डॉ. फ़िरदौस ख़ान
फ़ारूख़ शेख़ फ़िल्मी दुनिया के आसमान का एक ऐसा रौशन सितारे थे, जिसकी चमक से समानांतर सिनेमा दमकता था. उनके चेहरे पर मासूमियत थी. उनके अंदाज़ में शोख़ी थी और उनका मिज़ाज शायराना था.


फ़ारूख़ शेख़ का जन्म 25 मार्च 1948 को गुजरात के सूरत ज़िले के गांव अमरोली में हुआ था. उनके पिता मुस्तफ़ा शेख़ मुम्बई के जाने माने वकील थे. उनके पिता ज़मींदार परिवार से ताल्लुक़ रखते थे. उनकी परवरिश बड़ी शानो-शौकत से हुई थी. उनके कहने से पहले ही ज़रूरत की हर चीज़ उन्हें मुहैया हो जाती थी. इसके बावजूद उनमें ज़रा सा भी ग़ुरूर नहीं था. 
उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम मुम्बई के सेंट मैरी स्कूल से हासिल की. उसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाई की. फिर उन्होंने मुम्बई के ही सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ़ लॉ से वकालत की पढ़ाई मुकम्मल की.

उनके पिता चाहते थे कि वह भी उनकी तरह वकील बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी अभिनय में थी. वे कालेज के दिनों से ही रंगमंच से जुड़ गए थे. वे इतना शानदार अभिनय करते थे कि उनके चर्चे दूर-दूर तलक होने लगे. इसका नतीजा ये हुआ कि उन्हें साल 1973 में आई फ़िल्म 'गर्म हवा' में काम करने का मौक़ा मिल गया. इस फ़िल्म में उनके अभिनय को ख़ूब सराहा गया. और इस तरह उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत हुई और हिन्दी सिनेमा को शानदार अभिनेता मिल गया.

फ़ारूख़ शेख़ एक बेहतरीन कलाकार थे. उनके लिए अभिनय महज़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं था. वे एक वक़्त में दो से ज़्यादा फ़िल्मों में काम नहीं करते थे. साल 1978 में आई फ़िल्म 'नूरी' ने उन्हें कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचा दिया. ये फ़िल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके पास तक़रीबन 40 फ़िल्मों के प्रस्ताव आए. ख़ास बात ये थी कि सबकी सब फ़िल्मों की कहानी 'नूरी' फ़िल्म की कहानी के आसपास ही घूमती थी. उन्होंने सब प्रस्ताव ठुकरा दिए, क्योंकि वे सिर्फ़ पैसों के लिए एक जैसी फ़िल्मों में काम नहीं करना चाहते थे. वे नये और दमदार किरदार निभाना चाहते थे.

फ़ारूख़ शेख़ कलात्मक फ़िल्मों के अभिनेता थे. उनकी फ़िल्मों में जनमानस का दुख-दर्द, उनकी ख़ुशियां और उनके इंद्रधनुषी ख़्वाबों की झलक मिलती है. हालांकि उन्हें दरख़्तों के इर्दगिर्द घूमने वाले किरदार पसंद नहीं थे, लेकिन दर्शकों ने उन्हें अपनी महबूबा से शिद्दत से मुहब्बत करने वाले महबूब के किरदार में भी ख़ूब पसंद किया. नूरी फ़िल्म का नग़मा देखें-
आजा रे ओ दिलबर जानिया
आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा
दिल की प्यास बुझा जा रे...

नूरी फ़िल्म का ये नग़मा भी बहुत ही दिलकश है-
चोरी चोरी कोई आये
चुपके-चुपके, सबसे छुपके 
ख़्वाब कई दे जाये
आंखें डाले आंखों में, जाने मुझसे क्या वो पूछे
मैं जो बोलूं क्या, हंस दूं मुझको कुछ ना सूझे
ऐसे तांके, दिल में झांके, सांस मेरी रुक जाए


उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'बाज़ार' की ग़ज़ल आज भी लोगों को बहुत पसंद आती है-
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की 
फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की...

फ़िल्म 'उमराव जान' ने तो इतिहास रच दिया था. इसकी ग़ज़ल आज भी लोगों को गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है-
ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चांद से बेहतर नज़र आती है हमें  

सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें 
दिन ढले यूं तिरी आवाज़ बुलाती है हमें 

याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से 
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें 

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूं है 
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें...

फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी' का नग़मा देखें, जिसमें वह अभिनेत्री रेखा के साथ बहुत ही शोख़ अंदाज़ में नज़र आ रहे हैं-
फूल गुलाब का, लाखों में हज़ारों में 
एक चेहरा जनाब का...

उनके अंदाज़ में शोख़ी के साथ-साथ एक ऐसी संजीदगी भी थी, जो मुहब्बत में सिर्फ़ वादे करना ही नहीं जानती, बल्कि उसे शिद्दत से निभाने का जज़्बा भी रखती थी. उसके लिए महबूब ही सबकुछ है. कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में महबूब का अक्स नज़र आता है. फ़िल्म साथ-साथ का नग़मा ऐसा ही है-
तुमको देखा तो ये ख़्याल आया
ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया
आज फिर दिलने एक तमन्ना की
आज फिर दिलको हमने समझाया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया...

ये मुहब्बत ही तो है, जो नायिका अपने अमीर बाप का घर छोड़कर नायक के साथ एक छोटे से घर में रहने के लिए आ जाती है. फिर वे दोनों मिलकर अपना घर सजाते हैं-
ये तेरा घर, ये मेरा घर
किसी को देखना हो अगर
पहले आके मांग ले, तेरी नज़र मेरी नज़र...
न बादलों की छांव में, न चांदनी के गांव में
न फूल जैसे रास्ते बने हैं इसके वास्ते
मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईंट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर
ये तेरा घर ये मेरा घर...

उनकी फ़िल्म 'चश्मे बद्दूर' का ये गीत रूह की गहराई में उतर जाता है- 
कहां से आए बदरा हो
कहां से आए बदरा हो
घुलता जाए कजरा... 

उन पर फ़िल्मायी गई फ़िल्म 'गमन' की ग़ज़ल भी यादगार है-
आपकी याद आती रही रातभर
चश्मे- ग़म मुस्कुराती रही रातभर...

इसी फ़िल्म की ये ग़ज़ल भी ख़ूब पसंद की गई-
सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर का हर शख़्स परेशान सा क्यूं है...

सटारडम से कोसों दूर रहने वाले फ़ारूख़ शेख़ एक आम आदमी के अभिनेता थे. दर्शकों को लगता था कि उन्हीं के बीच से निकला कोई शख़्स पर्दे पर उन्हीं का कोई किरदार निभा रहा है. उनमें सादगी, विनम्रता और संजीदगी थी. ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे. उनके मासूम चेहरे से उनके बावक़ार वजूद का अक्स झलकता था.

उन्होंने रंगमंच और फ़िल्मों के अलावा टेलीविज़न के लिए भी काम किया. यहां भी उन्हें ख़ूब कामयाबी मिली. वे समाज सेवा से भी जुड़े रहे.

28 दिसम्बर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतक़ाल हो गया.
आज भले ही वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन अपने अभिनय के ज़रिये वे आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में ज़िन्दा हैं.

***
जन्म : 25 मार्च 1948 
स्थान : गांव अमरोली, ज़िला सूरत (गुजरात)
निधन : 28 दिसम्बर 2013 
स्थान : मुम्बई (महाराष्ट्र) 


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

  • जुमेरात... - *-डॉ. फ़िरदौस ख़ान * 28 जनवरी, 2016... जुमेरात का दिन, एक यादगार दिन था... कभी न भूलने वाला दिन... मुहब्बत की शिद्दत से सराबोर दिन, इबादत से लबरेज़ दिन, एक...
  • रमज़ान और ग़रीबों का हक़ - रमज़ान आ रहा है... जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं... इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़र...
  • Sayyida Fatima al-Zahra Salamullah Alaiha - On this blessed 20th of Jamadi al-Thani, we celebrate the birth of Sayyida Fatima al-Zahra alamullah Alaiha — the Lady of Light, the Mother of the Imams,...
  • میرے محبوب - بزرگروں سے سناہے کہ شاعروں کی بخشش نہیں ہوتی وجہ، وہ اپنے محبوب کو خدا بنا دیتے ہیں اور اسلام میں اللہ کے برابر کسی کو رکھنا شِرک یعنی ایسا گناہ مانا جات...
  • उमरपुरा के सिख भाइयों ने बनवाई मस्जिद - *डॉ. फ़िरदौस ख़ान * हमारे प्यारे हिन्दुस्तान की सौंधी मिट्टी में आज भी मुहब्बत की महक बरक़रार है. इसलिए यहां के बाशिन्दे वक़्त-दर-वक़्त इंसानियत, प्रेम और भाई...
  • 25 सूरह अल फ़ुरक़ान - सूरह अल फ़ुरक़ान मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 77 आयतें हैं. *अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है*1. वह अल्लाह बड़ा ही बाबरकत है, जिसने हक़ ...
  • ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ - ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਿਤੋਂ ਕਬੱਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਬੋਲ ਤੇ ਅੱਜ ਕਿਤਾਬੇ-ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੋਈ ਅਗਲਾ ਵਰਕਾ ਫੋਲ ਇਕ ਰੋਈ ਸੀ ਧੀ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਤੂੰ ਲਿਖ ਲਿਖ ਮਾਰੇ ਵੈਨ ਅੱਜ ਲੱਖਾਂ ਧੀਆਂ ਰੋਂਦੀਆਂ ਤ...

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं