"इक तानपुरा मटमैला सा
इक सीधे पल्ले की साड़ी
इक चोटी लाल परांदे संग
माथे पर बिंदिया की लाली
सादी चूड़ी,जगमग कंगन
हंसली,पायल,छम छम करधन
एक औरत,काली सी औरत
दो आंखें रौशन सी आँखें
इक गर्दन ऊंची उठी हुई
आवाज़ हमेशा नपी तुली
वो एक बदन,जिसमें कितने
इतिहास उतरते आते थे
मानव क्या ,असुर राक्षस क्या
देवता कई मिल जाते थे!
वो चलती फिरती गाथा थी
वो लोकभूमि की महाव्यास
वो कठिन शास्त्र का सरल भाष्य
वो कृष्ण बंसरी का प्रकाश!
जो गूँज रही थी नगर नगर
वो जंगल मिट्टी की जाई
अब लील गया आकाश जिसे
कहते थे हम "तीजन बाई"..!!
-ओमा अक्
