मन का यमुना तट सूना है
निःशब्द बांसुरी मौन हो गई।
रहे देखते स्मृतियों के दर्पण
मधु मिलन यामिनी बीत गईं।
गर्द गुबार बस शेष बचा है
मन के नीरव वीरानेपन में
कोलाहल है रुदन क्रन्दन है
मणि माणिक लड़ियाँ टूट गईं।
सांस सांस पर काल के पहरे
उर के स्पंदन क्षीण हो गए
श्रृंगार अधूरा पड़ा रह गया
कुसमित कलियाँ सूख गईं।
गिनते रहे पदचिह्न पुराने
आहट प्रियतम के आने की
प्रीति भरी गगरिया रीत गई।
निश्चेष्ट पड़ा है चंदन सा तन
अभिलाषाओं के मधुवन में
मनभावन की बस्ती छूट गई।
-डाॅ० स्वामी विजयानन्द
