भारत का रत्न और आभूषण उद्योग अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा है और भारत के निर्यात संबंधी विकास का महत्वपूर्ण आधार है। यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और एक ऐसा क्षेत्र है जो तेजी से आगे बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान भारत के कुल निर्यात का 14 प्रतिशत रत्न और आभूषणों का निर्यात किया गया। इस उद्योग ने पिछले 4 दशकों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। 1966-67 में जब रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) की स्थापना की गई थी, तब निर्यात 2 करोड़ 80 लाख अमरीकी डॉलर था जो वित्त वर्ष 2011-12 में बढ़ कर 42.84 अरब अमरीकी डॉलर पर पहुंच गया।
रत्‍न और आभूषण उद्योग के कुल निर्यात का 54 प्रतिशत हीरों का, 38 प्रतिशत स्वर्ण आभूषणों का और 1-1 प्रतिशत रंगीन रत्नों तथा अन्य का निर्यात किया जाता है, कुल हिस्‍से में 4 प्रतिशत बिना तराशे हीरों का निर्यात शामिल हैं। इसके आपूर्तिकर्ताओं और खरीदारों में विभिन्न देश शामिल हैं।
प्रमुख खरीदारों में संयुक्त अरब अमीरात (44 प्रतिशत), हांगकांग (25 प्रतिशत) और अमरीका (12 प्रतिशत) शामिल हैं, जबकि बेल्जियम जो कच्चे माल का कुल 21.55 प्रतिशत आयात करता है, अब तक सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।
हीरा: निर्विवाद अग्रणी
उद्योग के विश्वसनीय प्रदर्शन में हीरा सबसे आगे है जो निर्माण क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान देता है। देश भर में करीब 10 लाख लोगों को इसमें रोजगार मिला हुआ है। भारत ने 2011-12 में 23.30 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य के काटे गए और तराशे गए हीरों का निर्यात किया।
  इस उद्योग की 50 के दशक में बहुत छोटे स्तर पर शुरुआत हुई और यह पिछले कुछ वर्षों में काटे गए और तराशे गए हीरों के मामले में दुनिया के सबसे बड़े केंद्र के रूप में स्थापति हो गया है। मूल्य के लिहाज से देखा जाए तो दुनिया में आपूर्ति में इसका 60 प्रतिशत और मात्रा के लिहाज से 85 प्रतिशत योगदान है। दुनिया भर में हीरों के आभूषण के प्रत्येक 12 सेटों में से 11 भारत में बनाए जाते हैं। यह काम मुख्य रूप से मुंबई, सूरत और जयपुर में होता है। इसकी सफलता के पीछे विभिन्न कारक हैं जिसमें सबसे प्रमुख भारतीय कारीगरों की दक्षता है। इस उद्योग को स्थापित करने में भारतीय उद्यमियों के अनवरत प्रयासों ने इसकी वृद्धि में उल्‍लेखनीय योगदान दिया है।
  छोटे हीरों के मामले में दुनिया में अपनी धाक जमाने के बाद भारत बड़े पत्थरों को काटने और तराशने में दक्षता हासिल कर रहा है। भारत में हीरा तराशने की प्रक्रिया दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फैक्ट्रियों के समकक्ष है और प्रौद्योगिकी के लिहाज से भी वह किसी से पीछे नहीं है। इनमें लेजर मशीनों, कम्प्यूटरीकृत अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
आभूषण: तेजी से उभरता क्षेत्र
   पिछले कुछ समय में दुनिया में आभूषण के निर्यात के क्षेत्र में भारत तेजी से उभरा है। पिछले कुछ दशक में इसकी औसत वृद्धि प्रतिवर्ष करीब 15-20 प्रतिशत रही है। वर्ष 2011-12 में स्वर्ण आभूषणों का निर्यात 16.5 अरब अमरीकी डॉलर पर पहुंच गया, जो 1994-95 में 48 करोड़ 60 लाख अमरीकी डॉलर था।
  हालांकि ब्रांडेड आभूषणों का विकास अभी आरंभिक चरण में है क्योंकि परम्परागत आभूषणों या परिवार के सुनार की अवधारणा का अभी भी वर्चस्व बना हुआ है। गुणवत्ता का आश्वासन देने और जालसाजी रोकने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने हॉल मार्क वाले आभूषणों की शुरुआत की लेकिन इन्‍हें अपनी जगह बनाने में अभी वक्त लगेगा। भारत के कुछ आभूषण ब्रांडों ने दुनिया के कुछ देशों में अपने कदम बढ़ाए हैं।
रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद:
   वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने 1966 में रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद की स्थापना की। इसने उद्योग को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इस समय देश भर में परिषद के 5,300 सदस्य हैं। परिषद उद्योग के प्रसार के लिए अंतर्राष्ट्रीय आभूषण शो सहित अनेक आयोजन करती है। इनमें व्यापार प्रतिनिधिमंडलों को भेजने और उनकी मेजबानी करने, विदेश में विज्ञापनों, प्रकाशनों, दृश्य-श्रव्य/कॉरपोरेट साहित्य, सदस्यों की डायरेक्टरी के जरिए निरंतर छवि निर्माण आदि शामिल हैं।
  सरकार ने इस क्षेत्र की ताकत को पहचानते हुए और रोजगार की संभावनाओं को देखते हुए कुछ महत्वपूर्ण पहल की। उद्योग की जरूरत के मुताबिक कारीगरों के दक्षता स्तर को बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल में दोमजूर और गुजरात में खंबात में ऐसे दो केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। सरकार आभूषण के क्षेत्र में विविधता को अपनाने के लिए वैश्विक भागीदारी को भी बढ़ावा दे रही है। हीरों और रत्नों की ग्रेडिंग, प्रमाणीकरण, अनुसंधान और विकास, काटने और तराशने के क्षेत्र में दक्षता बढ़ाने तथा भारत में आधुनिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना के लिए एंटवर्प वर्ल्ड डायमंड सेंटर के साथ सहयोग किया गया है।
भारत अंतर्राष्ट्रीय आभूषण सप्ताह और भारत अंतर्राष्ट्रीय आभूषण शो:
   आभूषणों के लिए भारत को ‘नवपरिवर्तन और डिजाइन स्थल’ के रूप में बढ़ावा देने के प्रयास में रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भारत अंतर्राष्ट्रीय आभूषण सप्ताह आयोजित किया। 5 दिन तक चले शानदार शो में भारत के प्रमुख आभूषण डिजाइनरों ने भाग लिया और आभूषण के क्षेत्र में भारत के सर्वश्रेष्ठ डिजाइन, अभिनव प्रयोगों, टेक्नोलॉजी, गुणवत्ता और कारीगरी का नमूना प्रस्तुत किया।
  आभूषण सप्ताह के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय शो का आयोजन किया गया जो एशिया प्रशांत क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा आभूषण एक्सपो था। इसमें प्रदर्शकों, निर्यातकों, खरीदारों और व्यापारियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसका उद्घाटन केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री श्री आनंद शर्मा ने 23 अगस्त को किया और इसमें थाइलैंड, इस्राइल, तुर्की, बेल्जियम और संयुक्त अरब अमीरात ने भाग लिया।
प्रगति के पथ पर:
   रत्न और आभूषण का विश्व बाजार आज 100 अरब अमरीकी डॉलर से ज्यादा है। आभूषण बनाने वाले देशों में सिर्फ इटली, चीन, थाइलैंड, अमरीका और भारत का नाम शामिल है। हालांकि भारत हीरे काटने और तराशने की ग्लोबल फैक्ट्री है, पर एंटवर्प और बेल्जियम की गलियों में भी यहूदी और गुजराती व्‍यापारी इस काम में लगे हुए हैं। मुबई में दुनिया का सबसे बड़ा हीरा सर्राफा स्थापित किया गया है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और उम्मीद है कि भारत एशिया के बाजार में हीरों का प्रमुख व्यापारी बन जाएगा।


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