एच सी कंवरभारतीय रेल, जो राष्ट्र की जीवन रेखा मानी जाती है और देश की साझी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है, ने नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती के अवसर पर  एक खास प्रदर्शनी ट्रेन संस्कृति एक्सप्रेस चलाई है। इस ट्रेन में गुरुदेव के जीवन और दर्शन को चित्रित किया गया है। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने 09 मई, 2010 को इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रेल संग्रहालय, हावड़ा से विदा किया। पांच डिब्बों की प्रदर्शनी ट्रेन संस्कृति एक्सप्रेस, जो गुरुदेव को भारतीय रेल की ओर से श्रध्दांजलि है, सालभर पूरे देश का भ्रमण करेगी और अगले वर्ष 08 मई, 2011 को हावड़ा लौटेगी।

पांच वातानुकूलित डिब्बों को टैगोर की उपलब्धियों और दर्शन को चित्रित करने के लिए हावड़ा के लिलूआह रेलवे वर्कशॉप में विशेष रूप दिया गया है। पहले डिब्बे का नाम जीवन स्मृति दिया गया है और इसमें तस्वीरों के माध्यम से टैगौर के जीवन, उनके जीवनावशेषों, शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन को प्रदर्शित किया गया है।

कोलकाता के प्रसिध्द जोरसांको भवन में 07 मई, 1861 को जन्मे कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने महज सात वर्ष की उम्र से ही अपना लेखन कार्य शुरू कर दिया था। वह भारतीय संस्कृति के एक महानायक थे।

सन् 1884 में टैगोर ने कविता संग्रह कोरी-ओ-कमल लिखा। उन्होंने राजो-ओ- रानी और विसर्जन नामक दो नाटक भी लिखे। सन् 1890 में वह अपनी पारिवारिक संपत्ति की देखभाल के लिए शेलदाहा, जो अब बंगलादेश में है, चले गए थे। सन् 1893 और 1900 के बीच टैगोर ने काव्य के सात खंड लिखे जिसमें सोनार तारी और खनिका भी शामिल हैं।

सन, 1901 में रवींद्रनाथ टैगोर बंगदर्शन पत्रिका के संपादक बन गए। सन् 1905 में लार्ड कर्जन ने बंगाल को दो भागों में बांटने का निर्णय लिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस निर्णय का जमकर विरोध किया। उन्होंने कई राष्ट्रीय गीत लिखे और विरोध सभाओं में शामिल हुए। उन्होंने अविभाजित बंगाल की एकता को प्रदर्शित करने के लिए रक्षाबंधन कार्यक्रम शुरू किया।

इस ट्रेन के दूसरे डिब्बे का नाम गीतांजलि है जो उनकी कविताओं और गीतों के प्रदर्शन के साथ ही विभिन्न कलाकारों द्वारा गुरुदेव के गीतों के गायन का प्रदर्शन करता है। सन् 1913  में उन्हें उनके काव्यसंग्रह गीतांजलि के लिए नोबेल साहित्य पुरस्कार मिला, जिसके बाद वह पहले एशियाई नोबेल पुरस्कार विजेता बन गए। रवींद्रसंगीत के दो गीत-जन गण मन और आमर सोनार बांग्ला, अब क्रमश: भारत और बंगलादेश के राष्ट्रीय गान हैं। सन् 1921 में उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने नोबेल पुरस्कार की पुरस्कार राशि और अपनी पुस्तकों से मिली सभी रॉयल्टी इस विश्वविद्यालय को दे दी। टैगोर न केवल श्रेष्ठ रचनाकार थे बल्कि वह पश्चिमी संस्कृति खासकर पश्चिमी काव्य एवं विज्ञान के भी अच्छे जानकार थे। सन् 1940 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें साहित्य में डाक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किया।

तीसरे डिब्बे का नाम मुक्तोधारा है। इसमें रवींद्र साहित्य, काव्य, निबंध, उपन्यास, नाटक, नृत्य नाटक और अन्य विधाओं तथा गुरुदेव द्वारा गाए गए गायन को प्रदर्शित किया गया है।

चौथे डिब्बे का नाम चित्ररेखा है। इसमें टैगोर द्वारा उनके बालपन और किशोरावस्था के दौरान की बनायी गयी तस्वीरें, छायाचित्र, प्राकृतिक छटाएं, स्केच आदि हैं। इस डिब्बे में श्रीनंदलाल बोस, अवींद्रनाथ टैगोर, गगेंद्रनाथ टैगोर, बिनोद बिहारी, रामकिंकर बैज, सुनयनी देवी और सुधीर खास्तगीर जैसे जाने-माने चित्रकारों के चित्र भी दिखाए गए हैं।

पांचवें डिब्बे का नाम शेषकथा दिया गया है। इसमें टैगोर के जीवन की अंतिम यात्रा की तस्वीरें और उनके करीबियों द्वारा वर्णित उनके जीवन के अंतिम दिन,तथा अंतिम दिनों की कविताएं संग्रहीत हैं। कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर का 07 अगस्त, 1941 को उनके पैतृक घर में  निधन हो गया था। इस डिब्बे में स्मरणिका नामक एक खंड और है जिसमें शांतिनिकेतन के हस्तशिल्प उत्पादों, फोटो प्रिंटों, गुरुदेव की हस्तलिप, की प्रदर्शनी और उनकी बिक्री की व्यवस्था भी है। इसके अलावा अन्य कई महत्वपूर्ण चीजें हैं।

एक साल की यात्रा के दौरान संस्कृति एक्सप्रेस कविगुरु की कला और साहित्य का देशभर में प्रचार-प्रसार के लिए करीब 100 स्टेशनों का चक्कर लगाएगी।


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