वैभव का सबसे बड़ा छल यह है कि वह अपने को सफलता की तरह प्रस्तुत करता है। जबकि कई बार वह केवल संग्रह होता है, उपलब्धि नहीं।
एक पेड़ कभी अपने फलों की गिनती नहीं करता। यदि वह गिनने लगे, तो शायद छाया देना भूल जाए। तरूवर फल नहीं खात है....!
नदी अपने किनारों का स्वामित्व नहीं लिखवाती। इसलिए समुद्र तक पहुँच जाती है। तालाब जितना अपने पानी को बचाना चाहता है, उतना ही जल्दी हरा पड़ने लगता है।
मैंने कई बड़े घर देखे हैं, जिनमें लौटने की इच्छा नहीं हुई। और कई मिट्टी के आँगन, जहाँ से उठते हुए लगा कि कुछ अपना वहीं छूट गया है। वैभव घर को बड़ा कर सकता है, गृह नहीं।
एक पुरानी लालटेन, जो वर्षों तक किसी किसान के साथ खेत जाती रही, अपने शीशे की चमक पर कभी गर्व नहीं करती। उसे मालूम है कि उसकी रोशनी का मूल्य अँधेरे ने तय किया है।
भूल से भी वैभव को मत बाँचना। वह अक्सर आदमी की ऊँचाई नहीं, उसके चारों ओर खड़ी चीज़ों की ऊँचाई बताता है।
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वैभव का कोई विरुद्धार्थी नहीं होता। शायद इसलिए कि उसका उलटा अभाव नहीं, विनम्रता है।
रूसी उपन्यासों का एक बूढ़ा पात्र याद आता है। उसके पास बची हुई चीज़ों की सूची बहुत छोटी थी—एक पुराना कोट, लकड़ी की कुर्सी, खिड़की पर रखा एक गमला और देर तक जलने वाला एक दीपक। लेकिन जब कोई अतिथि उसके घर आता, वह अपनी कुर्सी अतिथि को दे देता और स्वयं चौखट पर बैठ जाता। उस दिन समझ में आया कि कुर्सी का वैभव उस पर बैठने में नहीं, उसे छोड़ देने में था। चीज़ें जितनी अपनी रहती हैं, उतनी बड़ी नहीं होतीं; जितनी किसी और की हो जाती हैं, उतनी बड़ी हो जाती हैं।
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मनुष्य का असली वैभव वह है, जिसे खो देने के बाद भी वह थोड़ा-सा मनुष्य बना रहे। जैसे पेड़ पतझर के बाद भी पेड़ रहता है। जैसे खाली घोंसला भी पक्षियों की स्मृति सँभाले रहता है। जैसे एक बूढ़ी माँ के हाथ, जिनमें अब आटा गूँधने की ताक़त नहीं बची, फिर भी घर की सबसे बड़ी रोटी वही हैं।
अंततः, वैभव वह नहीं जो आँखों को चकाचौंध कर दे; वैभव वह है जिसके सामने अहंकार अपनी आवाज़ धीमी कर ले।
इसलिए भूल से भी वैभव को मत बाँचना। कई बार जो सबसे अधिक चमकता है, उसके भीतर सबसे अधिक अँधेरा जमा होता है।
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किताबों में बड़े-बड़े महल मिलते हैं, लेकिन पाठकों को याद अक्सर वह छोटी-सी मेज़ रह जाती है, जिस पर कोई पात्र अपनी आख़िरी रोटी दो हिस्सों में बाँट देता है।
साहित्य ने हमें सिखाया है कि वैभव का माप कमरों की संख्या से नहीं, उस एक अतिरिक्त थाली से होता है जो हमेशा किसी अजनबी के लिए बची रहती है।
इसलिए भूल से भी वैभव को मत बाँचिए।
वह सोने की चमक में कम, किसी के लिए बचाकर रखे गए एक कौर, एक कुर्सी, एक कंबल और एक वाक्य में अधिक दिखाई देता है।
जो वैभव बाँटते ही छोटा हो जाए, वह वैभव नहीं, संग्रह है। जो बाँटने पर और बढ़ जाए, वही मनुष्य का असली ऐश्वर्य है।
-जयप्रकाश मानस
