अनिल चमड़िया
दुनिया में जब भी किसी ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिन आंदोलनों में मनुष्य अपने ऊपर थोपे गए कई बंधनों से मुक्ति के लिए एकजूट होता है तो उस आंदोलन का कोई न कोई गीत याद आने लगता है. यही वास्तविकता है कि कोई भी आंदोलन गीतों के बिना पूरा नहीं होता है. काव्य धारा के कई रूप हैं और वे कविता, नज्म़, गज़ल, गीत आदि के रूप में जाने जाते हैं. बल्कि यूं भी कहा जाए कि नारे भी अपनी काव्यत्मकता से ही यादगार बन पाते हैं. ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गए. इस विषय पर कई शोध हुए हैं लेकिन तमाम तरह के शोधों के बावजूद ये लगता है कि वे उस दौरान लिखे गए सभी गीतों को समेट नहीं पाए.

आमतौर पर दो चार गीतों को हम दोहराते हैं. उनमें उर्दू के प्रसिद्ध शायर इक़बाल का वह गीत जिसमें वे कहते हैं कि सारे जहां से अच्छा , हिन्दोस्तां हमारा. हम बुलबुले है इसकी , ये गुलसितां हमारा. इसी हिन्दोस्तां को हिन्दुस्तान के रूप में प्रचारित किया गया है. इक़बाल 1938 में ऐसे ही जोश खरोश से भरे गीत लिखकर दुनियां से विदा हो गए. दरअसल ब्रिटिश सत्ता के विरोध में आजादी के संग्राम के गीतों की ये विशेषताएं थी कि उनमें सात समंदर पार के शासकों की ज्यादतियों का एहसास कराया जाए. लेकिन इसके साथ ये भी जरूरी था कि अपने भीतर की अच्छाई और सुदंरता के विभिन्न पहलूओं की तस्वीर लोगों के सामने खींची जाए. इक़बाल हिन्दोस्तां हमारा गीत में ही लिखते हैं कि गोदी में खेलती है उसकी हजारों नदियां, गुलशन है जिनके दम से रश्के –जिनां हमारा.

गुलामी का एहसास कराना, स्वतंत्रता की चाहत पैदा करना, स्वतंत्रता के लिए सामूहिकता की भावना पैदा करना, उस सामूहिकता की ताकत का एहसास कराना और सबसे महत्वपूर्ण कि आपस की दूरियों को दूर करना और उन दूरियों को विविधता के रूप में पहचान कराकर उन्हें अपनी ताकत बताना, ये सब एक साथ जब कोई रचनाकार करता है तो उसकी राष्ट्रीय़ गीतकार के रूप में स्वीकार्यता हो जाती है. केवल इकबाल अपनी रचनाओं में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष और अपने लोगों के बीच एकता विकसित करने की चुनौती से नहीं जूझ रहे थे बल्कि हर वह रचनाकार ऐसी चुनौती से जुझ रहा था जो कि भारत को एक लेकिन सभी भारतवासियों के राष्ट्र के रूप में निखारने के सपने देख रहा था. वंशीधर शुक्ल लिखते हैं कि
बिस्मिल , रोशन , लहरी, मौं.अशपाक अली से वीर
आजादी लेने निकले थे, फांसी चढ़े अखीर
शक्ति अनतोली निकली. सिर बांधे कफनवा

कैप्टन राम सिंह लिखते है- कदम कदम बढाए जा
खुशी के गीत गाए जा
यह जिंदगी है कौम की
तू कौम पर लुटाए जा, बढ़ाए जा

भारतीय समाज जातियों, धर्मों और दूसरे तरह के आपसी विभाजनों से जूझता रहा है. इन विभाजनों को दूर करने की लड़ाई सदियों से होती रही है. भक्तिकालीन साहित्य में भी यह चुनौती देखने को मिलती है. ब्रिटिश सत्ता विरोधी आंदोलनों के लिए लोगों को घरों से निकालना था और उन्हें यह एहसास कराना था कि इंसानी जिदंगी समाज को जीवंत बनाए रखने की शर्त के साथ जुड़ी है. इसीलिए उस आंदोलन में शामिल होने वाला सैनानी फांसी पर चढ़ते हुए भी लोगों के भीतर मौत का भय नहीं पैदा करता था बल्कि लड़ने के लिए प्रेरित करता था. इस तरह की प्रेरणा केवल और केवल साहित्य ही कर सकता है. कल्पना करें कि स्वंतत्रता की लड़ाई की अगुवाई करने वालों के साथ इन गीतों का साथ नहीं होता तो लोगों को नींद से जगाना और सक्रिय करना लगभग असंभव होता.

वंशीधर शुक्ल खूनी पर्या गीत में कहते हैं कि-

तुम्हीं हिंद में सौदागर आए थे टुकड़े खाने, मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने, लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईष्या बरसाने, राजाओं के मंत्री फोड़े , लगे फौज को भड़काने. तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा, जब तक तुझको ......

स्वतंत्रता संग्राम की खास बात यह देखी जाती है कि इसने घर-घर में गीत-सैन्य तैयार किए. यानी हर घर में गीत लिखने वाले सैनिक तैय़ार किए. इसीलिए बहुत सारे गीत ऐसे मिलते हैं जिनके रचनाकार के बारे में शोधकर्ताओं को जानकारी नहीं मिलती. दरअसल यहां सैनिक के रूप गीतकार का अर्थ इसी रूप में लेना चाहिए कि जैसे सैकड़ों सैनिक हथियारों से लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं और उनके नाम सबकी जुबां तक नहीं पहुंच पाते हैं. दरअसल यही भावना होती है जो कि समाज में परिवर्तन की लड़ाई को अंजाम देने और उनमें सफलता की भावना को सुनिश्चित करती है. एक अज्ञात रचना में गीतकार कहता है कि उठो नौजवानों न रहने कसर दो , विदेशी का अब तो बहिष्कार कर दो, मुअस्सर जहां नहीं पेटभर है दाना . गुलामी में मुश्किल हुआ सर उठाना . रंग दे बसंती चोला , मायी नी रंग दे बसंती चोला वाला जो गीत अक्सर जन भागीदारी वाले कार्यक्रमों में सुनाई देता है उस गीत के भी रचनाकार के बारे में शायद ही कोई जानता हो. वास्तव में उस रचना का रचनाकार अज्ञात है.

दरअसल स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ गीत लोगों के बीच लोकप्रिय है लेकिन बहुत बड़ी संख्य़ा में गीत हैं जिन्हें आमतौर पर सुना व पढ़ा नहीं जाता है. आंदोलन के गीतों की खासियत यह भी होती है कि एक गीत कोई लोकप्रिय होता है तो उसकी तर्ज पर कई-कई गीतों की रचना आम लोग करने लगते हैं. मसलन जन गण मन गीत की तरह ही एक अज्ञात रचनाकार लिखते हैं कि शुभ सुख चैन की वर्षा बरसे , भारत भाग है जागा , पंजाब, सिंध , गुजरात, मराठा,द्रविड़,उत्कल-बंग/चंचल सागर , विंध्य हिमालय नीला यमुना गंगा...... इसी तरह वंदे मातरम शीर्षक वाले अज्ञात गीतकार लिखते हैं कि सरचढ़ो के सिर में चक्कर उस समय आता जरूर, काम में पहुंची जहां झनकार वंदे मातरम. एक ही गीत से कई-कई गीत निकलते रहे हैं. इन गीतों में एक और विशेषता यह देखी जाती है कि हर तरह के काम धंधे करने वाले लोगों के अनुकूल गीत तैयार करने की कोशिश की जाती थी. चकोर लिखते है कि दुखिया किसान हम है, भारत के रहने वाले. बेदम हुए, न दम है , बेमौत मरने वाले . आखिर पंक्ति में लिखते है – ए मौज करने वालो, कर देंगे हश्र बरपा, उभरे चकोर जब भी, हम आह भरने वाले.

गीतों को ब्रिटिश सत्ता अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती थी. वह लड़ने वालों के खिलाफ जेल,लाठी गोली का तो इस्तेमाल करती ही थी वह गीतों को भी सलाखों में डालने का इंतजाम करती थी. गीत यानी कलात्मक तरीके से जमीनी हकीकत को बयां करने और उसे लड़ने के लिए प्रेरित करने वाली अभिव्यक्ति  से घबराकर ही सरकार ने एक कानून बनाया था जो कि आज भी बरकरार है, जिसके तहत गीतकारों, नाटककारों और दूसरे तरह की साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होने वाले वाले रचनाकारों को जेल के अंदर डाला जाता था और गीतों को जब्त कर लिया जाता था. ब्रिटिश सत्ता ने जिस अनुपात में लोगों को जेलों के भीतर डाला उसी अनुपात में गीत भी जब्त किए. इनमें एक गीत राम सिंह का है- मेरे पुत्रों को यह पैगाम दे देना ज़रा बेटा, मर मिटो देश की खातिर, मेरे लख़्ते-जिगर बेटा. दूसरा गीत कुंवर प्रतापचन्द्र आजाद का है -बांध ले बिस्तर , फिरंगी, राज अब जाने को है, ज़ुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जन संचार विभाग में प्रोफेसर व भारतीय जन संचार संस्थान में हिन्दी पत्रकारिता के प्रशिक्षक रहे हैं.)


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