हृदयनारायण दीक्षित
सच क्या है? सत्य का सत्य आधुनिक विज्ञान की बड़ी चुनौती है। पंथिक पुस्तकों के अनेक तथ्य विज्ञान की खोजों में सत्य नहीं निकले। लेकिन वैज्ञानिक खोजें भी अंतिम सत्य नहीं होती। भौतिक विज्ञान प्रत्यक्ष को सत्य मानता है। प्रत्यक्ष का साधारण अर्थ प्रति-अक्ष यानी आंख के सामने होता है। वैदिक साहित्य में ‘अक्ष’ का मतलब इन्द्रियां हैं। यहां आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा से प्राप्त जानकारी भी प्रत्यक्ष मानी गयी है। लेकिन भारतीय दर्शन में प्रत्यक्ष को ही सत्य नहीं माना गया है। सत्य प्राप्त की यात्रा में प्रत्यक्ष एक उपकरण है। दरअसल जो प्रत्यक्ष है, वह रूप है, रूप अस्थायी है। प्रत्येक रूप का नाम है। नाम समूह बोधक हैं व्यक्ति भी बोधक है। भैंस या गाय समूह बोधक हैं। राम-श्याम व्यक्ति बोधक हैं। लेकिन रूप की तरह नामों की भी स्थायी सत्ता नहीं है। वैज्ञानिक भौतिकवादी/मार्क्सवादी मित्र यथार्थवाद शब्द का प्रयोग करते हैं। यथार्थ भी प्रकृति के गुणों से विकसित नाम रूप की ही सत्ता है। यथार्थ ‘यथा-अर्थ’ है। जैसा रूप, गुण वैसा अर्थ। सो यथार्थ भी सत्य नहीं होता। साधारण बोलचाल की भाषा में एक शब्द चलता है वास्तव। ‘वास्तव’ यथार्थ का करीबी है लेकिन यथार्थ से गहरा है। ‘वास्तव’ नाम रूप की सत्ता के भीतर के संकेत देता है।

‘वस्तुतः’ भी ऐसा ही शब्द है। अंग्रेजी में इसे आबजेक्टिव कह सकते हैं। वस्तुतः का अर्थ वस्तुपरक होता है। वस्तुतः भी सत्य नहीं होता। वस्तुपरकता की सीमा है। यह देश काल में आबद्ध है। वास्तव और यथार्थ भी देशकाल के भीतर है। ये सब समय चक्र की चक्की में पिसते हैं। भूतकाल का यथार्थ वर्तमान काल में दूसरा हो जाता है। सत्य पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता। वैदिक अनुभूतियों में सत्य ‘काल अबाधित सत्ता’ है। समाज जीवन में सत्य बोलने पर जोर है। लेकिन सत्य बोला नहीं जा सकता। बोलने के काम में कई क्रियाएं चलती हैं। पहला है – देखे हुए को समझना। दूसरा – समझे हुए को भाषा और शब्द फिर तीसरा है उच्चारण करना। तीनों चरणों में भारी गलतियां होती है। देखे हुए को ठीक से समझना यथार्थ है। समझ को सार्वजनीन समझ के लायक बोलना बहुत कठिन है। मैं दार्शनिक विषयों पर लिखता हूँ अपनी प्रगाढ़ समझ के बावजूद मैं सबकी समझ लायक शब्द वाक्य बनाने का प्रयास करता हूँ। लेकिन ‘यथार्थ और वास्तव’ को प्रकट नहीं कर पाता। भाषा की सीमा है। रत्नाकर जी हिन्दी के बड़े कवि ने खूबसूरत कविता में गोपियों का प्रेम वर्णन किया है नेकु कही नैननि सों/ अनेकु कही बैननि सों/रही सही सोऊ कहि दीन्ही हिचकीन सों। गोपियों ने उद्धव से श्रीकृष्ण का प्रेम बताया थोड़ा आंखों से बोलकर/थोड़ा वाणी से और शेष हिचकियों से रोकर। पूरा तो भी नहीं कह पायीं।

प्रेम अनिर्वचनीय है, अकथनीय है। प्रेम सत्य है। सत्य प्रेम है। सत्य कैसे बोला जाये? बोलना बोलने के पहले ही अर्ध्दसत्य हो जाता है। क्या मनुष्य सत्य है? बेशक वह प्रत्यक्ष है, वह वास्तविकता भी है लेकिन मनुष्य अपने आपमें अविभाज्य नहीं है। वह शिशु है, तरुण है, रुग्ण है, स्वस्थ है, वृद्ध है, मेधावी है, पराक्रमी है, वह वरिष्ठ है, कनिष्ठ है। मनुष्य कहने से आधा अधूरा बोध भी नहीं होता। बेशक मनुष्य कहने से यह पशु नहीं है, मेज, रेल या भवन नहीं है जैसे निषेध बोध होते हैं। वास्तविकता सत्य नहीं होती। वास्तविकता की समझ का उपकरण इन्द्रियां ही हैं। इन्द्रिय बोध की सीमा है। हम दूर से जिसे कुत्ता समझते हैं, निकट आने पर वही बिल्ली है, तो क्या बाद में देखी गई बिल्ली ही सत्य है? नहीं ठीक जांचने से प्राप्त बिल्ली की समझ भी अंतिम नहीं है। बिल्ली भी रूप है, समूहवाची संज्ञा है। सत्य का साक्षात्कार नितांत भिन्न घटना है। रोजमर्रा के जीवन में बोला जा रहा सत्य दरअसल सत्य न होकर यथार्थ ही है।

तब सत्य क्या है? दर्शन का जन्म सत्य की खोज में ही हुआ। प्रत्यक्ष ही सत्य होता तो दर्शन की जरूरत न होती। भारतीय ऋषि सत्य अभीप्सु थे। ईशावास्योपनिषद् यजुर्वेद का 40वाँ अध्याय है। कह सकते हैं विश्व की प्राचीनतम् उपनिषद् ईशावास्योपनिषद् और वृहदारण्यक उपनिषद् में ‘सत्य’ के दर्शन की गहन प्रार्थना है। दोनों उपनिषदों में एक साथ आए एक मंत्र में कहा गया है – हिरण्यमय पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं। तत्त्वं पूषन्न पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये। प्रार्थना है कि सत्य का मुंह चकाचौंध करते स्वर्ण पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन आप इस स्वर्ण ढक्कन को हटाइए और मुझे सत्यनिष्ठ को दर्शन करवाइए। शंकराचार्य का खूबसूरत भाष्य है – जिनका चित्त स्थिर और निर्मल नहीं है। सत्य उनके लिए अदृश्य है। सत्य का मुख ढका हुआ है। हे पूषन दर्शन में रुकवाट डालने का कारण (आवरण) दूर करो। ‘स्वर्ण ढक्कन’ और ‘सत्य का मुख’ बड़े सुन्दर प्रतीक हैं। यहां स्वर्ण ढक्कन रूप हैं, नाम हैं, प्रकृति के गुण हैं। सांसारिक प्रपंच हैं। ऐसे सारे सांसारिक प्रपंचों ने हम सबकी बुध्दि को आच्छादित कर लिया है। हम यथार्थ और वस्तुतः को ही सत्य समझ बैठे हैं। आवरण सत्य के मुंह पर नहीं है। आवरण हमारी समझ पर है, हमारे बोध पर ही है। लेकिन ऋषि सत्य के मुंह पर स्वर्ण का आवरण बताकर हमारी समझ को सरल दिशा देते हैं। वरना सत्य का मुख कहां होता है? सामान्य जीवन में प्रत्येक मुख का ही अपना सत्य होता है।

सत्य प्रकृति सृष्टि का मूल कारण है। विज्ञान प्रत्येक कार्य का कोई कारण मानता है। दर्शन में भी प्रत्येक कार्य का कारण है। सृष्टि विराट ‘कार्य’ है। सृष्टि जैसा विराट कार्य बिना कारण नहीं हो सकता। शंकराचार्य ने कई जगह सृष्टि को ‘कार्यब्रह्म’ नाम दिया है और ब्रह्म को कारण ब्रह्म बताया है। उपनिषद् दर्शन में सत्य और ब्रह्म पर्यायवाची है। सत्य ही सृष्टि का मूल कारण है। प्रश्न उठता है कि तब सत्य का क्या कारण है? कार्यकारण सिध्दांत के अनुसार सत्य का भी कोई कारण होना चाहिए। उपनिषद् दर्शन के अनुसार सत्य सदा से है, वह सनातन है, चिरन्तन है, विभु है, अज है, अजन्मा है। उसका कोई कारण नहीं। वह है तो है। बाकी सब उसका विकास है। कपिल दर्शन में विकास को खूबसूरत तरीके से विकार कहा गया है। सारी दुनिया के दार्शनिक इसी सत्य की खोज में लगे रहे हैं। जिन्होंने जाना, वे परम आनंदित हुए लेकिन पूरा-पूरा कह नहीं पाये। सत्य अकथनीय है।

कठोपनिषद् (और गीता में भी) में परम तत्व को प्रवचन, विद्वता, या वेद-श्रुति के जरिए अप्राप्य बताया गया है लेकिन प्रवचन के व्यापार हैं, विद्वता के घमंड है। वेदों के उद्धरण हैं। वेद उपनिषद् संकेतक है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, बादरायण, कपिल, बुद्ध, रामकृष्ण, कबीर, रविदास या ऐसे ही पूर्वज हम सबकी प्रेरणा हैं कि उन्होंने सत्य पाया है तो हम भी पा सकते हैं लेकिन इनके शब्दों को रटने से सत्य दर्शन की यात्रा असंभव है। भारत सत्य अभीप्सु ऋषियों पूर्वजों की धरती है। यहां सत्य के अनूठे प्रयोग हुए हैं। सत्य धर्मान् महानुभावों ने हिरण्यकोष त्यागे हैं। वे प्रत्यक्ष रूप में, वास्तव में, वस्तुतः बड़े गरीब, निर्वस्त्र साधनहीन थे लेकिन सत्यतः वे भीतर से परम समृद्ध, आनंदमगन, परिपूर्णमुक्त ऋतस्य पन्थ के यात्री थे। सत्य की अभीप्सा भारतीय संस्कृति की सनातन पूंजी है। भारत का अर्थ ही प्रकाशरत (भा-प्रकाश, रत-संलग्न) है। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के मन्त्र में सत्य ज्योति की ही अभीप्सा है। भारत की आधुनिक पीढ़ी को सत्य और यथार्थ में फर्क करना चाहिए। नई पीढ़ी में ही भारत का भविष्य है।
(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं)


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

  • नाम का पास - फ़िल्म 'गाइड' में नायक राजू को रात में ठंड से ठिठुरता देखकर कोई उसे ज़र्द कपड़ा ओढ़ा जाता है. इसी कपड़े की वजह से गांववाले उसे संत-महात्मा समझ लेते हैं. वह गा...
  • اچھا خواب - رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: “اگر تم میں سے کوئی اچھا خواب دیکھے تو خوش ہو اور صرف اس کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہے۔” حوالہ: صحیح مسلم ، حدیث نمبر: 5902 ...
  • Sayyida Fatima al-Zahra Salamullah Alaiha - On this blessed 20th of Jamadi al-Thani, we celebrate the birth of Sayyida Fatima al-Zahra alamullah Alaiha — the Lady of Light, the Mother of the Imams,...
  • میرے محبوب - بزرگروں سے سناہے کہ شاعروں کی بخشش نہیں ہوتی وجہ، وہ اپنے محبوب کو خدا بنا دیتے ہیں اور اسلام میں اللہ کے برابر کسی کو رکھنا شِرک یعنی ایسا گناہ مانا جات...
  • उमरपुरा के सिख भाइयों ने बनवाई मस्जिद - *डॉ. फ़िरदौस ख़ान * हमारे प्यारे हिन्दुस्तान की सौंधी मिट्टी में आज भी मुहब्बत की महक बरक़रार है. इसलिए यहां के बाशिन्दे वक़्त-दर-वक़्त इंसानियत, प्रेम और भाई...
  • 25 सूरह अल फ़ुरक़ान - सूरह अल फ़ुरक़ान मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 77 आयतें हैं. *अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है*1. वह अल्लाह बड़ा ही बाबरकत है, जिसने हक़ ...
  • ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ - ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਿਤੋਂ ਕਬੱਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਬੋਲ ਤੇ ਅੱਜ ਕਿਤਾਬੇ-ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੋਈ ਅਗਲਾ ਵਰਕਾ ਫੋਲ ਇਕ ਰੋਈ ਸੀ ਧੀ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਤੂੰ ਲਿਖ ਲਿਖ ਮਾਰੇ ਵੈਨ ਅੱਜ ਲੱਖਾਂ ਧੀਆਂ ਰੋਂਦੀਆਂ ਤ...

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं