सन्दीप तोमर
रिटायरमेंट के बाद मनोज की दिनचर्या बाकी लोगों जैसी नहीं रह गई थी। अधिकांश लोग नौकरी से मुक्त होकर आराम, तीर्थयात्रा या रिश्तेदारियों में समय बिताने की योजना बनाते हैं, लेकिन मनोज ने अपने जीवन का सबसे कठिन और सबसे अर्थपूर्ण काम उसी उम्र में शुरू किया था, जब लोग जिम्मेदारियों से छुटकारा पाने की सोचते हैं।
सुबह चार बजे उठना अब भी उनकी आदत थी। नहा-धोकर, हल्का नाश्ता करके वे अपनी पुरानी साइकिल उठाते और शहर के किनारे बसे उस इलाके की ओर निकल जाते, जिसे लोग “काली बस्ती” कहते थे। शहर के संभ्रांत लोग जिस बस्ती का नाम लेते हुए भी नाक-भौं सिकोड़ते, जहाँ टूटी झुग्गियाँ थीं, खुले नाले थे, बदबू थी, बेरोज़गारी थी और उससे भी ज्यादा था उम्मीदों का अभाव, वहाँ मनोज ने अपनी अनूठी प्रयोगशाला की निर्मिति तय की।
मनोज पिछले पंद्रह वर्षों से उस बस्ती के बच्चों को पढ़ा रहे थे। शुरू में उन्होंने केवल पाँच बच्चों को सड़क किनारे बैठाकर पढ़ाना शुरू किया था। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ते गए। किसी के हाथ में कूड़ा बीनने वाला कट्टा होता, कोई होटल में बर्तन मांजकर आता, कोई ट्रैफिक सिग्नल से भीख माँगकर कक्षा में आता था। मनोज उन बच्चों को पकड़-पकड़कर पढ़ाई के लिए लाते थे।
कई बार बच्चे भाग जाते। कई बार उनके माता-पिता उल्टा मनोज पर ही बरस पड़ते। उनका जवाब होता- “मास्टर जी, पढ़ाई से पेट नहीं भरता। दिन भर कूड़ा बीनेंगे तो ही शाम को रोटी आएगी। हमारे यहाँ पैसों के पेड़ नहीं लगे कि पैसे तोड़े और खाना आ गया, आप हमारे बच्चों को निकम्मा बना देंगे।”
लेकिन मनोज हार नहीं मानते। वे कभी किताबें खरीदकर लाते, कभी पुराने कपड़े इकट्ठा करते, कभी किसी समाजसेवी संस्था से मदद मांगते। धीरे-धीरे कुछ बच्चे पढ़ाई में टिकने लगे।
उनकी पत्नी सुनीता कई बार चिंता में कहतीं— “अब उम्र हो गई है मनोज जी। थोड़ा अपने लिए भी जी लीजिए।”
मनोज मुस्करा देते- “बस यह अपने लिए ही तो कर रहा हूँ।”
रिटायरमेंट के बाद उनकी लगन और बढ़ गई थी। अब उन्होंने बस्ती में एक छोटी डिस्पेंसरी खुलवाने का बीड़ा भी उठा लिया था। वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते, डॉक्टरों से मिलते, दवाइयों के लिए समाजसेवियों से मदद मांगते। कई लोग उनकी पीठ थपथपाते, पर वास्तविक मदद बहुत कम लोग करते। फिर भी वे रोज उसी उत्साह से काम में लगे रहते।
उस शाम भी वे बाजार निकले थे। घर का कुछ सामान लेना था। सर्दियों की हल्की गुलाबी शाम थी। सड़क पर भीड़ बढ़ने लगी थी। मनोज एक थैले में सब्जियाँ रखे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे कि सामने से तीन जवान लड़के उनकी ओर आते दिखाई दिए।
तीनों के चेहरे पर आत्मविश्वास और विनम्र मुस्कान थी। मनोज ने गौर से देखने की कोशिश की। माथे पर बल पड़े, लेकिन चेहरों को पहचान नहीं पाए।
तीनों पास आकर एक साथ झुक गए- “नमस्ते सर!”
मनोज थोड़ा सकपका गए। तीनों समझ गए कि गुरुजी उन्हें पहचान नहीं पाए हैं। उनमें से एक मुस्कराया- “सर, शायद आपने हमें नहीं पहचाना?”
मनोज ने हल्की झेंप के साथ कहा- “हाँ बेटा, रिटायर होकर नजर और याददाश्त दोनों कमजोर हो गई हैं।”
लड़के की आँखें चमक उठीं- “सर, मैं राजू… ये मोहन… और ये जयराम।”
मनोज कुछ क्षण चुप रहे। फिर जैसे यादों की कोई धूल अचानक हट गई हो। उनके चेहरे पर विस्मय फैल गया।
“अरे… तुम लोग?”
राजू हँस पड़ा- “हाँ सर, वही… जिनके हाथ से आपने कूड़ा बीनने वाला कट्टा छीनकर कॉपी-किताब पकड़ा दी थी।”
मोहन ने भावुक स्वर में कहा- “सर, अगर उस दिन आपने हमें जबरदस्ती पकड़कर स्कूल न भेजा होता तो शायद आज भी हम कूड़े के ढेर में प्लास्टिक ढूँढ़ रहे होते।”
जयराम बोला- “याद है सर? हम लोग पढ़ने नहीं आते थे तो आप खुद झुग्गियों में आ जाते थे।”
मनोज की आँखों के सामने बीस साल पुरानी तस्वीरें घूमने लगीं। बरसात में कीचड़ से भरी गलियाँ… बदबूदार नाले… फटे कपड़ों में भागते बच्चे… और उनके पीछे किताब लेकर दौड़ते वे खुद।
दिल्ली के द्वारका इलाके में मटियाला नाम की एक जगह है। उसी मटियाला के किनारे बसी थी- “काली बस्ती”। यह नाम जितना साधारण था, वहाँ की जिंदगियाँ उससे कहीं ज्यादा कठिन थी। टीन की छतों, प्लास्टिक के टाट और टूटे बांसों से बनी झुग्गियों के बीच फैली हुई वह बस्ती शहर के चमचमाते मॉलों और ऊँची इमारतों के बिल्कुल पास होते हुए भी उनसे कोसों दूर थी। बरसात में तो आलम ये होता कि जुग्गियों में घुटनों तक पानी भरा होता था।
सुबह होते ही यहाँ की गलियों में बच्चों की आवाजें नहीं, बल्कि कूड़े के कट्टों की घिसटने की आवाज सुनाई देती थी। छोटे-छोटे हाथ बोरे उठाए निकल पड़ते थे। किसी के हिस्से प्लास्टिक आता, किसी के हिस्से लोहे के टुकड़े। कुछ बच्चे द्वारका की रेड लाइटों पर हाथ फैलाए खड़े रहते। उनकी आँखों में बचपन कम और भूख ज्यादा दिखाई देती थी।
इसी इलाके के निगम प्राथमिक विद्यालय मटियाला में मनोज कुमार की नियुक्ति हुई थी।
पहले दिन स्कूल से लौटते समय उन्होंने सड़क किनारे एक सात-आठ साल के बच्चे को देखा। बच्चा कूड़े के ढेर में कुछ तलाश रहा था। उसके पीछे दो छोटी बच्चियाँ थीं, जिनके हाथों में मैले कटोरे थे। ट्रैफिक सिग्नल लाल होते ही वे गाड़ियों की ओर दौड़ पड़तीं।
मनोज कुछ देर तक उन्हें देखते रहे। फिर न जाने क्यों उनके भीतर कुछ टूट-सा गया। उस रात वे देर तक सो नहीं सके। पत्नी सुनीता ने पूछा- “क्या बात है? इतने परेशान क्यों हो?”
मनोज धीरे से बोले- “आज स्कूल के बाहर मैंने ऐसे बच्चों को देखा जिनकी उम्र किताब पकड़ने की है… लेकिन हाथ में कूड़े का बोरा है या फिर भीख माँगने का कटोरा।”
सुनीता ने लंबी साँस लेते हुए कहा- “ऐसे बच्चे तो बहुत हैं।”
“हाँ,” मनोज बोले, “लेकिन शायद हम सब उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।”
अगले दिन से मनोज का जीवन बदल गया। स्कूल की ड्यूटी खत्म होने के बाद वे सीधे काली बस्ती जाने लगे। शुरुआत आसान नहीं थी। बच्चे उन्हें देखते ही भाग जाते। कुछ लोग शक की निगाह से देखते। एक दिन उन्होंने दस साल के राजू को रोककर पूछा- “स्कूल जाओगे?”
राजू हँस पड़ा- “स्कूल जाकर क्या मिलेगा?”
“पढ़ाई मिलेगी।”
“उससे रोटी मिलेगी?”
मनोज चुप रह गए।
यही हाल दूसरे लड़के राजू के साथ भी हुआ, ठीक उसी शाम राजू की माँ ने लगभग झिड़कते हुए कहा- “मास्टर जी, हमारा लड़का शाम तक पचास-साठ रुपये कमा लाता है। स्कूल जाएगा तो घर कैसे चलेगा?”
मनोज के पास इन सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था। लेकिन उनके भीतर एक जिद जन्म ले चुकी थी। उन्होंने तय किया कि यदि बच्चे स्कूल नहीं आ सकते तो वे खुद बच्चों तक जाएंगे। उन्होंने अपने कुछ संवेदनशील साथियों के साथ विमर्श करने का निर्णय लिया। एक-दो पढने के समय के साथी और एक-दो पढ़ाने के समय के साथी उनके साथ काम करने को राजी हुए। योजना बनी कि एक बच्चा यदि पचास रूपये रोज कमाकर अपने परिवार को देता है तो महीने का हुआ पंद्रह सौ, यदि इतनी राशि का राशन-सामान इन परिवारों में वितरित किया जाए इस शर्त के साथ कि आप अपने बच्चों को कूड़ा बीनने या भीख मांगने न भेजकर हमारे पास पढने भेजेंगे तो शायद ये समस्या सुलझ सकती है। योजना पर सबकी सहमती हुई तो काम पर अमला होना भी शुरू हुआ।
शुरुआत में उन्होंने बस्ती के बाहर एक खाली जगह पर पाँच बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। फटी कॉपियाँ, उधार की किताबें, टूटी पेंसिलें—बस इतना ही सामान था।
कई दिन तो बच्चे पढ़ने के बजाय भाग जाते। कोई कहता- “माँ बुला रही है।” कोई कट्टा उठाकर भाग खड़ा होता। लेकिन मनोज हार नहीं मानते। धीरे-धीरे कुछ बच्चे टिकने लगे।
इसी दौरान उनकी मुलाकात शिक्षिका अंशु पाठक से हुई। अंशु भी पास के निगम विद्यालय ककरोला में पढ़ाती थीं। उन्होंने जब बच्चों की स्थिति देखी तो वे भी इस प्रयास से जुड़ गईं।
अंशु अक्सर कहतीं- “जब ये बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बेंच पर बैठते हैं न, तो लगता है जैसे किसी सूखी मिट्टी में पहली हरियाली उग आई हो।”
पाँच-छः लोगों की यह कोशिश धीरे-धीरे एक अभियान बन गई, नाम दिया गया “टीम आज्ञा” यानी “अक्षर ज्ञान अभियान।”
उनका एक ही नारा था- “चले हैं हम शिक्षा का दीप जलाने को…”
अब शाम को बस्ती में छोटे-छोटे शिक्षा केंद्र लगने लगे। आशा सेठ, मंजू ग्रोवर, संतराम, अंजू, सुदीप और कई अन्य साथी भी जुड़ते चले गए। कोई बच्चों को पढ़ाता, कोई राशन लाता, कोई कपड़े जुटाता।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था। कुछ स्थानीय नेताओं को यह सब पसंद नहीं आया। उन्हें डर था कि पढ़े-लिखे लोग सवाल पूछना सीख जाते हैं।
एक बार बस्ती में पढ़ाई बंद करवाने की कोशिश भी हुई। एक आदमी ने गुस्से में कहा- “तुम लोग बच्चों को बिगाड़ रहे हो। ये पढ़-लिखकर अफसर बनेंगे क्या?”
मनोज ने शांत स्वर में जवाब दिया- “न बनें अफसर… लेकिन इंसान तो बनेंगे।”
धीरे-धीरे असर भी दिखने लगा। जो बच्चे पहले ट्रैफिक सिग्नल पर भीख माँगते थे, वे अब स्कूल की प्रार्थना में खड़े दिखाई देने लगे। जिन हाथों में कूड़े की थैलियाँ थीं, उनमें अब कॉपी-किताबें थीं। टीम आज्ञा ने अथक प्रयासों से चार स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर (STC) खुलवाए। यहाँ उन बच्चों को पढ़ाया जाता था जिन्हें उम्र के हिसाब से बड़ी कक्षा में दाखिला मिलना था लेकिन वे अक्षर तक नहीं पहचानते थे।
मनोज और अंशु खुद बच्चों के बैग और कॉपियाँ बाँटते। त्योहार भी उन्हीं बच्चों के साथ मनाए जाते।
बाल दिवस पर टीम के सदस्य सुदीप ने यह पर्व इन बच्चो के साथ बड़े पैमाने पर मानने का निर्णय लिया, टीम के सभी सदस्य सहमत हुए। उन्होंने अपनी बेटी के जन्मदिन पर बच्चों को स्वेटर बाँटने की इच्छा भी जताई। उन्होंने मनोज को स्वेटर कह्रिदने के लिए शाम को पैसे दिए, उसी रात ठीक आठ बजे नोटबंदी की घोषणा हुई तो सबके हाथ अपने-पाने टीवी के रिमोट पर फ्रीज हो गए। अगले दिन पैसे निकालना मुश्किल था, पुराने नोट चलन से बाहर थे लेकिन मनोज ने किसी तरह व्यवस्था की। इत्तेफाकन टीम की ही एक नयी सदस्य अनीता की वैवाहिक वर्षगांठ भी उसी दिन थी, उस दिन बच्चों को स्वेटर, खाना और मिठाइयाँ मिलीं।
कई बच्चों ने शायद पहली बार महसूस किया था कि त्योहार सिर्फ अमीरों के लिए नहीं होते।
करीना नाम की एक बच्ची, जो कभी रेड लाइट पर भीख माँगती थी, अब सुंदर चित्र बनाती थी। पवन पढ़ाई में इतना तेज निकला कि अपनी कक्षा में दूसरा स्थान लेकर आया। जब उसे पुरस्कार मिला तो बाकी बच्चों की आँखों में भी चमक आ गई- “अगली बार इनाम हमें मिलेगा।” यही वह जज़्बा था जिसे टीम आज्ञा पैदा करना चाहती थी। और अपने इरादों में धीरे-धीरे ही सही परन्तु कामयाब हो रही थी।
उन्हें याद आया, एक बार राजू के पिता ने गुस्से में उन्हें धक्का दे दिया था- “मेरा लड़का पढ़-लिखकर कलेक्टर बनेगा क्या?” उस रात मनोज देर तक सो नहीं पाए थे। लेकिन अगले दिन वे फिर उसी झुग्गी में पहुँचे थे। आज वही राजू सामने खड़ा था- साफ-सुथरे कपड़ों में, आत्मविश्वास से भरा हुआ।
मनोज ने पूछा- “तो अब क्या कर रहे हो तुम लोग?”
राजू ने गर्व से कहा- “सर, हम तीनों ने एम.सी.ए. किया है।”
“और अब?” -मनोज की आवाज़ काँप गई।
“सर, बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।”
कुछ क्षणों के लिए मनोज जैसे स्तब्ध रह गए। उनकी आँखें भर आईं। वे तीनों को देखते रहे, मानो अपने सपनों को साकार रूप में खड़ा देख रहे हों।
मोहन ने जेब से एक कार्ड निकालकर मनोज को दिया- “सर, अगले महीने हमारी कंपनी ने हमें विदेश भेजने का प्रोजेक्ट दिया है। लेकिन उससे पहले हम आपसे मिलना चाहते थे।”
जयराम धीरे से बोला- “सर, आपने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं… इंसान होने का मतलब समझाया।”
मनोज के भीतर वर्षों की थकान जैसे पिघलने लगी। उन्हें लगा, उनकी छोटी-सी कोशिश व्यर्थ नहीं गई। इतने में राजू ने संकोच से कहा- “सर, हमने सुना है आप बस्ती में डिस्पेंसरी खुलवा रहे हैं?”
मनोज ने धीमे स्वर में कहा- “कोशिश कर रहा हूँ बेटा… लेकिन अभी बहुत पैसे और सहयोग चाहिए।”
तीनों लड़कों ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर राजू ने मुस्कराते हुए कहा- “सर, आपने बहुत कुछ कर लिया, अब हमारी बारी है।” लेकिन मनोज कुछ समझ नहीं पाए।
मोहन बोला- “जिस बस्ती से हम निकले हैं, वहाँ के बच्चों को अब इलाज के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा।”
जयराम ने कहा- “हम तीनों ने मिलकर शुरुआत के लिए पाँच लाख रुपये जमा किए हैं।”
मनोज अवाक् रह गए। बोले- “नहीं बेटा… ये बहुत ज्यादा है…”
राजू ने विनम्रता से उनके हाथ पकड़ लिए- “सर, ये दान नहीं है। ये आपका ही लगाया हुआ बीज है, जो अब पेड़ बनकर लौट रहा है।” मनोज की आँखों से आँसू बह निकले। बाजार की भीड़, गाड़ियों का शोर, दुकानों की रोशनी- सब धुंधला गया। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि असली रिटायरमेंट नौकरी से नहीं होता। जब तक इंसान के भीतर दूसरों के लिए कुछ करने का जज़्बा जिंदा है, तब तक जीवन भी जिंदा रहता है।
उस रात मनोज बहुत दिनों बाद निश्चिंत होकर सोए। उन्हें पता था- अब काली बस्ती का भविष्य अकेला नहीं है।
***
लेकिन मनोज हार नहीं मानते। वे कभी किताबें खरीदकर लाते, कभी पुराने कपड़े इकट्ठा करते, कभी किसी समाजसेवी संस्था से मदद मांगते। धीरे-धीरे कुछ बच्चे पढ़ाई में टिकने लगे।
उनकी पत्नी सुनीता कई बार चिंता में कहतीं— “अब उम्र हो गई है मनोज जी। थोड़ा अपने लिए भी जी लीजिए।”
मनोज मुस्करा देते- “बस यह अपने लिए ही तो कर रहा हूँ।”
रिटायरमेंट के बाद उनकी लगन और बढ़ गई थी। अब उन्होंने बस्ती में एक छोटी डिस्पेंसरी खुलवाने का बीड़ा भी उठा लिया था। वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते, डॉक्टरों से मिलते, दवाइयों के लिए समाजसेवियों से मदद मांगते। कई लोग उनकी पीठ थपथपाते, पर वास्तविक मदद बहुत कम लोग करते। फिर भी वे रोज उसी उत्साह से काम में लगे रहते।
उस शाम भी वे बाजार निकले थे। घर का कुछ सामान लेना था। सर्दियों की हल्की गुलाबी शाम थी। सड़क पर भीड़ बढ़ने लगी थी। मनोज एक थैले में सब्जियाँ रखे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे कि सामने से तीन जवान लड़के उनकी ओर आते दिखाई दिए।
तीनों के चेहरे पर आत्मविश्वास और विनम्र मुस्कान थी। मनोज ने गौर से देखने की कोशिश की। माथे पर बल पड़े, लेकिन चेहरों को पहचान नहीं पाए।
तीनों पास आकर एक साथ झुक गए- “नमस्ते सर!”
मनोज थोड़ा सकपका गए। तीनों समझ गए कि गुरुजी उन्हें पहचान नहीं पाए हैं। उनमें से एक मुस्कराया- “सर, शायद आपने हमें नहीं पहचाना?”
मनोज ने हल्की झेंप के साथ कहा- “हाँ बेटा, रिटायर होकर नजर और याददाश्त दोनों कमजोर हो गई हैं।”
लड़के की आँखें चमक उठीं- “सर, मैं राजू… ये मोहन… और ये जयराम।”
मनोज कुछ क्षण चुप रहे। फिर जैसे यादों की कोई धूल अचानक हट गई हो। उनके चेहरे पर विस्मय फैल गया।
“अरे… तुम लोग?”
राजू हँस पड़ा- “हाँ सर, वही… जिनके हाथ से आपने कूड़ा बीनने वाला कट्टा छीनकर कॉपी-किताब पकड़ा दी थी।”
मोहन ने भावुक स्वर में कहा- “सर, अगर उस दिन आपने हमें जबरदस्ती पकड़कर स्कूल न भेजा होता तो शायद आज भी हम कूड़े के ढेर में प्लास्टिक ढूँढ़ रहे होते।”
जयराम बोला- “याद है सर? हम लोग पढ़ने नहीं आते थे तो आप खुद झुग्गियों में आ जाते थे।”
मनोज की आँखों के सामने बीस साल पुरानी तस्वीरें घूमने लगीं। बरसात में कीचड़ से भरी गलियाँ… बदबूदार नाले… फटे कपड़ों में भागते बच्चे… और उनके पीछे किताब लेकर दौड़ते वे खुद।
दिल्ली के द्वारका इलाके में मटियाला नाम की एक जगह है। उसी मटियाला के किनारे बसी थी- “काली बस्ती”। यह नाम जितना साधारण था, वहाँ की जिंदगियाँ उससे कहीं ज्यादा कठिन थी। टीन की छतों, प्लास्टिक के टाट और टूटे बांसों से बनी झुग्गियों के बीच फैली हुई वह बस्ती शहर के चमचमाते मॉलों और ऊँची इमारतों के बिल्कुल पास होते हुए भी उनसे कोसों दूर थी। बरसात में तो आलम ये होता कि जुग्गियों में घुटनों तक पानी भरा होता था।
सुबह होते ही यहाँ की गलियों में बच्चों की आवाजें नहीं, बल्कि कूड़े के कट्टों की घिसटने की आवाज सुनाई देती थी। छोटे-छोटे हाथ बोरे उठाए निकल पड़ते थे। किसी के हिस्से प्लास्टिक आता, किसी के हिस्से लोहे के टुकड़े। कुछ बच्चे द्वारका की रेड लाइटों पर हाथ फैलाए खड़े रहते। उनकी आँखों में बचपन कम और भूख ज्यादा दिखाई देती थी।
इसी इलाके के निगम प्राथमिक विद्यालय मटियाला में मनोज कुमार की नियुक्ति हुई थी।
पहले दिन स्कूल से लौटते समय उन्होंने सड़क किनारे एक सात-आठ साल के बच्चे को देखा। बच्चा कूड़े के ढेर में कुछ तलाश रहा था। उसके पीछे दो छोटी बच्चियाँ थीं, जिनके हाथों में मैले कटोरे थे। ट्रैफिक सिग्नल लाल होते ही वे गाड़ियों की ओर दौड़ पड़तीं।
मनोज कुछ देर तक उन्हें देखते रहे। फिर न जाने क्यों उनके भीतर कुछ टूट-सा गया। उस रात वे देर तक सो नहीं सके। पत्नी सुनीता ने पूछा- “क्या बात है? इतने परेशान क्यों हो?”
मनोज धीरे से बोले- “आज स्कूल के बाहर मैंने ऐसे बच्चों को देखा जिनकी उम्र किताब पकड़ने की है… लेकिन हाथ में कूड़े का बोरा है या फिर भीख माँगने का कटोरा।”
सुनीता ने लंबी साँस लेते हुए कहा- “ऐसे बच्चे तो बहुत हैं।”
“हाँ,” मनोज बोले, “लेकिन शायद हम सब उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।”
अगले दिन से मनोज का जीवन बदल गया। स्कूल की ड्यूटी खत्म होने के बाद वे सीधे काली बस्ती जाने लगे। शुरुआत आसान नहीं थी। बच्चे उन्हें देखते ही भाग जाते। कुछ लोग शक की निगाह से देखते। एक दिन उन्होंने दस साल के राजू को रोककर पूछा- “स्कूल जाओगे?”
राजू हँस पड़ा- “स्कूल जाकर क्या मिलेगा?”
“पढ़ाई मिलेगी।”
“उससे रोटी मिलेगी?”
मनोज चुप रह गए।
यही हाल दूसरे लड़के राजू के साथ भी हुआ, ठीक उसी शाम राजू की माँ ने लगभग झिड़कते हुए कहा- “मास्टर जी, हमारा लड़का शाम तक पचास-साठ रुपये कमा लाता है। स्कूल जाएगा तो घर कैसे चलेगा?”
मनोज के पास इन सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था। लेकिन उनके भीतर एक जिद जन्म ले चुकी थी। उन्होंने तय किया कि यदि बच्चे स्कूल नहीं आ सकते तो वे खुद बच्चों तक जाएंगे। उन्होंने अपने कुछ संवेदनशील साथियों के साथ विमर्श करने का निर्णय लिया। एक-दो पढने के समय के साथी और एक-दो पढ़ाने के समय के साथी उनके साथ काम करने को राजी हुए। योजना बनी कि एक बच्चा यदि पचास रूपये रोज कमाकर अपने परिवार को देता है तो महीने का हुआ पंद्रह सौ, यदि इतनी राशि का राशन-सामान इन परिवारों में वितरित किया जाए इस शर्त के साथ कि आप अपने बच्चों को कूड़ा बीनने या भीख मांगने न भेजकर हमारे पास पढने भेजेंगे तो शायद ये समस्या सुलझ सकती है। योजना पर सबकी सहमती हुई तो काम पर अमला होना भी शुरू हुआ।
शुरुआत में उन्होंने बस्ती के बाहर एक खाली जगह पर पाँच बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। फटी कॉपियाँ, उधार की किताबें, टूटी पेंसिलें—बस इतना ही सामान था।
कई दिन तो बच्चे पढ़ने के बजाय भाग जाते। कोई कहता- “माँ बुला रही है।” कोई कट्टा उठाकर भाग खड़ा होता। लेकिन मनोज हार नहीं मानते। धीरे-धीरे कुछ बच्चे टिकने लगे।
इसी दौरान उनकी मुलाकात शिक्षिका अंशु पाठक से हुई। अंशु भी पास के निगम विद्यालय ककरोला में पढ़ाती थीं। उन्होंने जब बच्चों की स्थिति देखी तो वे भी इस प्रयास से जुड़ गईं।
अंशु अक्सर कहतीं- “जब ये बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बेंच पर बैठते हैं न, तो लगता है जैसे किसी सूखी मिट्टी में पहली हरियाली उग आई हो।”
पाँच-छः लोगों की यह कोशिश धीरे-धीरे एक अभियान बन गई, नाम दिया गया “टीम आज्ञा” यानी “अक्षर ज्ञान अभियान।”
उनका एक ही नारा था- “चले हैं हम शिक्षा का दीप जलाने को…”
अब शाम को बस्ती में छोटे-छोटे शिक्षा केंद्र लगने लगे। आशा सेठ, मंजू ग्रोवर, संतराम, अंजू, सुदीप और कई अन्य साथी भी जुड़ते चले गए। कोई बच्चों को पढ़ाता, कोई राशन लाता, कोई कपड़े जुटाता।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था। कुछ स्थानीय नेताओं को यह सब पसंद नहीं आया। उन्हें डर था कि पढ़े-लिखे लोग सवाल पूछना सीख जाते हैं।
एक बार बस्ती में पढ़ाई बंद करवाने की कोशिश भी हुई। एक आदमी ने गुस्से में कहा- “तुम लोग बच्चों को बिगाड़ रहे हो। ये पढ़-लिखकर अफसर बनेंगे क्या?”
मनोज ने शांत स्वर में जवाब दिया- “न बनें अफसर… लेकिन इंसान तो बनेंगे।”
धीरे-धीरे असर भी दिखने लगा। जो बच्चे पहले ट्रैफिक सिग्नल पर भीख माँगते थे, वे अब स्कूल की प्रार्थना में खड़े दिखाई देने लगे। जिन हाथों में कूड़े की थैलियाँ थीं, उनमें अब कॉपी-किताबें थीं। टीम आज्ञा ने अथक प्रयासों से चार स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर (STC) खुलवाए। यहाँ उन बच्चों को पढ़ाया जाता था जिन्हें उम्र के हिसाब से बड़ी कक्षा में दाखिला मिलना था लेकिन वे अक्षर तक नहीं पहचानते थे।
मनोज और अंशु खुद बच्चों के बैग और कॉपियाँ बाँटते। त्योहार भी उन्हीं बच्चों के साथ मनाए जाते।
बाल दिवस पर टीम के सदस्य सुदीप ने यह पर्व इन बच्चो के साथ बड़े पैमाने पर मानने का निर्णय लिया, टीम के सभी सदस्य सहमत हुए। उन्होंने अपनी बेटी के जन्मदिन पर बच्चों को स्वेटर बाँटने की इच्छा भी जताई। उन्होंने मनोज को स्वेटर कह्रिदने के लिए शाम को पैसे दिए, उसी रात ठीक आठ बजे नोटबंदी की घोषणा हुई तो सबके हाथ अपने-पाने टीवी के रिमोट पर फ्रीज हो गए। अगले दिन पैसे निकालना मुश्किल था, पुराने नोट चलन से बाहर थे लेकिन मनोज ने किसी तरह व्यवस्था की। इत्तेफाकन टीम की ही एक नयी सदस्य अनीता की वैवाहिक वर्षगांठ भी उसी दिन थी, उस दिन बच्चों को स्वेटर, खाना और मिठाइयाँ मिलीं।
कई बच्चों ने शायद पहली बार महसूस किया था कि त्योहार सिर्फ अमीरों के लिए नहीं होते।
करीना नाम की एक बच्ची, जो कभी रेड लाइट पर भीख माँगती थी, अब सुंदर चित्र बनाती थी। पवन पढ़ाई में इतना तेज निकला कि अपनी कक्षा में दूसरा स्थान लेकर आया। जब उसे पुरस्कार मिला तो बाकी बच्चों की आँखों में भी चमक आ गई- “अगली बार इनाम हमें मिलेगा।” यही वह जज़्बा था जिसे टीम आज्ञा पैदा करना चाहती थी। और अपने इरादों में धीरे-धीरे ही सही परन्तु कामयाब हो रही थी।
उन्हें याद आया, एक बार राजू के पिता ने गुस्से में उन्हें धक्का दे दिया था- “मेरा लड़का पढ़-लिखकर कलेक्टर बनेगा क्या?” उस रात मनोज देर तक सो नहीं पाए थे। लेकिन अगले दिन वे फिर उसी झुग्गी में पहुँचे थे। आज वही राजू सामने खड़ा था- साफ-सुथरे कपड़ों में, आत्मविश्वास से भरा हुआ।
मनोज ने पूछा- “तो अब क्या कर रहे हो तुम लोग?”
राजू ने गर्व से कहा- “सर, हम तीनों ने एम.सी.ए. किया है।”
“और अब?” -मनोज की आवाज़ काँप गई।
“सर, बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।”
कुछ क्षणों के लिए मनोज जैसे स्तब्ध रह गए। उनकी आँखें भर आईं। वे तीनों को देखते रहे, मानो अपने सपनों को साकार रूप में खड़ा देख रहे हों।
मोहन ने जेब से एक कार्ड निकालकर मनोज को दिया- “सर, अगले महीने हमारी कंपनी ने हमें विदेश भेजने का प्रोजेक्ट दिया है। लेकिन उससे पहले हम आपसे मिलना चाहते थे।”
जयराम धीरे से बोला- “सर, आपने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं… इंसान होने का मतलब समझाया।”
मनोज के भीतर वर्षों की थकान जैसे पिघलने लगी। उन्हें लगा, उनकी छोटी-सी कोशिश व्यर्थ नहीं गई। इतने में राजू ने संकोच से कहा- “सर, हमने सुना है आप बस्ती में डिस्पेंसरी खुलवा रहे हैं?”
मनोज ने धीमे स्वर में कहा- “कोशिश कर रहा हूँ बेटा… लेकिन अभी बहुत पैसे और सहयोग चाहिए।”
तीनों लड़कों ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर राजू ने मुस्कराते हुए कहा- “सर, आपने बहुत कुछ कर लिया, अब हमारी बारी है।” लेकिन मनोज कुछ समझ नहीं पाए।
मोहन बोला- “जिस बस्ती से हम निकले हैं, वहाँ के बच्चों को अब इलाज के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा।”
जयराम ने कहा- “हम तीनों ने मिलकर शुरुआत के लिए पाँच लाख रुपये जमा किए हैं।”
मनोज अवाक् रह गए। बोले- “नहीं बेटा… ये बहुत ज्यादा है…”
राजू ने विनम्रता से उनके हाथ पकड़ लिए- “सर, ये दान नहीं है। ये आपका ही लगाया हुआ बीज है, जो अब पेड़ बनकर लौट रहा है।” मनोज की आँखों से आँसू बह निकले। बाजार की भीड़, गाड़ियों का शोर, दुकानों की रोशनी- सब धुंधला गया। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि असली रिटायरमेंट नौकरी से नहीं होता। जब तक इंसान के भीतर दूसरों के लिए कुछ करने का जज़्बा जिंदा है, तब तक जीवन भी जिंदा रहता है।
उस रात मनोज बहुत दिनों बाद निश्चिंत होकर सोए। उन्हें पता था- अब काली बस्ती का भविष्य अकेला नहीं है।
***
संदीप तोमर
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