वीना एन. माधवन
शायद हम में से ज्यादातर ने हाल ही में समाचारपत्रों या पत्रिकाओं में राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक (एनपीआर) के बारे में पढ़ा होगा, लेकिन यह सारी चहल-पहल आखिर है क्या ? एनपीआर क्या है ? इसका उद्देश्य क्या है ? और इन सबसे बढ़कर, इससे आम आदमी को क्या फायदा होने जा रहा है ?

एनपीआर के बारे में जानने के लिए, पहले जनगणना के बारे में कुछ जान लेना आवश्यक है। अब, भारत के लिए जनगणना कोई नई चीज़ नहीं है। यह अंग्रेजाें के राज से ही की जाती रही है। भारत में पहली जनगणना 1872 में हुई थी। वर्ष 1881 से, जनगणना बिना किसी रुकावट के हर दस साल में की जाती रही है। जनगणना एक प्रशासनिक अभ्यास है जो भारत सरकार करवाती है। इसमें जनांकिकी, सामाजिक -सांस्कृतिक और आर्थिक विशेषताओं जैसे अनेक कारकों के संबंध में पूरी आबादी के बारे में सूचना एकत्र की जाती है।

वर्ष 2011 में भारत की 15वीं तथा स्वतंत्रता के बाद यह सातवीं जनगणना होगी। एनपीआर की तैयारी वर्ष 2011 की जनगणना का मील का पत्थर है। जनगणना दो चरणों में की जाएगी। पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2010 के दौरान होगा जिसमें घरों का सूचीकरण, घरों की आबादी और एनपीआर के बारे में डाटा एकत्र किया जाएगा। इस चरण में एनपीआर कार्यक्रम के बारे में प्रचार करना भी शामिल है जो दो भाषाओं- अंग्रेजी और हर राज्य#संघीय क्षेत्र की राजभाषा में तैयार किया जाएगा। पहला चरण पहली अप्रैल, 2010 को पश्चिम बंगाल, असम, गोवा और मेघालय राज्यों तथा संघीय क्षेत्र अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में शुरू होगा। दूसरे चरण में आबादी की प्रगणना करना शामिल है।

देश के साधारण निवासियों का राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक बनाना एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बारे में विशिष्ट सूचना एकत्र की जाएगी। इसमें अनुमानित एक अरब 20 करोड़ की आबादी को शामिल किया जाएगा तथा इस स्कीम की लागत कुल 3539.24 करोड़ रुपए होगी। भारत में पहली बार एनपीआर तैयार किया जा रहा है। भारत का पंजीयक यह डाटाबेस तैयार करेगा।

इस परिस्थिति में, इस बात पर बल देना महत्वपूर्ण हो जाता है कि यद्यपि इन दोनों अभ्यासों का मक़सद सूचना का संग्रह है मगर जनगणना और एनपीआर अलग-अलग बातें हैं। जनगणना जनांकिकी, साक्षरता एवं शिक्षा, आवास एवं घरेलू सुख-सुविधाएं, आर्थिक गतिविधि, शहरीकरण, प्रजनन शक्ति, मृत्यु संख्या, भाषा, धर्म और प्रवास के बारे में डाटा का सबसे बड़ा स्रोत है। यह केंद्र एवं राज्यों की नीतियों के लिए योजना बनाने तथा उनके कार्यान्वयन के लिए प्राथमिक डाटा के रूप में काम आता है। यह संसदीय, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण के लिए भी इस्तेमाल की जाती है।

दूसरी तरफ एनपीआर में, देश के लिए व्यापक पहचान का डाटाबेस बनाना शामिल है। इससे आयोजना, सरकारी स्कीमों/कार्यक्रमों का बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना तथा देश की सुरक्षा को मजबूत करना भी सुगम होगा। एक अन्य पहलू जो एनपीआर को जनगणना से अलग करता है, वह यह है कि एनपीआर एक सतत प्रक्रिया है। जनगणना में, संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य सीमित अवधि के लिए होता है तथा काम समाप्त होने के बाद उनकी सेवाएं अनावश्यक हो जाती हैं, जबकि एनपीआर के मामले में संबंधित अधिकारियों और तहसीलदार एवं ग्रामीण अधिकारियों जैसे उनके मातहत अधिकारियों की भूमिका स्थायी होती है।

एनपीआर में व्यक्ति का नाम, पिता का नाम, मां का नाम, पति#पत्नी का नाम, लिंग, जन्म तिथि, वर्तमान वैवाहिक स्थिति, शिक्षा, राष्ट्रीयता (घोषित), व्यवसाय, साधारण निवास के वर्तमान पते और स्थायी निवास के पते जैसी सूचना की मद शामिल होंगी। इस डाटाबेस में 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के फोटो और फिंगर बायोमेट्री (उंगलियों के निशान) भी शामिल होंगे। साधारण निवासियों के प्रमाणीकरण के लिए मसौदा डाटाबेस को ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के समक्ष रखा जाएगा।

आम आवासियों के स्थानीय रजिस्टर का मसौदा ग्रामीण इलाके में गांवों में और शहरी इलाकों में वार्डों में रखे जाएंगे ताकि नाम के हिज्जों, पत्रों जन्म, तिथियों आदि गलतियों पर शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इसके अलावा दर्ज व्यक्ति की रिहायश के मामले में भी शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इस मसौदे को आम आवासियों की तस्दीक के लिए ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के सामने पेश किया जाएगा।

डाटाबेस पूरा होने के बाद, अगला काम भारतीय अनन्य पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के जरिए हर व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या (यूआईडी) तथा पहचान पत्र देना होगा। बाद में इस यूआईडी नंबर में एनपीआर डाटाबेस जोड़ा जाएगा। पहचान पत्र स्मार्ट कार्ड होगा जिस पर 16 अंक की अनन्य संख्या होगी तथा उसमें शैक्षिक योग्यताएं, स्थान और जन्म तिथि, फोटो और उंगलियों के निशान भी शामिल होंगे। फिलहाल, मतदाता पहचान पत्र या आय कर दाताओं के लिए स्थायी लेखा संख्या (पैन) जैसे सरकार की तरफ से जारी विभिन्न कार्ड एक दूसरे के सब-सेट्स के रूप में काम करते हैं। इन सभी को अनन्य बहुद्देश्यीय पहचान कार्ड में एकीकृत किया जा सकता है।

समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन तटीय एनपीआर परियोजना नामक प्रायोगिक परियोजना से हासिल अनुभव के आधार पर समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन किया जाएगा। यह परियोजना 9 राज्यों और 4 संघीय क्षेत्रों के 3,000 से अधिक गांवों में चलायी गयी है। मुंबई आतंकी हमलों के बाद तटीय सुरक्षा बढ़ाने के मद्देनज़र तटीय एनपीआर परियोजना कार्यान्वित करने का निर्णय लिया गया था क्योंकि आंतकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई में घुसे थे।

एनपीआर से लोगों को क्या फायदा होगा ?
भारत में, मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पैन कार्ड जैसे विभिन्न डाटाबेस हैं लेकिन इन सबकी सीमित पहुंच है। ऐसा कोई मानक डाटाबेस नहीं है जिसमें पूरी आबादी शामिल हो। एनपीआर मानक डाटाबेस उपलब्ध कराएगा तथा प्रत्येक व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या का आवंटन सुगम कराएगा। यह संख्या व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक स्थायी पहचान प्रदान करने जैसी ही होगी।

एनपीआर का महत्व इस तथ्य में निहित है कि देश में समग्र रूप से विश्वसनीय पहचान प्रणाली की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। गैरकानूनी प्रवास पर लगाम कसने तथा आंतरिक सुरक्षा के मसले से निपटने के लिए भी देश के हर क्षेत्र और हर कोने के लोगों तक पहुंच बनाने की ज़रूरत जैसे विभिन्न कारकों की वजह से यह सब और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

अनन्य पहचान संख्या से आम आदमी को कई तरह से फायदा होगा। यह संख्या उपलब्ध होने पर बैंक खाता खोलने जैसी विविध सरकारी या निजी सेवाएं हासिल करने के लिए व्यक्ति को पहचान के प्रमाण के रूप में एक से अधिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यक्ति के आसान सत्यापन में भी मदद करेगी। बेहद गरीब लोगों के लिए सरकार अनेक कार्यक्रम और योजनाएं चला रही है लेकिन अनेक बार वे लक्षित आबादी तक नहीं पहुंच पाते। इस प्रकार यह पहचान डाटाबेस बनने से सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की विविध लाभार्थी केंद्रित स्कीमों का लक्ष्य बढ़ाने में मदद मिलेगी।

एनपीआर देश की आंतरिक सुरक्षा बढ़ाने की ज़रूरत भी पूरा करेगा। सबको बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र उपलब्ध होने से आतंकवादियों पर भी नज़र रखने में मदद मिलेगी जो अकसर आम आदमियों में घुलमिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इससे कर संग्रह बढ़ाने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में कल्याण योजनाओं के बेहतर लक्ष्य निर्धारण के अलावा गैरकानूनी प्रवासियों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी।

भारत अनुमानित 1 अरब 20 करोड़ की आबादी को अनन्य बायोमीट्रिक कार्ड उपलब्ध कराने के वायदे के साथ सबसे बड़ा डाटाबेस बनाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस तरह अनन्य पहचान उपलब्ध कराने का रास्ता निर्धारित कर दिया गया है। यह अभ्यास इतना विशाल है कि इस परियोजना को सफल बनाने के लिए लोगों के उत्साहपूर्ण समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता है जो सबके लिए फायदेमंद होगी।


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