नज़्म
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क़ पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
अपना घर...
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*डॉ फ़िरदौस खान*जब हम अपनी एक क़रीबी रिश्तेदार के घर जाते हैं, तो रास्ते में
एक घर पड़ता है. यूं तो वहां और भी घर हैं, लेकिन हमें यह घर बहुत अच्छा लगता
है....
