नज़्म
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क़ पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
फूल, किताबें और एक तस्वीर...
-
हमारे कमरे में क़दम रखते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है...फ़र्श पर बिछी चांदनी
पर...गहरे हरे रंग की ज़मीन पर हल्के बादामी रंग के बड़े-बड़े फूल बहुत ही
ख़ूब...
