राहुल मिश्रा
उस आदमी की नौकरी यह थी कि वो अंधेरे में बैठा रहे, और सामने रोशनी फेंकता रहे।
हर शाम शहर के सबसे बड़े सिनेमाघर में हजारों लोग उसी रोशनी में चेहरे देखते थे। हंसते थे। रोते थे।
उन चेहरों में एक भी उसका अपना नहीं था।
शो खत्म होने के बाद वो घर लौटता, और तब तक उसके बच्चे सो चुके होते थे।
और फिर एक दिन उसी परदे पर एक चेहरा उभरा, जिसे उसने पालने में देखा था।
वो चेहरा आज सौ साल का हो रहा है।
अब शुरू से शुरू करते हैं
अहिरीटोला। उत्तरी कलकत्ता। 1926 का सितंबर।
एक बच्चा अपने ननिहाल में पैदा हुआ। नाना ने उसका नाम रखा, उत्तम।
उत्तम, यानी सबसे अच्छा।
मां को वो नाम पसंद नहीं आया।
नाम बदलकर अरुण कर दिया गया।
पर उस घर में उस नाम को लेकर एक और बात दर्ज है।
ननिहाल के कुलगुरु उस बच्चे को देखने आए। उन्होंने उसकी हंसी देखी।
और कहा कि यह बच्चा एक दिन पूरे देश में इसी नाम से पहचाना जाएगा उत्तम।
उस दिन उस कमरे में जो लोग बैठे थे, उनमें से किसी ने इस बात को गंभीरता से लिया होगा, यह मानना मुश्किल है।
क्योंकि आगे जो हुआ, वो इसका ठीक उल्टा था।
उसकी जिंदगी में सबसे ज्यादा बार जो चीज बदली, वो कोई फिल्म नहीं थी।
उसका नाम था।
वो नाम अभी चार बार और बदलेगा, चार बार पिटेगा, और एक भोर में पूरा बंगाल उसे ठुकरा भी देगा।
पिता का नाम सतकड़ि चट्टोपाध्याय। जड़ें हुगली में। पेशा एक ही, और पूरी उम्र वही रहा।
वो चौरंगी के मेट्रो सिनेमा में प्रोजेक्शनिस्ट थे। वही मेट्रो, जहां तब तक एक भी बंगाली फिल्म नहीं दिखाई गई थी।
मां चपला देवी। दो छोटे भाई, बरुण और तरुण। घर भवानीपुर में, गिरीश मुखर्जी रोड पर। बड़ा परिवार, छोटी कमाई।
पर उस घर में एक चीज थी, जो पैसे से नहीं आती।
पिता और चाचा ने मिलकर मोहल्ले का एक नाटक दल बनाया था। नाम, सुहृद समाज। रिहर्सल क्लबघर में होती, और मंचन गली में।
मां-बाप सख्त थे। शाम को किताब खुलनी चाहिए थी।
तो बच्चा चुपके से निकलकर क्लबघर की खिड़की पर खड़ा हो जाता।
कभी दरवाजे पर कान लगा देता, संवाद सुनता, और घर आकर अकेले दोहराता। डर लगा रहता था कि पकड़ा जाएगा हालांकि उसने खुद बताया है कि जिंदगी में उसके मां-बाप ने उसे कभी नहीं मारा।
बचपन के ये दृश्य कहीं बाहर से नहीं आए हैं।
आखिरी बरसों में उसने अपनी आत्मकथा लिखवाई थी। नाम, आमार आमि। यह सब उसी में दर्ज है, उसी की जबान से।
उस किताब का क्या हुआ, यह इस कहानी के आखिर में आएगा।
एक दिन वो पकड़ा गया।
पकड़ने वाली उसकी बड़ी बहन थी। पुतुल।
उसने घर में शिकायत नहीं की।
उल्टे उससे कहा कि जो देखकर आए हो, वो करके दिखाओ।
बच्चे ने उसके सामने एक दृश्य निभाया।
बहन हंस पड़ी। और फिर उसने वो बात कही, जो उस बच्चे की जिंदगी की पहली अभिनय-सलाह थी।
उसने कहा कि एक ही जगह खड़े मत रहो। थोड़ा घूमो-फिरो।
कुछ ही अरसे बाद वो स्कूल से लौटा और बहन को आवाज लगाई।
बहन नहीं आई। मां आई, चेहरा उतरा हुआ।
टाइफाइड।
एक दिन के बुखार में वो पीली पड़ चुकी थी।
उसने भाई को कमरे में बुलाया, और कहा कि तुम जात्रा सीखो, उसमें बहुत मजा आएगा।
वो ठीक नहीं हुई।
आगे चलकर, जिंदगी के अकेले पलों में, खुले आसमान की तरफ देखते हुए उसे बहन की वही आखिरी बात सुनाई देती रही।
जिस आदमी को देखने के लिए एक दिन पूरा बंगाल सड़कों पर टूट पड़ेगा, उसका पहला दर्शक जा चुका था।
और यह याद रखिएगा कि उसे अभिनय की पहली सलाह किसी निर्देशक ने नहीं दी थी। एक बहन ने दी थी, जो उसे बचाने के लिए झूठ बोल चुकी थी।
स्कूल चकरबेड़िया में था, घर से पैदल की दूरी पर।
बहुत छोटी उम्र में हेडमास्टर क्लास में आए और पूछा कि नाटक में कौन काम करेगा।
पूरी क्लास चुप।
एक लड़का खड़ा हुआ, और छाती धड़कते हुए बोला कि वो कर लेगा।
उसे गयासुर के बचपन वाला हिस्सा मिला।
नाटक के बीच में बांस का बना मंच टूटकर गिर गया, क्योंकि बड़े गयासुर वाला लड़का ऊपर बहुत उछल रहा था। मंच दोबारा जोड़ा गया, और नाटक पूरा हुआ।
उस दिन उसे मेडल मिला। वो उसे लेकर घर तक दौड़ता आया।
फिर मोहल्ले के लड़कों ने अपना दल बनाया, लूनार क्लब।
मंच के परदे के लिए घर-घर से साड़ियां और चादरें मांगी गईं, और उन्हें सेफ्टी पिन से जोड़ा गया। मुकुट चांदी के कागज से बने, और मेकअप पाउडर से हुआ।
उसी इंतजाम में उन्होंने अपना पहला नाटक खेला रवींद्रनाथ का मुकुट।
नाटक इतना चला कि पड़ोस के एक घर ने रिहर्सल के लिए अपना कमरा दे दिया।
और अब उस क्लब की एक ऐसी बात, जो हिंदी में लगभग कहीं नहीं लिखी गई।
1943 में उन लड़कों ने बंकिमचंद्र के आनंदमठ का एक विशेष मंचन किया।
उससे सत्रह सौ रुपये जुटे। पूरे के पूरे आजाद हिंद फौज के कोष में भेज दिए गए।
सत्रह बरस का एक लड़का, जिसका अपना घर मुश्किल से चल रहा था, नेताजी की फौज के लिए चंदा जुटा रहा था।
पढ़ाई साउथ सबर्बन स्कूल से होते हुए कॉमर्स कॉलेज तक पहुंची।
पर वहां रुक गई।
बरसों बाद उसने खुद कहा कि हालात ऐसे थे कि पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और नौकरी पकड़नी पड़ी।
नौकरी वो थी, जो उस दौर के कलकत्ता में सबसे सुरक्षित मानी जाती थी।
खिदिरपुर। पोर्ट कमिश्नर्स का दफ्तर। कैश विभाग। एक क्लर्क की कुर्सी।
महीने के दो सौ पचहत्तर रुपये। उसी बातचीत में उसने यह भी कहा कि उस वक्त अभिनय उसके लिए करियर नहीं था, सिर्फ शौक था। दफ्तर में भी एक क्लब था जो नाटक करता था, और वो उसमें भी खेलता था।
दिन में हिसाब। शाम को मंच।
और इसी बीच उसने अपने ऊपर वो मेहनत शुरू की, जो आज के किसी भी नौजवान को पढ़नी चाहिए।
आवाज साधने के लिए उसने निधानबंधु बनर्जी से शास्त्रीय संगीत सीखा।
तैराकी में वो जॉनी वाइजमुलर का दीवाना था वही तैराक, जो परदे पर टार्जन बना था। और भवानीपुर स्विमिंग एसोसिएशन में सौ गज की फ्रीस्टाइल का चैंपियन वो लगातार तीन साल रहा।
लाठी खेला सीखा। कुश्ती लड़ी। योग किया।
फुटबॉल में वो राइट-बैक खेलता था, और आखिरी सांस तक मोहन बागान का समर्थक रहा
पर एक चीज थी, जो इस पूरी मेहनत के बावजूद उसके साथ अटकी रही।
उसका उच्चारण।
उसके साथ काम करने वाली दो बड़ी अभिनेत्रियों ने बाद में साफ कहा है कि शुरुआती दिनों में उसका उच्चारण साफ नहीं था।
और उसने उस कमी पर जो काम किया, वो अजीब था।
उसने गीता और चंडीपाठ का अभ्यास शुरू किया।
यह वाक्य अभी बिल्कुल मामूली लग रहा है।
तीस बरस बाद यही अभ्यास उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा घाव बनने वाला था।
अब उस लड़की की बात, जिसके बिना यह कहानी वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन उसने अपने ही घर से एक लड़की को निकलते देखा, चचेरी बहन अन्नपूर्णा के साथ।
पूछने पर नाम मिला। गौरी रानी गांगुली।
उसके बाद वो शाम को क्लब की रिहर्सल छोड़ने लगा, और घर के आसपास मंडराने लगा, इस उम्मीद में कि वो लड़की फिर आएगी।
वो नहीं आई।
कई हफ्ते बाद वो आई।
लड़के ने हारमोनियम उठाया और गाना शुरू कर दिया।
उसे पक्का यकीन था कि उसकी आवाज सुनकर वो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आ जाएगी, और वो हारमोनियम से नजर उठाएगा तो वो दरवाजे पर खड़ी होगी।
वो गाता रहा। कोई नहीं आया।
आखिर में अन्नपूर्णा ऊपर आई, और अपने साथ उसका संदेश लेकर आई।
संदेश यह था कि तुम बहुत अच्छा गाते हो, और वो तुम्हें ठीक से जानना चाहती है।
फिर वो फिर गायब हो गई।
एक दिन बेचैनी में वो घूमते-घूमते गंगा किनारे जा बैठा। और वहीं से सीधे उसके स्कूल पहुंच गया।
साथ में उनके घर का चौकीदार खड़ा था। लड़की ने सिर्फ आंख से इशारा किया, कि छुट्टी के वक्त आना।
वो आया।
और उसने वो सवाल पूछा, जो उस उम्र में कोई नहीं पूछता।
उसने कहा कि वो फिल्मों में जाना चाहता है। क्या तुम्हें मंजूर है?
उसने कहा कि अगर तुम हीरो बन गए, तो उससे ज्यादा खुशी की बात क्या होगी।
उसने यह सवाल इसलिए पूछा था, क्योंकि उसे अपनी पहली भूमिका मिल चुकी थी।
1947। एक हिंदी फिल्म। भरतलक्ष्मी स्टूडियो में पांच दिन का काम, वो भी एक्स्ट्रा के तौर पर।
किरदार यह था कि वो दूल्हा बनेगा, जिसे मंडप पर पीटा जाता है। और वो फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हुई।
अगले साल एक बंगाली फिल्म आई। निर्देशक नितिन बोस। कहानी रवींद्रनाथ की।
उसमें उसने असित बरन के बचपन वाला हिस्सा निभाया।
फिल्म का विज्ञापन अखबार में छपा।
वो उसमें अपना नाम ढूंढ रहा था।
नाम नहीं था।
भूमिका छोटी थी और वो अनजान था, इसलिए परदे पर चलने वाली नामावली में भी उसका नाम नहीं गया।
पहली रिलीज हुई फिल्म। और उसमें उसका कोई नाम ही नहीं था।
पर एक इंसान ने उसे उस भीड़ में पहचान लिया।
गौरी अपनी दादी के साथ वो फिल्म देखने गई थी। दादी ने मजाक में पूछा कि परदे पर कौन सा अभिनेता अच्छा लगा।
गौरी ने उसकी तरफ इशारा कर दिया।
और दादी को समझ आ गया कि यह मजाक का जवाब नहीं था।
उसी दिन से गौरी का घर से निकलना बंद, और रिश्ता कहीं और तय।
वो चुपके से निकलकर उसके पास पहुंची।
लड़के के पास न कमाई थी, न कोई नाम। फिर भी वो सीधे उसके पिता के पास गया, और हाथ मांग लिया।
पिता संपन्न आदमी थे। पर उन्हें उस लड़के की नीयत पर भरोसा हो गया, और उन्होंने हां कह दी।
1 जून 1948 को शादी हुई।
अब उन नामों की बात, जो एक के बाद एक फेल हुए।
1949 में वो पहली बार हीरो बना। परदे पर नाम गया, उत्तम चटर्जी। फिल्म नहीं चली।
अगली फिल्म में नाम बदलकर अरूप कुमार कर दिया गया। वो भी नहीं चली।
फिर वो लौटकर अरुण हो गया।
और 1951 में दो चीजें एक साथ हुईं, जिन्होंने उसकी जिंदगी बदल दी।
पहली। एक बड़े अभिनेता की नजर उस पर पड़ी।
पहाड़ी सान्याल। उस दौर के जाने-माने कलाकार।
उन्हीं की वजह से उसे न्यू थियेटर्स में मौका मिला।
और उन्हीं ने उसे सलाह दी कि परदे पर वो एक नाम तय कर ले, और वो नाम यही रखे।
दूसरी। उसी साल एक फिल्म बन रही थी, सहयात्री। हीरो असित बरन तय थे, पर वो दूसरी तारीखों में फंस गए और अनुबंध पर दस्तखत नहीं कर सके।
वो भूमिका उस संघर्ष कर रहे लड़के के पास आ गई।
और उसी फिल्म में, जिंदगी में पहली बार, उसका नाम परदे की नामावली में छपा। फिल्म की पुस्तिका के कवर पर उसका चेहरा गया।
इस बार उसने वही नाम चुना, जो जन्म के पहले ही दिन उसकी अपनी मां ने लौटा दिया था।
नाम उत्तम कुमार।
उसी फिल्म में हेमंत मुखर्जी ने पहली बार उसके लिए तीन गाने गाए।
न फिल्म चली, न गाने।
और यहां इस कहानी की सबसे चुप बात आती है।
1947 से 1951 के बीच उसकी जितनी भी फिल्में बनीं, सब पिटीं।
सिनेमा पढ़ाने वाले जो लोग आज उस दौर पर काम करते हैं, वो एक बात दर्ज करते हैं।
उन बरसों की उसकी फिल्में अब मौजूद नहीं हैं। प्रिंट खो चुके हैं।
उसकी नाकामी का कोई सबूत आज दुनिया में नहीं बचा। जो बचा, वो सिर्फ वो है जो उसने उस नाकामी के बाद बनाया।
पर उस वक्त उसे यह कोई नहीं बता सकता था।
उस वक्त स्टूडियो में उसका एक खिताब बन चुका था, जो पीठ पीछे नहीं, मुंह पर बोला जाता था।
फ्लॉप मास्टर जनरल।
और एक दूसरा ताना भी था। लोग उसे देखकर कहते लो, नया दुर्गादास आ गया।
दुर्गादास बनर्जी उस जमाने के बड़े सितारे थे, जो मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक कामयाबी से पहुंचे थे। बड़े घर के, रईस, तराशे हुए आदमी।
यानी वो ताना सिर्फ नाकामी का नहीं था। वो यह याद दिलाने के लिए था कि तुम कहां से आए हो।
वो टूट गया।
उसने तय कर लिया कि सिनेमा छोड़ देगा और पोर्ट की पक्की नौकरी में लौट जाएगा।
उस मोड़ पर उसे गौरी ने रोका।
उन्होंने कहा कि जिस काम में मन नहीं लगता, उसमें लौटने से कुछ नहीं मिलेगा।
जिस आदमी को पूरी इंडस्ट्री नाकाम मान चुकी थी, उसके लिए उस साल की सबसे बड़ी पूंजी यही एक वाक्य था।
1952। निर्देशक निर्मल दे ने उसे बुलाया।
बाकी लोगों को उसमें कुछ नहीं दिखा था। निर्मल दे को दिखा।
फिल्म का नाम था बासु परिबार।
और वो चल गई।
पच्चीस साल की उम्र में, आठ बरस की लगातार पिटाई के बाद, उसे पहली कामयाबी मिली।
उसने उसी साल पोर्ट की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
बरसों बाद उसने कहा कि किरदार को तोड़कर समझना उसने सबसे पहले निर्मल दे से ही सीखा।
और ठीक इसी दौर में उसने वो काम किया, जो उसकी असली मरम्मत थी।
1953 में वो मंच पर लौटा। नाटक का नाम था श्यामली।
वो नाटक लगातार करीब पांच सौ रातें चला।
पांच सौ रातें, हर रात एक ही किरदार, एक ही संवाद, एक जीवित भीड़ के सामने।
जो उच्चारण उसकी सबसे बड़ी कमजोरी था, वो पचास के दशक के मध्य तक पूरी तरह ठीक हो चुका था।
और आगे चलकर उसकी बांग्ला बोलने का ढंग खुद एक मानक बन गया वो नमूना, जिसे सुनकर लोग बोलना सीखते हैं।
1953 में ही शाड़े चुयात्तोर आई। और उसमें एक नई अभिनेत्री उसके सामने खड़ी थी।
सुचित्रा सेन।
वो फिल्म महीनों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी। और उसने एक और काम किया, जिस पर कम ध्यान गया है।
कलकत्ता के पैराडाइस सिनेमा में साल भर ज्यादातर हिंदी फिल्में चलती थीं। वहां दिखाई जाने वाली वो पहली बंगाली फिल्म थी।
अगले साल अग्निपरीक्षा आई, जिसने उसे रोमांटिक हीरो बना दिया।
और वो फिल्म संयोग से उसी दिन रिलीज हुई, जिस दिन उसका जन्मदिन था।
आगे चलकर वो दोनों तीस फिल्मों में साथ आए।
उस जोड़ी के बारे में उसने खुद जो कहा, उसमें एक भी शब्द बनावटी नहीं है।
उसने कहा कि अगर सुचित्रा उसके साथ न होतीं, तो वो उत्तम बन ही नहीं पाता।
पर सिर्फ सुचित्रा के साथ की कहानी अधूरी है।
उसने लगभग उतनी ही फिल्में एक और अभिनेत्री के साथ कीं। सावित्री चटर्जी।
और उनके बारे में एक किस्सा है, जो बताता है कि यह आदमी असल में क्या था।
एक शाम वो अपनी रोज की महफिल में बैठा था। गाना चल रहा था, हंसी-मजाक चल रहा था।
अचानक वो उठ खड़ा हुआ।
लोग हैरान रह गए, क्योंकि उसके जाने का वक्त नहीं हुआ था।
उसने वजह बताई। कल सुबह सावित्री के साथ एक दृश्य है। घर जाकर तैयारी करनी है।
वरना वो पूरा दृश्य उसके हाथ से ले जाएंगी।
बंगाल का सबसे बड़ा सितारा, महफिल छोड़कर घर जा रहा था, क्योंकि उसे अपनी सह-कलाकार से डर लगता था।
उसकी तस्वीरें आज हर जगह हैं। पर एक बात उन तस्वीरों से नहीं दिखती।
वो पारंपरिक अर्थों में सुंदर नहीं था।
लंबा जरूर था, पर नाक चपटी थी, होंठ मोटे थे, और कद-काठी कोई खास नहीं थी।
उसके अपने दौर के कई नौजवान अभिनेता उससे कहीं ज्यादा सुडौल थे।
जो चीज उसके पास थी, उसे परदे की मौजूदगी कहते हैं। और आम तौर पर माना जाता है कि यह चीज या तो होती है, या नहीं होती।
पर उसकी शुरुआती नाकामियां यही साबित करती हैं कि उसके पास वो चीज पैदाइशी नहीं थी।
उसने वो बनाई।
बालों की वो लापरवाह सी लट, होंठों के कोने पर टिकी सिगरेट, वो हल्का सा तनाव, सिर का वो आधा मुड़ना, और आखिर में वो अचानक खुलने वाली मुस्कान यह सब किसी वरदान से नहीं आया था।
यह बरसों की मेहनत का नतीजा था।
उस दौर में एक और नाम था, जिसे बंगाल हमेशा उसी के साथ जोड़कर लेता था।
सौमित्र चटर्जी।
बंगाल ने उन दोनों को हमेशा आमने-सामने खड़ा किया। सौमित्र ने खुद कहा है कि उनका और उत्तम का नाम राज्य की दो संस्थाओं जैसा हो गया था मोहन बागान और ईस्ट बंगाल।
पर वही सौमित्र यह भी कहते रहे कि लोकप्रियता में उत्तम कुमार से आगे कोई नहीं निकल सका। वो खुद पास तक पहुंचे, पर आगे हमेशा वही रहा।
और असल जिंदगी में वो दोनों दुश्मन नहीं थे।
वो अक्सर साथ बैठते थे। शहर के एक पुराने होटल में, देर तक, गिलास सामने रखकर।
जिन दो नामों को पूरा बंगाल आपस में लड़ाता रहा, वो दोनों शाम को एक ही मेज पर होते थे।
अब उस अंधेरे कमरे पर लौटिए, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी।
1957। मेट्रो सिनेमा ने तय किया कि वो पहली बार एक बंगाली फिल्म दिखाएगा।
फिल्म का नाम था चंद्रनाथ। शरतचंद्र के उपन्यास पर बनी। हीरो वही लड़का, हीरोइन सुचित्रा सेन।
और उस शाम प्रोजेक्शन रूम में वही लंबा, दुबला, गंभीर आदमी बैठा था, जो बरसों से उस परदे पर रोशनी फेंकता आया था।
रोशनी उसने फेंकी। और उस रोशनी में जो चेहरा खड़ा हुआ, वो उसका अपना बेटा था।
बाप ने कभी परदे पर अपना नाम नहीं देखा। पर वो परदा रोज उसी ने जिंदा किया था।
अगले ही साल एक और चीज हुई, जो हिंदी के पाठकों के लिए खास है।
उसकी एक बंगाली फिल्म में एक हिंदी गाना रखा गया।
गाने वाले थे मोहम्मद रफी। और उन्होंने उसके लिए एक पैसा नहीं लिया।
किसी बंगाली फिल्म में वो पहला हिंदी गाना था।
और फिर 1959 में उसे वो नाम मिला, जिससे आज पूरा हिंदुस्तान उसे जानता है।
वो नाम किसी सरकार ने नहीं दिया था। किसी पुरस्कार समिति ने नहीं दिया था।
एक बांग्ला पत्रिका ने उसे पहली बार महानायक लिखा।
और वो शब्द चिपक गया।
तीस साल पहले जिस बच्चे की मां ने उसका नाम लौटा दिया था, उसे अब लोग एक नया नाम दे रहे थे।
अब सत्यजित रे इस कहानी में दाखिल होते हैं।
साठ के दशक की शुरुआत में रे ने उसे रवींद्रनाथ के एक उपन्यास पर बनने वाली फिल्म के लिए बुलाया, और खलनायक की भूमिका दी।
उसने मना कर दिया। उसका कहना था कि इस किरदार के साथ कोई और ज्यादा इंसाफ करेगा।
और फिर उसने रे से यह गुजारिश की कि वो फिल्म उसे बनाने दें, अपने बैनर तले।
जो आदमी किरदार के लिए खुद को नाकाफी बता रहा था, वो उसी फिल्म पर अपना पैसा लगाने को तैयार था।
वो फिल्म तब बनी नहीं। पर रे ने वो नाम याद रखा।
1966। नायक।
एक सुपरस्टार, जो पुरस्कार लेने ट्रेन से दिल्ली जा रहा है, और रास्ते में एक नौजवान पत्रकार के सामने अपने डर, अपनी गलतियां और अपना अकेलापन खोलता जाता है।
रे ने खुद लिखा है कि उन्होंने वो भूमिका इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें लगा कि यह अभिनेता उससे आसानी से जुड़ पाएगा।
क्योंकि वो कहानी एक साधारण मध्यवर्गीय नौजवान की थी, जिसे फिल्मों में मौका मिलता है और जो तेजी से ऊपर चढ़ जाता है।
रे ने साफ लिखा कि यह फर्श से अर्श तक की कहानी है, और इसमें उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
इस बात को याद रखिएगा। कहानी के आखिर में खुद उत्तम कुमार इसका ठीक उल्टा कहने वाले हैं।
उस फिल्म में एक दृश्य है जो आज तक दोहराया जाता है। एक पुराना कलाकार नए लड़के को डांटता है कि यह क्या तरीका है, यह हॉलीवुड है क्या, तुम बुदबुदा क्यों रहे हो।
मजा यह है कि असल जिंदगी में उत्तम कुमार की पहचान ही यही थी संवाद को ऊंचा उछालने की जगह उसे दबाकर, ठहराकर बोलना।
रे ने वो असली ताना उठाकर फिल्म में रख दिया था।
और उस फिल्म के लिए उसने जो किया, वो शायद उस दौर का कोई सितारा नहीं करता।
शूटिंग से कुछ समय पहले उसे चेचक हुई थी। चेहरे पर उसके निशान साफ दिख रहे थे।
उसने मेकअप न करने पर हामी भर दी।
बंगाल का सबसे बड़ा हीरो, कैमरे के सामने अपने दाग लेकर खड़ा हो गया।
नायक के प्रीमियर के दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले नहीं देखा था।
भीड़ ने उसकी कमीज नोच ली।
वो फिल्म बर्लिन तक गई और वहां सम्मानित हुई। और उसे देखकर हॉलीवुड की एलिजाबेथ टेलर ने कहा कि वो इस अभिनेता से मिलना चाहती हैं, उसके साथ काम करना चाहती हैं।
1967 इस कहानी का सबसे अजीब साल है। उसमें दो चीजें एक साथ हुईं।
पहली। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तब तक कई बरसों से दिए जा रहे थे, पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी उस साल पहली बार बनी।
वो पुरस्कार पाने वाला देश का पहला अभिनेता यही आदमी था। और एक नहीं, दो फिल्मों के लिए एक साथ।
उसने बंबई में अपनी सबसे बड़ी छलांग लगाने की कोशिश की।
उसने एक हिंदी फिल्म खुद बनाई। रंगीन, महंगी, बड़ी लोकेशन। सामने वैजयंतीमाला।
और वो फिल्म असल में उसी अग्निपरीक्षा का हिंदी रूपांतर थी, जिसने तेरह साल पहले उसे बंगाल का हीरो बनाया था।
जो जादू बंगाल में चला था, वो बंबई में नहीं चला।
फिल्म बुरी तरह पिटी।
जो पैसा उसने बरसों में जोड़ा था, वो उसी में चला गया। और ऊपर से कर्ज।
उसी दौर में, एक शूटिंग के बीच, उसे पहला दिल का दौरा पड़ा।
और यह भी जान लीजिए कि उससे पहले वो बंबई के कई बड़े मौके ठुकरा चुका था जिनमें राज कपूर की संगम भी थी।
अब समझिए कि कर्ज में डूबा हुआ आदमी आगे क्या करता है।
वो सिर्फ अपना कर्ज नहीं उतारता। वो दूसरों के लिए एक संस्था खड़ी करता है।
साठ के दशक के आखिर में उसने कलाकारों की पुरानी संस्था छोड़ी, और अपनी खुद की बनाई। शिल्पी संसद। फिल्म इंडस्ट्री के गरीब कर्मचारियों और छोटे कलाकारों के लिए।
वो उसका आजीवन अध्यक्ष रहा।
शो करके पैसा जुटाया जाता था, पर उतना जमा नहीं होता था।
तो उसने तय किया कि संस्था के लिए एक पूरी फिल्म बनाएगा, और उसकी सारी कमाई वहीं जाएगी।
1973। बोन पलाशिर पदाबली।
निर्देशन उसने किया, पटकथा उसने लिखी, और पार्श्व संगीत भी उसी ने दिया।
बड़े से बड़ा कलाकार बिना पैसे लिए काम करने आया। खुद उसने भी एक पैसा नहीं लिया।
और वो फिल्म खूब चली।
यह कोई एक बार का काम नहीं था।
साठ के दशक में जब तकनीशियनों का वितरकों से झगड़ा हुआ, तो वो तकनीशियनों के साथ खड़ा हो गया।
और अपनी ही फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ धरने पर बैठ गया।
उसकी मौत के बाद इंडस्ट्री के एक निर्देशक ने जो कहा, उससे पूरी बात एक लाइन में खुल जाती है।
उन्होंने कहा कि संस्थाओं ने, फिल्मी विद्वानों ने और बौद्धिक तबके के एक हिस्से ने उसे लगातार नजरअंदाज किया।
पर स्टूडियो के मजदूरों, तकनीशियनों और दिहाड़ी वालों ने उसे बेशर्त प्यार दिया।
और यह भी जान लीजिए कि वो दौर उसके लिए आसान नहीं था।
सत्तर का दशक बंगाल में नौजवानों के गुस्से का दशक था। पढ़े-लिखे लड़के सड़कों पर थे, और पुरानी हर चीज सवालों के घेरे में आ गई थी।
उस गुस्से से वो भी नहीं बचा। स्टूडियो की दीवारों पर उसके खिलाफ लिखा गया, और कई बार सामने भी सुनना पड़ा।
उसी दौर में उसने ऐसी फिल्में करनी शुरू कीं, जिनमें वो हीरो नहीं, दादा था।
एक फिल्म में वो ऐसा बड़ा भाई है, जिसे कभी मोहल्ले के लड़के पूजते थे, और अब वही लड़के उसे नीचा दिखाते हैं। उसका कारोबार डूब चुका है, और उसकी बात का कोई वजन नहीं बचा।
परदे पर वो अपने ही दौर का दृश्य निभा रहा था।
सत्तर के दशक के मध्य में शक्ति सामंत उसे एक ऐसी फिल्म में ले आए, जो एक साथ बंगाली और हिंदी दोनों में बनी। नाम, अमानुष। सामने शर्मिला टैगोर।
उस फिल्म में उसका किरदार एक टूटा हुआ, शराब में डूबा हुआ, पर भीतर से खरा आदमी था।
और उस फिल्म का एक गाना आज भी हिंदुस्तान के हर कोने में बजता है।
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा।
उसी गाने पर किशोर कुमार को फिल्मफेयर मिला।
पचास के करीब पहुंच चुके, कर्ज में डूबे एक आदमी ने बंबई से आखिरकार वो चीज ले ली, जो कुछ बरस पहले उसके हाथ से फिसल गई थी।
और 1975 उसके करियर का सबसे अजीब साल है।
उस साल उसकी छह फिल्में आईं।
छहों चलीं।
एक हास्य फिल्म, एक ऐसे डॉक्टर की कहानी जो जिंदगी भर झुका नहीं, एक राजा जो साधु बनकर लौटता है, और एक ऐसा किरदार जिसमें वो सिरे से खलनायक था।
उस आखिरी फिल्म के लिए उसे मना किया गया था, कि दर्शक तुम्हें इस रूप में कभी नहीं देखना चाहेंगे।
उसने वो फिल्म फिर भी की।
1979 में, उसने एक और काम किया जिसका जिक्र कम होता है।
पिछले साल बंगाल में भीषण बाढ़ आई थी।
राहत के पैसे जुटाने के लिए उसने एक चैरिटी क्रिकेट मैच कराया। एक तरफ बंगाली फिल्म इंडस्ट्री, दूसरी तरफ बंबई की फिल्म इंडस्ट्री।
बंगाल की टीम की कप्तानी उसने खुद की।
और बंबई की टीम की कप्तानी की दिलीप कुमार ने।
और अब वो हिस्सा, जिसे इस कहानी से निकाल देना बेईमानी होगी।
1948 में जिस लड़की के लिए वो बिना कमाई और बिना नाम के उसके पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया था, उसी गौरी के साथ उसका घर आगे चलकर वैसा नहीं रहा।
1963 में पर्दे के बाहर उसकी जिंदगी में सुप्रिया देवी आईं। वही अभिनेत्री, जो 1952 की उसी पहली कामयाब फिल्म में उसके साथ परदे पर थीं, जिसने उसे फ्लॉप मास्टर जनरल से उत्तम कुमार बनाया था।
उसके बाद उसकी जिंदगी दो घरों में बंट गई।
उसने गौरी से कानूनी अलगाव कभी नहीं लिया।
इस पर बंगाल में बरसों बहस हुई, और आज भी होती है। मैं उस बहस में नहीं पड़ूंगा। यह पन्ना किसी के निजी फैसलों पर अदालत लगाने के लिए नहीं है, और तीनों में से कोई आज सफाई देने के लिए मौजूद नहीं है।
पर एक बात दर्ज करना जरूरी है, क्योंकि वो उसी ने दर्ज की है।
आमार आमि का पहला मसौदा जब सुप्रिया देवी ने पढ़ा, तो उन्हें लगा कि उसमें उनकी जगह बहुत कम है।
उसने किताब में एक हिस्सा और जोड़ा।
यानी जो आदमी जिंदगी भर लोगों की उम्मीदों के हिसाब से जिया, वो अपनी आत्मकथा भी पूरी तरह अकेले नहीं लिख पाया।
1967 में उसने एक बच्ची को कानूनी तौर पर गोद भी लिया था।
और उसके जाने के बाद उसके दोनों घर कभी एक जगह नहीं आ पाए।
अब उस आदमी की अपनी जबान से सुनिए, क्योंकि वो मौका बहुत कम मिला है।
20 जुलाई 1980 को उसने एक लंबी बातचीत दी। वो इंटरव्यू लगभग नहीं देता था, और उस पत्रकार को डेढ़ साल से टाल रहा था।
वो उसकी आखिरी प्रकाशित बातचीत निकली।
उससे पूछा गया कि इतनी बड़ी लोकप्रियता कैसी लगती है।
उसने कहा कि अच्छी लगती है। पर जब वो हद पार कर जाती है तो मुसीबत बन जाती है। लोग छूते नहीं, चिकोटी काटते हैं, कपड़े फाड़ देते हैं, कभी गाड़ी का शीशा तोड़ देते हैं।
उसने उसे एक ही शब्द दिया। घुटन।
फिर उससे पूछा गया कि क्या यह छवि उसके अभिनय को भी बांधती है।
उसने कहा, हां।
उसने कहा कि वो किसी किरदार को अपने ढंग से नहीं कर पाता, अगर वो उत्तम कुमार की बनी-बनाई छवि से टकराता हो।
उसने यह भी कहा कि वो कभी एक शातिर, सचमुच का खलनायक करना चाहता है। पर उसे मालूम है कि लोग मंजूर नहीं करेंगे।
फिर उससे पूछा गया कि अब तक का कौन सा किरदार करने में उसे सबसे ज्यादा मजा आया।
उसका जवाब एक शब्द का था।
कोई नहीं।
पूछा गया, एक भी नहीं?
उसने कहा कि कुछ फिल्मों के कुछ हिस्से अच्छे लगे, बस इतना ही।
और नायक?
अब वो बात याद कीजिए जो रे ने लिखी थी कि यह कहानी उत्तम की अपनी जिंदगी की झलक है।
उत्तम कुमार ने कहा कि उसे उस किरदार में अपनी कोई झलक नहीं दिखती।
उसने कहा कि उसकी समझ में यह आया ही नहीं कि वो आदमी आखिर किस बात से इतना परेशान है।
अब आखिरी हफ्ते पर आइए।
दो साल पहले उसे एक और दौरा पड़ चुका था। उसके बाद डॉक्टरों ने दिल से जुड़ी एक और तकलीफ पकड़ी थी, और जेब में हमेशा एक दवा रहने लगी थी, जो सीने में अचानक ऐंठन उठने पर काम आती।
डॉक्टरों ने उसे दो चीजों से रोका था।
इतना काम मत करो। और शराब छोड़ दो।
उसने दोनों में से एक भी बात नहीं मानी।
काम इसलिए नहीं छोड़ सका कि कर्ज था, संस्था थी, और उस अकेले नाम पर टिकी एक पूरी इंडस्ट्री थी।
और बाकी जो था, वो शायद उसी घुटन का दूसरा नाम था, जिसका जिक्र उसने चार दिन पहले खुद किया था।
22 जुलाई। सेट पर मेकअप करने वाले ने देखा कि वो उखड़ा हुआ है।
उसने पूछा कि आप थोड़ा आराम क्यों नहीं करते, इतना काम करके खुद को क्यों तोड़ते हैं।
जवाब में उसने कहा कि बहुत लंबा वक्त हो गया, अब शायद उसकी जरूरत खत्म हो गई है।
23 जुलाई की सुबह घर के पास खड़ी उसकी गाड़ी से उसका टेप रिकॉर्डर चोरी हो गया।
वो टेप रिकॉर्डर वो हर जगह साथ रखता था। उस पर गाने सुनता था, और अपनी आवाज भी रिकॉर्ड करता था।
उस चोरी ने उसे तोड़ दिया।
स्टूडियो पहुंचा तो उसका मेकअप रूम किसी और के पास था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
फिर उस दिन का दृश्य आया। एक सीढ़ी। चढ़ना और उतरना।
उसके हिसाब से यह मामूली दृश्य था।
पर हर बार उसे लगा कि ठीक नहीं हुआ।
सात बार।
आखिर में निर्देशक ने बाकी लोगों से चुपके से कहा कि जोर से ताली बजा दो, ताकि वो और रीटेक न मांगे।
जिस फिल्म का वो दृश्य था, वो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के पिग्मेलियन पर बनी थी।
कहानी उस आदमी की, जो एक लड़की का उच्चारण सुधारता है।
यानी वो आदमी, जिसने अपनी जबान खुद घिसकर तैयार की थी, जिसे शुरू में साफ न बोल पाने का ताना मिला था, आखिरी बार परदे पर किसी और की जबान सुधार रहा था।
और तिरपन साल की उम्र में, दिल के कई दौरे झेल चुका वो आदमी, सातवीं बार भी सीढ़ी चढ़-उतरकर यही सोच रहा था कि अभी ठीक नहीं हुआ।
उस शाम वो एक दोस्त की महफिल में गया, और देर रात तक वहीं रहा।
आधी रात के आसपास तबीयत बिगड़ी।
वो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल गया घर से पांच मिनट का रास्ता।
रात तीन बजे उसे भर्ती किया गया। शहर के बड़े हृदय-रोग विशेषज्ञों का एक बोर्ड बैठा।
और उस बोर्ड में जो एक डॉक्टर उसे संभाल रहा था, उसका नाम था लालमोहन मुखर्जी।
यह वही लड़का था, जिससे उसकी दोस्ती सातवीं क्लास में साउथ सबर्बन स्कूल में हुई थी।
स्कूल से लेकर आखिरी रात तक, वो साथ था।
पूरी रात और अगला पूरा दिन कोशिश चलती रही।
24 जुलाई 1980। रात साढ़े नौ बजे के करीब वो चला गया।
अगले दिन जो हुआ, उसे उस शहर ने पहले कभी नहीं देखा था।
एक खुली ट्रक। सफेद फूलों के ढेर। और दक्षिण कलकत्ता की सारी सड़कें रुक गईं।
अगली सुबह आनंदबाजार पत्रिका के पहले पन्ने पर जो शीर्षक छपा, उसका मतलब सिर्फ इतना था सिनेमा का इंद्र गिर गया।
और उसी दिन एक और चीज गायब हो गई।
वो अपनी आत्मकथा लिख रहा था। नाम, आमार आमि।
जिस दिन वो गया, उस पांडुलिपि का कोई पता नहीं चला। वो चोरी हो गई।
फिर बरसों बाद, एक अखबारनवीस को वो मिली। और तीस साल बाद, कोलकाता पुस्तक मेले में वो छपकर सामने आई।
उन पन्नों में वो अपने डर के बारे में लिखता है। कि यह रोशनी, यह चमक, कुछ भी टिकने वाला नहीं। कि यह किसी भी पल बुझ सकती है, और उसे और गहरे अंधेरे में फेंक सकती है।
जिसे पूरा बंगाल महानायक कहता था, वो अकेले में अंधेरे की गिनती कर रहा था।
और एक तारीख, जो इस कहानी में अक्सर छूट जाती है।
जिस औरत ने उसे पोर्ट की नौकरी में लौटने से रोका था, जिसकी वजह से यह पूरा नाम बना गौरी वो उसके जाने के नौ महीने बाद ही चली गईं।
अब आज पर आइए।
3 सितंबर 2026, उस बच्चे के जन्म को आज सौ साल पूरे हो रहे हैं।
अहिरीटोला और टॉलीगंज में उसकी मूर्तियों पर माला चढ़ेगी, और बिजली सिनेमा के सामने बीस फुट ऊंचा कटआउट खड़ा होगा।
न्यू टाउन में उसके नाम के फिल्म केंद्र की नींव रखी जा रही है, और डाक विभाग भी उसके नाम पर स्मृति-सामग्री जारी कर रहा है।
डाक टिकट तो सत्रह साल पहले ही आ चुका था।
चार दिन का उत्सव जिस फिल्म से शुरू होगा, वो वही है नायक। जिसकी नई, साफ की हुई कॉपी हाल में परदे पर लौटी है, और एक नई पीढ़ी उसे पहली बार बड़े परदे पर देख रही है।
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जन्म : 3 सितम्बर 1926
स्थान : अहिरितोला, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
मृत्यु : 24 जुलाई 1980
स्थान : बेल व्यू क्लिनिक, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
