सब जानते शुरू से, न झूठ बोले दर्पण।
फिर सच को देखते ही,क्यों टूटता है दर्पण?
मुश्किल पता लगाना,अपनी असल शकल का।
होता है सामना जब, क्यों रूठता है दर्पण?
आंखें दिखाती सब कुछ,क्या देख पाती खुद को?
निज-आंख देखते तो, क्यों मुस्कुराता दर्पण?
कायर है होंठ कितना, कहकर भी कह न पाता।
आंखें बताती सब कुछ,और खिलखिलाता दर्पण।।
मिलता कहां मुकम्मल,हिस्सा भी अपने हक का।
जब सच नहीं समाता तो टूटता है दर्पण।।
-श्यामल सुमन
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