सरफ़राज़ ख़ान
साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी कलम से निकले शब्द सीधे रूह में उतर जाते हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक ऐसा ही चमकता हुआ नाम हैं। उन्हें चाहने वाले 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहते हैं। यह ख़िताब उनकी शख़्सियत और उनके लेखन पर पूरी तरह खरा उतरता है। वे सिर्फ़ एक लेखिका या शायरा नहीं हैं। वे एक इस्लामी विदुषी, कवयित्री, कहानीकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक भी हैं। उनके लेखन में जहां एक तरफ़ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों का अक्स दिखता है, वहीं दूसरी तरफ़ मुहब्बत का बेहद कोमल अहसास भी महसूस होता है। उनकी शायरी दिमाग़ से ज़्यादा दिल पर असर करती है। उनके अअल्फ़ाज़ रूह पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

रूहानियत और पारिवारिक संस्कार
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का जीवन रूहानियत और सूफ़ी दर्शन के क़रीब रहा है। वे अपनी कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं। उनकी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान उनके सबसे बड़े आदर्श रहे हैं। वे कहती हैं कि उनकी अम्मी बहुत ही नेक और इबादतगुज़ार महिला थीं।
बचपन में उन्हें इबादत करते देखकर ही फ़िरदौस के मन में रूहानी इल्म हासिल करने की चाहत पैदा हुई। उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘फ़हम अल क़ुरआन’ है। वे इसे अपनी ज़िन्दगी का शाहकार (मास्टरपीस) मानती हैं। उनका मानना है कि इंसान की ज़िन्दगी का असली मकसद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। उनका लेखन इसी मंज़िल तक पहुंचने का एक रास्ता है।

बचपन से ही लेखन का जुनून
लिखने का शौक़ डॉ. फ़िरदौस को बचपन से ही लग गया था। जब वे महज़ छठी कक्षा में थीं, तभी उन्होंने अपनी पहली नज़्म लिखी थी। उनके पिता ने उस नज़्म की क़ाबिलियत को पहचाना और उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में छपने के लिए भेज दिया।
पहली ही नज़्म छपने के बाद उन्हें काफ़ी सराहना मिली। इसके बाद लिखने और छपने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। शुरुआती दौर में छोटे अख़बारों से शुरू हुआ उनका सफ़र आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तक पहुंच चुका है। उनकी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' काफ़ी चर्चा में रही है। यह किताब सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित है। पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को बहुत उपयोगी मानते हैं।

मीडिया जगत में अमिट छाप
डॉ. फ़िरदौस ख़ान का मीडिया करियर भी बेहद शानदार रहा है। उन्होंने दूरदर्शन, आकाशवाणी और कई प्रतिष्ठित अख़बारों और पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम किया है। आकाशवाणी के साथ उनका एक भावनात्मक रिश्ता है। वे कहती हैं कि उन्होंने रेडियो सुनते हुए ही बचपन बिताया।
साल 1996 में जब रेडियो पर उनका पहला प्रोग्राम आया, तो उनके पिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसके बाद साल 2002 में वे दूरदर्शन से जुड़ीं। वहां उन्होंने सहायक समाचार सम्पादक और प्रोड्यूसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने न सिर्फ़ ख़बरें और लेख लिखे, बल्कि टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटकों का भी सफ़ल लेखन किया। देश का शायद ही कोई बड़ा अख़बार ऐसा हो, जिसमें उनके लेख प्रकाशित न हुए हों।

मुशायरों और कला की दुनिया
लेखन के साथ-साथ डॉ. फ़िरदौस ने संगीत की दुनिया में भी हाथ आज़माया है। उन्होंने कई सालों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली है। उनकी आवाज़ और शब्दों का जादू मुशायरों और कवि सम्मेलनों में ख़ूब चलता है।
जब उनकी रचनाएं गोपालदास नीरज जैसे महान कवि की पत्रिका ‘गीतकार’ में छपीं, तो उन्हें देशभर से न्योते आने लगे। उन्होंने सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में भी शिरकत की है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।

सम्मान और पुरस्कारों का सिलसिला
बेहतरीन पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। साल 2014 में एबीपी न्यूज़ चैनल ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर के पुरस्कार से नवाज़ा था। साल 2005 में अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टीट्यूट ने उन्हें कामयाब महिलाओं की सूची में नामांकित किया था। उन्हें दो मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार के अवॉर्ड से सम्मानित किया। लेकिन डॉ. फ़िरदौस का मानना है कि सबसे बड़ा सम्मान पाठकों का प्यार है। वे कहती हैं कि उनके लफ़्ज़ ही उनकी असली पहचान हैं।

भाषाओं पर पकड़ और अनुवाद
वे एक बहुभाषी लेखिका हैं। वे हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखती हैं। उनकी अंग्रेज़ी कविताओं को विदेशों में भी ख़ूब पसंद किया जाता है। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदेमातरम्' का पंजाबी में अनुवाद किया है।
उनके इस अनुवाद की साहित्यिक हलक़ों में ख़ूब चर्चा हुई। वे पंजाबी पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं।
राहुल गांधी पर लिखी गई उनकी एक नज़्म ने भी काफ़ी सुर्ख़ियां बटोरी थीं। भाषा की सरहदें उनके लिए कभी रुकावट नहीं बनीं।

डिजिटल युग और ब्लॉगिंग
आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो रहा है, डॉ. फ़िरदौस ने ब्लॉगिंग के ज़रिये भी अपनी बात पहुंचाई है। उनके कई मशहूर ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ ब्लॉग पर लोग क़ुरआन करीम की उनकी व्याख्या पढ़ सकते हैं। ‘फ़िरदौस डायरी’ में उनके लिखे गीत, गज़ल और कहानियां मौजूद हैं। ‘मेरी डायरी’ ब्लॉग पर वे समाज, पर्यावरण, राजनीति और समसामयिक विषयों पर अपने विचार साझा करती हैं। इसके अलावा उर्दू के लिए ‘जहांनुमा’ और पंजाबी के लिए ‘हीर’ जैसे ब्लॉग के ज़रिये  वे अपनी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ उनका इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है।
 
देश सेवा और सामाजिक सरोकार
डॉ. फ़िरदौस का व्यक्तित्व सिर्फ़ क़लम तक सीमित नहीं है। वे समाज सेवा में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने हिसार में नागरिक सुरक्षा विभाग में पोस्ट वार्डन के तौर पर काम किया है। वे 'अनुराग साहित्य केन्द्र' की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं। हाल ही में यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक प्रेरक लेखिका के रूप में शामिल किया गया है।

अपनी इच्छाओं के बारे में वे बहुत ही सादगी से कहती हैं कि उन्होंने ज़िन्दगी  में जितना मांगा, ख़ुदा ने उससे कहीं ज़्यादा दिया। वे नफ़रत और जलन जैसी भावनाओं से कोसों दूर रहती हैं। उनका मानना है कि इंसान का अख़लाक (आचरण) ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है। उनके जीवन का सफ़र उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपनी परम्पराओं से जुड़े रहकर दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। डॉ. फ़िरदौस ख़ान की क़लम आज भी समाज को नई दिशा दे रही है और मुहब्बत के पैग़ाम को आम कर रही है।
साभार आवाज़ 


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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