ग़ज़ल
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो, तुम क्या जानो बात मेरी तनहाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आंख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यूं इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की
उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफक में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की
-क़तील शिफ़ाई
अम्मी से हालात का मुक़ाबला करना सीखा
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अम्मी जान कहा करती हैं कि इंसान को कभी बुज़दिल नहीं होना चाहिए. बचपन में
बिजली चली जाती और अंधेरे में हमें दूसरे कमरे में जाने में ख़ौफ़ आता, तो अम्मी
कहती...
