र मोदी जी नहीं दे सकते. क्योंकि वे कहते हैं कि वे किसान शहीद ही नहीं हुए. तो ये जो सोच है हिन्दुत्ववादियों की. चीन की सेना हिन्दुस्तान के अन्दर आ जाए, हज़ार किलोमीटर ले जाए, प्रधानमंत्री जी कहेंगे, देश के अन्दर कोई नहीं आया. और फिर डिफ़ेंस मिनिस्ट्री कहेगी कि चीन हमारे देश के अन्दर आ गया, चीन की सेना हमारे देश के अन्दर है.
उन्होंने कहा कि मैं थोड़ा और भी बताना चाहता हूं. 2014 में गैस सिलेंडर 414 रुपये का था, 2021 में 900 रुपये हो गया, यानी 117 प्रतिशत बढ़ोतरी. पेट्रोल 70 रुपये था, आज सौ रुपये है. डीज़ल 57 रुपये था, आज 90 रुपये है. चीनी 30 रुपये थी, आज 50 रुपये है. घी 300-350 रुपये लीटर था, आज 650 रुपये लीटर है. आटा 15 रुपये किलो था, आज 30 रुपये है. दाल 70 रुपये किलो थी, आज 190 रुपये है. अच्छे दिन आ गए हैं. आ गए अच्छे दिन? किसके- ‘हम दो, हमारे दो’ के. एयरपोर्ट देखो, पोर्ट देखो, कोल माइन देखो, टेलीफ़ोन देखो, सुपर मार्केट देखो. जहां भी देखो भैया, दो लोग दिखेंगे आपको- अडानी जी, अंबानी जी. उनकी ग़लती नहीं है. देखो भैया, अगर आपको कोई मुफ़्त में कुछ दे, आप क्या वापस दे दोगे- नहीं दोगे. उनकी ग़लती थोड़े ही है, ग़लती प्रधानमंत्री की है. सुबह उठते ही कहते हैं- भैया, आज अडानी-अंबानी को क्या दें? चलो भैया, आज एयरपोर्ट दे देते हैं. चलो भैया, आज किसानों के खेत दे देते हैं. चलो आज खनन दे देते हैं, माइन दे देते हैं. ऐसे देश नहीं चलाया जाता है. देश ग़रीबों का है, किसानों का है, मज़दूरों का है, छोटे दुकानदारों का है, स्मॉल मीडियम बिजनेस वालों का है, क्यों- क्योंकि यही लोग इस देश को रोज़गार दे सकते हैं. अंबानी जी की जगह है, अडानी जी की जगह है, मगर वे रोज़गार पैदा नहीं कर सकते. रोज़गार हमारा किसान पैदा करता है. रोज़गार छोटे व्यापारी पैदा करते हैं. छोटे दुकानदार पैदा करते हैं. छोटे बिजनेस वालों, मिडिल साइज़ बिजनेस वालों को तो इन्होंने ख़त्म ही कर दिया, मिटा दिया. एक प्रतिशत आबादी के पास 33 प्रतिशत धन, 10 प्रतिशत आबादी के पास 65 प्रतिशत धन और 50 प्रतिशत आबादी के पास केवल छह प्रतिशत धन. ये क्या हो रहा है? उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान को इस आक्रमण के ख़िलाफ़ खड़ा होना ही पड़ेगा और कोई रास्ता ही नहीं है और आप देखना, ये देश एक आवाज़ से खड़ा होगा. राजस्थान एक आवाज़ से खड़ा होगा और नरेंद्र मोदी जी को बाहर का रास्ता दिखाएगा.
उन्होंने कहा कि कोरोना हुआ, मैंने अपनी आंखों से देखा. बाक़ी देशों ने अपने लोगों की जेब में पैसा डाला, मदद की, मगर नरेंद्र मोदी जी ने 5-10 बड़े उद्योगपतियों का टैक्स माफ़ किया, उनकी जेब में पैसा डाला और मज़दूरों को ट्रेन तो छोड़ो, बस भी नहीं दी, वे हज़ारों किलोमीटर पैदल चले. 100-200 लोग तो सड़कों पर ही मर गए. नरेंद्र मोदी जी ने कहा- थाली बजाओ, ताली बजाओ, मोबाइल फ़ोन की लाइट जलाओ, मर जाओ.
उन्होंने कहा कि अब रोज़गार की बात करते हैं, पर आज 60 साल से सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी हिन्दुस्तान में है. क्यों- क्योंकि आपने रोज़गार देने वाली रीढ़ की हड्डी तोड़ दी. आपने डिमोनेटाइज़ेशन किया, जीएसटी की. नोटबंदी, कोरोना में आपने छोटे बिजनेस वालों को समर्थन नहीं दिया, सब ख़त्म हो गया. रोज़गार कहां से पैदा होगा? रोज़गार दो-तीन उद्योगपति नहीं पैदा कर सकते. रोज़गार लाखों दुकानदार, लाखों छोटे बिजनेस वाले, मिडिल साइज़ बिजनेस वाले, करोड़ों किसान पैदा करते हैं. ये सच्चाई है देश की. देश को यह सच्चाई पहचाननी पड़ेगी, और कोई रास्ता नहीं है. मैं आपसे झूठ नहीं बोलने वाला, मैं हिन्दुत्ववादी नहीं हूं, मैं हिन्दू हूं. मैं डरता नहीं, सत्ता मिले न मिले, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मैं सच्चाई के रास्ते से नहीं हटने वाला. मगर सच्चाई देश को पहचाननी पड़ेगी.
उन्होंने चीन का ज़िक्र करते हुए कहा कि चीन ने अरुणाचल में, लद्दाख़ में हमारी ज़मीन ली है. मोदी जी कह रहे हैं कि कुछ नहीं हुआ. 700 किसान शहीद हुए, मोदी जी कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ. बहुत कुछ हुआ है. बहुत लोगों को चोट लगी है. बहुत लोगों की जानें गई हैं. बहुत दुख हुआ है और अब देश को आगे बढ़ना पड़ेगा और ये देश एक साथ मिलकर आगे बढ़ेगा.
प्रियंका गांधी ने भी जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों की निन्दा की. उन्होंने कहा कि मैं ऐसे लोगों से मिलकर आई हूं, जिनके परिजनों को इस सरकार के मंत्री के बेटे ने कुचलकर मार दिया। हमारे बेटों के हत्यारों के साथ पीएम मंच साझा करते हैं. ये सरकार जनता की भलाई नहीं चाहती. ये आपके लिए काम नहीं कर रही है. किसके लिए काम कर रही है? ये सरकार कुछ गिने-चुने लोगों के लिए ही काम कर रही है.
इस रैली में सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणु गोपाल, पवन बंसल, अजय माकन, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, चरणजीत सिंह चन्नी, अधीर रंजन चौधरी, गोविन्द सिंह डोटासरा, सचिन पायलट आदि ने शिरकत की. कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का कड़े शब्दों में निंदा करते हुए जनमानस से कांग्रेस के लिए समर्थन मांगा.
क़ाबिले ग़ौर है कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से ही जनमानस के मुद्दों को दरकिनार करते हुए सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर चुनाव लड़ती आई है. अब राहुल गांधी ने भाजपा को उसी की बिछाई बिसात पर हर तरफ़ से घेर लिया है. देखना दिलचस्प होगा कि अब भाजपा इसका कैसे मुक़ाबला करती है.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)










