"मुहम्मद रफ़ी साहब इतने अच्छे इंसान थे कि क्या कहना.. वो कहते हैं न भगवान के आदमी... वो वही थे..!" पद्मविभूषण से सम्मानित अतुलनीय गायिका आशा भोंसले ने कभी अपने एक साक्षात्कार में यह बात बड़ी सच्चाई से कही थी... भारत रत्न लता मंगेशकर भी रफ़ी साहब को अतुलनीय रूप से सरल इंसान मानती थीं!...महान संगीतकार नौशाद उन्हें मौसिकी का पैगंबर कहते थे तो महेंद्र कपूर से सोनू निगम या अरिजीत तक तो वो भगवान जैसे ही हैं। परन्तु असल जीवन में वह बेहद सरल और शुक्रगुज़ार इंसान थे जिसे बस गाने से मतलब था और वो भी बहुत अच्छा गाने से... क्यों कि उनका ईश्वर तो सुरों में ही उनसे रिश्ता बनाता था।
अब से पूरी एक सदी पहले 24 दिसंबर 1924 को "कोटला सुल्तान सिंह"(तब भारत अब पाकिस्तान) में मुहम्मद रफ़ी का जन्म हुआ... बचपन में एक दरवेश के गाने से मोहित हुए रफ़ी को संगीत ने ख़ुद एक सुरीला दरवेश बना दिया था।
मुहम्मद रफ़ी... जिनको इस दुनिया से गए आज पूरे पैंतालीस साल हो चुके हैं.. मग़र उनकी आवाज़ और अंदाज़ का जादू आज भी संगीतप्रेमियों के सर चढ़ कर बोलता है और उनके गाए गीतों से रेडियो,टीवी,यूट्यूब सब भरे रहते हैं... उनके गीत जिनमें ग़ज़ब का रोमांस है,कामुकता है,प्रेम है,वात्सल्य है,करुणा है,उदासी है,पीड़ा है,हास्य है, मस्ती है और अतुलनीय भक्ति है। यही कारण है कि मुहम्मद रफ़ी के सिनेमा गायकी के लगभग तीस साल के सफ़र में उन्हें पद्मश्री, एक राष्ट्रीय पुरस्कार, छ फिल्म फेयर अवॉर्ड और पंद्रह बार फिल्म फेयर नॉमिनेशन प्राप्त हुए... किन्तु सबसे बड़ी उपलब्धि तो किसी कलाकार की यही होती है कि उसे ख़ास और आम दोनों तरह की जनता से प्रेम और सम्मान मिले...जिस मामले में मुहम्मद रफ़ी दुनिया के कुछ ही गिने चुने कलाकारों में आते हैं... वो नाती से नाना तक सबके दुलारे रहे हैं।
मै जब छोटा था तब मेरे माता पिता को रिकॉर्ड प्लेयर पर खूब गीत सुनने की आदत थी...उन गीतों में एक रिकॉर्ड लगभग रोज़ ही बजता था और वो था फिल्म "बैजू बावरा" का जिसके दो गाने मुझे सुनते सुनते रट गए - "तू गंगा की मौज मै जमुना का धारा"... और "ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले"... दोनों के गायक थे "महान रफ़ी"... लेकिन उस फिल्म का एक गीत जो मुझे केवल पसंद नहीं था बल्की मेरी आत्मा में घुला हुआ था वह था "राग मालकौंस" के उच्च स्वरों से सिहरता हुआ एक अद्भुत भजन जिसे नौशाद अली ने डूब कर संगीतबद्ध किया, शकील बदायूंनी ने हृदय के रक्त से लिखा और मुहम्मद रफ़ी ने अपनी आत्मा से ऐसा गाया कि बस पूरा भारत रोम रोम हर्षित हो उठा..उस गीत के अंतिम अंग में जब कीर्तन होता है उस टुकड़े में रफ़ी साहब ने जिस भावुकता से "मोहे दर्शन भिक्षा दे दो" कहा है वह बेजोड़ है।
रफ़ी साहब का कमाल यह था कि वो पांच वक़्त के नमाज़ी होने के साथ ही किसी भी धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठे रहे... यही कारण है कि जब फिल्मकार अपनी किसी फिल्मी सिचुएशन में किसी मार्मिक हिन्दू भजन को गाने के लिए किसी गायक की कल्पना करता तो उसमें हेमंत कुमार के बाद सबसे पहला नाम मुहम्मद रफ़ी का ही होता था और मुहम्मद रफ़ी इस उत्तरदायित्व को इतनी सच्चाई से निभाते थे कि अभिनेताओं को केवल रफ़ी के भावों का अनुकरण मात्र करना रह जाता था... जिसका जीवंत प्रमाण है फिल्म फिल्म वसंत बहार का वह अद्वितीय देवी भजन जिस पर भारत भूषण को अभिनय करने का अवसर मिला किन्तु यदि आप उस गीत को देख रहे हैं तो अनायास आपकी आँखें बंद हो कर केवल गायन में डूब जाना चाहेंगी... और वह मार्मिक भजन है - "दुनिया न भाए मोहे, अब तो बुला ले, चरणों में चरणों में"...माता काली की प्रतिमा के समक्ष चित्रांकित यह गीत आंखों में आंसुओं की धार लाने को पर्याप्त है।
मुहम्मद रफ़ी में अपनी भारत भूमि के प्रति एक गहरा लगाव था... बंटवारे के बाद भारत में रह जाने का उनका फ़ैसला कोई परिस्थिति जन्य घटना नहीं थी अपितु उनके अंतर्मन का निर्णय था... यह बात उनके अनेक देशभक्ति के गीतों के साथ साथ उस एक भजन में भी उदघोषित होती है जो भारत के सबसे लोकप्रिय कृष्ण भजनों में एक है और जिसके बिना अब तक कि कोई जन्माष्टमी नहीं मनी है - "बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके बृजबाला"... इस गीत को राजेंद्र कृष्ण जैसे अनूठे गीतकार ने जिस तन्मयता से लिखा था उसी तन्मयता से विद्वान संगीतकार रवि साहब ने उसकी धुन भी बनाई थी... पर सोने पर सुहागा तो थी मुहम्मद रफ़ी की दिलफरेब आवाज़ जिसमें गाते हुए उनकी तान में मानो कृष्ण की मुरली गूंज गूंज जाती हो...तभी तो इस एक पंक्ति पर पहुंच कर रफ़ी पूरे भारत का स्वर बन जाते हैं - "अरे! पूरा कर दे(तान) आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया/ कोई नहीं है तुझ भी मोहन भारत का रखवाला रे/ बड़ी देर भई नंदलाला"...!
कहते हैं कि किसी के हृदय में कितना प्रेम छुपा है किसी के प्रति यह तब पता लगता है जब कोई अपने प्रिय को नाम से पुकारता हो... आश्चर्य है कि जिस प्रेम भाव से मुहम्मद रफ़ी ने फिल्मी गीतों में भगवान राम का नाम पुकारा है वह कदाचित ही कोई दूसरा कर सका हो.. शायद यही कारण है कि उनसे अधिक "राम भजन" हिंदी फिल्मों में किसी भी गायक ने नहीं गाए हैं... यदि आपको रफ़ी के श्री राम प्रेम का अनुभव करना हो तो आप उनके गाए किसी भी राम भजन को सुनते हुए उनके "राम" बोलने का अंदाज़ सुनिए..विश्वास करिए आप रोम रोम सिहर उठेंगे... उनके भक्ति गीत - "जय रघुनंदन जय सिया राम" या "मुझे अपनी शरण में लेलो राम" और "बड़ी देर भई बड़ी देर भई, कब लोगे खबर मोरे राम"... इस बात का जीवंत प्रमाण हैं।
भारत में जितने भी बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं लगभग सबके लिए रफ़ी साहब ने ही सफलतम गीत या भजन गाए हैं ... उधारण में होली के त्यौहार पर "तन रंग लो जी आज मन रंग लो" या "होली खेलत नंदलाल बिरज में"... अथवा नवरात्रि में "तूने मुझे बुलाया शेरा वालिए, मै आया मै आया शेरा वालिए"...जिसे वैष्णव माता के रस्ते जाने वाले हर यात्री के मुंह से आज भी सुना जा सकता है... अथवा "हे नाम रे,सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरो वाली, ऊंचे डेरो वाली, बिगड़ी बना दे मेरे नाम"... या शिवरात्रि पर अनन्य शिव भक्ति में डूबा भजन "मोर भंगिया के मनाई दा"..."हे महादेव मेरी लाज रहे/ मेरी लाज रहे तेरा राज रहे/" और "मुझे तो शिव शंकर मिल गए/ किया न जप तप, तीर्थ न घूमा, अपने ही घर मिल गए/"... जन्माष्टमी के मनमोहन पर्व पर "मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे" या "राधिके तूने बंसरी चुराई" या "वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सबकी आंखों का तारा" और "गोविन्दा आला रे आला, ज़रा मटकी संभाल बृजबाला"... देश भर में गणपति पूजा पर घर घर बजने वाला गीत "देवा हो देवा, गणपति देवा तुमसे बढ़ कर कौन, और तुम्हारे भक्त जनों में हमसे बढ़ कर कौन" यह सब मुहम्मद रफ़ी के सुर और लय के साथ ही साथ उनकी पवित्र भावना के भी परिचायक हैं।
हिन्दी उर्दू के अलावा मुहम्मद रफ़ी ने अनेक भारतीय और कुछ विदेशी भाषाओं में गीत गाए हैं... इनमें कई भजन भी हैं जिनमें मराठी ,बंगाली,तेलुगु,पंजाबी जैसी भाषाओं में कई भजन शामिल हैं...और उसमें ही शामिल अनेक सुमधुर गीत "हिंदी की बड़ी बहनों में सबसे करीबी भोजपुरी" भाषा के हैं... यह इतिहास ही है कि भोजपुरी की पहली पहली फिल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" जिसके संगीतकार सुविख्यात "चित्रगुप्त" और गीतकार हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े कवि "शैलेन्द्र" थे और जिसके गीतों को लता मंगेशकर,ऊषा मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली... जिनमें रफ़ी साहब का गाया दर्दभरा गीत -"सोनवा के पिंजरा में बंद भईल हाय राम
चिरई के जियरा उदास
टूट गईल डालिया,छितर गईल खोतवा,
छूट गईल नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा मां" ....सुन कर मन भर आता है... निर्गुण सरीखे इस विदाई गीत में जिस प्रकार से एक पंजाबी उर्दू ज़बान के मुहम्मद रफ़ी ने भोजपुरी की चासनी चटाई है वह सुनते ही बनता है... भोजपुरी में तीस से अधिक गाने गाने वाले मुहम्मद रफ़ी ने जब भोजपुरी भजन गाया तो वह संयोग से भगवान राम की लीला को ही समर्पित था... "हमार संसार" नामक भोजपुरी फिल्म जिसका संगीत "श्याम शर्मा" ने दिया था और गीतनुमा भजन लिखा था देश के प्रमुख प्रगतिशील शायर "मज़रूह सुल्तानपुरी" ने... और इस राम भजन को जब राम के दुलारे रफ़ी साहब ने गाया तो माधुर्य ही माधुर्य बरस गया - "हँसत खेलत प्रभु पुनि लौटे ,
हसत खेलत प्रभु पुनि घर लौटे, संग लखन सिया माई,
अइसन दिन सबके घर आवे, मिले भाई से भाई,
आहो मिले राम भरत दूनू भाई, आहो मिले राम भरत दूनू भाई
फुकलो से ई दिया न बुताई, नेह के जोत जरत चली जाई"।
ये भारत की उदार संस्कृति का ही प्रतीक है कि हिन्दी सिनेमा का सबसे सफल नातिया क़लाम (मुहम्मद साहब की तारीफ़) भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज़ में घर घर गूंजा - "बेक़स पे करम कीजिए सरकार ए मदीना"... वहीं दूसरी तरफ़ भारत के सबसे लोकप्रिय सिनेमाई भजनों में सर्वोत्तम मुहम्मद रफ़ी के नाम दर्ज़ मिलते हैं...फिर वह चाहे "शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली हो" जैसी कालजई भक्ति कव्वाली हो या "मधुर राम का नाम जग में/ भज राम राम राम जग में/" जैसा कीर्तन मुहम्मद रफ़ी सबको हृदय से गाते गए और हृदय में उतारते गए... और उतरते गए इस हिंदुस्तान के हृदय में...कदाचित उस परमात्मा के भी जो भारत का रखवाला है... क्यों कि यह एक अनुपम संयोग ही है कि सबसे अधिक सिने भजन गाने वाले इस मुस्लिम गायक के जीवन का अंतिम सफल गीत भी एक भजन ही था... हां! 31 जुलाई 1980 के दिन जब इस हरदिल अज़ीज़ गायक ने अपनी मुस्कुराती आंखें हमेशा के लिए बंद की... रमज़ान का पवित्र महीना भी अलविदा की ओर था... और गुरुपूर्णिमा का पर्व बीता कर महादेव शिव के श्रवण मास अभी अभी प्रारंभ हुआ था...आकाश से शिवकृपा घनघोर वर्षा के रूप में उतर रही थी...लाखों की भीड़ मुंबई की सड़कों पर उस इंसान की अर्थी के पीछे छतरी लिए भीगती चल रही थी जिसे भगवान ने सिर्फ़ गाने के लिए भेजा था और जाते जाते भी भगवान का ये आदमी अपना अंतिम गीत भगवान राम के चरणों में समर्पित कर गया था जो आज उसकी मृत्यु के बाद सारे देश में गूंज रहा था - "राम जी की निकली सवारी/ राम जी की लीला है न्यारी न्यारी..!"
-ओमा अक्
(मुहम्मद रफ़ी की जन्म शताब्दी और पैंतालीसवीं पुण्यतिथि २१ जुलाई २०२५ पर श्रद्धांजलि रूप में यह स्मृतिपत्र)
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