डॉ. फ़िरदौस ख़ान
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई. बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाये. हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी. हमने भी अल सुबह अपने पीर को मुबारकबाद दी और उन्होंने हमेशा की तरह हमें दुआएं दीं.
बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई. वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे. एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं. ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह के पास पहुंच गए. अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे.
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई. बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाये. हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी. हमने भी अल सुबह अपने पीर को मुबारकबाद दी और उन्होंने हमेशा की तरह हमें दुआएं दीं.
बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई. वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे. एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं. ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह के पास पहुंच गए. अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे.
