डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’ ने पुरस्कार प्राप्त होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि मेरी धर्मपुत्री फ़िरदौस ख़ान ने इस उपन्यास का भावानुवाद करने में मेरी बड़ी सहायता की है। उसे हार्दिक शुभाशीष। सदा प्रसन्न और सक्रिय जीवन जिये।
उनके अनुसार ‘रॉबिन्सन क्रूसो' लन्दन के सुप्रसिद्ध लेखक डैनियल डेफॉ की रचना है। यह उपन्यास सर्वप्रथम 25 अप्रैल 1719 को प्रकाशित हुआ था। यह अंग्रेज़ी का प्रथम उपन्यास माना जाता है। यह उपन्यास रॉबिन्सन क्रूसो नामक एक अंग्रेज़ पात्र का यात्रा वृतांत है, जो एक उष्णकटिबंधीय द्वीप पर 28 वर्ष से अधिक समय तक रहा। वास्तव में यह एक काल्पनिक आत्मकथा है, साथ ही इसमें डायरी और यात्रावृत्त के तत्व भी मिले हुए हैं। काल्पनिक होते हुए पाठक को यही लगता है कि वह एक वास्तविक आत्मकथा पढ़ रहा है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सबकुछ उसकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है।
डैनियल डेफॉ का जन्म 13 दिसम्बर 1660 को क्रिपलगेट (लन्दन) में हुआ था। वे अंग्रेज़ी पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार थे। उन्होंने धर्म, परालौकिक शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, अपराध और आर्थिक आदि विषयों पर पाँच सौ से अधिक पुस्तकें और लेख लिखे। उन्हें आर्थिक मामलों की पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जाता है।
उनके पिता जेम डेफॉ चर्बी से बत्ती बनाने का काम करते थे। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनके काम में सहायता करे। किन्तु डैनियल डेफॉ को इसमें तनिक भी रुचि नहीं थी। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उन्होंने हौजरी और इससे बने वस्त्रों का व्यवसाय किया। उन्होंने मदिरा का व्यवसाय किया। किन्तु इन कार्यों से शीघ्र ही उनका मोहभंग हो जाता था। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। लेखन में उनकी रुचि थी। सर्वप्रथम उन्हें 1697 में उस समय सफ़लता प्राप्त हुई, जब सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों पर उनके लेखों की श्रृंखला प्रकाशित हुई। इसके पश्चात 1719 से 1724 में उनके अनेक उपन्यास प्रकाशित हुए, जिससे विश्वभर में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 1719 में प्रकाशित उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उन्हें महान उपन्यासकारों की श्रेणी में सम्मिलित कर दिया। अपनी विशिष्ट आत्मकथात्मक विधा के कारण यह उपन्यास आज भी लोकप्रिय है।
डैनियल डेफॉ का जन्म 13 दिसम्बर 1660 को क्रिपलगेट (लन्दन) में हुआ था। वे अंग्रेज़ी पत्रकार, लेखक और उपन्यासकार थे। उन्होंने धर्म, परालौकिक शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति, अपराध और आर्थिक आदि विषयों पर पाँच सौ से अधिक पुस्तकें और लेख लिखे। उन्हें आर्थिक मामलों की पत्रकारिता का अग्रदूत भी माना जाता है।
उनके पिता जेम डेफॉ चर्बी से बत्ती बनाने का काम करते थे। उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र भी उनके काम में सहायता करे। किन्तु डैनियल डेफॉ को इसमें तनिक भी रुचि नहीं थी। उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उन्होंने हौजरी और इससे बने वस्त्रों का व्यवसाय किया। उन्होंने मदिरा का व्यवसाय किया। किन्तु इन कार्यों से शीघ्र ही उनका मोहभंग हो जाता था। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। लेखन में उनकी रुचि थी। सर्वप्रथम उन्हें 1697 में उस समय सफ़लता प्राप्त हुई, जब सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों पर उनके लेखों की श्रृंखला प्रकाशित हुई। इसके पश्चात 1719 से 1724 में उनके अनेक उपन्यास प्रकाशित हुए, जिससे विश्वभर में उन्हें ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 1719 में प्रकाशित उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उन्हें महान उपन्यासकारों की श्रेणी में सम्मिलित कर दिया। अपनी विशिष्ट आत्मकथात्मक विधा के कारण यह उपन्यास आज भी लोकप्रिय है।
इस उपन्यास में समुद्र यात्राओं के साथ-साथ एक निर्जन द्वीप में रहने के संघर्ष एवं पराक्रम का सजीव चित्रण किया गया है। कहा जाता है कि स्कॉटिश जहाज़ के डूबने पर शेष बचे अलेक्जेंडर सेलकर्क को आधार बनाकर यह उपन्यास लिखा गया था। अलेकजेंडर सेलकार्क एक अंग्रेज़ जहाजी था। यात्रा के समय तूफ़ान में उसका जहाज़ डूब गया था। जहाज़ के शेष सब यात्री डूबकर मर गए, परन्तु वह बच गया। उसने एक निर्जन द्वीप पर शरण ली। इस द्वीप पर उसके अतिरिक्त कोई और नहीं था। इस निर्जन स्थान पर वह अनेक वर्षों तक रहा। अंत में इस स्थान से उसका उद्धार हुआ और वह सकुशल अपने देश पहुँचा।
डैनियल डेफॉ का निजी जीवन भी दुखों से भरा हुआ था। उनके माता-पिता के आपसी संबंध अच्छे नहीं थे, जिसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनका विवाह मैरी टफ़ले के साथ हुआ था। उनकी पत्नी को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। व्यवसाय में लाभ न होने के कारण वे ऋण के बोझ तले दब गए थे। ऐसे समय में उनके उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ ने उनका बहुत साथ दिया। इस उपन्यास से उन्हें सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया। इसे विश्वभर में पढ़ा गया। इसके विक्रय से उन्हें अच्छी आय हुई और उन्होंने अपना संपूर्ण ऋण चुका दिया। जीवन के अंतिम समय में उनके बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था। 24 अप्रैल 1931 को लन्दन में उनका निधन हुआ।
डैनियल डेफॉ ने अपने जीवन में धर्म और नैतिकता को विशेष स्थान दिया। इस उपन्यास का समापन भी वे नीतिपरक उपदेश और शिक्षा के साथ ही करते हैं। उनके लेखन पर आदर्श और नीति का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। उनकी सभी कथाओं का अंत सुखदायी है। उनकी कथाओं में धर्म के उपदेश हैं, जो पाठकों को परमार्थ के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी कथाओं में अन्याय एवं असत्य की पराजय होती है तथा सत्य एवं न्याय की विजय होती है। इस दृष्टि से वे भारतीय दर्शन के आदिक निकट प्रतीत होते हैं।
मूल उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’ के प्रकाशन के लगभग 141 वर्ष पश्चात भारत में श्री देवदत्त तिवारी ने इसका भावानुवाद किया। ‘रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’ नाम से उनकी यह पुस्तक वर्ष 1860 में बनारस मेडिकल कॉलेज के श्री जेजे माइकल प्रिंटर से प्रकाशित हुई थी। इसमें ‘क्रूसो’ के स्थान पर ‘बासो’ लिखा जाना, संभवत टंकण आदि की त्रुटि रही होगी, परन्तु इससे पुस्तक की महत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अव मूल पुस्तक के लगभग 306 वर्ष पश्चात और भावानुवाद के प्रकाशन के लगभग 165 वर्ष पश्चात पुनः इसका भावानुवाद किया गया है। श्री तिवारी जी के भावानुवाद और इस नवीन भावानुवाद में बहुत अंतर है। प्रथम अंतर इसकी भाषा शैली के विषय में है अर्थात श्री देवदत्त तिवारी ने तत्कालीन भाषा शैली में इसका भावानुवाद किया, जो पूर्वांचली प्रभाव और कथावाचकों की शैली से प्रभावित है। उस समय की भाषा और वर्तमान समय की भाषा में बहुत अंतर आ चुका है। इसलिए यह नवीन पुस्तक आज की भाषा में है। नवीन पुस्तक के भावानुवाद में पूर्वोक्त पुस्तक के भावानुवाद की ‘आत्मा’ को यथावत रखा गया है। दूसरा और सबसे बड़ा अंतर यह है कि पूर्वोक्त पुस्तक में बहुत कुछ छूट गया था अथवा छोड़ दिया गया था। इस नवीन पुस्तक में मूल उपन्यास के उन सभी महत्वपूर्ण अंशों, विशेषकर अंतिम भाग को भी सम्मिलित किया गया है, जो पूर्व भावानुवाद में नहीं है। इसमें पुस्तक का संपूर्ण भावानुवाद किया गया है। इसमें अनावश्यक विस्तार के अतिरिक्त और कोई भी अंश छोड़ा नहीं गया। संपूर्ण घटनाओं का वर्णन इसमें सम्मिलित है। नायक रॉबिन्सन क्रूसो की तत्कालीन मनोस्थिति को अधिक मार्मिक बनाने के लिए मैंने अध्याय दो, चार, सात और आठ में कुछ स्वरचित दोहे लिखे हैं, परन्तु वे कथा के प्रवाह और नायक के भावों को बाधित नहीं करते अपितु इनसे रसमयता बढ़ती ही है।
उपन्यास के नायक की अपराजेय जिजीविषा उच्च स्तर की है, परन्तु आपत्ति आने पर वह सदा अपने माता-पिता के उपदेशों का स्मरण करता है। विपत्तियों से घिर जाने पर वह किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता, अपितु कुछ समय के असमंजस के बाद तुरंत आपत्ति-निवारण का समाधान खोज लेता है। उपन्यास में तत्कालीन परिवेश यूरोपीय यात्रियों की साहसिक व्यापारिक यात्राएँ, समुद्री लुटेरे, कृषि, मानवभक्षी जातियाँ, यूरोपीय सभ्यता का प्रथम चरण आदि बहुत कुछ यहाँ रूपायित हुआ है। ध्यातव्य है कि भारत उस समय तक सभ्यता के कई स्वर्णिम युग पार कर चुका था ऐसे में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' की पंक्तियाँ अधिक प्रासंगिक लगतीं हैं-
"जब थे दिगम्बर रूप में वे जंगलों में घूमते
प्रासाद-केतन पट हमारे व्योम को थे चूमते”
फिर भी यह उपन्यास एक युग का समग्र परिवेश प्रस्तुत करने में सहायक हुआ है।
ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य यूरोपीय व्यापारियों का सम्पर्क पहले बंगाल से हुआ था। मीर जाफ़र की ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की धूर्तता के कारण उनका पहला राज्य भी बंगाल में ही बना। अतः पारस्परिक विनिमय में साहित्य और संस्कृति का प्रभाव भी एक दूसरे पर पड़ा। इसलिए 'रॉबिन्सन क्रूसो' का प्रथम अनुवाद बांग्ला भाषा में ही हुआ था, परन्तु उसके अनुवादकों के विषय में कोई जानकारी हमारे पास नहीं है।
