राहुल मिश्रा
मम्मी-पापा बेंगलुरु लौटने को निकल रहे थे। उसी वक्त बेटी रो पड़ी।
मां ने पूछा, कोई लड़का है? काम पर किसी से कुछ हुआ? कुछ हुआ है क्या?
तीनों का जवाब नहीं था।
फिर भी मां समझ गई। और उस दिन मां ने जो सवाल पूछा, दो साल बाद वही सवाल एक राष्ट्रीय अभियान बना, जो पूरे भारत में लोगों से कह रहा था कि किसी से हाल पूछो, तो एक बार दोबारा पूछो।
बेटी उस वक्त अपने काम के सबसे ऊंचे दौर में थी। फिल्में चल रही थीं, नाम चल रहा था। दादा बैडमिंटन संघ के सचिव रहे थे, पिता वो आदमी हैं जिन्होंने All England जीतने वाले पहले भारतीय बनकर देश का नाम ऊंचा किया था। और बेटी को आज करोड़ों लोग परदे पर पहचानते हैं।
नाम, दीपिका पादुकोण।
दीपिका, यानी छोटा सा दीया। ये कहानी उसी दीये की है, जिसकी लौ एक वक्त बहुत कांपने लगी थी। और उस मां की, जिसने जाते-जाते वो कांपती लौ देख ली।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
कोपेनहेगन। डेनमार्क। 5 जनवरी 1986।
प्रकाश पादुकोण उन दिनों अपने खेल का बड़ा हिस्सा डेनमार्क में रहकर खेलते और सीखते थे। वहीं बड़ी बेटी दीपिका पैदा हुई। एक साल की थी, जब परिवार बेंगलुरु लौट आया। घर में मां उज्जला थीं, पिता थे, और बाद में छोटी बहन अनीशा आई।
इस घर में बैडमिंटन तीसरी पीढ़ी का खेल था। दादा रमेश पादुकोण मैसूर बैडमिंटन एसोसिएशन के सचिव थे, और उन्होंने ही बेटे प्रकाश के हाथ में रैकेट थमाया था। वही प्रकाश 1980 में All England का सिंगल्स खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने।
तो बेटी का कोर्ट पर उतरना तय था। दीपिका ने खुद बताया है कि वो सुबह पांच बजे उठती थी। पहले फिजिकल ट्रेनिंग, फिर स्कूल, फिर दोबारा बैडमिंटन। नेशनल चैंपियनशिप के लेवल तक खेली। इसी साल जून में एक पॉडकास्ट पर पिता ने भी यही याद किया, कि बेटी की जिंदगी बेहद अनुशासन वाली थी, और खेल ने उसे फोकस करना और बड़ा सोचना सिखाया।
फिर दसवीं में एक मोड़ आया।
एक इंटरव्यू में दीपिका ने कहा था कि उसे समझ आ गया था, वो ये खेल सिर्फ इसलिए खेल रही थी क्योंकि ये परिवार में था। और उसने रैकेट रख दिया। All England चैंपियन की बेटी, और वो कह रही है कि ये मेरा रास्ता नहीं। उसने मॉडलिंग चुनी। बेंगलुरु में फैशन कोरियोग्राफर प्रसाद बिदप्पा के साथ काम शुरू किया, एक साबुन के विज्ञापन से पहचान मिली, और फिर मुंबई आ गई, जहां शुरू में मौसी के घर रही।
फिर फिल्में आईं। और एक के बाद एक आती रहीं।
अब चलते हैं उस साल पर। 2014।
बाहर से देखें तो ये उसके करियर का सबसे चमकदार वक्त था। 2020 में दावोस के मंच पर उसने खुद कहा कि बीमारी तब आई जब उसे इसकी सबसे कम उम्मीद थी। वो प्रोफेशनल हाई पर थी, फिल्में अच्छा कर रही थीं, और जिंदगी में एक बहुत अच्छा रिश्ता था।
और फिर एक सुबह। उसी भाषण में दीपिका ने बताया कि एक सुबह वो उठी, लगा सब ठीक है, और वो बेहोश होकर गिर गई।
उसके बाद जो हुआ, वो उसने 2015 में एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया था। पेट में एक अजीब सा खालीपन रहता था। सांस उथली रहती थी। किसी चीज पर ध्यान नहीं टिकता था। और वो बार-बार टूट जाती थी।
उसी साल एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी, "हैप्पी न्यू ईयर"। बाद में दीपिका ने माना कि वो शूटिंग उसके लिए बहुत मुश्किल थी, क्योंकि वो डिप्रेशन और एंग्जायटी से गुजर रही थी। और फिल्म की डायरेक्टर फराह खान ने कहा कि उन्हें सेट पर इसका अंदाजा तक नहीं हुआ।
यानी कैमरे के सामने काम चलता रहा। और कैमरे के पीछे?
परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के सामने उसने अपनी भाषा में कहा था, "मैं मुंबई में अकेली रहती थी, लेकिन इस एहसास को किसी से शेयर नहीं करती थी।"
किसी से नहीं। मां से भी नहीं।
और फिर आया वो दिन।
मम्मी-पापा कुछ दिनों के लिए बेंगलुरु से मुंबई आए थे। बेटी के पास रहे। फिर लौटने का दिन आया। और जाने के वक्त दीपिका टूट गई।
उसके अपने शब्द, "जब मेरी मम्मी मुंबई आईं और कुछ दिन बाद वापस गईं, तो मैं अचानक रोने लगी। मुझे पूरी तरह निराशा महसूस हो रही थी, जीने की इच्छा खत्म हो गई थी।"
बेटी अचानक रो रही है, बिना किसी बात के। कोई भी मां वही पूछेगी, जो उज्जला पादुकोण ने पूछा। दीपिका ने NDTV से बातचीत में वो सवाल खुद दोहराए हैं। कोई लड़का है? काम पर कोई है? कुछ हुआ है क्या?
उसके शब्दों का मतलब था, वो इनमें से कुछ भी नहीं था। वो बस एक बहुत खाली, खोखली सी जगह से आ रहा था।
और फिर वो बात, जिसके लिए ये पोस्ट लिखी गई। दीपिका ने कहा, मां तुरंत समझ गईं। और ये भी कि उसके लिए वो पल भगवान का भेजा हुआ था।
मां ने वजह पूछी। वजह थी ही नहीं। और मां ने उसी खालीपन को पहचान लिया।
ये कहानी डिप्रेशन की नहीं है।
ये उस सवाल की कहानी है, जो एक मां ने जाते-जाते पूछा, और उस चुप्पी की, जिसे मां ने जवाब मान लिया।
मां ने बेटी से कहा कि किसी जानकार से बात करो। दीपिका ने बाद में कई बार कहा है कि अगर मां ने उसके बदले हुए बर्ताव को नहीं पहचाना होता और मदद लेने को नहीं कहा होता, तो वो नहीं जानती कि आज किस हालत में होती।
उसने एक साइकोलॉजिस्ट को फोन किया। बच्चों को उसने बताया, "जब इस बारे में खुलकर बात की, तो खुद को हल्का महसूस किया।" जिस काउंसलर ने उस दौर में उसकी मदद की, वो थीं ऐना चांडी, जो आगे चलकर उसकी संस्था की चेयरपर्सन बनीं।
पर एक बात दीपिका ने कभी नहीं छिपाई, और यही इस कहानी का सबसे ईमानदार हिस्सा है। उसने कहा कि काउंसलिंग से मदद मिली, पर एक हद तक। 2015 वाले उस इंटरव्यू के मुताबिक, फिर बेंगलुरु के एक मनोचिकित्सक से दूसरी राय ली गई, और पहले हिचकने के बाद उसने दवा लेना भी माना। हमारे यहां तो अक्सर दवा का नाम सुनते ही लोग "पागलों वाली दवा" कह देते हैं, वहां सबसे बड़ी स्टार में से एक ने ये बात बिना झिझक कही।
पर ठीक होने के बाद दुनिया को बताने की क्या जरूरत थी? इसका जवाब इसी साल जून में उसके पिता ने दिया है। प्रकाश पादुकोण ने बताया कि दीपिका की एक दोस्त की मौत हुई थी, और तभी बेटी ने तय किया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूक हों।
और परिवार? पिता के शब्दों में, "अगर इससे दूसरों की मदद हो रही थी, तो हमें इस बात को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि दीपिका ऐसी स्थिति में थी कि लोगों की मदद कर सकती थी।"
जनवरी 2015 में दीपिका ने एक अखबार को इंटरव्यू देकर सबके सामने कहा कि उसे डिप्रेशन था। बात इतनी बड़ी थी कि अमेरिका के वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इस पर खबर छापी। उसी इंटरव्यू में उसने कहा था कि इसे मानने और इसके बारे में बोलने से उसे आजादी मिली है।
उसी साल उसने एक संस्था बनाई, "द लिव लव लाफ फाउंडेशन"।
और अब वो बात, जिसका वादा ऊपर किया था।
10 अक्टूबर 2016। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस। दीपिका की संस्था ने एक अभियान शुरू किया, नाम था "दोबारा पूछो"। संस्था के हिसाब से ये मानसिक स्वास्थ्य पर देश का पहला राष्ट्रीय जागरूकता अभियान था। पूरा संदेश बस इतना, कि किसी से पूछो "कैसे हो?", और वो कहे "ठीक हूं", तो रुको, और एक बार दोबारा पूछो। सच में, कैसे हो?
यानी मुंबई के उस घर में जाते-जाते जो सवाल एक मां ने पूछा था, बेटी ने उसे पूरे देश का सवाल बना दिया।
संस्था वहीं नहीं रुकी। उसी साल कर्नाटक के दावणगेरे के गांवों में मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों तक इलाज पहुंचाने का काम शुरू हुआ। स्कूलों में बच्चों के लिए कार्यक्रम शुरू हुए, डॉक्टरों के लिए ट्रेनिंग शुरू हुई। 2023 में ये काम हिंदी पट्टी तक पहुंचा, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा तक। संस्था के मुताबिक दावणगेरे वाला काम अब अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है।
जनवरी 2020 में दावोस में World Economic Forum ने इसी काम के लिए उसे क्रिस्टल अवॉर्ड दिया। 2022 में TIME मैगजीन ने भी इसी काम के लिए सम्मानित किया।
फरवरी 2025 में वो परीक्षा पे चर्चा में बच्चों के बीच थी। वहां उसने कोई भारी भाषण नहीं दिया। कहा कि परीक्षा से पहले वाली रात मम्मी-पापा से बात करो, जो डर है, उसे किसी भरोसे वाले से कह दो। नींद को उसने एक मुफ्त की सुपरपावर बताया। धूप और खुली हवा की बात की। और कहा कि तनाव होना तो स्वाभाविक है, असली बात ये है कि हम उसे संभालते कैसे हैं।
मम्मी-पापा से बात करो। जो लड़की खुद कभी मां से कुछ नहीं कह पाई थी, वही अब बच्चों से यही कह रही थी।
और एक बात, जो मुझे इस पूरी कहानी में सबसे सच्ची लगी। 2022 में एक इंटरव्यू में दीपिका ने माना कि आज भी उसे डर रहता है कि कहीं ये वापस न आ जाए। इसलिए हर सुबह उठकर वो अपनी सेहत को सबसे पहले रखती है।
ये कोई फिल्मी "हैप्पी एंडिंग" नहीं है। ये एक इंसान का रोज का ध्यान रखना है।
अब लौटिए उस पिता पर, जिसके घर में दिन सुबह पांच बजे शुरू होता था। इसी साल जून में प्रकाश पादुकोण ने कहा कि उन्होंने अपनी बेटी से सीखा है कि मेंटल हेल्थ हमेशा पहले आनी चाहिए। आराम, अच्छा खाना, कसरत, और तनाव को संभालना, ये सब आपस में जुड़े हैं।
देश का पहला All England चैंपियन, इकहत्तर साल की उम्र में, अपनी बेटी का छात्र बना बैठा है। वही बेटी, जिसने दसवीं में उनका खेल छोड़ दिया था।
और अब वो तारीख, जिसकी वजह से ये कहानी आज लिखी गई।
19 सितंबर 2026।
एक हफ्ता पहले दीपिका और रणवीर सिंह के घर दूसरी बेटी आई। बड़ी बेटी दुआ इसी महीने की 8 तारीख को दो साल की हुई है। दोनों ने एक सादी सी तस्वीर डाली। छोटे से पैरों की छाप, नीचे तीन नाम, रणवीर, दीपिका, दुआ, और वो तारीख। साथ में लिखा कि दुआ और उनके दिल, दोनों बड़े हो रहे हैं।
यानी जो लड़की कभी मां के जाते वक्त बिना वजह रो पड़ी थी, वो आज खुद दो बेटियों की मां है।
अठारह साल से अखबार की डेस्क पर हूं। "सब ठीक है" से ज्यादा झूठा वाक्य मैंने न किसी खबर में पढ़ा, न किसी फोन पर सुना।
मेरी भी एक बेटी है, ज्ञानवी। ये पोस्ट लिखते हुए समझ आया कि "खाना खाया?" के बाद एक सवाल और पूछना चाहिए।
उज्जला पादुकोण ने उस दिन जो सवाल पूछा था, वो उनकी बेटी ने देश को सौंप दिया। और अब वही सवाल उस घर में लौट आया है, जहां दो नन्हीं बच्चियां बड़ी होंगी। उनकी मां जानती है कि रोना कमजोरी नहीं होता, कि दवा लेना शर्म नहीं होती, और "ठीक हूं" सुनकर बात खत्म नहीं करनी चाहिए।
दादा ने बेटे को रैकेट थमाया था। बेटे ने बेटी को अनुशासन दिया। और मां ने बेटी को एक सवाल दिया।
और तीसरी पीढ़ी की बेटी ने उस सवाल से पूरे देश के लिए एक दरवाजा खोल दिया।
मां ने तीन सवाल पूछे। तीनों का जवाब नहीं था। फिर भी मां समझ गई।
इस कहानी से जो रखने लायक है:
भारत सरकार की मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन Tele-MANAS, नंबर 14416 या 1-800-891-4416, चौबीसों घंटे, मुफ्त।
दीपिका की बात बच्चों के लिए, नींद एक मुफ्त की सुपरपावर है, और परीक्षा से पहले की रात मम्मी-पापा से बात।
और उस संस्था का दो शब्दों वाला नियम, "दोबारा पूछो"।
ये कहानी उस मां तक पहुंचनी चाहिए, जिसका बच्चा किसी दूसरे शहर में, या दूसरे देश में अकेला रहता है, और हर फोन पर कहता है, सब ठीक है।
इस पोस्ट में जो बात भी दीपिका या उनके पिता के नाम से आई है, वो उन्होंने खुद कही है, इंटरव्यू में, मंच पर, कैमरे के सामने। कहने का ढंग मेरा है। तथ्य मेरे नहीं।
आपके घर में "दोबारा" कौन पूछता है?
