नज़्म : साहिल

Posted Star News Agency Saturday, November 08, 2025 ,


अब तुम को कैसा लगता है
जाड़ों के मौसम का सूरज
गर्मी की रातों का चन्दा
बारिश तुम को बहुत पसन्द थी
जब भी बादल घिर आते थे
लम्बी काली घनेरी ज़ुल्फें
अपने कांधों पर बिखराकर
आंगन में ऐसे फिरती थीं
जैसे कोई हिरनी बन में
देख के काले काले बादल
अपना आपा खो बैठी हो
अब तुमको कैसा‍‍------
इक दिन टेलीफोन पे तुमने
नाम मिरा "साहिल" रक्खा था
मैंने हंसकर ये पूछा था
नाम मिरा साहिल क्यों रक्खा
इठला कर तुम ये बोली थीं
हमने अपने दिल की किश्ती
प्यार के दरिया में छोड़ी है
किश्ती को तो इक न इक दिन
साहिल पर रुकना होता है-----
चारों जानिब सन्नाटा है
पलकों पर जुगनू रक्खे हैं
तन्हा बैठा सोच रहा हूँ
तुमने झूट कहां बोला था
मैं ही आज समझ पाया हूँ
साहिल एक कहाँ होता है
साहिल भी तो "दो " होते हैं
-फा़खि़र अदीब
                    ساحل
           اب تمکو کیسا لگتا ہے
جاڈوں کے موسم کا سورج
گرمی کی راتوں کا چندا
بارش تمکو بہت پسند تھی
جب بھی بادل گھر اَتے تھے
لمبی کالی گھنیری ذلفیں
اپنے کاندھوں پر بکھرا کر
اَنگن میں ایسے پھرتی تھیں
جیسے کوی ہرنی بن میں
دیکھ کے کالے کالے بادل
اپنا اَپا کھو بیٹھی ہو۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ 
اب تمکو کیسا لگتا ہے
-----
اک دن ٹیلیفون پے تم نے
نام مرا ساحل رکھا تھا  
مینے ہنس کر یہ پوچھا تھ
نام مرا "ساحل" کیوں رکھا
اٹھلا کر تم یہ بولی تھیں
ہم نے اپنے دل کی کشتی
پیار کے دریا میں چھو ڈی ہے
کشتی کو تو اک نہ اک دن
ساحل پر رکنا ہوتا ہے۔۔۔۔۔۔ 
چاروں جانب سناٹہ ہے
پلکوں پر جگنو رکھے ہیں
تنہا بیٹھا سوچ رہا ہوں 
ساحل" ایک کہاں ہوتا "
ساحل بھی تو دو ہوتے ہیں
فاخر ادیب


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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