Showing posts with label ग्रामीण भारत. Show all posts
Showing posts with label ग्रामीण भारत. Show all posts

डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज जब सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं और थाली में सब्ज़ियां कम होने लगी हैं. ऐसे में अगर घर में ही ऐसी सब्ज़ी का इंतज़ाम हो जाए, जो खाने में स्वादिष्ट हो और सेहत के लिए भी अच्छी हों, तो फिर क्या कहने. जी हां, हम बात कर रहे हैं सहजन की. गांव-देहात और छोटे-छोटे क़स्बों और शहरों में घरों के आंगन में सहजन के वृक्ष लगे मिल जाते हैं. बिहार की वैजयंती कहती हैं कि सहजन में ख़ूब फलियां लगती हैं. वह इसकी सब्ज़ी बनाती हैं, जिसे सभी ख़ूब चाव से खाते हैं. इसके फूलों की सब्ज़ी की भी घर में बार-बार मांग होती है. वह सहजन का अचार भी बनाती हैं. अपनी मां से उन्होंने यह सब सीखा है. उनके घर में एक गाय है. अपनी गाय को वह सहजन के पत्ते खिलाती हैं. गाय पहले से ज़्यादा दूध देने लगी हैं. इतना ही नहीं, वह सब्ज़ी वालों को फलियां बेच देती हैं. वह बताती हैं कि एक सब्ज़ी वाला उनसे अकसर वृक्ष से सहजन की फलियां तोड़ कर ले जाता है. इससे चार पैसे उनके पास आ जाते हैं. उन्होंने अपने आंगन में चार और पौधे लगाए हैं, जो कुछ वक़्त बाद उनकी आमदनी का ज़रिया बन जाएंगे.

जो लोग सहजन के पौष्टिक तत्वों से वाक़िफ़ हैं, वे हमेशा सहजन की मांग करते हैं. बाज़ार में सहजन की फलियां 100 रुपये किलो तक बिकती हैं. हिसार के सब्ज़ी बाज़ार में सहजन की फलियां कम ही आती हैं. इसलिए ये ऊंची क़ीमत पर मिलती हैं. बहुत-से ऐसे घर हैं, जिनके आंगन में सहजन के वृक्ष खड़े हैं, वे वहीं से पैसे देकर सहजन की फलियां तोड़ लेते हैं और उन ग्राहकों को बेच देते हैं, जो उनसे सहजन मंगाते हैं. सहजन के बहुत से ग्राहक बंध गए हैं. इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग भी शामिल हैं.

सहजन बहुत उपयोगी वृक्ष है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे बंगाल में सजिना, महाराष्ट्र में शेगटा, आंध्र प्रदेश में मुनग और हिंदी भाषी इलाक़ों में इसे सहजना, सुजना, सैजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ड्रमस्टिक कहा जाता है.  इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है. सहजन का वृक्ष मध्यम आकार का होता है. इसकी ऊंचाई दस मीटर तक होती है, लेकिन बढ़ने पर इसे छांट दिया जाता है, ताकि इसकी फलियां, फूल और पत्तियां आसानी से तोड़ी जा सकें. यह किसी भी तरह की ज़मीन पर उगाया जा सकता है. नर्सरी में इसकी पौध बीज या क़लम से तैयार की जा सकती है. पौधारोपण फ़रवरी-मार्च या बरसात के मौसम में करना चाहिए.  इसे खेत की मेढ़ पर लगाया जा सकता है. इसे तीन से चार फ़ुट की दूरी पर लगाना चाहिए. यह बहुत तेज़ी से बढ़ता है. इसके पौधारोपण के आठ माह बाद ही इसमें फलियां लग जाती हैं. उत्तर भारत में इसमें एक बार फलियां लगती हैं, जबकि दक्षिण भारत में यह सालभर फलियों से लदा रहता है. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के लिए साल में दो बार फलियां देने वाली क़िस्म तैयार कर ली है और अब यही क़िस्म उगाई जा रही है. दक्षिण भारत के लोग इसके फूल, पत्ती और फलियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में करते हैं. उत्तर भारत में भी इन्हें ख़ूब चाव से खाया जाता है. इसकी फलियों से सब्ज़ी, सूप और अचार भी बनाया जाता है. इसके फूलों की भी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसकी पत्तियों की चटनी और सूप बनाया जाता है.

गांव-देहात में इसे जादू का वृक्ष कहा जाता है. गांव-देहात के बुज़ुर्ग इसे स्वर्ग का वृक्ष भी कहते हैं. सहजन में औषधीय गुण पाए जाते हैं. इसके सभी हिस्से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इसके सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है. आयुर्वेद में इसे तीन सौ रोगों का उपचार बताया गया है. इसमें अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जैसे कैलोरी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, रेशा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फ़ास्फ़ोरस, पोटैशियम, कॊपर, सल्फ़र, ऒक्जेलिक एसिड, विटामिन ए-बीटासीरोटीन, विटामिन बी- कॊरिन, विटामिन बी1 थाइमिन, विटामिन बी2 राइबोफ़्लुविन, विटामिन बी3 निकोटिनिक एसिड, विटामिन सी एस्कार्बिक एसिड, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, ज़िंक, अर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, ट्रिप्टोफन,फ़िनॊयलेनेलिन, मीथिओनिन, थ्रिओनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, वैलिन, ओमेगा आदि. एक अध्ययन के मुताबिक़ सहजन की पत्तियों में विटामिन सी संतरे से सात गुना होता है. इसी तरह इसकी पत्तियों में विटामिन ए गाजर से चार गुना, कैल्शियम दूध से चार गुना, पोटैशियम केले से तीन गुना और प्रोटीन दही से दोगुना होता है. सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है, जो दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किया जाता है. इसकी छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं. कहा जाता है कि इसके सेवन से सेहत अच्छी रहती है और बुढ़ापा भी दूर भागता है. आंखों की रौशनी भी अच्छी रहती है. इसके पोषक तत्वों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दक्षिण अफ़्रीका के कई देशों में कुपोषित लोगों के आहार में इसे शामिल करने की सलाह दी है. डब्ल्यूएचओ ने कुपोषण और भूख की समस्या से लड़ने के लिए इसे बेहतर माना है. फ़िलीपींस और सेनेगल में कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रम के तहत बच्चों के आहार में सहजन को शामिल किया गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने आए हैं. फ़िलीपींस, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में सहजन की काफ़ी मांग है. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए यह वरदान है. इसकी पत्तियां पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं. इसे चारे के लिए भी उगाया जाता है. चारे के लिए इसकी पौध छह इंच की दूरी पर लगाई जाती है. बरसीम की तरह इसकी कटाई 75 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऒफ़ एग्रीकल्चरल साइंस उपासला द्वारा निकारगुआ में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गायों को चारे के साथ सहजन की पत्तियां खिलाने से उनके दूध में 50 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है. सहजन के बीजों से पानी को शुद्ध किया जा सकता है. इसके बीजों को पीस कर पानी में मिलाया जाता है, जिससे पानी शुद्ध हो जाता है.

सहजन की खेती किसानों के लिए फ़ायदेमंद है. किसान सहजन की खेती कर आर्थिक रूप से समृद्ध बन सकते हैं. एक वृक्ष से आठ क्विंटल फलियां प्राप्त की जा सकती हैं. यह वृक्ष दस साल तक उपज देता है. इसे खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है. पशुओं के बड़े-बड़े बाड़ों के चारों तरफ़ भी सजहन के वृक्ष लगाए जा सकते हैं. बिहार में किसान सहजन की खेती कर रहे हैं. यहां सहजन की खेती व्यवसायिक रूप ले चुकी है.  बिहार सरकार ने सहजन की खेती के लिए महादलित परिवारों को पौधे मुहैया कराने की योजना बनाई है. इस योजना का मक़सद महादलित और ग़रीब परिवारों को स्वस्थ करना और उन्हें आमदनी का ज़रिया मुहैया कराना है. राज्य में समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहजन के पौधे वितरित किए जाते हैं. यहां स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों के परिसरों में सहजन बोया जा रहा है. कृषि विभाग के प्रोत्साहन की वजह से यहां के किसान सहजन उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे सहजन की क़लम खेत में लगाते हैं. मार्च-अप्रैल में वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. उत्पादन वृक्ष के अनुसार होता है. एक वृक्ष से एक से पांच क्विंटल तक फलियां मिल जाती हैं. इसमें लागत भी ज़्यादा नहीं आती. वे अन्य सब्ज़ियों के साथ सहजन की खेती करते हैं. इससे उन्हें दोहरा फ़ायदा हो जाता है. इसके साथ ही पशुओं के लिए अच्छा चारा भी मिल जाता है, जो उनके लिए पौष्टिक आहार है. छत्तीसगढ़ में किसान पारम्परिक धान की खेती के साथ सहजन उगा रहे हैं.  उनका कहना है कि वे इसकी फलियां शहर की मंडियों में बेजते हैं. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड आदि राज्यों में सहजन की ख़ासी मांग है. सहजन की फलियां 40 से 100 रुपये प्रति किलो बिकती हैं. सहजन के फ़ायदों को देखते हुए अनेक राज्य इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं. इसे किचन गार्डन के तौर पर प्रोत्साहित किया जा रहा. स्थानीय जलवायु के अनुकूल इसकी नई क़िस्में तैयार की जा रही हैं. 

आदिवासी इलाक़ों में भूमिहीन लोग बेकार पड़ी ज़मीन पर सहजन के वृक्ष उगाकर आमदनी हासिल कर रहे हैं. उनका कहना है कि ख़ाली ज़मीन पर जो भी वृक्ष उगाता है, वृक्ष के फल पर अधिकार भी उसी का होता है. इससे जहां बेकार पड़ी ज़मीन आमदनी का ज़रिया बन गई है, वहीं वृक्षों से पर्यावरण भी हराभरा बना रहता है. वृक्ष फल और छाया  देने के साथ-साथ बाढ़ को रोकते हैं, भूमि कटाव को रोकते हैं.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सहजन की विदेशों में बहुत मांग है, लेकिन जागरुकता की कमी की वजह से यहां के लोगों को इसके बारे में उतनी जानकारी नहीं है, जितनी होनी चाहिए. ऐसे में सहजन की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पारम्परिक खेती के साथ भी सहजन उगाया जा सकता है. इसमें कोई विशेष लागत भी नहीं आती.  सहजन कृषि वानिकी और सामाजिक वानिकी का भी अहम हिस्सा बन सकता है. बस ज़रूरत है जागरुकता की.



डॉ. फ़िरदौस ख़ान

भारत गांवों का देश है। यहां तक़रीबन साढ़े छह लाख गांव हैं। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार मई 2025 तक देश में कुल छह लाख 44 हज़ार 131 गांव थे। केन्द्रीय बजट 2025-26 के मुताबिक़ तक़रीबन दो लाख 68 हज़ार ग्राम पंचायतें हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा तक़रीबन एक लाख गाँव हैं। वक़्त के साथ इनकी तादाद बदलती रहती है।    
  
अकसर गांवों में जाना होता है। बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई देता है। पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं। खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं। दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं। परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है। हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है। रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है। दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी। दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाख़ों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले कई दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है। गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं। गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है। पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल इख़्तियार कर रहे हैं। गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं। शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं। ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं। पहले ग्रामीण अंचलों में लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे। प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परम्परा वाले प्रदेशों में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं। लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं। शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले गांवों के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है। पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है।

हरियाणा जैसे राज्य विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति के प्रदेश माने जाते हैं। यहां के गांव प्राचीन काल से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केन्द्र रहे हैं। गीता का जन्म स्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं। लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआख़ोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है। नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं। लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है। इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फ़ार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं। अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फ़ार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है।

शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है। तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली रौनक़ नहीं रही है। शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं। शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं। अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं। समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है। समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं। होना तो यही चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें। मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा। आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।

विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए। ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है। लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे। काश, वह दिन जल्द आ जाए। हम तो यही दुआ करते हैं, अमीन।   


ध्रुव गुप्त  
दशहरे की आहट के साथ पूर्वी और उत्तर भारत के कई राज्यों में ग्रामीण मेलों की शुरुआत हो जाती है। आधुनिकता की तेज रफ्तार ने पिछले कुछ दशकों में इन मेलों का आकर्षण बहुत हद तक छीन लिया है, लेकिन ये मेले कभी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ और हमारे गांवों की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे।  देश की प्रकृति और गंध को महसूस करने के बेहतरीन ज़रिए। आज के युवाओं में भले ही इन मेलों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह गया हो, ऐसे मेलों को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोगों के भीतर का बच्चा आज भी मचल उठता है। हाल के वर्षों में कई बार कुछ देर इन मेलों में  घूम-घामकर बचपन वाले तिलिस्म को जगाने की  कोशिश करता रहता हूं, मगर वह जादू अक्सर नदारद ही मिलता है।  मेला देखने के लिए अब न वो बचपन वाली आंखें हैं  और न उसे महसूस करने के लिए बच्चों वाला दिल। वैसे शहरीकरण की अंधी दौड़ में ग्रामीण मेलों की आत्मा भी कितनी बच गई है अब !
पिछली पीढ़ी के लोगों को अपने बचपन और किशोर वय में साल भर इन मेलों की प्रतीक्षा रहती थी।  इन मेलों का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करता था खाने के लिए तीसी के तेल में बनी तेज गंध वाली लाल-पीली गरम जलेबी, रंग-बिरंगे बतासे, मूढ़ी-पकौड़ी और मुंह में रखते ही उड़ जाने वाली छलना-सी हवा मिठाई या बुढ़िया के बाल। देखने के लिए बाइस्कोप वाला क़ुतुब मीनार और ताजमहल, टेंट में चल रहे जादूघर, छोटे-मोटे सर्कस, सांप और संपेरे, कठपुतली का नाच और मौत का कुआं। खरीदने-पढ़ने के लिए ठाकुर प्रसाद एंड संस, कचौड़ी गली बनारस जैसे प्रकाशकों की किताबें जैसे वशीकरण मन्त्र, जीजा-साली विनोद, लैला-मजनू,शीरी-फरहाद,आल्हा-रूदल, सारंगा -बृजाभार और बिहुला-विषहरी के किस्से, प्रेमपत्र कैसे लिखें, आशिक-माशूक की  शायरी, लता की तान, मुकेश और रफ़ी के दर्द भरे नग्मे, घर सजाने के लिए रंग-बिरंगे गुबारे,मिट्टी और लकड़ीके असंख्य खिलौने और नरगिस, मधुबाला, सुरैया, दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद जैसे फिल्मी सितारों की बहुरंगी तस्वीरें।
तब के ग्रामीण मेलों की सबसे बड़ी पहचान होती थी हर दिशा से उठती हुई  फिनाइल की तीखी मगर जानी-पहचानी गंध। यह गंध आती थी ग्रामीण स्त्रियों के रंग-बिरंगे कपड़ों से। वे अपने धराऊ महंगे कपडे साल भर पेटियों में छुपाकर रखती थीं और कीड़ों से बचाने के लिए उनपर फिनाइल की गोलियां डाल देती थीं। मेले-ठेले के मौके पर वे कपडे बाहर निकलते थे और उनके निकलते ही घर से मेले तक का वातावरण फिनाइल की गंध से महमहा जाता था। उस दौर में मेले के बड़े हिस्सों पर औरतों का ही कब्ज़ा होता था। मंदिरों में पूजा करती औरतें,  समूह में झूम-झूमकर गाती-गुनगुनाती औरतें, किसी पेड़ के नीचे मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाती-खिलाती औरतें, सस्ते श्रृंगार प्रसाधनों की दुकानों पर मोलभाव करती औरतें और मेले में बहुत दिनों बाद मिली माई-बहनों के गले मिल बुक्का फाड़कर रुदन करती औरतें। 'माई रे माई', 'बहिनी रे बहिनी' की संगीतमय टेक के साथ उनका लंबा चलने वाला विलाप और कुछ ही पलों बाद उनके हंसने-खिलखिलाने की आवाजें मेलों का कौतूहल हुआ करती थीं।  घर-घर में मौजूद मोबाइल  और वीडियो कॉल के इस जमाने में माई-बहनों का वह मेल-मिलाप और रुदन अब इतिहास की वस्तु हो चला है।
उस दौर में लोकगायकों और वादकों की आमदनी का एक बड़ा ज़रिया वे ग्रामीण मेले ही हुआ करते थे जहां उनकी कला से खुश होकर लोग उनपर पैसों की बारिश कर देते थे।  उन लोक कलाकारों के पास धार्मिक, पौराणिक और लोकगीतों के अलावा मेला घूमने वाली औरतों को लेकर बनाए हुए दर्जनों गीत होते थे।  उन मेलाघुमनी गीतों में मेलों में आवारागर्दी करने वाले मर्दों को कोई कुछ नहीं कहता था। मज़ाक की पात्र हमेशा वे भोली-भाली औरतें ही होती थीं जिन्हें ये मेले साल में एक-दो बार घर की चहारदीवारी से निकलकर  दुनिया देखने के मौके देते थे। उनमें से ज्यादातर गीत अब भूल गए, लेकिन एक गीत की कुछ पंक्तियां आज भी याद है।
तीसी-तोरी बेच कर पईसा जुटावेली से, मेलावा में खाएके मिठाई मेलाघुमनी। 
साड़ी लाल-पीली पर ओढ़के चदरिया से कर लेली सोरहो सिंगार मेलाघुमनी। 
चारि जनि आगे भइली, चार जनि पीछे भइली, रस्ते में झूमर उठावे मेलाघुमनी। 
मरद के कम भीड़, मउगी के ठेलाठेली, मेलवा में मारेली नजारा मेलाघुमनी। 
अचरा में गुड़ चिउरा, झोरवा में लिट्टी-चोखा, गटकेलि गरम जिलेबी मेलाघुमनी। 
नैहरा - ससुरवा के लोग से जे भेंट भईल , बीचे राहे रोदन पसारे मेलाघुमनी। 
विकास की तेज रफ्तार में जिन चीजों की बलि चढ़ी है, उनमें लोकजीवन की खुशबू से भरे गांव-देहात के ये मेले भी हैं। मॉल संस्कृति में जी रही आज की पीढ़ी के लिए ये मेले अप्रासंगिक हो चुके हैं, लेकिन जिन लोगों ने इन मेलों में भारतीय गांवों की आत्मा की खुशबू, आत्मीयता महसूस की है, उनकी स्मृतियों में ये मेले हमेशा ही बने रहेंगे। और बनी रहेगी वह सरलता और भोलापन जो हमारे जीवन से धीरे-धीरे खारिज़ हो चला है।

जावेद अनीस 
वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहस्राब्दि विकास के 8 लक्ष्य तय किये थे. जिसका मकसद  2015 तक दुनिया भर में गरीबी, स्वास्थ्य, मृत्यु दर, शिक्षा, लिंगभेद, भुखमरी जैसी चुनौतियों पर काबू पाना था. लेकिन दुर्भाग्य से 2015  तक इन्हें हासिल नहीं किया जा सका. इसके बाद वर्ष 2030 तक के लिये “सतत् विकास लक्ष्य” (एसडीजी) का विचार सामने आया जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अगले 15 सालों के लिए नए लक्ष्य तय कर दिए गए हैं. इन्हें टिकाऊ विकास लक्ष्य भी कहा जाता है. 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प को साल 2015  में संयुक्त राष्ट्र संघ की 70वें अधिवेशन में औपचारिक  रूप से स्वीकार किया गया था. यह एक जनवरी 2016 से लागू है. एसडीजी के तहत कुल 17 विकास लक्ष्य तय किये गये हैं. सतत विकास लक्ष्यों का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण करते हुये विकास के तीनों पहलुओं, सामाजिक समावेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाहित करना है. सतत विकास की अवधारणा में भविष्य की भी चिंता शमिल है. एसडीजी की खासियत यह है कि इसमें पर्यावरण संरक्षण को आर्थिक विकास का अंग माना गया है, यह एक ऐसे विकास के माडल की वकालत करती है जो भावी पीढ़ियों की जरूरतें को प्रभावित किए बिना ही हमारे मौजूदा समय की आवश्यकताओं को पूरा कर सके.
सतत विकास की अवधारणा को सैद्धांतिक तौर पर मानना तो आसान है लेकिन इसे व्यवहार में लाना उतना ही मुश्किल है खासकर भारत जैसे विकासशील देशों के लिये, दरअसल एसडीजी जैसे लक्ष्यों को हासिल करने में भारत जैसे देशों की सबसे बड़ी चुनौती विकास की अपनी रफ्तार को रोके बिना पर्यावरण संरक्षण तथा संसाधनों का प्रबंधन करना है, इसके अलावा गरीब व विकासशील देशों के पास पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी और तकनीकि दक्षता का अभाव भी होता है.
शायद इसीलिये  एसडीजी लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में भारत की शुरुआत निराशाजनक है. पिछले साल सतत विकास समाधान नेटवर्क (एसडीएसएन) और बर्टल्समैन स्टिफटंग द्वारा सतत विकास सूचकांक पेश किया गया था जिसमें भारत को 149 देशों की सूची में 110वें स्थान पर रखा गया.
सतत् विकास का सातवाँ लक्ष्य है सभी के लिये सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना. जिसका मकसद है 2030 तक सभी को स्वच्छ उर्जा स्रोतों के जरिये सस्ती बिजली उपलब्ध करना.विश्व की करीब सवा अरब आबादी अभी भी बिजली जैसी बुनियादी जरूरत से महरूम है ऐसे में सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा को नये लक्ष्यों में शामिल किया जाना बहुत प्रासंगिक है. एसडीजी 7 भारत जैसे विकासशील देशों के लिये एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. नीति आयोग के अनुसार भारत में करीब 30 करोड़ लोग अभी भी ऐसे हैं जिन तक बिजली की पहुँच नहीं हो पायी है, इसी तरह से 2014 में जारी यूनाइटेड नेशंस इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार अपने लोगों को खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन न उपलब्ध करा पाने वाले देशों की सूची में भारत शीर्ष पर है और यहां की दो-तिहाई आबादी खाना बनाने के लिए कार्बन उत्पन्न करने वाले ईंधन और गोबर से तैयार होने वाले ईंधन का इस्तेमाल करती है जिसकी वजह से इन परिवारों की महिलाओं और बच्चों के सेहत को गंभीर असर पड़ता है.
सितंबर, 2015 को केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल द्वारा ‘स्वच्छ पाक ऊर्जा और विद्युत तक पहुँच राज्यों का सर्वेक्षण’ रिपोर्ट जारी किया गया था इस सर्वेक्षण में 6 राज्यों (बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल) के 51 जिलों के 714 गांवों के 8500 परिवार शामिल किये गये थे. रिपोर्ट के अनुसार इन राज्यों में 78% ग्रामीण आबादी भोजन पकाने के लिए पारंपरिक बायोमास ईंधन का उपयोग करती है और केवल 14% ग्रामीण परिवार ही भोजन पकाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करते हैं.

उर्जा मंत्रालय द्वारा दिये गये आंकड़ों के अनुसार हमारे देश अभी 4 करोड़ 5 लाख 30 हजार 31 घरों में बिजली नहीं है जिनमें से प्रमुख राज्यों की स्थिति निम्नानुसार है-
राज्य बिजली से वंचित घरों की संख्या 
उत्तर प्रदेश 1,46,66,815
बिहार  64,95,622
झारखंड 30,47,833
मध्य प्रदेश 45,02,027
राजस्थान 20,20,979
हरियाणा 6,83,690
छत्तीसगढ़ 6,44,458
 (स्रोत : उर्जा मंत्रालय )
दरअसल वर्तमान में भारत ऊर्जा को लेकर मुख्यतः कोयले,पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैसों और तेल पर ही निर्भर है जिसकी अपनी सीमायें हैं, एक तो महंगी होने की वजह से सभी तक इनकी पहुँच नहीं है दूसरा इनसे बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, इसके साथ ही ये विकल्प टिकाऊ भी नहीं है, जिस रफ्तार से ऊर्जा के इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा उससे वे जल्द ही खत्म हो जायेंगी और फिर इन्हें दोबारा बनने में सदियां लग जायेंगी. इसका प्रभाव पर्यावरण के साथ-साथ भावी पीढ़ियों पर भी पड़ना तय है. ऐसे में ऊर्जा के नये विकल्पों की तरफ बढ़ना समय की मांग है जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर लगाम लग सके और सभी लोगों तक सस्ती और  टिकाऊ ऊर्जा की पहुँच बनायी जा सके. इस दिशा में भारत अभी शुरूआती दौर में ही है. विश्व आर्थिक मंच ग्लोबल एनर्जी आर्किटेक्चर परफार्मेंस इंडेक्स रिपोर्ट में हर साल वैश्विक स्तर पर विभिन्न मुल्कों में सुरक्षित, सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा की आपूर्ति के आधार पर ऊर्जा ढांचे का आकलन पेश किया जाता है, यानी 2017 में जारी इसकी रिपोर्ट में 127 देशों में से भारत को 87वां स्थान दिया गया है जिसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. इस सम्बन्ध में  नीति आयोग ने उम्मीद जतायी है कि चूंकि अक्षय ऊर्जा स्रोतों की कीमत कम हो रही है जिससे सभी को सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा पहुँच के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिल सकती है. वर्तमान में हमारे देश में नवीकरणीय ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों के माध्यम से लगभग 50 गीगावॉट बिजली पैदा की जाती है जिसे 2022 तक 100 गीगावॉट यानी दुगना करने के लक्ष्य रखा गया है.
इधर मोदी सरकार का जोर भी ग्रामीण क्षेत्रों में सभी को एलपीजी कनेक्शन  और बिजली उपलब्ध कराने के लिये 'प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना'  और “प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना” जैसी योजनाओं की शुरुआत की गयी है. उज्ज्वला योजना की शुरुआत तीन सालों में पांच करोड़ गरीब महिलाओं को रसोई गैस कनैक्शन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गयी है, इसका मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए एलपीजी के उपयोग को बढ़ावा देना है जिससे लकड़ी और उपले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के उपयोग को कम किया जा सके.  इसी तरह से 'प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना' के तहत  31 मार्च 2019 तक तक भारत के  हर घर को बिजली उपलब्ध कराने लक्ष्य रखा गया है. हालांकि जानकार मानते है कि भारत का भी परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर होना इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा है. इस दिशा में सौर उर्जा एक अच्छा विकल्प हो सकता है. हमारा देश सौर उर्जा के उत्पादन के लिए एक आदर्श स्थल है क्योंकि हमारे यहाँ साल भर में 250 से 300 दिनों तक सूरज की पर्याप्त रोशनी उपलब्ध है.
मध्यप्रदेश के संदर्भ में बात करें तो राज्य में बिजली की सरप्लस उतपादन होने के बावजूद यहाँ अभी भी लगभग 45 लाख परिवार बिजली विहीन हैं.दूसरी तरफ हालत यह है कि मध्यप्रदेश में राज्यों के मुकाबले बिजली ज्यादा महंगी मिल रही है. यहाँ देश में सबसे ज्यादा महंगी दरों पर बिजली के बिल वसूले जा रहे हैं जिसका असर गरीब किसानों और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है. इसी साल ही  बिजली कंपनियों के प्रस्ताव पर विद्युत नियामक आयोग द्वारा बिजली दरों में करीब 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गयी है, यह लगातार तीसरा साल था जब बिजली दरों में इजाफा किया गया है और इस तरह से यहाँ पिछले तीन सालों में बिजली दरों में करीब तीस प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जा चुकी है. यह स्थिति तब है जबकि राज्य में बिजली का  उत्पादन मांग से अधिक हो रहा है और मध्यप्रदेश दूसरे राज्यों को भी बिजली उपलब्ध कराता है लेकिन फिर भी यहाँ लोग महंगी दरों पर बिजली खरीदने को मजबूर हैं तो इसकी वजह यह है कि मध्यप्रदेश सरकार प्राइवेट बिजली कंपनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीद रही है. विपक्षी पार्टियां इसे देश का सबसे बड़ा बिजली घोटाला बता रही हैं, उनका आरोप है कि राज्य में भरपूर बिजली उपलब्ध होने के बावजूद सरकार ने प्राइवेट बिजली कंपनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीदने का करार किया हुआ है. उनका आरोप है कि सरकार निजी कंपनियों से महंगी बिजली खरीदने के लिए खुद के बिजलीघरों को या तो बंद रख रही है या फिर उनसे नाममात्र का बिजली पैदा किया जा रहा है. दरअसल मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है जहाँ लोगों ने बिजली उत्पादन के बड़े प्रोजेक्ट के चलते भरी कीमत चुकायी है. इसके लिये नर्मदा घाटी में ही दो सौ से ज्यादा बांध बनाये जा चुके हैं जिसके चलते लाखों लोगों को उनकी जगह से विस्थापित होने को मजबूर किया गया है. लेकिन इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बावजूद यहाँ बनायी गयी बिजलीघरों  का क्षमता से बहुत कम उपयोग किया जा रहे है.
इधर मध्यप्रदेश सरकार का चुटका परमाणु प्लांट भी सवालों के घेरे में है, मध्यप्रदेश सरकार मंडला जिले के चुटका में बिजली के लिये परमाणु प्लांट बना रही है जिसकी क्षमता 1400 मेगावाट होगी लेकिन स्थानीय लोग इस परियोजना का भारी विरोध कर रहे हैं. विरोध करने वालों का कहना है कि प्लांट से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित तो होंगें ही लेकिन इसके साथ ही परमाणु बिजली-घर पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित भी नहीं है. अब सवाल उठता है कि ज्यादा बिजली होने के बावजूद इस तरह का रिस्क लेने की क्या जरूरत है जिससे पर्यावरण की क्षति हो और हजारों लोगों को आपनी जगह से उजाड़ना पड़े.
मध्यप्रदेश प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बहुत धनी है  यहाँ नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा स्रोतों की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं जिसपर ध्यान देने की जरूरत है. मध्य प्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर काम शुरू करने वाले शुरआती राज्यों में से एक है जिसकी शुरुआत 2009 में की गयी थी, साल 2010 में मध्यप्रदेश में नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग के रूप में एक स्वतंत्र मंत्रालय का  गठन किया गया जिसके बाद से प्रदेश में नवकरणीय ऊर्जा के विकास का रास्ता खुला है. वर्तमान में नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कुल 3200 मेगावॉट ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है. देश की सबसे बड़ी 130 मेगावॉट की सौर परियोजना नीमच जिले में स्थापित की जा चुकी है. इस साल अप्रैल में  मध्यप्रदेश सरकार ने तीन निजी कंपनियों के साथ मिलकर  रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट पर अनुबंध किया है इसके  तहत करीब  5,000 करोड़ की लागत से 750 मेगावॉट की उत्पादन क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया जायेगा. सरकार द्वारा दावा किया जा रहा है कि इस सोलर प्लांट से 2 रुपए 97 पैसे के टैरिफ पर बिजली मिलेगी. इसके 2018 के अंत तक शुरू हो जाने की सम्भावना है .
 एसडीजी 7 इस बात की वकालत करता है कि ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ही एकमात्र रास्ता  है जिससे  भविष्य को नुकसान पहुचाये बिना तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. यह आर्थिक विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की मांग करता है. जरूरत इस बात की है कि भारत और चीन जैसे उभरते देश इस क्षेत्र में अपनी दक्षता को हासिल करें और इसके लिए सस्ती तकनीक के आविष्कार की तरफ भी ध्यान दें .


जगदीश्वर चतुर्वेदी
आदिवासी समस्या राष्ट्रीय समस्या है। भारत की राजनीति में आदिवासियों को दरकिनार करके कोई राजनीतिक दल नहीं रह सकता। एक जमाना था आदिवासी हाशिए पर थे लेकिन आज केन्द्र में हैं। आदिवासियों की राजनीति के केन्द्र में आने के पीछे प्रधान कारण है आदिवासी क्षेत्रों में कारपोरेट घरानों का प्रवेश और आदिवासियों में बढ़ती जागरूकता। आदिवासियों के प्रति वामपंथी दलों का रूख
कांग्रेस और भाजपा के रुख से बुनियादी तौर पर भिन्न है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को कभी भी आदिवासी बनाए रखने, वे जैसे हैं वैसा बनाए रखने की कोशिश नहीं की है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को साम्राज्यवादी विचारकों द्वारा दी गयी घृणित पहचान से मुक्त किया है। उन्हें मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठा दी है। यह कार्य उनके मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए किया है। आदिवासियों को वे
सभी सुविधा और सुरक्षा मिले जो देश के बाकी नागरिकों को मिलती हैं। आदिवासियों का समूचा सांस्कृतिक तानाबाना और जीवनशैली वे जैसा चाहें रखें,राज्य की उसमें किसी भी किस्म के हस्तक्षेप की भूमिका नहीं होगी,इस प्रक्रिया में भारत के संविधान में संभावित रूप में जितना भी संभव है उसे आदवासियों तक पहुँचाने में वामपंथियों की बड़ी भूमिका रही है। आदिवासियों को आतंकी या हथियारबंद
करके उनके लिए लोकतांत्रिक स्पेस तैयार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक स्पेस तैयार करने के लिए आदिवासियों के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक कानूनों क पालन और प्रचार-प्रसार पर जोर देना होगा। आदिवासियों के लिए लोकतंत्र में जगह तब ही मिलेगी जब उन्होंने लोकतांत्रिक ढ़ंग से लोकतान्त्रिक समस्याओं पर गोलबंद किया है। लोकतंत्र की बृहत्तर प्रक्रिया का उन्हें
हिस्सा बनाया जाए। आदिवासियों के लिए बंदूक की नोंक पर लाई गई राजनीति आपराधिक कर्म को बढ़ावा देगी। उन्हें अपराधी बनायेगी। साम्राज्यवादी विचारकों के आदिवासियों को अपराधी की कोटि में रखा। इन दिनों आदिवासियों को तरह-तरह के बहानों से मिलिटेंट बनाने,जुझारू बनाने,हथियारबंद करने,पृथकतावादी बनाने,सर्वतंत्र-स्वतंत्र बनाने के जितने भी प्रयास उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर
छत्तीसगढ़-लालगढ़ तक चल रहे हैं ,वे सभी आदिवासियों को अपराधकर्म में ठेल रहे हैं। अंतर यह है कि उसके ऊपर राजनीति का मुखौटा लगा हुआ है। आदिवासी को मनुष्य बनाने की बजाय मिलिटेंट बनाना सामाजिक-राजनीतिक अपराध है।
हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि आदिवासी इलाकों में ही उग्रवाद क्यों पनपा है ? कांग्रेस के नेताओं और भारत सरकार के गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् के पास उग्रवाद की समस्या का एक ही समाधान है वह है आदिवासी इलाकों में विकास और पुलिस कार्रवाई। इसी एक्शन प्लान पर ही सारा मीडिया और कारपोरेट जोर दे रहा है। इस एक्शन प्लान को आदिवासी समस्या के लिए रामबाण दवा कहा जा रहा है। केन्द्र
सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए कुछ घोषणाएं भी की हैं। लेकिन यह प्लान बुनियादी तौर पर अयथार्थपरक है। इस प्लान में आदिवासियों का उनकी जमीन से उच्छेद रोकना, उनके क्षेत्र के संसाधनों का स्वामित्व,विस्थापन और उनके पीढ़ियों के जमीन के स्वामित्व की बहाली की योजना या कार्यक्रम गायब है। मनमोहन-चिदम्बरम् बाबू जिस तरह का लिकास करना चाहते हैं उसमें आदिवासियों का विस्थापन
अनिवार्य है। समस्या यहां पर है कि क्या केन्द्र सरकार विकास का मॉडल बदलना चाहती है ? जी नहीं, केन्द्र सरकार विकास का नव्य-उदार मॉडल जारी रखना चाहती है। आदिवासियों की उनकी जमीन से बेदखली जारी रखना चाहती है, ऐसे में आदिवासियों के सड़कें,स्कूल-कॉलेज,रोजगार के सपने देकर शांत नहीं किया जा सकता। विकास के मनमोहन मॉडल में विस्थापन अनिवार्य और अपरिहार्य है। ऐसी अवस्था में
आदिवासियों के बीच में विकास और पुलिस एक्शन का प्लॉन पिटेगा। आदिवासियों का प्रतिवाद बढ़ेगा। दूसरी बात यह कि विस्थापन का विकल्प मुआवजा नहीं है। मुआवजा ज्यादा हो या कम इससे भी आदिवासियों का गुस्सा शांत होने वाला नहीं है। इस प्रसंग में सबसे बुनियादी परिवर्तन यह करना होगा कि आदिवासियों के इलाकों पर उनका ही स्वामित्व रहे। क्रेन्द्र या राज्य सरकार का आदिवासियों की जमीनऔर जंगल पर स्वामित्व संवैधानिक तौर पर खत्म करना होगा। 
आदिवासियों के सामने इस समय दो तरह की चुनौतियां हैं, पहली चुनौती है आदिवासियों के प्रति उपेक्षा और विस्थापन से रक्षा करने की और उसके विकल्प के रूप में परंपरागत संस्थाओं और आदिवासी एकजुटता को बनाए रखने की। दूसरी चुनौती है नयी परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल बदलने और लदनुरूप अपने संस्कारों,आदतों और कानूनों में बदलाव लाने की। आदिवासियों पर कोई भी परिवर्तन यदि बाहर
से थोपा जाएगा तो वे प्ररोध करेंगे। आदिवासियों का प्रतिरोध स्वाभाविक है। वे किसी भी चीज को स्वयं लागू करना चाहते हैं। यदि केन्द्र सरकार उनके ऊपर विकास को थोपने की कोशिश करेगी तो उसमें अंततः असफलता ही हाथ लगेगी। आदिवासी अस्मिता की धुरी है स्व-संस्कृति प्रेम, आत्मनिर्णय और आत्म-सम्मान में विश्वास।


अतुल कुमार तिवारी
स्वच्छता जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।ग्रामीण क्षेत्रों में सदियों से सुनिश्चित स्वच्छता सुविधायें मुहैया कराने के इरादे से ग्रामीण विकास मंत्रालय का पेयजल आपूर्ति एवं स्वच्छता विभाग सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) चला रहा है। इस अभियान का उद्देश्य ग्रामवासियों की खुले में शौच जाने की आदत में बदलाव लाना है। सरकार का लक्ष्य है कि २०१० तक शौच का यह तरीका पूरे तौर पर बंद हो जाए और लोग शौचालय का प्रयोग करें।
 रणनीति -
टीएससी के अंतर्गत सहभागिता और मांग आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाता है। पूरे जिले को इकाई मानते हुए ग्राम पंचायतों और स्थानीय लोगों को इसमें शामिल किया जाता है। रणनीति यह है कि कार्यक्रम का नेतृत्व समुदाय के लोगों को ही सौंपा जाए तथा कार्यक्रम को जनकेन्‍द्रित बनाया जाए । इसमें व्यक्तिगत स्वच्छता और व्यवहार में परिवर्तन पर ही विशेष जोर दिया जाता है। टीएससी में संपूर्ण स्वच्छता की सामूहिक उपलब्धि पर बल देने वाले सामुदायिक नेतृत्व के दृष्टिकोण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताओं में स्वच्छता के बारे में लोगों को प्रेरित करने हेतु सूचना, शिक्षा एवं संप्रेषण (आईईसी) पर जोर, बीपीएल परिवारों / गरीबों और विकलांगों को इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहन राशि और प्रोद्योगिकी के विभिन्न विकल्पों में से किसी को भी अपनाने की छूट शामिल है। इसके अलावा ग्राम स्तर पर पैदा होने वाली मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक व्यवस्था को बनाए रखना भी इसी कार्यक्रम का जरुरी हिस्सा है। संपूर्ण स्वच्छता अभियान के क्षेत्र में श्रेष्ठ उपलब्धियों के लिए निर्मल ग्राम पुरस्कार (एनजीपी) के रुप में नकद राशि प्रोत्साहन स्वरूप दी जाती है।
घटक
लोगों को घरों में शौचालय के निर्माण के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा क्रमश: 1500 रूपए और 700 रूपये की राशि दी जाती है। यह प्रोत्साहन राशि बीपीएल परिवारों के उन्हीं लोगों को दी जाती है,जो अपने घरों में शौचालय का निर्माण कर उनका इस्तेमाल भी करते हैं।गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवारों को अपने ही खर्च से या ऋण लेकर शौचालय बनवाने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। ये ऋण स्वयं सहायता समूह (एसएचजी),बैंक अथवा सहकारी संस्थाओं से लिया जा सकता है। विद्यालयों और आंगनवाड़ी शौचालयों के निर्माण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें 70 और 30 के अनुपात में खर्च वहन करती हैं। सामुदायिक प्रसाधन सुविधाओं के निर्माण (स्‍वच्‍छता संबंधी) सामग्रियों के उत्पादन केंद्रों को सहायता,स्वच्छता संबंधी ग्रामीण विक्रय केंद्रों और ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन भी संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम के महत्वपूर्ण घटक हैं।
क्रियान्वयन –
अभिनव रणनीतिओं के फलस्वरूप ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का प्रसार 1981 के 1 प्रतिशत से बढ़कर इस वित्त वर्ष में 67 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत जो प्रगति हुई है वह इस प्रकार है :  वर्तमान में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 607 ग्रामीण जिलों में टीएससी को लागू किया जा रहा है। स्वच्छता कार्यक्रम का विस्तार 2001 में 22 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर 2010 में 67 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
 भौतिक प्रगति
 कार्यक्रम के अंतर्गत सितंबर 2010 तक 7.07 करोड़ व्यक्तिगत घरों में शौचालय, 10.32 लाख शाला शौचालय, 3.46 लाख आंगनवाड़ी शौचालय बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त महिलाओं के लिए अलग से 19502 प्रसाधन केंद्रों का निर्माण किया गया है। इनमें 3.81 करोड़ बीपीएल परिवार सम्मिलित हैं।
व्यक्तिगत घरेलू शौचालय ( आई.एच.एच.एल) का निर्माण
इस मद में दादर एवं नागर हवेली, पुड्डूचेरी, मणिपुर, जम्मू एवं कश्मीर, बिहार, असम, नगालैंड, मेघालय, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और उत्तराखंड का प्रदर्शन 50 प्रतिशत  के राष्ट्रीय औसत से नीचे रहा है। सिक्किम और केरल में सभी घरों में शौचालय निर्माण हो चुका है। इस प्रकार इनका प्रदर्शन 100 प्रतिशत रहा है, जो कि सराहनीय कहा जाएगा। जहां तक शालाओं में  शौचालयों के निर्माण का प्रश्न है, मेघालय, जम्मू एवं कश्मीर, बिहार,हिमाचल प्रदेश,पश्चिम बंगाल,गोवा,नगालैंड,मध्य प्रदेश,उत्तराखंड,त्रिपुरा,तमिलनाडु और मणिपुर का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर से नीचे है।

मार्च 2011 तक सभी शालाओं और आंगनवाड़ी केन्‍द्रों में शौचालयों का निर्माण :
शालाओं में 13,14,636 शौचालयों के निर्माण के लक्ष्य के विरुद्ध 10,32,703(78.55 प्रतिशत) शौचालयों का निर्माण हो चुका है। समस्‍त राज्यों ने सभी शालाओं और आंगनवाड़ी केन्‍द्रों में मार्च 2011 तक शौचालयों के निर्माण का संकल्प व्यक्त किया है। टी.ए.सी के तहत निर्धारित लक्ष्य को मिजोरम और सिक्किम ने पहले ही पूरा कर लिया है। बजट आबंटन जो 2002-03 में 165 करोड़ रूपए था, उसे बढ़ाकर2010-11 में 15 अरब 80 करोड़ रूपए कर दिया गया।
वित्तीय प्रगति
टी.एस.सी के अंतर्गत कुल वित्तीय प्रावधान 1 खरब 96 अरब 26 करोड़ 43 लाख रुपये का है। इससे जुड़ी परियोजनाओं में केंद्र का अंश 1 खरब 22 अरब 73 करोड़ 81 लाख रुपये का है, जबकि राज्यों और हित ग्राहियों का हिस्सा क्रमश: 52 अरब 5 करोड़ 79 लाख और 21 अरब 46 करोड़ 83 लाख रुपये का है। केंद्र अब तक 58 अरब 70 करोड़ रुपये 61 लाख रुपये जारी कर चुका है, जिसमें से 47अरब 30 करोड़ 28 लाख रुपये इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर खर्च किये जा चुके हैं।
केंद्र द्वारा जारी राशि के विरुद्ध पंजाब, दादरा एवं नगर हवेली, मणिपुर, असम,आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओड़ीशा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, त्रिपुरा, बिहार, झारखंड, मेघालय, पश्चिम बंगाल और जम्मू एवं कश्मीर का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से कम रहा है।
निर्मल ग्राम पुरस्कार
1999 में टीएससी के आरंभ होने के बाद निर्मल ग्राम सुधार के अंतर्गत जो प्रोत्साहन राशि दी जाती है उससे ग्रामीण क्षेत्र में स्वच्छता संबंधी कार्यक्रम में तेजी आई है। 2001 से 2004 के बीच औसत वृद्धि 3 प्रतिशत वार्षिक की रही है। परंतु 2004 में निर्मल ग्राम पुरस्कार की शुरुआत  के बाद इस कार्यक्रम में सात से आठ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हो रही है।
सीमायें
 कुछ राज्यों में स्वच्छता को प्राथमिकता नहीं देना, कुछ राज्यों द्वारा अपना हिस्सा जारी नहीं करना, ग्राम स्तर पर पारस्परिक संप्रेषण पर जोर नहीं देना, निचले स्तर पर अपर्याप्त क्षमता विकास, कुछ परिवारों अथवा परिवार के सदस्यों के बीच व्यवहारजन्य परिवर्तन का अभाव, छात्रों की संख्या के अनुपात में शालाओं में शौचालयों और मूत्रालयों का अभाव और ठोस तथा तरल कचरा प्रबंधन पर अधिक बल न देना इस कार्यक्रम में अनुभव की जाने वाली कुछ समस्यायें हैं।
 चुनौतियां
 आशा है कि 11 वीं योजना के अंत तक करीब 2.4 करोड़ और घरों में भी स्वच्छता संबंधी सुविधायें उपलब्ध करा दी जाएंगी। प्रतिवर्ष लगभग 1.2 करोड़ ग्रामीण घरों में स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया करायी जा रही हैं। इस प्रकार 11 वीं योजना के अंत तक 3.18 करोड़ ग्रामीण परिवारों में स्वच्छता संबंधी सुविधायें मुहैया कराने की जरुरत होगी। कार्यक्रम का जो वर्तमान उद्देश्य है उसके लिए इन सभी शेष 3.18 करोड़ परिवारों में 12 वीं योजना के दौरान स्वच्छता सुविधायें उपलब्ध करानी होंगी। बगैर स्वास्थ्य सुविधा वाले नए परिवारों की पहचान अथवा बीपीएल की परिभाषा में भविष्य में यदि कोई परिवर्तन होता है तो उससे कार्यक्रम की रूपरेखा में भी बदलाव हो सकता है।
कठिन क्षेत्र
बाढ़ प्रभावित तटीय, पर्वतीय और मरुस्थली क्षेत्रों में समस्या के समाधान के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके लिए उपयुक्त और कम खर्चीली प्रौद्योगिकियों का विकास करना होगा। लोगों को तैयार करने के लिए विश्वसनीय तौर तरीके अपनाने होंगे।
ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन ( एसएलडब्ल्यूएम)
जैविक और अजैविक कचरे के संग्रहण और निस्तारण के लिए संस्थागत व्यवस्था कायम करना होगा। इसके लिए ग्राम पंचायतों को प्रेरित करने की आवश्यकता है।
व्यक्तिगत स्वच्छता प्रबंधन
शालाओं और आंगनवाड़ी केन्‍द्रों में चल रहे स्वच्छता संबंधी कार्यक्रम में हाथ की धुलाई को एक अभिन्न हिस्से के रूप में शामिल किया गया है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों में मासिक धर्म के समय स्वच्छता पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
पर्यावरण स्वच्छता
एक बार जब व्यवहार जन्य परिवर्तन के लिए किये जा रहे प्रयास सफल हो जायेंगे,तो पर्यावरण की स्वच्छता पर ध्यान दिया जाना महत्वपूर्ण हो जाएगा। पानी की बचत के लिए और पर्यावरण अनुकूल साधनों से स्वच्छता सुविधाओं के अभावों को दूर करने के वास्ते शीघ्र ही प्रयास शुरू करने होंगे।
विकलांग हितैषी शौचालय
संपूर्ण स्वच्छता अभियान ( टीएससी) में विकलांग व्यक्तियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ग्रामीण क्षेत्रों की संस्थाओं में कम से कम ऐसा शौचालय मुहैया कराना जरुरी है जिसे विकलांग व्यक्ति भी आसानी से इस्तेमाल कर सके।
स्वच्छता कार्यक्रम के एकीकरण ( कंवर्जेंस) हेतु विशेष क्षेत्र
रेलवे और राजमार्ग जैसे क्षेत्रों में स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण मुहैया कराने के लिए टी.एस.सी से अन्य कार्यक्रमों को जोड़ने की आवश्यकता है। पर्यटक एवं धार्मिक स्थलों और साप्ताहिक हाट / बाजारों में भोजन और पारिवेशिक स्वच्छता पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
इसे देखते हुए ग्रामीण विकास मंत्रालय के पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग ने कार्यक्रम पर मजबूती से अमल करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। इनमें टी.एस.सी के अंतर्गत लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में राज्यों की प्रगति की नियमित समीक्षा और दिशानिर्देशों का पुनरीक्षण कर निर्मल ग्राम पुरस्कार को सुदृढ़ बनाना है ताकि चयन प्रक्रिया को और अधिक विश्वसनीय तथा पारदर्शी बनाया जा सके। कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं उनमें कार्यक्रम क्रियान्वयन हेतु आईईसी और एचआरडी की समीक्षा, परिवेश की स्वच्छता पर राष्ट्रीय कार्यशाला और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कर स्वच्छता प्रौद्योगिकी विकल्पों को टी.एस.सी से जोड़ना, ठोस और तरल कचरा प्रबंधन जैसी अगली पीढ़ी की स्वच्छता गतिविधियों को चलाने की राज्यों की क्षमता को सुदृढ़ बनाना शामिल है।
 आशा है कि नए उपायों और प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के लिए बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलेगी।


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं