इन दिनों जौहर को लेकर के बहुत बड़ी चर्चा चल रही है... हमें याद रखना चाहिए कि जोहर इतिहास के भीतर दर्ज घटनाओं में बहुत कम है, खासतौर पर पद्मावती का जौहर तो बिल्कुल भी ऐतिहासिक सत्य नहीं है, बल्कि एक सूफ़ी कवि मालिक मुहम्मद जायसी के द्वारा रचित ग्रंथ है!
आज जब जौहर को महिमा मंडित भी करने की कोशिश की जा रही है हमें नहीं भूलना चाहिए कि जोहर या सती प्रथा यह सारी बातें कहीं ना कहीं भारत और दुनिया भर की सामाजिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अलग-अलग नाम से अंकित मिलती हैं, जो स्त्रियों को दमित करके रखने का एक फूहड़ तरीका भर ही रहा है।
यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि किसी समुदाय की स्वतंत्रता का दमन करने के लिए हर बार किसी अस्त्र शस्त्र या बाहुबल की ही आवश्यकता नहीं होती है। बल्कि उसके लिए सबसे अधिक बार सांप्रदायिक,नैतिक, ऐतिहासिक और पारंपरिक दबाव पैदा किया जाता है जो अधिक स्वीकार्य और प्रभावी होता है, जिसमें सारे कुत्सित मंतव्य सम्मानजनक ढंग से समाहित हो जाते हैं! 80 के दशक में हमने राजस्थान में सती प्रथा को चलते हुए आखिरी बार भी देखा है और उसकी केस स्टडी में यह पता लगता है कि वह सती प्रथा भी ज़मीन जायदाद की लालच में हुई थी। पीछे भी तमाम ऐसी घटनाएं हैं जिनमें स्त्रियों को खासतौर पर बड़े घरानों की विधवा स्त्रियों को जला देने के कई षड्यंत्र बनाए जाते थे, जिनका सबसे सरल तरीका होता था उसे धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा के नाम पर ऐतिहासिक और सम्मानजनक होने का जामा पहना देना।
मैं जोहर अथवा सती प्रथा ऐसी किसी भी घटना को लज्जित करने वाली ऐतिहासिक घटना के तौर पर ही देखता हूं! इस कारण यदि मैं पद्मावत को सच भी मान लूं और उसके बाद के अन्य जौहर अथवा सतीप्रथा की घटनाओं स्वीकार करूं तो भी वह एक भयानक दुर्घटना से अधिक कुछ नहीं है... जिसमें की कई निर्दोष स्त्रियों को भ्रामक सम्मान के नाम पर अपनी जान गंवानी पड़ी। निःसंदेह! हमारे पुरुष प्रधान पारंपरिक पारिवारिक सामाजिक संरचना में हर युग काल में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया के अंदर स्त्रियों पर और बच्चों पर अनगिनत अत्याचार किए गए हैं।
राजतंत्र के समय ऐसा दुनिया का कोई हिस्सा नहीं और इतिहास का कोई ऐसा हिस्सा नहीं था जहां पर इस तरह की घटनाएं नहीं घटी है, पूरे वैदिक पौराणिक काल से लेकर हम मिश्र में देखते हैं, बेबीलोन में देखते हैं, ईरान में देखते हैं, इस्लामी शासन में देखते हैं, यहूदी,ईसाई शासन में देखते हैं, बौद्ध शासन में देखते हैं, सभी धार्मिक परंपराओं के शासन काम के बाद भी जब आज लोकतांत्रिक सत्ताएं आ चुकी हैं तब भी हम देखते हैं कि दंगों में, फसाद में, पारिवारिक सामुदायिक झगड़ो में यहां तक कि हमारी भाषा में हर जगह स्त्रियां टारगेट की जाती हैं उनका बलात्कार किया जाता है। उनकी हत्या की जाती है। यह मानवीय कमजोरी और पारंपरिक सोच का घृणातम रूप है जिसे प्रायः किसी अन्य धर्म या समुदाय या देश के विरुद्ध खड़ा करके अपनी वासन पूरी की जाती रही है। और इसे महानता का नाम दे कर अपने पाप को छुपा ले जाने की कोशिश मूर्खता के अलावा कुछ भी नहीं है। अगर यह पाप है तो पूरी दुनिया के लिए पाप है। और यह लज्जा जनक है हर एक के लिए उसके लिए भी जिसने इस तरह के कृत्य को उकसाया और उनके लिए भी जिन्हें यह करना पड़ा और उसको बाद में उन्होंने महिमा मंडित कर दिया गया।
अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कहानी झूठी है, लेकिन अगर यह सच है तो अलाउद्दीन खिलजी खलनायक है! पद्मावती और उसके साथ जोहर करने वाली रनियां वही बेसहारा स्त्रियां है(जिन्हें पुरुष प्रधान सोच ने एक सम्पत्ति में बदल रखा था) लेकिन वह भी लोग सबसे बड़े खलनायक है जोहर या सती प्रथा को महिमामंडित करके कहीं ना कहीं स्त्री को उस बेहूदा घेरे में बंद रखना चाहते हैं जहां से वह अपनी आजादी का ऐलान न कर सके! तथा वह यह कभी ना जान पाए कि वह एक मनुष्य है एक सामान्य मनुष्य है ना कि किसी भी दूसरे मनुष्य ,नैतिकता,परम्परा या इतिहास की बपौती ।।
-ओमा अक्क
