डॉ. फ़िरदौस ख़ान
भारत गांवों का देश है। यहां तक़रीबन साढ़े छह लाख गांव हैं। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के आंकड़ों के अनुसार मई 2025 तक देश में कुल छह लाख 44 हज़ार 131 गांव थे। केन्द्रीय बजट 2025-26 के मुताबिक़ तक़रीबन दो लाख 68 हज़ार ग्राम पंचायतें हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा तक़रीबन एक लाख गाँव हैं। वक़्त के साथ इनकी तादाद बदलती रहती है।
अकसर गांवों में जाना होता है। बदलाव की बयार ऐसी चली है कि हर बार कुछ न कुछ नया दिखाई देता है। पहले जहां खेतों में सब्ज़ियों की बहार होती थी, वहीं अब मकान बन रहे हैं। खेत सिकुड़ रहे हैं और बस्तियां फैलती जा रही हैं। दरअसल, आधुनिकता की अंधी दौड़ ने परिवेश को इतना प्रभावित किया है कि कितनी ही प्राचीन संस्कृतियां अब इतिहास का विषय बनकर रह गई हैं। परिवर्तन प्रकृति का नैसर्गिक नियम है, और यह शाश्वत सत्य भी है, लेकिन धन के बढ़ते प्रभाव ने स्वाभाविक परिवर्तन को एक नकारात्मक मोड़ दे दिया है। हालात ये हो गए हैं कि व्यक्ति पैसे को ही सब कुछ मानने लगा है। रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज उसके लिए महज़ ऐसे शब्द बनकर रह गए हैं, जिसकी उसे क़तई परवाह नहीं है। दूर देहात या गांव का नाम लेते ही ज़ेहन में जो तस्वीर उभरती थी, उसकी कल्पना मात्र से ही सुकून की अनुभूति होती थी। दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत, हवा के झोंकों से शाख़ों पर झूमते सरसों के पीले-पीले फूल, पनघट पर पानी भरती गांव की गोरियां, लोकगीतों पर थिरकती अल्ह़ड नवयुवतियां मानो गांव की समूची संस्कृति को अपने में समेटे हुए हों, लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले कई दशकों के दौरान हुए विकास ने गांव की शक्ल ही बदलकर रख दी है। गांव अब गांव न रहकर, शहर होते जा रहे हैं। गांव के शहरीकरण की प्रक्रिया में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। हालत यह है कि एक परिवार को देखकर पड़ौसी के परिवार का रहन-सहन बदल रहा है। पूर्वजों के बनाए घर अब घर न रहकर, शहरी कोठियों की शक्ल इख़्तियार कर रहे हैं। गांवों की चौपालें अब अपना स्वरूप लगभग खो चुकी हैं। शहरी सभ्यता का सबसे ज़्यादा असर उन गांवों पर पड़ा है, जो शहर की तलहटियों के साथ लगते हैं। ये गांव न तो गांव रहे हैं और न ही पूरी तरह शहर बन पाए हैं। पहले ग्रामीण अंचलों में लोकगीत न केवल मनोरंजन का साधन होते थे, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी सशक्त माध्यम होते थे। प्राचीन समृद्ध लोक संस्कृति की परम्परा वाले प्रदेशों में आज सांस्कृतिक और शैक्षणिक पिछ़डेपन के कारण लोककलाएं पार्श्व में जा रही हैं। लुप्त हो रही ग्रामीण संस्कृति को संभाल पाने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हुए हैं। शौर्यपूर्ण, लेकिन सादा और सहज जीवन जीने वाले गांवों के लोगों में आज जीवन के उच्च मूल्यों की उपेक्षा हो रही है। पैसे और ताक़त की अपसंस्कृति हर तरफ़ पनपती दिखाई देती है।
हरियाणा जैसे राज्य विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति के प्रदेश माने जाते हैं। यहां के गांव प्राचीन काल से संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों के केन्द्र रहे हैं। गीता का जन्म स्थान होने का गौरव भी श्रीकृष्ण ने इसी प्रदेश को दिया, लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि ग्रामीण अपनी गौरवशाली संस्कृति को दरकिनार कर शहर की पाश्चात्य संस्कृति की गर्त में समा जाना चाहते हैं। लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरों में जाते हैं और अपने साथ गांव में लेकर आते हैं नशे की आदत, जुआख़ोरी और ऐसी ही कई अन्य बुराइयां, जो ग्रामीण जीवन को दूषित करने पर आमादा है। नतीजा सबके सामने है, गांवों में भाईचारे की भावना ख़त्म होती जा रही है और ग्रामीण गुटबाज़ी का शिकार हो रहे हैं। लोग गांवों से निकलकर शहरों की तरफ़ भागने लगे हैं, क्योंकि उनका गांवों से मोह भंग हो रहा है। इतना ही नहीं, अब धीरे-धीरे गांव भी फ़ार्म हाउस कल्चर की चपेट में आ रहे हैं। अपनी पहचान खो चुका धनाढ्य वर्ग अब सुकून की तलाश में दूर देहात में ज़मीन ख़रीदकर फ़ार्म हाउसों का निर्माण करने की होड़ में लगा है।
शहर की बुराइयों को देखते हुए यह चिन्ता जायज़ है कि गांव की सहजता अब धीरे-धीरे मर रही है। तीज-त्यौहारों पर भी गांवों में पहले वाली रौनक़ नहीं रही है। शहरवासियों की तरह ग्रामीण भी अब बस रस्म अदायगी ही करने लगे हैं। शहर और गांवों के बीच पुल बने मीडिया ने शहर की अच्छाइयां गांवों तक भले ही न पहुंचाई हों, पर वहां की बुराइयां गांव तक ज़रूर पहुंचा दी हैं। अंधाधुंध शहरीकरण के ख़तरे आज हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं। समाज का तेज़ी से विखंडन हो रहा है। समाज परिवार की लघुतम इकाई तक पहुंच गया है, यानी लोग समाज के बारे में न सोचकर सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं। होना तो यही चाहिए कि गांव सुविधाओं के मामले में कुछ-कुछ शहर बने रहें, लेकिन संस्कृति के मामले में गांव ही रहें। मगर तब तक ऐसा संभव नहीं हो सकता, जब तक विकास की हमारी अवधारणा आयातित होती रहेगी और उदारीकरण के प्रति हमारा नज़रिया नहीं बदलेगा। आज शहर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आ चुके हैं और अब शहरों के साथ लगते गांव भी इनकी देखादेखी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।
विकास के अभाव में गांव स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता की तरफ़ क़दम नहीं बढ़ा पाए। ऐसे में रोज़गार की तलाश में गांव के युवकों का शहर की तरफ़ पलायन शुरू होना और शहर की बुराइयों से उनका रूबरू होना, हैरत की बात नहीं है। लेकिन इस सबके बावजूद उम्मीद बरक़रार है कि वह दिन ज़रूर आएगा, जब लोग पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल से निकलकर अपनी संस्कृति की तरफ़ लौटेंगे। काश, वह दिन जल्द आ जाए। हम तो यही दुआ करते हैं, अमीन।
