हुतात्मा वसंत - रजब

Posted Star News Agency Sunday, June 28, 2026



वसंत-रजब ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
दो दोस्तों के शहादत की कहानी
1 जुलाई को वसंत-रजब का शहादत दिवस है। यह कहना उचित होगा कि इतिहास मे यह एकमात्र ऐसी घटना है जहाँ दो मित्रों ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वसंत रजब की मृत्यु 1946 में हुई थी। लेकिन उससे पहले, गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1931 में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यह हमारी स्वतंत्रता की एक निराली मिसाल है।

महात्मा गांधी ने अपने नेतृत्व में दास प्रथा के विरुद्ध संघर्ष को एक रचनात्मक दिशा दी। उन्होंने समाज को 18 रचनात्मक कार्यक्रम दिए। स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष करने वाला प्रत्येक कार्यकर्ता इन 18 सूत्री कार्यक्रमों के प्रति निष्ठावान था। इनमें से एक महत्वपूर्ण बिंदु कौमी एकता था, अर्थात् हिंदू-मुस्लिम एकता। इस स्वतंत्रता संग्राम से निकले योद्धाओं ने वीरतापूर्वक संघर्ष करते हुए समय आने पर हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना स्वयं को बलिदान कर दिया। इनमें से एक महत्वपूर्ण नाम वसंत और रजब नामक दो मित्रों का है!

यह कहानी सन् 1946 की है। गुजरात के अहमदाबाद में रथ यात्रा चल रही थी। रथ यात्रा के जमालपुर इलाके में पहुंचते ही हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव पैदा हो गया और जल्द ही दंगें भड़क उठे। दो मित्र, वसंत और राजब, ने हिंसक भीड़ को शांत करने की कोशिश की। बार-बार विनती करने के बावजूद लोग शांत नहीं हुए। तब उन्होंने कहा, "अगर तुम्हें इन्हें मारना ही है, तो पहले हमें मार डालो।" यह सुनकर हिंसक भीड़ शांत होने के बजाय और भी ज्यादा क्रोधित हो गई और उन्होंने पत्थरों, चाकुओं और कटारों से वसंत और रजब की जमकर हत्या कर दी।

अपनी जान बचाने की बजाय, उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वे शहीद हो गए। वसंत हिंदू थे जबकि रजब मुसलमान थे। उनकी मृत्यु के समय वसंत 40 वर्ष के थे, जबकि रजब अली केवल 27 वर्ष के थे।

1946 हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अंधकारमय दौर था। अंग्रेजों ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग कर रही थी। कई स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम द्वेष चरम पर था। कई जगहों पर दंगे हो रहे थे। गांधीजी देश को इस कटुता से मुक्त करने का भरसक प्रयास कर रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम में उतरे कार्यकर्ता गांधीजी के संदेश के अनुसार, अपने प्राणों की परवाह किए बिना हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

वसंतराव कौन थे?
वसंतराव का पूरा नाम वसंतराव हेगिष्टे था। वे अहमदाबाद में रहते थे। पंद्रह वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी स्कूल छोड़ दिया और गुजरात विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय विद्यालय में दाखिला लिया। विश्वविद्यालय ने उनके भीतर देशभक्ति की भावना जगाई। उन्होंने गांधी जी के साथ दांडी मार्च में भाग लिया। 1930 के नमक सत्याग्रह में उन्हें कारावास की सजा हुई। वे कांग्रेस सेवा दल से जुड़े थे। उन्होंने साष्टांग नमस्कार प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता। एक बार वसंतराव और उनके मित्र गांधी जयंती मनाने के लिए घोलका गांव गए थे। वहां से लौटते समय वे एक गांव से गुजरे। एक मित्र ने कहा, चलो थोड़ी देर इस गांव में रुकते हैं, आराम करते हैं, पानी पीते हैं। बाद में उन्हें पता चला कि यह चम्हारों का गांव है। मित्र ने कहा, हम यहां पानी नहीं पिएंगे। वसंतराव ने कहा, मैं यहां पानी पीऊंगा और उनके आग्रह पर अन्य मित्रों ने भी पानी पिया। आजादी के साथ-साथ इन युवाओं के मन में जातिगत भेदभाव से परे एक समाज बनाने की इच्छा थी। जब वे व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए जेल में थे, तब अहमदाबाद में दंगे हुए। जेल से रिहा होने के बाद वसंतराव ने कहा, "इन दंगों में अहमदाबाद से एक भी कांग्रेसी की मौत न होना हमारे विरोधियों को मौका दे रहा है। मैं उस व्यक्ति की मौत चाहता हूँ जो अपने सिर पर हथौड़ा गिरते हुए भी 'मुझे मार डालो' कहता रहे।" और अंततः उनकी यही इच्छा पूरी हुई। उन्होंने एक बार एक मित्र से कहा था, मैंने अपने जीवन में व्यायाम और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी है।

रजब अली कौन थे 
रजब अली का पूरा नाम रजब अली लखानी था ! उनका जन्म सन् 1919 में हुआ था ! वे एक खोजा मुस्लिम थे। उनका जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के कराची शहर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के काठियावाड़ जिले के लिंबडी गांव से था। सन् 1934 में लखानी परिवार कराची छोड़कर अपने पैतृक गांव लिंबडी लौट आया। उस समय राजब अली की आयु मात्र सोलह वर्ष थी। सन् 1936 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और भावनगर महाविद्यालय में दाखिला लिया। छात्रावास में रहते हुए ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। वे ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के कट्टर विरोधी थे। इसीलिए उन्होंने बी.ए. की अंतिम वर्ष की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। उन्हें सन् 1938, सन् 1941 और सन् 1942 में जेल जाना पड़ा। वे धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति की पहचान करने के प्रबल विरोधी थे। वे स्वयं को 'हिंदुस्तानी' बताते थे। वसंतराव से मिलते ही उनकी गहरी दोस्ती हो गई और यह दोस्ती अंत तक, यानी मृत्यु तक कायम रही। छह फुट लंबे रजब अली का व्यक्तित्व आकर्षक था। वे साहसी स्वभाव के थे। सादगी और विनम्रता उनके स्वभाव में थी। वे विचारधारा से समाजवादी थे। रजब अली का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मुस्लिम परिवार में हिंदू नाम और हिंदू परिवार में मुस्लिम नाम होना अत्यंत आवश्यक है।

जीवन भर एक-दूसरे का सहारा रहे वसंत रजब ने मृत्यु में भी एक-दूसरे का साथ दिया। वसंतराव की बहन ने उनकी मृत्यु को याद करते हुए बताया, "घटना घटते ही हम अस्पताल गए। वहां हमने वसंतराव का शव देखा। तभी हमें लगा कि रजब अली भी यहीं होंगे, क्योंकि वे दोनों हमेशा साथ रहते थे।" और ऐसा ही हुआ। रजब अली का शव भी उसी अस्पताल में मिला।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वसंत रजब की शहादत हमारी विरासत है। आज के नफरत भरे माहौल में यह शहादत प्रेरणादायक है।
- जयंत दिवाण 


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