मैं आसुओं की लड़ी
बागों में फूल न हों,
तो उनकी शोभा क्या ??
हमारे पास दोस्त न हों,
तो हमारी शोभा क्या ??
फूलों के मुरझा जाने पर,
दोस्तों के नाराज हो जाने पर,
क्या है वो हमको,
अच्छा लगता है जो ??
कुछ फूल ऐसे भी हैं,
जो सिर्फ शूल देते हैं !!
कुछ दोस्त भी उन फूल से,
जो देखते हैं राहें शूल सी !!
एक खूबसूरत फूल ऐसा खिला,
बाग़ ने न चाहा उसे छोड़ना !!
मुझे एक दोस्त ऐसा मिला,
मैंने न चाहा उससे रिश्ता तोडना !!
मगर शूल से वे फूल व् दोस्त,
धोखा दे बाग़ व् मुझे गए !!
रुखी सी, मुरझाई सी,
रह गई मैं बनकर 'आसुओं की लड़ी ' !!
-महिमा कपूर
जुमेरात...
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*-डॉ. फ़िरदौस ख़ान *
28 जनवरी, 2016... जुमेरात का दिन, एक यादगार दिन था... कभी न भूलने वाला
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