सलीम अख्तर सिद्दीकी
26/11 यानि मुंबई पर देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला। एक आतंकवादी अजमल कसाब जिन्दा बचा था। मुकदमा चला और डेढ़ साल के भीतर ही उसे सजा-ए-मौत सुना दी गयी। कसाब सजा-ए-मौत का ही हकदार था। संसद पर हुए हमले के आरोपी अफजल गुरु को भी फांसी लगने का इंतजार किया जा रहा है। मासूम और बेकसूरों की जान लेने वालों को फांसी की सजा भी कम है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि इससे बड़ी सजा कोई नहीं है। यदि दूसरे देश के कुछ आतंकवादी हमारे देश में धुसकर लोगों को गोलियों से भून दें या बमों से उड़ा दें तो निःसंदेह देश के बच्चे-बच्चे को उसका अफसोस ही नहीं होता, बल्कि आतंकवादियों के खिलाफ दिलों में नफरत भी घर कर जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है। आतंकवादियों का मकसद ही लोगों की जान लेकर दहशत फैलाना होता है। लेकिन जब अपने ही देश के सुरक्षा बल, जिनकी जिम्मेदारी नागरिकों को सुरक्षा देने की होती है, स्वयं ही अपने ही देश के नागरिकों को गोलियों से भून दें, उसे किस आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाना चाहिए ? उस पर भी मारने वालों का बचाव और मरने वालों को इंसाफ न देना किस नीयत को दर्शाता है ? यूं तो देश में ऐसे बहुत से नरसंहार हुए हैं, जिनमें सीधे-सीधे सरकारों का हाथ रहा है, लेकिन 22 मई और 23 मई 1987 को हुए हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहार ऐसे हैं, जो आजाद भारत की बदतरीन मिसालें हैं और देश के नाम पर कलंक की तरह हैं। यह कलंक और तब बढ़ जाता है, जब नरसंहार के चौबीस साल भी  पीड़ितों को न्याय तो दूर, दोषियों को बचाने की कोशिश की जाती है।
मई 1987 को मेरठ में एक दिन के अंतराल पर दो ऐसे नरसंहार हुए थे, जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है।  22 मई 1987 मेरठ के हाशिमपुरा से उत्तर प्रदेश के प्रांतीय सशस्त्र बल ( पीएसी ) ने 44 मुसलमान नौजवानों को अपने ट्रकों में भरा और उन्हें मुराद नगर (गाजियाबाद) की गंग नहर पर ले जाकर गोलियों से भूना और लाशों को नहर में बहा दिया था। क्या यह नरसंहार ऐसा ही नहीं था, जैसे मुंबई में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने किया था ? सवाल यह है कसाब को क्यों डेढ़ साल में फांसी की सजा दे दी गयी और हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहार के दोषी क्यों आजाद घूम रहे हैं ? सवाल यह है कि 26/11 और मलियाना-हाशिमपुरा के नरसंहार में क्या अन्तर है ? क्या मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार में मरने वाले भारतीय नागरिक नहीं थे ?
22 मई को हाशिमपुरा में क्या हो गया था इसका पता बाकी मेरठ को नहीं था। 23 मई 1987 को पीएसी ने एक और ऐसे नरसंहार को अंजाम दिया, जो क्रूरता की मिसाल बन गयी। मेरठ से लगभग पांच किलाोमीटरा दूर है मलियाना। लगभग दस हजार की इस आबादी में मुसलमानों की संख्या दस प्रतिशत भी नहीं है। मेरठ शहर में दंगे होते रहते थे, लेकिन मलियाना साम्प्रदायिक हिंसा में कभी नहीं झुलसा था। भले ही 18/19 मई की रात से पूरे मेरठ में भयानक दंगा भड़का हूआ था, लेकिन मलियाना शांत था और यहां पर कफ्ूर्य भी नहीं लगाया गया था। यहां कभी हिन्दू-मुस्लिम दंगा तो दूर तनाव तक नहीं हूआ था। हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ सुख चैन से रहते आ रहे थे। लेकिन कुछ साम्प्रदायिक शक्तियों, पुलिस और पीएसी ने मलियाना को वो जख्म दिए, जिसकी पीड़ा उन्हें आज भी होती है। पूरे परिवार खत्म कर दिए गए थे। उस मंजर को याद करके यहां के लोग आज भी कांप उठते हैं। लगभग दोपहर बारह बजे से पुलिस और पीएसी ने मलियाना की मुस्लिम आबादी को चारों ओर से घेरना शुरु किया। यह घेरे बंदी लगभग ढाई बजे खत्म हुई। घेरेबंदी कुछ इस तरह की जा रही थी मानो दुष्मन देष के सैनिकों पर हमला करने के लिए उनके अड्डों को घेर रही हो। पूरे इलाके को घेरने के बाद कुछ पुलिस और पीएसी वालों ने घरों के दरवाजों पर दस्तक देनी शुरु कर दी। दरवाजा नहीं खुलने पर उन्हें तोड़ दिया गया। घरों में लूट और मारपीट शुरु कर दी नौजवानों को पकड़कर एक खाली पड़े प्लाट में लाकर बुरी तरह से मारा-पीट कर ट्रकों में फेंकना शुरु कर दिया गया। दरअसल, पीएसी हाशिमपुरा की तर्ज पर ही मलियाना के मुस्लिम नौजवानों को कहीं और ले जाकर मारने की योजना पर काम रहे थे, लेकिन पीएसी की फायरिंग से इतने ज्यादा लोग मरे और घायल हुए थे कि पीएसी की योजना फेल हो गयी थी। पुलिस और पीएसी लगभग ढाई घंटे तक फायरिंग करती रही। इस ढाई घंटे की फायरिंग में में 73 लोग मारे गए थे।
23 साल बाद इस 23 मई को मलियाना के लोगों ने मरने वालों की याद में एक कार्यक्रम किया था। सब के पास सुनाने के लिए कुछ न कुछ था। मौहम्मद यामीन के वालिद अकबर को दंगाईयों ने पुलिस और पीएसी के सामने ही मार डाला था। नवाबुद्दीन ने उस हादसे में अपने वालिद अब्दुल रशीद और वालिदा इदो को पुलिस और पीएसी के संरक्षण में अपने सामने मरते देखा। आला पुलिस अधिकारियों के सामने ही दंगाईयों ने महमूद के परिवार के 6 लोगों को जिन्दा जला दिया। शकील सैफी के वालिद यामीन सैफी की लाश भी नहीं मिली थी। प्रशासन यामीन सैफी को 'लापता' की श्रेणी में रखता है। आज भी उस मंजर को याद करके लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। जब कभी उस हादसे का जिक्र होता है तो लोग देर-देर तक अपनी बदकिस्मती की कहानी सुनाते रहते है। मलियाना के लोगों को राजनैतिक दलों से भी बहुत शिकायतें हैं। उनका कहना है कि सभी राजनैतिक दलों ने मलियाना कांड पर सियासत की, लेकिन इस बात की किसी भी दल ने कोशिश् नहीं की कि मलियाना नरसंहार के लिए गठित जीएल श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करके दोषियों को सजा दिलाए। मलियाना के लोगों का यह भी लगता है कि सरकार ने मृतक आश्रितों को मुआवजा राशि देने में भी भेदभाव से काम लिया। उनका कहना है कि उन्हें केवल 40-40 हजार रुपयों का मुआवजा दिया गया था, जो अपर्याप्त था। पीड़ितों की मांग है कि उन्हें भी उसी तरह का राहत पैकेज दिया जाए, जिस तरह से सिखों को दिया गया है।  विपक्ष और मीडिया के तीखे तेचरों के चलते इस नरसंहार एक सदस्यीय जांच आयोग से जांच कराने का ऐलान किया गया था। आयोग के अध्यक्ष जीएल श्रीवास्तव ने एक साल में ही जांच पूरी करके सरकार को रिपोर्ट सौप दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट का हश्र भी ऐसा ही हूआ, जैसा कि अन्य आयोगों की रिपोर्टां का अब तक होता आया है। कहा जाता है कि जांच आयोग की रिपोर्ट में पुलिस और पीएसी को दोषी ठहराया गया है।
इस अति चर्चित नरसंहार सुनवाई यूं तो फास्ट ट्रेक अदालत में चल रही है, लेकिन अभी भी उसकी चाल बेहद सुस्त है। फास्ट ट्रेक अदालतों का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि मलियाना जैसे जघन्य मामलों की सुनवाई जल्दी से जल्दी हो सके। मुख्य गवाहों को धमकाया जा रहा है। बयान बदलने के लिए पैसों का लालच दिया जा रहा है। 
मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार पर वरिष्ठ पत्रकार हरि शंकर जोशी की टिप्पणी
मैं भी एक ऐसा ही इंसान हूं, जिसने मेरठ के दंगों के सच को भुगता है। दिनमान के रिपोर्टर जसवीर उर्फ जस्सी जो दुर्भाग्य से इस दुनिया में नहीं हैं और मैं सबसे पहले मलियाना पहुंचे थे। जहां पीएसी ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर ग्रामीणों का नरसंहार किया था। रात ग्यारह बजे वहां से लौटकर दंगे के इस सच को जस्सी ने बीबीसी में फ्लैश  कराया था। मैने उसे अमर उजाला में लिखा था। लेकिन खबर प्रकाषन के लिए तमाम जद्दोजहद के बाद तभी जा सकी थी, जब बीबीसी ने उसे प्रसारित कर दिया था। उसके बाद कुछ संगठनों ने अमर उजाला की प्रतियां जलाईं थीं। पत्रकारों को भुगतने की धमकी दी थी। हाशिमपुरा तो पीएसी की इंतहा थी। मैं जानता हं कि यदि विभूति गाजियाबाद के एसएसपी न होते और 'चौथी दुनिया' न होता तो हाशिमपुरा का नंगा सच कभी सामने न आता। मैं दंगे के दौरान हाशिमपुरा की घटना का काफी हद तक साक्षी रहा हूं। मैने नहर पर नरसंहार की घटना से पहले हाशिमपुरा की फायरिंग भी देखी है, जब एक तरफ से पुलिस गोलियां चला रही थी तो दूसरी तरफ से दंगाई छतों पर चढ़कर बराबर का मुकाबला कर रहे थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आप चंद सिरफिरे बदमाशों  के लिए सामुहिक नरसंहार कर दो। मुझे याद है कि वीरेंद्र सेंगर किस तरह जान हथेली पर रखकर काम कर रहे थे। मैं जिस गली में घुसता वहां वीरेंद्र मिल जाते और पूछते तुम्हें पुलिस व पीएसी नहीं रोकती। लेकिन अफसोस कि आज तक हाशिमपुरा को इंसाफ नहीं मिला और न उन दंगाईयों को सजा जिन्होंने दंगे में निर्दोषों का खून बहाया।


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