फ़िरदौस ख़ान
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार नित नये ऐसे फ़ैसले ले रही है, जिससे सरकार का ख़ज़ाना भरता रहे. लोकसभा ने गत मंगलवार को शत्रु संपत्ति क़ानून संशोधन विधेयक-2017 को मंज़ूरी दी, जिसमें युद्धों के बाद पाकिस्तान और चीन चले गए लोगों द्वारा छोड़ी गई जायदाद पर उत्तराधिकार के दावों को रोकने के प्रावधान किए गए हैं. पिछले शुक्रवार को राज्यसभा ने विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में शत्रु संपत्ति क़ानून संशोधन विधेयक को पारित कर दिया था.

ग़ौरतलब है कि साल 1947 में देश के बंटवारे के वक़्त और साल 1962 में चीन, साल 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुई जंगों के दौरान या उसके बाद जो भारतीय नागरिक पाकिस्तान या चीन चले गए, उन्हें भारत सरकार शत्रु मानती है. इसलिए उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति माना जाता है. इसके अलावा पाकिस्तान और चीन के अलावा दूसरे देशों की नागरिकता ले चुके लोगों और कंपनियों की संपत्ति भी शत्रु संपत्ति के दायरे में आती है. ऐसी संपत्तियों की देखरेख के लिए सरकार एक कस्टोडियन की नियुक्ति करती है. भारत सरकार ने साल 1968 में शत्रु संपत्ति अधिनियम लागू किया था, जिसके तहत शत्रु संपत्ति को कस्टोडियन में रखने की सुविधा दी की गई. केंद्र सरकार ने इसके लिए कस्टोडियन ऑफ़ एनिमी प्रॉपर्टी विभाग का गठन किया है, जिसे शत्रु संपत्तियों को अधिग्रहित करने का अधिकार है.
इस विधेयक के मुताबिक़ अब किसी भी शत्रु संपत्ति के मामले में केंद्र सरकार या कस्टोडियन द्वारा की गई किसी कार्रवाई के संबंध में किसी वाद या कार्यवाही पर विचार नहीं किया जाएगा. अगर शत्रु संपत्ति के मालिक का कोई उत्तराधिकारी भारत लौटता है, तो उसका इस संपत्ति पर कोई दावा नहीं होगा. एक बार कस्टोडियन के अधिकार में जाने के बाद शत्रु संपत्ति पर उत्तराधिकारी का कोई हक़ नहीं होगा. अगर शत्रु के उत्तराधिकारी भारतीय हों या शत्रु अपनी नागरिकता बदलकर किसी और देश का नागरिक बन जाए, तो ऐसे हालात में भी शत्रु संपत्ति कस्टोडियन के पास ही रहेगी. शत्रु संपत्ति अब उस हालात में संपत्ति के मालिक को वापस दी जाएगी, जबकि वह सरकार के पास आवेदन भेजेगा और संपत्ति शत्रु संपत्ति नहीं पाई जाएगी. कस्टोडियन को शत्रु संपत्ति को बेचने का अधिकार भी होगा, जबकि पिछले क़ानून के मुताबिक़ अगर संपत्ति के संरक्षण या रखरखाव के लिए ज़रूरी होने पर ही संपत्ति को बेचा जा सकता था. पिछले क़ानून के मुताबिक़ अगर शत्रु से उत्तराधिकारी भारतीय होते थे, तो वह इस शत्रु संपत्ति से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल कर पाते थे, लेकिन अब नये क़ानून में इस सुविधा को ख़त्म कर दिया गया है.

इस विधेयक के पास होने से उन लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, जो देश से पलायन करने वाले लोगों की जायदादों के वारिस बने बैठे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक़ देशभर में 16000 संपत्तियां शत्रु संपत्ति कहलाती हैं, जिनकी  क़ीमत तक़रीबन एक लाख करोड़ रुपये है. इनमें पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जिन्ना, भोपाल के नवाब की संपत्ति, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की रियासतों की संपत्तियां भी शामिल हैं.
ग़ौरतलब है कि नये क़ानून से सबसे ज़्यादा जिन लोगों का नुक़सान होगा, जो नवाबों के वारिस हैं. महमूदाबाद के राजा काज़ी नसरुल्लाह के वारिस की जायदाद भी ख़तरे में है. काज़ी नसरुल्लाह बग़दाद के ख़लीफ़ा के मुख्य काज़ी थे. वह साल 1316 में दिल्ली आए. वह मुहम्मद तुग़लक की फ़ौज में कमांडर की तरह लड़े. इससे ख़ुश होकर मुहम्मद तुग़लक ने अवध में उन्हें जागीर दी, जो महमूदाबाद रिसायत कहलाई.
महमूदाबाद के राजा मुहम्मद आमिर मुहम्मद ख़ान के पिता मुहम्मद आमिर अहमद ख़ान साल 1957 में पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी पत्नी रानी कनीज़ आबिद अपने बेटे के साथ यहीं रहीं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उनकी तक़रीबन 936 संपत्तियां हैं, जिनका मुक़दमा सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा था. मुहम्मद आमिर मुहम्मद ख़ान का कहना है कि वह और उनकी मां हमेशा से ही भारतीय नागरिक रहे हैं, इसलिए उनकी पुश्तैनी जायदाद को शत्रु संपत्ति नहीं माना जाना चाहिए.

ख़बरों की मानें, तो सैफ़ अली ख़ान की भोपाल स्थित संपत्ति पर भी असर पड़ेगा. सैफ़ के पिता मंसूर अली ख़ान पटौदी की मां साजिदा सुल्तान बेगम भोपाल के आख़िरी नवाब हमीदुल्लाह ख़ान की छोटी बेटी थीं. हमीदुल्ला ख़ान की दो बेटियां थीं. उनकी बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान 1950 में पाकिस्तान जाकर बस गई थीं, लेकिन हमीदुल्लाह और उनके परिवार के बाक़ी लोग भोपाल में ही रहे. साल 1960 में नवाब हमीदुल्लाह की मौत के बाद छोटी बेटी साजिदा को उनकी जायदाद मिली. फिर साल 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने साजिदा को भोपाल रियासत का वारिस घोषित कर दिया. इस पर आबिदा ने भारतीय अदालत में साजिदा को वारिस बनाए जाने के ख़िलाफ़ याचिका दायर की. फ़िलहाल यह मामला अदालत में है. साल 1968 में सरकार शत्रु संपत्ति अधिनियम लेकर आई. इस क़ानून के तक़रीबन पांच दशक बाद पिछले साल कस्टोडियन ऑफ़ इनेमी प्रॉपर्टी ऑफ़िस ने नवाब की संपत्तियों को शत्रु संपत्ति घोषित किया था.
मुंबई स्थित जिन्ना हाउस भी इस क़ानून की ज़द में है. जिन्ना की इकलौती बेटी दीना वाडिया इस पर अपना हक़ जताती हैं. जिन्ना पाकिस्तान चले गए थे, इसलिए साल 1949 में भारत सरकार ने इसे अपने क़ब्ज़े में ले लिया था. हालांकि पाकिस्तान ने भी इस पर अपना दावा पेश किया था. जिन्ना ने अपनी वसीयत में इसे अपनी बहन फ़ातिमा जिन्ना को दिया था. फ़ातिमा ने शादी नहीं की और उनका कोई वारिस नहीं है. दीना वाडिया का कहना है कि जिन्ना की इकलौती बेटी होने की वजह से इस पर उनका हक़ है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि इस नये क़ानून से मुसलमान सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि मुसलमानों की करोड़ों की जायदाद शत्रु संपत्ति के दायरे में आ जाएगी. आज जो लोग करोड़ों के मालिक हैं, कल वे कंगाल हो जाएंगे.


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