फ़िरदौस ख़ान
देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश झारखंड से भूख से मरने की ख़बरें आईं. चतरा ज़िले के इतखोरी में मीना मुसहर नामक एक महिला की मौत हो गई. उसके बेटे का कहना है कि उसकी मां ने चार दिनों से अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था. हालत बिगड़ने पर वह अपनी मां को अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. महिला कचरा बीनकर अपना गुज़ारा करती थी. इससे पहले शनिवार को गिरीडीह ज़िले के मनगारगड्डी की सावित्री देवी मौत हो गई थी. ग्रामीणों के मुताबिक़ महिला ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था. वह भीख मांग कर अपना पेट भरती थी. भूख से मौत के ये पहले मामले नहीं हैं. ऐसे मामले सामने आते रहते हैं और सरकारें इन मामलों को गंभीरता से लेने की बजाय ख़ुद को बचाने के लिए लीपा-पोती में लग जाती हैं, जो बेहद शर्मनाक है.

दरअसल, भूख से मौत की समस्या सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है. भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में आर्टिकल 25 के तहत भोजन के अधिकार के रूप में इसे मंज़ूर किया. साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया, जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंज़ूरी हासिल है और कई देश इसे क़ानून का दर्जा भी दे रहे हैं. इस क़ानून के लागू होने से भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा.

लेकिन तमाम कोशिशों और तमाम दावों के बावजूद लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है. हालत ये है कि दुनियाभर में भूख से जूझने वाले लोगों की वालों की तादाद  12 करोड़ 40 लाख हो गई. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के प्रमुख डेविड बीसली के मुताबिक़ भूख से जूझ रहे तक़रीबन तीन करोड़ 20 लाख लोग चार देशों सोमालिया, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तर पूर्व नाइजीरिया में हैं. दुनियाभर में भुखमरी का दंश झेल रहे  81 करोड़ 50 लाख लोगों में से 60 फ़ीसद लोग ऐसे संघर्षरत इलाकों में रहते हैं, जहां उन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि उन्हें अगली बार खाना कब से मिलेगा.

एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और ग़रीबी की वजह से रोज़ाना 25 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज़्यादा है. भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फ़ीसद महिलाएं हैं. दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है. हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है. 18 साल से कम उम्र के तक़रीबन 35.8 से 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं. इनमें से ज़्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या तक़रीबन एक करोड़ 46 लाख है.

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूडे़दानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही की वजह से वे महज़ काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह गईं. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ भूख से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोज़गार मुहैया कराना होगा. केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने लोगों को बेहद मामूली दामों में अनाज मुहैया कराने की योजना बनाई थी. इसके तहत परिवार के प्रति सदस्य को सात किलो खाद्यान्न यानी 3 रुपये किलो गेहूं, 2 रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो की दर से मोटा अनाज दिया जाना था. इस योजना का फ़ायदा हर ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे सरकार यह सुनिश्चित करना होगा.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल  कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य को भूखमरी मुक्त बनाने के मक़सद से लोगों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की एक सराहनीय योजना शुरू की थी. 16 अगस्त, 2017 को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु के जयनगर वॉर्ड में इंदिरा कैंटीन का उद्घाटन किया था. तमिलनाडु के अम्मा कैंटीन के तर्ज़ पर बने इस इंदिरा कैंटीन में 5 रुपये में नाश्ता और 10 रुपये में दिन और रात का खाना मिलता है.  राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की इस पहल को ‘सभी को भोजन’ के कांग्रेस के संकल्प की ओर एक और क़दम बताया था.  उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में बहुत से लोग बड़े घरों में रहते हैं और महंगी कारों से चलते हैं. उनके लिए खाना बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यहां लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़्यादा पैसा नहीं है. इंदिरा कैंटीन इनकी सेवा करेगी. हम चाहते हैं कि शहर के सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबक़े के लोग जानें कि वे भूखे नहीं रहने वाले. कैंटीन के भोजन की गुणवत्ता को परखने के लिए  उद्घाटन के बाद राहुल गांधी ने कैंटीन जाकर खाना भी खाया.

जिस देश में भूख से लोगों की मौतें होती हों, जहां करोड़ों लोग आज भी भूखे पेट सोते हों, ऐसे देश में सस्ता खाना मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. तमिलनाडु के ’अम्मा कैंटीन’ की तर्ज़ पर देश भर में कैंटीन खोले जाने चाहिए, ख़ासकर देश के उन हिस्सों में जो ग़रीबी की मार से बुरी तरह जूझ रहे हैं और जहां से बार-बार भूख और कुपोषण से लोगों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं. दरअसल, देशभर में इस तरह की योजनाएं लागू करने की बेहद ज़रूरत है.

जिस देश में, जिस समाज में भूख से तड़प-तड़प कर किसी की मौत हो जाए. क्या उस देश का शासन-प्रशासन ख़ुद को जनहितैषी कह सकता है ? क्या वह समाज ख़ुद को सभ्य कह सकता है ? क्या इसके लिए सिर्फ़ सरकार और शासन-प्रशासन दोषी है ? क्या इसके लिए सिर्फ़ समाज को दोष देकर अपना दामन बचाया जा सकता है ? नहीं, बिल्कुल नहीं, क्योंकि हम सब भी इसके लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं. व्यक्ति से परिवार बनता है और परिवार से समाज. समाज से ही देश बनता है. भूख से सिर्फ़ इंसान नहीं, इंसानियत भी मरती है.


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