वो पयम्बर के नवासे, वो बहत्तर जाँ निसार
वो अनलहक़ की सदाओं से महकता रेगज़ार
अर-रिहाया से अली असग़र तलक कितने शहीद
अर्श से माहे मुहर्रम में दिया करते हैं दीद
या मोहम्मद कह रहे थे प्यास से तड़पे हलक़
जीत ना पाएंगे बातिल जीतता है सिर्फ़ हक़
जीत ना पाएंगे बातिल जीतता है सिर्फ़ हक़
हाय ये ख़ुदग़र्ज़ दुनिया, हाय ये ज़ुल्मो सितम
कर्बला ही कर्बला है ज़िन्दग़ी हर एक गाम
राहे हक़ में हो गए क़ुर्बान जो उनको सलाम
आसमाँ पर सर उठाए, ताज़िया देता पयाम...!!
-ओमा अक्
(मुहर्रम के मौक़े पर कर्बला की याद में)
