ग़ज़ल
पत्थर शीशे जैसे दिल से, टकराए, टकराने दे,
अक्स किसी का टुकड़े-टुकड़े, हो जाए, हो जाने दे,
इंतज़ार करके हमने तो, पूरा अपना फ़र्ज़ किया,
वापस जाकर फिर भी कोई, ना आये, ना आने दे !
मुश्किल तो यह है, मुश्किल से, मुश्किल की पहचान हुई,
ऐसी मुश्किल में भी कोई, मुस्काये, मुस्काने दे !
दिल का हाल जुबां-चेहरे पर, आ जाए तो हर्ज़ नहीं,
मेरे हाल-चाल से वो जी, बहलाए, बहलाने दे !
मेरी उम्मीदे-ज़मीन पर, कब्ज़ा कर ले और वहां,
ताजमहल अपनी यादों का, बनवाये, बनवाने दे !
हमने इस दुनिया में रहकर, सारे मंज़र देख लिए,
कोई खुद को पाक-साफ़ जो, बतलाये, बतलाने दे !
सच पूछो तो, इस दुनिया को, पता नहीं है जीवन का,
बात पते की, कोई पंडित, समझाए, समझाने दे !
-अतुल मिश्र
जुमेरात...
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*-डॉ. फ़िरदौस ख़ान *
28 जनवरी, 2016... जुमेरात का दिन, एक यादगार दिन था... कभी न भूलने वाला
दिन... मुहब्बत की शिद्दत से सराबोर दिन, इबादत से लबरेज़ दिन, एक...
