बचपन में पढाई के दौरान कक्षा नौ तक गणित के विषय से हमें बहुत डर लगता था। यूँ समझिए जैसे बिल्ली को देखकर चूहा भागता है वही हाल हमारा होता था, कभी गणित में पास नहीं हुए हमेशा बैक आती थी और मार पडती थी सो अलग।
एक दिन की बात है हमारे टीचर एक सवाल बोर्ड पर समझा रहे थे और उन्हें हमारी काबिलियत का पता था लिहाजा जान पूछकर हमसे उसी सवाल के बारे में पूछते और हम ढुंट की तरह उल्टे सीधे जवाब देते या फिर खामोश हो जाते और पूरी क्लास में हमारा मजाक बनाया जाता था।
टीचर हमसे बोले तुम्हें गणित समझ क्यूँ नहीं आता है.? हम बोले..जी बहुत डर लगता है, वो बोले डर किस बात का लगता है। हमने बडी मासूमियत से बोला- "मार का डर लगता है।" वो बोले "मार का डर।" हम बोले स्कूल में सवाल हल नहीं होता तो आपसे पिटते हैं और घर पर पापा से, लेकिन क्या करूँ समझ ही नहीं आता।
थोडी देर सोचकर वो बोले ठीक है बेटा आज के बाद हम आपको न डाँटेंगे और ना ही मारेंगे। बस एक बात हमारी मानोगे। हमने कहा- जी। वो बोले- अपने मन से डर को निकाल दो। देखो डर के आगे जीत है, आप कोई भी सवाल को अपने आप हल करो, एक बार नहीं आयेगा, दो बार नहीं आयेगा। आखिर कब तक समझ नहीं आयेगा। वो हमारे मनोविज्ञान को समझ चुके थे। हमने कोशिश की।कुछ दिन तो समझ नहीं आया और फिर बडे प्यार से हमको उन्हीं सवालों को समझाते रहे और धीरे धीरे हमारी झिझक और डर दिल से निकल गया और कुछ ही महीनों में वही गणित जो हमको हव्वा लगता था हमारा मनपसंद सब्जैक्ट बन गया, आलम ये हो गया कि कठिन से कठिन सवाल भी चुटकियों में हल करने लगे और इस नाचीज ने दसवीं और इंटर बोर्ड की परीक्षा में स्कूल में सबसे ज्यादा अंकों से पास की थी।
आज भी वो मेरे टीचर वो मेरे गुरू जब भी याद आते हैं उनके प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है जिन्होंने मुझे एक सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया। मौजूदा दौर में जब न पढने वाले रहे न पढाने वाले रहे बस सबका ध्येय केवल और केवल धन कमाना ही रह गया है तो बडा कोफ्त होता है और उस दौर की यादों को समेटे हुए खुद को आज खुशकिस्मत समझता हूँ।
