नहीं प्रभाती आरती , ना सँझवाती शाम।
प्रेत बसेरा सा लगे , पीछे छूटा गाँव।।
कोदौ कुटकी ना रहे , ना सामा का भात।
नहीं पनपथी ज्वार की , चना चबैना प्रात।।
मही महेरी ढूँढ़ते , जाउर मीठा भात।
कढ़ी फुलौरी के बिना , रूठे नहीं बरात।।
नहीं दुधारू भैंस अब , नहीं रँभाती गाय।
टुरी टुरैली मौज में , बीड़ी गाँजा पाय।।
विरहा आल्हा के बिना , सूना है चौबार।
ढोल मँजीरा के बिना , फीके सब त्यौहार।।
अमराई कोयल बिना , कागा बिन खपरैल।
अहिबाती भूँखन मरे , खेलय फाग रखैल।।
-डॉ. स्वामी विजयानन्द
