रुकनुद्दीन रज़ा 
मस्जिद और दरगाह हज़रत कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह की मुख़्तसर तारीख़
मध्य प्रदेश के शहर धार के दक्षिण पश्चिम में एक क़दीम इमारत हज़रत कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह के मज़ारे मुबारक से मुत्तसिल है। इसके आस-पास बहुत से औलिया अल्लाह के मज़ारत हैं। सन 1305 में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी  ने जब मालवा फतह किया। इस वक़्त हज़रत कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह का यहां क़याम था।सुल्तान शैख़ का अकीदतमंद था। सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपनी फतह की खुशी में इस मक़ाम पर एक आलीशान मस्जिद तामीर करने का हुक्म दिया, जो दो साल की मुद्दत सन 1307 में बनकर तैयार हुई। मस्जिद के क़रीब ही अक़्क़ल कुआँ अहाता,दालान और हुजरे तामीर करवाये। चूंकि ये इमारत 2 साल की क़लील मुद्दत में तामीर हुई थी, इसलिए एक सदी में ही ये मरम्मत तलब हो गई।


मालवा के पहले हुक्मरां दिलावर शाह गोरी ने 1392-93 में इसकी मरम्मत करवाई और मस्जिद के दरवाज़े पर एक कुतबा नस्ब किया, जिसमें तहरीर है "दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद शाह तुग़लक़ के सूबेदार दिलावर खान गोरी ने इस कि मरम्मत करवाई।"
(नोट-सुल्तान मुहम्मद शाह तुग़लक़ S/O सुल्तान फिरोजशाह तुग़लक़ दिल्ली का सुल्तान था और दिलावर शाह गोरी उस वक़्त मालवा का सूबेदार था, जिस ने 1401 में अपनी ख़ुद मुख्तारी का एलान किया और मालवा का पहला ख़ुद मुख़्तार सुल्तान बना)


ये अज़ीमुश्शान मस्जिद संगे सुर्ख (लाल-पत्थरों) से तामीर की गई है, बीच मे वसीअ दालान है जिस के दरमियान में वुज़ू का हौज़ बना हुआ है। मस्जिद अपने दौर के बेहतरीन architecture का नमूना है, मस्जिद काफी वसीअ और शानदार है, खूबसूरत मिम्बर के पास मेहराब में संगे मूसा(कीमती और कामयाब पत्थर) नस्ब किया गया है।
इमारत का architecture हिन्दी-ईरानी है चौदहवीं सदी में जितनी इमारतें तामीर हुई। वो इसी तर्ज़ की है जो के मकामी कारीगरों ने बनाई थी। ये कारीगर गुम्बदो मीनार की तामीर से नावाकिफ़ थे और यही वजह है कि मस्जिद पर मीनार नही है।
14 वी 15 वी सदी में हिन्द-ईरानी संगम से एक नया architecture ईजाद हुआ, जो तुग़लको पठान architecture कहलाया मुगल दौर में इस मे और तरक़्क़ी हुई।
मस्जिद की जाली, सुतून और गुम्बद की छत की नक़्क़ाशी इंतिहाई खूबसूरत है।
मस्जिद के पत्थर कुछ दूसरी इमारतों के मलबे से हासिल किये गये थे,मस्जिद में संस्कृत और पाली भाषा के कुछ पत्थर भी बरामद हुए जो दाख़िली दरवाज़े के पास ही नस्ब हैं जो उस दौर में आम बात थी बाक़ी आज के सियासी हालात से तो आप वक़ीफ ही हैं,लिखने की ज़रुरत नही।
ये मस्जिद पुरातत्व विभाग के अंडर में है,
अल्हम्दुलिल्लाह इसमे अभी जुमा की नमाज़ अदा की जाती है और इंशाअल्लाह पंज वक़्ता नमाज़ भी अदा होगी।
उस दौर में इस मस्जिद के इमाम ताजदारे मालवा हज़रत ख़्वाजा कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह थे जिन का मज़ार मुबारक मस्जिद से मुत्तसिल है।
ताजदारे मालवा हज़रत कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह का सिलसिला ए नस्ब 25 वास्तों से अमीरूल मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारुके आज़म से मिलता है। आप सुलतानुल औलिया हज़रत बाबा फरीद गंजे शकर के हक़ीक़ी पर पौते और महबूबे इलाही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीदो ख़लीफ़ा हैं।
हज़रत महबूबे इलाही ने अपने जिन चार मुरीदो ख़लीफ़ाओ को इस्लाम की खिदमत के लिए मालवा भेजा था आप उन्ही में से एक हैं।
आप अपने पीरो मुर्शिद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के हुक्म से 1291 में मालवा तशरीफ़ लाए और धार में जिस मक़ाम पर आपका मज़ारे मुबारक है। अपनी ख़ानक़ाह बनाई और खिदमते ख़ल्क़ ( जन-सेवा) में लग गए। तारीख शाहिद है कि आप के हुस्ने अख़लाक़ दावते मुहब्बत से लाखों लोगों ने स्वच्छा से इस्लाम कुबूल किया।उस वक़्त मालवा का राजा पूर्णमल खुद आप की इंसानियत नवाज़ी से दाखिले इस्लाम हो गया।
यक़ी पैदा कर ऐ नादाँ यक़ी से हाथ आती है
वो दरवेशी के जिस के सामने झुकती है सुल्तानी  "इक़बाल"
खुद दिल्ली के सुलतान जलालुद्दीन ख़िलजी,और अलाउद्दीन खिलजी भी आपके इरादत मन्दों में थे।
जलालुद्दीन ख़िलजी का लड़का महमूद ख़िलजी दिल्ली से धार आकर हज़रत की ख़ानक़ाह में मुकीम हो गया यहाँ कुछ अरसे बाद उसका इन्तिक़ाल हो गया।
महमूद ख़िलजी का मक़बरा आपके मज़ार के सामने एक मकबरे में है, आपके मज़ारत के करीब बहुत से सूफिया किराम आराम फ़रमा हैं।
आप 41 साल तक धार में दरस और दावते दीन का फ़रीज़ा अंजाम देते रहे आप की आमद के 15 साल बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने धार मलवा फतह कर लिया और आपकी ख़ानक़ाह के करीब ही आलीशान जामा मस्जिद तामीर की।
हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती ने धार में मुस्तक़ील क़याम के दौरान ही अपने अहलो अयाल को भी धार बुलवा लिया था।जिन के मज़ारत आप के करीब हैं।
हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैह का विसाले मुबारक (705 हिजरी) में हुआ।
आपके विसाल के 130 साल बाद मालवा का अज़ीम हुक्मरा सुल्तान महमूद शाह ख़िलजी अव्वल ने मज़ार पर गुम्बद और अक़्क़ल कुआँ के करीब दूसरा मक़बरा और हुजरा तामीर किया।
आपके क़रीब ही मज़ारात में आप के छोटे भाई हज़रत नूरुद्दीन चिश्ती, उर्फ शाह आलम चिश्ती और अहाते में हज़रत हिसामुद्दीन चिश्ती और बहुत से सूफिया ए किराम के मज़ारत और शाही खानदान के अफ़राद दफन हैं।
सदियों से आपका आस्ताना अकीदत का मरकज़ बना हुआ है जहां पर हर धर्म के लोग हाज़िर होते हैं। हर साल आके मज़ार पर उर्स की तक़रीब मुनक़्क़ीद की जाती है जहाँ पर सभी धर्मों के लोग मुल्क भर से आते हैं।
बादशाहों और उनके वज़ीरों का दौर खत्म हो गया, लेकिन फ़क़ीरों का दौर क़यामत तक चलता रहेगा।
ना बादशाह ना कोई वज़ीर ज़िंदा है
दरे नबी का मगर हर फ़क़ीर ज़िंदा है
(लेखक  साहित्यकार हैं)  
सम्पर्क 
बड़नगर
ज़िला उज्जैन मध्यप्रदेश 
मोबाइल नम्बर 8224995916, 9993156497



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