डॉ. एस अय्यप्पन
राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है जो कृषि उत्पादकता एवं उत्पादन बढाने वाली प्रौद्योगिकियों के सृजन के माध्यम से कृषि के सर्वांगीण विकास में उत्प्रेरक भूमिका निभा रही है। भारत एक समय खाद्यान्नों के लिए आयात पर निर्भर रहता था लेकिन अब वह खाद्यान्नों का निर्यात करने लगा है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) देशभर में फैले अपने 98 शोध संस्थानों और 578 कृषि केंद्रों के व्यापक नेटवर्क के माध्यम से कृषि अनुसंधान, शिक्षा और उसके विस्तार का नेतृत्व करती रही है। इसके अलावा वह अपने विशिष्ट अनुसंधान एवं अकादमिक प्रयासों के तहत 45 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों का सहयोग कर रही है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के मद्देनजर परिषद ने कृषि को ज्यादा लाभपरक बनाने के लिए अपने अनुसंधान शिक्षा और शैक्षणिक कार्यक्रम का स्वरूप बदला है। इससे उत्पादन -उपभोग प्रणाली के मद्देनजर कृषि तंत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है

भारत में फिलहाल वैश्विक उत्पादन की दृष्टि से करीब 12 प्रतिशत गेहूं , 21 प्रतिशत चावल, 25 प्रतिशत दलहन, 10 प्रतिशत फल, 22 प्रतिशत गन्ना और 16 प्रतिशत दूध उत्पादन हो रहा है। यह सब महज 2.3 प्रतिशत भूमि, 4.2 प्रतिशत पानी और 11 फीसदी से थोड़ा अधिक कृषि भूमि से हासिल किया जा रहा है। इस कृषि भूमि में महज 50 फीसदी में सिंचाई सुविधा है। इन संसाधनों से विश्व की 18 प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण हो रहा है। कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास पर किए गए निवेश से 48 प्रतिशत प्रतिफल मिल रहा है और इस क्षेत्र की ताकत का हाल के वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान पता चला जब भारत आरामदायक स्थिति में बना रहा।

हालांकि ज्ञान आधारित संगठन आईसीएआर प्रौद्योगिकी आधारित अभिनवकारी पहल के माध्यम से इन चुनौतियों के समाधान में जुटा है। जैविक एवं अजैविक दबावों, घटती जैवविविधता, सिकुड़ते और क्षरित होते संसाधन और जलवायु में लगातार होते परिवर्तन जैसे मुद्दों से भी सक्रियता से निबटा जा रहा है। दरअसल किसानों का कल्याण, जीविका, खाद्य एवं पोषण संबंधी सुरक्षा, समानता और समृध्दि ही संपूर्ण रणनीति है। सार्वजनिक एवं निजी उपक्रमों के साथ मिलकर परिषद ने सामूहिक प्रयासों से महत्वपूर्ण जिंसों में उत्पादन से लेकर उपभोग प्रणाली के बारे में ग्रामीण आजीविका का प्रौद्योगिकी आधारित स्थायी मॉडल उपलब्ध कराया है। परिषद ने अति पिछड़े 150 जिलों में से 102 में प्रौद्योगिकी आधारित अभिनवकारी संपोषणीय ग्रामीण जीविका की पहल की है जिससे 50 हजार कृषक परिवार लाभान्वित हो रहे हैं।

जलवायु की परिवर्तनशीलता से फसलों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए महाराष्ट्र में अजैविक दबाव प्रबंधन संस्थान की स्थापना की गयी और उसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया है। यह संस्थान क्रियाशील है। इस अनुसंधान आधारित संस्थान के चार बहुपरक विद्यालय हैं जो विभिन्न प्रकार के अजैविक दबावों से निबटने के तौर तरीके ढूंढने में लगे हैं। सूखा और बाढ से फ़सल के नुकसान को रोकने के लिए फसल की ऐसी किस्मों को विकसित करने पर विशेष बल दिया जा रहा है जो नमी की कमी तथा जलभराव को झेल सकें। 35 संस्थानों के सहयोग से एक बहुपरक कार्यक्रम शुरू किया गया है जिसका लक्ष्य बोयी गयी फसल को प्रतिकूल मौसम में अधिकाधिक विकास परिस्थितियां प्रदान की जा सकें और बदली हुई जलवायु स्थिति में उपज अधिक हो।

किसानों को गुणवत्ता पूर्ण बीज और पौध सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आईसीएआर ने अपना प्रयास तेज कर दिया है जिससे 2009-10 में 7340 टन बीजों और 25 लाख पौध सामग्री का उत्पादन और वितरण हो पाया। परिषद 578 कृषि केंद्रों के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि किसानों को समय से यह सामग्री और जरूरी दिशानिर्देश मिल जाएं।

पशुधन उत्पादन में 6 प्रतिशत की लक्षित वृध्दि को हासिल करने और पशुधन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए उच्च सुरक्षा वाली पशु रोग प्रयोगशाला स्थापित की गयी। यह प्रयोगशाला टीके विकसित करने के अलावा एवियन एंपऊलूएंजा की पहचान में अहम भूमिका निभा रही है। अंतर्राष्ट्रीय फुट एंड माउथ डिजीज रेफेरेंस प्रयोशाला की स्थापना की जा रही है और यह संस्थान वैश्विक भागीदारी के माध्यम से दक्षिण एशिया में इस बीमारी के उन्मूलन में अहम भूमिका निभाएगा। फसल के पौधों की बीमारियों की पहचान के लिए डायगनोस्टिक किट तैयार किए गए हैं। कपास और सोयाबीन के लिए कीट निगरानी की इलैक्ट्रॉनिक प्रणाली शुरू की गयी है।

बौध्दिक संपदा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए परिषद ने अपने दिशानिर्देश तैयार किए हैं जो अनुसंधान साझेदारी के लिए जरूरी ढांचा प्रदान करते हैं। आईसीएआर ने विकेंद्रीकृत त्रिस्तरीय सांस्थानिक प्रणाली अपनायी है जिसके तहत हर संस्थान में संस्थान प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई (आईटीएमयू) और संस्थान प्रौद्योगिकी प्रबंधन समिति (आईटीएमसी) गठित की गयी है। इन इकाइयों और समितियों को बौध्दिक संपदा और प्रौद्योगिकी प्रबंधन से जुड़े मामलों का दैन्दिन आधार पर निदान कराने का अधिकार है। वाणिज्यिक दृष्टि से बहुत ही उपयोगी प्रौद्योगिकी तैयार करने वाले पांच संस्थानों को क्षेत्रीय प्रौद्योगिकी प्रबंधन एवं व्यापार नियोजन एवं विकास इकाइयों के रूप में चुना गया है। ये आईटीएमयू के साथ मिलकर अपने संबंधित क्षेत्र में क्षेत्रीय आधार पर प्रौद्योगिकी स्थानांतरण की कार्ययोजना बनाते हैं। आईसीएआर में केंद्रीय प्रौद्योगिकी प्रबंधन समिति एक ऐसी शीर्ष इकाई है जो प्रौद्योगिकी-कानूनी एवं नीतिगत मामलों में अपना फैसला देती है। इसका काम संपोषणीय सार्वजनिक निजी साझेदारी निर्माण संबंधी अधिकाधिक पहलों को बढावा देना भी है।

ज्ञान आधारित इस युग में विभिन्न हितधारकों के बीच कृषि ज्ञान एवं सूचनाओं का विनिमय एक महत्वपूर्ण अवयव है। अतएव, परिषद कृषि के सभी हितधारकों तक कम लागत पर संदेशों के त्वरित, प्रभावी प्रसार के लिए ज्ञान आधारित एवं प्रौद्योगिकी केंद्रित सूचना वितरण प्रणाली के विकास में जुटी हुई है। सूचना और संचार क्रांति के साथ कदमताल करते हुए लक्षित वर्ग तक पहुंचने के लिए आईसीटी की मदद ली जा रही है। परिषद के मुख्यालय में एक हब ने काम करना शुरू कर दिया है जो ई कनेक्टिविटी के माध्यम 192 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और आठ क्षेत्रीय परियोजना निदेशालयों से जुड़ा है। धीरे धीरे इसका विस्तार किया जाएगा। ई सुविधा से केवीके के लिए एक ऐसा माहौल तैयार होने की उम्मीद है जिससे वैज्ञानिक किसानों को उपयुक्त प्रौद्योगिकी, श्रेष्ठ पध्दतियों और विचारों के बारे में बता पाएंगे। इस सुविधा से कृषि से संबंधित वैश्विक ई सामग्री की पहुंच इंटरनेट पर सुनिश्चित होगी और केवीके वेबपेज के विकास में मदद मिलेगी। दो तरफा श्रवण एवं एकतरफा वीडियो प्रसारण से हितधारकों के बीच संवाद प्रक्रिया मजबूत होगी। इस व्यवस्था से कंप्यूटर के माध्यम से जिले में मोबाइल धारक किसानों और अन्य हितधारकों को उचित परामर्श या सलाह भी भेजी जा सकेगी। आईसीएआर की वेबसाइट पर मौसम आधारित कृषि सलाह नियमित रूप से जारी की जाती है। किसान मोबाइल एडवायजरी सेवा शुरू की गयी है जिसके तहत हर मंगलवार और शुक्रवार को किसानों को केवीके जरूरी संदेश पहुंचाते हैं। मोबाइलों पर करीब छह लाख 24 हजार संदेश भेजे गए हैं जिनसे करीब 60 हजार किसानों को लाभ पहुंचने की आशा है।

सूचना क्रांति के साथ कदमताल करते हुए परिषद प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक और वेब के माध्यम से किसानों और अन्य हितधारकों को उपयुक्त कृषि प्रौद्योगिकियां पहुंचा रही है। कृषि, पशुपालन, मत्स्यिकी तथा अन्य संबध्द क्षेत्रों पर कई प्रकार की पुस्तकें, लेख, पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं और देशभर में वे हितधारकों तक पहुंचती हैं। हाल ही में परिषद ने दूरदर्शन और आकाशवाणी पर नियमित दृश्य एवं श्रव्य कार्यक्रम शुरू किए हैं जहां विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ लक्षित समूह के साथ अपना ज्ञान और अनुभव बांटते हैं। लाभकारी कृषि प्रौद्योगिकी पर परिषद द्वारा वीडियो फिल्में दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर नियमित रूप से दिखायी जा रही हैं। परिषद की वेबसाइट को उपयोगकर्ताओं के लिए ज्यादा उपयोगानुकूल बनाने के लिए उसे नया स्वरूप प्रदान किया गया है और उसपर एफएक्यू आदि सुविधा है। इस वेबसाइट से प्रतिमाह 97 हजार से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं। परिषद द्वारा प्रकाशित अनुसंधान पत्रिकाएं दुनियाभर में पहुंचती हैं।

चूंकि कृषि लगातार ज्यादा से ज्यादा ज्ञान आधारित और बाजारोन्मुखी होती जा रही है, ऐसे में अधिकाधिक अभिनवकारी अनुसंधान, विकास प्रयास, कुशल नीतियां और सेवाओं का प्रभावी प्रदाय, आपूर्ति आदि अनिवार्य हैं। राष्ट्रीय कृषि नीति में संपोषणीय पारिवारिक खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि क्षेत्र में चार फीसदी से अधिक की वृध्दिदर का लक्ष्य तय किया गया है। समय बीतने के साथ ही नये अनुसंधान निश्चित रूप से पूंजी एवं ज्ञान पर ज्यादा केन्द्रित होंगे। इसके अलावा अनुसंधान एवं विकास में सामान्य रूप से और खासकर कृषि के क्षेत्र में निवेश के मद्देनजर हमें इस बात को लेकर चुनिंदा रुख अपनाना होगा कि क्या किया जाना चाहिए और उसे कैसे किया जाना चाहिए ताकि संसाधनों का समुचित इस्तेमाल हो।

कृषि क्षेत्र में वृध्दि कई कारकों की उपज है ये हैं- एनएआरएस, समर्थकारी नीतिगत माहौल, पर्याप्त सार्वजनिक धन व्यवस्था, सहयोगी बाजार, ऊर्जा समेत अन्य निवेश, आय में सुधार। ये तत्व कृषि क्षेत्र को गति प्रदान करने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। आज कृषि और खाद्य क्षेत्र की जो स्थिति है, वह अगले दो दशक बाद काफी भिन्न होगी, ऐसे में परिषद मौजूदा कृषि को ज्यादा उत्पादकतापूर्ण, कुशल और संपोषणीय बनाने के प्रयास में जुटी हुई है।


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