फ़िरदौस ख़ान
जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके बावजूद वह देश की माटी में रची-बसी है. देश का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस ने देश को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाया. देश को मज़बूत करने वाली कांग्रेस को आज ख़ुद को मज़बूत करने की ज़रूरत है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को हार को भुलाकर संघर्ष करना चाहिए. सड़क से सदन तक पार्टी को नये सिरे से खड़ा करने का मौक़ा उनके पास है. राहुल गांधी  किसी ख़ास वर्ग के नेता न होकर जन नेता हैं. वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

इस वक़्त राहुल गांधी के कंधों पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. पहले उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाना है और फिर खोई हुई हुकूमत को हासिल करना है. उन्हें चाहिए कि वे देश भर के सभी राज्यों में युवा नेतृत्व ख़ड़ा करें. सियासत में आज जो हालात हैं, वे कल भी रहेंगे, ऐसा ज़रूरी नहीं है. जनता को ऐसी सरकार चाहिए, जो जनहित की बात करे, जनहित का काम करे. बिना किसी भेदभाव के सभी तबक़ों को साथ लेकर चले. कांग्रेस ने जनहित में बहुत काम किए हैं. ये अलग बात है कि वे अपने जन हितैषी कार्यों का प्रचार नहीं कर पाई, उनसे कोई फ़ायदा नहीं उठा पाई, जबकि भारतीय जनता पार्टी लोक लुभावन नारे देकर सत्ता तक पहुंच गई. बाद में ख़ुद प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के चुनावी वादों को’ जुमला’ क़रार दे दिया. आज देश को राहुल गांधी जैसे नेता की ज़रूरत है, जो छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है. ऐसे ईमानदार नेता को जनता क्यों न सर-आंखों में बिठाएगी.

कांग्रेस को मज़बूत करने के लिए राहुल गांधी को पार्टी की आंतरिक कलह को दूर करना होगा. पार्टी में आंतरिक कलह दिनोदिन बढ़ रही है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री सज्जन वर्मा ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कुछ सियासी परिवारों पर कांग्रेस को ख़त्म करने की एवज में सुपारी लेने का आरोप लगाया है. उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को फ़ौरन सख़्त कार्रवाई करने की सलाह देते हुए लिखा है कि "इंदिरा गांधी ने राजा-महाराजाओं का प्रभाव ख़त्म करने के लिए रियासतें ख़त्म कर दी थीं, तब कुछ लोगों ने ख़ूब शोर मचाया था. अब वही लोग राजनीतिक शोर मचा रहे हैं. ऐसे लोगों का प्रभाव ख़त्म करने के लिए कठोर निर्णय लेने होंगे. तभी हमारी पार्टी प्रदेश और देश में खड़ी हो पाएगी." सज्जन कुमार का पत्र सार्वजनिक होने के बाद पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्‌डू ने भी सोनिया गांधी को पत्र लिख डाला है, जिसमें उन्होंने सज्जन वर्मा के बयान को ग़ैर ज़िम्मेदाराना बताते हुए उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग की है. उनका कहना है कि हमारी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से है, लेकिन कांग्रेस के सचिव अपने ही लोगों पर सवाल उठा रहे हैं.
बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस की नैया डुबोने में इसके खेवनहारों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. राहुल गांधी को इस बात को भी समझना होगा और इसी को मद्देनज़र रखते हुए आगामी रणनीति बनानी होगा.  पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस को अपनी जागीर समझ लिया और सत्ता के मद में चूर वे कार्यकर्ताओं से भी दूर होते गए. नतीजतन, जनमानस ने कांग्रेस को सबक़ सिखाने की ठान ली और उसे सत्ता से बदख़ल कर दिया. वोटों के बिखराव और सही रणनीति की कमी की वजह से कांग्रेस को ज़्यादा नुक़सान हुआ. लेकिन इसका यह मतलब क़तई नहीं कि कांग्रेस का जनाधार कम हुआ है. लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है. हाल में विधानसभा चुनाव में पांच में से तीन राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है.  

आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अब लोकसभा में भले ही 44 सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसदों पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें  हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस की हुकूमत है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता है. इन राज्यों में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना होगा. इसके लिए कांग्रेस को अभी से तैयारी शुरू करनी होगी.

इस साल 31 दिसंबर तक कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव होने हैं. पहले ये चुनाव 30 जून तक कराए जाने थे, लेकिन पार्टी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर छह महीने का और वक़्त मांगा, जिसे मंज़ूर कर लिया गया. कांग्रेस को चाहिए कि वह पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में सौंपे. राहुल गांधी को चाहिए कि वे ऐसे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाएं, जो पार्टी के बीच रहकर पार्टी को कमज़ोर करने का काम कर रहे हैं. राहुल गांधी को चाहिए कि वे कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाएं, क्योंकि कार्यकर्ता किसी भी पार्टी की रीढ़ होता है. जब तक रीढ़ मज़बूत नहीं होगी, तब तक पार्टी भला कैसे मज़बूत हो सकती है.  उन्हें पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं से लेकर पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक अपनी पहुंच बनानी होगी. बूथ स्तर पर पार्टी को मज़बूत करना होगा. साफ़ छवि वाले जोशीले युवाओं को ज़्यादा से ज़्यादा पार्टी में शामिल करना होगा. कांग्रेस की मूल नीतियों पर चलना होगा, ताकि पार्टी को उसका खोया हुआ वर्चस्व मिल सके.


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