अशोक भाटिया
मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों और कांग्रेस की बदलती रणनीतियों (विशेषकर तमिलनाडु में DMK से दूरी) के बाद इंडिया  गठबंधन गंभीर संकट में है और इसके भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। बंगाल, केरल और पंजाब में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस का तालमेल न होना गठबंधन की एकता को कमजोर कर रहा है।

बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की काफी समय तक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की चर्चाएं चल रही थीं। कुछ सीटों पर दोनों दलों में एक राय नहीं बन पाई। ऊपर से तो दोनों ही दल चुप्पी साधे रहे, लेकिन अंदर ही अंदर खटपट होती रही। अचानक एक दिन ममता ने कह दिया- 'एकला चलो', यानी बंगाल में INDIA गठबंधन को खारिज करते हुए अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान। ममता को लग रहा था कि कांग्रेस बंगाल में लेफ्ट के साथ भी 'गलबहियां' कर रही है, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। वाम दल के विरोध की लहर पर सवार होकर ही ममता सत्ता के शिखर तक पहुंची थीं। ऐसे में ये नजदीकी ममता को खटकी और उन्होंने फौरन किसी भी तरह के गठबंधन से दूरी बना ली। 

ममता की INDIA गठबंधन से दूरी का मुख्य कारण बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन बचाना और कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार न करना था। ममता के लिए राज्य की सत्ता और क्षेत्रीय वर्चस्व, राष्ट्रीय गठबंधन की तुलना में हमेशा प्राथमिकता पर रहे हैं। अब न सत्ता रही, ना ही वर्चस्व। इसी वजह से ममता को अचानक से INDIA गठबंधन की याद आई। 

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की हार के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ी है कि इंडिया गठबंधन का क्या होगा। अभी तक संसद में इंडिया गठबंधन के घटक दलों के रूप में समाजवादी पार्टी और डीएमके हमेशा से कांग्रेस के पीछे खड़ी रही। जबकि तृणमूल कांग्रेस का स्टैंड मुद्दों के आधार पर बदलता रहता था। वहीं अभी हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस ने दो राज्यों में अपने ही इंडिया गठबंधन के साथियों के खिलाफ चुनाव लड़ा। केरल में वह वाममोर्चा को हरा कर सत्ता में आई, जबकि बंगाल में वह तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ी और 292 सीटों पर उम्मीदवार उतारे।

राहुल गांधी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी की सरकार पर तीखे प्रहार किए। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है, क्योंकि राज्यों में राजनीतिक दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, मगर केंद्र में बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो जाते हैं। मगर अब इंडिया गठबंधन में दिक्कत ये है कि कांग्रेस तमिलनाडु में डीएमके का साथ छोड़ कर एक्टर विजय के साथ सरकार में शामिल होने जा रही है। जबकि डीएमके के साथ मिलकर उन्होंने अभी चुनाव लड़ा है। वैसे लोग इसे कांग्रेस की मौक़ापरस्त राजनीति भी कह सकते हैं, मगर यह राजनीति है। यदि मौका चूक गए तो चूकते ही रहेंगे और इतिहास गवाह है कांग्रेस ने ऐसे कई मौके चूके हैं।

अगर कांग्रेस एक्टर विजय के साथ सरकार में जाती है तो संसद में उसे लोकसभा में डीएमके के 22 और राज्यसभा के 8 सांसदों का समर्थन नहीं मिल पाएगा। दरअसल डीएमके के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस में चुनाव से पहले भी दो राय थी। कांग्रेस का एक धड़ा डीएमके के साथ चुनाव में जाने के पक्ष में नहीं था, खासकर तमिलनाडु के कांग्रेसी। मगर अंत में राहुल गांधी को मानना पड़ा और कांग्रेस डीएमके का गठबंधन हुआ। अब देखना है कि तमिलनाडु की राजनीति क्या करवट लेती है। कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि कांग्रेस को एक्टर विजय के साथ जाना चाहिए हम अगली लोकसभा में तमिलनाडु की सभी 39 सीटें जीत सकते हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी अब  तृणमूल कांग्रेस की तरफ से  नरम हैं और भारतीय जनता पार्टी पर बंगाल में वोट चोरी के साथ साथ सरकार चोरी का आरोप लगा दिया है। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तो कोलकाता ही पहुंच गए। कुल मिलाकर यहां पर इंडिया गठबंधन पर एकसाथ दिखाई दे रहा है। मगर अगले चुनाव तक क्या होगा यह अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा टेस्ट उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव में होना है। यहां देखना होगा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एकसाथ लड़तीं है या अलग-अलग।
राहुल और अखिलेश पहले भी एक साथ लड़ चुके हैं। कांग्रेस अकेले भी लड़ चुकी है।अभी लोकसभा में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के 6 सांसद हैं।समाजवादी पार्टी के 37 सांसद मिलाकर कुल 43 सांसद होते हैं, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दिलचस्प हो सकता है। लेकिन इस सब के लिए इंडिया गठबंधन को 2027 और उसके आगे तक जिंदा रहना पड़ेगा।

बात करें तमिलनाडु तो वहां  कांग्रेस के एक वर्ग ने चुनाव से पहले टीवीके के साथ गठबंधन करने की इच्छा खुलकर व्यक्त की थी, लेकिन अब जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, तो उसने टीवीके का समर्थन किया है।जहां कुछ विशेषज्ञ इसे "तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का निर्णय" मानते हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि "यह एक अवसरवादी निर्णय है, नीतिगत निर्णय नहीं।"विजय की नवगठित पार्टी, जिसने हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाग लिया था, उसने 108 सीटें जीती हैं।कांग्रेस ने टीवीके को सरकार बनाने में समर्थन दिया है। डीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 5 सीटें जीती हैं।

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरीश चोडंकर के नाम से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि पार्टी टीवीके का समर्थन इस शर्त पर करेगी कि "भारतीय संविधान में विश्वास न रखने वाली सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखा जाए।"वे आगे  कहते कि वे तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। वे इसे ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करना चाहते हैं।"अपने बयान में गिरीश चोडंकर ने कहा, "यह गठबंधन आपसी सम्मान, उचित हिस्सेदारी और दोनों पक्षों की ज़िम्मेदारी की भावना पर आधारित है। यह न केवल वर्तमान सरकार के गठन के लिए बल्कि भविष्य के स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के लिए भी जारी रहेगा।"
 
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के समर्थन को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में पत्रकार मालन ने कहा, "कांग्रेस द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक टीवीके को समर्थन देने का कारण शायद आगामी चुनावों में अधिक सीटें जीतना हो सकता है। उन्हें लगता है कि विजय के साथ गठबंधन करने से उन्हें आसानी होगी। उन्होंने डीएमके को अपने भविष्य के रुख़ से अवगत कराने के लिए भी ऐसा कहा होगा।"तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की सबसे बड़ी सहयोगी रही है।इंदिरा गांधी के समय से लेकर राहुल गांधी के वर्तमान युग तक, कुछ मतभेदों के बावजूद डीएमके-कांग्रेस संबंध लंबे समय तक कायम रहे हैं।डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बीच का रिश्ता भी तमिलनाडु में कई बार चर्चा का विषय रहा है। दोनों ने सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एक-दूसरे को "भाई" कहा है।

एलंगोवन राजशेखरन ने राज्य की बड़ी पार्टियों का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा, "कांग्रेस ने 'इंडिया' गठबंधन में शामिल पार्टियों के खिलाफ काम किया। राज्य की पार्टियां कांग्रेस से नाराज़ हो गई हैं। इस तरह के रवैये के साथ, कांग्रेस पार्टी कभी भी भाजपा गठबंधन के विकल्प के रूप में उभर नहीं पाएगी। कांग्रेस ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है।"
 
जा मीडिया ने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस के इस फैसले से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।हालांकि, उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता युवा पीढ़ी के नेताओं से सहमत नहीं हैं। वे इस अवसर का लाभ उठाकर पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं। 1967 में तमिलनाडु में डीएमके के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस ने सरकार में कोई भूमिका नहीं निभाई है। अब यह स्थिति बदल सकती है।"
 
हालांकि, कांग्रेस के मोहन कुमारमंगलम का कहना है कि मंत्रिमंडल में भूमिका उनके लिए कोई शर्त नहीं है।एलंगोवन राजशेखरन का कहना है कि कांग्रेस की यह शर्त कि "सांप्रदायिक ताकतें जो भारतीय संविधान में विश्वास नहीं करतीं" इस गठबंधन में शामिल न हों, अस्वीकार्य है।वे कहते हैं, "अगर विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने का फैसला करते हैं तो कांग्रेस क्या करेगी?"

चेन्नई इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च की वरिष्ठ प्रोफेसर आनंदी कहती हैं, "टीवीके-कांग्रेस गुट ने नीतियों पर क्या चर्चा की? दोनों पक्षों ने निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण, भाषा नीति, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद आदि पर क्या बात की? यह सवाल उठता है कि क्या वे ऐसी आपातकालीन स्थिति में इन विषयों पर चर्चा कर सकते थे। यह तो सिर्फ संख्या का खेल है।"मोहन कुमारमंगलम कहते हैं, "विजय ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनका राजनीतिक शत्रु भाजपा है। हमने अपने समर्थन की शर्त यह रखी है कि सांप्रदायिक ताकतें गठबंधन में शामिल न हों। इसका मतलब है कि भाजपा को गठबंधन में नहीं आना चाहिए।"

इंडिया गठबंधन में अब विजय आएंगे या डीएमके निकलेगी ये भी एक बड़ा सवाल है राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए गठित 'इंडिया' गठबंधन का क्या होगा?के सवाल पर मालन कहते हैं, "विजय इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। हालांकि उस गठबंधन में शामिल पार्टियां अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के मुद्दे पर एकजुट हैं। हालांकि, अब अगर टीवीके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल हो जाता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि डीएमके गठबंधन में रहेगी या नहीं। इसका समाधान अगले लोकसभा चुनावों तक हो सकता है।"
 
मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "डीएमके की नीति भाजपा के खिलाफ नहीं है। ऐसे में वे 'इंडिया' गठबंधन में क्यों नहीं शामिल होते? दोनों दलों (टीवीके और डीएमके) को एक साथ आकर भाजपा का विरोध करना चाहिए। 'इंडिया' गठबंधन में हर तरह की नीतियों वाले दल शामिल हैं। क्या डीएमके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बजाय भाजपा के साथ गठबंधन करेगी? भविष्य में कुछ भी हो सकता है।"



अशोक भाटिया 
लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार 
वसई पूर्व, मुम्बई (महाराष्ट्र)  


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