भला कहते हो कैसे जमाने से है प्यार।
भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।
प्रेम सचमुच जगत में बहुत अनमोल।
जिसमें दुनिया समायी है आंखें तो खोल।
फिर भी दिखता हो नफरत तो जीना बेकार।
भला कहते हो कैसे जमाने से है प्यार।
भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।
जिन्दगी जंग ऐसा कि लड़ते सभी।
कभी बाहर से घायल तो भीतर कभी।
हो मुहब्बत की मरहम तो होगा सुधार।
भला कहते हो कैसे जमाने से है प्यार।
भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।
खोज में क्यों है मधुकर सुमन से क्या आस?
जा के मरता पतंगा क्यों दीपक के पास?
प्यार तो है बस खोना समर्पण आधार।
भला कहते हो कैसे जमाने से है प्यार।
भाव दिखते नहीं प्यार लगता उधार।।
-श्यामल सुमन
हमें आंधियों से निस्बत है...
-
*-डॉ. फिरदौस ख़ान *
आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है. हमें आंधियां बहुत पसंद हैं. हमें आंधियों
से निस्बत है. ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह य...
