कबीर की खोज

Posted Star News Agency Monday, June 29, 2026



प्रो० रामवचन राय
मध्यकाल के निर्गुणपंथी संत कबीर दास काशी में पैदा हुए, वहाँ रहे। बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के मगहर में उनका अंतिम समय बीता। इस बीच बिहार के अनेक क्षेत्रों में उनका आना-जाना होता रहा। बिहार आने का एक दिलचस्प प्रसंग कबीर साहेब के साथ जुड़ा बताया जाता है। काशी में उनके सत्संग में अनेक जगहों से लोग आते थे। इन भक्तों में कुछ लोग सेवादार बनकर आश्रम में ही रहने लगे। इन्हीं लोगों में एक भक्त बिहार से सीवान के धनौती गाँव के थे। एक दिन सेवादार भक्तों के बीच किसी बात पर कहा-सुनी हुई। भोजन से पहले सब एक साथ मिल कर 'बीजक' (कबीर-वाणी) का पाठ करते थे। उस दिन बीजक-पाठ और पदों के गायन के बाद 'बीजक' लाल-कपड़े में लपेट कर यथा-स्थान रख दिया गया। सुबह लोग उठे तो देखा- 'बीजक' वहाँ नहीं था। खोज शुरू हुई। सेवादारों में एक शख्स वहाँ नहीं था। उसका नाम भगवान दास था जो सीवान के धनौती गाँव का रहने वाला था। कबीर साहेब तक‌ यह बात पहुंची। शक हुआ कि सेवादारों के बीच झगड़े के बाद वह नाराज चल रहा था। रात में सबके सोने के बाद 'बीजक' लेकर वही भाग गया।

परेशानी यह थी कि 'बीजक' की वह पहली हस्तलिखित प्रति थी, जिसका पाठ और गायन सुबह-शाम भक्तों के बीच होता था। अतः कुछ शिष्यों के साथ कबीर साहेब भगवान दास की खोज में उसके गाँव धनौती पहुंचे थे। लेकिन इनके पहुंचने की खबर भगवान दास को मिल गयी और वह गाँव से भाग गये। कबीर ने कहा- चलो यहाँ से। वह भगवान दास नहीं भग्गू दास है। यह नाम कबीर-साहित्य में जहाँ-तहां मिलता है। 90 के दशक में धनौती मठ की जमीनों पर कब्जा करने का विवाद शुरू हुआ तो जे.पी. आंदोलन में काम करने वाले 77 के चुनाव में मीरगंज के विधायक बने हमलोगों के मित्र भवेश चंद्र प्रसाद ने एक प्रसंग में बताया था कि धनौती का कबीर मठ उनके परिवार का है। उनके पूर्वजों ने बनाया था। किंतु भगवान दास के नाम और कबीर दास से जुड़े प्रसंग का पता उन्हें नहीं था। मैंने जब 'बीजक' प्रसंग की चर्चा की और भग्गू दास का प्रसंग सुनाया तो भवेश जी आह्लादित हो उठे। भगवान दास उनके लकड़दादा थे जो काशी में कबीर के यहां रहे। धनौती का कबीर मठ उस यात्रा की निशानी है, जो बाद में भक्तों और अनुयायियों द्वारा स्थापित हुआ। बिहार में ऐसे कई मठ स्थापित हुए जहां स्वयं कबीर सत्संग करने गए थे अथवा अपनी यात्राओं के दौरान गये थे। सीवान के धनौती के अलावा पटना के फतुहा समस्तीपुर के रोसड़ा के साथ मधुबनी, सहरसा और सुपौल का भी नाम लिया जाता है। यही कारण है कि आज भी उत्तर बिहार में कबीर पंथ के अनुयायियों की संख्या ज्यादा है। खासकर पिछड़े, अतिपिछड़े और दलित समाज में कबीर की सबसे अधिक पैठ है। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर भारत में सामाजिक परिवर्तन लाने में कबीर की क्रांतिकारी भूमिका है।

वस्तुतः कबीर एक साथ बहुत कुछ हैं। वे संत हैं, कवि हैं, समाज सुधारक हैं, क्रांतिकारी हैं, गृहस्थ और कारीगर (बुनकर) हैं। कपड़ा बुनना उनका पेशा था। इसलिए पेट की चिंता उन्हें नहीं थी, दूसरे संतों की तरह। उनका स्वावलंबन स्वाभिमान से आगे अक्खड़ता की सीमा तक पहुंच गया था। इसलिए वे सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक पाखंडों और सत्ता के दमन को चुनौती देते थे। पंडितो, पुरोहितों, मौलानाओं और तत्कालीन शासक इब्राहिम लोदी के समक्ष भी कभी नहीं झुके। संभवतः कबीर की इस अक्खड़ता और क्रांतिकारी सोच ने समाज के प्रभुवर्ग को विचलित किया तथा उन्होंने कबीर की उपेक्षा की। इसलिए बहुत दिनों तक कबीर मठों में बंद रहे। उनके भक्त वहीं बैठकर उनके पद गाते थे और संगत-पंगत करते थे। वहीं से लोकजीवन में उनका प्रवेश हुआ। धीरे-धीरे उनकी ख्याति देश देशांतर में फैलती गई। प्रबुद्ध समाज का ध्यान कबीर की ओर गया। लेकिन हिंदी के अधिकांश आचार्यों का द्वार उनके लिए वर्षों तक बंद था। हिंदी के शीर्ष आलोचक पं. रामचंद्र शुक्ल ने अपने आलोचना-ग्रंथ 'त्रिवेणी' में कबीर को स्थान नहीं दिया। उसमें सूरदास, तुलसीदास और जायसी थे, लेकिन कबीर शुक्ल जी की गंभीर उपेक्षा के शिकार हुए। नतीजा हुआ कि कबीर के लिए विश्वविद्यालय का दरवाजा बहुत बाद में खुला। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह दरवाजा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने खोला - कबीर पुस्तक लिखकर। लेकिन मैं इससे असमत हूं। कबीर को विश्वविद्यालय के छात्रों, अध्यापकों और अन्य प्रबुद्ध हिंदी प्रेमियों में ले जाने का प्रयास द्विवेदी जी ने जरूर किया, लेकिन यह पहला प्रयास नहीं था। हिंदी वालों को यह श्रेय नहीं दिया जा सकता। 
 
मेरा मानना है कि कबीर को खोजने, पढ़ने, विश्लेषण करने और प्रकाशित कर प्रबुद्ध वर्ग तक पहुंचाने का काम पहली बार एक बांग्ला-भाषी विद्वान ने किया। वे थे आचार्य क्षितिमोहन सेन, जो शांतिनिकेतन में भारतीय संस्कृति और दर्शन के अध्यापक थे। वे आज के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन के नाना थे। कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर की प्रेरणा से उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर लगभग दो सौ मठों के कबीर पंथी साधुओं से मुलाकात की और वहां से कबीर संबंधी पुस्तकों का संग्रह किया। फिर उनके पदों का परस्पर मिलान कर बांग्ला में चार खंडों में कबीर वाणी का प्रकाशन कराया जो कबीर का बोलपुर संस्करण कहा जाता है। इसका पहला खंड अक्टूबर 1910 ई. में, दूसरा खंड जनवरी 1911 ई. में, तीसरा खंड मई 1911 ई. में और चौथा खंड अगस्त1911 ई. में प्रकाशित हुआ। इस तरह आचार्य क्षितिमोहन सेन ने कुल चार खंडों में कबीर की उपलब्ध रचनाओं का प्रकाशन कराया। इस प्रकार आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रयास से कबीर बौद्धिक समाज के सामने आए। इससे पहले वे मठों के माध्यम से लोक जीवन में जन-श्रृति बन कर प्रचलित थे।

आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा संकलित पदों से ही एक सौ पदों को चुनकर रवींद्र नाथ टैगोर ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ' हंड्रेड पोयम्स ऑफ़ कबीर ' नामक पुस्तक छपावाई। तब तक उन्हें 'गीतांजलि' पर नोबेल पुरस्कार (1913 ई.) मिल चुका था। इस बार  'गीतांजलि' के बहाने फिर एक बार कबीर चर्चा में आ गए। दरअसल गीतांजलि की भूमिका अंग्रेजी के प्रख्यात कवि डब्लू.बी.येट्स. ने लिखी थी। कहते हैं कि इसके अंग्रेजी अनुवाद में उनका योगदान भी था। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि एजरा पाउंड ने पत्र लिख कर डब्लू.बी.येट्स से पूछा कि इस पुस्तक में क्या है कि जिस पर फिदा होकर तुमने ऐसी जबरदस्त भूमिका लिखी? येट्स का जवाब था कि गीतांजलि में मुझे नव-रहस्यवाद(Neo-Mysticism) की झलक मिली जो आज की दुनिया के लिए एक संदेश है। फिर एजरा पाउंड ने दूसरा पत्र लिखा - तब तुमने कबीर को नहीं पढ़ा है। कबीर तो पहले ही यह सब कुछ कह गए हैं। अब मैं कबीर पर पुस्तक लिखने जा रहा हूं। अंग्रेजी के दो महान कवियों के बीच जब गीतांजलि को लेकर पत्राचार हो रहा था, एजरा पाउंड इटली की जेल में थे। फिर मानसिक रोग के इलाज के लिए वाशिंगटन लाये गए और कबीर पर लिखने का उनका सपना पूरा नहीं हुआ।

शांतिनिकेतन में आचार्य क्षितिमोहन सेन के समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी वहां हिंदी पढ़ाते थे। उन्होंने आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा कबीर मठों से संकलित पदों के आधार पर ही ' कबीर ' नामक पुस्तक लिखी, जिससे हिंदी पाठकों के बीच कबीर की चर्चा शुरू हुई और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनका प्रवेश हुआ। किंतु कबीर आज भी बहुतों के लिए प्रश्न बने हुए हैं। उन्हीं के शब्दों में -
हद-हद करते सब गए, बेहद गया न कोय, 
बेहद के मैदान में, रहा कबीरा सोय। 


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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